अध्याय-3
संख्याओं की कहानी
3.1 रीमा की जिज्ञासा
एक सुस्त दोपहरी में रीमा एक पुरानी पुस्तक के पृष्ठ पलट रही थी तभी एक पन्ना सर्र... से पुस्तक से निकलकर हवा में उड़ता हुआ जमीन पर जा गिरा। उसने उस पन्ने को उठाया और उस पर बने कुछ अलग प्रकार के प्रतीकों को एकटक देखने लगी। "ओह! यह क्या है?" वह अचंभित हुई।
रीमा उस पन्ने को लेकर अपने पिताजी की ओर दौड़ी जैसे यह कोई गुप्त खजाना हो। उसके पिताजी ने उस पन्ने को देखा और मुस्कुराने लगे। उन्होंने कहा,
"लगभग 4000 वर्ष पूर्व एशिया के पश्चिमी भाग में मेसोपोटामिया नामक स्थान पर एक सभ्यता फली-फूली। यह वह स्थान था जिसमें वर्तमान समय के ईराक का एक बड़ा भाग एवं कुछ अन्य पड़ोसी देश सम्मिलित हैं। यह उनके अंक लिखने के तरीकों में से एक है।"
रीमा की आँखें चमक उठीं। "क्या सच में! ये विभिन्न प्रतीक संख्याएँ थीं?" उसकी जिज्ञासा और बढ़ गई और उसके मस्तिष्क में अनेक प्रश्न उठने लगे।
- मनुष्य ने कब से गिनना आरंभ किया?
- उन्हें गिनने की क्या आवश्यकता थी? वे क्या गिनते थे?
- मनुष्य ने कब से संख्याओं को आधुनिक रूप में लिखना आरंभ किया?
- मेसोपोटामिया के लोग 20, 50, 100, ..... को कैसे लिखते होंगे?
रीमा की जिज्ञासा को भाँपते हुए उसके पिताजी ने बताना प्रारंभ किया कि कैसे संख्या व संख्या निरूपण का विचार समय के साथ सभी भौगोलिक क्षेत्रों में विकसित होते हुए अंततः अपने आधुनिक रूप में पहुँच गया। अब आप उनके साथ अतीत में यात्रा करने के लिए तैयार हो जाइए!
शताब्दियो पूर्व पाषाण युग से ही मनुष्य को गिनती करने की आवश्यकता हुई। वे अपने पास उपलब्ध फल, सब्जी, अनाज इत्यादि की मात्रा, अपने पशुधन की संख्या, वस्तुओं के व्यापार संबंधी विवरण, अनुष्ठानों में दी गई भेंट की संख्या आदि को निर्धारित करने के लिए किया करते थे। वे विगत दिनों की जानकारी भी रखना चाहते थे जिससे वे यह जान सकें व पूर्वानुमान कर सकें कि अमावस्या, पूर्णिमा या किसी ऋतु का आगमन जैसी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ कब-कब घटित होंगी। यद्यपि जब वे ऐसी संख्या बोलते या लिखते थे तो वे आधुनिक संख्याओं का उपयोग नहीं करते थे जिनका हम वर्तमान में करते हैं।
वर्तमान में उपयोग की जाने वाली आधुनिक मौखिक व लिखित संख्याओं की संरचना की उत्पत्ति हजारों वर्ष पूर्व भारत में हुई थी। प्राचीन भारतीय ग्रंथ, जैसे यजुर्वेद संहिता में 10 की घातों के आधार पर संख्याओं के नामों का उल्लेख लगभग वैसा ही है जैसा आज हम उन संख्याओं को मौखिक रूप में पढ़ते हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने एक (एकक), दस (दश), सौ (शत), हजार (सहस्त्र), दस हजार (अयुत) आदि से लेकर 1012 और उसके आगे की संख्याओं के नाम सूचीबद्ध किए हैं।
वर्तमान में 0 से 9 तक के अंकों का प्रयोग करके जिस प्रकार हम अपनी संख्याएँ लिखते हैं उसकी उत्पत्ति व विकास भी लगभग 2000 वर्ष पूर्व भारत में ही हुआ था। अंक 0 (जिसे तब एक बिंदु के रूप में चिह्नित किया जाता था) को मिलाकर 10 अंकों का उपयोग करके लिखी गई संख्याओं का पहला ज्ञात उदाहरण बख्शाली पांडुलिपि (लगभग तीसरी शताब्दी सामान्य संवत्) में मिलता है।
499 सामान्य संवत् में आर्यभट्ट पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने 10 प्रतीकों वाली भारतीय पद्धति को पूर्णतः स्पष्ट किया एवं इसका उपयोग करके वैज्ञानिक गणनाओं की व्याख्या की।
भारतीय संख्या पद्धति लगभग 800 सामान्य संवत् तक अरब जगत में पहुँच गई थी। इसे महान पारसी गणितज्ञ अल-ख्वारिज्मी (जिनके नाम पर एल्गोरिद्म शब्द बना) ने अपनी पुस्तक ऑन द कैलकुलेशन विद हिंदू न्यूमेरल्स (825 सामान्य संवत्) और प्रसिद्ध दार्शनिक अल-किंदी ने अपनी पुस्तक ऑन द यूज ऑफ द हिंदू न्यूमेरल्स (830 सामान्य संवत्) के माध्यम से अरब जगत में लोकप्रिय बनाया।
लगभग 1100 सामान्य संवत् तक अरब जगत से हिंदू अंक यूरोप और अफ्रीका के कुछ भागों में पहुँच चुके थे। यद्यपि अल-ख्वारिज्मी द्वारा लिखित पुस्तक ऑन द कैलकुलेशन विद हिंदू न्यूमेरल्स का लैटिन में अनुवाद हो चुका था परंतु वास्तव में ये इतालवी गणितज्ञ फिबोनाची ही थे जिन्होंने लगभग 1200 सामान्य संवत् में भारतीय संख्या पद्धति को यूरोप में अपनाने के लिए तैयार किया।
परंतु उस समय रोमन अंक यूरोपीय विचारधारा और लेखन में इतने गहराई से जुड़े हुए थे कि कई शताब्दियों तक भारतीय अंकों का व्यापक प्रयोग नहीं हो पाया था। किंतु यूरोपीय पुर्नजागरण के समय और 17वीं शताब्दी तक इन्हें अपनाना नितांत आवश्यक हो गया था अन्यथा इससे उस समय की वैज्ञानिक प्रगति में बाधा उत्पन्न होती।
"प्रत्येक संभावित संख्या को 10 प्रतीकों (जिसमें से प्रत्येक प्रतीक का एक स्थानीय मान तथा एक निरपेक्ष मान हो) के समूह द्वारा व्यक्त करने की विशुद्ध पद्धति भारत में विकसित हुई। वर्तमान में यह विचार इतना साधारण लगता है कि इसकी उपयोगिता और अति महत्ता को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता। इसकी सरलता इस बात में निहित है कि इसने गणनाओं को सरल बनाया और अंकगणित को उपयोगी आविष्कारों में स्थान दिलवाया।"
इसके उपरांत इन दस अंकों का प्रयोग प्रत्येक महाद्वीप तक विस्तारित हो गया और वर्तमान में ये विश्व के प्रत्येक कोने में उपयोग किए जाते हैं।
चूँकि यूरोपियन विद्वानों ने भारतीय संख्यांकों की समझ अरब जगत से प्राप्त की। अतः अपने यूरोपियन परिप्रेक्ष्य में उन्होंने इन संख्यांकों को 'अरबी संख्यांक' कहा। दूसरी ओर जैसा कि ऊपर उल्लेखित है अरब विद्वानों, जैसे- अल-ख्वारिज्मी और अल-किंदी ने इन्हें 'हिंदू संख्यांक' कहा है।
यूरोप में औपनिवेशिक काल में यूरोपीय शब्द 'अरबी संख्याएँ' व्यापक रूप से प्रचलित हुआ। यद्यपि वर्तमान में इस त्रुटि को यूरोप सहित विश्व की अनेक पाठ्यपुस्तकों और दस्तावेजों में सुधारा जा रहा है।
वर्तमान में संख्याओं के लिए हम जिन सर्वाधिक प्रचलित शब्दावलियों का उपयोग कर रहे हैं वे 'हिंदू संख्यांक', 'भारतीय संख्यांक' एवं संक्रमणकालीन 'हिंदू-अरबी संख्यांक' हैं।
यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि 'हिंदू' शब्द किसी धर्म को नहीं परंतु उस क्षेत्र या वहाँ के लोगों को संदर्भित करता है जहाँ से ये अंक आए हैं।
वर्तमान में भारतीय संख्या पद्धति में संख्याओं को लिखने के लिए प्रयुक्त अंकों 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 की संरचना एक लंबे समय में विकसित हुई जैसा कि नीचे दर्शाया गया है।
भारतीय अंक प्रणाली को वैश्विक स्तर पर अपनाए जाने से पूर्व विभिन्न जन समुदाय संख्याओं को दर्शाने के लिए विभिन्न विधियों का प्रयोग करते थे। हम उनमें से कुछ विधियों की संक्षेप में चर्चा करेंगे। इन पद्धतियों को हम कालानुक्रम में नहीं परंतु एक ऐसे क्रम में देखेंगे जो संख्या निरूपण की अवधारणा के विकास के मुख्य चरणों को दर्शाता है।
आइए, सबसे पहले हम किसी दिए गए संग्रह में वस्तुओं की संख्या गिनने और निर्धारित करने के लिए आवश्यक कुछ मूलभूत विधियों की खोज करते हैं।
गणन की क्रियाविधि
कल्पना कीजिए कि हम लगभग दस हजार वर्ष पूर्व के पाषाण युग में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। मान लीजिए कि हमारे पास गायों का एक झुंड है। यहाँ कुछ स्वाभाविक प्रश्न दिए गए हैं जो हम झुंड के विषय में पूछ सकते हैं-
- ? प्रश्न 1. हम यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि सभी गायें चरने के पश्चात अपने स्थान पर सुरक्षित वापस आ गई हैं?
