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हमारा आवास पृथ्वी एक अद्वितीय जीवनदायी ग्रह
खोजबीन और विचार करें
- आप क्या सोचते हैं यदि पृथ्वी पर जीवन ही नहीं होता तो वह कैसी दिखाई देती?
- पृथ्वी पर जीवन अरबों वर्षों से अस्तित्व में है। बड़े-बड़े परिवर्तनों एवं आपदाओं के उपरांत भी इसके यथावत बने रहने के क्या कारण हैं?
- कुत्ते अंडे क्यों नहीं देते एवं मुर्गियाँ जीवित चूजों को जन्म क्यों नहीं देतीं?
- यदि कोई अंतरिक्षयान मंगल ग्रह पर अपने साथ मृदा एवं जल ले जाए तो क्या वहाँ पौधे उगाए जा सकते हैं?
- अपने प्रश्नों को साझा कीजिए
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__________?
अब हम इस पुस्तक के अंतिम अध्याय पर पहुँच चुके हैं जो मध्य स्तर की हमारी वैज्ञानिक यात्रा को उद्देश्य पूर्ति की ओर ले जाता है। हमने अभी तक जो भी सीखा एवं जाना है अब उसे संयोजित करने का समय है। हमें यह समझने का प्रयास करना है कि हमारा आवास 'पृथ्वी' ग्रह ब्रह्मांड के किसी भी अन्य स्थान से किस प्रकार भिन्न है? आपने कक्षा 6 एवं 7 की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा में पढ़ा है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करने वाला एक साधारण ग्रह नहीं है अपितु यह एक ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन संभव है। यह विविध दृश्यभूमियों, ऊँचे पर्वतों, विशाल महासागरों, असीमित मरुस्थलों एवं हरे-भरे वनों से परिपूर्ण है। वर्तमान में उपग्रहों की सहायता से हम पृथ्वी के अद्भुत छायाचित्र ले सकते हैं। इस अध्याय के प्रारंभिक पृष्ठ पर दर्शाया गया छायाचित्र भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पृथ्वी अवलोकन उपग्रह द्वारा लिया गया है। इसे लगभग 3000 छोटे-छोटे छायाचित्रों को जोड़कर किसी पच्चीकारी की भाँति बनाया गया है। यह छायाचित्र बहुत सुंदर प्रतीत होता है। यह आभासी रंगीन छवि है जिसमें वैज्ञानिक अलग-अलग प्रकार की सूचना दर्शाने के लिए विभिन्न रंगों का उपयोग करते हैं। ऐसे उपग्रह छायाचित्र पृथ्वी पर पौधों एवं समुद्र के सूक्ष्मजीवों का अध्ययन करने में सहायता करते हैं। इसके साथ ही समुद्र के तापमान, तेल-रिसाव एवं वायु की दिशा का भी पता लगा सकते हैं। इस अध्याय में हम उन विशेष परिस्थितियों का पता लगाएँगे जो पृथ्वी को जीवों के लिए एक उपयुक्त आवास बनाती हैं।
13.1 पृथ्वी एक अद्वितीय ग्रह क्यों है?
ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो पृथ्वी को इतना विशेष बनाती हैं? वर्तमान में हमें ज्ञात है कि ब्रह्मांड में अरबों ग्रहों के होते हुए भी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ पर जीवन सभी रूपों में विद्यमान है एवं पनप रहा है।

क्या आपने कभी यह विचार किया है कि वास्तव में पृथ्वी पर जीवन कहाँ विद्यमान है? पृथ्वी ग्रह की सतह पर एक बहुत ही पतली परत पर पर्वत, नदियाँ, जंगल, जीव एवं मनुष्य सभी विद्यमान हैं। सबसे ऊँचे पर्वत शिखर से लेकर सबसे गहरे महासागर की सबसे गहरी गर्त (खाई) तक समस्त जीवन इस भू-पर्पटी पर सीमित है। यह पृथ्वी के समग्र आकार की तुलना में अत्यंत छोटी है। यदि पृथ्वी सेब के आकार की तरह होती तो उसकी भू-पर्पटी सेब के छिलके की भाँति पतली होती जैसाकि चित्र 13.1 में दर्शाया गया है। वस्तुतः यह अत्यंत पतली जीवन सहायक परत ही पृथ्वी को विशिष्ट बनाती है।
मुझे आश्चर्य होता है कि पृथ्वी में ऐसी कौन-सी विशेषताएँ हैं जिनसे जीव-जंतु पनपते हैं और वे जीवित रह पाते हैं।
आइए, हम एक ऐसा क्रियाकलाप करें जिसमें पृथ्वी की उन विशेषताओं की सूची बनाई जाए जो आपके विचार से पृथ्वी को एक अद्वितीय ग्रह बनाती हैं।
क्रियाकलाप 13.1- आइए, पता लगाएँ
- यहाँ पृथ्वी की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं जिन्हें हम प्रायः सामान्य मान लेते हैं परंतु वे हमारे लिए अत्यंत रोचक एवं महत्त्वपूर्ण होती हैं। ऐसी विशेषताओं को तालिका 13.1 में सूचीबद्ध कीजिए। इनमें से कुछ विशेषताओं को आपकी सहायता के लिए तालिका में अंकित किया गया है।
तालिका 13.1 - पृथ्वी के विषय में रोचक विशेषताएँ
| क्र.सं. | पृथ्वी की रोचक विशेषताएँ |
|---|---|
| 1. | जिस वायु में हम श्वास लेते हैं वह उड़कर अंतरिक्ष में नहीं जाती है। (हमने अध्याय 7 'द्रव्य की कणीय प्रकृति' में सीखा कि गैस के कण स्वतंत्र रूप से गति करते हैं एवं गैसों का आयतन निश्चित नहीं होता) |
| 2. | हम गुरुत्व के कारण पृथ्वी पर खड़े रह पाते हैं (जैसाकि हमने अध्याय 5 'बलों को जानें' में सीखा) परंतु हमारा हृदय रक्त को प्रवाहित करके हमारे मस्तिष्क तक ऊपर पहुँचाता है। |
| 3. | |
| 4. |
आपने जो विशेषताएँ सूचीबद्ध की है उन पर अपने शिक्षको एवं मित्रों के साथ चचो कीजिए। आपने अनुभव किया कि पृथ्वी हमारे लिए अनेक प्रकार से रोचक एवं महत्त्वपूर्ण है। यह हमें श्वास लेने के लिए वायु, पीने के लिए जल एवं फसल उगाने के लिए उपजाऊ मृदा प्रदान करती है। पृथ्वी हमें चट्टान, लकड़ी एवं अन्य पदार्थ भी उपलब्ध कराती है जिनसे हम अपने घर, भवन एवं सड़कें बनाते हैं। आप यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो पृथ्वी को एक अद्वितीय ग्रह बनाती हैं जो न केवल हमारे जीवन को अस्तित्व में रहने देती हैं अपितु उसे यथावत भी बनाए रखती हैं।
13.2 हमारे सौरमंडल के ग्रह कैसे दिखते हैं?
कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा में आपने 'पृथ्वी से परे' अध्याय में सौर मंडल के विषय में पढ़ा था। आइए, उनमें से कुछ बातें जो हमने सीखी थी, उनका स्मरण करें। हमारे सौर मंडल में आठ ग्रह हैं जो लगभग वृत्ताकार कक्षाओं में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सूर्य से उनकी बढ़ती
दूरी के क्रमानुसार ये ग्रह हैं- बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस एवं नेपच्यून। इन सभी ग्रहों में से बुध, शुक्र, पृथ्वी एवं मंगल अपेक्षाकृत छोटे एवं चट्टानी ग्रह हैं जबकि बृहस्पति, शनि, यूरेनस एवं नेपच्यून बड़े ग्रह हैं जो मुख्य रूप से गैसों से बने हैं।
आइए, हम क्रियाकलाप 13.2 को करें एवं सौर मंडल के इन ग्रहों के विषय में और अधिक जानें।
क्रियाकलाप 13.2 - आइए, पता लगाएँ
- सौर मंडल के ग्रहों के तापमान एवं आकार के विषय में सूचनाएँ एकत्रित कीजिए। इसके साथ ही यह भी जाँचिए कि क्या सभी ग्रहों पर वायुमंडल उपस्थित है?
