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अध्याय -1


प्राकृतिक संसाधन एवं उनका उपयोग

समस्त चिंतनशील सामाजिक विज्ञानी इस बात पर स्पष्ट हैं कि हमें क्या करने की आवश्यकता है। हमें संपोषणीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना होगा, एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए कार्य करे, प्रयुक्त संसाधनों का पुनरुपयोग करे, अपशिष्ट को न्यूनतम करे तथा समाप्त हो चुके संसाधनों की पुनः पूर्ति करे। हमें प्रकृति के सहज ज्ञान की ओर लौटना होगा जो सभी संसाधनों का अंततः पुनर्निर्माणकर्ता एवं पुनर्चक्रणकर्ता है।

– क्रिस्टियाना फिगुएरेस और टॉम रिवेट-कारनैक 'द फ्यूचर वी चूज'

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महत्वपूर्ण प्रश्न

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  1. हम प्राकृतिक संसाधनों का वर्गीकरण कैसे करते हैं?
  2. जीवन के विभिन्न पक्षों और प्राकृतिक संसाधनों के वितरण के मध्य क्या संबंध है?
  3. प्राकृतिक संसाधनों के असंधारणीय उपयोग/अतिशोषण से क्या आशय है?
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चित्र 1.2- प्रवाहित जल की शक्ति को विद्युत में रूपांतरित करता हिमाचल प्रदेश में एक लघु जल विद्युत संयंत्र
Screenshot 2026-02-13 164426 चित्र 1.3- एक अपतटीय तेल संयंत्र समुद्र तल के नीचे से खनिज तेल निकालते हुए

प्रकृति कब एक संसाधन बन जाती है?

'प्रकृति' शब्द का एक अर्थ उन सजीव और निर्जीव रूपों की समग्रता से है जो हमारे पर्यावरण का भाग हैं, परंतु मानव द्वारा निर्मित नहीं हैं। जब मानव इनका उपयोग अपने जीवन-यापन के लिए करते हैं या उपभोग के लिए इनसे नई वस्तुएँ बनाते हैं, तब प्रकृति के ये तत्व 'संसाधन' बन जाते हैं। उदाहरण के लिए, वृक्ष पर्यावरण का अंश हैं; वे मानव से पृथक स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में हैं। जब हम उन्हें काटते हैं और उनकी लकड़ी से फर्नीचर बनाते हैं, तब हम वृक्षों को एक संसाधन के रूप में देखते हैं।

प्रायः ये वस्तुएँ आसानी से उपलब्ध नहीं होती उदाहरण के लिए, समुद्र की गहराई में खनिज तेल हो सकता है, जहाँ पहुँचने की तकनीक हमारे पास नहीं है या निष्कर्षण की लागत बहुत अधिक हो सकती है अथवा यह सांस्कृतिक रूप से अस्वीकार्य हो सकता है, जैसे- पवित्र उपवनों में वृक्षों को काटना। इसलिए, किसी तत्व को संसाधन कहलाने के लिए उसे तकनीकी रूप से सुलभ होना चाहिए, उसका दोहन आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य होना चाहिए। (सामान्यतः 'दोहन' शब्द का एक नकारात्मक अर्थ होता है। जिस संदर्भ में हम इसका यहाँ प्रयोग कर रहे हैं, इसका अर्थ है- 'प्राकृतिक संसाधनों का निष्कर्षण, उपयोग और उपभोग'।)

पृथ्वी पर अनेक प्राकृतिक संसाधन हैं, जिनमें से कई लाखों वर्षों में निर्मित हुए हैं और जिन्हें मानव ने ग्रहण किया है और उनका उपयोग करना सीखा है। इनमें प्रत्यक्ष रूप से जल, वायु और मृदा सम्मिलित हैं और साथ ही कुछ अप्रत्यक्ष, जैसे- कोयला, खनिज तेल, बहुमूल्य पत्थर, धातु अयस्क, लकड़ी आदि सम्मिलित हैं।

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चित्र 1.4 - सामान्य जुताई से भूमिगत पारिस्थितिकी तंत्र में न्यूनतम व्यवधान उत्पन्न होता है और मृदा की नमी बनी रहती है।
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चित्र 1.5 - मधुमक्खी के छत्ते से शहद

इसे अनदेखा न करें

  • विश्व की अनेक स्थानीय परंपराओं में प्रकृति को पवित्र माना जाता है। आपने इसके बारे में पढ़ा है। ऐसी परंपराओं में प्रकृति को पालनकर्ता और पोषणकर्ता के रूप में देखा जाता है।
  • क्या आप ऐसी प्रथाओं के बारे में जानते हैं जो इसे प्रतिबिंबित करती हैं?
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चित्र 1.6 - कल्याण हेतु तुलसी-पूजा

आइए विचार करें

थोड़ा ठहरिए। स्वयं और अपने आस-पास की वस्तुओं को देखिए। इनमें से प्रत्येक का उद्गम-स्रोत क्या है? किसी-न-किसी मोड़ पर ये सभी प्रकृति की ओर ले जाती हैं, यहाँ तक कि आपके वस्त्र पर लगा प्लास्टिक का बटन भी।

संक्षेप में, हम 'प्राकृतिक संसाधन' शब्द का प्रयोग उन सामग्रियों और पदार्थों के लिए करते हैं, जो प्रकृति में पाए जाते हैं और मानव के लिए मूल्यवान होते हैं।