- ? प्रश्न2. क्या हमारे पास अपने पड़ोसी की तुलना में कम गायें हैं?
- ?प्रश्न 3. यदि हमारे पास गायों की संख्या कम है तो हमें कितनी और अधिक गायों की आवश्यकता होगी जिससे हमारी और हमारे पड़ोसी की गायों की संख्या एक समान हो जाए।
हमें इन प्रश्नों को हिंदू संख्या पद्धति के अनुसार संख्या-नाम या लिखित संख्याओं का प्रयोग किए बिना हल करना होगा। बताइए कि हम इसे कैसे हल कर सकते हैं? आगे कुछ संभावित विधियाँ दी गई हैं।
विधि 1– हम कंकड़, छड़ियाँ या कोई भी ऐसी वस्तु जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो, उनका उपयोग करके प्रश्नों को हल कर सकते हैं। आइए, छड़ियाँ लेते हैं। झुंड की प्रत्येक गाय के लिए हम एक छड़ी रख सकते हैं। अंत में संग्रहीत छड़ियाँ हमें गायों की वह संख्या दर्शाती है जिसका उपयोग यह ज्ञात करने के लिए किया जा सकता है कि कोई गाय खोई तो नहीं है।
प्रत्येक गाय के संगत एक छड़ी रखने की यह विधि जिसमें कोई भी दो गायें एक ही छड़ी से संबंधित नहीं हों एकैकी प्रतिचित्रण (वन-टू-वन मैपिंग) कहलाता है। इस प्रतिचित्रण का प्रयोग संख्याओं को दर्शाने की विधि के रूप में किया जा सकता है जैसा कि निम्न तालिका में दर्शाया गया है।
? आप अन्य दो प्रश्नों (प्रश्न 2 और प्रश्न 3) के उत्तर देने के लिए छड़ियों का उपयोग किस प्रकार करेंगे?
विधि 2 – हम वस्तुओं के स्थान पर ध्वनियों या नामों के एक मानक अनुक्रम का उपयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए हम किसी भी भाषा के वर्णों की ध्वनियों का उपयोग कर सकते हैं। गिनती करते समय हम वस्तुओं और वर्णों के मध्य एकैकी प्रतिचित्रण बना सकते हैं अर्थात गणना की जाने वाली प्रत्येक वस्तु को वर्ण-क्रम का पालन करते हुए एक वर्ण से जोड़ सकते हैं। इस प्रतिचित्रण का उपयोग संख्याओं के मौखिक निरूपण की एक विधि के रूप में किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए यदि हम अंग्रेजी के वर्णों 'a' से 'z' तक का उपयोग करें तो हमें निम्नलिखित संख्या निरूपण प्राप्त होगा ।
केवल अंग्रेजी वर्णमाला के वर्णों का उपयोग इस रूप में करने की एक स्पष्ट सीमा यह है कि इसका उपयोग 26 से अधिक वस्तुओं वाले समूहों की गिनती करने के लिए नहीं किया जा सकता है।
? आप अपनी भाषा के वर्णों की ध्वनियों का उपयोग करके इस प्रकार से कितनी संख्याओं को निरूपित कर सकते हैं?
विधि 3 – हम लिखित प्रतीकों के एक अनुक्रम को निम्न प्रकार से प्रयोग कर सकते हैं-
?क्या आप इसी प्रकार बड़ी संख्याओं को दर्शाने के लिए भी इस विधि का विस्तार कर सकते हैं? और कैसे?
उपर्युक्त चर्चा के उपरांत हम देखते हैं कि गिनती करने के लिए या किसी संग्रह का आकार ज्ञात करने के लिए हमें वस्तुओं, नामों या लिखित प्रतीकों के एक मानक अनुक्रम की आवश्यकता होती है जिनका एक निश्चित क्रम होना चाहिए। आइए, इस मानक अनुक्रम को संख्या पद्धति नाम देते हैं। वस्तुओं के संग्रह की गणना, वस्तु और मानक अनुक्रम के मध्य क्रमिक अनुक्रम का पालन करते हुए एकैकी प्रतिचित्रण बनाकर की जा सकती है।
चूँकि संख्याओं का कोई अंत नहीं होता है, अतः संख्याओं को सरलता से गिनने के लिए एक अंतहीन मानक अनुक्रम या संख्या पद्धति बनाना एक चुनौती है। छड़ियों का उपयोग करने से एक अंतहीन मानक अनुक्रम या संख्या पद्धति प्राप्त होती है। परंतु इससे एक बड़े संग्रह की गणना करना सुविधाजनक नहीं है, क्योंकि हमें जितनी वस्तुओं की गणना करनी है उतनी ही छड़ियों की आवश्यकता होगी। विधि 2 में भाषा के वर्णों की ध्वनियों के उपयोग से गिनती करना सुविधाजनक है परंतु यह एक अंतहीन मानक अनुक्रम या संख्या पद्धति नहीं है। विधि 3 में दी गई मानक अनुक्रम या संख्या पद्धति वास्तव में यूरोप में प्रयोग की जाने वाली पद्धति थी जिसका स्थान बाद में हिंदू संख्या पद्धति द्वारा ले लिया गया। इसे रोमन संख्या पद्धति कहा जाता है। यह शताब्दियों तक यूरोप में व्यापक रूप से उपयोग की जाती थी और अनेक उद्देश्यों के लिए सुविधाजनक थी परंतु इसमें भी यही कमी थी किसी भी बड़ी से बड़ी संख्या को लिखने के लिए अत्यधिक प्रतीकों का उपयोग करने की आवश्यकता पड़ती है। हम संख्याएँ लिखने की इस पद्धति के विषय में आगे और अधिक जानेंगे।
दी गई तीनों विधियों में दर्शाया गया है कि इतिहास हमें मूर्त वस्तुओं (जैसे-छड़ी, कंकड़, शरीर के अंग आदि), नामों और लिखित प्रतीकों का उपयोग करके बनाई गई संख्या प्रणालियों के उदाहरण प्रस्तुत करता है। कुछ व्यक्ति समूहों द्वारा संख्याओं को मूर्त वस्तुओं के साथ-साथ नामों से भी दर्शाया जाता था परंतु कुछ अन्य जैसे चीनी लोगों द्वारा उपर्युक्त तीनों रूपों में दर्शाया जाता था। लिखित संख्या पद्धति में प्रयुक्त होने वाले प्रतीकों को संख्यांक कहा जाता है। उदाहरण के लिए 0, 1, 5, 36, 193 आदि हिंदू संख्या पद्धति में पाए जाने वाले कुछ संख्यांक हैं। 'छोटी' संख्याओं को दर्शाने वाले संख्यांकों के सदैव नाम होते थे। अतः लिखित प्रतीकों से बनी संख्या पद्धति सदैव नामों से बनी संख्या पद्धति के साथ-साथ चलती थी जैसा कि आधुनिक हिंदू संख्या पद्धति में होता है।
?आइए, पता लगाएँ
1. मान लीजिए आप एक संख्या पद्धति का उपयोग कर रहे हैं जिसमें संख्याओं को दर्शाने के लिए छड़ियों का उपयोग किया जाता है जैसा कि विधि 1 में बताया गया है। हिंद संख्या पद्धति के संख्या नामों या संख्यांकों का उपयोग किए बिना दो संख्याओं या छड़ियों के दो संग्रहों के जोड़, घटाव, गुणन और विभाजन की विधि बताइए।
2. विधि 2 में दी गई संख्या पद्धति का विस्तार करने की एक विधि यह है कि एक से अधिक वर्णों वाली श्रृंखला का प्रयोग किया जाए। उदाहरण के लिए हम 27 के लिए 'aa' का प्रयोग कर सकते हैं। सभी संख्याओं को दर्शाने के लिए आप इस पद्धति को कैसे विस्तारित कर सकते हैं? ऐसा करने की अनेक विधियाँ हो सकती हैं।
