- विद्युत सेल से विद्युत-परिपथ बनाते समय यदि हमारे पास विद्युत लैंप नहीं है तो क्या हमारे पास कोई अन्य विधि है जिसके द्वारा हम पता लगा सकते हैं कि उस परिपथ में धारा प्रवाहित हो रही है या नहीं?
- क्या अस्थायी चुंबक बनाना संभव है? इन्हें कैसे बनाया जा सकता है?
- हम जीवाश्म ईंधन एवं लकड़ी को जलाकर ऊष्मा उत्पन्न करते हैं परंतु विभिन्न प्रकार के विद्युत उपकरणों में ऊष्मा कैसे उत्पन्न होती है?
- हम कैसे ज्ञात कर सकते हैं कि कोई सेल अथवा बैटरी अब कार्य के योग्य नहीं रह गई है? क्या सभी प्रकार के सेलों अथवा बैटरियों को पुनः आवेशित करके कार्य के योग्य बनाया जा सकता है?
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विद्यालय में विज्ञान प्रदर्शनी लगी थी जिस कारण चारों ओर चहल-पहल थी। मोहिनी और आकर्ष ने अपने मित्रों के साथ एक प्रदर्श से दूसरे प्रदर्श पर जाकर उत्सुकतापूर्वक विभिन्न प्रदर्शों के विषय में खोजबीन की, प्रश्न पूछे एवं मुख्य बिंदु अभिलेखित किए। एक सामान्य प्रदर्श ने उन्हें बहुत आकर्षित किया। यह उनके विद्यालय की वरिष्ठ विद्यार्थी सुमना द्वारा प्रदर्शित उत्थापक विद्युत-चुंबक का कार्यकारी प्रदर्श था। इसमें किसी क्रेन की तरह कोई हुक नहीं लगा था अपितु एक कील के ऊपर तार लपेटकर उसे बैटरी से संयोजित किया गया था। जब सुमना ने परिपथ बंद किया तो कील ने लोहे से बनी कागज-क्लिपों (पेपर क्लिपों) को चुंबक की भाँति ऊपर उठाया। जैसे ही सुमना ने परिपथ खोला तो कागज क्लिपें कील से पृथक हो गईं। मोहिनी एवं आकर्ष आश्चर्यचकित थे। उन्हें कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा के अध्याय 'चुंबकों को जानें' में सीखा हुआ यह तथ्य स्मरण हो आया कि चुंबकीय पदार्थ चुंबकों द्वारा आकर्षित होते हैं और लोहा एक चुंबकीय पदार्थ है परंतु सुमना के प्रदर्श में कोई चुंबक नहीं था अपितु एक विद्युत परिपथ था। वे बहुत रोमांचित थे एवं इस प्रदर्श को स्वयं बनाने का प्रयास करना चाहते थे।
4.1 क्या विद्युत धारा का कोई चुंबकीय प्रभाव होता है?
क्रियाकलाप 4.1 – आइए, अन्वेषण करें
- एक चुंबकीय दिक्सूचक, एक विद्युत-सेल, एक सेल-धारक, दो आरेख-पिन (ड्राइंग पिन), एक सुरक्षा-पिन (सेफ्टी पिन), दो कीलें, संयोजी तारों के दो टुकड़े (एक लंबा एवं एक छोटा) और गत्ते (कार्ड बोर्ड) के दो छोटे टुकड़े लीजिए।
- दो आरेख-पिन, एक सुरक्षा-पिन और एक गत्ते के टुकड़े का उपयोग करके एक स्विच बनाइए (जैसा आपने पूर्व कक्षा 7 विज्ञान की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा के अध्याय 'विद्युत - परिपथ एवं उनके घटक' में बनाया था)।
- सेल को सेल-धारक में लगाइए।
- चित्र 4.1 (क) में दर्शाए अनुसार गत्ते के दूसरे टुकड़े पर दो कीलों को लगाइए। लंबे तार के मध्य भाग को कीलों से बाँधकर इस प्रकार तान दीजिए कि यह गत्ते के टुकड़े की सतह से थोड़ा ऊपर उठा रहे। इस तार के एक सिरे को सेल-धारक से और दूसरे सिरे को स्विच से जोड़िए।
- दूसरे तार को सेल धारक और स्विच के मध्य जोड़िए।
- दोनों कीलों के मध्य तार के नीचे चुंबकीय दिक्सूचक रखिए (चित्र 4.1, क)। दिक्सूचक सुई का निरीक्षण करते समय विद्युत परिपथ में विद्युत धारा को प्रवाहित करने के लिए स्विच को 'ऑन' कीजिए (चित्र 4.1, ख)। आप क्या अवलोकन करते हैं?
- अब पुनः दिक्सूचक सुई का अवलोकन करते समय स्विच को 'ऑफ' स्थिति में कर दीजिए। अब आप क्या अवलोकन करते हैं?
- स्विच को 'ऑन' और 'ऑफ' करने की प्रकिया को कई बार दोहराइए। प्रत्येक बार सावधानीपूर्वक अवलोकन कीजिए कि दिक्सूचक सुई किस प्रकार से व्यवहार करती है?

कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा के अध्याय 'चुंबकों को जानें' में हम यह पहले ही सीख चुके हैं कि दिक्सूचक सुई एक छोटा चुंबक होती है जिसके समीप किसी चुंबक को लाने से इसमें विक्षेपण होता है। यह चुंबकीय प्रभाव चुंबक एवं दिक्सूचक के मध्य किसी अचुंबकीय पदार्थ को रखने पर भी देखा जा सकता है। परंतु तार में विद्युत धारा प्रवाहित होने पर दिक्सूचक सुई विक्षेपित क्यों होती है? यह विक्षेपण इंगित करता है कि धारावाही तार का दिक्सूचक सुई पर चुंबकीय प्रभाव होता है। जब धारा प्रवाह रोकते हैं तो चुंबकीय प्रभाव समाप्त हो जाता है और दिक्सूचक सुई प्रारंभिक दिशा में लौट आती है। चुंबक अथवा धारावाही तार के चारों ओर का वह क्षेत्र जिसमें चुंबकीय प्रभाव, जैसे दिक्सूचक सुई के विक्षेपण, का अनुभव किया जा सकता है चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है।
- हमने पूर्व कक्षाओं में चुंबकों एवं विद्युत धारा के विषय में सीखा है। मेरा विचार था कि दोनों में कोई संबंध नहीं है। परंतु अब हमें यह ज्ञात हुआ है कि विद्युत और चुंबकीय प्रभाव एक-दूसरे से संबद्ध हैं।
जब किसी चालक (जैसे - तार) में विद्युत धारा प्रवाहित होती है तो यह इसके चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। यह परिघटना विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहलाती है। जैसे ही हम तार में धारा का प्रवाह रोकते हैं तो चुंबकीय क्षेत्र समाप्त हो जाता है।

आपने अभी-अभी वही खोज की है जो 1820 सामान्य संवत् में वैज्ञानिक हैंस क्रिश्चियन ऑस्टेंड (1777-1851) ने की थी कि विद्युत एवं चुंबकत्व परस्पर संबद्ध परिघटनाएँ हैं। वह डेनमार्क के एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। यह कहा जाता है कि एक बार किसी प्रयोग का प्रदर्शन करते समय उन्होंने देखा कि जब भी किसी विद्युत परिपथ के स्विच को ऑन अथवा ऑफ किया जाता है तो समीप रखी हुई चुंबकीय दिक्सूचक सुई विक्षेपित होती है। उन्होंने इसकी जाँच की और जब वह आश्वस्त हो गए कि विद्युत धारा वास्तव में चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है तब उन्होंने अपने परीक्षण परिणामों को प्रकाशित किया। इसी आधार पर अन्य वैज्ञानिकों ने उनके प्रयोग को यह जाँच करने हेतु दोहराया कि क्या उन्हें भी वही परिणाम प्राप्त होते हैं तथा विद्युत एवं चुंबकत्व के मध्य संबंधों की जाँच के कार्य को आगे बढ़ाया।
- क्या हम विद्युत धारा का उपयोग चुंबक बनाने में कर सकते हैं?

विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव के अनेक व्यावहारिक अनुप्रयोग होते हैं इसका उपयोग विद्युत-चुंबक, विद्युत घंटी, विद्युत मोटर, विद्युत पंखे, लाउडस्पीकर एवं अनेक अन्य युक्तियों में किया जाता है।
4.1.1 विद्युत-चुंबक
क्रियाकलाप 4.2-आइए, खोज करें
- लगभग 50 cm लंबा एवं लचीला विद्युतरोधी परत चढ़ा तार, एक लोहे की कील, एक विद्युत सेल और लोहे से बनी कुछ कागज-क्लिपें लीजिए।
- चित्र 4.2 में दर्शाए अनुसार तार को कील पर कुंडली के रूप में कसकर लपेटिए और इसे आसंजक टेप से सुरक्षित कीजिए।
- तार के सिरों को सेल से जोड़िए। ध्यान रखिए तार को सेल से कुछ सेकंड से अधिक समय तक संयोजित न रखें अन्यथा सेल शीघ्र ही दुर्बल हो सकता है।
- कील को लोहे से बनी कागज-क्लिपों के समीप लाइए और थोड़ा ऊपर उठाइए। क्या क्लिपें कील के सिरों पर चिपक जाती हैं?
- तार में धारा प्रवाह रोकने हेतु तार को सेल से वियुक्त कर दीजिए। क्या क्लिप गिर जाते हैं?

जब कुंडली से धारा प्रवाहित होती है तो क्लिपें कुंडली से चिपक जाती हैं परंतु जब धारा रोक दी जाती है तो क्लिपें कुंडली से पृथक हो जाती हैं। आइए, अब हम क्रियाकलाप 4.3 के माध्यम से इन प्रेक्षणों की विस्तार से जाँच करते हैं।
क्रियाकलाप 4.3-आइए, प्रयोग करें
- लगभग 100 cm लंबा एवं लचीला विद्युतरोधी परत चढ़ा तार, मोटे कागज (चार्ट पेपर) का टुकड़ा, एक लोहे की कील, एक विद्युत सेल, दो चुंबकीय दिक्सूचक और लोहे या स्टील से बनी कुछ कागज-क्लिपें लीजिए।
- मोटे कागज के टुकड़े को मोड़कर एक बेलन का रूप दीजिए जिसका व्यास लगभग पेंसिल की मोटाई के बराबर हो। इसे आसंजक टेप से सुरक्षित कीजिए।
- चित्र 4.3 (क) में दर्शाए अनुसार बेलनाकार कुंडली निर्मित करने हेतु बेलन पर विद्युतरोधी परत चढ़े तार के लगभग 50 फेरे कसकर लपेटिए।
- बेलनाकार कुंडली के दोनों सिरों के समीप दिक्सूचक रखिए (चित्र 4.3, ख)।
- चित्र 4.3 (ग) में दर्शाए अनुसार कुंडली के दोनों सिरे सेल के सिरों से संयोजित कीजिए और चुंबकीय दिक्सूचकों का अवलोकन कीजिए। क्या आप दिक्सूचकों की सुइयों में कोई विक्षेपण देखते हैं?
- सेल से तार को वियोजित कीजिए। देखिए कि क्या दिक्सूचकों की सुइयाँ अपनी प्रारंभिक स्थितियों में वापस आ जाती हैं?
- कागज के बेलन के अंदर एक कील प्रविष्ट कीजिए (चित्र 4.3, घ) और उपरोक्त चरणों को दोहराइए। क्या दिक्सूचक सुइयों के विक्षेपण में कोई अंतर आता है?
- कील के दोनों सिरों के समीप लोहे से बनी कुछ कागज-क्लिपें रखिए। क्या क्लिपें कील के सिरों की ओर आकर्षित होती हैं?


