अध्याय - 5
सार्वभौमिक मताधिकार और भारत की निर्वाचन प्रणाली
(भारत ने) आम व्यक्ति पर अपार विश्वास प्रकट करते हुए और लोकतांत्रिक शासन की परम सफलता प्राप्त करते हुए, वयस्क मताधिकार का सिद्धांत स्वीकार किया... इससे पहले विश्व इतिहास में कभी ऐसा साहसिक प्रयोग नहीं किया गया है।
– अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर नवंबर 1949, संविधान सभा में बहस

महत्वपूर्ण प्रश्न
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार क्या है?
- निर्वाचन प्रणाली क्या है?
- भारत की निर्वाचन प्रणाली कैसे कार्य करती है?
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
संविधान निर्माताओं ने आरंभ से ही निश्चय कर लिया था कि वयस्क मताधिकार (फ्रैंचाइज) भारतीय लोकतंत्र की एक विशेषता होगी। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक वयस्क नागरिक को एक मत देने का अधिकार है और सभी मतों का समान मूल्य है। इस प्रकार, जाति, मत, नस्ल, धर्म, लिंग, शिक्षा, आय आदि का भेदभाव किए बिना 18 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक भारतीय नागरिक को मत देने का अधिकार है। 'सार्वभौमिक' शब्द का अर्थ यही है।
आइए पता लगाएँ
भारत ने 1988 में मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी। चर्चा कीजिए कि क्या यह एक अच्छा निर्णय था।
सार्वभौमिक मताधिकार भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है। लोकसभा, प्रत्येक राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश की विधानसभा और गाँवों एवं शहरों में सभी स्थानीय चुनाव सार्वभौमिक मताधिकार पर आधारित (भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार) होते हैं। याद रखें कि कोई भी व्यक्ति अन्य व्यक्ति की ओर से मतदान नहीं कर सकता।
- क्या आप गणना कर सकते हैं कि आपको पहली बार मत देने के लिए कितने समय की प्रतीक्षा करनी होगी?
अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए किसी मतदाता का अपने निर्वाचन क्षेत्र में पंजीकृत होना आवश्यक है। यद्यपि गंभीर अपराध में दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति को मतदान करने से रोका जाता है।
क्या आपको याद है कि भारत में 2024 की गर्मियों में आम चुनाव हुए थे? लगभग 98 करोड़ मतदाता लोकसभा के 543 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान करने के पात्र थे।
इसे अनदेखा न करें
भारत में 2,50,000 से भी अधिक स्थानीय निकायों में 31 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। इनमें 13 लाख महिलाएँ हैं। ये सभी सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से निर्वाचित होते हैं।
इस विशाल कार्य का प्रबंध निष्पक्ष एवं स्वतंत्र ढंग से सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक और सुव्यवस्थित प्रणाली का होना आवश्यक है। हम इस अध्याय में यह जानेंगे कि कौन मत दे सकता है, चुनाव के कितने प्रकार हैं, निर्वाचन प्रणाली क्या है और यह कैसे कार्य करती है।
इसे अनदेखा न करें
- स्वतंत्रता से पहले मात्र 13 प्रतिशत भारतीयों को मत देने का अधिकार था और मताधिकार सार्वभौमिक नहीं था। हम पाठ्यपुस्तक के अन्य भाग में इसके बारे में पढ़ेंगे।
- भारत विश्व में बहुत पहले महिलाओं को मत का अधिकार प्रदान करने वाले आरंभिक देशों में से था। जैसे, स्विट्जरलैंड में महिलाओं को मत देने का अधिकार 1971 में दिया गया। महिलाओं ने अनेक देशों में इस मूल अधिकार को पाने के लिए लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी। इसके विपरीत, प्रगतिशील संवैधानिक दृष्टि और देश की प्राचीन परंपराओं में निहित लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार स्वतंत्र भारत में महिलाओं को आरंभ से ही मताधिकार सुनिश्चित किया गया।