- ये सूचनाएँ आप अपने विद्यालय के पुस्तकालय से, विश्वसनीय वेबसाइट से एवं अपने अध्यापकों से चर्चा करके एकत्रित कर सकते हैं।
- तालिका 13.2 में उल्लिखित सूचनाओं के आधार पर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए।
तालिका 13.2 - हमारे सौर मंडल के ग्रह
| क्र.सं. | ग्रह | औसत तापमान (°C) | पृथ्वी की तुलना में त्रिज्या | क्या यहाँ वायुमंडल है? |
|---|---|---|---|---|
| 1. | बुध | 170 | नहीं | |
| 2. | शुक्र | 450 | 0.95 | हाँ |
| 3. | पृथ्वी | 15 | 1 | हाँ |
| 4. | ||||
| 5. | 11 | |||
| 6. | ||||
| 7. | ||||
| 8. | –200 | 4 |
हमें ज्ञात है कि सौर मंडल के समस्त ग्रह अपनी ऊर्जा सूर्य से प्राप्त करते हैं। अतः जो ग्रह सूर्य के निकट होते हैं सामान्यतः वे बहुत अधिक गरम होते हैं एवं जो ग्रह सूर्य से दूर होते हैं तो वे ग्रह ठंडे होते जाते हैं। तालिका 13.2 में क्या आपने इस तथ्य का अवलोकन किया? यह सामान्यतः सही है परंतु शुक्र ग्रह इसका अपवाद है। सूर्य से दूरी के सापेक्ष दूसरा ग्रह शुक्र है जिसका औसत तापमान सर्वाधिक है एवं यह सबसे गरम ग्रह भी है। ऐसा क्यों है?
शुक्र ग्रह सबसे गरम केवल इसीलिए नहीं है कि वह सूर्य के सबसे निकट है अपितु इसलिए है कि उसका सघन वायुमंडल ऊष्मा को रोक कर रखता है। शुक्र ग्रह का वायुमंडल पूर्ण कार्बन डाइऑक्साइड गैस से निर्मित है जो ऊष्मा को बाहर की ओर मुक्त नहीं होने देता है।
इसे हरितगृह प्रभाव (ग्रीन हाउस प्रभाव) कहते हैं। यह स्थिति शुक्र ग्रह को बुध ग्रह की अपेक्षा अधिक गरम बना देती है जबकि बुध सूर्य के अधिक निकट है। पृथ्वी पर भी वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें सूर्य के द्वारा गरम हुई पृथ्वी तथा उसके द्वारा उत्सर्जित विकिरण को अवशोषित करके ऊष्मा को रोक लेती हैं। इस प्रकार हरितगृह प्रभाव पृथ्वी का उपयुक्त तापमान बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है (चित्र 13.2)।
एक सोपान ऊपर
पृथ्वी एवं शुक्र ग्रहों पर ऊष्मा अवशोषित करने वाला हरितगृह प्रभाव उस प्रकार से कार्य नहीं करता जैसा कि ठंडी जलवायु में पौधों को उगाने के लिए बनाए गए हरितगृह में होता है। पृथ्वी या शुक्र ग्रह पर वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें सूर्य से गरम हुई पृथ्वी द्वारा उत्सर्जित विकिरणों को अवशोषित करके ऊष्मा को रोक लेती हैं, जबकि पौधों का हरितगृह इस कारण गरम रहता है क्योंकि सामान्यतः यह काँच की दीवारों से बना एक बंद स्थान होता है। अतः यह स्थान (चित्र 13.3) दिन के समय गरम रहता है जिससे गरम वायु भीतर ही रहती है एवं गरमी सरलता से बाहर की ओर मुक्त नहीं हो पाती है।
अतः दोनों ही प्रकार के हरितगृह प्रभाव गरमी को रोककर रखते हैं परंतु उनकी यह प्रक्रिया भिन्न-भिन्न होती है।
13.3 पृथ्वी पर जीवन हेतु उपयुक्त कारक कौन से हैं?
13.3.1 पृथ्वी की स्थिति
पृथ्वी पर जीवन संभव होने का महत्त्वपूर्ण कारण पृथ्वी का सूर्य से उचित दूरी पर होना है। पृथ्वी सूर्य से ऐसी उचित दूरी पर स्थित है जहाँ तापमान जल को द्रव अवस्था में ही बनाए रखता है। यदि पृथ्वी सूर्य के अधिक समीप होती तो पृथ्वी का तापमान अत्यंत उच्च होता एवं पृथ्वी का संपूर्ण जल वाष्पित हो जाता। इसके अतिरिक्त यदि पृथ्वी सूर्य से अधिक दूरी पर होती तो यहाँ जाता। ऐसी चरम परिस्थितियों में अधिकांश जीवों का पृथ्वी पर संवृद्धि करना एवं पनपना असंभव हो जाता विशेषकर पौधों, जंतुओं एवं मनुष्यों का यद्यपि कुछ सूक्ष्मजीव, जैसे- जीवाणु उस पर्यावरण में ही जीवित रह पाते हैं जहाँ जल जमी हुई अवस्था अत्यधिक ठंडा का तापमान अत्यंत निम्न होता एवं यहाँ का जल पूरी तरह जम
जैसाकि आपने सामाजिक विज्ञान विषय में भी पढ़ा है कि हमारी पृथ्वी की सतह का अधिकांश भाग जल से ढका हुआ है। इसके साथ ही जल की असीम मात्रा के कारण अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी नीले रंग की दिखाई देती है अतः इसे नीला ग्रह भी कहा जाता है (चित्र 13.5)।
एक सोपान ऊपर
क्या कभी मंगल ग्रह पर जीवन संभव था?
मंगल ग्रह सूर्य के 'वासयोग्य क्षेत्र' के सीमांत क्षेत्र पर स्थित है। अनेक अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह पर भेजे जा चुके हैं जिसमें रोवर्स भी है। रोवर्स को मंगल ग्रह की सतह का अध्ययन करने के लिए उस पर उतारा गया था परंतु अभी तक वहाँ जीवन होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। तब भी वैज्ञानिकों का मानना है कि अतीत में मंगल ग्रह पर जल द्रव अवस्था में रहा होगा। संभवतः वहाँ कुछ झीलें रही होंगी और साधारण जीवन के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ रही होंगी।
यही कारण है कि मंगल ग्रह वर्तमान में भी वैज्ञानिकों को आकर्षित करता है। इसके साथ ही हमें यह भी स्मरण कराता है कि विज्ञान के पास कभी भी किसी प्रश्न का अंतिम उत्तर नहीं होता है। जैसे-जैसे हम और अधिक अन्वेषण करते जाते हैं वैसे-वैसे हमें जीवन के नए प्रमाण यहाँ तक कि विविध नवीन रूपों के साक्ष्य भी प्राप्त होते जाते हैं। हम जैसे-जैसे और सीखते जाते हैं वैसे-वैसे विज्ञान भी उस परिवर्तन के लिए तैयार रहता है।
क्या तापमान अथवा सूर्य से दूरी ही एकमात्र कारण है जो पृथ्वी को रहने योग्य बनाता है?
क्या होता यदि पृथ्वी का आकार बहुत छोटा या बहुत बड़ा होता?