यह देखा गया है कि जब बेलनाकार कुंडली से धारा प्रवाहित की जाती है तो यह एक चुंबक की भाँति व्यवहार करती है और चुंबकीय दिक्सूचक की सुई को विक्षेपित करती है। जब कुंडली के क्रोड में लोहे की कील प्रविष्ट की जाती है तो यह कुंडली एक अपेक्षाकृत अधिक प्रबल चुंबक बन जाती है। साथ ही चुंबकीय दिक्सूचक की सुई का विक्षेपण पहले की तुलना में अधिक होता है और अब यह लोहे की क्लिपों की अधिक संख्या को भी आकर्षित करती है (चित्र 4.3, ङ) । जब विद्युत धारा का प्रवाह रोका जाता है तो बेलनाकार कुंडली अपना चुंबकीय प्रभाव खो देती है।
एक धारावाही कुंडली जो एक चुंबक की भाँति व्यवहार करती है विद्युत-चुंबक कहलाती है। व्यावहारिक अनुप्रयोगों हेतु अधिकांश विद्युत-चुंबकों को अधिक प्रबल बनाने हेतु उनमें लौह क्रोड प्रविष्ट कराया जाता है
- क्या विद्युत-चुंबक में भी छड़ चुंबक की भाँति दो ध्रुव होते हैं?
क्रियाकलाप 4.4- आइए, अन्वेषण करें
- क्रियाकलाप 4.3 में निर्मित विद्युत-चुंबक और एक चुंबकीय दिक्सूचक लीजिए। कुंडली के दोनों सिरों पर 'अ' और 'आ' अंकित कीजिए।
- चित्र 4.4 (क) में दर्शाए अनुसार चुंबकीय दिक्सूचक कुंडली के सिरे 'अ' के समीप रखिए।
- कुंडली को सेल से संयोजित कीजिए और दिक्सूचक का अवलोकन कीजिए। अवलोकन कीजिए कि कुंडली के सिरे 'अ' की ओर चुंबकीय दिक्सूचक का कौन सा ध्रुव आकर्षित होता है। अपने अवलोकन को अपनी अभ्यास पुस्तिका में लिखिए।
- इसी प्रक्रिया को सिरे 'आ' की ध्रुवता ज्ञात करने हेतु दोहराइए (चित्र 4.4, ख)। क्या आप पाते हैं कि सिरे 'आ' की ध्रुवता सिरे 'अ' की ध्रुवता के विपरीत है?
कक्षा 6 में हमने सीखा था कि चुंबक के दो ध्रुव होते हैं। चुंबक की भाँति ही विद्युत-चुंबक के भी दो ध्रुव होते हैं- उत्तर एवं दक्षिण।
(i) उसी कुंडली से 2 और 4 सेलों के संयोजन के साथ तथा (ii) 2 सेलों के साथ भिन्न-भिन्न फेरों की संख्या वाली कुंडली का संयोजन करके क्रियाकलाप 4.3 को दोहराइए। आप क्या देखते हैं?
एकल सेल कम मात्रा में धारा प्रदान करता है इसलिए चुंबकीय क्षेत्र दुर्बल होता है। परिणामस्वरूप दिक्सूचक सुई का विक्षेप कम होता है और कुंडली मात्र कुछ ही क्लिपों को आकर्षित कर पाती है। कोई बैटरी जिसमें एक से अधिक सेल होते हैं एकल सेल की तुलना में अधिक धारा प्रदान करती है। यह प्रबल चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है अतः दिक्सूचक सुई का विक्षेप अधिक होता है और कुंडली अधिक क्लिपों को आकर्षित करती है। कुंडली में फेरों की संख्या में वृद्धि भी कुंडली को अधिक प्रबल विद्युत-चुंबक बनाती है।
क्रियाकलाप 4.4 को कुंडली में धारा की दिशा परिवर्तित करके भी दोहराइए। इस प्रकार किसी विद्युत-चुंबक की प्रबलता को कुंडली में प्रवाहित धारा के परिमाण में परिवर्तन करके अथवा कुंडली में फेरों की संख्या में परिवर्तन करके अथवा दोनों में परिवर्तन करके परिवर्तित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रवाहित धारा की दिशा को उलट करके विद्युत-चुंबक के ध्रुवों को भी उत्क्रमित किया जा सकता है।
क्या आपको कक्षा 6, जिज्ञासा के अध्याय 'चुंबकों को जानें' में सीखा हुआ यह तथ्य स्मरण है कि स्वतंत्र रूप से लटका चुंबक उत्तर-दक्षिण दिशा में ठहरता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी पृथ्वी स्वयं भी एक वृहत चुंबक की भाँति व्यवहार करती है परंतु पृथ्वी एक चुंबक की भाँति व्यवहार क्यों करती है? पृथ्वी के भीतर गहराई में उपस्थित क्रोड में तरल लोहे की गति विद्युत धाराओं का निर्माण करती है जो चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। अनेक प्रवासी पक्षी, मछलियाँ और पशु महाद्वीपों और महासागरों के पार यात्रा करने के लिए इस चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग करते हैं। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र अंतरिक्ष से आने वाले हानिकारक कणों को रोकने हेतु भी एक परिरक्षक की भाँति कार्य करता है और पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने में सहायता करता है।
4.1.2 उत्थापक विद्युत-चुंबक
- क्या वास्तविक जीवन में भी वस्तुओं को उठाने के लिए विद्युत-चुंबकों का उपयोग किया जाता है?

