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अध्याय - 2

भारत के राजनैतिक मानचित्र का पुनर्निर्माण

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चित्र 2.1 - दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर का हवाई दृश्य

महत्वपूर्ण प्रश्न

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  1. इस कालखंड में विदेशी आक्रमणों एवं नए राजवंशों के उदय ने भारत की राजनैतिक सीमाओं को किस प्रकार नया आकार दिया?
  2. भारतीय समाज ने विदेशी आक्रमणों का सामना किस प्रकार किया? राजनैतिक अस्थिरता के वातावरण में भारतीय अर्थव्यवस्था ने किस प्रकार सामंजस्य स्थापित किया?
  3. इस कालखंड ने लोगों के जीवन पर क्या प्रभाव डाला?

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चित्र 2.2

इस अध्याय एवं अगले अध्याय में वर्णित कालखंड को प्रायः भारतीय इतिहास के मध्यकाल का उत्तरार्द्ध कहा जाता है। 'मध्यकालीन' (दो कालों के बीच) शब्द मूलतः यूरोपीय इतिहास, सामान्यतः रोमन साम्राज्य के पतन (5वीं शताब्दी) से लेकर पुनर्जागरण तक के लिए प्रयुक्त होता है (14-16 शताब्दी के बीच यूरोप का सांस्कृतिक पुनरुत्थान ग्रीक तथा रोमन कला एवं साहित्य के पुर्नन्वेषणन द्वारा पोषित था)। एक समय इसे आधुनिक विज्ञान के विकास से पूर्व के अंधकार युग के रूप में देखा जाता था। चूँकि यूरोप और भारत के इतिहास बहुत भिन्न है, अतः 'मध्यकाल' शब्द का प्रयोग दोनों के लिए उपयुक्त नहीं है। इतिहासकार भी सदैव इस बात पर सहमत नहीं होते कि भारत में यह किस काल के संदर्भ में उपयोग किया जाए। हमें कभी-कभी मध्यकाल का प्रयोग करना होगा किंतु हमारे लिए यह मूलतः 11वीं से 17वीं शताब्दी का कालखंड है।

'अतीत के चित्रपट' अध्यायों में हमने यथासंभव कम तिथियाँ रखने का प्रयास किया है, केवल उन्हीं को रखा है जो महत्वपूर्ण संदर्भ-बिंदुओं को रेखांकित करती हैं।

आपको उन अध्यायों में समयरेखा का बार-बार अवलोकन करना उपयोगी रहेगा। मानचित्रों का भी अवलोकन करें क्योंकि मानचित्र आपको उस भूगोल की कल्पना करने में सहायक होंगे जिसे सेना, आम लोगों, व्यापारियों, विद्वानों या आध्यात्मिक व्यक्तियों/संतों द्वारा पार किया गया था।

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शब्द विन्यास...

आपको यत्र-तत्र कोष्ठकों में कुछ वैकल्पिक वर्तनी मिल जाएगी। उदाहरण के लिए 'खिलजी' या 'खलजी' एक ही हैं। इसी प्रकार अब हम यहाँ 'मुगल' को मानक वर्तनी के रूप में प्रयोग करते हैं, किंतु 'मोगल' जैसी वैकल्पिक वर्तनी का उपयोग कभी-कभी किया जाता है।

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चित्र 2.3 - तुगलक एवं लोदी शासकों (13वीं से 15वीं शताब्दी) के अधीन क्षेत्रों तथा दक्षिण एवं पूर्व की क्षेत्रीय शक्तियों के मध्य तुलना
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चित्र 2.4- कुतुब मीनार चित्र 2.5- दिल्ली के कुतुब मीनार परिसर में कुव्वत-उल-इस्लाम ('इस्लाम की ताकत') मस्जिद का एक भाग। इसका निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक (13वीं शताब्दी का आरंभ) और बाद के सुल्तानों द्वारा पूरा किया गया। एक शिलालेख के अनुसार इसके निर्माण में 27 विध्वंसित हिंदू एवं जैन मंदिरों की सामग्री का उपयोग किया गया था जिसके कुछ अवशेष यहाँ देखे जा सकते हैं।

11वीं शताब्दी के आरंभ में भारत की यात्रा में एक नए युग का आरंभ हुआ। हिंदुकुश पर्वत के पार से हुए आक्रमणों ने भारत के राजनैतिक मानचित्र को नया रूप दे दिया। निःसंदेह भारत ने इससे पहले भी कई युद्ध देखे थे, किंतु इस अवधि में भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर के लोगों द्वारा किए गए आक्रमण अभूतपूर्व थे। इनमें से कई हमलावर मध्य एशियाई - तुर्क या अफगान थे। ये आक्रांता केवल भारत के अतुल्य धन और साम्राज्य विस्तार के उद्देश्य के साथ ही नहीं आते थे, वरन् प्रायः आवश्यकता पड़ने पर हिंसा के बल पर अपने पंथ-मजहब के स्वयं के संस्करण का प्रसार करने के ध्येय से भी आते थे।

आइए, अब इस अध्याय में 13वीं शताब्दी से लेकर अब तक भारत के निरंतर परिवर्तित परिदृश्य का अन्वेषण करें।

दिल्ली सल्तनत का उदय एवं पतन

यहाँ हम दिल्ली सल्तनत से अपनी यात्रा आरंभ करते हैं, जिसकी स्थापना 1192 में राजा पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद हुई, जिन्होंने उत्तर-पश्चिम के क्षेत्रों पर शासन किया। इस सल्तनत ने तुर्क-अफगान मूल के पाँच क्रमिक विदेशी राजवंश का शासन देखा - ममलुक (गुलाम वंश), खिलजी या खलजी, तुगलक, सैयद एवं लोदी। जहाँ उत्तर भारत के कुछ भाग दिल्ली सल्तनत के प्रत्यक्ष नियंत्रण में आ गए, वहीं पूर्व में पूर्वी गंग एवं दक्षिण में होयसल जैसे पड़ोसी राज्यों ने इसके विस्तार को रोका (चित्र 2.3) और ये कला, संस्कृति एवं प्रशासन के संपन्न केंद्र के रूप में भी उभरे। दिल्ली नगर ने उत्तर भारत के राजनैतिक परिदृश्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सल्तनत काल राजनैतिक अस्थिरता एवं क्षेत्रीय विस्तार के प्रयासों के लिए प्रसिद्ध रहा। इसके परिणामस्वरूप सैन्य अभियान चलाए गए, जिनमें गाँवों एवं नगरों पर आक्रमण किए गए तथा मंदिरों एवं शिक्षा केंद्रों को लूटा और नष्ट किया गया।

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चित्र 2.6 - अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल का एक सिक्का, जिस पर फारसी में 'सिकंदर सानी' या 'द्वितीय सिकंदर' अंकित है।

उत्तराधिकार (नए सुल्तान की नियुक्ति) प्रायः हिंसक हुआ करते थे। लगभग तीन में से दो सुल्तानों ने अपने पूर्ववर्ती शासकों को हटाकर सत्ता हथिया ली। इससे सुल्तानों का औसत शासनकाल कठिनता से नौ वर्षों से अधिक रहा।

आइए पता लगाएँ

चित्र 2.6 को ध्यानपूर्वक देखें। आप क्या सोचते हैं, अलाउद्दीन खिलजी ने स्वयं को 'द्वितीय सिकंदर' क्यों कहा?

14वीं शताब्दी के आरंभ में अलाउद्दीन ने उत्तर एवं मध्य भारत के विस्तृत क्षेत्रों में सैन्य अभियान चलाकर अनेक नगरों को लूटा। साथ ही उसने मंगोल सेनाओं के कई आक्रमणों को विफल किया। मंगोल भारत को अपने विशाल साम्राज्य का अंग बनाने का प्रयास कर रहे थे। उसके गुलाम सेनानायक मलिक काफूर ने सल्तनत का विस्तार दक्षिण तक किया तथा मार्ग में स्थित कई राज्यों पर विजय प्राप्त की। उसके द्वारा लूटी गई संपत्ति ने सल्तनत के विशाल सैन्य तंत्र को आर्थिक रूप से समर्थ बनाया। उसने कई हिंदू केंद्रों पर आक्रमण किए जैसे - श्रीरंगम, मदुरई, चिदंबरम और संभवतः रामेश्वरम्।

आइए पता लगाएँ

आपके विचार से उन दिनों सेना को बनाए रखने एवं युद्ध संचालन के लिए किन प्रकार के संसाधनों की आवश्यकता होती होगी? समूहों में विभिन्न प्रकार के व्ययों पर चर्चा करें, जैसे - हथियारों या सैनिकों के लिए भोजन से लेकर युद्ध में पशुओं का उपयोग, सड़क निर्माण इत्यादि।

कुछ दशकों बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली पर शासन किया और दिल्ली सल्तनत के क्षेत्रों का विस्तार किया। मौर्य साम्राज्य के पश्चात बहुत समय बाद प्रायः संपूर्ण उपमहाद्वीप एक ही शासक के अधीन आया। यद्यपि यह प्रभुत्व महत्वपूर्ण था, किंतु यह अल्पकालिक सिद्ध हुआ। मुहम्मद बिन तुगलक ने कई महत्वाकांक्षी योजनाएँ बनाईं, परंतु उन्हें प्रायः दोषपूर्ण विधि से निष्पादित किया गया। ऐसी योजनाओं में एक थी - राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद (जिसे उस समय 'देवगिरि' कहा जाता था, जो आज के संभाजीनगर के निकट स्थित है) स्थानांतरित करना। संभवतः उसे लगा कि यह अधिक केंद्र में स्थित होने के कारण साम्राज्य पर अधिक अच्छा नियंत्रण प्रदान करेगा। लोगों को 1000 किलोमीटर से अधिक दूरी तय करने के लिए विवश किया गया और कुछ वर्षों बाद जब योजना विफल हो गई, तो उसने राजधानी को पुनः दिल्ली स्थानांतरित कर दिया।