3. आप स्वयं एक संख्या पद्धति बनाने का प्रयास कीजिए।
3.2 कुछ प्रारंभिक संख्या पद्धतियाँ
I. शरीर के अंगों का प्रयोग
विश्व में अनेक जन समुदायों ने गणन के लिए अपने हाथों और शरीर के अन्य अंगों का प्रयोग किया है। आइए, देखते हैं कि कैसे पापुआ न्यू गिनी के एक जन समुदाय ने इस विधि का प्रयोग किया तथा वर्तमान में भी शरीर के अंगों का मानक अनुक्रम या संख्या पद्धति के रूप में प्रयोग करते हैं।
II. हड्डियों और अन्य सतहों पर मिलान प्रतीक
किसी सतह जैसे हड्डी पर या गुफा की दीवार पर चिह्न बनाना संख्याओं को दर्शाने की प्राचीनतम विधियों में से एक है। इन प्रतीकों को मिलान प्रतीक (गणना प्रतीक) भी कहा जाता है।
इस विधि में गणना की जा रही प्रत्येक वस्तु के लिए एक चिह्न बनाया जाता है। अंत में इस प्रकार प्राप्त प्रतीकों का संग्रह वस्तुओं की कुल संख्या को दर्शाता है। यह विधि छड़ियों के प्रयोग से गिनने की विधि (विधि 1) के समान ही है, अंतर मात्र यह है कि इसमें एक छड़ी जोड़ने के स्थान पर एक चिह्न बनाया जाता है।
पुरातत्वविदों ने 20,000 वर्ष पूर्व ऐसी प्राचीन हड्डियों का पता लगाया जिन पर मिलान चिह्न बने हुए प्रतीत होते हैं। ऐसी सबसे प्राचीन ज्ञात हड्डियों जिन पर बने प्रतीकों से दर्शाया गया है वे इशांगो हड्डी और लेबोम्बो हड्डी हैं। 20,000 से 35,000 वर्ष पूर्व इंशागो हड्डी कांगो गणराज्य में खोजी गई थी। इसमें प्रतीकों को स्तंभवार व्यवस्थित किया गया है। यह संभवतः कालदर्शक पद्धति का संकेत देते हैं। दक्षिण अफ्रीका में खोजी गई लेबोम्बो हड्डी उससे भी अधिक प्राचीन एक मिलान प्रतीकों वाली छड़ी है। इस पर 29 चिह्न बने हुए हैं और इसकी अनुमानित आयु लगभग 44,000 वर्ष है। इसे प्राचीनतम गणितीय कलाकृतियों में से एक माना जाता है। संभवतः इसका प्रयोग भिन्न छड़ी या चंद्र कालदर्शक के रूप में किया गया होगा।
III. दो के बार-बार गणन से प्राप्त संख्याओं के नाम
ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी समूह गुमुलगल द्वारा उनकी संख्याओं के लिए निम्नलिखित शब्द प्रयोग किए जाते थे।
- 1 – उरापोन (urapon)
- 2 – उकासर (ukasar)
- 3 – उकासर-उरापोन (ukasar-urapon)
- 4 – उकासर-उकासर (ukasar-ukasar)
- 5 – उकासर-उकासर-उरापोन (ukasar-ukasar-urapon)
- 6 – उकासर-उकासर-उकासर (ukasar-ukasar-ukasar)
? क्या आप बता सकते हैं कि उनके संख्या नाम कैसे बनते हैं?
संख्या 3 का नाम 2 और 1 के संख्यात्मक नामों से मिलकर बना है। संख्या 4 का नाम दो बार 2 के संख्यात्मक नाम के प्रयोग से बना है।
?क्या आप देख सकते हैं कि अन्य संख्याओं के नाम कैसे बने हैं?
संख्याओं को 2 के बार-बार प्रयोग (2 के पदों में) से गिना जाता है और जिसका प्रयोग करके संख्याओं के नाम लिखे जाते हैं—
- 3 = 2 + 1
- 4 = 2 + 2
- 5 = 2 + 2 + 1
- 6 = 2 + 2 + 2
गुमुलगल ने 6 से बड़ी किसी भी संख्या को "रास" कहा है।
इस संख्या पद्धति से जुड़ी एक बहुत ही रोचक और चकित करने वाली ऐतिहासिक घटना है। आइए, दक्षिण अफ्रीका के बुशमैन तथा दक्षिण अमेरिका के मूल निवासियों की निम्नलिखित संख्या पद्धतियों को देखते हैं।
भौगोलिक रूप से इतने दूर होने और परस्पर संपर्क का प्रमाण न होने पर भी इन तीनों समूहों ने एक समान संख्या पद्धतियाँ विकसित की हैं। इतिहासकार इस विषय पर आश्चर्यचकित हैं कि ऐसा कैसे हुआ? एक सिद्धांत यह है कि संभवतः इन तीनों समूहों के व्यक्तियों के पूर्वज समान रहे होंगे जिन्होंने इस संख्या पद्धति का उपयोग किया होगा। समय के साथ उनके वंशज इन स्थानों पर आकर बस गए होंगे।
गुमुलगल संख्या पद्धति में मात्र 6 तक की संख्याओं के लिए संख्या नाम थे तथापि हम यहाँ एक विचार की उत्पत्ति देख सकते हैं। गणना के लिए 2 के बार-बार प्रयोग से संख्याओं को दर्शाने की पद्धति अन्य पद्धतियों, जैसे- मिलान पद्धति आदि से श्रेष्ठ है।
की पद्धति अन्य पद्धतियों, जैसे- मिलान पद्धति आदि से श्रेष्ठ है। विभिन्न संख्या पद्धतियों में इस विचार ने जो व्यापक रूप लिया है वह इस प्रकार है- एक निश्चित संख्या के समूहों में गिनना (जैसे गुमुलगल पद्धति के संदर्भ में 2) और बड़ी संख्याओं को दर्शाने के लिए इस समूह के आकार से जुड़े शब्द या प्रतीकों का उपयोग करना। विभिन्न संख्या पद्धतियों में सामान्य रूप से उपयोग किए जाने वाले कुछ समूह आकार 2, 5, 10 और 20 हैं। आप देखें कि रोमन पद्धति (तालिका 1) में 5 के समूह में गणन करने की अवधारणा निहित है।
एक निश्चित समूह आकार में गणना और संख्याओं को दर्शाने के लिए इस अवधारणा का प्रयोग करना संख्या पद्धतियों के विकास के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा है।
उस समय इस अवधारणा का एक कारण यह भी रहा होगा कि किसी दिए गए संग्रह के आकार को एक दृष्टि में तुरंत जानने की मनुष्य की भी एक सीमा है। आइए, निम्नलिखित गतिविधि को करने का प्रयास करें।
गतिविधिआइए, नीचे दिए गए प्रत्येक बक्से में वस्तुओं की संख्या शीघ्रता से गिनें —
आप गणना किए बिना ही किस आकार के समूह में वस्तुओं की संख्या तुरंत देख सकते हैं? अधिकांश व्यक्तियों को एक बार में 5 या उससे अधिक वस्तुओं वाले समूहों को गिनना कठिन लगता है।
एक बार में 5 या उससे अधिक वस्तुओं को देखकर संख्या को जानने में कठिनाई के कारण ही उस समय के व्यक्तियों को 5 या उससे अधिक के समूह को एक नए प्रतीक से परिवर्तित करने के लिए प्रेरित किया होगा। जैसा कि तालिका 1 में दर्शाई गई पद्धति में दर्शाया गया है।
ऐसी संख्या पद्धति का प्रयोग करने में क्या कठिनाइयाँ हो सकती हैं जो मात्र एक ही आकार के समूहों में गणना करती है? आप 1345 जैसी संख्या को उस पद्धति में कैसे निरूपित करेंगे जो मात्र 5 के बार-बार प्रयोग से गणना करती है?
