अध्याय - 3
मराठा साम्राज्य का उदय
व्यापारियों में टोपीधारी पुर्तगाली, अंग्रेज, डच, फ्रांसीसी तथा डेनमार्क के लोग भी व्यापार करते हैं। परंतु ये अन्य व्यापारियों के समान नहीं हैं। उनका पूरा ध्यान इस देश में प्रवेश करने, अपना क्षेत्र विस्तृत करने और अपने धर्म का प्रचार करने में ही प्रवृत्त है। वे स्वभाव से हठी हैं तथा नौसेना और बारूद ही इनके मुख्य हथियार हैं। इनके आवागमन पर नियंत्रण रखना आवश्यक है और इन्हें सुदृढ़ भवनों के निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
– रामचंद्रपंत अमात्य, आज्ञापत्र (1715)

महत्वपूर्ण प्रश्न
- मराठा कौन थे? वे ब्रिटिश शासन स्थापित होने से पूर्व भारतवर्ष की सबसे बड़ी अखिल भारतीय शक्ति कैसे बने?
- उनके शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
- भारतीय इतिहास पर मराठा साम्राज्य का क्या प्रभाव पड़ा?

मराठा कौन थे?
मराठा दक्कन पठार, विशेष रूप से वर्तमान महाराष्ट्र के निवासियों का एक समूह है। वे मराठी भाषा बोलते हैं। इस भाषा का 12वीं शताब्दी से एक सतत प्रवाहमान और समृद्ध साहित्यिक इतिहास रहा है। इस अध्याय में हम यह अध्ययन करेंगे कि किस प्रकार मराठा शक्तिशाली राजनैतिक सत्ता के रूप में उभरे जिन्होंने भारत के इतिहास की दिशा को निर्णायक रूप से परिवर्तित किया।


13वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के अधिकांश भाग पर यादव वंश का आधिपत्य था। तब इनकी राजधानी देवगिरि (दौलताबाद) थी। 14वीं शताब्दी के आरंभ में दिल्ली की खिलजी सल्तनत ने यादव वंश को परास्त कर दिया।

ऐसे राजनैतिक परिवर्तनों के मध्य सांस्कृतिक परंपराएँ निरंतर प्रवाहमान रहीं, विशेष रूप से वे परंपराएँ जो भक्ति (ईश्वर या किसी विशिष्ट देवता के प्रति समर्पण) से संबंधित थीं। 7वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य, भारत के विभिन्न क्षेत्रों के संतों और साधकों ने आध्यात्मिक उत्थान के लिए बाह्य अनुष्ठानों की अपेक्षा भक्ति-मार्ग को अधिक महत्व प्रदान किया। समाज के विविध वर्गों से आने वाले इन संतों ने लोकभाषाओं में भक्ति-गीतों और काव्यों की रचना की जिससे उनके विचार दूर-दूर तक पहुँचे।
आइए पता लगाएँ
क्या आपने कभी 'भक्ति' शब्द सुना है? आपके लिए इसका क्या अर्थ है? भारत के किसी भी भक्ति संत का चयन कर उनके जीवन, उपदेशों और संदेशों का अध्ययन कीजिए। आप उनकी कोई कविता या भजन ढूँढ़कर उसे अपने सहपाठियों के साथ साझा कीजिए।
महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, रामदास आदि अनेक संत इस कालखंड में लोकप्रिय हुए। उन्होंने उपनिषदों और भगवद्गीता जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों का मराठी में अनुवाद कर इनमें निहित दार्शनिक ज्ञान को जनसामान्य के लिए सुलभ बनाया। कुछ संतों ने सिख गुरुओं की भाँति सामाजिक संगठन और राजनैतिक चेतना के संवर्धन पर भी विशेष बल दिया। परिणामस्वरूप समाज को एक सुदृढ़ सांस्कृतिक आधार प्राप्त हुआ जिसने आगे चलकर मराठों को एक राजनैतिक शक्ति के रूप में संगठित होने में सहायता की।
17वीं शताब्दी तक कुछ मराठा सरदारों ने स्वराज्य की स्थापना करने के आरंभिक प्रयत्न किए। वे तभी सफल हुए जब शिवाजी सत्ता में आए और उन्होंने मराठों को एकत्रित कर संगठित किया। परंतु शिवाजी कौन थे?
मराठा शक्ति की स्थापना और शिवाजी का उदय
1630 में शिवाजी का जन्म भोंसले कुल में शाहजी और जीजाबाई के यहाँ हुआ। उस समय शाहजी दक्कन की सल्तनतों की सेवा में संलग्न थे और प्रायः अपने परिवार से दूर रहते थे। इस बीच उनकी जागीर पुणे में शिवाजी का लालन-पालन जीजाबाई और कुछ विश्वस्त अधिकारियों की देख-रेख में हुआ, जहाँ उन्हें उत्तम संस्कार और अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई। उसी काल में, दक्कन के सुल्तानों के मध्य होने वाले निरंतर पारस्परिक संघर्षों से पुणे गंभीर रूप से प्रभावित था।
16 वर्ष की आयु में ही शिवाजी ने सैन्य अभियान आरंभ किया। पहले उपेक्षित और निर्जन दुर्गों पर कब्जा करके उनकी सुरक्षा को सुदृढ़ बनाया और पुणे पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। एक स्वतंत्र राज्य या 'स्वराज्य' की उनकी कल्पना आगामी वर्षों में और विकसित हुई, जो राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्षों तक विस्तृत थी। इसी का अन्वेषण हम इस अध्याय में करेंगे।