प्राकृतिक संसाधनों की श्रेणियाँ

विज्ञान में हम वर्गीकरण और नामकरण की उपयोगिता सीखते हैं। जब हम विचारों या वस्तुओं को वर्गीकृत करते हैं, तब हम कुछ समान विशेषताओं (या मानदंडों) का उपयोग करते हैं। हम श्रेणियों का इस प्रकार नामकरण करते हैं कि हम उन्हें केवल एक शब्द या एक छोटे वाक्यांश से संदर्भित कर सकें। जब ये नाम और अर्थ जन-समूहों में साझा किए जाते हैं, तब इससे सहायता मिलती है। हम विचारों या वस्तुओं के एक समूह पर बिना प्रत्येक बार वर्णन किए चर्चा कर सकते हैं। इससे हम अधिक प्रभावशाली रूप से संवाद कर सकते हैं। पूर्ववर्ती कक्षाओं में आपने सजीव और निर्जीव वस्तुओं के विषय में पढ़ा था। जैसे ही हम इन शब्दों का उपयोग करते हैं, आपको इनका अर्थ समझ में आ जाता है। यह श्रेणियों का एक सरल उदाहरण है।

हम प्राकृतिक संसाधनों के साथ भी ऐसा ही करते हैं।

आइए विचार करें

प्राकृतिक संसाधनों को वर्गीकृत करने के लिए हम कौन-से विभिन्न मानदंडों का उपयोग कर सकते हैं?

प्राकृतिक संसाधनों को वर्गीकृत करने का एक उपाय यह है कि हम उन संसाधनों को देखें, जिनका उपयोग जीवन के लिए अनिवार्य, सामग्री के स्रोत तथा ऊर्जा के स्रोत के रूप में किया जाता है।

जीवन के लिए आवश्यक संसाधन

पृथ्वी पर जीवन उस वायु के बिना संभव नहीं है जिसमें हम श्वास लेते हैं, उस जल के बिना जिसे हम पीते हैं और उस भोजन के बिना जो हम खाते हैं। हम ये सब वायुमंडल, नदियों और सरोवरों से तथा मृदा के कृषि कार्य या अन्य सजीव वस्तुओं के माध्यम से प्राप्त करते हैं। हम उस वायु को नहीं बना सकते जिसमें हम श्वास लेते हैं, उस जल को जिसे हम पीते हैं या उस मृदा को जो हमें भोजन देती है।

सामग्री के लिए संसाधन

मनुष्य प्रकृति के उपहारों से भौतिक वस्तुओं का निर्माण करता है। हम इनका प्रयोग अपनी उपयोगिता हेतु या ऐसी सुंदर वस्तुओं के निर्माण में करते हैं, जो हमारे और दूसरों के जीवन को समृद्ध बनाती हैं, जैसे- लकड़ी के एक टुकड़े को कुर्सी में परिवर्तित किया जा सकता है अथवा तराशकर शिल्पित कर प्रतिमा भी बनाई जा सकती है। भारत की भौगोलिक विविधता हमें लकड़ी से लेकर संगमरमर और कोयले से लेकर सोने तक, विविध प्रकार के प्राकृतिक संसाधन प्रदान करती है।

ऊर्जा के लिए संसाधन

ऊर्जा आधुनिक जीवन की आधारशिला है, जैसे- विद्युत हमारे भवनों, परिवहन और सभी प्रकार की उत्पादन प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक है। यह ऊर्जा विभिन्न प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त हो सकती है, जैसे- कोयला, जल, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, सूर्य का प्रकाश, पवन आदि।Screenshot 2026-02-13 164503
चित्र 1.7- नदी का जल, एक नवीकरणीय संसाधन तब तक है जब तक हिमनदों (ग्लेशियर) और वनों का अस्तित्व है।
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चित्र 1.8 - यदि हम वनों को पुनर्जीवित होने दें, तो सीमित मात्रा में लंबे समय तक उनसे लकड़ी प्राप्त कर सकते हैं।

नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधन

प्राकृतिक संसाधनों को वर्गीकृत करने का दूसरा उपाय इस आधार पर हो सकता है कि वे नवीकरणीय हैं या नहीं। प्रकृति का एक सामान्य सिद्धांत यह है कि यह पुनर्स्थापन और पुनर्जनन की प्रक्रिया में कार्य करती है। पुनर्स्थापन किसी क्षीण या क्षतिग्रस्त वस्तु को उसकी मूल स्वस्थ अवस्था में पुनः लाने की प्रक्रिया है। प्रकृति समय के साथ स्वयं को स्वस्थ, नवीनीकृत और संरक्षित करती है जैसे - आपकी त्वचा पर लगा घाव सामान्यतः ठीक हो जाता है या दावानल के बाद वन पुनः स्वस्थ हो जाते हैं। पुनर्जनन, पुनर्स्थापन से अधिक व्यापक है। यह प्रकृति की नवजीवन और फलने-फूलने के लिए अनूकूल परिस्थितियाँ निर्मित करने की क्षमता को प्रकट करता है।

हम उन क्षेत्रों में वृक्ष लगाते हैं जहाँ आवास के लिए वनों को निर्मूलित करने जैसे मानवीय हस्तक्षेपों के कारण वृक्ष नष्ट हो गए हों। वहाँ मूल रूप से उगने वाले वृक्षों को लगाने से पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्स्थापन होता है जैसे- वृक्ष पक्षियों, गिलहरियों और अन्य जीवों को भोजन और आश्रय प्रदान करते हैं जिससे जीवन पुनः लौट आता है। प्रकृति चक्रों में कार्य करती है, जहाँ कुछ भी अपशिष्ट नहीं होता। एक वन का उदाहरण लीजिए। मान लीजिए वन में एक वृक्ष गिर जाता है, तो वह जीवाणुओं, फफूँद और कीड़ों का भोजन बनकर सड़ जाता है। वह वृक्ष मृदा का भाग बन जाता है और उसे उपजाऊ बनाता है। बीजों से नए वृक्ष और पौधे उगते हैं, अंततः कुछ वृक्ष गिर जाते हैं और चक्र पुनः आरंभ हो जाता है। ये प्रकृति के पुनर्स्थापन और पुनर्जनन के सिद्धांत के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