आइए पता लगाएँ
भारत में 1947 में लगभग 14 प्रतिशत व्यक्ति साक्षर थे, जिसमें लगभग 8 प्रतिशत महिलाएँ थीं। कुछ लोगों के अनुसार केवल साक्षर व्यक्तियों को मताधिकार दिया जाना चाहिए। अपने समूह में चर्चा करें कि संविधान-निर्माताओं ने स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही सार्वभौमिक मताधिकार देने का निश्चय क्यों किया।
सार्वभौमिक मताधिकार के महत्वपूर्ण होने के कई कारण हैं। इनमें से कुछ को नीचे दिए गए मानस-मानचित्र में दर्शाया गया है।

बाधाएँ पार करना, भागीदारी में सक्षम बनाना - सार्वभौमिक
जब प्रत्येक नागरिक निर्वाचन प्रक्रिया में स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से भाग लेता है, तो लोकतंत्र फलता-फूलता है। मतदान लोगों द्वारा अपनी इच्छा व्यक्त करने का एक शक्तिशाली माध्यम है। भारत में यह कैसे होता है?
भारत एक विशाल, विविध और जटिल देश है। भारत में मतदाताओं की संख्या यूनाइटेड किंगडम की तुलना में पंद्रह गुना है और क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत फ्रांस की तुलना में छह गुना बड़ा है। भारत में भौगोलिक विविधता भी एक चुनौती है। इस प्रकार इस जटिलता को ध्यान में रखते हुए भारत में चुनाव की व्यवस्था आवश्यक है।
भारत निर्वाचन आयोग (ई.सी.आई.) देश में चुनाव आयोजित करवाता है। हम इस अध्याय में ई.सी.आई. के कार्यों के बारे में अधिक जानेंगे। ई.सी.आई. ने मताधिकार संबंधी बाधाएँ हटाने और प्रत्येक मतदाता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अनेक उपाय किए हैं।
निर्वाचन अधिकारी यह सुनिश्चित करने के लिए दूर-दूर तक जाते हैं कि प्रत्येक नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग कर पाए। वर्ष 2024 में पहली बार वृद्ध और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए घर से ही मतदान करने और मतदाताओं के एक विशेष वर्ग के लिए डाक से मतदान करने का विकल्प उपलब्ध कराया गया। सहायता के लिए ब्रेल-सक्षम मतपत्र और ऐप-आधारित अनुरोधों को भी संभव बनाया गया, जिसमें पहिया कुर्सियाँ एवं रैंप्स की व्यवस्था भी सम्मिलित थी।
आइए पता लगाएँ
- समूह में चर्चा करें कि इस प्रकार के उपाय लोकतंत्र में क्या भूमिका निभाते हैं? क्या इन उपायों से लाभान्वित हुए किसी व्यक्ति को आप जानते हैं? इन उपायों से मतदाताओं की भागीदारी कैसे बढ़ सकती है? तकनीकी इसमें कैसे सहायक हो सकती है?
- यदि आपके पास इंटरनेट है तो ई.सी.आई. की वेबसाइट - (https://www.eci.gov.in/persons-with-disabilities) देखें। ई.सी.आई. द्वारा दिव्यांगों के मताधिकार में सहायता के जो विभिन्न उपाए किए गए हैं, उन्हें पढ़ें और उनकी पहचान करें।


आइए पता लगाएँ
लगभग 34 प्रतिशत मतदाताओं ने 2024 के चुनावों में मताधिकार का प्रयोग नहीं किया। आपके विचार से ऐसा क्यों है? लोग अपने अधिकारों का प्रयोग करने में किन-किन चुनौतियों का सामना करते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर के लिए अपने परिवार और पड़ोस में बड़ों के साथ एक लघु सर्वेक्षण करें। सर्वेक्षण के निष्कर्षों का विश्लेषण करें और सुझावों के साथ एक प्रतिवेदन लिखें कि प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने मत का उपयोग कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है।
इसे अनदेखा न करें
दसवीं शताब्दी के उत्तरामेरूर शिलालेखों में प्रतिनिधियों के चयन के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया का विवरण मिलता है। इसके अनुसार, ताड़पत्रों पर प्रत्याशियों के नाम लिखकर उन्हें एक पात्र में डाला जाता था, जिसके बाद उसे सीलबंद कर दिया जाता था। चयन के दिन उसे सबके समक्ष खोला जाता था और कोई बालक एक-एक कर ताड़पत्रों को बाहर निकालता था। इसके बाद कोई सम्मानित व्यक्ति अपने खाली हाथ दिखाकर चयनित प्रत्याशियों के नाम पढ़ता था।
कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव - कक्षा 8, सूर्योदय विद्यालय