यद्यपि एक निश्चित आकार के समूहों में गिनती करना और संख्याओं को दर्शाने के लिए इसका प्रयोग मिलान विधि की अपेक्षा अधिक सहज है, परंतु यह विधि बड़ी संख्याओं के लिए अधिक कठिन हो सकती है। आइए, अब अगली पद्धति में इसका एक परिष्कृत रूप देखते हैं।
IV. रोमन संख्यांक
रोमन संख्या पद्धति में 20 तक की संख्याएँ हम पहले ही देख चुके हैं। हमने देखा कि रोमन संख्या पद्धति में 1 के लिए I, 5 के लिए V और 10 के लिए X का प्रयोग होता है।
39 तक किसी भी संख्या हेतु रोमन संख्यांक प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम संख्या को अधिक से अधिक यथासंभव 10-10 के समूहों में समूहीकृत किया जाता है। शेष को यथासंभव 5-5 के समूह में समूहीकृत किया जाता है। अंत में शेष के 1-1 के समूह बनाए जाते हैं।
उदाहरण: आइए, संख्या 27 लें
27 = 10 + 10 + 5 + 1 + 1
अतः 27 के लिए रोमन संख्यांक XXVII है।
50 को XXXXX के रूप में दर्शाने के स्थान पर एक नया प्रतीक (L) दिया गया है। जिस प्रकार संख्या 4 को 5 से 1 कम के रूप में दर्शाया जाता है अर्थात IV, इसी प्रकार 40 को 50 से 10 कम अर्थात XL के रूप में दर्शाया जाता है। यद्यपि इस पद्धति का प्रयोग करने वाले इसका अनुसरण नहीं करते थे। कभी-कभी 40 को XXXX के रूप में भी दर्शाया जाता था।
रोमन संख्या पद्धति कुछ निश्चित बड़ी संख्याओं को दर्शाने के लिए नए प्रतीकों का प्रयोग करती है। आइए, उन सभी संख्याओं को जिनके लिए एक नया मूल प्रतीक होता है, उन्हें हम सांकेतिक संख्याएँ कहेंगे। और उनसे संबंधित संख्यांक दिए गए हैं।
इन प्रतीकों का प्रयोग अन्य संख्याओं को दर्शाने के लिए भी किया जाता है। उदाहरण के लिए संख्या 2367 पर विचार कीजिए। आइए इसे 1000 से प्रारंभ करते हुए सांकेतिक संख्याओं के योग के रूप में लिखते हैं। सर्वप्रथम यथासंभव 1000 लेते हैं तत्पश्चात यथासंभव 500 और इसी प्रकार आगे की सांकेतिक संख्याएँ लेते हैं तब हमें प्राप्त होता है-
2367 = 1000 + 1000 + 100 + 100 + 100 + 50 + 10 + 5 + 1 + 1अतः रोमन संख्यांकों में यह संख्या MMCCCLXVII है।
?आइए, पता लगाएँ
- निम्नलिखित संख्याओं को रोमन पद्धति में दर्शाइए –
- (i) 1222
- (ii) 2999
- (iii) 302
- (iv) 715
हम देखते हैं कि यह पद्धति पूर्व में चर्चा की गई कुछ संख्या पद्धतियों की अपेक्षा कितनी अधिक प्रभावशाली है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस पद्धति का उद्भव रोम में लगभग आठवीं शताब्दी सामान्य संवत् पूर्व में प्रचलित प्राचीन यूनानी संख्या पद्धति से हुआ होगा।
रोमन साम्राज्य के विस्तार के साथ यह पूरे यूरोप में फैल गई।
इस पद्धति की प्रभावशीलता किसी दी गई संख्या को मात्र एक समूह आकार के आधार पर समूहीकृत करने के कारण नहीं बल्कि समूह आकारों (जिन्हें सांकेतिक संख्याएँ कहते हैं) के अनुक्रम के आधार पर समूहीकृत करने और इसके पश्चात इन सांकेतिक संख्याओं के अनुक्रम द्वारा दी गई संख्या को दर्शाने से है। इतिहास में रोमन पद्धति की इस विशेषता का संख्या पद्धति के विकास में एक उल्लेखनीय योगदान है।
रोमन पद्धति अन्य पद्धतियों की तुलना में दक्ष होते हुए भी अंकगणितीय संक्रियाओं विशेषकर गुणा और भाग को सरलता से करने में इतनी सक्षम नहीं है।
उदाहरणनिम्नलिखित संख्याओं को हिंदू संख्यांकों में परिवर्तित किए बिना जोड़ने का प्रयास कीजिए।
आइए, प्रत्येक I, X और C की कुल संख्या ज्ञात करने का प्रयास करें और इन्हें सबसे बड़ी सांकेतिक संख्या से प्रारंभ करते हुए समूहीकृत करें। प्रथम दृष्टया देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि सबसे बड़ी सांकेतिक संख्या 'C' है परंतु ध्यान दीजिए कि 5C (100) मिलकर एक D (500) बनाते हैं। अतः इनका योग है
अब इसे स्वयं कीजिए।
(ख) LXXXVII + LXXVIII
? रोमन संख्यांकों में दी गई दो संख्याओं को हिंदू संख्यांकों में परिवर्तित किए बिना आप कैसे गुणा करेंगे? निम्नलिखित सांकेतिक संख्याओं के युग्मों का गुणनफल ज्ञात करने का प्रयास कीजिए। V × L, L × D, V × D एवं VII × IX
रोमन पद्धति में व्यक्ति अपनी अंकगणितीय संक्रियाओं को करने हेतु अबेकस (abacus) नामक एक गणना उपकरण का उपयोग करते थे। अबेकस के विषय में हम अगले अनुभाग में जानेंगे। यद्यपि प्रशिक्षित व्यक्ति ही इस उपकरण का प्रयोग करते थे।
ऊपर चर्चा की गई संख्या पद्धतियों पर विचार करते समय यह नहीं मानना चाहिए कि ऐतिहासिक रूप से कोई एक पद्धति पूर्व में विकसित किसी अन्य पद्धति में सुधार के रूप में विकसित हुई है। अब आगे आने वाली संख्या पद्धतियों का अध्ययन करते समय भी इस बात को ध्यान में अवश्य रखना चाहिए। प्रत्येक संख्या पद्धति के विकास की वास्तविक कहानी अत्यधिक जटिल है और कई बार स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं हो पाई है। अतः इस अध्याय से हम इसे खोजने का प्रयास नहीं करेंगे।
?आइए, पता लगाएँ
1. प्रशांत महासागर के एक द्वीप में रहने वाले मूल निवासियों का एक समूह भिन्न-भिन्न वस्तुओं को गिनने के लिए संख्या नामों के विभिन्न अनुक्रम का प्रयोग करते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? सोचकर बताइए।
2. 2 के बार-बार प्रयोग से गिनती करने की इसी विधि से गुमुलगल संख्या पद्धति की 6 से आगे की संख्याओं पर विचार कीजिए। इस पद्धति में आने वाली संख्याओं के लिए हिंदू संख्यांकों का प्रयोग किए बिना विभिन्न अंकगणितीय संक्रियाएँ (+, -, ×, ÷) करने की विधियों का पता लगाइए।
इसका उपयोग निम्नलिखित का मूल्यांकन करने के लिए कीजिए।
(i) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) + (उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन)
(ii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) − (उकासर-उकासर-उकासर)
(iii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) × (उकासर-उकासर)
(iv) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर) ÷ (उकासर-उकासर)
3. हिंदू संख्या पद्धति की उन विशेषताओं की पहचान कीजिए जो इसे रोमन संख्या पद्धति की तुलना में अधिक प्रभावी बनाती हैं।
4. इस अनुभाग में चर्चा की गई अवधारणाओं का प्रयोग करते हुए पूर्व में बनी संख्या पद्धति को परिष्कृत करने का प्रयास कीजिए।
3.3 आधार की अवधारणा
I. मिस्र की संख्या पद्धति
अब हम एक लिखित संख्या पद्धति का अवलोकन करेंगे जिसे मिस्रवासियों ने लगभग 3000 सामान्य संवत् पूर्व विकसित किया था। इस पद्धति में हम किसी दी गई संख्या को समूहीकृत करने और दर्शाने के लिए सांकेतिक संख्याओं का प्रयोग करते हैं। तथापि इस पद्धति की मुख्य विशेषता सांकेतिक संख्याओं का अनुक्रम है।
कल्पना कीजिए कि आप कंकड़ों का एक समूह बना रहे हैं। माना एक कंकड़ के लिए पहली सांकेतिक संख्या 1 है। पिछली सांकेतिक संख्या (1) के 10 संग्रहों का एक साथ समूह बनाइए। इसका आकार दूसरी सांकेतिक संख्या है जो कि 10 है। पिछली सांकेतिक संख्या (10) के 10 संग्रहों का एक साथ समूह बनाइए। इसका आकार तीसरी सांकेतिक संख्या है जो कि 10 * 10 = 100 है और इसी प्रकार हम अगली सांकेतिक संख्याएँ प्राप्त कर सकते हैं।
प्रत्येक सांकेतिक संख्या पिछली संख्या की 10 गुना है। चूँकि पहली सांकेतिक संख्या 1 है इसलिए ये सभी संख्याएँ 10 की घात हैं। इन संख्याओं के लिए लिए गए प्रतीक निम्नलिखित हैं-
- 1
- 10
- 102
- 103
- 104
- 105
- 106
- 107
रोमन संख्याओं की भाँति किसी दी गई संख्या को सांकेतिक संख्याओं के समूहों में गिना जा सकता है। यह दी गई संख्या से छोटी सबसे बड़ी सांकेतिक संख्या से आरंभ होती है। इसके पश्चात इसका प्रयोग संख्यांक निरूपित करने के लिए किया जाता है।
उदाहरण के लिए संख्या 324 जोकि
100 + 100 + 100 + 10 + 10 + 4 के समान है, उसे
के रूप में लिखा जाता है।
?आइए, पता लगाएँ
1. निम्नलिखित संख्याओं को मिस्र की संख्या पद्धति में दर्शाइए।
- 10458
- 1023
- 2660
- 784
- 1111
- 70707
II. मिस्र की संख्या पद्धति में विविधताएँ और आधार की धारणा
? पिछली सांकेतिक संख्या के समान आकार के 10 संग्रहों को एक साथ समूहीकृत (जैसा कि मिस्र पद्धति में होता था) करने के स्थान पर क्या हम पिछली सांकेतिक संख्या के अनुरूप समान आकार के 5 संग्रहों को एक साथ समूहीकृत करके एक संख्या पद्धति प्राप्त कर सकते हैं? क्या इस 5 को किसी भी धनात्मक पूर्णांक से प्रतिस्थापित किया जा सकता है?