नवीकरणीय संसाधन

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चित्र 1.9 - कृतज्ञतास्वरूप सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करना।
नवीकरणीय संसाधन समय के साथ इन विशेषताओं को प्रदर्शित करते हैं। भारत के अधिकांश भाग में प्रचुर मात्रा में सूर्य का प्रकाश उपलब्ध है। प्राकृतिक प्रक्रियाओं में वर्षा और पिघलते हिमनदों से नदियाँ नियमित रूप से पोषित होती हैं। वन स्वयं को नवीनीकृत करते हैं, मृदा प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से स्वयं का पुनः निर्माण करती है इत्यादि।

सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, प्रवाहित जल से उत्पन्न ऊर्जा, वनों से प्राप्त लकड़ी नवीकरणीय संसाधन हैं, यदि हम उनका प्रबंधन सातत्य विधियों से कर सकें।

यद्यपि उनके नवीकरणीय बने रहने के लिए एक अनुबंध यह है कि पुनर्स्थापन और पुनर्जनन की प्राकृतिक लय बाधित न हो। यदि हम वनों में वृक्षों के बढ़ने की गति के साथ-साथ लकड़ी काटते हैं, तो अंततः वन नष्ट हो जाएँगे। वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि अविवेकपूर्ण मानवीय कृत्यों के कारण प्रकृति के अनेक चक्र असंतुलित हो गए हैं। जीवाश्म ईंधन आधारित औद्योगीकरण और कृषि तथा अन्य उद्देश्यों के लिए वनों की कटाई जैसे कारकों के संयोजन ने तापमान वृद्धि को जन्म दिया है, जिसका हम अनुभव कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, हिमालय में कुछ क्षेत्रों में हिमनद इतने शीघ्र पिघल रहे हैं कि वर्षा उनकी पूर्ति नहीं कर सकती। इसका 'पर्वतीय हिम स्रोत' (वाटर टावर) पर निर्भर समतल भूभागों में रहने वाली जनसंख्या की जल सुरक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है।

इसे अनदेखा न करें

  • परंपरागत रूप से, समुदायों में मछलियों की संख्या बनाए रखने के लिए प्रजनन काल की अवधि में मछली पकड़ने को नियंत्रित करने (या उससे परहेज करने) की एक व्यवस्था थी। हालाँकि, मछली पकड़ने के व्यवसायीकरण ने अत्यधिक मछली पकड़ने की प्रवृत्ति को जन्म दिया है। उदाहरण के लिए, टूना नामक एक मछली की संख्या में तीव्र और व्यापक ह्रास के कारण, इस मछली को पकड़ने पर नियंत्रण से संबंधित कई समझौते किए गए। फिर भी, इस महत्वपूर्ण मछली, जो छोटी मछलियों, झींगों आदि का सेवन करके समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखती है, की संख्या लगातार घट रही हैं।
  • क्या आप ऐसी अन्य पारंपरिक प्रथाओं के विषय में जानते हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में सहायता करती हैं?

हमें अपने उपभोग की वस्तुओं के उत्पादन के लिए उद्योगों की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया से अपशिष्ट भी उत्पन्न होते हैं जिन्हें प्रायः नदियों और अन्य जल निकायों में प्रवाहित कर दिया जाता है। ये अपशिष्ट प्रायः सड़-गलकर किसी जीव-जंतु का भोजन नहीं बन पाते। इसकी अपेक्षा, ये प्रकृति के पुनर्स्थापन और पुनर्जनन चक्र में व्यवधान उत्पन्न करते हैं, जिससे नदियाँ विषाक्त हो जाती हैं और वे जीवन का पोषण नहीं कर पातीं।

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चित्र 1.10-उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट को प्रायः उचित उपचार के बिना ही प्रवाहित कर दिया जाता है।

आइए पता लगाएँ

अपने आस-पास के उन मानवीय कार्यकलापों की पहचान करें जिनके परिणामस्वरूप प्रकृति अपनी पुनर्स्थापन और पुनर्जनन की क्षमता खो रही है। प्रकृति के चक्र को पुनर्स्थापित करने के लिए किस प्रकार के हस्तक्षेप किए जा सकते हैं?

इसे अनदेखा न करें

  • पारिस्थितिकी तंत्र की प्रक्रियाएँ और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ- प्रकृति के कार्य करने की कुछ स्वाभाविक प्रक्रियाएँ हैं। उदाहरण के लिए, वृक्ष प्राकृतिक रूप से ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं। जब ये प्राकृतिक प्रक्रियाएँ मनुष्यों के लिए लाभदायक होती हैं, तब हम उन्हें 'पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ' कहते हैं। हम इसे इस प्रकार समझ सकते हैं- वन, प्राकृतिक रूप से जल को शुद्ध करता है, मृदा अपरदन को रोकता है और पशुओं के लिए आवास प्रदान करता है- ये पारिस्थितिकी तंत्र के कार्य हैं। जब हम उस वन के कारण स्वच्छ जल, संरक्षित कृषि भूमि और परागित फसलों से लाभान्वित होते हैं, तब हम प्रकृति से पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्राप्त कर रहे होते हैं।
  • एक परिपक्व वृक्ष प्रतिदिन लगभग 275 लीटर ऑक्सीजन उत्पन्न करता है (यह वृक्ष के प्रकार के आधार पर कुछ भिन्न हो सकता है)। एक मनुष्य को प्रतिदिन लगभग 350 लीटर ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है (यह व्यक्ति की गतिविधि के प्रकार, उसकी ऊँचाई और भार आदि के आधार पर भिन्न हो सकती है)।