शिवाजी का राज्य शीघ्र ही भारत के पश्चिमी तट तक विस्तृत हो गया। तटीय क्षेत्रों के संसाधनों पर अधिकार तथा उन तक सुगम पहुँच सुनिश्चित करने के लिए उन्हें नौसेना स्थापित करना अनिवार्य लगा। उस समय यह वास्तव में एक नितांत क्रांतिकारी कदम था। तुलना करें तो बीजापुर सल्तनत (आदिलशाही वंश) के पास व्यापारी जहाज तो थे, परंतु तटरक्षा के लिए कोई पूर्णकालिक स्थायी नौसेना नहीं थी। यहाँ तक कि मुगल साम्राज्य में भी नौसेना का उपयोग अत्यंत सीमित था। इस प्रकार मराठा नौसेना का उदय हुआ, जिसकी वीरगाथाएँ कालांतर में इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय बन गईं।

अपनी प्रजा को शक्तिशाली शत्रुओं से सुरक्षित रखने के लिए शिवाजी ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। इस युद्ध पद्धति में छोटे-छोटे दल किसी भूभाग के गहन ज्ञान के आधार पर तीव्र गति से आकस्मिक आक्रमण कर शत्रुओं की विशाल सेना को परास्त कर देते हैं। शीघ्र ही उनकी सफलताओं से बीजापुर का सुल्तान विचलित हो उठा और उसने अपने अनुभवी सेनापति अफज़ल खाँ को शिवाजी का सामना करने भेजा। शिवाजी और उनके सलाहकारों ने अफज़ल खाँ को घने जंगलों के बीच प्रतापगढ़ किले की तलहटी में व्यक्तिगत भेंट के लिए सहमत कर लिया। वहाँ शिवाजी ने अफजल खाँ का वध कर दिया और पहाड़ों में छिपे मराठों ने गुरिल्ला आक्रमणों से अफज़ल खाँ की सेना को परास्त कर दिया।
आइए पता लगाएँ
यदि आप भूतकाल में यात्रा करके शिवाजी से मिल सकें तो आप उनसे कौन-से तीन प्रश्न पूछेंगे और क्यों?
इसे अनदेखा न करें
'वाघ-नख' एक छोटा अस्त्र है, जो बाघ के पंजे के समान आकार का होता है जिसका उपयोग शिवाजी ने निकट युद्ध में अफजल खाँ को मारने के लिए किया था।

आइए पता लगाएँ
गुरिल्ला युद्ध के बारे में अधिक जानने का प्रयास करें। दुनिया के अन्य किन देशों में यह - पद्धति अपनाई गई? उन्होंने इसके लिए किन भौगोलिक लाभों का उपयोग किया? अपने निष्कर्षों पर समूहों में चर्चा करें।
इसके पश्चात, मुगल सरदार शाइस्ता खाँ ने एक विशाल सेना के साथ तीन वर्षों तक शिवाजी के क्षेत्रों पर आक्रमण किया। अंततः केवल कुछ सैनिकों के साथ शिवाजी ने रात्रि में शाइस्ता खाँ के शिविर पर हमला किया। शाइस्ता खाँ इस हमले से बाल-बाल बच गया किंतु अपनी कुछ अंगुलियाँ गँवा बैठा और वह तुरंत महाराष्ट्र छोड़कर चला गया। यह साहसिक आक्रमण आधुनिक सर्जिकल स्ट्राइक के समान है।
तीन वर्षों तक चले आक्रमणों के प्रतिशोध में शिवाजी ने मुगल साम्राज्य के एक समृद्ध बंदरगाह सूरत (गुजरात) पर आक्रमण किया। वहाँ से उन्हें लगभग एक करोड़ रुपये मूल्य का विशाल खजाना प्राप्त हुआ, जो उस समय के लिए एक बहुत बड़ी राशि थी। उन्होंने धार्मिक स्थलों पर आक्रमण न करने का ध्यान रखा और यहाँ तक कि एक दानवीर व्यक्ति मोहनदास पारेख के घर को सुरक्षित रखा। उन्होंने कुछ वर्षों के बाद सूरत पर पुनः आक्रमण किया। ये घटनाएँ इतनी प्रसिद्ध हो गईं कि उस समय के एक अंग्रेजी समाचारपत्र 'लंदन गजट' में छपी। इसमें बताया गया कि कैसे शिवाजी ने सूरत में सभी यूरोपीय राजनयिक प्रतिनिधियों को पत्र लिखकर 'तुरंत धन की भेंट' की माँग की थी, अथवा 'वापस आकर उस शहर को नष्ट कर देने' की चेतावनी दी।
सूरत पर आक्रमण मुगल साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा का घोर अपमान था। इसलिए औरंगजेब ने शिवाजी को पराजित करने के लिए एक प्रतिष्ठित राजपूत सेनापति जय सिंह को भेजा। उसके विरुद्ध, शिवाजी को पुरंदर दुर्ग (पुणे के समीप) में हार मानकर संधि करनी पड़ी। उन्हें अपने साम्राज्य का एक बड़ा भाग छोड़ना पड़ा और उनके पुत्र संभाजी को मुगल सेवा में प्रवेश करना पड़ा।
जय सिंह के प्रयासों से शिवाजी आगरा स्थित मुगल दरबार में उपस्थित होने के लिए सहमत हुए, जहाँ उन्हें औरंगजेब और उस मुगल वजीर के सामने खड़ा किया गया जिसे शिवाजी पहले पराजित कर चुके थे। इस अपमान से क्रोधित होकर शिवाजी उसके दरबार से बाहर निकल गए। इस घटना के बाद औरंगजेब ने उन्हें नजरबंद कर दिया। इस स्थिति से मुक्ति पाने के लिए शिवाजी ने एक रणनीति बनाई। उन्होंने संत-महात्माओं और मुगल सरदारों को उपहार भेजने आरंभ कर दिए। उपहारों में प्रायः फल और मिष्ठान्न होते थे जो बड़ी-बड़ी टोकरियों में भरे होते थे। पहरेदारों ने आरंभ में तो उन उपहारों की जाँच की किंतु शीघ्र ही ऐसा करना बंद कर दिया। शिवाजी को मुगल पहरेदारों से यही अपेक्षा थी। इसी अवसर का लाभ उठाते हुए शिवाजी ने अपने पुत्र संभाजी सहित स्वयं को टोकरियों में छिपाकर सफलतापूर्वक अपने आप को मुक्त किया। इसके उपरांत औरंगजेब फिर कभी शिवाजी को पकड़ पाने में सफल न हो सका।