आइए, इस संभावना की जाँच करें। माना पहली सांकेतिक संख्या 1 है।
- पिछली सांकेतिक संख्या (1) के समान आकार के 5 संग्रहों का एक साथ समूह बनाइए। इसका आकार दूसरी सांकेतिक संख्या है जो कि 5 है।
- पिछली सांकेतिक संख्या (5) के समान आकार के 5 संग्रहों का एक साथ समूह बनाइए। इसका आकार तीसरी सांकेतिक संख्या जो कि 5 × 5 = 25 है।
- पिछली सांकेतिक संख्या (25) के समान आकार के 5 संग्रहों का एक साथ समूह बनाइए। इसका आकार चौथी सांकेतिक संख्या जो कि 5 × 25 = 125 है।
अतः हमारे पास एक नई संख्या पद्धति है जहाँ प्रत्येक सांकेतिक संख्या पिछली सांकेतिक संख्या की 5 गुना है। चूँकि पहली सांकेतिक संख्या 1 है अतः ये सभी संख्याएँ 5 की घात हैं।
50 = 1
51 = 5
52 = 25
53 = 125
54 = 625
55 = 3125
?संख्या 143 को इस नई संख्या पद्धति में व्यक्त कीजिए।
आइए, हम समूहन करना आरंभ करें। 53 = 125 से प्रारंभ करते हैं क्योंकि यह संख्या 143 से छोटी सबसे बड़ी सांकेतिक संख्या है। हमेें प्राप्त होता है—
143 = 125 + 5 + 5 + 5 + 1 + 1 + 1
अतः नई पद्धति में संख्या 143 के लिए संख्यांक
हैैं।
संख्या पद्धतियाँ जिनमें सांकेतिक संख्याएँ होती हैं उनमें -
(क) पहली सांकेतिक संख्या 1 होती है।
(ख) प्रत्येक अगली सांकेतिक संख्या वर्तमान सांकेतिक संख्या को किसी निश्चित संख्या n से गुणा करके प्राप्त की जाती है।
इसे आधार-n संख्या पद्धति कहा जाता है।
मिस्र की संख्या पद्धति आधार-10 पद्धति है और जो संख्या पद्धति हमने बनाई है वह आधार-5 पद्धति है। आधार-10 पद्धति को दशमलव संख्या पद्धति भी कहा जाता है।
? आइए, पता लगाएँ
-
1. निम्नलिखित संख्याओं को आधार-5 पद्धति में दिए गए प्रतीकों का प्रयोग करके लिखिए:
15, 50, 137, 293, 651 - 2. क्या ऐसी कोई संख्या है जिसे हमारी उपर्युक्त वर्णित आधार-5 पद्धति में नहीं दर्शाया जा सकता? क्यों या क्यों नहीं?
- 3. आधार-7 पद्धति की सांकेतिक संख्याओं का अभिकलन कीजिए। सामान्यतः आधार-n पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ क्या हैं?
आधार -n संख्या पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ n0 = 1 से आरंभ होने वाली n की घातें
1, n, n2, n3 ...
आधार- n पद्धति के लाभकिसी संख्या की सभी घातों से बनने वाली सांकेतिक संख्याएँ लेने के क्या लाभ हैं? आइए, इसे समझने के लिए सांकेतिक संख्याओं का प्रयोग करके कुछ अंकगणितीय संक्रियाएँ करें।
आइए, । और ∩ की कुल संख्या ज्ञात करने का प्रयास करे और उन्हें सबसे बड़ी संभव सांकेतिक संख्या से प्रारंभ करते हुए समूहन करें। इनका योग है-|
15 ∩ और 15
चूँकि 10 ∩ से अगली सांकेतिक संख्या
होती है,
अतः उपर्युक्त योग का पुनः समूहन किया जा सकता है। जैसे—
चूँकि 10 | से एक ∩ प्राप्त होता है अतः
? आइए, पता लगाएँ
1. निम्नलिखित मिस्र संख्यांकों का योग ज्ञात कीजिए।
2. निम्नलिखित संख्यांकों का योग हिंदू संख्या पद्धति द्वारा निर्मित आधार-5 पद्धति में ज्ञात कीजिए।
स्मरण रखिए इस पद्धति में सांकेतिक संख्या का 5 गुना करने पर अगली सांकेतिक संख्या प्राप्त होती है।
मैं मिस्र और हिंदू पद्धति में संख्याओं के योग की विधि में समानता देखती हूँ।
आधार-n वाली संख्या पद्धति में किए गए योग की पुनर्व्यवस्थापन रोमन पद्धति में किए योग से कीजिए। रोमन पद्धति में समूहन और पुनर्व्यवस्थापन सावधानीपूर्वक करना होता है क्योंकि अगली संख्या प्राप्त करने के लिए प्रत्येक सांकेतिक संख्या को सदैव एक ही आकार में समूहीकृत नहीं किया जाता है।
गुणन प्रक्रिया में आधार वाली संख्या पद्धति का लाभ और अधिक स्पष्ट हो जाता है।
? मिस्र संख्यांकों में दो संख्याओं का गुणा किस प्रकार करें?
आइए, सर्वप्रथम दो सांकेतिक संख्याओं के गुणनफल पर विचार करें।
? 1. किसी सांकेतिक संख्या को ∩ (अर्थात 10) से गुणा करने पर क्या प्राप्त होता है? निम्नलिखित गुणनफल ज्ञात कीजिए।
प्रत्येक सांकेतिक संख्या 10 की एक घात है अतः इसे 10 से गुणा करने पर इसमें 1 घात की वृद्धि होती है जिससे अगली सांकेतिक संख्या प्राप्त होती है।
? 2. किसी सांकेतिक संख्या को
102 से गुणा करने पर क्या प्राप्त होता है?
निम्नलिखित गुणनफल ज्ञात कीजिए।
? निम्नलिखित गुणनफल ज्ञात कीजिए
अतः किन्हीं दो सांकेतिक संख्याओं का गुणनफल एक अन्य सांकेतिक संख्या होती है।
? क्या यह गुणधर्म हमारे द्वारा बनाई गई आधार-5 पद्धति में भी लागू होता है? क्या यह किसी भी आधार वाली संख्या पद्धति पर लागू होता है?
क्या मिस्र की पद्धति में किसी संख्या और ∩ 10 के गुणनफल को निकाल सकते हैं?