कुछ स्रोतों के अनुसार, दोनों स्थानांतरणों में अपार जनहानि हुई। एक और उदाहरण था 'सांकेतिक मुद्रा' का आरंभ, जहाँ सस्ते ताँबें के सिक्कों को सांकेतिक मुद्रा घोषित किया गया और उन्हें चाँदी एवं सोने के सिक्कों को समान मूल्य का माना गया। यद्यपि यह एक प्रगतिशील विचार था (आज हमारी अधिकांश मुद्रा वास्तव में 'सांकेतिक' ही है), किंतु उस समय इसने व्यापार में भ्रम उत्पन्न कर दिया तथा लोगों को ताँबे के नकली सिक्के बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे अर्थव्यवस्था का हास हुआ।

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चित्र 2.7 - 19वीं शताब्दी का एक चित्र जिसमें मुहम्मद बिन तुगलक को उसके दरबार में दिखाया गया है।

सुल्तान एवं उनके दरबारी अभिजात वर्ग भव्य महलों में रहते थे, बहुमूल्य वस्त्र पहनते थे, रत्नजड़ित आभूषणों तथा उत्तम भोजन का आनंद लेते थे। यह संपत्ति मुख्यतः सैन्य अभियानों से प्राप्त लूट, साधारण जन एवं विजित क्षेत्रों पर लगाए गए करों एवं गुलाम व्यापार में भागीदारी से प्राप्त होती थी (जैसे कि गुलाम बनाए व्यक्ति मुफ्त में श्रम करते थे या उन्हें दूरस्थ मध्य एशिया भेजकर बेच दिया जाता था)।

लेकिन लूटपाट ने व्यापारिक नेटवर्क एवं कृषि उत्पादन को प्रभावित किया। इस अवधि में बौद्ध, जैन एवं हिंदू मंदिरों में पवित्र-पूजनीय मूर्तियों एवं चित्रों पर कई प्रहार भी हुए। इस प्रकार का विनाश न केवल लूटपाट से, वरन् 'बुत शिकन' से भी प्रेरित था।

आइए विचार करें

हम प्रतिमा (इमेज) शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं, जबकि सामान्यतः 'मूर्ति' या 'चिह्न' जैसे शब्द प्रचलित हैं? वास्तव में, ये दोनों शब्द- 'मूर्ति' या 'चिह्न' यहूदी, ईसाई एवं इस्लाम जैसे पंथों-मजहबों के संदर्भ में निंदनीय है क्योंकि इन पंथों की रूढ़िवादी शाखाएँ मूर्ति पूजा या चिह्नों की पूजा की निंदा करती हैं।

भारतीय शास्त्रीय ग्रंथों में 'मूर्ति', 'विग्रह', 'प्रतिमा', 'रूप' जैसे शब्दों का उपयोग प्रायः मंदिरों या घरों में होने वाली पूजा में प्रयुक्त मूर्तियों के लिए किया जाता था।

कुछ सुल्तानों ने 'जजिया' कर भी लगाया, जो गैर-मुस्लिम प्रजा पर सुरक्षा प्रदान करने और सैन्य सेवा से छूट देने के बदले वसूला जाता था। व्यावहारिक रूप में, शासक पर निर्भर करते हुए, यह भेदभावपूर्ण कर आर्थिक बोझ एवं सार्वजनिक अपमान का कारण बनता था। इसने प्रजा को इस्लाम पंथ अपनाने के लिए एक आर्थिक एवं सामाजिक प्रोत्साहन भी प्रदान किया। 14वीं सदी के अंत में तैमूर, जो कि मध्य एशिया का एक क्रूर तुर्क-मंगोल आक्रांता था, ने उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली पर घातक प्रहार किया। उस समय दिल्ली एक समृद्ध नगरी थी। जैसा कि उसने अपने आत्म-संस्मरण में लिखा है, उसके दो उद्देश्य थे- काफिरों के साथ युद्ध करना एवं उनकी धन-संपत्ति को लूटकर कुछ प्राप्त करना। बड़ी संख्या में लोगों की हत्या की गई या उन्हें गुलाम बना लिया गया और नगरों को खंडहर में बदल दिया गया। तैमूर अपार लूट के साथ भारत से लौटा, पीछे केवल अराजकता रह गई। इसके उपरांत लोदी वंश उभरा एवं दिल्ली सल्तनत के अंतिम राजवंश की स्थापना हुई। यद्यपि तब तक भारत के भीतर अन्य राज्यों एवं राजवंशों के बढ़ते प्रतिरोध के कारण सल्तनत का क्षेत्रफल अत्यंत सिकुड़ चुका था।

दिल्ली सल्तनत का प्रतिरोध

अपने संपूर्ण शासनकाल के समय दिल्ली सल्तनत को कई मोर्चों पर विरोध का सामना करना पड़ा। जहाँ कई राज्य सल्तनत के अधीन हो गए, वहीं कलिंग के पूर्वी गंग राज्य को अधीन करने में विफलता हाथ लगी, जिसमें वर्तमान ओडिशा, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल के कुछ भाग सम्मिलित थे। 13वीं शताब्दी के मध्य में इस राज्य के एक शासक नरसिंहदेव प्रथम, जिन्हें नरसिंह देवा प्रथम भी उच्चारित किया जाता है, को उनकी सैन्य शक्ति एवं सांस्कृतिक वैभव के लिए जाना जाता है, जो उन्होंने अपने राज्य को प्रदान किए। सल्तनत के कई आक्रमणों को विफल करने के अतिरिक्त, उन्होंने बंगाल में सल्तनत द्वारा नियुक्त प्रशासक को भी पराजित किया। विजयों की स्मृति में उन्होंने कोणार्क (वर्तमान ओडिशा) में प्रसिद्ध सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया।

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चित्र 2.8 - एक मूर्ति जिसमें नरसिंहदेव प्रथम को अपने सिंहासन पर सेवकों और संगीतकारों से घिरे हुए दिखाया गया है।

आइए विचार करें

तुगलक काल में, तेलुगु मुखियाओं, मुसुनुरी नायकों ने क्षेत्र के 75 से अधिक अन्य मुखियाओं को संगठित कर एक संघ बनाया। इस संघ ने छोटे राज्यों एवं दिल्ली सल्तनत की सेनाओं को पराजित किया तथा 1330-1336 के आस-पास वारंगल (वर्तमान तेलंगाना) से मुहम्मद बिन तुगलक की सेना को खदेड़ दिया। क्या आपको लगता है कि उस समय 75 मुखियाओं को एकजुट करना सरल कार्य रहा होगा?

भारतीय शास्त्रीय ग्रंथों में 'मूर्ति', 'विग्रह', 'प्रतिमा', 'रूप' जैसे शब्दों का उपयोग प्रायः मंदिरों या घरों में होने वाली पूजा में प्रयुक्त मूर्तियों के लिए किया जाता था।

हमने पहले उल्लेख किया था कि अलाउद्दीन दक्षिण की ओर इसलिए बढ़ा क्योंकि वह क्षेत्र अपनी समृद्धि के लिए प्रसिद्ध था। उस समय दक्षिण भारत, मुख्य रूप से वर्तमान कर्नाटक (चित्र 2.3 देखें) के कुछ भागों पर होयसल वंश का शासन था। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के कई आक्रमणों का सामना किया और दक्षिण के एकमात्र स्वतंत्र राज्य बने रहे। यद्यपि इन आक्रमणों तथा आंतरिक संघर्षों के कारण होयसल राज्य का ह्रास हुआ और मध्य 14वीं शताब्दी में इसका दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य में विलय हो गया (नीचे देखें)।

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चित्र 2.9 - होयसलों ने भव्य मंदिर बनवाए, उदाहरण के लिए बेलूर (यह चित्र) और हालेबिदु।

इसे अनदेखा न करें

चित्र 2.9 में दिखाई गई मूर्ति होयसल वंश के प्रतीक चिह्न के पीछे की कहानी को दर्शाती है। कन्नड़ लोककथाओं के अनुसार, साला नामक एक युवा ने अपने गुरु की रक्षा हेतु एक शेर से युद्ध किया था। इस वीरता के कारण इस वंश को 'होयसल' नाम मिला।

दिल्ली सल्तनत को अनेक स्वतंत्र क्षेत्रीय सल्तनतों के उदय से होने वाले विद्रोहों का भी सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए,बहमनी सल्तनत 14वीं शताब्दी के मध्य में उदित हुई एवं कुछ समय के लिए दक्कन के अधिकांश भाग पर उसका नियंत्रण रहा। गुजरात, बंगाल तथा अन्य क्षेत्रों में भी शक्तिशाली सल्तनतें उभरीं, जिससे गठबंधनों एवं लगातार युद्धों की एक जटिल स्थिति उत्पन्न हुई। राजस्थान के कुछ भाग भी दिल्ली सल्तनत की पहुँच से दूर रहे। 15वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत को मेवाड़ के शासक राणा कुंभा के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जिन्होंने बाद की सल्तनतों के आक्रमणों को भी सफलतापूर्वक विफल किया।

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चित्र 2.10 - अरावली पर्वतमाला स्थित कुंभलगढ़ दुर्ग का एक दृश्य

इसे अनदेखा न करें

कुंभलगढ़ दुर्ग (चित्र 2.10) 15वीं शताब्दी में राणा कुंभा द्वारा अरावली की पहाड़ियों में निर्मित कराया गया था। यह दुर्ग मेवाड़ के शासकों के लिए एक सुदृढ़ गढ़ के रूप में कार्य करता था, जो एक प्रमुख राजपूत राज्य था (आज के राजस्थान के मध्य एवं दक्षिणी भाग में स्थित)। यह दुर्ग घने जंगलों और खड़ी पहाड़ियों से घिरा हुआ है और अपनी 36 किलोमीटर लंबी विशाल दीवार के लिए प्रसिद्ध है, जो विश्व की सबसे लंबी निरंतर दीवारों में से एक है।