यह कक्षा प्रतिनिधि के वार्षिक चुनाव का समय था। कक्षा प्रतिनिधि शिक्षकों के साथ बैठकों, समारोहों के आयोजन और विद्यार्थियों एवं विद्यालय के अधिकारियों के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करने के लिए कक्षा का प्रतिनिधित्व करेगा। तीन विद्यार्थियों - अहमद, गुरमत और रवि- ने इस पद के लिए चुनाव लड़ने का निश्चय किया। अध्यापक सुश्री उषा को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष तथा पारदर्शी हो और सभी आवश्यक नियमों का पालन किया जाए।
प्रत्येक प्रत्याशी का परिचय यहाँ प्रस्तुत है -
अहमद ने कक्षा के कमरों और खेल के मैदान की स्वच्छता का आश्वासन दिया।गुरमत की रुचि अपनी कक्षा के सभी सहपाठियों द्वारा बेहतर ढंग से सीखने में थी। उसने सहपाठी-अनुशिक्षण और पारस्परिक सहायता की एक प्रणाली बनाने का प्रस्ताव दिया।
रवि पाठ्यचर्या में कलाओं - संगीत, नाटक और दृश्य कला को नई पाठ्यचर्या के अनुरूप उनकी कक्षा की समय-सारणी में अधिक महत्व दिलवाना चाहता था।
चुनाव-अभियान
अपने पक्ष में अहमद ने पोस्टर लगाए, गुरमत ने सूचना-पट्ट का उपयोग किया और सहपाठियों के साथ बातचीत की, जबकि रवि ने दोपहर के भोजन के समय एक संगीत प्रस्तुति आयोजित की। निर्वाचन अधिकारी के रूप में सुश्री उषा ने चुनाव आयोजित करवाए और सुनिश्चित किया कि वे निष्पक्ष ढंग से संचालित हों। उन्होंने कक्षा के नियमों के बारे में प्रत्येक विद्यार्थी को समझाया कि गुप्त मतदान प्रक्रिया क्या होती है जिससे कोई यह न जान पाए कि किसने अपना मत किसे दिया। इससे यह प्रक्रिया गोपनीय और निष्पक्ष बनी रहती है। उन्होंने कक्षा के एक कोने में मतदान केंद्र स्थापित किया।
मतदान का दिन
चुनाव के दिन प्रत्येक विद्यार्थी को एक मतपत्र दिया गया, जिसमें तीन प्रत्याशियों के नाम थे। उन्हें कहा गया कि वे जिस प्रत्याशी को मत देना चाहते हैं, उसके नाम के सामने 'X' का चिह्न लगाएँ। सुश्री उषा ने यह भी सुनिश्चित किया कि नेहा के लिए ब्रेल लिपि में एक मतपत्र हो। सभी विद्यार्थियों द्वारा मतदान करने के बाद सुश्री उषा ने मतपेटी में मतपत्र एकत्र किए और उसे गणना से पहले तक सीलबंद कर दिया।परिणाम
अंत तक 33 मत डाले गए थे। सुश्री उषा ने समीपस्थ कक्षा से सुश्री शीबा को गणना प्रक्रिया की साक्षी बनने के लिए बुलाया। 3 मतपत्रों पर चिह्न अंकित नहीं था, इसलिए उन्हें अवैध घोषित किया गया। चुनाव परिणाम घोषित किए गए, अहमद को 8, गुरमत को 12 और रवि को 10 मत प्राप्त हुए। सर्वाधिक मत पाने वाली गुरमत को कक्षा की नई प्रतिनिधि घोषित किया गया। उसने अपने सहपाठियों को धन्यवाद दिया और अपना वचन पूरा करने का आश्वासन दिया। अहमद और रवि ने गुरमत को बधाई दी और उसे समर्थन प्रदान किया।
