अध्याय - 6
संसदीय प्रणाली - विधायिका और कार्यपालिका
संविधान मात्र वकीलों का प्रलेख नहीं है; यह जीवन का संवाहक है और इसकी आत्मा सदैव युग की आत्मा होती है।
-अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर
संविधान सभा चर्चा, नवंबर 1949

महत्वपूर्ण प्रश्न
- भारत की संसदीय प्रणाली क्या है और इसकी संरचना किस प्रकार की गई है?
- संसद के प्रमुख कार्य क्या हैं?
- भारत के संसदीय लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका की भूमिकाएँ क्या हैं?
- केंद्र और राज्य स्तर पर विधायिका और कार्यपालिका का गठन किस प्रकार किया जाता है?
नालंदा विद्यालय के आठवीं कक्षा के विद्यार्थी दिल्ली में विद्यालय भ्रमण पर थे। उषा, सुखविंदर, अंजलि, जॉन और फरीदा विशेष रूप से नए संसद भवन को देखने के लिए उत्साहित थे।
परिचय
भारत को स्वतंत्रता देश के अनेक लोगों के महान बलिदानों और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध वर्षों के संघर्ष के बाद प्राप्त हुई। एक स्वतंत्र देश के नागरिक अब अपने शासन के बारे में स्वयं निर्णय ले सकते थे। हमारे राष्ट्र के जीवन में इस नए युग का प्रथम महत्वपूर्ण कदम स्वतंत्र भारत का संविधान तैयार करना था। इस व्यापक दस्तावेज ने राष्ट्र के लिए आधारभूत सिद्धांत स्थापित किए, जिनमें सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भी सम्मिलित हैं, जो देश के सभी वयस्क नागरिकों को उनकी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि, लिंग, जाति या धर्म के भेद के बिना मतदान का अधिकार प्रदान करता है।


भारत की जनता अपने प्रतिनिधियों का प्रत्यक्ष चुनाव करती है, जो लोकसभा के सदस्य बनते हैं। इन निर्वाचित प्रतिनिधियों में से बहुमत दल सरकार का गठन करता है। संसद सरकार की सर्वोच्च विधायी संस्था है (यह देश के लिए कानून बनाती है)। इसमें जनता के सभी निर्वाचित प्रतिनिधि सम्मिलित होते हैं और यह सरकार के कार्यों को नियंत्रित और निर्देशित करती है। इसलिए सरकार को जनता की सहमति से कार्य करते हुए देखा जा सकता है। 1952 में प्रथम लोकसभा के बाद अब तक 17 लोकसभाएँ हो चुकी हैं। 18वीं लोकसभा का गठन जून 2024 में हुआ।
भारतीय संसद की संरचना
भारतीय संसद में राष्ट्रपति और दो सदन होते हैं- लोकसभा (हाउस ऑफ द पीपल या निम्न सदन) और राज्यसभा (कांउसिल ऑफ स्टेट्स या उच्च सदन)। दो सदनों वाली इस संरचना को 'द्विसदनीय' प्रणाली कहा जाता है ('द्वि' का अर्थ है दो, 'सदन' का अर्थ है कक्ष)।


पुनरावलोकन करें
इसे अनदेखा न करें
हम जानते हैं कि भारतीय संविधान के अनेक पहलुओं को अन्य देशों के संविधानों से लिया गया है। ब्रिटेन की प्रणाली ने हमारी संसदीय प्रणाली को प्रेरित किया। यद्यपि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान-निर्माताओं के पास ऐसे अनुभव थे जिनमें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की संरचनाओं में, भले ही सीमित रूप में, भागीदारी से प्राप्त व्यावहारिक अनुभव सम्मिलित था, जिसने उन्हें संसदीय प्रक्रियाओं से परिचित कराया। इसके साथ ही प्राचीन गणराज्यों (महाजनपदों) की स्मृति और ग्रामसभा की परंपरा भी थी, जहाँ बुजुर्ग सामूहिक निर्णय लिया करते थे, जैसा कि हमने पिछले अध्याय में सीखा।

कार्य
संसद के प्रत्येक सदन में एक पीठासीन अधिकारी होता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि चर्चा और विचार-विनिमय सुव्यवस्थित रूप से संचालित हों। लोकसभा में सदस्य एक स्पीकर (अध्यक्ष) का निर्वाचन करते हैं, जो सदन की कार्यवाही चलाता है, सदस्यों को बोलने की अनुमति देता है, अनुशासन बनाए रखता है और नियमों का पालन सुनिश्चित करता है। राज्यसभा की अध्यक्षता भारत के उपराष्ट्रपति करते हैं, जो इसके सभापति (अध्यक्ष) के रूप में कार्य करते हैं।इसे अनदेखा न करें
'सेंगोल' जो एक स्वर्ण मंडित रजत राजदंड है, 14 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के अवसर पर प्रतीकात्मक रूप से भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को सत्ता के हस्तांतरण के शक्तिशाली प्रतीक के रूप में सौंपा गया था। इसे अब नई लोकसभा में सभापति की कुर्सी के पास स्थापित किया गया है और यह धर्मसम्मत तथा न्यायपूर्ण शासन का प्रतीक माना जाता है। चोल काल से जुड़ी परंपरा में, सेंगोल नए शासकों को यह स्मरण कराने के लिए सौंपा जाता था कि सत्ता का संचालन सदैव धर्म और न्याय के मार्गदर्शन में होना चाहिए। इसके शीर्ष पर स्थापित नंदी, न्याय का प्रतीक है।