आइए पता लगाएँ

आपको क्यों लगता है कि मध्यकाल में ऐसे स्थानों को दुर्गों के निर्माण के लिए चुना गया? इसके पक्ष-विपक्ष पर चर्चा कीजिए। (संकेत- रणनीति, सुरक्षा, भेद्यता इत्यादि विषयों पर विचार करें।)

विजयनगर साम्राज्य

ऐसी परिस्थिति में, जैसे-जैसे दिल्ली सल्तनत राजनैतिक रूप से अधिक अस्थिर होती गई, दक्षिण में एक नए सत्ता-केंद्र का उदय हुआ। 14वीं शताब्दी में दो भाइयों - हरिहर और बुक्का ने आरंभ में मुहम्मद बिन तुगलक के अधीन राज्यपाल के रूप में सेवाएँ दीं। इन्होंने अंततः दिल्ली की अधिसत्ता को अस्वीकार कर दिया तथा एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। यह राज्य दक्षिण भारत में एक प्रमुख शक्ति में परिणत हुआ और आगे चलकर विजयनगर साम्राज्य कहलाया।Screenshot 2026-02-13 154601
चित्र 2.11- विजयनगर के ध्वंसावशेषों का एक भाग (वर्तमान में हंपी)। विशाल भवन विरुपाक्ष मंदिर है।

इसे अनदेखा न करें

लोककथाओं के अनुसार, हरिहर एवं बुक्का ने हंपी (वर्तमान कर्नाटक) में एक अद्भुत दृश्य देखा - एक खरगोश अचानक पलटकर शिकारी कुत्तों के झुंड को दौड़ाने लगा। यह दृश्य अप्रत्याशित शक्ति एवं साहस का प्रतीक माना गया। जब उन्होंने यह घटना अपने गुरु विद्यारण्य को सुनाई, तो उन्होंने इसे प्रतिरोध एवं साहस के प्रतीक के रूप में वर्णित किया और उन्हें उसी स्थान पर अपनी राजधानी स्थापित करने का परामर्श दिया।

विजयनगर साम्राज्य के उत्तर में (चित्र 2.12 देखें) बहमनी सल्तनत एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थीं, जो अंततः पाँच स्वतंत्र राज्यों- बीजापुर, गोलकुंडा, बरार, अहमदनगर एवं बीदर में विभाजित हो गई, जिन्हें 'दक्कन सल्तनतें' कहा गया। प्रत्येक राज्य पर वहाँ के पूर्व प्रशासक अथवा 'तरफदार' शासन करने लगे, जिन्होंने स्वायत्तता की घोषणा कर दी थी। विजयनगर शासकों का प्रथम दो सल्तनतों के साथ ही पूर्व की ओर ओडिशा के गजपति शासकों से भी संघर्ष हुआ।

आइए विचार करें

क्या आपने 'गजपति' जैसे शीर्षकों में पति शब्द पर ध्यान दिया? पति का अर्थ है 'स्वामी' या 'प्रभु'। इस काल में कई राजवंशों द्वारा यह शक्ति तथा प्रतिष्ठा के संकेत के रूप में प्रयुक्त होता था। विजयनगर के राजाओं को 'नरपति', बहमनी सल्तनत के शासकों को 'अश्वपति' तथा मराठा शासकों को 'छत्रपति' कहा जाता था। प्रत्येक उपाधि राजत्व एवं शक्ति के विभिन्न पक्षों को दर्शाती है। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि इन तीन उपाधियों का क्या अर्थ है?

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चित्र 2.12 - दक्कन के राजवंश एवं विजयनगर साम्राज्य

कृष्णदेवराय

16वीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य अपने सर्वप्रसिद्ध शासक कृष्णदेवराय के अधीन अपनी चरम सीमा पर पहुँचा। उन्होंने साम्राज्य का विस्तार किया और दक्कन पर प्रभुत्व स्थापित किया। उनके शासन में साम्राज्य ने सैन्य शक्ति एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण, दोनों प्राप्त किए। उन्होंने संस्कृत, तेलुगु तथा कन्नड़ के कवियों एवं विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। स्वयं उन्होंने तेलुगु भाषा में तमिल भक्ति संत कवि आंडाल की कथा पर एक महाकाव्य आमुक्तमाल्यदा की रचना की। इस महाकाव्य का एक खंड राजनीति (राजकीय नीति) है, जहाँ उन्होंने सुशासन के विषय में अपने विचार प्रस्तुत किए। कृष्णदेवराय ने अनेक मंदिरों को अनुदान दिए, जिसमें आंध्रप्रदेश का तिरुपति मंदिर और उनकी अपनी राजधानी विजयनगर में स्थित विठ्ठल मंदिर सम्मिलित हैं, जो भव्य मंदिरों, महलों तथा अन्य भवनों में भी प्रदर्शित होता है।

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चित्र 2.13 - विठ्ठल मंदिर के महामंडप की वास्तुकला की भव्यता तथा जटिलता पर ध्यान दें, विशेष रूप से सूक्ष्म नक्काशीदार अखंड स्तंभों पर, जब उनके छोटे स्तंभों पर प्रहार किया जाता है, तो वे अलग-अलग संगीतमय स्वर निकालते हैं, इसीलिए उनका नाम 'संगीत स्तंभ' रखा गया है।

इसे अनदेखा न करें

व्यापार हेतु विदेशी यात्री विजयनगर आते थे। विशेषकर पुर्तगाली यात्रियों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया जाता था, क्योंकि वे घोड़े बेचने आते थे और राजा नहीं चाहता था कि वे अपने कीमती घोड़े शत्रु राज्यों को बेचें।

उनमें से एक पुर्तगाली यात्री डोमिगो पायस ने विजयनगर की राजधानी में अपने प्रवास का विस्तृत विवरण लिखा है। एक उद्धरण-

“यह नगर... मेरे लिए रोम जितना विशाल और दिखने में अत्यंत सुंदर है। नगर में और घरों के उद्यानों में वृक्षों के बाग हैं, तथा कई जलधाराएँ हैं, जो नगर के मध्य में बहती हैं। कुछ स्थानों पर झीलें भी हैं... इस नगर में लोगों की संख्या अनगिनत हैं... यह विश्व में सबसे अच्छी आपूर्ति वाला नगर है... सड़कों एवं बाजारों में बोझ ढोने वाले बैल भरे पड़े हैं... यहाँ आप विपुल मात्रा में सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं जो आप चाहते हैं।"


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चित्र 2.14 - विठ्ठल मंदिर का एक भित्ति-चित्र या पट्टिका

आइए पता लगाएँ

चित्र 2.14 में आप कौन-से तत्व देखते हैं? वे उस समय की जीवन-शैली के बारे में क्या बताते हैं? (संकेत - शस्त्र, जानवर, गतिविधियों को ध्यान से देखें।)

पड़ोसी राज्यों के विरुद्ध कई युद्ध जीतने के उपरांत, कृष्णदेवराय की 1529 में बीमारी के कारण मृत्यु हो गई। 1565 में दक्कन सल्तनतों ने गठबंधन बनाया एवं रामराय (कृष्णदेवराय के दामाद) के नेतृत्व वाली विजयनगर सेनाओं को तालीकोटा के युद्ध में पराजित किया। नगर को महीनों लूटा गया। घर, दुकानें, महल एवं अधिकांश मंदिर नष्ट कर दिए गए। बड़ी संख्या में नागरिकों का जनसंहार हुआ और नगर के ध्वंसावशेष ही शेष बचे। तत्पश्चात, साम्राज्य छोटे-छोटे भागों में विभाजित हो गया, जिसका शासन नायकों (पूर्व सैनिक अधिपति) के अधीन था। 17वीं सदी के मध्य तक विजयनगर साम्राज्य का अंत हो गया।

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प्लासी का युद्ध (1757) इस नीति का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है। जब बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों (जिनका नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव कर रहे थे) के मध्य तनाव उत्पन्न हुआ, तब क्लाइव ने नवाब के दरबार में असंतुष्ट तत्वों की पहचान की। क्लाइव ने नवाब के सेनापति मीर जाफर के साथ षड्यंत्र रचा और उसके साथ यह समझौता किया कि यदि वह नवाब के साथ विश्वासघात करेगा तो उसे नवाब के रूप में स्थापित कर दिया जाएगा। यह युद्ध पलाशी (अर्थात प्लासी, जैसा कि अंग्रेजों ने उच्चारित किया) में हुआ, जो वर्तमान कोलकाता से लगभग 150 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। नवाब को कुछ फ्रांसीसी सेनाओं का समर्थन प्राप्त था, किंतु मीर जाफर की सेनाएँ- जो नवाब की सेना का प्रमुख भाग थीं, युद्ध में निष्क्रिय रहीं। इस प्रकार संख्या में कम होने पर भी ब्रिटिशों को विजय प्राप्त हुई। आज भी 'मीर जाफर' नाम भारत में 'विश्वासघाती' के पर्यायवाची के रूप में स्मरण किया जाता है।

मुगल

जब दिल्ली सल्तनत पतनशील थी, तब बाबर, एक तुर्क-मंगोल शासक तथा सैन्य रणनीतिकार, जो समरकंद (वर्तमान उज्बेकिस्तान) से निष्कासित था, ने अपनी दृष्टि भारत की ओर मोड़ी। तैमूर वंशीय बाबर ने 1526 में इब्राहिम लोदी को पानीपत में पराजित किया, जिसे बाद में पानीपत का प्रथम युद्ध कहा गया। इस युद्ध में बारूद, क्षेत्रीय तोपखाने एवं तोड़ेदार बंदूकों पर अतिशय निर्भरता थी, जिन्हें हाल ही में भारत में युद्ध में सम्मिलित किया गया था। इस पराजय ने दिल्ली सल्तनत का अंत किया तथा बाबर ने दिल्ली की सत्ता संभालकर मुगल साम्राज्य की स्थापना की।