क्या वितरण गुणधर्म यहाँ भी लागू होगा? जिस प्रकार यह (a + b) * n के लिए लागू होता है इसी प्रकार यह तब भी लागू होता है जब किसी एक संख्या में दो से अधिक पद हों। उदाहरण के लिए (a + b + c) * n = an + bn + cn इसलिए
? निम्नलिखित का गुणनफल ज्ञात कीजिए।
? किसी संख्या को ∩ से गुणा करने का एक सरल नियम क्या होगा?
जैसा कि हमने देखा, दो संख्याओं को गुणा करने की प्रक्रिया में सांकेतिक संख्याओं का गुणन सम्मिलित होता है। जब सांकेतिक संख्याएँ किसी संख्या की घात होती हैं तो उनका गुणनफल एक अन्य सांकेतिक संख्या होती है। यह तथ्य गुणन प्रक्रिया को सरल बनाता है।
यद्यपि रोमन संख्यांकों के साथ ऐसा नहीं है। अतः उनके प्रयोग से गुणा करना कठिन होता है।
अतः वह संख्या पद्धति जिसकी सांकेतिक संख्याएँ किसी संख्या की घातें होती हैं (अर्थात किसी आधार वाली संख्या पद्धति) न केवल संख्या निरूपण में बल्कि अंकगणितीय संक्रियाओं को हल करने में भी प्रभावी होती है।
आधार वाली संख्या पद्धति की अवधारणा संख्या पद्धतियों के विकास के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था। हमारी आधुनिक हिंदू संख्या पद्धति भी इसी संरचना पर आधारित है।
दशमलव पद्धति का उपयोग करने वाला अबेकसग्यारहवीं शताब्दी के आस-पास जो लोग रोमन संख्यांकों का प्रयोग करते थे, वे भी दशमलव पद्धति के प्रयोग से निर्मित गणन यंत्र अबेकस का उपयोग करने लगे।
यह रेखाओं वाला एक बोर्ड (पट्ट) होता था, जैसा कि चित्र 3.1 में दर्शाया गया है। इस बोर्ड पर 1 को दर्शाने वाली पंक्ति से आरंभ होकर प्रत्येक अगली पंक्ति को 10 की क्रमागत घात के रूप में दर्शाया जाता है।
इसमें संख्याओं को इस प्रकार निरूपित किया गया –
- दी गई संख्या को सर्वप्रथम सांकेतिक संख्याओं (10 की घात) में समूहीकृत किया गया है ठीक उसी प्रकार जैसा हम अब तक संख्याओं का समूहन करते आए हैं।
- 10 की प्रत्येक घात के लिए उसकी पंक्ति पर उतने ही गणक (काउंटर्स रखे) गए जितनी बार वह समूहन में आता था।
- पंक्ति के ऊपर एक गणक की उपस्थिति उस पंक्ति में 5 का मान देती थी (जैसे – 5 इकाई, 5 दहाई आदि)।
उदाहरण के लिए आइए, संख्या 3426 लेते हैं। इसे निम्न प्रकार से समहीकत किया जा सकता है- 3426 = 1000 + 1000+1000+100+100+100+100+10+10+1+1+1+1+ 1+1
यह संख्या चित्र 3.1 में दर्शाए अनुसार निरूपित की गई है। ध्यान दीजिए कि 6 इकाई को कैसे निरूपित किया गया है। गणना के लिए अबेकस का प्रयोग किस प्रकार किया गया यह समझने के लिए एक सरल योग समस्या - 2907 + 43 पर विचार कीजिए। दी हुई दो संख्याएँ अबेकस की ऊर्ध्व विभाजन रेखा के एक-एक तरफ ली गईं हैं।
योगफल ज्ञात करने के लिए आप इसका उपयोग किस प्रकार करेंगे?
प्रत्येक पंक्ति के गणकों को एक साथ रखा गया। यदि किसी पंक्ति में कुल संख्या 10 से अधिक हो जाए तो क्या किया जाए?
संकेत - इस समस्या में 7 इकाई और 3 इकाई मिलकर 10 बनाते हैं जो दहाई को दर्शाने वाली पंक्ति के लिए एक गणक का मान देता है।
III. मिस्र की संख्या पद्धति की सीमाएँ
एक करोड़ (107) तक की संख्याओं के लिए अपेक्षाकृत प्रभावी संख्या निरूपण कर सकने और अपेक्षाकृत सरल गणना करने में सक्षम पद्धति होने के पश्चात भी मिस्र की पद्धति में एक कमी थी।
यदि अधिक बड़ी संख्याओं को दर्शाना हो तो 10 की उच्चतर घातों के लिए प्रतीकों के अंतहीन अनुक्रम की आवश्यकता थी। यहाँ हम संख्याओं के निरूपण की मूल चुनौती को एक अन्य रूप में पुनः उभरते हुए देखते हैं।
संख्या पद्धतियों के विकास के इतिहास में अंतिम अवधारणा ना केवल उपर्युक्त समस्या को हल करती है बल्कि संख्या निरूपण और अभिकलन को भी उल्लेखनीय रूप से सरल बनाती है।
? आइए, पता लगाएँ
1. क्या कोई ऐसी संख्या हो सकती है जिसके मिस्र संख्यांक निरूपण में कोई एक प्रतीक 10 या उससे अधिक बार आता हो? क्यों नहीं?
2. आधाार-4 की अपनी स्वयंं की संंख्या पद्धति बनााइए और 1 सेे 16 तक की संंख्यााओंं को इसमेंं निरूपित कीजिए।
3.हमारे द्वारा बनाई गई आधार-5 पद्धति में किसी दी गई संख्या को 5 से गुणा करने का एक सरल नियम दीजिए।
3.4 स्थाानीय मान निरूपण
I. मेसोपोटामिया की संख्या पद्धति
आरंभ में प्राचीन मेसोपोटामिया में प्रयोग की जाने वाली संख्या पद्धति में भिन्न-भिन्न सांकेतिक संख्याओं के लिए भिन्न-भिन्न प्रतीक होते थे। इसके पश्चात यह आधार-60 पद्धति बन गई जिसे षाष्टिक पद्धति भी कहा जाता है। यह एक अत्यंत प्रभावी संख्या निरूपण पद्धति थी।
उस समय कई लोग इस असमंजस में थे कि उन्होंने आधार-60 का चयन क्यों किया। इसे स्पष्ट करने के लिए विभिन्न सिद्धांत विद्यमान हैं। इनमें 60 और कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं की अवधि के मध्य संबंध (जैसे कि चंद्रमास की अवधि जिसमें लगभग 30 दिन होते हैं या पृथ्वी को स्थिर मानते हुए सूर्य को पृथ्वी के चारों ओर एक चक्कर लगाने में लगने वाला समय) से लेकर भिन्नों को दर्शाने में सरलता (हम यहाँ इस पर चर्चा नहीं करेंगे), मेसोपोटेमिया की सांकेतिक संख्याओं के पूर्व
अनुक्रम –1, 10, 60, 600, 3600, 36000... का केवल 60 की घातों तक सीमित हो जाना इत्यादि सम्मिलित इत्यादि सम्मिलित हैं।
मेसोपोटामिया की षाष्टिक पद्धति, जिसे बेबीलोन की संख्या पद्धति भी कहा जाता है,
का प्रभाव वर्तमान में भी हमारी समय मापन इकाइयों में देखा जा सकता है, जैसे- 1 घंटा = 60 मिनट और 1 मिनट = 60 सेकंड। इस पद्धति में 1 के लिए प्रतीक
और 10 के लिए प्रतीक
का प्रयोग किया जाता था।
आइए, अब हम उनकी संख्या पद्धति पर थोड़ा ठहरें और विचार करें कि अब तक ज्ञात मेसोपोटामिया पद्धति की विशेषताओं का प्रयोग करके एक प्रभावी संख्या पद्धति कैसे बनाई जा सकती है।
आइए, हम उनकी सांकेतिक संख्याओं को अपने प्रतीक दें-
ध्यान दीजिए कि इन प्रतीकों को बनाने में हमने भारतीय अंकों या संख्यांकों का ही प्रयोग किया है। हम स्वयं के प्रतीक भी बना सकते थे परंतु स्मरण रखने और प्रयोग की दृष्टि से हमने अपने परिचित संख्यांकों 1, 2, 3 का चयन किया है।
और
का प्रयोग करके 1 से 59 तक की संख्याओं को दर्शाया या निरूपित किया जा सकता है-
? उदाहरण - आइए, इस पद्धति में संख्या 640 को निरूपित करें। इसका सांकेतिक संख्याओं में समूहन करने पर हम देखते हैं कि — 640 = (10) * 60 + 40
यदि हम मिस्र की संख्या पद्धति का प्रयोग करते हैं तो यह संख्या 10
से निरूपित होगी और 40 को 4 क्या हम इसे और अधिक संक्षिप्त रूप से निरूपित कर सकते हैं?