संसदीय चर्चाओं को सभी के लिए सुलभ बनाने हेतु अनुवाद सेवाएँ अनेक भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराई जाती हैं। पहले, एक साथ अनुवाद (समकालिक अनुवाद) 12 भाषाओं में उपलब्ध था- हिंदी, अंग्रेजी, असमिया, बांग्ला, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, उड़िया, तमिल, पंजाबी और तेलुगु । हाल ही में इसमें छह और भाषाएँ जोड़ी गई हैं- बोडो, मैथिली, मणिपुरी, उर्दू, संस्कृत और डोगरी। भविष्य में और भी भाषाओं के सम्मिलित करने की संभावना है।
संसद के 'कार्यपालिका' संबंधी उत्तरदायित्व (अर्थात यह सुनिश्चित करना कि बनाए गए कानून लागू हों और क्रियान्वित हों) उसकी विधायी भूमिका (अर्थात् कानून बनाना) जितने ही महत्वपूर्ण हैं। संघीय कार्यपालिका, संसद के विधायी कार्यों और शक्तियों को जीवन प्रदान करती है। संघीय कार्यपालिका में निम्नलिखित सदस्य होते हैं-
- राष्ट्रपति,
- उपराष्ट्रपति, और
- प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद
मंत्रिपरिषद का चुनाव संसद के दोनों सदनों के सांसदों में से किया जाता है। ये मंत्री सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं।
आइए, अब हम संसद के विधायी और कार्यपालिका संबंधी कार्यों पर चर्चा करेंगे।
संसद के विधायी कार्य
संविधान ने संसद के प्रमुख कार्यों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया है। इन्हें सामान्यतः निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है-
- संवैधानिक कार्य
- कानून निर्माण
- कार्यपालिका संबंधी उत्तरदायित्व
- वित्तीय उत्तरदायित्व
1) संवैधानिक कार्य
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संसद को प्रत्यक्ष रूप से भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है, जिनमें सम्मिलित हैं-
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से संसदीय लोकतंत्र को सक्षम बनाना;
- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण का पालन करना;
- संघीय व्यवस्था सुनिश्चित करना; और
- कानूनों और नीतियों का निर्माण कर मौलिक अधिकारों तथा राज्य के नीति-निदेशक तत्वों को कायम रखना।
2) कानून निर्माण
विधायिका के प्रमुख उत्तरदायित्वों में से एक कानून बनाना है। संविधान ने कानून बनाने की एक विस्तृत और कठोर प्रक्रिया निर्धारित की है। सामान्यतः एक कानून को अधिनियम नामक साधन के माध्यम से लागू किया जाता है। एक विधेयक, जो एक प्रस्तावित कानून का प्रारूप होता है, संसद में प्रस्तुत किया जाता है और अधिनियम बनने से पहले एक लंबी तथा परिश्रमपूर्ण प्रक्रिया से गुजरता है। एक विधेयक कैसे अधिनियम और अंततः कानून बनता है, इसकी यात्रा बच्चों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 (आर.टी.ई.) के माध्यम से नीचे दी गई है।
अधिकांश लोग मुझे आर.टी.ई. कहते हैं। मैं अगस्त 2009 में अस्तित्व में आया, यद्यपि यह विचार लगभग एक सदी पहले ही प्रारंभ हो चुका था।
मेरी जड़ें भारतीय संविधान के राज्य नीति-निदेशक सिद्धांतों में निहित हैं। यद्यपि संविधान निर्माताओं की इच्छा थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के एक दशक के भीतर ही मुझे लागू कर दिया जाए, किंतु ऐसा नहीं हो सका और असंख्य बच्चे शिक्षा से वंचित रह गए। 1990 के दशक के आरंभ में किसी ने न्यायालय में यह तर्क दिया कि मैं संविधान में निहित मौलिक अधिकारों, विशेषकर 'जीवन के अधिकार' का अभिन्न अंग हूँ क्योंकि सार्थक जीवन जीने के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। कुछ वर्षों पश्चात संसदीय कार्यवाही आरंभ हुई और वर्ष 2002 में 86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया गया, जिसके अंतर्गत संविधान के अनुच्छेद 21 (क) में यह प्रावधान किया गया कि राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगा।
छह वर्ष बाद मुझे राज्यसभा में एक विधेयक के रूप में प्रस्तुत किया गया। एक समिति ने मेरा गहन अध्ययन किया और संशोधन सुझाए।