बाबर और भारत

बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा लिखी, जो ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें वह स्वयं को संस्कारी, बौद्धिक एवं जिज्ञासु व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसे वास्तुकला, कविता, पशुओं (विशेषकर पक्षियों, जिनमें से कई को उसने कुछ विवरणों में सूचीबद्ध किया है) तथा वनस्पति (विशेषकर फलदार वृक्षों) की गहरी समझ थी। किंतु वह एक निर्दयी विजेता भी था। कई नगरों के निवासियों की हत्या, महिलाओं तथा बच्चों को दास बनाना तथा लूटे गए नगरों के हंत निवासियों के मृत शरीरों से 'खोपड़ियों की मीनारें' बनवाना, इसमें उसे गर्व का अनुभव होता था। बाबर मध्य एशिया से अतिशय जुड़ाव रखता था और भारत को 'अल्प आकर्षणों का देश' मानते हुए भी लिखता है कि "हिंदुस्तान विशाल देश है एवं इसमें सोना-चाँदी बहुतायत में है... वर्षा ऋतु के समय यहाँ की हवा अत्यंत शुद्ध एवं स्वास्थ्यप्रद है... हिंदुस्तान में हर प्रकार के शिल्पकार तथा कारीगर अनगिनत संख्या में उपलब्ध हैं।" शायद भारत की समृद्धि तथा संसाधनों को देखकर उसने मध्य एशिया वापस जाने के स्थान पर यहीं अपनी सत्ता बनाए रखने का निर्णय लिया।


आइए विचार करें

भारत के विषय में बाबर के विचारों में आप क्या विशेष पाते हैं? समूहों में चर्चा करें।

1530 में बाबर की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र हुमायूँ को साम्राज्य बनाए रखने में संघर्ष करना पड़ा। इसका लाभ उठाते हुए अफगान नेता शेरशाह सूरी ने उत्तरी भारत के बड़े भाग पर शासन स्थापित किया एवं कई दीर्घकालिक सुधार किए। यद्यपि यह शासन अल्पकालिक रहा, क्योंकि हुमायूँ ने शीघ्र ही अपना साम्राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।

इससे पूर्व, हेमू, जो सूर वंश के अंतिम शासकों के अंतर्गत एक कुशल सेनापति एवं मुख्यमंत्री (वजीर) था, ने दिल्ली पर अल्पकालिक नियंत्रण स्थापित कर हेमचन्द्र विक्रमादित्य के नाम से शासन किया। यद्यपि उसने कुछ सैन्य सफलताएँ अर्जित कीं, परंतु वह बाबर के पौत्र अकबर से युद्ध करते हुए (पानीपत का द्वितीय युद्ध) युद्धभूमि में घायल हो गया। उसे बंदी बनाकर अकबर के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिसने उसका सिर धड़ से अलग करवा दिया। शीघ्र ही अकबर ने दिल्ली को मुगलों के लिए पुनः प्राप्त कर लिया।

अकबर

अपने पिता हुमायूँ के आकस्मिक निधन के पश्चात अकबर को मात्र 13 वर्ष की आयु में सम्राट घोषित किया गया। अकबर ने संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप को मुगल शासन के अधीन लाने का अभियान आरंभ किया। उसका राज्यकाल क्रूरता एवं समन्वयन का सम्मिश्रण था, जो उसकी महत्वाकांक्षा और रणनीति द्वारा निर्धारित था।

आरंभिक विजय अभियानों में, अपने पूर्ववर्तियों के उदाहरणों का अनुसरण करते हुए, उसने चित्तौड़ (या राजस्थान में चित्तौड़गढ़) में कोई दया नहीं दिखाई। चित्तौड़गढ़ के दुर्ग को उसने पाँच माह से अधिक समय तक घेरे रखा। राजपूत सैनिकों ने दृढ़ प्रतिरोध किया और मुगल सेना को भारी क्षति पहुँचाई, किंतु अंततः किले में सेंध लगा दी गई। राजपूत सैनिक लड़ते हुए बड़ी संख्या में हताहत हुए, जबकि सैकड़ों महिलाओं ने जौहर (बॉक्स देखें) किया। अकबर ने किले में लगभग 30,000 नागरिकों के नरसंहार का आदेश दिया और जीवित महिलाओं एवं बच्चों को दास बना लिया गया। अकबर की आयु उस समय 25 वर्ष थी। उसने विजय संदेश भेजा, जिसमें लिखा था "हमने काफिरों के अनेक दुर्ग तथा नगरों पर अधिकार कर लिया है और वहाँ इस्लाम स्थापित किया है। अपनी रक्तपिपासु तलवार की सहायता से हमने उनके मस्तिष्क से कुफ्र के चिह्न मिटा दिए हैं तथा संपूर्ण हिंदुस्तान में मंदिरों को नष्ट किया है।"

जौहर क्या है?

जब तुर्क या मंगोल सेनाएँ किसी क्षेत्र पर अधिकार कर लेती थीं, तो वे प्रायः वहाँ की स्त्रियों को गुलाम बनाकर ले जाते थे अथवा उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते थे। कई ऐतिहासिक उदाहरण ऐसी राजपूत स्त्रियों के प्राप्त होते हैं, जो अपनी पवित्रता एवं सम्मान की रक्षा हेतु सामूहिक रूप से स्वयं को अग्नि में समर्पित कर देती थीं। 'जौहर' अंतिम प्रतिरोध तथा प्रतिष्ठा की रक्षा का प्रतीक माना जाता था। जब अकबर ने अंतिम रूप से चित्तौड़ पर विजय प्राप्त की तो सैकड़ों राजपूत महिलाओं ने अपनी महारानियों एवं कुलीन महिलाओं के साथ जौहर किया।

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चित्र 2.16 - विभिन्न कालखंडों में मुगल और क्षेत्रीय शक्तियों का उदय

अकबर ने अपने पूर्ववर्तियों का अनुसरण करते हुए ये विचार अपनाया - “एक शासक को सदैव विजय की इच्छा रखनी चाहिए अन्यथा उसके शत्रु उसके विरुद्ध शस्त्र उठा लेंगे।" जैसे-जैसे उसके साम्राज्य का विस्तार होता गया (चित्र 2.16), उसने इसे स्थिर करने के लिए राजनैतिक युक्तियों का प्रयोग किया। उसने पड़ोसी राज्यों की राजकुमारियों के साथ विवाह संबंध स्थापित किए, राजपूत एवं क्षेत्रीय शक्तियों का राजदरबार में स्वागत किया, 'जजिया' कर का उन्मूलन किया और सुलह-ए-कुल - वस्तुतः सभी के साथ शांति या सभी पंथों के प्रति सहिष्णुता की नीति का अवलंबन लिया। अंतरपाथिक संवादों, हिंदू अधिकारियों की उच्च पदों पर नियुक्ति एवं अन्य साहसिक सुधारों के माध्यम से अकबर ने अपने साम्राज्य को विस्तार तथा स्थिरता प्रदान की और कई राजपूत शासकों का समर्थन प्राप्त किया। उसके दरबारी इतिहासकार एवं जीवनीकार अबुल फ़ज़ल ने उसके कथनों को वर्णित करते हुए लिखा है, "औपचारिक रूप से मैंने लोगों को अपने पंथ के अनुरूप ढाला और इसे ही इस्लाम मान लिया। जैसे-जैसे मैंने ज्ञान प्राप्त किया, मुझे अत्यंत लज्जा हुई। स्वयं मुस्लिम न होते हुए, दूसरों को बलात् ऐसा बनने के लिए विवश करना अनुचित था। बलपूर्वक मतांतरित लोगों से प्रतिबद्धता की क्या अपेक्षा की जा सकती है?" उसकी दीर्घ शासनावधि प्रायः 50 वर्षों तक (1556 से 1605 में मृत्यु तक) चली। इस अवधि का मध्यकाल प्रायः शांत रहा, किंतु अंतिम 15 वर्ष कश्मीर, सिंध, दक्कन और अफगानिस्तान में नए सैन्य अभियानों से भरे रहे।

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चित्र 2.17- चित्र में अकबर दरबार में विद्वानों, जिसमें दो जेसुइट सम्मिलित हैं (काले वस्त्र में), का स्वागत करते हुए।

आइए विचार करें

आपके विचार में अकबर ने साम्राज्य विस्तार हेतु अलग-अलग रणनीतियाँ क्यों अपनाईं, जबकि दिल्ली के पहले शासक प्रायः केवल सैन्य शक्ति पर ही निर्भर थे?

आइए पता लगाएँ

चित्र 2.3, 2.12 और 2.16. के मानचित्रों की तुलना करें। आप क्या अंतर देखते हैं? इनमें क्या 'परिवर्तन' हुए हैं?