आइए पता लगाएँ

अपने क्षेत्र में नवीकरणीय संसाधनों के प्रकारों का आकलन करने के लिए एक छोटा शोध-अध्ययन करें। आप अपने शिक्षक के साथ अपने अध्ययन के भौगोलिक क्षेत्र और आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के स्रोतों पर चर्चा कर सकते हैं। समय के साथ उनकी स्थिति में क्या परिवर्तन आया है? एक छोटी-सी रिपोर्ट बनाएँ जिसमें परिवर्तन के कारणों तथा आगे क्या किया जा सकता है, इसका उल्लेख हो।

अनवीकरणीय संसाधन

अनवीकरणीय संसाधन लंबी अवधि में निर्मित होते हैं। जिस अनुपात से हम उनका उपयोग करते हैं, उस अनुपात में उनकी पुनःपूर्ति नहीं की जा सकती। उदाहरण के लिए, जीवाश्म ईंधन (कोयला और पेट्रोलियम), खनिज एवं धातुएँ जैसे- लोहा, ताँबा और सोना, अनवीकरणीय संसाधन हैं। भारत में प्रचुर मात्रा में कोयले के भंडार हैं। हम अपनी बढ़ती ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कोयले का खनन करते हैं, परंतु अनुमान है कि भारत में कोयले का भंडार केवल अगले 50 वर्षों तक चल सकता है। जनसंख्या वृद्धि और विकास कार्यों में तीव्रता के साथ बिजली की माँग भी बढ़ रही है। जब तक अधिक टिकाऊ विकल्प व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं हो जाते, तब तक हमें अपने पास उपलब्ध कोयले का विवेकपूर्वक उपयोग करना होगा।

आइए पता लगाएँ

वे कौन-से अनवीकरणीय संसाधन हैं जिनका आप प्रतिदिन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपयोग करते हैं? उनके संभावित नवीकरणीय विकल्प क्या हैं? नवीकरणीय ऊर्जा की ओर अग्रसर होने के लिए हम कौन-से उपाय कर सकते हैं?

प्राकृतिक संसाधनों का वितरण और इसके निहितार्थ

प्राकृतिक संसाधन हमारी पृथ्वी पर या यहाँ तक कि देशों के भीतर भी समान रूप से वितरित नहीं हैं। यह असमान वितरण मानव बस्तियों, व्यापार प्रतिरूपों, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों तथा संघर्षों को भी आकार देता है। प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण पाने के लिए अनेक युद्ध लड़े गए हैं और आज भी लड़े जा रहे हैं।

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चित्र 1.11 - महत्वपूर्ण खनिजों का वितरण

आइए पता लगाएँ

चित्र 1.11 में दिए गए मानचित्र को ध्यान से देखिए। महत्वपूर्ण खनिजों के असमान वितरण पर ध्यान दीजिए। आपके क्षेत्र में किस प्रकार के संसाधन उपलब्ध हैं? उनका वितरण कैसे हुआ है?

प्राकृतिक संसाधनों के निकट स्थित उद्योग स्थानीय लोगों के लिए आजीविका के अवसर सृजित करते हैं। उनके आस-पास बस्तियाँ विकसित होती हैं और दूसरों के लिए भी आर्थिक अवसर बढ़ते हैं। जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने वाली आधुनिक सुविधाएँ सुलभ होती हैं। हालाँकि, इन लाभों के साथ अल्पावधि तथा दीर्घावधि दोनों ही स्तरों पर मूल्य चुकाना पड़ता है। हमारे पास विश्व भर से ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ संसाधन-संपन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को ऐसी सुविधाओं के लिए अपने घरों से विस्थापित होना पड़ा है।

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चित्र 1.12 - ब्रह्मपुत्र नदी का साझा जल

कुछ मामलों में उनके पावन स्थान संकट में हैं, जिससे संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार वाकृतिक संसाधनों की भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। मानव ज्ञान और कौशल के संयोजन से 'वूट्ज स्टील' जैसे विलक्षण उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। जैसा कि हम जानते हैं, व्यापार ने भारत में बड़े साम्राज्यों के विकास को गति दी थी।

आइए पता लगाएँ

  • किन्हीं दो प्राकृतिक संसाधनों का चयन कीजिए। भारत के विभिन्न भागों में उनकी उपलब्धता के विषय में जानकारी एकत्र कीजिए। उन्हें मानचित्र पर अंकित कीजिए। आप उनके वितरण के बारे में क्या देखते हैं? उनसे जुड़ी आर्थिक गतिविधियाँ किस प्रकार की हैं?
  • उन भागों में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के वर्तमान और भावी पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा कीजिए। प्रकृति के उपहारों का विवेकपूर्वक उपयोग करने की विधियाँ सुझाइए।

प्रकृति राजनैतिक सीमाओं पर ध्यान नहीं देती। इससे राज्यों और देशों के बीच प्राकृतिक संसाधनों के वितरण को लेकर तनाव उत्पन्न होता है। इसका एक उदाहरण कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के मध्य कावेरी नदी के जल का वितरण है। शांति और न्यायसंगत वितरण को बनाए रखने के लिए आपसी संवाद और कुशल प्रबंधन की आवश्यकता होती है। यद्यपि, पड़ोसी देशों के मध्य ऐसे समझौते करना सरल नहीं है।

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चित्र 1.13 - तमिलनाडु में कावेरी नदी पर बना मेदूर बाँध

आइए पता लगाएँ

अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में ऐसे किसी संघर्ष के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए। अपने अन्वेषण पर कक्षा में चर्चा करें।

'प्राकृतिक संसाधन अभिशाप'