मुख्य चर्चा वित्तपोषण को लेकर थी। लाखों बच्चों के लिए नए विद्यालय, आधारभूत ढाँचा और शिक्षकों की व्यवस्था अत्यधिक महँगी थी। किंतु 2008 तक सांसदों ने यह निश्चय कर लिया था कि अब समय आ गया है।
2009 के चुनावों के पश्चात, नई सरकार ने इस विषय को आगे बढ़ाया और अगस्त 2009 में मैं लोकसभा में पारित हो गया तथा राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर अधिनियम बन गया।
आज मैंने बच्चों के लिए विद्यालय में प्रवेश पाने हेतु विधिक मार्ग प्रशस्त किए हैं, नए विद्यालयों के निर्माण को संभव बनाया है और बच्चों के लिए निःशुल्क पुस्तकें और गणवेश (यूनिफॉर्म) सुनिश्चित किए हैं।
विधेयक से अधिनियम तक -
संसद में कानून निर्माण की प्रक्रिया

वाचन - इसका आरंभ ब्रिटिश संसद से हुआ था। कई सांसद निरक्षर थे, इसलिए एक क्लर्क विधेयक की विषय-वस्तु सांसदों को चर्चा के लिए पढ़कर सुनाता था। वर्तमान में सांसद चर्चा शुरू होने से पहले विधेयक पढ़ते हैं।
खंड- ये विधेयक के वे भाग हैं जो विधेयक के विशिष्ट विवरण की व्याख्या करते हैं। उदाहरण के लिए, आर.टी.ई. उस वर्ग को परिभाषित करता है जिस पर यह लागू होता है (6 से 14 वर्ष)।
राजपत्र - यह एक आधिकारिक सरकारी प्रकाशन है जो कानूनी प्रलेखों और आधिकारिक सूचनाओं को प्रकाशित करता है।
संसद हमेशा औपचारिक और गंभीर नहीं होती। कभी-कभी कविता और हास्य के माध्यम से वातावरण सहज बनाया जाता है।उदाहरण 1- संसद में कविता
1 फरवरी, 2025 को वर्ष 2025-26 के लिए केंद्रीय बजट प्रस्तुत करते समय श्रीमती निर्मला सीतारमण ने तिरुक्कुरल (नैतिकता और सदाचार पर तमिल में एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ) से निम्नलिखित श्लोक का वाचन किया-वानोक्की व्लुम उलाकेल्लम मन्नवन कोलनीक्की व्लुंग कुड़ी।
अर्थात-जैसे जीव वर्षा की प्रतीक्षा में जीते हैं, नागरिक सुशासन की आशा में रहते हैं।
यह सुनते ही, सत्ता पक्ष की ओर से मेजें जोर-जोर से थपथपाई गईं।*

1.2 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पी.एच.सी.), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सी.एच.सी.) और जिला चिकित्साल्यों (डी.एच.) में आयुष सुविधाओं का सह-स्थान
अनुशंसा-
1.2.1 समिति ने इस चरण में ध्यान दिलाया कि कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में आयुष का पृथक विभाग नहीं स्थापित किया गया है। समिति ने आयुष प्रणाली को प्रोत्साहित करने और आयुष स्वास्थ्य देखभाल में उत्तम समन्वय के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय को अनुशंसा की, कि वह ऐसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर बल दे और उन्हें प्रेरित करे, जहाँ आयुष का पृथक विभाग नहीं है, कि वे शीघ्र विकास और योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु ऐसा विभाग स्थापित करें।
(रिपोर्ट का अंश 2.13)
कार्यवाही1.2.2 सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में आयुष का पृथक विभाग बनाने का अधिकार संबंधित राज्य/केंद्र शासित सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। तथापि, आयुष मंत्रालय ने विभिन्न बैठकों में राज्य सरकारों/केंद्र सरकारों से अनुरोध किया है कि वे पृथक निदेशालय स्थापित करें तथा राज्यों/केंद्र सरकारों में राज्य प्रबंधन इकाई (एस.पी.एम.यू.) और जिला परियोजना प्रबंधन इकाई (डी.पी.एम.यू.) में कर्मचारियों की नियुक्ति करें, जिससे राष्ट्रीय आयुष मिशन (एन.ए.एम.) योजना के तीव्र विकास और कार्यान्वयन को सुनिश्चित किया जा सके। वर्तमान में 24 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में पृथक आयुष निदेशालय उपलब्ध हैं।
(एस.पी.एम.यू. = राज्य परियोजना प्रबंधन इकाई; डी.पी.एम.यू. = जिला परियोजना प्रबंधन इकाई)(रिपोर्ट का अंश 2.23)
आइए पता लगाएँ
यहाँ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों के बीच हुई बैठकों की रिपोर्ट का एक अंश दिया गया है। ऊपर दिए गए चित्र को देखें और छोटे-छोटे समूहों में निम्नलिखित पर चर्चा करें-कौन किसे रिपोर्ट कर रहा है? किस विषय की समीक्षा की गई है? समिति की अनुशंसा पहचानिए। सरकार का प्रत्युत्तर क्या है?