13.3.2 पृथ्वी का आकार
पृथ्वी को रहने योग्य बनाने वाले कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कारक और भी हैं। हमारे सौर मंडल में अधिकांश ग्रहों की कक्षाएँ लगभग वृत्ताकार हैं जिनमें पृथ्वी भी सम्मिलित है। इसी कारण सूर्य का प्रकाश एवं उसकी ऊष्मा लगभग पूरे वर्ष समान बनी रहती है। इसके साथ ही अधिकांश स्थानों पर अत्यधिक गरमी या ठंड नहीं होती है।
पृथ्वी को रहने योग्य बनाने का एकमात्र कारण इसकी सूर्य से उचित दूरी है। इसी के फलस्वरूप पृथ्वी का तापमान मध्यम है तथा पृथ्वी का उचित आकार भी जीवन के लिए उपयुक्त है क्योंकि पृथ्वी का उचित आकार वायुमंडल को बनाए रखता है। आप पूर्व में पढ़ चुके हैं कि वायुमंडल में गैसों की अनेक परतें होती हैं जो पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए हैं एवं यह जीवन को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अध्याय 5 'बलों को जानें' में आपने सीखा कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण वस्तुओं को अपनी ओर खींचता है। यदि पृथ्वी आकार में बहुत छोटी होती एवं औसत घनत्व समान रहता तो इसका गुरुत्वाकर्षण इतना दुर्बल होता कि यह वायुमंडल की गैसों को रोक ही नहीं पाती एवं यहाँ की गैसें अंतरिक्ष में पलायन कर जातीं। उदाहरण के लिए मंगल ग्रह का वायुमंडल पृथ्वी की तुलना में 100 गुना कम सघन है एवं बुध ग्रह पर तो वायुमंडल है ही नहीं।
इस परिप्रेक्ष्य में यदि पृथ्वी ग्रह का आकार अत्यंत बड़ा होता एवं गुरुत्वाकर्षण बल अधिक प्रबल होता तो पृथ्वी हमें इतनी प्रबलता से नीचे की ओर खींच लेती कि हमारी अस्थियाँ तक दबकर टूट सकती थीं। उचित आकार के कारण ही पृथ्वी वायुमंडल को रोककर रखने में सहायक है जो कि जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
पृथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित ऑक्सीजन श्वास लेने में सहायक है एवं यह पृथ्वी पर लगभग सभी प्रकार के जीवों के लिए आवश्यक है। इसके अतिरिक्त ऑक्सीजन की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका यह भी है कि हमारे वायुमंडल में कुछ ऑक्सीजन ओजोन (ऑक्सीजन के तीन परमाणु वाला अणु) के रूप में परिवर्तित हो जाती है। वायुमंडल का यह महत्त्वपूर्ण भाग ओजोन परत कहलाता है। यह ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणों को रोकने में ढाल का कार्य करती है। ये किरणें जीवित कोशिकाओं का क्षय करतीं हैं।
हमारी वैज्ञानिक परंपरा
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा वर्ष 2013 में प्रक्षेपित मंगलयान (मंगल कक्षित्र मिशन) मंगल ग्रह की खोज में एक बड़ी पहल थी (चित्र 13.7)। मंगलयान ऐसे उपकरण अपने साथ ले गया था जो मंगल ग्रह के वायुमंडल, सतह एवं अतीत में उपस्थित जल के संकेतों का अध्ययन कर सकते थे। इसमें लगे कुछ संवेदकों ने वैज्ञानिकों को अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को पूछने में सहायता की जैसे कि क्या कभी मंगल ग्रह जीवन के लिए उपयुक्त था? मंगलयान ने विश्व को दिखाया कि भारत अंतरिक्ष विज्ञान में कुशल एवं कम लागत वाली तकनीक से भी बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है। अतः इस तकनीक ने मंगल ग्रह के विषय में और अधिक जानने में सहायता की।
13.3.3 पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र
कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा में हमने सीखा कि स्वतंत्र रूप से लटका हुआ चुंबक सदैव एक निश्चित दिशा में स्थिर हो जाता है। इसका कारण यह है कि पृथ्वी स्वयं एक विशाल चुंबक के समान व्यवहार करती है। आपने अध्याय 4 'विद्युत – चुंबकीय एवं तापीय प्रभाव' में यह भी पढ़ा था कि चुंबक के चारों ओर का वह क्षेत्र जहाँ इसका प्रभाव अनुभव किया जाता है, चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी के क्रोड में पिघले हुए लोहे की गति ही पृथ्वी के चुबंकीय क्षेत्र का कारण है।
पृथ्वी पर निरंतर अंतरिक्ष से आने वाले सूक्ष्म एवं उच्च ऊर्जा वाले कण टकराते रहते हैं। इनमें से कुछ कण दूर ब्रह्मांड से आते हैं, इन्हें कॉस्मिक किरणें कहते हैं। कुछ अन्य कण सूर्य से आते हैं, इन्हें सौर पवन कहते हैं। यह कण हानिकारक हो सकते हैं क्योंकि ये वायुमंडल को क्षति पहुँचा सकते हैं एवं ओजोन परत का क्षय कर सकते हैं। इसके फलस्वरूप हानिकारक पराबैंगनी किरणें पृथ्वी तक पहुँचकर जीवन को प्रभावित कर सकती हैं।
अच्छी बात यह है कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है। यह अधिकांश हानिकारक कणों को पृथ्वी से दूर भेजता है जिससे हमारा वायुमंडल एवं जीवन पृथ्वी पर सुरक्षित रहता है।
सौर मंडल में पृथ्वी की अद्वितीय स्थिति के कारण ही यहाँ जल द्रव अवस्था में उपस्थित रहता है। इसके साथ ही पृथ्वी का आकार, वायुमंडल एवं चुंबकीय क्षेत्र आदि पृथ्वी को ऐसा ग्रह बनाते हैं जहाँ जीवन पनप सके एवं फल-फूल सके।

क्या पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने में उसके चुंबकीय क्षेत्र की कोई भूमिका है?
परंतु पृथ्वी पर जीवन कैसे सतत और संचालित है?
13.4 पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने में क्या सहायक है?
पृथ्वी पर जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ विद्यमान हैं परंतु सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं के मध्य सुंदर पारस्परिक संबंध ही जीवन को फलने-फूलने में सहायता करता है। कक्षा 6 एवं 7 की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा में आपने प्राकृतिक संसाधनों, जैसे- वायु, जल, सूर्य का प्रकाश, मृदा एवं खनिजों के विषय में सीखा। इसके साथ ही पौधों एवं जंतुओं में होने वाली महत्त्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं के विषय में भी सीखा था। आइए, अब हम जानेंगे कि कैसे ये सभी अवयव पृथ्वी पर जीवन को संबल प्रदान करने एवं उसे सतत बनाए रखने के लिए परस्पर क्रिया करते हैं।
13.4.1 वायु, जल एवं सूर्य का प्रकाश
हम जानते हैं कि वायुमंडल में ऑक्सीजन विद्यमान है। इसका उपयोग मानव, जीव-जंतु एवं पौधे श्वसन के लिए करते हैं। सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पौधे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड एवं मृदा से जल लेकर प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन तैयार करते हैं। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन उत्सर्जित होती है जो श्वसन के लिए आवश्यक होती है।