प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों का होना आर्थिक समृद्धि की गारंटी नहीं है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध कुछ क्षेत्रों में आर्थिक वृद्धि और विकास मंद हो सकता है- यह एक ऐसी स्थिति है, जिसे अर्थशास्त्री 'प्राकृतिक संसाधन अभिशाप' या 'प्रचुरता का विरोधाभास' कहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो इसका अर्थ यह है कि प्राकृतिक संसाधनों का प्रचुर होना स्वतः ही यह नहीं दर्शाता कि कोई देश समृद्ध है। प्रायः अर्थव्यवस्थाएँ ऐसे उद्योग विकसित करने में असमर्थ होती हैं जो संसाधनों को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में परिवर्तित कर सकें। इस पुस्तक के उत्तरार्ध का अध्याय 'उत्पादन के कारक' आपको इसकी समझ प्रदान करेगा।

भारत ने अपनी बढ़ती आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु ऐसे उद्योगों के विकास में निवेश करके सामान्यतः इस अभिशाप से अपना बचाव किया है।

आइए पता लगाएँ

आपके विचार से विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को सक्षम बनाने के लिए कौन-कौन से इनपुट आवश्यक हैं?

यद्यपि, संसाधनों के निष्कर्षण और संधारणीयता के बीच संतुलन बनाने की चुनौती अभी भी विद्यमान है। प्राकृतिक संसाधनों को समझना और उनका प्रबंधन एक मूल्यवान प्रस्थान बिंदु है, परंतु मानवीय ज्ञान, सुशासन और रणनीतिक योजना यह निर्धारित करती है कि वे स्थायी लाभ बनेंगे या अस्थायी अप्रत्याशित लाभ।

प्राकृतिक संसाधनों का दायित्वपूर्ण और विवेकपूर्ण उपयोग - प्रबंधन

पृथ्वी पर जीवन को स्थापित रखने हेतु आवश्यक है कि हम प्रकृति का सम्मान करें और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करें जिससे नवीकरणीय संसाधनों का पुनर्स्थापन एवं पुनर्जनन संभव हो सके तथा अनवीकरणीय संसाधनों का दायित्वपूर्ण एवं न्यायसंगत उपयोग हो सके।

इन विषयों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन के कारण प्रदूषण, जैव-विविधता की हानि और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं जो हाल के वर्षों में तीव्रता से घटित हो रही हैं।

नवीकरणीय संसाधनों का पुनर्स्थापन और पुनर्जनन

यहाँ दो उदाहरण दिए गए हैं कि किस प्रकार हम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग उनकी पुनर्जनन क्षमता से अधिक कर रहे हैं।

हमारे देश में अनेक कृषक सिंचाई हेतु भूजल का अत्यधिक दोहन करते हैं। अधिकांश राज्यों में दोहन अनुपात, भूजल स्तर की पुर्नभरण दर से अधिक है। समय के साथ भूजल-पूर्ति की कमी बढ़ती जाती है, जिससे भूजल-निष्कर्षण का मूल्य बढ़ता जाता है और अंततः जल की अनुपलब्धता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह अनुमान लगाया गया है कि तीव्रता से बढ़ते हमारे नगरों में शीघ्र ही भूजल समाप्त हो जाएगा। इस समस्या के समाधान के लिए भूजल स्तर बढ़ाने का प्रयास आरंभ किए गए हैं। इस हेतु पारंपरिक जल-संचयन की पद्धतियाँ, तालाबों और पोखरों के पुनरुद्धार, जल के अपव्यय को कम करना, जल को प्रसंस्करित करके उसके पुनरुपयोग जैसी कुछ रणनीतियाँ अपनाई जा रही हैं।

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चित्र 1.14 - रासायनिक उर्वरकों के अविवेकपूर्ण उपयोग के कारण फसल का हास
इसी प्रकार, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के अनुचित उपयोग से मृदा-क्षरण में वृद्धि हुई है। पारंपरिक कृषि पद्धतियों में मदा को धरती माता का अंग माना गया है। गोबर और अन्य प्राकृतिक उर्वरकों के उपयोग, गीली घास पलवार के प्रयोग, बहु-फसलीकरण आदि जैसी प्रथाओं ने समग्र मृदा-प्रबंधन को संभव बनाया है। हमें इन प्रथाओं से सीखना चाहिए और उन्हें वर्तमान परिस्थिति में आगे होने वाले क्षरण से बचाने के लिए उपयोग में लाना चाहिए। हमें अपनी मृदा को पुनः उपजाऊ बनाने और उसका कायाकल्प करने की अवश्यकता है।

भूजल का अत्यधिक दोहन - पंजाब से एक प्रकरण अध्ययन

पंजाब के उपजाऊ क्षेत्रों में एक गंभीर संकट सामने आया है, जहाँ भूजल संसाधन तीव्र गति से क्षीण हो रहे हैं। पंजाब हरित क्रांति का केंद्र था, जिसने हमारी जनसंख्या के एक बड़े भाग को भोजन उपलब्ध कराया और भारत को खाद्यान्नों के विषय में आत्मनिर्भर बनाने में योगदान दिया। वर्तमान में वही राज्य संधारणीयता की समस्या का सामना कर रहा है। प्रकृति का दोहन अल्प समय में ही पुनर्जनन से अधिक किया गया है। यद्यपि, यह चिंता केवल पंजाब तक ही सीमित नहीं है, अपितु यह कई अन्य राज्यों को भी प्रभावित करती है।