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चित्र 2.18 - फतेहपुर सीकरी में अकबर द्वारा निर्मित पाँच मंजिला 'पंचमहल' (वर्तमान आगरा के समीप)

स्वयं निरक्षर होने के उपरांत भी अकबर फारसी तथा भारतीय ग्रंथों का अध्ययन करने के लिए उत्सुक रहता था। उसने भारतीय शास्त्रीय विचारों में गहरी रुचि दिखाई एवं बहुधा विद्वानों को अपने राजदरबार में आमंत्रित किया। उसने फतेहपुर सीकरी में एक 'अनुवाद भवन' स्थापित किया जहाँ उसने प्रमुख संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद फारसी में करवाया। इनमें महाभारत (फारसी में रज़्मनामा या 'युद्ध का ग्रंथ'), रामायण (176 सुंदर लघु चित्रों के साथ), भगवद्गीता और पंचतंत्र सम्मिलित थे।

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चित्र 2.19 - रामायण के फारसी अनुवाद पर आधारित एक लघुचित्र, जिसमें राम द्वारा स्वर्ण मृग का पीछा करने का सुप्रसिद्ध प्रसंग दर्शाया गया है।

अकबर के पुत्र जहाँगीर ने पिता की भाँति ही कला तथा वास्तुकला के प्रति रुचि दिखाई एवं दक्कन में विस्तार का प्रयास किया। उसके पुत्र शाहजहाँ ने कई विद्रोहों का सामना किया। उसे आगरा स्थित ताजमहल के निर्माता के रूप में स्मरण किया जाता है। ताजमहल को आज भी विश्व के महान वास्तुशिल्प चमत्कारों में से एक माना जाता है। यह युग कला एवं स्थापत्य कला के विकास का चरम माना जाता है, जिसमें दिल्ली में हुमायूँ का मकबरा और दिल्ली एवं आगरा के लाल किले सम्मिलित हैं। अन्य शास्त्रीय कलाओं तथा भारतीय संगीत, सुलेख एवं लघुचित्र कला का भी इस काल में उत्कर्ष हुआ।

औरंगजेब

हमने पूर्व में उल्लेख किया है कि सल्तनत काल में उत्तराधिकार प्रायः हिंसक हुआ करते थे। इसकी पुनरावृत्ति शाहजहाँ के उत्तराधिकार के समय भी हुई। 1657 में शाहजहाँ बीमार पड़ गया। उसकी इच्छा थी कि सिंहासन बड़े पुत्र दारा शिकोह को मिले, किंतु दारा को उसके छोटे भाई औरंगजेब ने कई युद्धों में पराजित किया और अंततः उसकी हत्या कर उसका मस्तक काटकर पिता के समक्ष प्रस्तुत किया। औरंगजेब ने अपने अन्य दो भाइयों को भी रास्ते से हटाया - एक को बंदी बनाकर मृत्युदंड दिया गया तथा दूसरे को निर्वासन में भेज दिया गया। अपने शासन को चुनौतीमुक्त रखने के लिए उसने अपने पिता शाहजहाँ को आगरा के किले में बंदी बना लिया, जहाँ वह अपनी मृत्यु तक रहा। औरंगजेब ने 1658 में अपना राज्यारोहण किया और स्वयं को 'आलमगीर' अर्थात 'विश्वविजेता' नामित किया। उसने लगभग 49 वर्षों तक शासन किया।

आइए विचार करें

हमने ऊपर देखा कि दिल्ली के सुल्तानों का औसत शासनकाल लगभग नौ वर्ष था। यह आँकड़ा मुगल सम्राटों के विषय में औरंगजेब तक 27 वर्ष का हो जाता है और यदि हम 19वीं शताब्दी में साम्राज्य के अंत तक के सभी मुगल शासकों को सम्मिलित करें तो 16 वर्ष सभी के शासनकाल का औसत था। शासन के वर्षों की इन संख्याओं से आप क्या निष्कर्ष निकालते हैं?

औरंगजेब सैन्य मामलों में कुशल था। उसने कई अभियान चलाए, विशेष रूप से दक्षिण के कई भागों पर विजय प्राप्त की। उसके शासनकाल में मुगल साम्राज्य विस्तार के चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया (चित्र 2.16 देखें)। यद्यपि उसे लगातार महत्वपूर्ण विद्रोहों का सामना करना पड़ा, जिनमें से कुछ पर हम अगले भाग पर चर्चा करेंगे। औरंगजेब ने अपने जीवन के अंतिम 25 वर्ष दक्कन क्षेत्र में युद्ध करते हुए व्यतीत किए। इन अभियानों हेतु विशाल सेना के रख-रखाव ने साम्राज्य के राजकोष को क्षीण किया और प्रशासन पर भारी दबाव डाला। वास्तव में इसे 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल शक्ति के तेजी से पतन के प्रमुख कारकों में से एक माना जाता है।

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चित्र 2.20 - हाथ में बाज लिए हुए दरबार में औरंगजेब, उसके सम्मुख उसका पुत्र खड़ा है (17वीं शताब्दी का चित्र)।

औरंगजेब, जो सुन्नी इस्लाम का अनुयायी था, अत्यधिक मजहबी था। वह अनुशासित जीवन जीता था और अकबर के विपरीत, सारे इस्लामी या मजहबी नियमों एवं अवसरों का पालन करता था। उसने धीरे-धीरे अपने दरबार में उन प्रथाओं पर प्रतिबंध लगा दिया जिन्हें वह गैर-इस्लामी मानता था, जैसे - संगीत एवं नृत्य। उसने गैर मुसलमानों पर 'जजिया' कर एवं हिंदुओं पर अपने तीर्थ स्थलों के दर्शन हेतु तीर्थयात्रा कर पुनः लगा दिया (दोनों ही करों को अकबर द्वारा समाप्त कर दिया गया था)। कुछ विद्वानों का तर्क है कि औरंगजेब के उद्देश्य मुख्यतः राजनीतिक थे, जिससे साम्राज्य के प्रभुत्व को स्थापित एवं सशक्त किया जाए। वे कुछ मंदिरों को दिए गए अनुदानों तथा संरक्षण के आश्वासन का उदाहरण भी देते हैं। यद्यपि राजनीति उसके निर्णयों का प्रमुख भाग थी, औरंगजेब के निजी फरमान ही उसके व्यक्तिगत मजहबी उद्देश्यों को स्पष्ट कर देते हैं। उदाहरण के लिए 1669 में उसने सभी प्रांतों के गवर्नरों को आदेश दिया- "गैर-मुसलमानों/काफिरों के विद्यालयों एवं मंदिरों को नष्ट कर दो और उनकी शिक्षाओं तथा धार्मिक आचरणों को समाप्त कर दो।” इसके परिणामस्वरूप बनारस (वाराणसी), मथुरा, सोमनाथ स्थित अनेक मंदिरों, जैन मंदिरों एवं सिख गुरुद्वारों को ध्वस्त किया गया। औरंगजेब का यह पक्ष अन्य मुस्लिम फिरकों या शाखाओं, सूफियों और जोरास्ट्रियन के उत्पीड़न में भी दिखाई देता है। (जोरास्ट्रियन भारत में पारसी कहलाते हैं, जो मूलतः वर्तमान ईरान से हैं।)

आइए पता लगाएँ

अपने दो पुत्रों को लिखे गए पत्रों में औरंगजेब ने लिखा है, "मैं अकेला आया था और अकेला जा रहा हूँ। मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूँ और क्या कर रहा था... मैंने न देश के लिए और न ही लोगों के लिए अच्छा किया है। भविष्य के लिए भी मेरे पास कोई आशा नहीं है... मैं जीवनभर निराश रहा और दीन-हीन अवस्था में ही जा रहा हूँ।” ये शब्द उनके व्यक्तित्व के कौन-से पक्ष को उजागर करते है? आपको उनके बारे में कैसा महसूस होता है।

आइए विचार करें

उपरोक्त उल्लिखित कुछ आक्रांताओं एवं शासकों ने निर्मम हत्याएँ और अत्याचार किए। कई अन्य का उल्लेख किया जा सकता था। जैसा कि 'इतिहास के अंधकारमय कालखंडों पर एक टिप्पणी' (पृष्ठ 20) में स्पष्ट है, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि यह विवरण अतीत के लोगों के विषय में हैं, वर्तमान लोगों के बारे में नहीं। अतीत के तथ्यों की जानकारी होना आवश्यक है और उन अत्याचारों के पीड़ितों के लिए आदर एवं स्मृति भी। किंतु यह समझना महत्वपूर्ण है कि हम सैकड़ों वर्ष पूर्व किए गए व्यक्तियों के कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।

मुगलों का प्रतिरोध

अब हम कुछ मुख्य विद्रोहों के विषय में जानेंगे, जिन्होंने मुगल शक्ति को समाप्त किया (मराठों के विशेष संदर्भ को अगले अध्याय में पढ़ेंगे)।

शताब्दियों से अनेक किसान समुदायों ने कठोर शोषण के विरुद्ध विद्रोह किया। ऐसा ही एक उदाहरण, 17वीं शताब्दी में जाट किसानों से जुड़ा है (पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा एवं पूर्वी राजस्थान में) जिन्होंने मुगल प्रशासन के एक दमनकारी अधिकारी की हत्या कर दी। इसके बाद हुए युद्ध में 20,000 लोगों ने वीरतापूर्वक मुगल सेना का सामना किया, किंतु उनका जाट नेता मारा गया और विद्रोह का दमन कर दिया गया।

कई आदिवासी समुदाय, उदाहरण के लिए भील, गोंड, संथाल, कोच, अपने क्षेत्र पर अधिपत्य करने या उन पर कर लगाने के प्रयास के विरुद्ध भी लड़े। इनमें से कुछ समुदायों का दमन कर दिया गया या धीरे-धीरे इन्हें दिल्ली सल्तनत या मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया। अन्य, विशेष रूप से वनवासी, पहाड़ी या दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोग कुछ सीमा तक स्वतंत्रता बनाए रखने में सफल रहे।

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चित्र 2.21 - रानी दुर्गावती की एक कलात्मक प्रतिमा

रानी दुर्गावती को मध्य भारत के गोंड राज्यों में से एक गढ़ राज्य (मध्य भारत का एक गोंड राज्य) की एक वीर रानी के रूप में याद किया जाता है। सभी विवरणों से ज्ञात होता है कि उन्होंने बुद्धिमत्ता से शासन किया एवं अपने राज्य को समृद्ध बनाया। उनके पास 20,000 सैनिकों और 1,000 हाथियों की एक सेना थी, जिनके सहयोग से उन्होंने आक्रमण के कई प्रयासों को विफल कर दिया। जब अकबर द्वारा भेजे गए एक सेनापति ने 1564 में उनके राज्य पर आक्रमण किया, तो संख्याबल तथा हथियारों में कम होने के बाद भी उन्होंने स्वयं अपनी सेना का नेतृत्व किया और बहादुरी से लड़ीं। घायलावस्था में उन्होंने युद्धभूमि में ही आत्मबलिदान दिया ताकि उन्हें बंदी न बनाया जा सके। उस समय वह केवल 40 वर्ष की थीं। उनका बलिदान क्षेत्रीय गौरव एवं प्रतिरोध का प्रतीक बन गया और उन्हें आज भी भारतीय इतिहास में एक वीरांगना के रूप में स्थान दिया जाता है।