हमने सीखा कि सूर्य से आने वाली विकिरणें पृथ्वी को गरम करती हैं। इस गरमी का कुछ भाग वायुमंडल में हरितगृह प्रभाव (ग्रीनहाऊस प्रभाव) के कारण रोक लिया जाता है। यह प्रभाव दुर्बल होते हुए भी तापमान को इतना पर्याप्त बनाए रखता है कि जल द्रव अवस्था में ह सके। कक्षा 7 की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा में आपने विकिरण द्वारा ऊष्मा के स्थानांतरण के विषय में भी सीखा था। वायुमंडल की अनुपस्थिति में पृथ्वी ऊष्मा का अंतरिक्ष में निस्तारण कर अत्यधिक ठंडी हो जाती। इस प्रकार हरितगृह प्रभाव पृथ्वी को गरम रखने में सहायक होता है।
जल जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। आपने सीखा था कि जल पृथ्वी की सतह के लगभग 70 प्रतिशत भाग को घेरे हुए है। यह जल तालाबों, झीलों, नदियों, झरनों, समुद्रों, महासागरों एवं भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है। जल के सभी रूप मिलकर जल एक अच्छा विलायक है। कक्षा 7 की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा में आपने सीखा कि जल पोषक तत्वों का संचरण किस प्रकार मृदा से पौधों की पत्तियों तक करता है। जंतुओं में जल शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है, पाचन में जलमंडल बनाते हैं। अध्याय 7 'द्रव्य की कणीय प्रकृति' में आपने सीखा कि सहायता करता है एवं शरीर में जल की मात्रा का संतुलन बनाए रखता है जो स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए अति आवश्यक है।
यद्यपि पृथ्वी का अधिकांश भाग जल से ढका हुआ है फिर भी महासागरों की गहराई में रहने वाले जीवों के विषय में हम कम ही जानते हैं। जलमंडल करोड़ों छोटे जीवों, प्लवकों से लेकर विशाल व्हेल मछली तक का वास है। इनमें से अभी भी अनेक जीवों की खोज करना शेष है। महासागर, झीलें एवं नदियाँ जलीय जीवन हेतु एक समृद्ध पर्यावरण प्रदान करते हैं (चित्र 13.8)। अलवणीय जल फसलों को उगाने के लिए एवं विश्व में सभी स्थानों पर मनुष्यों का अस्तित्व बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।
वायु में उपस्थित जलवाष्प के द्वारा बादलों का निर्माण होता है एवं यही जलवाष्प वर्षा या बर्फ के रूप में पुनः भूमि पर आती है। इससे नदियों, झीलों एवं भूमि में जल पुनः भर जाता है। किसी स्थान पर पाए जाने वाले जीवों की प्रजातियों को वर्षा प्रभावित करती है। प्रवाहित वायु मौसम एवं वर्षा के प्रतिरूप को निर्धारित करती है जिसका कृषि, जल आपूर्ति एवं जीवन आदि पर प्रभाव पड़ता है।
13.4.2 मृदा, चट्टानें एवं खनिज
आप जानते हैं कि हमारे पैरों के नीचे कुछ अद्भुत है! वह है पृथ्वी की भू-पर्पटी। यह चट्टानों, मृदा एवं खनिजों से बनी है। यह कठोर एवं निर्जीव प्रतीत होती है परंतु यह जीवन की वृद्धि के लिए एवं जीवित रहने के लिए लगभग सभी आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करती है। पौधों के उगने में सहायक मृदा से लेकर खनिज, जैसे- लवण, कोयला, तेल एवं धातुएँ (जैसे - आयरन, कॉपर) आदि इससे प्राप्त होती हैं। यह बाह्य परत पारिस्थितिकी तंत्र एवं मानव जीवन दोनों के लिए सहायक है। पृथ्वी का वह ठोस भाग जिसमें चट्टानें, मृदा एवं खनिज पदार्थ सम्मिलित होते हैं, भूमंडल कहलाता है।
मृदा एक साधारण धूल जैसी होती है परंतु यह पोषक तत्वों से समृद्ध होती है, जैसे-नाइट्रोजन एवं पोटैशियम। ये पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक तत्व होते हैं। ये पोषक तत्व चट्टानों के मंद अपक्षय एवं पौधों व जंतुओं के अवशेषों से प्राप्त होते हैं।
पृथ्वी पर अनेक प्रकार की भू-आकृतियाँ, चट्टानें, मृदा -इत्यादि विद्यमान हैं। इस विविधता एवं इन्हें आकार देने वाले प्रक्रम को भूविविधता कहा जाता है (चित्र 13.9)। यह अद्वितीय पर्यावासों के सर्जन में सहायता करती है जहाँ विभिन्न प्रकार के जीव पनप सकते हैं। प्रकृति के निर्जीव भाग, जैसे - मृदा, चट्टानें एवं जल मात्र पृष्ठभूमि ही नहीं हैं अपितु ये स्वयं जीवन की कहानी को आकार देने में सहायक हैं।
13.4.3 पौधे, जंतु एवं सूक्ष्मजीव
सूक्ष्मजीवों से संबधित अध्याय से लेकर पारिस्थितिकी विज्ञान के अध्याय तक हमने देखा कि पृथ्वी जीवन से परिपूर्ण है जिसमें वृक्षों, झाड़ियों, जड़ी-बूटियों से लेकर जंतुओं, कीट-पतंगों एवं नग्न आँखों से न दिखाई देने वाले अत्यंत सूक्ष्मजीव विद्यमान हैं। वह स्थान जहाँ जीवित प्राणी रहते हैं, वे सभी से मिलकर जैवमंडल बनता है। जैवमंडल में पृथ्वी, जल एवं वायु सभी सम्मिलित होते हैं जहाँ जीवन अपने परिवेश के साथ पारस्परिक क्रिया करता है ताकि वह अपना अस्तित्व बना कर वृद्धि कर सके।
जैसाकि अध्याय 12 'प्रकृति कैसे सामंजस्य में कार्य करती है' में आपने सीखा कि जीव किस प्रकार एक दूसरे पर एवं अपने पर्यावरण पर निर्भर रहते हैं। पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं। जंतु पौधों या अन्य जंतुओं को अपना आहार बनाते हैं एवं अपघटक मृत जीवों को विघटित करके पोषक तत्वों को मृदा में वापिस कर देते हैं। जीवन को सहारा देने के लिए प्रकृति एक सामूहिक प्रणाली की तरह कार्य करती है।
13.4.4 संतुलन का महत्त्व
-क्या आप को कभी आश्चर्य हुआ है कि पृथ्वी पर इतनी वस्तुएँ किस प्रकार संतुलन बनाकर रखती हैं? प्रकृति, मौसम एवं जीवन के मध्य पृथ्वी एक विशाल सामूहिक परियोजना की भाँति है। यह एक विशाल जीवंत प्रणाली है जिसमें भूमि, वायु, जल एवं जीव-जंतु परस्पर सहायक हैं एवं वे एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। यहाँ तक कि किसी एक भाग में होने वाला छोटा-सा भी परिवर्तन, जैसे – जंगल की कटाई, वर्षा, मृदा, वायु की गुणवत्ता आदि वहाँ रहने वाले जंतुओं को प्रभावित कर सकता है। पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व केवल किसी एक कारण से ही नहीं बना रहता है अपितु इसलिए भी बना रहता है क्योंकि यहाँ सभी तंत्र मिलकर संतुलन बनाए रखते हैं। यह वही संतुलन है जो हमारे ग्रह को रहने योग्य बनाए रखता है। अतः स्वच्छ वायु, जल, मृदा एवं जीवन के सभी रूपों को संरक्षित एवं सुरक्षित रखना ही महत्त्वपूर्ण नहीं है अपितु भविष्य के लिए पृथ्वी को स्वस्थ बनाए रखने हेतु भी अनिवार्य है।
13.5 जीवन को लुप्त होने से कौन बचाता है?