उत्थापक विद्युत-चुंबक प्रबल विद्युत-चुंबक होते हैं जिन्हें क्रेनों से लटकाया जा सकता है। क्रेन प्रचालक विद्युत-चुंबक में धारा को ऑन और ऑफ करके इसके चुंबकत्व को नियंत्रित कर सकता है। जब धारा ऑन की जाती है तो विद्युत-चुंबक लोहे या स्टील की वस्तुओं को उठाता है। जब विद्युत-चुंबक में धारा ऑफ की जाती है तो चुंबकीय क्षेत्र समाप्त हो जाता है और वस्तुएँ मुक्त हो जाती हैं। उत्थापक विद्युत-चुंबक का कारखानों एवं कचरा स्थलों में धातु की भारी वस्तुओं को कुशलता से स्थानांतरित करने, उठाने और छाँटने हेतु व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
हम सीख चुके हैं कि जब विद्युत धारा किसी चालक (जैसे- तार) से प्रवाहित होती है तो उसके चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। उच्च कक्षाओं में आप विद्युत एवं चुंबकत्व के मध्य इस अद्भुत संबंध के विषय में सीखेंगे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जैसे विद्युत-धारा चुंबकत्व उत्पन्न कर सकती है उसी प्रकार एक गतिमान चुंबक विद्युत धारा भी उत्पन्न कर सकता है। विद्युत एवं चुंबकत्व के मध्य यह गहन संबंध हमारे दैनिक जीवन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह विद्युत मोटर से लेकर विद्युत जनित्र तक अनेक युक्तियों की निर्मिति का आधार है।
4.2 क्या एक धारावाही तार गरम होता है?
क्रियाकलाप 4.5 - आइए, अवलोकन करें
- विद्युत-चुंबक के लिए क्रियाकलाप करते समय क्या आपने यह भी अवलोकन किया कि तार के सिरे गरम हो गए थे? ऐसा क्यों होता है?

इस क्रियाकलाप में हम एक विशेष पदार्थ के तार का उपयोग करेंगे जिसे निक्रोम (नाइक्रोम) कहते हैं
- कीलों को गत्ते के टुकड़े पर उनके बीच लगभग 5 cm की दूरी रखते हुए उर्ध्वाधर खड़ा कीजिए।
- निक्रोम के तार को इन कीलों के मध्य बाँधिए और चित्र 4.5 में दर्शाए अनुसार स्विच को ऑफ की स्थिति में रखते हुए संयोजी तारों की सहायता से इसे कीलों पर बँधे तार से जोड़िए।
- निक्रोम के तार को स्पर्श कीजिए। आपको कैसा अनुभव होता है?
- लगभग 30 सेकंड के लिए स्विच को ऑन रखिए और इसके पश्चात इसे वापस ऑफ स्थिति में लाइए। क्षणभर के लिए निक्रोम तार को स्पर्श कीजिए (निक्रोम तार को पकड़ें नहीं)। आपको क्या अंतर प्रतीत होता है?
- अवलोकन की पुष्टि हेतु पिछले चरणों को दोहराइए।