1960 के दशक में कृषकों ने गेहूँ और धान की उच्च उपज वाली किस्मों की ओर देखना आरंभ किया। इन्हें पारंपरिक बीजों की तुलना में अधिक जल की आवश्यकता होती थी और कृषकों ने इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए भूजल का दोहन प्रारंभ कर दिया। इसके अतिरिक्त, निःशुल्क विद्युत की आपूर्ति के कारण भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ (यह स्थिति वर्तमान में भी भारत के अधिकांश भागों में व्याप्त है)। आधुनिक कृषि तकनीकों के लिए रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के उपयोग की भी आवश्यकता थी।

इन कारकों का संयुक्त प्रभाव यह है कि पंजाब के एक बड़े भाग में भूजल स्तर (चित्र 1.17 देखें) लगभग 30 मीटर की गहराई तक पहुँच गया, जो कृषकों की पहुँच से बाहर है। साथ ही, कीटनाशकों और उर्वरकों के रसायन भूजल में घुल गए हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

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चित्र 1.15 - भूजल निष्कर्षण
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चित्र 1.16- जल से भीगे धान के खेत

पंजाब के लगभग 80% क्षेत्र को 'अति-दोहित' के रूप में वर्गीकृत किया गया है। दूसरे शब्दों में, हमने भूजल के पुनर्स्थापन एवं पुनर्जनन की तुलना में कहीं अधिक अनुपात से जल का दोहन किया है।

हम देख सकते हैं कि अल्पावधि के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की गई है, परंतु दीर्घकालिक परिणामों को ठीक करने में समय और प्रयास लगेगा।

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1.17- पंजाब और चंडीगढ़ के जलस्तर की गहराई का मानचित्र, जून 2022 (एम.बी.जी.एल. = भू-तल से मीटर नीचे)

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चित्र 1.18 - जैसलमेर दुर्ग, राजस्थान। 12वीं शताब्दी की एक मृदा-निर्मित संरचना, जिसे बाद में बलुआ पत्थर का उपयोग करके पुनर्निर्मित किया गया।

सीमेंट का उदाहरण

सीमेंट के बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। हमारे घर, विद्यालय, अस्पताल और अन्य भवनों, सेतुओं, मार्गों और हवाई अड्डों (विमानपत्तनों) सभी को सीमेंट की आवश्यकता होती है। सीमेंट उत्पादन को सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में से एक माना गया है। उत्पादन प्रक्रिया के क्रम में निकलने वाली महीन धूल हमारे और पशुओं के फेफड़ों में प्रवेश कर उन्हें क्षति पहुँचाती है, पौधों की पत्तियों पर जम जाती है, जिससे उनकी उत्पादकता कम हो जाती है। इससे मृदा एवं जल में भी प्रदूषण होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सीमेंट कारखानों के लिए दिशा-निर्देश बनाए हैं, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रदूषण न्यूनतम हो या पूरी तरह से समाप्त हो जाए।

इसके अतिरिक्त, प्रदूषण कम करने वाली वैकल्पिक सामग्रियों के निर्माण की दिशा में भी प्रयास हो रहे हैं। इनमें पत्थर और मृदा जैसी पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग, नई वनस्पति-आधारित सामग्रियाँ और अनुपयोगी व्यर्थ प्लास्टिक से पुनर्निर्मित सामग्री सम्मिलित हैं।

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चित्र 1.19- ऑरोविले में ऑरोविले अर्थ इंस्टीट्यूट (जो मृदा वास्तुकला के लिए यूनेस्को से मान्यता प्राप्त है) द्वारा निर्मित एक सामुदायिक भवन। यह आधुनिक भवन विशेष तकनीकों का उपयोग करके मृदा से निर्मित किया गया है।

पारंपरिक सामग्रियों और विधियों को आधुनिक तकनीकी प्रगति के साथ संयोजित किया जा रहा है, जिससे ऐसी नई सामग्रियाँ बनाई जा सकें जो संधारणीय हों - उत्पादन की प्रक्रिया कम प्रदूषणकारी हो, स्थानीय रोजगार प्रदान करे तथा उस स्थान की जलवायु को ध्यान में रखकर रूपरेखा तैयार की जाए।

वृक्षायुर्वेद एक प्राचीन भारतीय वनस्पति-विज्ञान है, जो पौधों और वृक्षों के अध्ययन और देखभाल पर केंद्रित है। यह शब्द संस्कृत से आया है जिसमें 'वृक्ष' का अर्थ है पेड़ और 'आयुर्वेद' का अर्थ है जीवन या स्वास्थ्य का विज्ञान। यह पारंपरिक ज्ञान-प्रणाली अनेक सहस्राब्दियों पुरानी है और इसे लगभग 10वीं शताब्दी में सुरपाल के वृक्षायुर्वेद जैसे ग्रंथों में औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। इसमें विभिन्न प्रकार की मृदा में उगाए जाने वाले विशिष्ट पौधों के विषय में विस्तृत सुझाव दिए गए हैं और बीज-संग्रह, संरक्षण और रोपण-पूर्व उपचार की जटिल विधियाँ प्रदान की गई हैं। सिंचाई तकनीकों का विस्तृत वर्णन किया गया है और पौधों की प्रजातियों, विकास-अवस्था और मौसमी परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न सुझाव दिए गए हैं। यह प्राकृतिक विकर्षकों और एक साथ उगाए जाने वाले पौधों के माध्यम से कीट-नियंत्रण की रणनीतियों को निर्दिष्ट करता है। संधारणीय कृषि का यह रूप मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए फसल-चक्र और मिश्रित फसल जैसी प्रथाओं को प्रोत्साहित करता है। वृक्षायुर्वेद मृदा की नमी बनाए रखने के साथ-साथ मृदा में कवक, जीवाणु और केंचुओं जैसे जीवों के विकास को सुगम बनाने हेतु मृदा की जुताई के उचित तरीकों पर भी सुझाव देता है।