4) वित्तीय जवाबदेही
संसद वार्षिक बजट के माध्यम से सरकारी व्यय को स्वीकृति देती है और उसकी निगरानी करती है, साथ ही विभिन्न मंत्रालयों को धन के वितरण की जाँच भी करती है।
आइए पता लगाएँ
आपके विचार से संसद सरकारी व्यय पर दृष्टि क्यों रखती है? (संकेत- सरकार किसका पैसा खर्च करती है?)
सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह संसद को आवश्यक सूचना समय पर और सटीक ढंग से उपलब्ध कराए।
संसद के कार्यपालिका संबंधी कार्य
पिछले खंडों में हमने कार्यपालिका की भूमिका के कुछ बिंदुओं पर प्रकाश डाला है। अब हम इसे थोड़ा और निकटता से समझते हैं।इसे अनदेखा न करें
भारतीय संविधान का भाग V, अध्याय I- 'कार्यपालिका' से आरंभ होता है। इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद सहित अन्य की भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों का वर्णन है। अध्याय II में संसद की भूमिका और कार्यों का उल्लेख है। आपके विचार में ऐसा क्यों किया होगा?
1) राष्ट्रपति
राष्ट्रपति, राज्य का प्रमुख और कार्यपालिका का प्रधान होता है। प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद सरकार चलाने के लिए उत्तरदायी होते हैं। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है, संसद का सत्र बुलाता है एवं विधेयकों को स्वीकृति देता है इत्यादि। मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को सहायता और परामर्श देती है। यद्यपि कुछ विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, मुख्यतः राजनीतिक संकट के समय, जैसे कि जब लोकसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हुआ हो।
2) प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद
प्रधानमंत्री भारत की संसदीय व्यवस्था में वास्तविक कार्यकारी प्राधिकारी होते हैं। राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं। प्रधानमंत्री लोकसभा में सांसदों के बहुमत के समर्थन से कार्य करते हैं। प्रधानमंत्री के प्रमुख कार्यों में सम्मिलित हैं-
- मंत्रिपरिषद का नेतृत्व
- राष्ट्रपति को परामर्श देना
- विभिन्न मंत्रालयों के कार्यों का समन्वय
- राष्ट्रीय नीतियों को आकार देना
प्रधानमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद के सहयोग से निर्णय लेते हैं और सरकार को सुचारु रूप से चलाते हैं। प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं। संसद में चर्चा के लिए आने वाले अधिकांश विधेयक सरकार द्वारा प्रस्तावित किए जाते हैं। सरकारी नीतियों और कानूनों को लागू करने में अधिकारियों के एक स्थायी समूह की सहायता ली जाती है, जिन्हें 'सिविल सेवक' कहा जाता है। ये अधिकारी, जिन्हें सामान्यतः प्रशासक या नौकरशाह भी कहा जाता है, मंत्रियों के निर्देशन में कार्य करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि सरकारी विभाग सुचारु रूप से कार्य करें।
आइए पता लगाएँ
यदि कार्यपालिका के सदस्य विधायिका का ही अंग हैं तो हम कैसे कह सकते हैं कि यह शक्तियों का पृथक्करण है ? (संकेत- ऊपर दिए गए विधायिका वाले भाग पर पुनः ध्यान दें।)
इसे अनदेखा न करें
वर्ष 1956 में रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना के बाद त्यागपत्र दे दिया। यद्यपि उन्हें दुर्घटना के लिए दोषी नहीं ठहराया गया था, किंतु उनका मानना था कि एक मंत्री को अपने मंत्रालय में होने वाली किसी भी घटना का नैतिक उत्तरदायित्व लेना चाहिए। उन्होंने अपना त्यागपत्र प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंपा। आरंभ में नेहरू ने इसे अस्वीकार कर दिया किंतु शास्त्री ने आग्रह किया। अंततः उनका त्यागपत्र स्वीकार कर लिया गया।

विधायिका और कार्यपालिका के मध्य अंतर
विधायिका और कार्यपालिका के मध्य प्रमुख अंतर को समझना आवश्यक है। निम्नलिखित तालिका संक्षेप में इनका सारांश प्रस्तुत करती है।
| पहलू | विधायिका | कार्यपालिका |
|---|---|---|
| संरचना | भारत की संसद देश का सर्वोच्च विधायी निकाय है, जो राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा से मिलकर बनता है। | सर्वोच्च विधायी निकाय है, जो राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा से मिलकर बनता है। कार्यपालिका कार्यपालिका राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद से गठित होती है। |