कुछ वर्षों के पश्चात 1674 में रायगढ़ के सुदृढ़ पर्वतीय दुर्ग में शिवाजी का राज्याभिषेक पूर्ण वैदिक विधि-विधान से संपन्न हुआ। राज्याभिषेक के उपरांत उनकी औपचारिक उपाधि 'श्री राजा शिव छत्रपति' स्थापित हुई। कुछ पूर्ववर्ती शासकों की भाँति उन्होंने अपनी नवीन संवत् प्रणाली 'राज्याभिषेक शक्' का आरंभ किया।
राज्याभिषेक के पश्चात शिवाजी ने दक्षिण दिशा की विजय यात्रा आरंभ की जिसे 'दक्षिण-दिग्विजय' भी कहा जाता है। उन्होंने उत्तरी तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ महत्वपूर्ण भागों एवं अल्प संरक्षित क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की (चित्र 3.9 के मानचित्र को देखिए)। इस दक्षिणी विस्तार ने आगे चलकर मराठों को मुगल आक्रमण के विरुद्ध रणनीतिक रूप से उल्लेखनीय सामरिक सुदृढ़ता प्रदान की।
इसे अनदेखा न करें
दक्षिण में रहते हुए शिवाजी ने डच व्यापारियों के दास व्यापार को निषेध कर दिया। उस समय अधिकांश यूरोपीय व्यापारी भारतीयों को दास बनाकर बेच रहे थे तथा इस अमानवीय प्रथा का भारतीय शक्तियों की ओर से कोई विरोध नहीं किया गया था। किंतु शिवाजी के हस्तक्षेप ने इस प्रथा को चुनौती दी। दास व्यापार के विरुद्ध उनका यह पक्ष अपनी प्रजा के प्रति उनकी गहन संवेदनशीलता एवं संरक्षण-भाव का स्पष्ट प्रमाण है।