यदि पौधों एवं जंतुओं में जनन न हो तो एक समय पश्चात पृथ्वी से जीवन समाप्त हो जाएगा। जनन यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक प्रकार के जीव का अस्तित्व बना रहे एवं जीवन की निरंतरता बनी रहे। सामान्यतः हम यह अपेक्षा करते हैं कि जंतु ऐसी संतति पैदा करेंगे जो उनके जैसे दिखाई देंगे। जैसे- गाय के बछड़े व बिल्ली के बच्चे होते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि माता-पिता अपने बच्चों को एकल कोशिका से विकसित होने के लिए आवश्यक आनुवंशिकी अनुदेश स्थानांतरित कर देते हैं। ये अनुदेश आनुवंशिक पदार्थ या जीन कहलाते हैं जो प्रत्येक जीवित कोशिका के भीतर संगृहित होते हैं। आप इन्हें एक विस्तृत 'अनुदेश पुस्तिका' की तरह समझ सकते हैं जो प्रत्येक कोशिका के अंतर्गत विद्यमान होते हैं। कुछ अनुदेश कोशिका को यह बताते हैं कि रक्त कैसे बनता है जबकि अन्य अनुदेश अस्थियों, माँसपेशियों या त्वचा के निर्माण के लिए मार्गदर्शन करते हैं। साथ ही इन अनुदेशों से गाय की बछिया बड़ी होकर गाय जैसी एवं बिल्ली का बच्चा बड़ा होकर बिल्ली जैसा बन जाता है।
परंतु जनन का कार्य केवल एक ही जैसे जीवों को जन्म देना नहीं है अपितु यह माता-पिता से उनकी संतति में स्थानांतरित होने वाले अनुदेशों में भी छोटे-छोटे परिवर्तन करने की अनुमति भी देता है। कभी-कभी ये परिवर्तन पौधों या जंतुओं को नए वातावरण में अधिक उन्नत तरीके से जीवनयापन करने में सहायता करते हैं, जैसे- समय के साथ ऊँटों में चर्बी जमा होने से कूबड़ विकसित हो गया जिससे वे मरुस्थल मे जीवित रह सकें। यहाँ तक कि अतिसूक्ष्म जीवाणु से भी कुछ जीवाणु पनपते हैं जैसा कि आपने स्वास्थ्य से संबंधित अध्याय में सीखा कि कुछ जीवाणु प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो चुके हैं। इससे उन्हें जीवित रहने में सहायता मिलती है। कुछ वर्षों में ऐसे परिवर्तन पीढ़ी दर पीढ़ी नए गुणों को उत्पन्न करते हैं। यहाँ तक कि पूर्णरूप से नए जीव भी बन सकते हैं। अतः प्रजनन न केवल प्रत्येक प्रकार के जीव को सतत रूप से बनाए रखता है अपितु परिवर्तनों के अनुसार जीव अनुकूलन भी कर लेता है (चित्र 13.10)।
यह विचारणीय विषय है कि उपर्युक्त प्रक्रिया किस प्रकार समानता एवं विभिन्नता को दर्शाती है। समानता (एक जंतु अपने समान संतति को जन्म देता है, जैसे- एक गाय अपनी प्रजाति की बछिया को ही जन्म देती है) विभिन्नता (कुछ जंतुओं की प्रजातियों के रंग एवं कद में अंतर के कारण उनके गुणों में भी भिन्नता होती है)? यह एक प्रकार की रोचक पहेली है। जनन प्रक्रिया दो प्रकार की होती है। प्रथम वह जिसमें संतति लगभग अपने माता-पिता जैसी दिखाई देती है एवं द्वितीय वह जिसमें वह अपने माता-पिता से कुछ भिन्नता लिए हुए दिखती है।
अलैंगिक जनन में एकल जनक द्वारा नए जीवों को जन्म दिया जाता है जो पूर्णतः जनक के समान होते हैं (कोशिका के भीतर अनुदेशों के संदर्भ में पूर्णतया समान)। लैंगिक जनन में दो जनकों के अनुदेश मिलकर ऐसी संतति उत्पन्न करते हैं जो किसी भी जनक के समान नहीं होती। ऐसी संतित दोनों जनक के गुणों को साझा करते हैं परंतु उनमें कुछ भिन्नताएँ भी होती हैं। इस तरह के मेल आवश्यक विशेषताएँ बनाए रखते हैं एवं नए गुणों को प्रकट होने में सहायक होते हैं। अनेक पीढ़ियों के पश्चात ये छोटी-छोटी विभिन्नताएँ मिलकर बड़ी विभिन्नताओं युक्त नए जीवों के नए रूपों को जन्म देती हैं।
आइए, जानें कि पौधों एवं जंतुओं में जनन किस प्रकार होता है एवं यह समय के साथ किस प्रकार जीवों में विशिष्ट एवं विभिन्नता युक्त लक्षणों को विकसित करने में सहायक है।
13.5.1 अलैंगिक जनन
जब पौधे के किसी भी भाग, जैसे - तना, पत्ती या जड़ को मृदा में रोप दिया जाता है तब पौधे जनन कर सकते हैं। इस प्रकार के जनन को कायिक प्रवर्धन कहते हैं। क्या आप अपने आस-पास उपर्युक्त विधि द्वारा उगने वाले पौधों का अवलोकन कर एक
क्या आप अपने आस-पास उपर्युक्त विधि द्वारा उगने वाले पौधों का अवलोकन कर एक सूची बना सकते हैं?
बाँस और गन्ने किस प्रकार नए पौधे बनाते हैं? मैंने कभी उनके बीज नहीं देखे।
क्रियाकलाप 13.3 - आइए, पता लगाएँ
- पौधों के कुछ भागों को लीजिए, जैसे- मनी प्लांट के तने की कर्तन, आलू की आँखें या अदरक का एक टुकड़ा आदि (चित्र 13.11, ख)।
- प्रत्येक प्रतिदर्श को मृदा में भिन्न-भिन्न अधिक गहराई के स्तर तक रोपिए। मनी प्लांट की कर्तन को काँच के बर्तन में रखकर आप इसकी वृद्धि को सरलता से अवलोकित कर सकते हैं।
- यह सुनिश्चित कीजिए कि उन्हें वृद्धि के लिए आवश्यक जल, वायु एवं सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता रहे।
- इन्हें प्रतिदिन ध्यानपूर्वक देखिए एवं अंकित कीजिए कि इसकी जड़, तना एवं पत्तियाँ आने में कितने दिन लगते हैं। इसके साथ यह भी अवलोकन कीजिए कि पहला नया पत्ता कब दिखाई दिया।
क्या आपके संज्ञान में है...
केवल पौधे ही नहीं अपितु सूक्ष्मजीवों एवं जंतुओं में भी अलैंगिक जनन होता है। उदाहरण के लिए जीवाणु एवं अमीबा जैसे एककोशिकीय जीव दो समान जीवों में विभाजित हो जाते हैं। शैवाल जैसे कुछ बहुकोशिकीय जीव स्वयं के सूक्ष्म खंडों द्वारा पुनः विकसित होते हैं। एक अन्य साधारण जंतु हाइड्रा अपने शरीर पर छोटे-छोटे मुकुल बनाता है जो जनक से पृथक होकर नए जीवों का निर्माण करते हैं।
प्लेनेरिया (चित्र 13.12) एक प्रकार का चपटा कृमि है जो अपने शरीर के किसी भी खंड से एक नया कृमि विकसित कर सकता है। वैज्ञानिकों ने जंतुओं में पुनर्जनन को समझने के लिए प्लेनेरिया का उपयोग किया।
13.5.2 लैंगिक जनन
लैंगिक जनन में सामान्यतः दो जनक सम्मिलत होते हैं। नर एवं मादा जंतुओं में इसका अवलोकन करना सरल होता है परंतु क्या आप जानते हैं कि पुष्पीय पौधों में भी नर एवं मादा अंग होते हैं। कुछ सूक्ष्मजीवों, जैसे- जीवाणु एवं यीस्ट के भी दो 'संगम प्रारूप' होते हैं जो दो जनक की भाँति कार्य करते हैं।
जनन के लिए विशिष्ट कोशिकाएँ
आप अनुमान लगा सकते हैं कि यदि माता-पिता दोनों अपने आनुवंशिक पदार्थ नए जीव को बनाने में स्थानांतरित करते हैं तो क्या इस नए जीव में आनुवंशिक अनुदेश दोगुने नहीं हो जाएँगे? इसके साथ ही क्या ये आगे आने वाली पीढ़ी में भी दोगुने नहीं होते जाएँगे?