आइए पता लगाएँ
- इस प्रकरण में चुनावी प्रक्रिया के सबसे महत्वपूर्ण पक्ष क्या हैं?
- गुप्त मतपत्र का होना क्यों महत्वपूर्ण था?
- अपने प्रत्याशी का चयन करते समय विद्यार्थियों ने किन-किन बातों पर विचार किया होगा?
- क्या आप सोचते हैं कि गुरमत के कक्षा प्रतिनिधि निर्वाचित होने के बाद विद्यार्थियों के कोई उत्तरदायित्व हैं? यदि हाँ, तो वे क्या हैं?
- सुश्री उषा ने क्या भूमिका निभाई? यह क्यों महत्वपूर्ण थी?
- सुश्री उषा द्वारा नेहा के लिए ब्रेल मतपत्र की व्यवस्था करना क्यों महत्वपूर्ण था?
- यदि कक्षा के अनेक विद्यार्थियों ने किसी भी विकल्प पर चिह्न अंकित न किया होता तो क्या होता?
इसे अनदेखा न करें
कल्पना कीजिए कि यदि कोई विद्यार्थी अहमद, गुरमत या रवि में से किसी भी प्रत्याशी को मत देने का इच्छुक न होता, तो उसके पास क्या विकल्प होता? भारत सहित कुछ देश नोटा [NOTA (नन ऑफ द एबव अर्थात उपरोक्त में से कोई नहीं)] को एक अतिरिक्त विकल्प के रूप में प्रदान करते हैं। यदि मतदाता किसी भी प्रत्याशी से संतुष्ट नहीं है, तब उसके पास सभी प्रत्याशियों को अस्वीकृत करने का एक अतिरिक्त विकल्प होता है। इससे परिणामों में परिवर्तन नहीं होता, किंतु यह संदेश मिलता है कि मतदाता बेहतर विकल्प चाहते हैं। नोटा लोकतंत्र में एक मौन किंतु शक्तिशाली साधन है।
भारत निर्वाचन आयोग (ई.सी.आई.) की भूमिका
हमारे देश के आकार और विविधता को चुनावी प्रक्रिया के आयोजन में ध्यान रखना आवश्यक है। यहाँ हम चुनाव के उन भिन्न प्रकारों पर दृष्टि डालेंगे जिसका आयोजन और पर्यवेक्षण भारत निर्वाचन आयोग करता है।
पुनरावलोकन करें
यह उनमें से केवल दो प्रकार के चुनाव हैं जिनका प्रबंध भारत निर्वाचन आयोग करता है। हम बाद के खंडों में अन्य प्रकार के चुनावों पर दृष्टि डालेंगे। आइए, चुनावी प्रक्रिया की झलक प्राप्त करने से पहले भारत निर्वाचन आयोग से परिचित हो जाएँ– वह संस्था जो इस पूरी प्रक्रिया को संचालित करती है।
पुनरावलोकन करें
भारत निर्वाचन आयोग - एक संक्षिप्त परिचय
भारत निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से चुनाव कराने के लिए उत्तरदायी है। इसकी स्थापना 1950 में की गई थी। यह भारत में लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधान सभाओं और राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति के पदों के लिए चुनाव कराता है। स्वतंत्र भारत में प्रथम आम चुनाव 1951-1952 में हुए थे।
भारत निर्वाचन आयोग निम्नलिखित अति-महत्वपूर्ण कार्य करता है, जैसे-