विजयनगर साम्राज्य के उत्तर में (चित्र 2.12 देखें) बहमनी सल्तनत एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थीं, जो अंततः पाँच स्वतंत्र राज्यों- बीजापुर, गोलकुंडा, बरार, अहमदनगर एवं बीदर में विभाजित हो गई, जिन्हें 'दक्कन सल्तनतें' कहा गया। प्रत्येक राज्य पर वहाँ के पूर्व प्रशासक अथवा 'तरफदार' शासन करने लगे, जिन्होंने स्वायत्तता की घोषणा कर दी थी। विजयनगर शासकों का प्रथम दो सल्तनतों के साथ ही पूर्व की ओर ओडिशा के गजपति शासकों से भी संघर्ष हुआ।
पचास वर्ष की आयु में एक भीषण ज्वर के कारण शिवाजी का देहावसान हो गया। वे एक अद्वितीय रणनीतिकार तथा दूरदर्शी व्यक्ति थे। उनके जीवन काल में ही उनके पराक्रम की गाथाएँ संपूर्ण भारतवर्ष में एवं विदेशों में प्रसिद्ध हो गई थीं। यूरोपीय लोग उनकी तुलना सिकंदर जैसे महान सेनापतियों से करते थे। बुंदेला राजकुमार छत्रसाल मुगलों के विरुद्ध शिवाजी के संघर्ष से इतने प्रेरित हुए कि उन्होंने बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभक्त) नामक एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। सुप्रसिद्ध हिंदी कवि भूषण विशेष रूप से शिवाजी से मिलने के लिए महाराष्ट्र गए थे और तदनंतर उनके गुणगान में उन्होंने अनेक काव्य रचनाएँ कीं, जिनमें से अनेक आज भी जनमानस में प्रसिद्ध हैं।
आइए पता लगाएँ
शिवाजी के जीवन की किसी एक घटना का चयन कीजिए और अपने सहपाठियों के साथ मिलकर नाटक के रूप में उसका मंचन कीजिए।
शिवाजी के पश्चात मराठा
शिवाजी के दो पुत्र थे- संभाजी और राजाराम। शिवाजी के निधन के उपरांत संभाजी छत्रपति बने। उस समय दक्कन पर मुगलों के पूर्ण नियंत्रण में मराठे ही एकमात्र बाधक थे। औरंगजेब ने दक्कन पर हमला कर बीजापुर (आदिलशाही) और गोलकुंडा (कुतुबशाही) सल्तनतों को जीत लिया। फिर उसने संभाजी को बंदी बनाकर उन्हें क्रूर और असह्य यातनाएँ देकर मार डाला। इसके बाद उसने मराठाओं की राजधानी रायगढ़ पर अधिकार कर लिया।
संभाजी के पश्चात राजाराम छत्रपति बने और शीघ्र ही तमिलनाडु स्थित जिंजी की ओर प्रस्थान कर गए। इस प्रकार मुगल-मराठा संघर्ष का विस्तार दक्षिण भारत तक हुआ। मराठों ने अपने दुर्गों की दृढ़ता से रक्षा की और अनेक युद्धों और संघर्षों में प्रायः मुगलों पर भारी पड़े। फलस्वरूप औरंगजेब दक्कन से निकलने में असमर्थ रहा और मराठों को परास्त किए बिना ही मर गया। औरंगजेब की मृत्यु के उपरांत मराठे एक सुदृढ़ शक्ति के रूप में उभरे। अब वे रक्षात्मक स्थिति में न रहकर आक्रामक हुए। छत्रपति राजाराम की रानी ताराबाई के नेतृत्व में मराठों ने मुगल क्षेत्र पर भारी आक्रमण किया और भारतवर्ष के बड़े भाग पर विजय प्राप्त कर अपना अधिकार स्थापित किया।
तीव्रता से हुए इस विस्तार के मध्य मराठों में भी संरचनात्मक परिवर्तन हुए। शिवाजी के काल का केंद्रीकृत राज्य धीरे-धीरे अधिक विकेंद्रीकृत रूप लेने लगा। यद्यपि नाममात्र रूप से छत्रपति ही केंद्र में बने रहे, परंतु प्रादेशिक सरदार अधिक शक्तिशाली हो गए।
विशेषतया पेशवा (प्रधानमंत्री के लिए फारसी शब्द) का प्रभाव इतना प्रबल हुआ कि स्वयं छत्रपति पर भी यह हावी रहने लगा। पेशवा बाजीराव प्रथम और उनके पुत्र नानासाहेब पेशवा ने मराठों के अखिल भारतीय विस्तार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मराठों ने भारत के विशाल भूभाग को अपने अधीन कर लिया और सामान्यतः उस पर सुशासन किया। तथापि क्षेत्रीय सरदारों को अधिक शक्ति और स्वायत्तता के परिणामस्वरूप उनके द्वारा कभी-कभी अनुशासनहीनता और दुर्व्यवहार भी हुए जो शिवाजी के मूल्यों से बिल्कुल विपरीत थे। उदाहरण के लिए, बंगाल में मराठों के दस वर्षीय अभियान जनता के लिए अत्यधिक क्रूर और विनाशकारी सिद्ध हुए।
उत्तर की ओर अपने विस्तार के चलते मराठों ने कुछ समय के लिए लाहौर, अटक और यहाँ तक की पेशावर (पाकिस्तान) पर भी अधिकार स्थापित कर लिया। उन्होंने अफगानों से युद्ध किए और 1761 में पानीपत में महाविनाशकारी पराजय के उपरांत भी पेशवा माधवराव प्रथम के शासनकाल में मराठे शीघ्र ही सशक्त हो उठे। महादजी शिंदे (महादजी सिंधिया) के नेतृत्व में उन्होंने 1771 में दिल्ली पर पुनः अधिकार स्थापित किया। दिल्ली अग्रिम तीन दशकों तक मराठों के नियंत्रण में रही। तदनंतर अंग्रेजों ने इस पर अधिकार कर लिया।
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में अंग्रेजों के मुख्य प्रतिद्वंद्वी मराठे ही थे। 1775 से 1818 के मध्य तीन आंग्ल-मराठा युद्ध हुए। मराठों में बढ़ते आंतरिक कलह और विघटन एवं अंग्रेजों की उत्तम संगठनात्मक क्षमता और तकनीकी श्रेष्ठता के कारण अंततः मराठा शक्ति का समापन हुआ। वस्तुतः अंग्रेजों ने भारत को मुगलों एवं किसी अन्य शक्ति की तुलना में मराठों से अधिक प्राप्त किया।
इसे अनदेखा न करें
क्या आप जानते हैं कि पेशवाओं के अधीन एक शक्तिशाली अधिकारी नाना फड़णवीस को पहला अखिल भारतीय ब्रिटिश-विरोधी गठबंधन बनाने का श्रेय दिया जाता है? उन्होंने इस प्रयास में मैसूर के हैदर अली और हैदराबाद के निजाम जैसे पुराने विरोधियों को भी एकजुट किया था।

मराठा प्रशासन
नागरिक प्रशासन
शिवाजी ने अपने राज्य के लिए अपेक्षाकृत केंद्रीकृत प्रशासन की स्थापना की। उन्होंने वंशानुगत पद (जो सामान्यतः सुल्तानों या मुगलों के अधीन प्रचलित थे) और भूमि आवंटन समाप्त कर दिया और राज्य कोष से प्रत्येक राजकीय अधिकारी को वेतन दिया। कई अधिकारियों का समय-समय पर स्थानांतरण भी किया जाता था जिससे सुनिश्चित हो सके कि उनके पास राजा पर अपनी शर्तें थोपने की पर्याप्त शक्ति न हो।