ऐसा नहीं होता क्योंकि प्रत्येक जनक विशिष्ट जनन कोशिकाएँ बनाता है जिन्हें हम युग्मक कहते हैं। इन युग्मकों में जनक के आनुवंशिक पदार्थ का आधा भाग ही होता है। जब नर एवं मादा युग्मक मिलते हैं तो एक नई कोशिका बनाते हैं जिसमें प्रत्येक जनक से प्राप्त आधे-आधे अनुदेशों से एक पूरा सेट बनता है।
संतान पूर्ण रूप से अपने माता या पिता के समान नहीं दिखाई देती है। यहाँ तक कि एक ही परिवार के भाई-बहन भी एक दूसरे से भिन्न दिख सकते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संतति माता-पिता से युग्मकों द्वारा आनुवंशिक अनुदेश प्राप्त करते हैं। प्रत्येक युग्मक में आँखों के रंग, बालों के प्रकार आदि लक्षणों के लिए अलग-अलग अनुदेशों का एक सेट होता है। जब भी शुक्राणु एवं अंडाणु मिलकर शिशु का निर्माण करते हैं तो इन अनुदेशों का मिलन होता है। ये अनुदेश प्रत्येक बार अलग-अलग विधियों से मिलते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक बच्चा अद्वितीय होता है। इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है कि एक बच्चे को अपनी माँ की नासिका जैसी नाक एवं दूसरे बच्चे को अपने पिता के नेत्र जैसे नेत्र आनुवंशिक रूप से मिलते हैं। यह सब कुछ इस पर भी निर्भर करता है कि माता-पिता की अनुदेशिका के कौन-से भाग एक साथ आए हैं।
पौधों में लैंगिक जनन
पौधे अपने पुष्पों के विभिन्न भागों का उपयोग करके नर एवं मादा युग्मक बनाते हैं। पुष्प के परागकोश के भीतर पाए जाने वाले परागकण नर युग्मक होते हैं जबकि पुष्प के भीतर गहराई में पाए जाने वाले बीजांड मादा युग्मक होते हैं। एक पुष्प के परागकण जब वायु, कीटों या जंतुओं द्वारा एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक स्थानांतरित होते हैं तो यह प्रक्रिया परागण कहलाती है। नर एवं मादा युग्मकों के संलयन की प्रक्रिया निषेचन कहलाती है। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप एक युग्मज बनता है जो बीज के रूप में विकसित होता है। बीजांड के चारों ओर पुष्प का मांसल भाग फल के रूप में विकसित हो जाता है (चित्र 13.13)।
प्रायः पक्षी या जंतु जब फल खाते हैं तो बीज मूल पौधे से दूर गिर जाते हैं। पौधे उगाने के लिए बीजों के फैलाव की यह एक सरल प्रक्रिया है। इसी प्रकार पक्षी बरगद के फलों को खाकर बीज उत्सर्जित करते हैं। ये बीज वर्षा के समय वृक्ष की दरारों आदि में गिर जाने से अंकुरित हो नाते हैं। जब इन बीजों को पानी मिलता है तो वे जड़ों एवं प्ररोहों को विकसित करने के लिए संगृहित पोषक तत्वों का उपयोग करते हैं। स्मरण कीजिए कक्षा 6 में आपने 'बीजों के अंकुरण' क विषय में पढ़ा जहाँ आपने छोटे प्ररोहों एवं कोपलों का अवलोकन किया।
जंतुओं में लैंगिक जनन
जंतुओं में नर युग्मक को शुक्राणु एवं मादा युग्मक को अंडाणु कहते हैं। मछली एवं मेंढक में निषेचन प्रक्रिया जल में होती है। इनके नर एवं मादा क्रमशः अपने-अपने शुक्राणु एवं अंडाणु जल में स्खलित करते हैं तब वे संयोजित होकर युग्मज बनाते हैं। इन जंतुओं में युग्मज से भ्रूण का विकास भी जल में ही होता है (चित्र 13.14)।
मानव सहित पक्षियों एवं स्तनधारियों में शुक्राणु मादा जननांग के भीतर एकत्रित होते हैं एवं जब ये शुक्राणु मादा के शरीर द्वारा उत्पादित अंडे से मिलते हैं तो निषेचन हो जाता है। पक्षी व स्तनधारी जंतु इस चरण के पश्चात विविध प्रक्रियाओं का अनुसरण करते हैं।
पक्षियों में निषेचित अंडा 'युग्मज' मादा द्वारा दिया जाता है। अंडा देने के पश्चात उसके सेने की प्रक्रिया होती है। इसमें युग्मज का भ्रूण में विकास हो जाता है। यह विचारणीय है कि प्रत्येक अंडे में मादा को इतना खाद्य पदार्थ भरना पड़ता है कि यह खाद्य पदार्थ भ्रूण के विकास हेतु तब तक के लिए पर्याप्त रहे जब तक कि वह अंडे से बाहर न आ जाए। यह भ्रूण की पोषण आपूर्ति सुनिश्चित करने की एक प्रक्रिया है।
अधिकांश स्तनधारियों में युग्मज का भ्रूण में विकास मादा के शरीर के भीतर ही होता है। माँ का शरीर बच्चे के जन्म होने तक खाद्य पदार्थ एवं ऑक्सीजन प्रदान करता है। यह भ्रूण को पोषण देने की एक भिन्न प्रक्रिया है जो अंडे देने वाले जीव-जंतुओं से अलग है। प्रत्यक्ष रूप से बच्चे को जन्म देने एवं अंडे देने के लाभ एवं हानि क्या हैं? क्या आपको लगता है कि कुत्ते, गाय या मनुष्य पक्षियों की भाँति अंडे दे सकते हैं? यदि हाँ तो क्यों अथवा क्यों नहीं?
13.6 पृथ्वी पर जीवन को क्या खतरे हैं?
हम यह जानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन सजीव एवं निर्जीव वस्तुओं के परस्पर संतुलन पर निर्भर करता है परंतु मानवीय गतिविधियाँ इस संतुलन को बिगाड़ रही हैं। यहाँ तक कि वैश्विक तापमान, ऑक्सीजन का स्तर अथवा ओजोन परत में अंशमात्र भी परिवर्तन जीवन के लिए गंभीर संकट बन सकता है।
वर्तमान में हमारे समक्ष सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियाँ हैं, जैसे- जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का हनन एवं प्रदूषण, जिनका हम सामना कर रहे हैं। इन्हें एक साथ 'त्रिग्रहीय संकट' के नाम से जाना जाता है।
कोयला एवं तेल जैसे जीवाश्म ईंधन को जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड एवं मेथेन जैसी हरित गृह गैसें उत्सर्जित होती हैं एवं ये गैसें वातावरण में अधिक गरमी को रोक लेती हैं जिससे वैश्विक तापन होता है। यद्यपि पृथ्वी पर पेड़-पौधे एवं छोटे समुद्री प्लवक कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर संतुलन बनाए रखते हैं परंतु जब हम उन जीवाश्म ईंधनों को जलाते हैं जो लाखों वर्षों से पृथ्वी के भीतर संगृहीत थे तो अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में उत्सर्जित होती है जिसे पृथ्वी शीघ्रता से अवशोषित नहीं कर पाती जिसके परिणामस्वरूप वातावरण में ऊष्मा में वृद्धि होने लगती है। तापमान में थोड़ी-सी वृद्धि होने पर हिमछत्रक पिघल सकते हैं और समुद्र का जल-स्तर बढ़ सकता है। जल स्तर बढ़ने से कई समुद्र तटीय शहरों में बाढ़ आ सकती है और मौसम में बड़े परिवर्तन की स्थिति बनती है। इनके फलस्वरूप बहुत से पौधे और जीव-जंतु विलुप्त भी हो सकते हैं। तापमान, वर्षा और मौसम प्रतिमानों के दीर्घकालिक परिवर्तनों को जलवाय परिवर्तन कहते हैं।
जब प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाते हैं तो पौधे और जीव-जंतु लुप्त हो जाते हैं जिससे पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है। उदाहरण के लिए जैसाकि हमने अध्याय 12 'प्रकृति कैसे सामंजस्य में कार्य करती है' में समझा है कि यदि घास समाप्त हो जाए तो हिरण व टिड्डे जिनका भोजन ही घास है, वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करेंगे। शाकाहारी जीवों के बिना शिकारी पशु, जैसे- बाघ या लोमड़ी को भी अपना भोजन प्राप्त नहीं होगा। इस प्रकार पारिस्थितिकी तंत्र में प्रत्येक जीव की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है और इनमें से केवल कुछ के भी विलुप्त होने से प्रकृति की जीवन सहायक क्षमता क्षीण हो जाती है जो जीवन का आधार है।
प्रदूषण इस समस्या को और बढ़ा देता है। कारखानों, वाहनों और ईंधन जलने से उत्पन्न होने वाला वायु प्रदूषण मानव और प्रकृति दोनों को क्षति पहुँचाता है। इससे श्वास संबंधी समस्याएँ, फसलों का ह्रास, धूमकुहरा का बनना और अम्ल-वर्षा जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
जलवायु परिवर्तन कई रूपों को प्रभावित करता है, जैसे- फसलों की वृद्धि एवं जल आपूर्ति से लेकर वन्य जीवों का पर्यावास एवं मानव स्वास्थ्य तक। पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा हेतु हमें प्रदूषण को कम करने, स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग करने एवं बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प चुनने की आवश्यकता है। हमने यह भी सीखा है कि पृथ्वी पर जीवन परस्पर आधारित प्राकृतिक प्रणालियों के पारस्परिक सहज संतुलन से पल्लवित होता है। तथापि यह संतुलन मानवीय गतिविधियों में वृद्धि के कारण संकट में है, जैसे- वायु में ऑक्सीजन, वायुमंडल में ओजोन एवं पृथ्वी के तापमान में आंशिक कमी अथवा वृद्धि से पृथ्वी पर संपूर्ण जीवन संकटग्रस्त हो सकता है।
क्या आपके संज्ञान में है ...