हम इस संख्या को इस प्रकार सरलता से निरूपित कर सकते हैं –
जिसे दस बार 60 व एक बार 40 के रूप में पढ़ा जा सकता है, ठीक वैसा ही जैसा हमने समीकरण में लिखा है।
उदाहरण – आइए, एक अन्य संख्या 7530 को निरूपित करने का प्रयास करें।
7530 = (2) × 3600 + (5) × 60 + 30
अतः इसका निरूपण होगा
ध्यान दीजिए कि जब किसी संख्या को निरूपित करने के लिए 60 की घातों में समूहीकृत किया जाता है, तो 60 की घात 60 या उससे अधिक बार नहीं आ सकती। यदि ऐसा होता है तब उनमें से 60 को 60 की अगली घात के लिए समूहीकृत किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए नीचे दिए गए व्यंजक पर विचार कीजिए –
(1) × 3600 + (70) × 60 + 2
= (1) × 602 + (60 + 10) × 60 + 2
= (1) × 602 + 602 + (10) × 60 + 2
= (2) × 602 + (10) × 60 + 2
अतः किसी भी संख्या को 1–59 के बीच की संख्याओं का उपयोग करके सांकेतिक संख्याओं के लिए अंकों के साथ दर्शाया जा सकता है।
अब क्या होगा यदि हम 60 की विभिन्न घातों के लिए प्रतीकों को हटाकर संख्या निरूपण को और अधिक संक्षिप्त बना दें।
यह ठीक वैसा ही निरूपण है जैसा मेसोपोटामिया के लोगों ने किया था। उनके संख्यांकों में सबसे दाईं ओर के प्रतीकों का समूह इकाई की संख्या दर्शाता था। इसके बाईं ओर के प्रतीकों का समूह 60 की आवृत्ति को दर्शाता था। इसी प्रकार अगले बाईं ओर के प्रतीकों का समूह 3600 की आवृत्ति को दर्शाता था एवं इसी क्रम में प्रतीकों के समूह चलते रहते थे। जब कभी भी संख्या में 60 की घात विद्यमान नहीं होती थी तो उस स्थान पर एक रिक्त स्थान छोड़ दिया जाता था।
ऐसा प्रतीत नहीं होता कि मेसोपोटामिया के लोग इस विचार तक वैसे ही पहुँचे होंगे जैसे कि हम पहुँचे थे। कुछ विद्वानों का सुझाव है कि उनकी पूर्ववर्ती संख्या पद्धति में सांकेतिक संख्याओं 1 व 60 को दिए गए प्रतीकों की समानता एवं उनके आकस्मिक उपयोग के कारण उन्हें यह विचार आया होगा।
?आइए, पता लगाएँ
1. नीचे दी गई संख्याओं को मेसोपोटामिया की पद्धति में निरूपित कीजिए।- (i) 63
- (ii) 132
- (iii) 200
- (iv) 60
- (v) 3605
हम देख सकते हैं कि कैसे मेसोपोटामिया की पद्धति में प्रतीकों को लिखे जाने वाले स्थानों का उपयोग करके सांकेतिक संख्याओं के लिए प्रतीकों के अंतहीन अनुक्रम को बनाने की आवश्यकता को समाप्त कर दिया। ऐसी संख्या पद्धति (जिसमें एक आधार होता है) जो प्रत्येक प्रतीक के स्थान का उपयोग उस सांकेतिक संख्या को निर्धारित करने में करती है जिससे वह संबंधित है, स्थानिक संख्या प्रणाली या स्थानीय मान पद्धति कहलाती है।
स्थानीय मान की धारणा संख्या पद्धतियों के विकास के इतिहास में महत्त्वपूर्ण बिंदु है। इस धारणा ने विभिन्न प्रतीकों को सीमित संख्या में उपयोग करके संख्याओं के अंतहीन क्रम को निरूपित करने की समस्या का एक उत्कृष्ट समाधान दिया।
तथापि मेसोपोटामिया की पद्धति को पूर्णतया विकसित स्थानीय मान पद्धति नहीं माना जा सकता है। इसके साथ ही इसमें कुछ त्रुटियाँ ऐसी हैं जो किसी संख्या को पढ़ते समय भ्रांति उत्पन्न करती हैं।
?संख्या 60 के निरूपण का अवलोकन कीजिए। संख्या 3600 का निरूपण क्या होगा?
संख्यांकों को लिखते समय प्रतीकों के मध्य अंतराल (रिक्त स्थान) उस प्रकार नहीं दिया गया था जैसे हम यहाँ दे रहे हैं। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के द्वारा लिखी गई विभिन्न पांडुलिपियों में समान अंतराल बनाए रखना भी कठिन था। इससे अस्पष्टताएँ उत्पन्न हुईं। उदाहरण के लिए नीचे दी गई संख्याओं के निरूपण पर विचार कीजिए-
इस अस्पष्टता के कारण कि कौन से प्रतीक 60 की किस घात के संगत स्थान पर बने हैं, एक ही संख्यांक को भिन्न-भिन्न विधियों से पढ़ा जा सकता है। यहाँ तक कि हमारे निरूपण में भी जिसमें 60 की विभिन्न घातों के लिए प्रतीकों के मध्य एक समान अंतराल का उपयोग किया जाता है, प्रतीकों के दो समूहों के मध्य अंतरालों की संख्या जानना कठिन है जैसा कि 36002 के निरूपण में देखा जा सकता है।
अंतरालों के कारण होने वाली समस्या के समाधान के लिए आगे चलकर मेसोपोटामिया के लोगों ने अंतराल को अंकित करने के लिए एक 'स्थानधारक' प्रतीक प्रयुक्त करने का अद्भुत उपाय अपनाया। यह हमारी पद्धति में प्रयुक्त 0 (शून्य) के समान है। इस प्रकार शून्य (वह प्रतीक जो शून्यता दर्शाता है) किसी भी स्थानीय मान पद्धति, जिसमें संख्याओं को स्पष्ट रूप में लिखा जाता है, में एक 'स्थानधारक' के रूप में अपरिहार्य है।
अंतरालों से उत्पन्न होने वाली समस्या के समाधान के पश्चात भी इस पद्धति में अन्य अस्पष्टताएँ अभी भी बनी हुई थी। उदाहरण के लिए स्थानधारक प्रतीक को प्राथमिक तौर पर संख्याओं के मध्य उपयोग किया गया था अंत में नहीं। अतः वे इसका उपयोग 3600 जैसी संख्या को निरूपित करने के लिए नहीं कर सकते थे।
II. माया संख्या पद्धति
मध्य अमेरिका में 'माया सभ्यता' नामक एक सभ्यता विकसित हुई जिसने तीसरी से दसवीं शताब्दी सामान्य संवत् तक वृहत स्तर पर बौद्धिक और सांस्कृतिक प्रगति की। उनकी बौद्धिक उपलब्धियों में उनके द्वारा एशिया के लोगों से स्वतंत्र रूप से अभिकल्पित स्थानीय मान पद्धति भी सम्मिलित है। इन्होंने आधुनिक समय के '0' के लिए एक स्थानधारक प्रतीक का भी उपयोग किया जो एक सीप जैसा दिखता था।
यहाँ हमें एक उलझन भरी घटना देखने को मिलती है। इनकी तीसरी सांकेतिक संख्या 400 के स्थान पर 360 क्यों थी? कुछ विद्वानों का मानना है कि इस बात का उनके तिथिपत्र के साथ कुछ संबंध हो सकता है।
माया संख्या पद्धति में 1 के लिए एक
का और 5 के लिए एक
दंड (—) का प्रयोग किया जाता था। इन प्रतीकों का उपयोग 1 से 19 तक की
संख्याओं को निरूपित करने के लिए होता था।
विभिन्न सांकेतिक संख्याओं से संबद्ध प्रतीको को एक के नीचे एक लिखा गया था जिसमे सबसे नीचे वाला प्रतीकों का समूह इकाई की संख्या के संगत था। इसके ऊपर वाला समूह जितनी बार 20 आए उस संख्या के अनुरूप था। इसी क्रम में ऊपर वाला समूह जितनी बार 360 आए उस संख्या के अनुरूप था। इसी प्रकार प्रतीकों के समूह ऊपर तक बने होते थे।
- (i) 77
- (ii) 100
- (iii) 361
- (iv) 721
चूँकि माया सभ्यता एक वास्तविक आधार-20 पद्धति नहीं है, अतः इसमें गणनाओं के लिए किसी आधार वाली पद्धति के समान अनुकूलता की कमी है। तथापि उनके स्थानीय मान संकेतन और शून्य के लिए स्थानधारक प्रतीक के प्रयोग को संख्या पद्धतियों के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण उन्नति माना जाता है।