शिवाजी ने युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की विधवाओं को पेंशन भी दी, यहाँ तक कि उनके पुत्रों को सैन्य पद भी दिए। इस प्रकार उन्होंने सैनिकों और उनके परिवारों के प्रति अपनी संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का परिचय दिया।
आइए विचार करें
शिवाजी ने अपने अधिकारियों को कठोर निर्देश दिए थे कि वे अपनी प्रजा के साथ दुर्व्यवहार न करें और न ही उनसे बलपूर्वक घास का एक तिनका भी छीनें। अपने अधिकारियों को लिखे एक पत्र में शिवाजी कहते हैं-
"नौसेना के लिए सागौन जैसे बड़े वृक्षों की लकड़ियाँ आवश्यक हैं। आवश्यकता हो तो जंगल से पेड़ काटने की अनुमति ले लो और आगे बढ़ो। आम और कटहल जैसे अन्य वृक्ष भी उपयोगी हैं, किंतु उन्हें मत छुओ क्योंकि ऐसे पेड़ों को बढ़ने में कई वर्ष लगते हैं और लोग उनकी देखभाल अपने बच्चों की तरह करते हैं। यदि तुम उन्हें काट दोगे, तो क्या उनका दुःख कभी समाप्त होगा? अगर तुम दूसरों पर अत्याचार करके कुछ प्राप्त करते हो, तो वह अत्याचारी के साथ-साथ शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। ऐसे वृक्षों के अभाव में हानि भी होती है। इसलिए किसी भी परिस्थिति में बल का प्रयोग मत करो।"शिवाजी के पत्र के आधार पर आप एक शासक के रूप में उनके मूल्यों के बारे में क्या कह सकते हैं?
शिवाजी के प्रशासन में सहायता के लिए 'अष्टप्रधान मंडल' या आठ मंत्रियों की परिषद् (चित्र 3.14) भी थी।

मराठे प्रायः उन प्रांतों से चौथ (25 प्रतिशत) और सरदेशमुखी (चौथ के अतिरिक्त 10 प्रतिशत) नामक कर वसूलते थे, जो प्रत्यक्ष रूप से उनके अधीन नहीं थे। इनमें दक्कन और उत्तर भारत के प्रदेश भी सम्मिलित थे। बदले में मराठे उन प्रांतों की रक्षा करते थे और उनके आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करते थे। मुगलों ने भी विभिन्न संधियों के माध्यम से इस व्यवस्था को स्वीकृति दी और समय के साथ इनमें से कुछ प्रांत मराठा साम्राज्य का भाग बन गए।
इसे अनदेखा न करें
18वीं शताब्दी में मराठों ने प्रायः मुगल-मुद्राशैली को उसकी लोकप्रियता के कारण अपनाया किंतु साथ ही उसमें अपने सांस्कृतिक प्रतीक भी जोड़े। उदाहरण के लिए, यह दुर्लभ मराठा सिक्का जिसे 'गणपति-पंतप्रधान रुपया' के नाम से जाना जाता है, 19वीं शताब्दी के आरंभ में पटवर्धनों (पेशवा के अधीन सेनानायक) द्वारा ढाला गया था। इस सिक्के पर देवनागरी और फारसी, दो लिपियों में लेख उत्कीर्ण हैं। एक ओर गणपति (गणेश) का आवाहन है जबकि दूसरी ओर पेशवा (जिसे मराठी में 'पंतप्रधान' कहा जाता था) के प्रति निष्ठा की घोषणा की गई है।

सैन्य प्रशासन
मराठा सशस्त्र सेना तीन अंगों में विभाजित थी- पैदल सेना, घुड़सवार सेना और नौसेना। घुड़सवार सेना दो प्रकार के सैनिकों से बनी थी- 'बारगीर', जिनके घोड़ों और उपकरणों का भुगतान राज्य द्वारा किया जाता था और 'शिलेदार', जिनके घोड़ों और उपकरणों का भुगतान स्वयं सैनिक करते थे। 18वीं शताब्दी में मराठों ने यूरोपीय शैली के अनुशासित सैनिकों और तोपखाने की श्रेष्ठता देखी और उन्होंने ऐसे सैनिक तैयार और भर्ती करने का प्रयास किया। विशेष रूप से, महादजी शिंदे के पास एक विशाल यूरोपीय शैली की सेना थी।
तलवार और भाले मराठों के पसंदीदा हथियार थे (चित्र 3.16)। यद्यपि वे बड़ी संख्या में बंदूकों का भी उपयोग करते थे। शिवाजी के समय से ही सैन्य अभियानों में रॉकेटों का उपयोग किया जाता रहा है और 1770 तक धातु- नलिकाओं वाले रॉकेटों का भी उपयोग होने लगा था।
जैसा कि हमने पहले देखा, आरंभमें मराठा शक्ति के मुख्य आधार दुर्ग थे। शिवाजी ने बड़ी संख्या में दुर्गों पर नियंत्रण किया और उनका निर्माण भी कराया क्योंकि ये सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मार्गों पर नियंत्रण और छापामार युद्ध के दौरान सेना को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक थे।शिवाजी के वित्तमंत्री रामचंद्रपंत अमात्य ने अपनी कृति आज्ञापत्र (राजकीय आदेश) में बताया है-