विश्व के कई देशों ने पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक समझौते किए हैं। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987) ने क्लोरोफ्लुओरोकार्बन (CFCs) जैसे हानिकारक रसायनों के उत्सर्जन को घटाने में सहायता की जिससे ओजोन परत धीरे-धीरे पुनः बनने लगी। पृथ्वी शिखर सम्मेलन (1992) ने जलवायु परिवर्तन एवं जैव विविधता के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों का नेतृत्व किया। इसके पश्चात क्योटो प्रोटोकॉल (2005) एवं पेरिस समझौते (2015) ने कई देशों को हरितगृह गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रतिबद्ध किया। पेरिस समझौते ने लक्ष्य रखा कि वैश्विक तापन को 1.5°C से नीचे रखा जाए परंतु 2025 तक भी विश्व इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है। जलवायु परिवर्तन के और अधिक दुष्प्रभावों से बचने के लिए अभी अत्यधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।
जल एवं मृदा प्रदूषण जीवन के लिए गंभीर संकट है (चित्र 13.16)। कारखानों, खेतों एवं प्लास्टिक का कचरा जलीय जीवन को हानि पहुँचाते हैं एवं जल को प्रक्षित करते हैं। अत्यधिक मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग एवं अपशिष्ट का असुरक्षित निपटान मृदा को प्रदूषित करता है जिससे फसलों की पैदावार घटती है एवं खाद्य श्रृंखला के द्वारा हानिकारक पदार्थ फैल जाते हैं। इनसे बचाव के लिए उत्कृष्ट अपशिष्ट प्रबंधन एवं संधारणीय कृषि पद्धतियों की आवश्यकता है।
हमने अध्ययन किया कि पृथ्वी की सभी प्रणालियाँ, जैसे- जलमंडल, जैवमंडल, वायुमंडल और भूमंडल इत्यादि परस्पर संबंधित हैं। इनमें से किसी एक को होने वाली क्षति अन्य को भी प्रभावित कर सकती है। जलवायु संरक्षण से तात्पर्य है सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग कर हरितगृह गैसों के उत्सर्जन को कम करना, पर्यावरण के अनुकूल यातायात के साधनों का चयन करना और ऊर्जा के उत्कृष्ट उपयोग पर ध्यान देना। साथ ही जैव विविधता को सुरक्षित रखना भी नितांत आवश्यक है क्योंकि विविध पारिस्थितिकी तंत्र सुदृढ़ और संतुलित होते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग करने में स्थानीय समुदाय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
जलवायु एवं विविधता संरक्षण प्रत्येक व्यक्ति का उत्तरदायित्व है। उदाहरण के लिए कपड़ा एवं प्लास्टिक जैसी वस्तुओं का पुनः उपयोग कर, सुधार कर और पुनर्चक्रण कर प्रदूषण एवं अपशिष्ट को कम किया जा सकता है। ऊर्जा और जल की बचत जैसी छोटी-छोटी पहल भी इसमें बड़ा योगदान दे सकती हैं। हम इस विषय में अधिक जानकारी एकत्रित कर, विचारों को साझा कर और दूसरों को प्रोत्साहित कर परिवर्तन ला सकते हैं।
निष्कर्षतः पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए स्थानीय समुदाय से लेकर वैश्विक नेताओं तक हम सभी को कार्य करने की आवश्यकता है। हम सभी मिलकर कार्य करके और उत्तरदायित्व पूर्ण जीवन का निर्वहन कर इस अद्वितीय ग्रह 'पृथ्वी' एवं इसके भविष्य को संरक्षित कर सकते हैं।
स्मरणीय बिंदु
- हमारी पृथ्वी सौर मंडल में अद्वितीय ग्रह है जहाँ जीवन संभव है।
- पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा उस दूरी पर करती है जहाँ ताप न तो अत्यंत गरम होता है और न ही अत्यंत ठंडा, जिससे जल द्रव अवस्था में रह पाता है। यह क्षेत्र 'वासयोग्य क्षेत्र' या 'गोल्डीलॉक्स' क्षेत्र। कहलाता है।
- पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग वृत्ताकार कक्षा में करती है जिससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि वर्ष में किसी भी समय संपूर्ण पृथ्वी बहुत गरम अथवा बहुत ठंडी नहीं होती है।
- पृथ्वी का गुरुत्व केवल इतना ही पर्याप्त होता है कि वह वायुमंडल को अंतरिक्ष में पलायन नहीं करने देता। यह इतना अधिक भी नहीं है कि प्राणी अपने ही भार से दब जाए।
- वायुमंडल में ओजोन की उपस्थिति सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी की सतह पर पहुँचने से रोकती है।
- पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र उच्च ऊर्जा कणों से पृथ्वी की रक्षा करता है अन्यथा ये पृथ्वी से टकरा कर जीवन को नष्ट कर सकते हैं।
- वायुमंडल (जिसमें वायु है), जलमंडल (जिसमें जल है), भूमंडल (जिसमें पृथ्वी का ठोस भाग है) और जैवमंडल (जिसमें जीवन है) पारस्परिक क्रिया द्वारा पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखते हैं।
- पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता बनाए रखने के लिए जनन आवश्यक है।
- जनन अलैंगिक अथवा लैंगिक हो सकता है।
- अलैंगिक जनन में एक ही जनक द्वारा सर्वसमान नए जीव उत्पन्न होते हैं।
- लैंगिक जनन में अगली पीढ़ी में नए लक्षण उत्पन्न होने की संभावना होती है।
- भिन्न-भिन्न प्राणियों में युग्मज से भ्रूण का विकास शरीर के भीतर अथवा बाहर कहीं भी हो सकता है।
- जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का हनन और प्रदूषण पृथ्वी पर जीवन के लिए संकट बनते जा रहे हैं। ये तीनों समस्याएँ एक साथ 'त्रिग्रहीय संकट' के रूप में जानी जाती हैं।
जिज्ञासा बनाए रखें
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ऐसा कौन-सा प्रमुख कारण है जिससे वर्तमान में मंगल ग्रह पर पृथ्वी के समान जीवन संभव नहीं है?
(i) इस पर अनेक ज्वालामुखी हैं।
(ii) यह सूर्य के अधिक निकट है।
(iii) इस पर सघन वायुमंडल और द्रव जल का अभाव है।
(iv) इसका चुंबकीय क्षेत्र अत्यंत प्रबल है। - इनमें से कौन-सा भूविविधता का उदाहरण है?
(i) जंगल में विविध पक्षियों की चहचहाहट।
(ii) विभिन्न भू-आकृतियाँ, जैसे- पहाड़, घाटियाँ और मरुस्थल।
(iii) मानसून के समय मौसम में परिवर्तन।
(iv) तालाब में विभिन्न प्रकार की मछलियाँ। - यदि पृथ्वी अत्यधिक छोटी होती और उसका घनत्व समान होता तो उसके वायुमंडल का क्या होता?