राजपूतों का उदय

उत्तर-पश्चिमी भारत में स्थित होने के कारण तथा पूर्ववर्ती राजवंशों से प्राप्त गौरवशाली परंपराओं के कारण (उदाहरण के लिए, प्रतिहार जिन्होंने कुछ शताब्दियों पूर्व ही सिंध पर अरब आक्रमण का विरोध किया था), राजपूत प्रायः उपमहाद्वीप के बाहर से आने वाली शक्तियों से जूझते रहे। राजपूतों ने खिलजी के आक्रमण के बाद अपने राज्यों का पुनर्गठन कर लिया था। इस प्रक्रिया में मेवाड़ और मारवाड़ क्षेत्र में दो प्रमुख वंश उभरे। उनकी शौर्यपूर्ण कहानियाँ, विशेष रूप से लोकप्रिय गाथागीतों के माध्यम से आज भी सुनाई जाती हैं। इन वंशों में उत्पन्न वीर शासकों में से हम पूर्व में राणा कुंभा के विषय में पढ़ चुके हैं। राणा सांगा ने कई राजपूत वंशों को एकीकृत किया और सुल्तानों के विरुद्ध कई युद्ध जीते। अंततः, खानवा के युद्ध में बाबर के विरुद्ध उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। Screenshot 2026-02-13 154757

चित्र 2.23 - हल्दीघाटी के युद्ध का एक कलाकार द्वारा चित्रण (उदयपुर महल से)
यद्यपि उन्हें अपने पूर्ववर्तियों से एक विखंडित राज्य विरासत में मिला था, फिर भी मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप ने मुगल आधिपत्य को अस्वीकार किया और राजपूत प्रतिरोध का प्रतीक बन गए। 1576 में अरावली के हल्दीघाटी दर्रे में एक संघर्ष हुआ (चित्र 2.23)। यद्यपि मुगल सेना का पलड़ा भारी रहा, महाराणा ने युद्धभूमि छोड़ दी और अरावली की पहाड़ियों से मुगलों के विरुद्ध वर्षों तक गुरिल्ला युद्ध जारी रखा। कठोर परिस्थितियों में रहते हुए भी वे अपनी स्वतंत्रता पर अडिग रहे। यह उल्लेखनीय है कि महाराणा प्रताप को भीलों का प्रबल समर्थन प्राप्त था, जो न केवल धनुर्धर के रूप में सेना में सम्मिलित हुए वरन् उस क्षेत्र के अपने ज्ञान से भी योगदान दिया। अन्य अवसरों पर भी उनकी सेवा ने उन्हें मेवाड़ की सैन्य परंपरा में एक सम्मानित स्थान दिलाया, जैसा कि मेवाड़ के प्रतीक चिह्न से भी स्पष्ट होता है (चित्र 2.22)

कुछ राजपूत राज्यों ने अंततः कूटनीति एवं वैवाहिक गठबंधनों के माध्यम से मुगलों के साथ गठबंधन किया। किंतु, कुछ अन्य विशेष रूप से मेवाड़, ने मुगल प्रभुत्व को स्वीकार नहीं किया। औरंगजेब के शासनकाल के समय कई राजपूत सरदारों ने विद्रोह किया, जिनमें मारवाड़ के दुर्गादास राठौड़ भी सम्मिलित थे। इन्होंने जोधपुर की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। अतएव मुगल सत्ता राजस्थान में सीमित रही।Screenshot 2026-02-13 154808

चित्र 2.22 - मेवाड़ का प्रतीक चिह्न, बाएँ ओर एक भील योद्धा के साथ।

अहोम

13वीं शताब्दी में अहोम जातीय समूह वर्तमान म्यांमार से ब्रह्मपुत्र घाटी में चले गए एवं वहाँ अहोम साम्राज्य का गठन किया। सल्तनत एवं मुगल काल दोनों समय में अहोम शासकों ने उत्तर-पूर्व में विस्तार के प्रयासों का कठोर प्रतिरोध किया। उनकी अनूठी 'पाइक' प्रणाली में प्रत्येक सक्षम व्यक्ति से भूमि अधिकारों के स्थान पर श्रम या सैन्य कर्तव्य के माध्यम से राज्य को सेवा प्रदान करने का आह्वान किया जाता था। इससे शासकों को सार्वजनिक आधारभूत संरचना का निर्माण करने एवं स्थायी सेना के बिना विशाल त्वरित बल बनाए रखने का अवसर मिला। समय के साथ अहोमों ने स्थानीय संस्कृति को आत्मसात किया, कृषि को बढ़ावा दिया, विविध धर्मों को प्रोत्साहित किया एवं असम की समृद्ध परंपराओं में योगदान दिया।

आइए पता लगाएँ

कक्षा में चर्चा करें कि 'पाइक' प्रणाली ने अहोम साम्राज्य में लोगों के दैनिक-जीवन को चुनौतियों एवं लाभों के संदर्भ में कैसे प्रभावित किया तथा कैसे राजाओं को सेना और अर्थव्यवस्था दोनों का प्रबंधन करने में सहायता की।

17वीं शताब्दी में जब औरंगजेब ने मुगल सेना को अहोम की राजधानी गढ़गांव पर अधिपत्य के लिए भेजा, तब अहोमों ने घने जंगलों, पहाड़ियों और नदियों के अपने ज्ञान और लगातार गुरिल्ला रणनीति का प्रयोग हमले को विफल करने के लिए किया। यद्यपि मुगलों के पास अधिक सैनिक और नदी-नौकाओं का एक बड़ा बेड़ा था, वर्तमान गुवाहाटी के निकट बह्मपुत्र नदी पर लड़े गए सरायघाट के युद्ध (1671) में अहोम सेनापति लचित बरफुकन और उनके 10,000 सैनिकों ने 30,000 सैनिकों की मुगल सेना को पराजित किया। अंततः अहोम अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने में सफल रहे।

इसे अनदेखा न करें

मुगल सेनापति राम सिंह ने अहोम योद्धाओं की प्रशंसा इन शब्दों में की थी – “प्रत्येक असमिया सैनिक नाव चलाने, तीरंदाजी करने, खाई खोदने तथा बंदूकों एवं तोपों को चलाने में निपुण है। मैंने भारत के किसी अन्य क्षेत्र में ऐसी बहुमुखी प्रतिभा नहीं देखी है।"

आइए पता लगाएँ

अहोमों ने असम की नदियों, पहाड़ियों और जंगलों का उपयोग अपने लाभ के लिए कैसे किया? क्या आप उन उपायों के बारे में सोच सकते हैं, जिनसे भूगोल ने उनकी रक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करने और युद्ध लड़ने में सहायता प्रदान की?

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चित्र 2.24- सरायघाट के युद्ध की स्मृति में एक पट्टिका, जिसके अग्रभाग में एक अहोम नाव प्रदर्शित है (सरायघाट युद्ध स्मारक पार्क)
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चित्र 2.25- सरायघाट के युद्ध के समय अहोम योद्धाओं को दर्शाती मूर्तियाँ

सिखों का उदय

15वीं शताब्दी में पंजाब में गुरु नानक ने समानता, करूणा तथा ईश्वर की एकता (इक ओंकार) का संदेश फैलाया। उनके अनुयायी सिख के रूप में जाने गए। यद्यपि सिख पंथ का आरंभ एक आध्यात्मिक आंदोलन के रूप में हुआ था, किंतु बाद के कुछ मुगल शासकों की बढ़ती असहिष्णुता एवं उत्पीड़न ने सिख गुरुओं को उत्तर देने पर विवश किया। जब जहाँगीर को पता चला कि गुरु अर्जन देव ने उसके विद्रोही पुत्र का समर्थन किया है, तब उसने गुरु को यातनाएँ देकर मृत्युदंड दिया। इस घटना ने गुरु अर्जन देव के पुत्र तथा उत्तराधिकारी गुरु हरगोबिंद को सैन्य प्रशिक्षण आरंभ करने और सिख सेना बनाने के लिए प्रोत्साहित किया, जिसने मुगल सेनाओं के विरूद्ध कई लड़ाइयाँ लड़ीं।

इसे अनदेखा न करें

इस अध्याय के संदर्भ में पंजाब से तात्पर्य उस विशाल क्षेत्र से हैं जो वर्तमान भारत एवं पाकिस्तान के मध्य में विभाजित हैं।

सिखों का पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब, सबसे पहले गुरु अर्जन देव द्वारा संकलित किया गया था, बाद में गुरु तेग बहादुर के भजन इसमें जोड़े गए। यह ग्रंथ इस बात पर बल देता है कि सभी के लिए एक ही ईश्वर है (जिसने पृथ्वी को धर्म के गृह के रूप में स्थापित किया) और सिखों को अन्य मूल्यों के साथ-साथ सत्यनिष्ठा, करुणा, विनम्रता एवं आत्म-नियंत्रण का अभ्यास करने का निर्देश देता है।

उदाहरण - "सत्य उच्च है परंतु सच्चा जीवन उससे भी सर्वोच्च है।"

1675 में कश्मीरी पंडितों का एक समूह इस्लामी उत्पीड़न से सुरक्षा की माँग करते हुए गुरु तेगबहादुर के पास पहुँचा। गुरु ने उनके साथ खड़े होने एवं शहादत स्वीकार करने का निर्णय लिया। औरंगजेब ने इन्हें बंदी बना लिया तथा इस्लाम स्वीकारने का आदेश दिया। यातनाएँ झेलने तथा अपने दो शिष्यों की यातनाओं के कारण मृत्यु हो जाने के बाद भी गुरु ने इस्लाम स्वीकार करने से इंकार कर दिया। औरंगजेब के आदेश पर चाँदनी चौक में सार्वजनिक रूप से उनका सिर कलम कर दिया गया।