सिक्किम से एक प्रकरण अध्ययन

सिक्किम में पेमा के परिवार को खेत में महँगे रसायनों के प्रयोग से उत्पादन में हास और बढ़ते ऋण का सामना करना पड़ रहा था। जब राज्य सरकार ने पूरे राज्य में जैविक खेती को प्रोत्साहन देने की नीति की घोषणा की, तब पेमा के परिवार ने इसे अपनाने का निर्णय लिया। आरंभ में यह परिवर्तन सरल नहीं था। फसल का उत्पादन घट गया, क्योंकि वर्षों से रसायन के उपयोग के कारण मृदा अपनी उत्पादन क्षमता खो चुकी थी और अब उसे पुनः अर्जित कर रही थी।

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चित्र 1.20 - सिक्किम में जैविक कृषि

परिवार ने कम्पोस्ट खाद का प्रयोग आरंभ किया, नीम और लहसुन से प्राकृतिक कीटनिरोधक तैयार किया तथा वर्ष भर में अनेक फसलों का उत्पादन आरंभ कर दिया। लगभग पाँच वर्ष बाद, पेमा का खेत फल-फूल रहा था। वह अपनी इलायची, अदरक और पारंपरिक सब्जियाँ अच्छी कीमतों पर बेच पा रही थी। 2016 में, सिक्किम सौ प्रतिशत जैविक राज्य बन गया और उसकी सारी कृषि भूमि जैविक प्रमाणित हो गई। इसके प्रभाव परिवर्तनकारी थे- स्थानीय जैव-विविधता फली-फूली, लाभदायक कीड़े और पक्षी वापस लौटे। जैविक खेती के मॉडल को देखने के लिए आने वाले पर्यटकों के कारण पर्यटन में वृद्धि हुई और कृषकों की आय में औसतन 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्तमान में, सिक्किम एक वैश्विक मॉडल के रूप में कार्य करता है, जो दर्शाता है कि एक संपूर्ण क्षेत्र पर्यावरणीय और आर्थिक दोनों परिणामों में सुधार करते हुए संधारणीय कृषि पद्धतियों को सफलतापूर्वक अपना सकता है।

संसाधनों का दायित्वपूर्ण और विवेकपूर्ण उपयोग

अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विषय में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम इन संसाधनों का उपयोग इस तरह करें कि ये इतने लंबे समय तक विद्यमान रहें कि मानवता अधिक संधारणीय विकल्प ढूंढ सके। उदाहरण के लिए, हमें यथासंभव अधिक-से-अधिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग की आवश्यकता है।

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चित्र 1.21 - उपग्रह चित्र- राजस्थान में स्थित विश्व के सबसे बड़े सौर पार्कों में से एक। यह राजस्थान की वर्तमान आवश्यकताओं के लगभग 15% को पूरा करने के लिए पर्याप्त विद्युत उत्पन्न कर सकता है।
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चित्र 1.22 - रायचूर, कर्नाटक के निकट सौर ऊर्जा पार्क
अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन - नवीकरणीय ऊर्जा में भारत का नेतृत्व

भारत और फ्रांस ने 2015 में सौर ऊर्जा के लिए अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन (आई.ए.एस.ई.) को आरंभ किया था- यह सौर ऊर्जा के उपयोग के लिए प्रतिबद्ध सूर्य की रोशनी से समृद्ध देशों का एक गठबंधन है। यह गठबंधन उन देशों पर केंद्रित है जहाँ वर्षभर पर्याप्त धूप उपलब्ध रहती है। भारत ने विकासशील देशों में सौर परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश करने में सहायता की है, तकनीकी विशेषज्ञता साझा की है और मितव्ययी वित्तपोषण विकल्प उपलब्ध कराए हैं। भड़ला सौर उद्यान भारत की सौर ऊर्जा संबंधी महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि कैसे एक देश पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से नवीकरणीय विकल्पों की ओर संक्रमण कर सकता है। भारतीयों के लिए यह गठबंधन पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और आर्थिक अवसर, दोनों का प्रतीक है।

इन सभी प्रयासों के साथ हमें यह ध्यान रखना होगा कि जल और स्वच्छ वायु जैसे आधारभूत संसाधनों सहित संसाधनों का वितरण और उन तक पहुँच प्रायः समाज के कुछ वर्गों के साथ न्यायपूर्ण नहीं होती है। नगरों में अनेक क्षेत्रों में पीने के जल की पर्याप्त और नियमित आपूर्ति नहीं होती है। उद्योगों और जीवाश्म ईंधन के अत्यधिक उपयोग से होने वाला वायु प्रदूषण उन लोगों को प्रभावित करता है जो इन संकटों से स्वयं को बचाने में असमर्थ हैं।

हमें प्रकृति के साथ अपने संबंध को स्मरण रखना चाहिए और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, पुनर्जनन और संधारणीयता की दिशा में कार्य करना चाहिए। भगवद्गीता में लोकसंग्रह का उल्लेख है कि सभी को अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर उठकर सभी की भलाई के लिए कार्य करना चाहिए। क्या अब समय आ गया है कि हम इस पर गभीरता से विचार करें?

आगे बढ़ने से पहले...