(i) यह अधिक सघन और गरम हो जाता।
(ii) दुर्बल गुरुत्व के कारण यह अंतरिक्ष में चला जाता।
(iii) यह जम जाता।
(iv) इससे प्रबल पवन चलने लगती। - लैंगिक जनन में संतति अपने माता-पिता से भिन्न क्यों होती हैं?
(i) उनकी वृद्धि विभिन्न जलवायु में होती है।
(ii) वह विभिन्न प्रकार का भोजन ग्रहण करते हैं।
(iii) वह जन्म के पश्चात नए आनुवंशिक अनुदेश प्राप्त करते हैं।
(iv) वह माता-पिता दोनों से मिश्रित अनुदेश (जीन) प्राप्त करते हैं। - आपने मानसून के पश्चात अपने विद्यालय की दीवार की दरारों में छोटे-छोटे हरे पौधे उगते देखे होंगे। आपके अनुसार ये बीज कहाँ से आए? किन परिस्थितियों ने इन पौधों को वहाँ उगने में सहायता की होगी?
- कुछ समय पूर्व ही एक शहर में नई सड़कें और भवन बनाने के लिए जंगल का एक बड़ा भाग काट दिया गया। यह स्थानीय जलवायु एवं जैव विविधता को किस प्रकार प्रभावित करेगा? इससे स्थानीय क्षेत्र में जल की उपलब्धता अथवा गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
- एक मित्र कहता है, "पृथ्वी पर अतीत में भी जलवायु परिवर्तन होते रहे हैं इसलिए आज का वैश्विक तापन कोई नई बात नहीं है।" आपने अपनी विज्ञान की पुस्तक के इस अध्याय एवं अन्य अध्यायों में जो सीखा है उसका उपयोग करके आप क्या प्रतिक्रिया देंगे?
- कल्पना कीजिए कि यदि पृथ्वी पर उसका चुंबकीय क्षेत्र अचानक लुप्त हो जाए तो पृथ्वी पर जीवन के लिए किस प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं? व्याख्या कीजिए।
- मंगल ग्रह पर मनुष्यों के लिए एक नई बस्ती की अभिकल्पना बनाने के कार्य का उत्तरदायित्व दिया गया है। वहाँ मानव जीवन को बनाए रखने के लिए आपको पृथ्वी पर उपलब्ध तीन वस्तुएँ मंगल ग्रह पर पुनः बनानी होंगी। इनमें से किस वस्तु को वहाँ प्रतिकृत करना सबसे कठिन लगता है और क्यों?
- एक गाँव में विगत वर्षों से तापमान में वृद्धि हो रही है एवं वर्षा अप्रत्याशित हो गई है। इस
- यदि पृथ्वी पर वायुमंडल न होता तो क्या यह पृथ्वी पर जीवन, तापमान एवं जल को प्रभावित करता? स्पष्ट कीजिए।
- कायिक प्रवर्धन के पाँच उदाहरणों पर चर्चा कीजिए।
आपने अब तक जो सीखा उसके आधार पर कुछ प्रश्नों की रचना कीजिए ... .............
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खोजें, अभिकल्पित करें और चर्चा करें
- एक 'पृथ्वी जीवन रक्षक किट' तैयार कीजिए। कल्पना कीजिए कि आप किसी दूसरे ग्रह के लिए पृथ्वी जैसा एक छोटा-सा निदर्श (मॉडल) बना रहे हैं। जीवन सहायक के रूप में वहाँ कौन सी व्यवस्थाएँ होनी चाहिए और क्यों ?
- भारत एक चुनौतीपूर्ण चंद्र मिशन 'चंद्रयान-4' की योजना बना रहा है जो चंद्रमा से मृदा के प्रतिदर्श (सैंपल) लेकर आएगा। यदि चंद्रमा पर जल होता तो क्या उसकी मृदा में पौधे उग सकते हैं? किसी ऐसे प्रयोग के विषय पर विचार कीजिए जो आपको यह ज्ञात करने में सहायता कर सके कि क्या चंद्रमा पर पौधे उगाना संभव है?
- पुष्प प्रायः चमकीले रंग के होते हैं एवं उनमें एक रुचिकर गंध होती है। ये विशेषताएँ पौधे के जनन में कैसे सहायक होती हैं?
- मछली एवं मेंढक जैसे जंतु एक बार में सैकड़ों यहाँ तक कि हजारों अंडे क्यों देते हैं जबकि दूसरे जानवर बहुत कम अंडे देते हैं? इतने सारे अंडे देने के क्या लाभ और हानि हो सकते हैं?
- गौरैया जैसे पक्षी घोंसले बनाते हैं एवं अपने अंडों और चूजों की देखभाल करते हैं जबकि साँप जैसे सरीसृप सामान्यतः अपने अंडे देते हैं एवं उन्हें बिना सुरक्षा के छोड़ देते हैं। माता-पिता की देखभाल में यह अंतर प्रत्येक प्रकरण में बच्चों के जीवित रहने की संभावनाओं को कैसे प्रभावित कर सकता है?
इसका यहाँ अंत नहीं है, मेरे मित्र !
और अब हम कक्षा 8 की अपनी विज्ञान यात्रा के अंतिम पृष्ठ पर पहुँच चुके हैं। परंतु स्मरण रहे कि यह आपकी खोजयात्रा का अंत नहीं है। हमें आशा है कि वर्षभर में आपने गहन प्रश्न पूछना, अन्वेषणों की रूपरेखा तैयार करना और वैज्ञानिकों की भाँति सोचना सीखा होगा। भले ही आपने यह सोचा हो कि बल कैसे कार्य करते हैं, हमारे ग्रह का संतुलन किस प्रकार अद्भुत है तथा यह भी अन्वेषण किया होगा कि पारिस्थितिकी तंत्र किस प्रकार जुड़े हुए हैं विश्वास कीजिए कि आप विज्ञान के खोजी जगत में प्रवेश कर चुके हैं।
यदि आपने ध्यान दिया हो तो हमने प्रत्येक अध्याय में आपके लिए रिक्त स्थान दिया है जिसमें आप मस्तिष्क में उठे प्रश्नों को लिख सकते हैं। आपके आस-पास ऐसी कौन-सी वस्तुएँ हैं जो आपको आश्चर्यचकित करती हैं? संभवतः आपने देखा होगा कि किसी पत्ते पर जल की बूँदें लेंस की तरह कैसे कार्य करती हैं अथवा आपको विस्मय हुआ होगा कि विभिन्न पक्षियों की उड़ानों के प्रतिरूप भिन्न क्यों होते हैं। जिन वस्तुओं पर आप ध्यान देते हैं और उनके संबंध में आप जो प्रश्न पूछते हैं, ये ही वैज्ञानिक खोज का आरंभ हैं। यथार्थ अवलोकनों पर आधारित इस पाठ्यपुस्तक की अभिकल्पना आपके मार्गदर्शन हेतु की गई है और आपकी कल्पना को पतंग की भाँति ऊँची उड़ान भरने देने के लिए प्रेरित करती है। तब भी वास्तविक रोमांच आपका है- पूछते रहिए, प्रयोग करते रहिए, अपने निष्कर्षों को अपने मित्रों और शिक्षकों के साथ साझा करते रहिए।
स्मरण रहे कि इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात अगले वर्ष आप माध्यमिक स्तर में प्रवेश करेंगे, जहाँ हम विज्ञान के संसार में अधिक गहन अध्ययन करेंगे। यह यात्रा और अधिक विस्तृत जाँच-पड़ताल, बड़ी चुनौतियों और गहनतम खोजों के साथ आगे बढ़ेगी। इसलिए अपनी उत्सुकता बनाए रखें, कभी भी प्रयोग करना बंद न करें और सदैव यह विश्वास रखें कि आपकी जिज्ञासा संसार को परिवर्तित कर सकती है। हम आपसे पुनः विज्ञान के उन्हीं पृष्ठों में मिलेंगे क्योंकि विज्ञान का कोई अंत नहीं है, मेरे मित्र !