आपने देखा होगा कि जब निक्रोम के तार से धारा प्रवाहित की जाती है तो यह गरम हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब किसी चालक से विद्युत धारा प्रवाहित होती है तो इसे धारा प्रवाह में कुछ विरोध अथवा प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। भिन्न-भिन्न चालक धारा प्रवाह में भिन्न-भिन्न स्तरों का प्रतिरोध उत्पन्न करते हैं। उदाहरणार्थ समान आमाप एवं लंबाई के ताँबे के तार की तुलना में निक्रोम का तार अधिक प्रतिरोध उत्पन्न करता है। इस प्रतिरोध के कारण विद्युत ऊर्जा का कुछ भाग तापीय ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। जब किसी चालक से विद्युत धारा प्रवाहित होने पर उसके गरम हो जाने को विद्युत धारा का तापीय प्रभाव कहते हैं।
यह क्रियाकलाप सदैव एक शिक्षक के निर्देशन में ही किया जाना चाहिए।
क्रियाकलाप 4.5 को दो सेलों की बैटरी के साथ दोहराइए। आप क्या देखते हैं? एक अथवा दो सेलों का प्रयोग समान समयावधि के लिए किया जाए तो तार किस प्रकरण में अधिक गरम होगा?
दो सेलों के साथ किए गए प्रयोग में उत्पन्न ऊष्मा की मात्रा अधिक होती है। इसका कारण यह है कि उत्पन्न ऊष्मा विद्युत धारा के परिमाण पर निर्भर करती है। किसी तार में उत्पन्न ऊष्मा तार के पदार्थ, मोटाई, लंबाई एवं धारा प्रवाह की समय अवधि पर निर्भर करती है।
कक्षा 7 में हमने सीखा है कि एक तापदीप्त लैंप प्रकाश उत्पन्न करता है क्योंकि इसका तंतु विद्युत धारा द्वारा गरम हो जाता है। अनेक घरेलू उपकरणों, जैसे- विद्युत कक्ष-तापक, विद्युत हीटर, इस्तरी, जल-तापक निमज्जन छड़, केतली और बाल सुखाने का यंत्र (हेयर ड्रायर) इत्यादि विद्युत के तापीय प्रभाव के सिद्धांत पर कार्य करते हैं (चित्र 4.6)। इन सभी युक्तियों में एक छड़ होती है या तार की कुंडली होती है जिसे तापन अवयव कहते हैं। कुछ उपकरणों में जहाँ यह अवयव दृश्य है वहाँ इसके लाल-तप्त तार को चमकता हुआ देखा जा सकता है।
- अच्छा ! अब मुझे समझ आया कि टॉर्च के तापदीप्त लैंप को विद्युत सेल द्वारा दीप्त करने वाले क्रियाकलाप में वह लैंप कभी-कभी गरम क्यों हो जाता था।


विद्युत धारा का तापीय प्रभाव अनेक दैनिक उपकरणों में उपयोगी होता है। परंतु कभी-कभी इसके कारण समस्याएँ भी हो सकती हैं, जैसे- तारों में विद्युत संचरण के कारण ऊर्जा का क्षय होना। उपकरणों में अतितापन, प्लग और सॉकेट को हानि पहुँचा सकता है, जिससे प्लास्टिक के घटक पिघल सकते हैं अथवा आग भी लग सकती है। घरेलू परिपथ में ऐसी घटनाओं को कम करने के लिए परिपथ में सुरक्षा युक्तियाँ लगाई जाती हैं।
- सेल और बैटरियों जैसे विद्युत के सुवाह्य स्रोत अत्यंत सुविधाजनक एवं बहुउपयोगी होते हैं। इनका उपयोग करके हम छोटा लैंप दीप्त कर सकते हैं, चुंबक बना सकते हैं एवं तार को गरम कर सकते हैं।
- हाँ, परंतु क्या आपने कभी सोचा है कि इन सेल एवं बैटरियों के भीतर वह क्या है जो विद्युत उत्पन्न करता है?

4.3 बैटरी से विद्युत धारा कैसे उत्पन्न होती है?
आइए, हम अपना अध्ययन विद्युत सेलों के सबसे प्राचीन प्रकारों में से एक से आरंभ करते हैं।
4.3.1 वोल्टीय सेल
वोल्टीय सेल को गेल्वेनिक सेल के नाम से भी जाना जाता है। यह चित्र 4.7 में दर्शाया गया है। इसमें काँच अथवा प्लास्टिक के पात्र में रखी भिन्न-भिन्न पदार्थों से निर्मित दो धातु की छड़ें होती हैं और एक द्रव होता है जिसे विद्युत-अपघट्य कहते हैं। धातु की छड़ें जिन्हें इलेक्ट्रोड (विद्युताग्र) कहते हैं आंशिक रूप से विद्युत-अपघट्य में डूबी होती हैं जो प्रायः एक दुर्बल अम्ल अथवा लवण का विलयन होता है। छड़ों और विद्युत-अपघट्य के मध्य रासायनिक अभिक्रिया विद्युत उत्पन्न करती है। जब परिपथ जुड़ा होता है तो बाह्य परिपथ में विद्युत धारा धनात्मक सिरे से ऋणात्मक सिरे की ओर प्रवाहित होती है। समय के साथ विद्युत-अपघट्य में उपस्थित आवश्यक रसायन अभिक्रिया में उपयोग कर लिए जाते हैं और सेल कार्य करना बंद कर देता है। कोई सेल जब विद्युत आपूर्ति करने योग्य नहीं रह जाता तो यह निष्क्रिय सेल कहलाता है।

वोल्टीय या गैल्वेनिक सेलों का नामकरण दो इतालवी वैज्ञानिकों एलेसैंद्रो वोल्टा और लुइगी गैल्वेनी के नामों पर किया गया है। 17वीं शताब्दी के अंत में गैल्वेनी ने देखा कि एक मृत मेंढक की टाँग दो भिन्न-भिन्न धातुओं ताँबे और लोहे से स्पर्श करने पर फड़क उठी थी। तब तक यह ज्ञात हो चुका था कि विद्युत माँसपेशियों की गति को उत्तेजित कर सकती है और गैल्वेनी ने सोचा कि इस प्रयोग में मेंढक के टाँग की माँसपेशियों के फड़कने के लिए आवश्यक विद्युत मेंढक से ही उत्पन्न हुई होगी परंतु वोल्टा का विचार भिन्न था। उनका विश्वास था कि विद्युत धातुओं से उत्पन्न हुई है न कि मेंढक से। इसका परीक्षण करने के लिए उन्होंने जब मेंढक की टाँग के स्थान पर नमक के पानी में भिगोए हुए कागज का उपयोग किया तब भी उन्हें विद्युत धारा प्राप्त हुई। इससे यह निष्कर्ष निकला कि यह धातुओं और द्रव का संयोजन था जिससे विद्युत धारा उत्पन्न हुई और इस प्रकार पहली बैटरी का आविष्कार हुआ।
क्रियाकलाप 4.6- आइए, निर्माण करें
- क्या हम भी सरलता से उपलब्ध पदार्थों से स्वयं का वोल्टीय सेल निर्मित कर सकते हैं?