| मुख्य भूमिका | कानून बनाना और कार्यपालिका के कार्यों की देख-रेख करना। | विधायिका द्वारा निर्मित कानूनों को लागू करना। |
| कार्य | संसद में विधेयक प्रस्तुत कर सकती है। | अधिकांश विधेयक कार्यपालिका द्वारा संसद में प्रस्तुत किए जाते हैं। |
| कार्यपालिका की गतिविधियों पर प्रश्न पूछकर स्पष्टीकरण माँगती है। | विधायिका को अपने निर्णयों और कार्यों के बारे में जानकारी और स्पष्टीकरण प्रदान करती है। राष्ट्रपति को महत्वपूर्ण मामलों में सहायता और सलाह देती है जिसमें संसद के सत्र बुलाना भी सम्मिलित है। | |
| सभी सरकारी व्ययों को अनुमोदित करती है। | संसद द्वारा अनुमोदित बजट तैयार करती है एवं उसे लागू करती है। | |
| विभिन्न संसदीय समितियों से परामर्श करती है। | दैनिक मामलों में स्वतंत्र रूप से कार्य करती है तथा आवश्यकता पड़ने पर समितियों से परामर्श कर सकती है। |
न्यायपालिका - नियंत्रण और संतुलन की भूमिका
न्यायपालिका, सरकार का वह अंग है जो देश के कानूनों की व्याख्या तथा क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी है, जिसमें विवादों का निपटारा भी सम्मिलित है। न्यायपालिका न्यायालयों की प्रणाली के माध्यम से कार्य करती है और समाज एवं शासन की लोकतांत्रिक प्रकृति को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। न्यायपालिका संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करते हुए यह सुनिश्चित करती है कि सरकार की सभी शाखाएँ संविधान में निहित सिद्धांतों और मानदंडों के अनुसार कार्य करें। यह कानूनों की व्याख्या, विवादों का समाधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा कर समाज और सरकारी संस्थाओं के कार्यकलापों पर दृष्टि रखती है।
संविधान न केवल यह बताता है कि विधायिका और कार्यपालिका को देश पर शासन करने की शक्ति कैसे मिली है, अपितु यह इन अंगों के विशिष्ट उत्तरदायित्वों को भी सूचीबद्ध करता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि विधायिका की शक्तियों का उचित उपयोग हो और उत्तरदायित्व का पालन हो, न्यायपालिका को यह जाँचने का अनूठा और महत्वपूर्ण अधिकार दिया गया है कि संसद द्वारा पारित कानूनों ने संवैधानिक ढाँचे का उल्लंघन न किया हो। इसी प्रकार, यदि कार्यपालिका द्वारा कानूनों के कार्यान्वयन के दौरान संविधान का उल्लंघन होता है तो न्यायपालिका के पास पुनः हस्तक्षेप करने की शक्ति है। जिस प्रकार संसद विधायिका और कार्यपालिका के माध्यम से कार्य करती है, उसी प्रकार न्यायपालिका भी अपने न्यायालयों के माध्यम से कार्य करती है।
इस अध्याय में, हमने यह जाना कि संसद के अंतर्गत सरकार के अंग किस प्रकार कानून बनाने और उसे लागू करने के मध्य संतुलन स्थापित करते है और न्यायपालिका उनके कार्यों की जाँच कैसे करती है। ये सभी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण और नियंत्रण एवं संतुलन की प्रणाली के उदाहरण हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी अंग अत्यधिक शक्तिशाली न हो जाए।
हम अगले अध्याय में न्यायपालिका के बारे में और अधिक जानेंगे।
आइए पता लगाएँ
- यदि तीनों अंगों में से किसी एक विधायिका, कार्यपालिका या न्यायपालिका के पास समस्त शक्ति आ जाए, तब क्या हो सकता है? यह लोगों के अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है? इस विषय पर अपने सहपाठियों से विचार-विमर्श कीजिए कि प्रत्येक अंग किस प्रकार दूसरे अंग पर नियंत्रण रखता है। उदाहरण के लिए, विधायिका किस प्रकार न्यायपालिका की कार्यवाही पर प्रश्न उठाती है?
न्यायपालिका किस प्रकार सुनिश्चित करती है कि निर्मित कानून और शासकीय कार्य संविधान के अनुरूप हों? क्या आपको लगता है कि न्यायपालिका की कार्यवाहियों की भी किसी प्रकार समीक्षा की जा सकती है? - क्या आप ऐसे उदाहरण ढूँढ़ सकते हैं जहाँ न्यायपालिका ने कानून बनाने वालों से किसी कानून की समीक्षा करने के लिए कहा हो? क्या आप ऐसे उदाहरण भी ढूँढ़ सकते हैं जहाँ किसी कानून के क्रियान्वयन पर न्यायपालिका ने प्रश्न उठाए हों?