"दुर्ग राज्य का आधार हैं। उनके अभाव में बाह्य आक्रमण क्रमण के समक्ष राज्य नष्ट हो जाता है। इसलिए सभी पूर्व राजाओं ने दुर्गों का निर्माण करके देश को सुरक्षित किया। यह राज्य (मराठा साम्राज्य) स्वर्गीय महान गुरु [शिवाजी] द्वारा केवल दुर्गों से ही बनाया गया था। औरंगजेब जैसे दुर्जेय शत्रु ने [इस राज्य पर] आक्रमण करके, बीजापुर और भागनगर जैसे महान साम्राज्यों को जीता [... किंतु] दुर्गों के कारण ही [मराठा] राज्य दशकों के प्रचंड आघातों के बाद भी सुरक्षित रह सका।"
समुद्री वर्चस्व
जैसा कि हमने देखा, शिवाजी ने पश्चिमी तट की सुरक्षा के लिए एक नौसेना का गठन किया। 18वीं शताब्दी में कान्होजी आंग्रे ने कुशल भूगोल-ज्ञान और युद्धनीति के चतुर प्रयोग से मराठों को अनेक नौसैनिक युद्धों में विजय दिलाई, जबकि मराठा पोत यूरोपीय पोतों जैसे तकनीकी रूप से उन्नत नहीं थे।
उस समय भारत में यूरोपीय लोगों की मुख्य शक्ति उनकी नौसेनाएँ थीं। वे भारतीयों उस समय भारत में यूरोपीय लोगों की मुख्य शक्ति उनकी नौसेनाएँ थीं। वे भारतीयों को मूल्य देकर अपने नौसैनिक व्यापार-पत्र (पुर्तगाली में कार्ताज) खरीदने के लिए विवश करते थे। बिना पत्र वाले किसी भी जहाज को जब्त कर लिया जाता था। मराठों ने इस प्रथा को चुनौती दी और स्वयं यूरोपीय लोगों से पत्र माँगना आरंभ कर दिया। यूरोपियों ने कान्होजी आंग्रे को 'समुद्री डाकू' कहकर अपनी हताशा व्यक्त की !

इसे अनदेखा न करें
1665 में शिवाजी के बेड़े के चार पोत ओमान की राजधानी मस्कट पहुँचे। वहाँ के शासक ने उन्हें पकड़ लिया और उन पर सवार लोगों को बंदी बना लिया। उसने शिवाजी की तटीय संपत्ति पर हमला करने के लिए कुछ पोत भी तैयार कर लिए। किंतु जब उसे पता चला कि शिवाजी की नौसेना में सौ से अधिक पोत हैं, तब वह अपने पोतों के साथ बंदरगाह में पीछे हट गया।
न्याय व्यवस्था
मराठों की न्याय व्यवस्था कुशल थी, जो मृत्युदंड का संयमित प्रयोग करने के लिए उल्लेखनीय थी। पंचायत (आज के सरकारी पंचायती निकाय से भिन्न) स्थानीय अधिकारियों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों का एक समूह था, जो न्याय वितरण का मुख्य अंग था। असंतोषजनक निर्णय की स्थिति में मराठा सरदार के समक्ष अपील की जा सकती थी। इसके अतिरिक्त पुणे, इंदौर आदि प्रमुख नगरों में कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए कोतवाल या पुलिस भी तैनात की गई थी।
व्यापारिक तंत्र
शिवाजी ने व्यापार को प्रोत्साहित किया और स्वयं समुद्री विदेशी व्यापार में सक्रिय रूप से भाग लिया। उनके और उनके अधिकारियों के पास अपने पोत थे, जिन्हें वे नियमित रूप से यमन के मोचा, ओमान के मस्कट और मलेशिया के मलक्का जैसे दूरस्थ बंदरगाहों पर भेजते थे। इनमें से कुछ पोतों का उपयोग सोना, वस्त्र आदि माल के व्यापार के लिए होता था।
सड़कों का निर्माण और रख-रखाव किया गया। 18वीं शताब्दी में ओडिशा जैसे स्थानों में नदी परिवहन के लिए नौकाओं का तंत्र स्थापित किया गया। नदियों और छोटी जलधाराओं पर पुल बनाए गए।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान
मराठों ने भारत के सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शिवाजी का स्वराज्य दृष्टिकोण उनकी मुहर में स्पष्ट प्रकट होता है। इसमें एक संस्कृत अभिलेख अंकित था, जो प्रचलित फारसी मुहरों से भिन्न था- "शाहजी के पुत्र शिवाजी की यह मुहर (अर्थात अधिकार) विश्व द्वारा पूजित है जो नवचंद्र की भाँति बढ़ते हुए जनता के कल्याण के लिए राज करती है।"

शिवाजी ने मराठी भाषा के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से राज्य-व्यवहार-कोष नामक एक ग्रंथ भी लिखवाया। इसमें राजनयिक आदान-प्रदान में प्रयुक्त होने वाले प्रचलित फारसी शब्दों के संस्कृत पर्याय दिए गए। परिणामस्वरूप मराठा कूटनीति में विदेशी शब्दों का प्रयोग बहुत कम हो गया। शिवाजी एक धर्मनिष्ठ हिंदू थे, जो अपने धर्म का पालन करते हुए अन्य धर्मों का भी सम्मान करते थे। उनके भगवा ध्वज को सभी मराठों ने अपनाया। उन्होंने अपवित्र किए गए मंदिरों का पुनर्निर्माण किया तथा संस्कृत एवं मराठी साहित्य, धार्मिक संस्थाओं और पारंपरिक कलाओं को प्रोत्साहित किया।
संभवतः उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति और मूल्यों के पुनरुत्थान में सबसे अधिक योगदान दिया। उन्होंने लोगों को यह दिखाया कि शक्तिशाली राज्यों और साम्राज्यों को पराजित किया जा सकता है और मराठा अपने साम्राज्य का निर्माण, विस्तार और प्रशासन कर सकते हैं।
शक्तिशाली मराठा महिलाएँ
ताराबाई, एक निडर मराठा योद्धा रानी थीं जिन्होंने अपने पति राजाराम की मृत्यु के पश्चात 18वीं शताब्दी के आरंभ में शासन किया। यह अनुभव करते हुए कि दक्कन में औरंगजेब और मुगल सेना की उपस्थिति के कारण उत्तर भारत असुरक्षित था। उन्होंने विशाल मराठा सेनाओं का गठन किया और उन्हें उत्तर में मुगल क्षेत्रों पर आक्रमण करने के लिए भेजा। इस अर्थ में, वह उत्तर में मराठा विस्तार की सूत्रधार थीं। उनकी सैन्य रणनीति की समझ और दृढ़ता ने मुगल साम्राज्य को परास्त किया और एक कठिन समय में मराठा स्वतंत्रता की रक्षा की।