- पाँच अथवा छह रसीले नींबू, ताँबे का तार या पट्टियाँ (1-2 mm मोटी) तथा लोहे की कुछ कीलें लीजिए। इसके अतिरिक्त एक प्रकाश उत्सर्जक डायोड (एल.ई.डी.) और कुछ संयोजी तार लीजिए।
- चित्र 4.8 (क) में दर्शाए अनुसार किसी एक नींबू में ताँबे का तार और लोहे की कील एक-दूसरे से कुछ दूरी पर लगाइए।
- शेष सभी नींबुओं के लिए उपरोक्त चरणों को दोहराइए।
- ताँबे के तारों और कीलों को चित्र 4.8 (ख) में दर्शाए अनुसार जोड़िए।
- पहले नींबू के ताँबे का तार और अंतिम नींबू के लोहे की कील के मध्य संयोजन तारों का उपयोग करके एल.ई.डी. जोड़िए। आप क्या अवलोकन करते हैं? क्या एल.ई.डी. दीप्त हो जाती है?
- यदि एल.ई.डी. दीप्त नहीं होती है तो इसके सिरों को उलट दीजिए। क्या अब एल.ई.डी. दीप्त होती है? [स्मरण रहे कि हम पहले ही में सीख चुके हैं कि विद्युत धारा एल.ई.डी. से तभी प्रवाहित हो सकती है जब एल.ई.डी. का धनात्मक सिरा (लंबा तार) बैटरी के धनात्मक सिरे से जुड़ा हो और एल.ई.डी. का ऋणात्मक सिरा (छोटा तार) बैटरी के ऋणात्मक सिरे से जुड़ा हो।)]


एक दीप्त हुई एल.ई.डी. इंगित करती है कि आपका सेल कार्य कर रहा है। इस सेल में धातु के इलेक्ट्रोड ताँबे के तार और लोहे की कीलें हैं। नींबू का रस विद्युत-अपघट्य है जो विद्युत चालन में सहायता करता है। आप नींबू के रस के स्थान पर लवणों के विलयनों का भी उपयोग कर सकते हैं।
4.3.2 शुष्क सेल
वोल्टीय सेल बनाने के लिए धातु के कुछ सामान्य जोड़े हैं- जस्ता या ताँबा, जस्ता या चाँदी, एलुमिनियम या ताँबा, लोहा या ताँबा, मैग्नीशियम या ताँबा और सीसा या ताँबा। ताँबे जैसी कुछ धातुएँ धनात्मक इलेक्ट्रोड की भाँति कार्य करती हैं जबकि जस्ते जैसी अन्य धातुएँ ऋणात्मक इलेक्ट्रोड की भाँति कार्य करती हैं। ऐसा उनके रासायनिक गुणधर्मों के कारण है। इसके विषय में हम उच्च कक्षाओं में और अधिक सीखेंगे।
वोल्टीय सेलों का प्रवर्तन एक महत्त्वपूर्ण आविष्कार था परंतु दैनिक उपयोग हेतु ये सुविधाजनक नहीं हैं। इनके स्थान पर शुष्क सेल आज व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले विद्युत सेलों में से एक हैं। इन्हें 'शुष्क' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें विद्युत-अपघट्य द्रव के रूप में नहीं होता है अपितु गाढ़ी नम लेई के रूप में होता है। चित्र 4.9 में शुष्क सेल की संरचना दर्शाई गई है। इसमें एक जस्ते का पात्र होता है जो ऋणात्मक सिरे की भाँति कार्य करता है और केंद्र में धातु की टोपी से ढकी हुई कार्बन की छड़ धनात्मक सिरे की भाँति कार्य करती है। कार्बन की छड़ लेई जैसे विद्युत-अपघट्य से घिरी होती है।

शुष्क सेल केवल एक बार उपयोग में लाया जाने वाला सेल है अर्थात एक बार प्रयोग करने के पश्चात इसका निस्तारण करना होता है। अब पुनः आवेशनीय बैटरियों का उपयोग कई अनुप्रयोगों के लिए तेजी से बढ़ रहा है।
4.3.3 पुनः आवेशनीय बैटरियाँ
पुनः आवेशनीय बैटरियों को अनेक बार पुनः आवेशित करके पुनः उपयोग में लाया जा सकता है। यह अपव्यय को रोकता है और समय के साथ धन की बचत भी करता है।
पुनः आवेशनीय बैटरियाँ विभिन्न प्रकार की होती हैं जिनका उपयोग विभिन्न युक्तियों में किया जाता है, जैसे - घड़ियों और फोन में उपयोग की जाने वाली छोटी बैटरियाँ, लैपटॉप और टैबलेट में उपयोग की जाने वाली बैटरियाँ और इनवर्टर अथवा विद्युत चालित वाहनों में उपयोग की जाने वाली बड़ी बैटरियाँ (चित्र 4.10) आदि। तथापि पुनः आवेशनीय बैटरियाँ भी सदैव के लिए उपयोग नहीं की जा सकती हैं। इसके साथ अनेक बार आवेशित करने (चित्र 4.11) और उपयोग में लाने के पश्चात इन बैटरियों का धीरे-धीरे क्षरण होता जाता है।