हम अगले अध्याय में न्यायपालिका के विषय में और जानेंगे।
राज्य स्तर पर विधायी और कार्यपालिका संबंधी कार्य
जैसी चर्चा की गई, केंद्र सरकार में एक संसद है जिसके विधायी और कार्यपालिका संबंधी कार्य हैं। इसी प्रकार, प्रत्येक राज्य की अपनी विधान सभा और कार्यपालिका होती है। राज्य की विधायिका को 'राज्य विधानमंडल' कहा जाता है। जिस प्रकार संसद में संसद के सदस्य (सांसद) होते हैं जो कानून बनाते हैं, उसी प्रकार विधान सभा के सदस्य (विधायक) होते हैं, जो 'राज्य सूची' और 'समवर्ती सूची' के विषयों पर कानून बनाते हैं।
संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची

संविधान में ऐसी सूचियाँ दी गई हैं जो यह स्पष्ट करती हैं कि किन विषयों पर संघ और राज्य सरकारें पृथक रूप से कानून बना सकती हैं। इन्हें क्रमशः संघ सूची और राज्य सूची कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, एक समवर्ती सूची भी है जिसमें वे विषय सम्मिलित हैं जिन पर संघ और राज्य दोनों सरकारें कानून बना सकती हैं। परंतु यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर संघ सरकार कानून बना देती है, तो राज्य सरकार को उसका पालन करना अनिवार्य होता है। उदाहरण के लिए, शिक्षा का विषय समवर्ती सूची में होने के बावजूद शिक्षा का अधिकार अधिनियम संपूर्ण भारत में लागू है।
भारत में संघ और राज्य सरकारों की समानांतर संरचना
राज्य स्तर पर संरचना संघ स्तर की संरचना के समान है। आप दोनों स्तरों की इस संरचना को तालिका में देख सकते हैं-| विशेषताएँ | संघ सरकार | राज्य सरकार |
|---|---|---|
| संवैधानिक प्रमुख | भारत के राष्ट्रपति, निर्वाचन मंडल द्वारा निर्वाचित | राज्य के राज्यपाल, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त |
| सरकार के प्रमुख का कार्यकाल | 5 वर्ष | 5 वर्ष |
| कार्यकारी अध्यक्ष | केंद्र में राष्ट्रपति औपचारिक प्रमुख होता है, परंतु वास्तविक कार्यकारी प्रमुख प्रधानमंत्री होता है। | राज्य में राज्यपाल औपचारिक प्रमुख होता है, परंतु मुख्यमंत्री वास्तविक प्रमुख होता है। |
| कार्यकारिणी का चयन | लोकसभा में बहुमत दल /गठबंधन के नेता करते हैं। | विधान सभा में बहुमत दल/गठबंधन के नेता करते हैं। |
| मंत्रिपरिषद | प्रधानमंत्री द्वारा चयनित | मुख्यमंत्री द्वारा चयनित |
| उत्तरदायित्व | लोकसभा के प्रति उत्तरदायी | विधान सभा के प्रति उत्तरदायी |
| विधानमंडलीय संरचना | द्विसदनीय लोकसभा और राज्यसभा | एकसदनीय (केवल विधान सभा) या द्विसदनीय (विधान सभा एवं विधान परिषद) दोनों हो सकता है। |
| निम्न सदन | लोकसभा | विधान सभा |
| उच्च सदन | राज्यसभा | विधान परिषद - केवल कुछ राज्यों में |
| निम्न सदन का कार्यकाल | 5 वर्ष | 5 वर्ष |
| पीठासीन अधिकारी (निम्न सदन) | अध्यक्ष | अध्यक्ष |
| विधायी शक्तियाँ | संघ सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाती है। | राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाती है। |
| वित्तीय शक्तियाँ | वित्तीय बजट केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत हो सकता है। | वित्तीय बजट केवल विधान सभा में ही प्रस्तुत हो सकता है। |
राज्य विधानमंडलों की संरचना
केंद्र के विपरीत, राज्य विधानमंडल 'एकसदनीय' (केवल एक सदन वाला) या 'द्विसदनीय' (दो सदनों वाला) हो सकता है। निम्न सदन को विधान सभा और उच्च सदन को विधान परिषद कहा जाता है। जिन राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था है, वे हैं- आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश। शेष राज्यों में एकसदनीय व्यवस्था है।

आइए पता लगाएँ
आपके राज्य में किस प्रकार की विधायिका है?