निर्वाचन प्रक्रिया का प्रबंधन
भारत में चुनाव प्रबंधन एक विशाल कार्य है। भारत निर्वाचन आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से चुनाव कराने के लिए आधुनिक भारत की आवश्यकताओं के अनुसार अपनी क्षमताएँ उन्नत कर रहा है। चुनावी प्रक्रिया अत्यंत विशाल है और इसके लिए कुशलता से कार्य करना आवश्यक है। उदाहरण के रूप में लोकसभा चुनाव को लेते हैं। ध्यान दें कि राज्य विधान सभाओं के चुनाव में भी इसी प्रक्रिया का पालन किया जाता है। सभी चुनाव नियमित रूप से अलग-अलग समय पर होते हैं। इसलिए, देश के विभिन्न भागों में प्रत्येक वर्ष अनेक चुनाव निर्धारित अवधि पर कराए जाते हैं।

जैसा कि आप देख सकते हैं, ये संख्याएँ बहुत बड़ी हैं। इस संपूर्ण प्रक्रिया में सहायता के लिए शिक्षकों सहित अनेक लोगों को नियुक्त किया जाता है।
आइए पता लगाएँ
अपने विद्यालय या आस-पास उन शिक्षकों की पहचान करें जिन्होंने चुनाव कार्य (ड्यूटी) किया हो। अपनी कक्षा में उन्हें अपने अनुभव साझा करने के लिए आमंत्रित करें।
इसे अनदेखा न करें
लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र अनुसूचित जाति के व्यक्तियों के लिए आरक्षित हैं जबकि 47 अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।

लोकसभा और राज्य विधान सभाओं के लिए मतदान की प्रक्रिया


प्रथम मतदान अधिकारी - मतदाता सूची में मतदाता का नाम और उसके पहचान-पत्र की जाँच करता है।

द्वितीय मतदान अधिकारी - मतदाता की अंगुली पर स्याही लगाता है, उसे पर्ची देकर उसका हस्ताक्षर लेता है।

तृतीय मतदान अधिकारी - पर्ची लेता है और मतदाता की अंगुली की जाँच करता है। पर्ची में नोटा का विकल्प भी उपलब्ध रहता है।

चौथा - इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन (ई.वी.एम.) पर मतदान करने हेतु मतदाता बटन दबाता है; एक बीप की ध्वनि सुनाई देती है। वह वीवीपैट (वी.वी.पी.ए.टी.) में छपी हुई पर्ची को भी देखता है।


आइए पता लगाएँ
- भारत की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ई.वी.एम.) और मतदाता सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल (वी.वी.पी.ए.टी.) प्रणाली का उपयोग नामीबिया और भूटान जैसे देशों में भारत निर्वाचन आयोग की सहायता से किया जाता है। अन्य देशों ने भी इस प्रौद्योगिकी का अध्ययन किया है और अपने देशों में इसे अपनाने के लिए भारत से प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
- मतदाता सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल (वी.वी.पी.ए.टी.) एक ऐसी प्रणाली है जो मतदाता के वोट की पर्ची निकालती है, जिससे मतदाता यह जान लेते हैं कि उनका इलेक्ट्रॉनिक वोट सही से दर्ज हो गया है। यह पर्ची विवाद की स्थिति में सत्यापन और पुनः गणना के लिए एक बैकअप प्रमाण के रूप में उपलब्ध कराती है, विशेषतः उस स्थिति में जब इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली में कोई त्रुटि उत्पन्न हो।

इसे अनदेखा न करें
आदर्श आचार संहिता को सर्वप्रथम वर्ष 1960 में केरल में अपनाया गया था, जिसे उस समय के प्रमुख राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों द्वारा स्वेच्छा से स्वीकार किया गया था। भारत निर्वाचन आयोग ने 1962 के आम चुनाव के दौरान इसे राजनैतिक दलों के बीच प्रसारित किया और 1991 से आयोग इसका अनुपालन सुनिश्चित करने में सक्रिय भूमिका निभाने लगा।
आइए पता लगाएँ
- यहाँ कुछ प्रकार की शिकायतें दी गई हैं जिनका निवारण भारत निर्वाचन आयोग करता है-
- आपके विचार में ये आचार संहिता के उल्लंघन क्यों हैं?