अहिल्याबाई होलकर, होलकर राजवंश की उत्तराधिकारिणी थी, जो उत्तर भारत में मराठा विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रमुख कुलों में से एक था। 18वीं शताब्दी में इस राजवंश ने मध्य भारत में, वर्तमान इंदौर के आस-पास एक विशाल क्षेत्र पर शासन किया। अपने पति और पुत्र को खोने के उपरांत भी उन्होंने तीस वर्षों तक धैर्य एवं साहसपूर्वक शासन किया। उन्होंने प्रजा का ध्यान रखते हुए बुद्धिमानी से प्रशासन चलाया। अहिल्याबाई एक धर्मपरायण महिला थीं। उन्होंने उत्तर में केदारनाथ से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक समस्त भारत में सैकड़ों मंदिरों, घाटों, कुओं तथा मार्गों का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया।

यह प्रसिद्ध है कि उन्होंने वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया, जिसे औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था तथा गुजरात में सोमनाथ मंदिर का, जिसे महमूद गज़नी ने ध्वस्त कर दिया था। अहिल्याबाई होलकर को मध्य प्रदेश में महेश्वर बुनाई उद्योग को बढ़ावा देने और पारंपरिक हथकरघा शिल्प को पुनर्जीवित करने का श्रेय भी दिया जाता है, जो आज भी फल-फूल रहा है।
इसे अनदेखा न करें
मोडी लिपि (देवनागरी का एक तिर्यक रूप) मराठों द्वारा पत्राचार के लिए उपयोग की जाने वाली मुख्य लिपि थी।

शिवाजी का आदर्श उनके उत्तराधिकारियों को निरंतर प्रेरणा देता रहा। उदाहरण के लिए, नागपुर के भोंसले स्थानीय संस्कृति और परंपरा के उत्साही समर्थक के रूप में उभरे और पुरी (ओडिशा) में भगवान जगन्नाथ की पूजा, जो मुगल शासन में प्रायः बाधित रहती थी, मराठों के संरक्षण से पुनर्जीवित हुई। संभवतः सबसे प्रभावशाली योगदान कुछ विशिष्ट मराठा महिलाओं का था। आइए, उनमें से दो के विषय में जानते हैं (पिछला पृष्ठ देखें)।
तंजावुर
आइए, सांस्कृतिक योगदान के एक अन्य उदाहरण को देखने के लिए दक्षिण की ओर चलें। शिवाजी के सौतेले भाई, एकोजी ने 17वीं शताब्दी के अंत में तंजावुर (तमिलनाडु) पर विजय प्राप्त की। इससे इस क्षेत्र में मराठा शासन का आरंभ हुआ। तंजावुर के मराठों ने विशेष रूप से एक समृद्ध और नवीनता से परिपूर्ण समन्वयकारी संस्कृति के निर्माण में योगदान दिया। वे कला के महान संरक्षक थे तथा कई शासक स्वयं कवि और नाटककार थे।

आइए पता लगाएँ
क्या आपने 'भरतनाट्यम' नृत्यशैली के विषय में सुना है? क्या आप जानते हैं कि इस नृत्यशैली का मराठाओं से गहरा संबंध है? क्या आप यह ज्ञात कर सकते हैं कि यह संबंध क्या था?
तंजावुर के सभी मराठा शासकों में सरफोजी द्वितीय का योगदान सबसे उल्लेखनीय है। वे कई भारतीय और यूरोपीय भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने देवेंद्र कुर्वंजी नामक एक मराठी नाटक लिखा जिसमें उन्होंने तत्कालीन विश्व भूगोल का विस्तार से वर्णन किया है। सरफोजी ने अनेक प्रतिभाशाली संगीतकारों को संरक्षण दिया। उनके काल में ही आधुनिक कर्नाटक संगीत का विकास हुआ तथा प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यशैली भरतनाट्यम के प्रारंभिक चरण विकसित हुए।