विधायिका के प्रभावी कामकाज की चुनौतियाँ
जैसे कि चर्चा की गई है, भारतीय विधायिका (जिसमें केंद्र में संसद और राज्यों में विधानमंडल सम्मिलित हैं) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कानून बनाने, प्रशासनिक प्रक्रियाओं की निगरानी करने और बजट को अनुमोदित करने का कार्य करती है। यह राष्ट्रीय नीतियों, विकास योजनाओं, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और जन-समस्याओं के समाधान पर विचार-विमर्श के लिए भी मंच प्रदान करती है। किंतु इन सभी उत्तरदायित्वों को निभाने में विधायिका को कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। इनमें से कुछ चुनौतियाँ यह हो सकती हैं- सदस्यों की नियमित अनुपस्थिति, सदस्यों का असहयोगात्मक व्यवहार या संवाद, महत्वपूर्ण चर्चाओं की गुणवत्ता में कमी और प्रश्नकाल का बाधित होना।
सामान्यतः संसद साल में तीन बार बैठती है। इन बैठकों को 'सत्र' कहा जाता है-बजट सत्र, मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र। प्रत्येक सत्र में कई बैठकें होती हैं, जहाँ संसद प्रस्तावित विधेयकों पर विचार-विमर्श करती है, शासन के प्रमुख विषयों पर चर्चा करती है और कार्यपालिका से उसके निर्णयों और कार्यों पर स्पष्टीकरण माँगती है। सामान्यतः संसद सत्र प्रतिदिन 6 घंटे चलता है। आवश्यकता पड़ने पर विशेष अवसरों पर अथवा अत्यधिक कार्यों को पूरा करने के लिए यह समय बढ़ाया भी जा सकता है। राज्य विधानसभाओं की कार्यप्रणाली भी इसी प्रकार की होती है।
आइए पता लगाएँ
- नीचे दी गई सारणी का अध्ययन कीजिए। संसद के कामकाज के विषय में समय के साथ आप कौन-से निष्कर्ष निकाल सकते हैं? हाल के वर्षों के आँकड़े भी संकलित कीजिए।
- पूर्व राज्यसभा अध्यक्ष एम. वेंकैया नायडू द्वारा 2021 में दिया गया यह वक्तव्य पढ़िए- "2004 से 2014 के मध्य राज्यसभा की उत्पादकता लगभग 78% रही, किंतु इसके पश्चात यह घटकर लगभग 65% रह गई। जिन 11 सत्रों की अध्यक्षता मैंने की, उनमें से चार सत्रों में उत्पादकता बहुत कम रही - 6.80%, 27.30%, 28.9% और 29.55%। राज्यसभा ने वर्ष 2018 में अब तक की सबसे न्यून उत्पादकता 35.75% दर्ज की, जो निरंतर व्यवधानों के कारण थी।" इस वक्तव्य से आप क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं? इसका राज्य सभा की भूमिका पर क्या प्रभाव पड़ता है?
| लोकसभा की अवधि | सत्रों की संख्या | बैठकों की संख्या |
|---|---|---|
| पहली लोकसभा (1952-1957) | 14 | 677 |
| दूसरी लोकसभा (1957-1962) | 16 | 567 |
| दसवीं लोकसभा (1991–1996) | 16 | 423 |
| तेरहवीं लोकसभा (1999-2004) | 14 | 356 |
संसद और राज्य विधानसभाओं की परिकल्पना ऐसे मंचों के रूप में की गई है जहाँ विचारशील वाद-विवाद और चर्चाएँ हों और जनता के हित में कानून बनाए जाएँ। किंतु जब ये चर्चाएँ बाधित होती हैं, सत्रों की अवधि संक्षिप्त की जाती है और अनेक विधेयकों पर चर्चा करने और पारित होने में अत्यधिक समय लग जाता है, तो यह एक चिंताजनक विषय बन जाता है।
आइए पता लगाएँ
- एक लघु समूह परियोजना के रूप में कार्य कीजिए। अपने राज्य या संघ शासित प्रदेश में विधायिका की कार्यप्रणाली से संबंधित आँकड़े संकलित कीजिए।
- किसी विधायक से समय लेकर भेंट कीजिए और राज्य विधानमंडल से संबंधित चुनौतियों के बारे में जानकारी एकत्रित कीजिए।
समाज के कुछ वर्गों द्वारा इस बात पर चिंता व्यक्त की गई है कि लोकसभा के प्रतिनिधियों का एक बड़ा भाग आपराधिक मामलों का सामना कर रहा है। इसके अतिरिक्त, कई बार लोकसभा की बैठकों में क्रोध या पक्षपात के कारण से विचार-विमर्श सुचारु रूप से नहीं हो पाता और जनता से संबंधित महत्वपूर्ण विषयों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
मीडिया भी मतदाताओं की चिंताओं को व्यक्त करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। यहाँ दिए गए व्यंग्यचित्र इन्हें हास्य के साथ प्रस्तुत करते हैं, जो सभी स्वस्थ लोकतंत्रों में सामान्य बात है।
फिर भी, हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था उतनी ही सशक्त होती है, जितने जागरूक और सक्रिय हमारे नागरिक होते हैं। प्रश्न पूछकर, अपने विचार साझा करने से और सार्वजनिक चर्चाओं में भाग लेकर लोग उत्तम नीतियाँ बनाने में सहायता करते हैं।


इसलिए, भारत की विधायिका संबंधी चुनौतियों से निपटने का एक श्रेष्ठ उपाय यह है कि अधिकाधिक नागरिक समाज के महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी रखें, डिजिटल माध्यमों पर सार्वजनिक चर्चाओं के माध्यम से भाग लें और नीतियों पर विभिन्न शासकीय विभागों द्वारा नीति-निर्माण की प्रक्रियाओं में उपलब्ध कराए गए डिजिटल मंचों पर विचार रखें तथा नीतियों पर राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ें।
अब बहुत से युवा नेता और भिन्न विचार रखने वाले लोग भी राजनीति में आ रहे हैं। प्रौद्योगिकी की सहायता से अब शासन से जुड़े रहना और उसमें भाग लेना पहले से आसान हो गया है। भावी मतदाता के रूप में आपके चुनाव और आपकी सहभागिता संसद तथा आपके राज्य की विधान सभा को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे, जिससे वे वास्तव में सभी लोगों की सेवा कर सकें।
इसे अनदेखा न करें

- भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में अपने एक भाषण में कहा था-
“सरकारें आएँगी, जाएँगी। पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी। मगर यह देश रहना चाहिए, इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।"
- आपके विचार से यह कथन लोकतंत्र में संसद और नेताओं की भूमिका के बारे में क्या संदेश देता है? जब राजनैतिक शक्ति बदलती है तब भी लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना क्यों आवश्यक है?