- अच्छा! तो यही कारण है कि एक अथवा दो वर्ष के पश्चात फोन की बैटरी आवेशन की आवृत्ति बढ़ जाती है।
वर्तमान में पुनः आवेशनीय बैटरियों में सबसे अधिक प्रयुक्त बैटरी लीथियम-आयन (Li-आयन) बैटरी है जो लगभग उन सभी युक्तियों में पाई जाती हैं जिनमें बैटरी लगानी पड़ती है। इन बैटरियों में लीथियम और कोबाल्ट जैसी विशेष धातुएँ उपयोग में लाई जाती हैं। इनका खनन और संसाधन विश्व के सीमित क्षेत्रों में ही होता है। इसी कारण विभिन्न देश इनकी सुरक्षित आपूर्ति करने हेतु पुरानी बैटरियों के पुनर्चक्रण और नई प्रौद्योगिकियों को विकसित करने की प्रतिस्पर्धा में लगे हुए हैं। अगली बड़ी छलाँग के रूप में वैज्ञानिक ठोस अवस्था बैटरियों पर काम कर रहे हैं जिससे द्रव अथवा लेई जैसे विद्युत-अपघट्य को ठोस पदार्थों से प्रतिस्थापित कर दिया जाएगा। ये भविष्य की बैटरियाँ अधिक सुरक्षित, शीघ्रता से आवेशित होने वाली और लंबे समय तक चलने वाली होंगी। उन्नत पुनः आवेशनीय बैटरियाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि विश्व विद्युत शक्ति के पर्यावरण अनुकूल स्रोतों के विकास की ओर बढ़ रहा है।
- जब किसी चालक (जैसे - तार) से विद्युत धारा प्रवाहित होती है तो यह इसके चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है। इस परिघटना को विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव कहते हैं।
- चुंबक की भाँति व्यवहार करने वाली धारावाही कुंडली को विद्युत-चुंबक कहते हैं। व्यावहारिक अनुप्रयोगों हेतु अधिकांश विद्युत-चुंबकों में इन्हें प्रबल चुंबक बनाने हेतु एक लोहे का क्रोड लगा होता है।
- चालकों में विद्युत धारा प्रवाहित होने के कारण ऊष्मा का उत्पन्न होना विद्युत-धारा का तापीय प्रभाव कहलाता है।
- सेल अथवा बैटरी एक ऐसी युक्ति है जो उसके भीतर होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं के कारण विद्युत धारा उत्पन्न करती है।
- पुनः आवेशनीय बैटरियों को आवेशित करके उनका पुनः उपयोग किया जा सकता है।
- रिक्त स्थान भरिए-
(i)वोल्टीय सेल में प्रयुक्त होने वाला विलयन _________कहलाता है।
(ii)एक धारावाही कुंडली __________की भाँति व्यवहार करती है। - सही विकल्प चुनिए-
(i) शुष्क सेल, वोल्टीय सेल की तुलना में कम सुवाह्य है। (सत्य/असत्य)
(ii) कुंडली तभी विद्युत-चुंबक बनती है जब कुंडली से विद्युत धारा प्रवाहित होती है। (सत्य/असत्य)
(iii) एक सेल के उपयोग से बना विद्युत-चुंबक दो सेलों की बैटरी के उपयोग से बने उसी विद्युत-चुंबक की अपेक्षा लोहे के अधिक कागज-क्लिपों को आकर्षित करता है। (सत्य/असत्य) - किसी निक्रोम के तार में अल्प समय के लिए विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है।
(i) तार गरम हो जाता है।
(ii) तार के नीचे रखे चुंबकीय दिक्सूचक की सुई विक्षेपित हो जाती है। सही विकल्प का चयन कीजिए-
(क) केवल विकल्प (i) सही है।
(ख) केवल विकल्प (ii) सही है।
(ग) विकल्प (i) और (ii) दोनों सही हैं।
(घ) विकल्प (i) और (ii) दोनों सही नहीं हैं। - स्तंभ 'क' में दिए गए एकांशों का मिलान स्तंभ 'ख' में दिए गए एकांशों से कीजिए।
स्तंभ 'क' स्तंभ 'ख' (i)वोल्टीय सेल (क) विद्युत तापक हेतु सर्वाधिक उपयुक्त (ii) विद्युत इस्तरी (ख) विद्युत धारा के चुंबकीय प्रभाव पर कार्य करती है। (iii)निक्रोम तार (ग) विद्युत धारा के तापीय प्रभाव पर कार्य करती है।t (iv) विद्युत-चुंबक (घ) रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा विद्युत उत्पन्न करती है। - सामान्यतः विद्युत-तापन युक्तियों में निक्रोम तार का उपयोग किया जाता है क्योंकि यह-
- विद्युत का सुचालक है।
- किसी निश्चित परिमाण की विद्युत धारा के लिए अधिक ऊष्मा उत्पन्न करता है।
- ताँबे की अपेक्षा सस्ता है।
- विद्युत का कुचालक है।
- विद्युत-तापन युक्तियों (जैसे - विद्युत कक्ष-तापक अथवा विद्युत हीटर) को प्रायः पारंपरिक तापन विधियों (जैसे - लकड़ी अथवा चारकोल जलाना) की तुलना में अधिक सुविधाजनक माना जाता है। समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए इस कथन के समर्थन हेतु कारण बताइए।
- चित्र 4.4 (क) का अवलोकन कीजिए। यदि इसमें कुंडली के समीप रखे दिक्सूचक की सुई में विक्षेपण होता है तो
- विद्युत धारा का पथ दर्शाने हेतु आरेख पर तीर का चिह्न लगाइए।
- स्पष्ट कीजिए कि कुंडली में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर दिक्सूचक सुई क्यों घूमती है?
- यदि आप बैटरी के सिरों को उल्टा कर देते हैं तो पूर्वानुमान लगाइए कि विक्षेप पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
- मान लीजिए कि अध्याय के आरंभ में उल्लिखित कहानी में सुमना अपने उत्थापक विद्युत-चुंबक प्रदर्श के स्विच को ऑफ करना भूल जाती है। कुछ समय पश्चात लोहे की कील लोहे से बनी कागज-क्लिपों को नहीं उठा पाती है परंतु लोहे की कील के चारों ओर लपेटा गया तार अभी भी गरम है। उत्थापक विद्युत-चुंबक ने क्लिपों को उठाना क्यों बंद कर दिया? संभावित कारण बताइए।
- चित्र 4.12 (क) और (ख) में से किस चित्र में स्विच बंद (ऑन) होने पर एल.ई.डी. दीप्त होगी?
- नेहा ठीक वैसी ही कुंडली लेती है जैसी क्रियाकलाप 4.4 में ली गई थी किंतु वह इसके भीतर से लोहे की कील को बाहर निकाल देती है जिससे केवल तार से बनी कुंडली ही रह जाती है। क्या कुंडली अभी भी दिक्सूचक सुई को विक्षेपित करेगी? यदि हाँ, तो क्या विक्षेपण पहले की तुलना में अधिक होगा अथवा कम?
- चित्र 4.13 में दर्शाए अनुसार हमारे पास लोहा, ताँबा, ऐलुमिनियम एवं निक्रोम की बनी एक जैसी आकृति और आकार की चार कुंडलियाँ है।