प्रत्युत्तर में, उनके पुत्र गुरु गोबिंद सिंह - 10वें एवं अंतिम गुरु ने खालसा पंथ की स्थापना की। यह न्याय, समानता तथा आस्था की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध एक सैन्य भाईचारा था, जो प्रायः प्राणों की चिंता किए बिना मुगल सेना से भिड़ता था।

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चित्र 2.26 - गुरु गोबिंद सिंह का लघु चित्र

इसे अनदेखा न करें

क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के प्रसिद्ध खरीदारी क्षेत्र चाँदनी चौक में गुरुद्वारा शीशगंज साहिब का क्या महत्व है? सिख पंथ में गुरुद्वारा एक पूजा स्थल है। यह वही स्थान है, जहाँ 1675 में औरंगजेब ने नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर का सिर काट दिया था। इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को सिख रेजिमेंट द्वारा विशिष्ट सम्मान दिया जाता है, जो 1979 से प्रत्येक वर्ष गणतंत्र दिवस परेड में राष्ट्रपति से पूर्व इसे सलामी देती है। यह भारतीय इतिहास में आस्था एवं बलिदान का एक शक्तिशाली प्रतीक है।

आइए विचार करें

  • आपको ऐसा क्यों लगता है कि गुरु तेग बहादुर ने धर्म परिवर्तन करने के स्थान पर यातनाएँ सहन कीं? उन्होंने क्यों सोचा कि उनका बलिदान कोई प्रभाव डालेगा?
  • सिख गुरुओं एवं खालसा ने किन मूल्यों को अपनाया?
  • वर्तमान विश्व में वे कैसे प्रासंगिक हैं?

मुगल साम्राज्य के पतन के साथ, विशेष रूप से मराठों के आक्रमणों के कारण, पंजाब क्षेत्र में कई सिख संघ उभरे, जिन्हें अंततः 19वीं शताब्दी के अंत में महाराजा रणजीत सिंह के प्रयासों से एकीकृत किया गया। रणजीत सिंह की सैन्य कुशाग्रता, कूटनीतिक कौशल और धार्मिक सहिष्णुता ने उन्हें एक सशक्त केंद्रीयकृत साम्राज्य स्थापित करने में सहायता की, जो कश्मीर के कुछ भागों सहित उत्तर-पश्चिम के अधिकांश भागों तक विस्तृत था।

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चित्र 2.27 – यह चित्र इस अध्याय में सम्मिलित प्रमुख राजवंशों को दर्शाता है, जिसमें उनके भौगोलिक स्थानों का भी एक सामान्य संकेत हैं।

सिख साम्राज्य, जो कश्मीर के कुछ भागों सहित उत्तर-पश्चिम के अधिकांश भाग में फैला हुआ था, 19वीं शताब्दी के मध्य तक मुगल साम्राज्य के अवशेषों और तदंतर ब्रिटिश विस्तार, दोनों का विरोध करता रहा।

भारत का प्रशासन

दिल्ली सल्तनत के अधीन प्रशासन

दिल्ली सल्तनत ने सुल्तान पर केंद्रित एक राजनैतिक व्यवस्था प्रारंभ की, जिसमें सुल्तान के पास राजनीतिक और सैन्य प्रमुख के रूप में पूर्ण अधिकार थे। समकालीन इतिहास के अनुसार उसके कर्तव्यों में 'संभावित आक्रमण से इस्लाम के क्षेत्रों की रक्षा करना', 'शुल्क और कर संग्रह करना' तथा 'व्यक्तिगत संपर्क द्वारा सार्वजनिक विषयों और लोगों की स्थिति से जुड़े रहना' सम्मिलित था। सुल्तान को एक मंत्रिपरिषद की सहायता प्राप्त होती थी, जो सल्तनत के विभिन्न विभागों के प्रभारी थे।

प्रशासन का एक प्रमुख साधन इक्ता प्रणाली थी, जिसमें कर वसूली के लिए कुलीनों (इक्तादारों) को क्षेत्र सौंपे जाते थे। व्यय कटौती के पश्चात शेष राजस्व सुल्तान के कोष में जमा होता था। सेना के रख-रखाव के लिए यह व्यवस्था विशेष रूप से आवश्यक थी। इस प्रणाली ने केंद्रीय सत्ता के प्रति विश्वसनीय स्थानीय प्रशासकों का एक जाल निर्मित किया, किंतु उनके पद वंशानुगत नहीं थे। यद्यपि व्यापार पर प्रत्येक स्तर पर कर लगाया जाता था, इसका सर्वाधिक बोझ कृषकों पर पड़ता था। कुछ समकालीन विवरणों में भूमि से राजस्व संग्रह के समय अत्यधिक क्रूरता का भी उल्लेख मिलता है।

मुगल प्रशासनिक ढाँचा

अधिक नियंत्रण और दक्षता सुनिश्चित करने के लिए अकबर ने अपने प्रशासनिक तंत्र का पुनर्गठन किया। दीवान वित्त का प्रभारी था, जबकि मीर बख्शी सैन्य विषयों की देख-रेख करता था। खान-ए-सामान शाही घराने के साथ-साथ सार्वजनिक कार्यों, व्यापार, उद्योग और कृषि का प्रभारी था। सदर न्याय, पंथ-मजहब और शैक्षिक विषयों के लिए उत्तरदायी था। इन मंत्रियों को साम्राज्य के बारह प्रांतों (सूबों) में से प्रत्येक में नियुक्त किया जाता था, जिन्हें आगे छोटी प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था। सरकारी अधिकारियों के मध्य प्रभावी जाँच और संतुलन की व्यवस्था लागू थी। ग्राम स्तर पर पारंपरिक स्वशासन की संरचनाएँ प्रायः निर्बाध रूप से जारी रहीं।

अकबर ने मनसबदारी प्रणाली भी स्थापित की। अबुल फ़ज़ल ने अपनी पुस्तक आइन-ए-अकबरी में दर्ज किया है कि अकबर के प्रशासन में मनसबदारों (अधिकारियों) से अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने मनसब (पद) के अनुसार राज्य के लिए हाथियों, घोड़ों, ऊँटों और सैनिकों की एक निश्चित संख्या रखें। इससे, एक स्थायी केंद्रीकृत सेना बनाए बिना ही, अल्प सूचना पर सेना एकत्र करना संभव हो जाता था। नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित निरीक्षण किए जाते थे। मनसबदारों को सामान्यतः जागीर (भूमि) के रूप में भुगतान किया जाता था और इस कारण उन्हें जागीरदार भी कहा जाता था।

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चित्र 2.28 - अबुल फ़ज़ल की पांडुलिपि पेंटिंग, जिसमें वे अपने पूरे इतिहास को सामने रखकर एक छत पर बैठे हैं।

विभिन्न पंथों के प्रति अकबर की बढ़ती सहिष्णुता के बाद भी प्रशासन के उच्च स्तरों पर गैर-मुस्लिमों को अल्प संख्या में रखा गया था। उदाहरण के लिए, उनके प्रशासन में गैर-मुस्लिम अधिकारियों का कुल प्रतिशत शायद ही कभी एक-तिहाई से अधिक था और प्रायः इससे भी कम रहता था। यहाँ तक कि मुस्लिम अधिकारियों में भी विदेशी मूल के अधिकारियों को सामान्यतः भारतीय मूल के अधिकारियों पर प्राथमिकता दी जाती थी।

अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल ने एक कुशल राजस्व प्रणाली प्रारंभ की। उन्होंने फसलों की पैदावार और कीमतों का विस्तृत सर्वेक्षण किया और उस जानकारी के आधार पर प्रत्येक फसल के लिए मूल्य निर्धारित किए। उन्होंने पूरे साम्राज्य में भूमि का एक व्यवस्थित सर्वेक्षण भी आरंभ किया, जिससे राजस्व संग्रह में वृद्धि हुई और राज्य-तंत्र सुदृढ़ हुआ।

अगले अध्याय में हम एक अलग तरह के प्रशासन- मराठों के प्रशासन का अध्ययन करेंगे।

जन-जीवन

13वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य परिवर्तित राजनैतिक शक्तियों के बाद भी भारत ने अपनी कृषि प्रधान नींव, फलते-फूलते कारीगर उद्योगों, समुदाय और मंदिर-आधारित अर्थव्यवस्थाओं तथा व्यापक व्यापार नेटवर्क के कारण जीवंत आर्थिक गतिविधियों का अनुभव किया। श्रेणी (संघ), जाति (पेशेवर रूप से परिभाषित समुदाय) और ऋण प्रणालियों जैसी विकेंद्रीकृत आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं पर आधारित भारतीय उपमहाद्वीप विश्व के सबसे धनी क्षेत्रों में से एक बना रहा।

सल्तनत काल में बुनियादी ढाँचे में कुछ प्रगति हुई - विशेषकर उत्तर भारत में सड़क मार्गों, सेतुओं कुछ नहरों और अन्य सिंचाई कार्यों के निर्माण के साथ ही नए शहरों की स्थापना में भी। मुगल काल में इन सभी का और विस्तार हुआ। विभिन्न धातुओं और मूल्यवर्ग के सिक्के मुद्रा के रूप में प्रचलित थे। मुगलों ने एक अलग प्रणाली अपनाई जिसमें चाँदी का 'रुपया' और ताँबे का 'दाम' प्रचलन में था।

कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी। हम पहले ही देख चुके हैं कि शासक अपने प्रशासन और सैन्य बल को बनाए रखने के लिए कृषि राजस्व पर निर्भर रहते थे। साधारणतः उपज का पाँचवाँ भाग राजस्व के रूप में वसूला जाता था हालाँकि, कुछ सुल्तानों ने इसे आधे भाग तक बढ़ा दिया था। सिंचाई प्रणालियों के विस्तार ने कृषि उत्पादकता में वृद्धि की जिससे खाद्य (चावल, गेहूँ, जौ, दालें, गन्ना, मसाले आदि) और गैर-खाद्य (कपास, जिससे वस्त्र उत्पादन में उन्नति हुई; रेशम, ऊन, रंग, लकड़ी, जूट आदि) सहित अनेक फसलों का उत्पादन संभव हुआ। ध्यान देने योग्य है कि कृषि उत्पादन, क्षेत्र और काल के अनुसार भिन्न-भिन्न था। इस अवधि में किसानों को कई भीषण अकालों का सामना करना पड़ा और राहत की व्यवस्था किसी विशिष्ट शासक की उदारता पर निर्भर करती थी।

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चित्र 2.29 - खेतों की सिंचाई के लिए कुओं या तालाबों से पानी खींचने के लिए प्रयोग किया जाने वाला एक फारसी पहिया।

वस्त्रों के अतिरिक्त शिल्पकारों ने हथियारों से लेकर बर्तनों और आभूषणों तक अनेक प्रकार के उत्पाद बनाए। नदी एवं समुद्री व्यापार के लिए आवश्यक जहाज निर्माण इस अवधि में अत्यधिक विकसित हुआ। भारतीय वस्तुओं का निर्यात तटीय और नदी किनारे के नगरों, जैसे - कालीकट, मैंगलोर, सूरत, मसूलीपट्टनम और हुगली के माध्यम से किया जाता था। भारत जितना निर्यात करता था, उससे कहीं कम आयात करता था। आयातित वस्तुओं में रेशम, घोड़े, धातुएँ और विविध विलासिता की वस्तुएँ सम्मिलित थीं। अरब, फारस (वर्तमान ईरान) और मध्य एशिया के व्यापारी भारतीय बंदरगाहों में बस गए जिससे व्यापारिक गतिविधियों में तीव्र वृद्धि हुई।

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चित्र 2.30 - ताँबे की प्लेट पर अंकित विजयनगर के भूमि अनुदान आधुनिक संपत्ति प्रलेखों के समतुल्य।

हुंडी प्रणाली ने मुद्रा का भौतिक परिवहन किए बिना व्यापारियों को राजनैतिक सीमाओं के पार धन हस्तांतरित करने में सक्षम बनाया, जिससे वे लूटपाट के प्रति कम संवेदनशील हो गए। मारवाड़ी जैसे व्यापारी समुदाय विभिन्न राजनैतिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत काम करने में निपुण हो गए। उन्होंने ऋण और विश्वास की समानांतर प्रणालियाँ विकसित कीं जो आधिकारिक ढाँचों से स्वतंत्र रूप से कार्य करती थीं।

इसे अनदेखा न करें

हुंडी किसी व्यक्ति को भुगतान करने का एक लिखित निर्देश था। इसे राजनैतिक सीमाओं के पार ले जाया जा सकता था और यह आधुनिक बैंकिंग का अग्रदूत था जो मुद्रा ले जाने की आवश्यकता के बिना वित्तीय लेन-देन को संभव बनाता था। ये प्रणालियाँ शासक वर्गों की प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना ही व्यापार नेटवर्क में संचालित होती थीं।


आर्थिक गतिविधि के केंद्र के रूप में मंदिर

अनेक मंदिर न केवल पूजा, शिक्षा, सामाजिक संपर्क या प्रदर्शन कला के केंद्र थे, अपितु उन्होंने चहल-पहल भरे बाजारों वाले पारिस्थितिक तंत्र का भी निर्माण किया। शासक वर्ग मंदिर के देवताओं को भूमि और धन (दान) प्रदान करते थे, जिसे मंदिर प्रबंधकों द्वारा ट्रस्ट के रूप में रखा जाता था। ये प्रबंधक सामुदायिक बुनियादी ढाँचे (सिंचाई प्रणालियाँ, सरोवर आदि) और तीर्थयात्रियों के लिए आवास (धर्मशालाएँ एवं छत्रम) विकसित करते थे। मंदिर व्यापारी वर्ग को ऋण प्रदान करते थे और आंतरिक तथा समुद्री व्यापार को वित्तपोषित करते थे।

प्रारंभिक काल में जहाँ समृद्धि देखी गई, वहीं 1600 के दशक के उत्तरार्ध में आर्थिक संकट उभरने लगा। करों और बिचौलियों को भुगतान के बाद किसानों के पास प्रायः अपनी उपज का केवल एक छोटा भाग ही बचता था। इसके कारण कई किसानों को अपनी भूमि गँवानी पड़ी और वे बंधुआ मजदूर बन गए।

इतिहासकार बताते हैं कि शिल्पकारों और मजदूरों को भी प्रायः कठिन आर्थिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। भारत अभी भी एक समृद्ध देश था- जैसा कि कई अरब और यूरोपीय यात्रियों ने प्रमाणित किया है, किंतु धन-संपत्ति मुख्यतया शासकों, दरबारियों, उच्च अधिकारियों और व्यापारी वर्ग के हाथों में केंद्रित थी। इसके अतिरिक्त निरंतर होने वाले युद्धों के कारण जनसंख्या का बलात् विस्थापन हुआ।

सामान्य जन के स्तर पर, विशेष रूप से शासकों की अनुमति से अपवित्र या नष्ट किए गए पावन स्थलों को लेकर संघर्षों की घटनाएँ हुईं किंतु समग्र रूप से, विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक रहते थे और आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर थे।

भारत के अधिकांश शासकों ने कलाओं को संरक्षण दिया, समुदायों ने भी अपनी परंपराओं को बनाए रखने या पुनर्जीवित करने का प्रयास किया, जिनमें से अनेक परिवर्तनशील परिस्थितियों के अनुकूल ढल गईं। इन सांस्कृतिक परंपराओं के मध्य परस्पर क्रिया के परिणामस्वरूप एक साझा विरासत का निर्माण हुआ।

इन सबके मध्य, भारत आर्थिक रूप से समृद्ध रहा, किंतु प्रायः राजनैतिक रूप से अस्थिर रहा। राजनैतिक मानचित्र के बार-बार परिवर्तित होने वाले इस दौर में भारत ने गंभीर चुनौतियों का सामना किया, किंतु फिर भी वह बचा रहा। यह न केवल कठिनाइयों की अपितु सहनशीलता की भी कहानी है- जब अवसर आया तो शस्त्र के माध्यम से और कभी कला, साहित्य, अध्यात्म और कालातीत मूल्यों में नए सृजन के माध्यम से भी।

आगे बढ़ने से पहले...

  • इस काल में तुर्क, अफगान और मुगल सेनाओं के नेतृत्व में कई विदेशी आक्रमण हुए जिनसे व्यापक विनाश हुआ, पुराने राजवंशों का पतन हुआ और राज्यों व साम्राज्यों का उत्थान और पतन हुआ। निरंतर युद्ध, गठबंधनों और विजयों ने भारत की राजनैतिक सीमाओं को नया रूप दिया।
  • इस काल में धार्मिक असहिष्णुता की अनेक घटनाएँ हुईं। बौद्ध, जैन, हिंदू, सिख, पारसी और जनजातियों को समय-समय पर गंभीर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा हालाँकि, कुछ शासक दूसरों की तुलना में अधिक उदार थे।
  • कृषि और व्यापार का विस्तार हुआ, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था और विश्व के साथ संपर्क बढ़ा। फिर भी, आम जनता की आर्थिक स्थिति सामान्यतः दयनीय बनी रही।
  • भारतीय समाज ने कस्बों, नगरों, मंदिरों और अर्थव्यवस्था के अन्य पहलुओं के पुनर्निर्माण में अनुकूलनशीलता और लचीलापन दिखाया। साथ ही, उसने सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करने और नई सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के निर्माण के लिए देशी और विदेशी तत्वों को मिलाने के मार्ग खोजे। वास्तुकला, संगीत और चित्रकला सहित अनेक कला रूपों और सांस्कृतिक गतिविधियों का उत्कर्ष हुआ।

प्रश्न और क्रियाकलाप

  1. दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य की राजनैतिक रणनीतियों की तुलना कीजिए। इनमें क्या समानताएँ और भिन्नताएँ थीं?
  2. विजयनगर साम्राज्य और अहोम साम्राज्य जैसे अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक समय तक पराजित होने से कैसे बच सके? उनकी सफलता में किन भौगोलिक, सैन्य और सामाजिक कारकों का योगदान था?
  3. कल्पना कीजिए कि आप अकबर या कृष्णदेवराय के दरबार में एक विद्वान हैं। अपने किसी मित्र को पत्र लिखकर वहाँ की राजनीति, व्यापार, संस्कृति और समाज का वर्णन कीजिए।
  4. अकबर, जो अपनी युवावस्था में एक क्रूर विजेता था, कुछ वर्षों बाद कैसे सहिष्णु और दयालु हो गया? ऐसे परिवर्तन का क्या कारण हो सकता है?
  5. यदि विजयनगर साम्राज्य तालीकोटा का युद्ध जीत जाता तो क्या होता? कल्पना कीजिए और दक्षिण भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास पर उसके प्रभाव का वर्णन कीजिए।
  6. प्रारंभिक सिख पंथ द्वारा प्रचारित अनेक मूल्य जैसे समानता, सेवा और न्याय आज भी प्रासंगिक हैं। इनमें से किसी एक मूल्य का चयन कीजिए और चर्चा कीजिए कि यह समकालीन समाज में कैसे प्रासंगिक है।
  7. कल्पना कीजिए कि आप किसी बंदरगाह नगर (सूरत, कालीकट या हुगली) में एक व्यापारी हैं। वहाँ वस्तुओं, व्यापार करने वाले लोगों, जहाजों की आवाजाही आदि के संबंध में आप जो दृश्य देखते हैं, उनका वर्णन कीजिए।