आगे बढ़ने से पहले...
- भारत की संसदीय प्रणाली यह सुनिश्चित करती है कि सत्ता साझा हो, निर्णयों पर विचार-विमर्श हो और नेताओं को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाया जाए।
- विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि सभी संविधान का पालन करें।
- संसद जनता का प्रतिनिधित्व करती है और हमारे लोकतंत्र की संघीय भावना को प्रकट करती है।
- केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर ऐसी संरचनाएँ बनाई गई हैं, जो प्रतिनिधित्व, उत्तरदायित्व और एकता में संतुलन स्थापित करती हैं।
- संस्थाओं के बीच संतुलन नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने में सहायता करता है।
- संसद के कामकाज को अधिक कुशल और उत्पादक बनाने की आवश्यकता है जिससे देश की प्रगति बाधित न हो।
प्रश्न और क्रियाकलाप
- पता लगाइए कि आपके राज्य से संसद के प्रत्येक सदन में कितने प्रतिनिधि हैं।
- वे कौन-से तत्व हैं जो भारतीय संसद को 'जनता की आवाज' बनाते हैं? यह कैसे सुनिश्चित करती है कि विभिन्न विचारों को सुना जाए?
- आपके विचार से संविधान ने कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी क्यों बनाया?
- आपके अनुसार केंद्र स्तर पर द्विसदनीय विधायिका क्यों चुनी गई?
- हाल ही में संसद में पारित किसी विधेयक की पूरी प्रक्रिया को समझने का प्रयास कीजिए। जानिए कि वह विधेयक सबसे पहले किस सदन में प्रस्तुत किया गया था। क्या उस पर कोई बड़ी चर्चा या विरोध हुआ था? इस विधेयक को कानून बनने में कितना समय लगा? इसके लिए आप समाचार-पत्रों की पुरानी खबरें, सरकारी वेबसाइटें और लोकसभा की चर्चाएँ देख सकते हैं। आवश्यकता हो तो अपने शिक्षक से सहायता लीजिए।
- संसद द्वारा हाल ही में पारित किसी कानून का चयन कीजिए। कक्षा को अलग-अलग समूह में बाँटिए- कुछ विद्यार्थी लोकसभा और राज्यसभा के सांसद बनें, कुछ मंत्री बनें जो प्रश्नों के उत्तर दें और कोई राष्ट्रपति की भूमिका निभाए। सभी मिलकर एक लघु नाटिका तैयार करें जिसमें दर्शाया जाए कि एक विधेयक संसद में कैसे प्रस्तुत होता है, कैसे उस पर चर्चा होती है, वह पारित होता है और अंत में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर कानून बन जाता है। एक 'मॉडल संसद' का मंचन कीजिए।
- महिला आरक्षण विधेयक, 2023 व्यापक समर्थन के साथ पारित हुआ। इतने लंबे समय तक चर्चा के बाद भी इस विधेयक को पारित होने में 25 वर्ष से अधिक समय क्यों लगा?
- कभी-कभी संसद बाधित हो जाती है और जितने दिनों तक इसे कार्य करना चाहिए, उतना कार्य नहीं कर पाती। आपको क्या लगता है कि इसका कानूनों की गुणवत्ता और लोगों के अपने प्रतिनिधियों के प्रति विश्वास पर क्या प्रभाव पड़ता है?
- क्या आप विद्यार्थियों के बीच हित समूह बनाकर किसी नीति से संबंधित प्रश्नों की एक सूची तैयार कर सकते हैं, जिन्हें आप अपने सांसद या विधायक से पूछना चाहेंगे? यही प्रश्न विधायक के स्थान पर सांसद से पूछें जाएँ तो उनमें क्या अंतर होगा? और यदि सांसद की जगह विधायक से पूछेंगे तो प्रश्न कैसे भिन्न होंगे?
- भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की क्या भूमिका है? यदि हमारे पास स्वतंत्र न्यायपालिका न हो तो क्या हो सकता है?