चित्र 4.13 जब कुंडलियों से विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो कुंडलियों के समीप रखी दिक्सूचक सुइयाँ विक्षेप दर्शाएँगी -
- केवल परिपथ (क) में
- केवल परिपथ (क) और (ख) में
- केवल परिपथ (क), (ख) और (ग) में
- सभी चारों परिपथों में

- 25, 50, 75 और 100 फेरों वाली कुंडलियाँ बनाइए। उन्हें एक-एक करके सेल से संयोजित कीजिए। सभी प्रकरणों में उनके सापेक्ष एक ही स्थिति में रखिए चुंबकीय दिक्सूचक में सुई का विक्षेपण नोट कीजिए। अपने अवलोकनों का अभिलेखन कीजिए। विद्युत-चुंबक की प्रबलता पर कुंडली के फेरों की संख्या के प्रभाव के संबंध में निष्कर्ष निकालिए।
- समान लंबाई एवं भिन्न-भिन्न मोटाई के दो पतले निक्रोम के तार लीजिए (जिनमें एक तार की मोटाई दूसरी तार की मोटाई की लगभग दोगुनी हो, जैसे - 0.3 मिलीमीटर और 0.6 मिलीमीटर)। उन्हें एक-एक करके एक ऐसे परिपथ में संयोजित कीजिए जिसमें एक स्विच और एक सेल हो तथा प्रत्येक स्थिति में 30 सेकंड के लिए विद्युत धारा प्रवाहित कराइए। इन तारों को क्षण भर के लिए स्पर्श कीजिए। कौन-सा तार अधिक गरम होता है? अब इसी क्रियाकलाप को समान व्यास परंतु भिन्न-भिन्न लंबाई के दो निक्रोम के तारों के साथ दोहराइए। अपने क्रियाकलाप का एक प्रतिवेदन तैयार कीजिए।
- विभिन्न फलों एवं सब्जियों का उपयोग करके विद्युत सेल बनाने का प्रयास कीजिए। विभिन्न धातुओं के इलेक्ट्रोडों का उपयोग करके विद्युत सेल बनाने का प्रयास कीजिए। अपने प्रेक्षणों के आधार पर एक संक्षिप्त प्रतिवेदन तैयार कीजिए।
कोई बैटरी जब कार्य करना बंद कर देती है तब भी वह पूर्णतः 'निष्प्रयोज्य' नहीं होती है। इसमें अभी भी अम्ल जैसे पदार्थ और सीसा, कैडमियम, निकल अथवा लीथियम जैसी धातुएँ हो सकती हैं। यदि बैटरी को सामान्य कचरे में फेंक दिया जाए तो यह आग लगने का कारण बन सकती है अथवा पर्यावरण हेतु हानिकारक हो सकती है। इसके अतिरिक्त इन बैटरियों में प्रयुक्त अनेक पदार्थ मूल्यवान होते हैं और उनका पुनः उपयोग व पुनर्चक्रण किया जा सकता है। इन दिनों अनेक स्थानों पर 'ई-कचरा' (ई-वेस्ट) पुनर्चक्रण सुविधाएँ उपलब्ध हैं जहाँ उपयोग की गई बैटरियों का निपटान किया जा सकता है। यदि आपको ज्ञात नहीं है तो अपने शिक्षक से पूछिए। बैटरियों का पुनर्चक्रण हमारे ग्रह और इसके निवासियों के लिए उत्तम है।