इसे अनदेखा न करें
आदर्श आचार संहिता को सर्वप्रथम वर्ष 1960 में केरल में अपनाया गया था, जिसे उस समय के प्रमुख राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों द्वारा स्वेच्छा से स्वीकार किया गया था। भारत निर्वाचन आयोग ने 1962 के आम चुनाव के दौरान इसे राजनैतिक दलों के बीच प्रसारित किया और 1991 से आयोग इसका अनुपालन सुनिश्चित करने में सक्रिय भूमिका निभाने लगा।
इसे अनदेखा न करें
टी.एन. शेषन 1990 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने। उन्होंने स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सुधार किए। इन सुधारों में सम्मिलित हैं- चुनाव प्रचार अभियान चलाने के लिए सुस्पष्ट नियमों का पालन तथा परोक्षी मतदान (प्रॉक्सी वोटिंग) की समाप्ति के लिए मतदाता परिचय पत्र और प्रत्याशियों द्वारा चुनाव में व्यय पर पर कड़ी चौकसी। टी.एन. शेषन ने मतदाताओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए कठोर प्रयास किए और उन्हें प्रायः ऐसे अधिकारी के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने भारतीय चुनावों को निष्पक्ष, पारदर्शी और भयरहित बनाया।

आइए पता लगाएँ
जिस क्षेत्र में आप रहते हैं, वहाँ अगला चुनाव कब होने वाला है? क्या वह राज्य स्तर, शहरी स्थानीय निकाय या पंचायत का चुनाव है?
भारत में चुनाव प्रक्रिया को समझना - एक संक्षिप्त अवलोकन
लोकसभा तथा राज्य विधान सभाओं के लिए चुनाव
भारत में चुनावों को प्रायः 'प्रजातंत्र के पर्व' के रूप में जाना जाता है - एक ऐसा समय जब नागरिक प्रतिनिधियों का चुनाव करने के लिए अपने अधिकारों का प्रयोग स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा उत्तरदायी रूप से करते हैं। हम जानते हैं कि भारत में संसदीय शासन प्रणाली लागू है, जिसमें नागरिक विभिन्न स्तरों- लोकसभा (राष्ट्रीय स्तर), राज्य विधान सभाओं (राज्य स्तर) तथा स्थानीय निकायों (शहर एवं ग्रामीण स्तर) के चुनाव में भाग लेते हैं। लोकसभा निर्वाचन के लिए देश को 543 निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। लोकसभा के लिए निर्वाचित सदस्य सांसद कहलाते हैं, जबकि राज्य विधान सभाओं के लिए निर्वाचित सदस्य विधायक कहलाते हैं। भारत 'जो सबसे आगे, वह जीता' (फर्स्ट पास्ट द पोस्ट) निर्वाचन प्रणाली का उपयोग करता है, जिसमें किसी निर्वाचन क्षेत्र में सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाला प्रत्याशी विजयी होता है। इससे तात्पर्य है कि कोई प्रत्याशी कुल मतों का 50 प्रतिशत मत प्राप्त किए बिना भी जीत सकता है, उदाहरण के लिए, गुरमत 33 में से केवल 12 वोट पाकर भी जीत गई।
इसे अनदेखा न करें
विधान सभा को विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे - विधान सभा और नियम सभा आदि। आपके राज्य में इसे क्या कहा जाता है?
मतदान की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया आरंभ होती है। लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने वाला राजनीतिक दल या गठबंधन राष्ट्रीय सरकार का गठन करता है। सामान्यतः इस बहुमत का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता है। इसी प्रकार राज्य स्तर पर बहुमत प्राप्त दल का नेता मुख्यमंत्री बनता है।