सरफोजी की चिकित्सा विज्ञान में गहरी रुचि थी। उन्होंने धन्वंतरि महल की स्थापना की जो एक चिकित्सा केंद्र था। यहाँ भारतीय और पाश्चात्य दोनों प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों से रोगों का निःशुल्क उपचार किया जाता था। उन्होंने एक मुद्रणालय भी आरंभकिया जो भारत में किसी स्थानीय शासक द्वारा स्थापित पहला ऐसा उदाहरण था। उन्होंने तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर की दीवारों पर भोंसले परिवार का इतिहास उत्कीर्ण कराया, जो भारत के सबसे बड़े एकल शिलालेखों में से एक है और भावी पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर है। तंजावुर का सांस्कृतिक परिवेश बहुभाषी था जिसमें कई प्रभावों का मिश्रण था। यहाँ की स्थानीय तमिल संस्कृति, पूर्व शासकों की तेलुगु संस्कृति और वर्तमान शासकों की मराठी संस्कृति का परस्पर स्वतंत्र रूप से मेल-जोल हुआ।
मराठा विरासत
मराठा शासन ने मुगल प्रभुत्व को चुनौती दी और अंग्रेजों द्वारा उपमहाद्वीप पर अधिकार से पूर्वी, उत्तरी और मध्य भारत के अधिकांश भागों पर नियंत्रण कर सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य स्थापित किया। उन्होंने एक कुशल प्रशासन के साथ शासन करने की एक नई विधि स्थापित की और बिना किसी धार्मिक भेदभाव के स्थानीय हिंदू परंपराओं को भी पुनर्जीवित किया। दमनकारी शासन और विदेशी प्रभुत्व के विरुद्ध उनका साहसिक संघर्ष स्वराज्य के ज्वलंत आदर्श से प्रेरित था। कालांतर में इन्होंने भारतीयों को प्रेरित किया कि वे स्वयं शासन कर सकते हैं और इस प्रकार भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का बीजारोपण किया।
आगे बढ़ने से पहले...
- छत्रपति शिवाजी महाराज ने 17वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य की स्थापना की। मुगल सत्ता के प्रति उनके दशकों के प्रतिरोध और उससे प्राप्त अनुभव ने 18वीं शताब्दी में उनके अखिल भारतीय विस्तार में सहायता की।
- भारत को अंग्रेजों ने मुगलों या किसी अन्य भारतीय शक्ति की तुलना में मराठों से अधिक प्राप्त किया।
- दुर्ग मराठा राज्य की आधारशिला थे। मराठों ने सैकड़ों दुर्गों पर नियंत्रण किया जिससे उस क्षेत्र पर उनका रणनीतिक नियंत्रण दृढ़ हुआ।
- उनकी दुर्जेय नौसेना ने उस समय की नवीनतम तकनीक तक पहुँच न होने के बाद भी लंबे समय तक यूरोपीय नौसैनिक वर्चस्व का प्रतिकार किया।
- मराठों ने विभिन्न क्षेत्रों में भारतीयों के मध्य एक नए सांस्कृतिक आत्मविश्वास का संचार किया और इस प्रकार सांस्कृतिक पुनरुत्थान और नवाचार में योगदान दिया।
प्रश्न और क्रियाकलाप
- विश्लेषण करें कि किस प्रकार भूगोल (विशेषकर पर्वत और समुद्र तट) ने मराठा सैन्य रणनीति और राज्य-निर्माण को निर्धारित किया।
- कल्पना कीजिए कि आप विद्यार्थियों के लिए किसी मराठा नेता की संक्षिप्त जीवनी लिख रहे हैं। किसी एक व्यक्तित्व (कान्होजी आंग्रे, बाजीराव प्रथम, महादजी शिंदे, अहिल्याबाई होलकर या ताराबाई) का चयन कीजिए और उनकी प्रेरणादायक विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए तीन-चार अनुच्छेद लिखिए। किसी एक चुनौती का वर्णन कीजिए जिस पर उन्होंने विजय प्राप्त की।
- यदि आपको आज किसी एक मराठा दुर्ग (जैसे - रायगढ़, सिंधुदुर्ग, जिंजी या प्रतापगढ़) को देखने का अवसर मिले तो आप किसे चुनेंगे और क्यों? उसके इतिहास, वास्तुकला और सामरिक महत्व का अध्ययन कीजिए। कक्षा में अपने निष्कर्षों को डिजिटल या पोस्टर रूप में प्रस्तुत कीजिए।
- अध्याय में लिखा है कि अंग्रेजों ने भारत को मुगलों या किसी भी अन्य शक्ति से अधिक मराठों से छीना। आपके विचार में इसका क्या अर्थ है? अध्याय में दिए गए कौन-से प्रमाण इस विचार का समर्थन करते हैं?
- तुलना कीजिए कि शिवाजी और उत्तरवर्ती मराठों ने धार्मिक स्थलों और विभिन्न धर्म के लोगों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया। इस अध्याय में कौन-सा प्रमाण धार्मिक विविधता के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्शाता है?
- इस अध्याय में वर्णित है कि मराठों के लिए दुर्ग 'राज्य की आधारशिला' थे। वे इतने महत्वपूर्ण क्यों थे? उन्होंने मराठों को शक्तिशाली शत्रुओं के विरुद्ध खड़े रहने में किस प्रकार सहायता की?
- आपको मराठा सिक्कों का मुख्य अभिकल्पक (डिजाइनर) नियुक्त किया गया है। एक ऐसे सिक्के का रूपांकन कीजिए, जो मराठा उपलब्धियों और मूल्यों का प्रतिनिधित्व करे। अपने द्वारा चुने गए प्रतीकों की व्याख्या कीजिए।
- मराठा काल की इस भूमिका अध्ययन करने के पश्चात आपके विचार में भारतीय इतिहास में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान क्या था? अध्याय से उदाहरण लेकर अपने विचार का समर्थन करते हुए एक अनुच्छेद लिखिए। अपने विचारों को सहपाठियों के साथ साझा कर उन पर चर्चा कीजिए।