  • 'प्राकृतिक संसाधन' वे पदार्थ और सामग्रियाँ हैं जो प्रकृति में पाए जाते हैं एवं मानव के लिए मूल्यवान हैं।
  • संसाधनों को वर्गीकृत करने के विभिन्न तरीके हैं; इनमें नवीकरणीय और अनवीकरणीय उपयोगी श्रेणियाँ हैं।
  • प्रौद्योगिकी एवं कौशल के विकास में निवेश के माध्यम से 'संसाधन अभिशाप' पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
  • हमें नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग की दर के बारे में सतर्क रहने की आवश्यकता है, जिससे उनका अत्यधिक दोहन न हो। अनवीकरणीय ऊर्जा का विवेकपूर्ण और बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग उनकी उपलब्धता को लंबे समय तक बनाए रखने में सक्षम बनाएगा।

प्रश्न और क्रियाकलाप

  1. आज जो संसाधन नवीकरणीय है, उसे कल अनवीकरणीय कैसे बनाया जा सकता है? कुछ ऐसे उपायों का वर्णन कीजिए जिनसे ऐसा होने से रोका जा सकता है।
  2. पाँच पारिस्थितिकी तंत्र कार्यों के नाम बताइए जो मानव के लिए उपयुक्त हैं।
  3. नवीकरणीय संसाधन क्या हैं? ये अनवीकरणीय संसाधनों से कैसे भिन्न हैं? लोग यह सुनिश्चित करने के लिए क्या कर सकते हैं कि नवीकरणीय संसाधन हमारे और आने वाली पीढ़ियों के उपयोग के लिए उपलब्ध रहें? दो उदाहरण दीजिए।
  4. अपने घर और पड़ोस में ऐसी सांस्कृतिक प्रथाओं की पहचान कीजिए जो प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की ओर इंगित करती हैं।
  5. वर्तमान उपयोग के लिए वस्तुओं के उत्पादन में किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?

इतिहास के अंधकारमय कालखंडों पर एक टिप्पणी

कभी-कभी इतिहास युद्धों और विनाश के वर्णन से ही भरा हुआ प्रतीत होता है। यह सत्य है कि इतिहास में उन कालखंडों का कम ही विवरण मिलता है, जब समाज में समग्र रूप में शांति और सामंजस्य का वातावरण हो। निस्संदेह, हर देश में ऐसे शांतिपूर्ण कालखंड और उदार शासक रहे होंगे किंतु फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि इतिहास अयोग्य, भ्रष्ट और क्रूर शासकों से भरा हुआ है। विशेषतः ऐसा हम इतिहास के उन अंधकारमय कालखंडों में पाते हैं, जब युद्ध, अत्याचार, कट्टरता, रक्तपात अचानक संपूर्ण परिदृश्य पर छा जाते हैं या हावी हो जाते हैं और समस्त समाज तथा देश को कष्ट और दुख में डाल देते हैं। विश्वभर में इतिहासकारों ने इस दुविधा का सामना किया है- इस तरह के अंधकारमय कालखंडों पर कितना ध्यान देना चाहिए? क्या हमें इन्हें पूर्ण रूप से हटा देना चाहिए? क्या हमें इनके भयावह वर्णन के स्थान पर संक्षिप्त उल्लेख करना चाहिए? या उनका विश्लेषण करना चाहिए, जिससे यह समझा जा सके कि किन परिस्थितियों या कारणों से ऐसे घटनाक्रम संभव हुए जिससे भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति न हो। हमारे अनुसार तीसरा विकल्प सबसे उपयुक्त है, अगर इसे पर्याप्त निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ क्रियान्वित किया जाए। चाहे अतीत सुखद हो अथवा दुःखद, उसे जानना आवश्यक है, क्योंकि अतीत हमारे साथ रहकर हमारे वर्तमान को आकार देता है।

'निष्पक्षता और संवेदनशीलता' से हमारा क्या तात्पर्य है? सरल शब्दों में यह महत्वपूर्ण हैं कि हमें उन अंधकारमय घटनाओं का अध्ययन बिना पक्षपात किए करना चाहिए और उनके लिए वर्तमान में किसी भी जीवित व्यक्ति को दोष नहीं देना चाहिए। उदाहरण के लिए, आप आगे पढ़ेंगे कि द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के परिणामस्वरूप विश्वभर में लाखों लोगों की मृत्यु हुई। उस समय जर्मनी में एक क्रूर विचारधारा (जिसे 'नाजीवाद' कहा जाता है) का पालन किया जा रहा था, जो 'निम्न/हीन नस्लों' के उन्मूलन में विश्वास रखती थी। इसके परिणामस्वरूप कुछ नृजातीय समूहों के साथ अमानवीय व्यवहार हुआ और अधिग्रहित राष्ट्रों पर निर्मम शासन किया गया। अतः यह पूर्णतया अनुचित और अस्वीकार्य होगा कि वर्तमान के जर्मन नागरिकों को आठ दशक पूर्व हुई उन घटनाओं के लिए दोषी ठहराया जाए। वास्तव में महत्वपूर्ण यह है कि हम जानें कि नाजी विचारधारा किस प्रकार फलित और पोषित हुई तथा किन कारणों से संभव हो सकी, ताकि वर्तमान या भविष्य में ऐसी विचारधारा पनपने से पहले ही नष्ट की जा सके।

यह सिद्धांत इस पाठ्यपुस्तक के 'अतीत के चित्रपट' अध्यायों पर लागू होता है, जिनमें युद्धों तथा क्रूरता या बर्बरता के प्रसंग सम्मिलित हैं। इन घटनाओं को ना तो मिटाया जा सकता है और ना ही नकारा जा सकता है, परंतु यह भी अनुचित होगा कि इसके लिए वर्तमान में किसी को उत्तरदायी ठहराया जाए। क्रूर हिंसा, अत्याचारी शासन या सत्ता की गलत महत्वाकांक्षाओं की ऐतिहासिक उत्पत्ति और उसके मूल को समझना ही अतीत के घाव को भरने तथा एक ऐसे भविष्य का निर्माण करने की सर्वोत्तम विधि है जहाँ ऐसे कृत्यों के लिए कोई स्थान नहीं होगा।