जैसा कि हमने चित्र 5.11 में देखा, राज्य निर्वाचन आयोग निर्वाचन व्यवस्था का एक भाग है। यह न केवल लोकसभा और विधान सभा चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, अपितु निम्न स्तर पर स्थानीय निकायों के चुनाव कराने में भी महत्वपूर्ण भागीदारी रखता है। यह इन मामलों में भारत निर्वाचन आयोग के परामर्श से काम करता है और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार तथा लोगों द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव संबंधी अन्य संवैधानिक प्रावधान यहाँ भी प्रासंगिक हैं।
आइए पता लगाएँ
- आपके निर्वाचन क्षेत्र से सांसद और विधायक कौन हैं? (एक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में दो या अधिक विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र हो सकते हैं।)
- इनमें से प्रत्येक किस राजनीतिक दल से संबंधित है?
- सांसद और विधायक क्रमशः किन विषयों की चिंता करते हैं?
राज्यसभा के लिए चुनाव
राज्यसभा के निर्वाचित प्रत्याशियों को भी सांसद (संसद सदस्य) कहा जाता है, किंतु उन्हें अप्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से चुना जाता है।
आइए, सूर्योदय विद्यालय का उदाहरण पुनः देखें। कल्पना कीजिए कि विद्यालयी स्तर पर एक विशेष परिषद निर्मित की जा रही है। यदि इस परिषद के सदस्य कक्षा प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाते हैं, तब यह एक अप्रत्यक्ष चुनाव होगा।
राज्यसभा के 245 सदस्यों में से 233 को राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित विधायकों द्वारा चुना जाता है, जबकि 12 सदस्य भारत के राष्ट्रपति द्वारा नामित होते हैं। प्रत्येक राज्य को उसकी जनसंख्या के अनुसार राज्यसभा में सीटें अलग-अलग संख्या में आवंटित हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें अरुणाचल प्रदेश जैसे कम जनसंख्या वाले राज्यों की अपेक्षा अधिक हैं।
राज्यसभा को स्थायी सदन भी कहा जाता है। इसे कभी विघटित नहीं किया जाता। राज्यसभा के सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। प्रत्येक दो वर्षों में इसके एक-तिहाई सदस्य सेवानिवत्त होते हैं और नए सदस्य चने जाते हैं।
यद्यपि मतदान प्रक्रिया में अंतर होता है। इसमें एकल संक्रमणीय मत प्रणाली का उपयोग किया जाता है। यह एक विशेष विधि है, जिससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि छोटे राज्यों को भी राज्यसभा में समुचित प्रतिनिधित्व मिले। आप इस कार्यप्रणाली के बारे में विस्तार से उच्च कक्षाओं में सीखेंगे।
राज्यसभा - राज्यों की परिषद

भारत के राष्ट्रपति का चुनाव
भारत के राष्ट्रपति का चुनाव आम जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया जाता है। अपितु एक निर्वाचक मंडल का गठन कर चुनाव संपन्न होता है, जिसमें सम्मिलित होते हैं -
- संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सदस्य
- भारत के प्रत्येक राज्य तथा दिल्ली और पुडुचेरी के केंद्र/संघ शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के सदस्य
इस चुनाव में एकल संक्रमणीय मत प्रणाली का पालन किया जाता है। चूँकि राष्ट्रपति पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए यह पद्धति केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों का सहयोग लेती है। मतदान और मतगणना के नियम बहुत विस्तृत हैं, अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। (इस स्तर पर हमें विस्तार में जानने की आवश्यकता नहीं है।)
भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचन में निम्नलिखित समूह सम्मिलित नहीं होते हैं-
- राज्यसभा के मनोनीत सदस्य (12)
- राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य
- द्विसदनीय विधानमंडलों में विधान परिषदों के सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों)
- केंद्र शासित प्रदेशों, दिल्ली और पुडुचेरी की विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य।
आइए पता लगाएँ
आपके विचार से उपरोक्त समूह भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचन में क्यों सम्मिलित नहीं होते? आम जनता राष्ट्रपति के निर्वाचन में क्यों सम्मिलित नहीं होती है?
ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रतिनिधि ही राष्ट्रपति के निर्वाचन में मतदान करें। इससे लोकतांत्रिक रूप बना रहता है क्योंकि राष्ट्रपति को जनता की इच्छा का प्रतिनिधि माना जाता है - अप्रत्यक्ष किंतु सार्थक रूप से।
भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव
भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचन मंडल द्वारा किया जाता है, जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित और मनोनीत सदस्य सम्मिलित होते हैं। यहाँ भी एकल संक्रमणीय मत प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रतिनिधि ही राष्ट्रपति के निर्वाचन में मतदान करें। इससे लोकतांत्रिक रूप बना रहता है क्योंकि राष्ट्रपति को जनता की इच्छा का प्रतिनिधि माना जाता है - अप्रत्यक्ष किंतु सार्थक रूप से।
भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव
भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचन मंडल द्वारा किया जाता है, जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित और मनोनीत सदस्य सम्मिलित होते हैं। यहाँ भी एकल संक्रमणीय मत प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति होता है। यदि कभी ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं कि राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों का निर्वहन न कर सके, तो उपराष्ट्रपति यह भूमिका निभाता है।चुनौतियाँ और आगे का मार्ग
भारत की निर्वाचन प्रणाली को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है। किंतु, सभी प्रणालियों की तरह यह भी अपनी कुछ चुनौतियों का सामना करती है। चुनावों में धन का बढ़ता प्रभाव, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशियों की उल्लेखनीय संख्या और मतदाताओं की उदासीनता (विशेषकर शहरी क्षेत्रों में) जैसी समस्याएँ हमारे लोकतंत्र की स्थिति और भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती हैं।आगे बढ़ने का मार्ग मतदाताओं को उस जानकारी से सशक्त करने में निहित है, जिसकी उन्हें विचारशील और उत्तरदायी चुनाव करने के लिए आवश्यकता होती है। मीडिया, शिक्षा और जागरूकता अभियानों को मिलकर लोगों, विशेषकर युवाओं को समझाने में सहयोग करना चाहिए कि सोच-समझकर मतदान करना क्यों महत्वपूर्ण है। एक जागरूक और सतर्क मतदाता लोकतांत्रिक प्रणाली की सबसे शक्तिशाली सुरक्षा है। यह सही प्रश्न पूछने से आरंभ होती है और उत्तरदायी मतदान करने पर समाप्त होती है।
आगे बढ़ने से पहले...
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है।
- मतदान का अधिकार एक दायित्व भी है। प्रत्येक मतदाता को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। मतदाता जागरूकता, मतदान के अधिकार का एक महत्वपूर्ण पक्ष है।
- सभी मतदाताओं की भागीदारी को सुगम बनाना आवश्यक है।
- भारत निर्वाचन आयोग देश में चुनाव कराने वाला संवैधानिक निकाय है।
- भारत निर्वाचन आयोग देश में सभी चुनावों की देख-रेख करता है जिनमें राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव भी सम्मिलित हैं।
- भारतीय लोकतंत्र ऐसी चुनौतियों का सामना कर रहा है जो मतदाताओं की सतर्कता और जागरूकता की माँग करता है।
प्रश्न और क्रियाकलाप
- एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार क्यों महत्वपूर्ण है?
- 'गुप्त मतदान' का क्या अर्थ है? यह लोकतंत्र में क्यों महत्वपूर्ण है?
- प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनावों के उदाहरण दीजिए।
- लोकसभा के सदस्यों का चुनाव, राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव से किस प्रकार भिन्न है?
- आपके विचार से मतपत्रों की तुलना में ई.वी.एम. के क्या-क्या लाभ हैं?
- भारत के कुछ नगरीय क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत में कमी आ रही है। इस प्रवृत्ति के क्या कारण हो सकते हैं और अधिक लोगों को मतदान हेतु प्रोत्साहित करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
- आपके विचार में लोकसभा की कुछ सीटें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित क्यों होती हैं? एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
- सोशल मीडिया हमारे चुनावी अनुभव के तरीके को बदल रहा है - आकर्षक प्रचार रीलों और लाइव भाषणों से लेकर इंस्टाग्राम और ट्विटर पर राजनैतिक वाद-विवाद तक। क्या यह लोकतंत्र को सशक्त बना रहा है या इसे उलझा रहा है? समूह बनाकर चर्चा कीजिए - इसके लाभ एवं चुनौतियाँ क्या हैं और डिजिटल युग में चुनावों का भविष्य क्या हो सकता है?
- वेबसाइट https://www.indiavotes.com पर जाएँ और किसी भी वर्ष के एक निर्वाचन संसदीय चुनाव क्षेत्र के परिणामों का अध्ययन करें। अपने राज्य के किसी विधान सभा चुनाव का भी इसी प्रकार अध्ययन करें।