एक रोचक तथ्य यह है कि हम अभी भी कुछ यूरोपीय भाषाओं के संख्या नामों में आधार-20 का उपयोग देख सकते हैं।
III. चीनी संख्या पद्धति
चीन के लोगों ने दो संख्या पद्धतियों का उपयोग किया- पहली राशियों को लिखने के लिए लिखित पद्धति एवं दूसरी गणना करने के लिए छड़ों का उपयोग करने वाली पद्धति। छड़ आधारित संख्या पद्धति में संख्यांक छड़ संख्यांक कहलाते हैं। यहाँ हम छड़ संख्यांकों पर चर्चा करेंगे जो चीनी लिखित पद्धति की अपेक्षा संख्याओं को लिखने व गणना करने में अधिक प्रभावी हैं।
चीन में छड़ संख्यांक लगभग तीसरी शताब्दी तक विकसित हो गए थे तथा 17वीं शताब्दी तक इनका प्रयोग होता रहा। यह एक दशमलव पद्धति (आधार-10) थी। इसमें 1 से 9 तक के प्रतीक अग्रलिखित थे।
मेसोपोटामिया की पद्धति की भाँति छड़ संख्यांकों में भी किसी स्थानीय मान की अनुपस्थिति को इंगित करने के लिए रिक्त स्थान का प्रयोग किया जाता था। तथापि 1 से 9 तक के प्रतीकों के आकार कुछ अधिक एकसमान होने के कारण मेसोपोटामिया की पद्धति की तुलना में चीनी पद्धति में रिक्त स्थानों को ज्ञात करना अपेक्षाकृत सरल था।
ध्यान दीजिए कि छड़ संख्यांक हिंदू पद्धति से कितने मिलते-जुलते हैं। शून्य के लिए किसी प्रतीक के साथ चीनी पद्धति एक पूर्णतः विकसित स्थानीय मान पद्धति होगी।
IV. हिंदू संख्या पद्धति
? संख्या निरूपण के विचारों के विकास में हिंदू तथा भारतीय संख्या पद्धति का क्या स्थान है? इस पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ कौन-सी हैं? क्या इस पद्धति में स्थानीय मान प्रणाली का उपयोग किया जाता है?
जैसा कि देखा जा सकता है कि हिंदू संख्या पद्धति एक स्थानीय मान पद्धति है। हिंदू संख्या पद्धति में 0 के लिए प्रतीक कम से कम 200 सामान्य संवत् पूर्व से ही विद्यमान है। 0 को एक अंक के रूप में उपयोग करने के कारण एवं प्रत्येक स्थान पर एकल अंक के प्रयोग के कारण संख्यांकों को पढ़ते या लिखते समय इस पद्धति में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता नहीं है। यही कारण है कि हिंदू संख्या पद्धति का उपयोग अब संपूर्ण विश्व में किया जाता है।
शून्य का एक अंक के रूप में और सही अर्थ में एक संख्या के रूप में प्रयोग एक ऐसी सफलता थी जिसने गणित और विज्ञान के जगत को वास्तव में परिवर्तित कर दिया। भारतीय गणित में शून्य का उपयोग स्थानीय मान पद्धति में केवल एक स्थानधारक के रूप में ही नहीं किया जाता था अपितु इसे अन्य संख्याओं के समान एक संख्या का पद भी दिया गया था। हिंदू संख्यांकों का प्रयोग करके गणना करने व वैज्ञानिक गणना की व्याख्या करने के लिए 499 सामान्य संवत् में आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ आर्यभटीय में संख्या 0 के अंकगणितीय गुणों (जैसे 0 में कोई भी संख्या जोड़ने पर वही संख्या प्राप्त होती है एवं 0 से किसी भी संख्या को गुणा करने पर शून्य प्राप्त होता है) का स्पष्ट रूप से प्रयोग किया था। जैसा कि हमने पिछली कक्षा में सीखा था। 628 सामान्य संवत् में ब्रह्मगुप्त ने अपनी रचना ब्रह्मस्फुटसिद्धांत में 0 का किसी भी अन्य संख्या की भाँति एक संख्या के रूप में प्रयोग (जिसके प्रयोग से आधारभूत गणितीय संक्रियाएँ की जा सकती हैं) को संहिताबद्ध किया था।
ऋणात्मक संख्याओं को प्रस्तुत करने के साथ शून्य को एक संख्या के रूप में प्रस्तुत करके ब्रह्मगुप्त ने एक ऐसी रचना की जिसे आधुनिक शब्दों में वलय कहा जाता है अर्थात संख्याओं का एक ऐसा समूह जो योग व्यकलन व गुणन के अंतर्गत संवृत होता है। दूसरे शब्दों में समूह में से किन्हीं भी दो संख्याओं को योग व्यकलन व गुणन करने पर उसी समूह की एक अन्य संख्या प्राप्त की जा सकती है। इन नए विचारों ने आधुनिक गणित और विशेष रूप से बीजगणित व विश्लेषण के क्षेत्रों की नींव रखी।
आशा है कि इससे आपको उन सभी अवधारणाओं का बोध हो गया होगा जिन्हें हम वर्तमान में संख्याओं को लिखने एवं गणना करने में उपयोग करते हैं। 0 की खोज और इसके परिणामस्वरूप बनी भारतीय संख्या पद्धति वास्तव में अब तक के सबसे महान, सबसे रचनात्मक व सबसे प्रभावशाली आविष्कारों में से एक है, जो हमारे दैनिक जीवन में निरंतर दिखाई देती है।
साथ ही ये आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभिकलन, लेखाकार्य, सर्वेक्षण आदि का आधार तैयार करती है। इसके पश्चात जब आप संख्याएँ लिखें तब उन संख्याओं के पीछे के असाधारण इतिहास के विषय में एवं उनके आविष्कार के समय आई सभी गहन अवधारणाओं के विषय में अवश्य विचार कीजिए।
? आइए, पता लगाएँ
1. आपके विचार से चीन के लोग जोंग और हेंग प्रतीकों को एकांतर रूप से क्यों प्रयोग करते थे? यदि मात्र जोंग प्रतीकों का ही प्रयोग किया जाता तो 41 को कैसे प्रदर्शित किया जाता? यदि दो क्रमिक स्थानों के मध्य कोई सार्थक अंतराल न हो तो क्या इस संख्यांक की किसी अन्य प्रकार से व्याख्या की जा सकती थी?
2. उकासर और उरापोन को अंकों के रूप में लेकर एक आधार-2 वाली स्थानीय मान पद्धति बनाइए। इस पद्धति की तुलना गुमुलगल पद्धति से कीजिए।
3. बताइए कि किस प्रकार आपके दैनिक जीवन में और किन व्यवसायों में हिंदू संख्यांक और 0 महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं? यदि हमारी संख्या पद्धति और 10 का आविष्कार या कल्पना नहीं हुई होती तो हमारा जीवन कितना भिन्न होता?
4. प्राचीन भारतीयों ने हिंदू संख्या पद्धति के लिए संभवतः आधार-10 का उपयोग किया होगा क्योंकि मनुष्य की दस अँगुलियाँ होती हैं और इसीलिए हम अपनी अँगुलियों से गिनती कर सकते हैं। यदि हमारी केवल 8 अँग्लियाँ होती तो क्या होता? तब हम संख्याएँ कैसे लिखते? यदि हम आधार 8 का उपयोग करते तब हिंदू संख्यांक कैसे लिखते? आधार-5 का उपयोग करने पर हिंदू संख्यांक कैसे लिखे जाते हैं? आधार 10 वाले हिंदू संख्यांक 25 को क्रमशः आधार-8 और आधार-5 वाले हिंदू संख्यांकों के रूप में लिखने का प्रयास कीजिए। क्या आप इसे आधार-2 में लिख सकते हैं?
सारांश
- संख्याओं को निरूपित करने के लिए हमें वस्तुओं, नामों या लिखित प्रतीकों के एक मानक अनुक्रम की आवश्यकता होती है जिनका एक निश्चित क्रम हो। इस मानक अनुक्रम को संख्या पद्धति कहा जाता है।
- लिखित संख्या पद्धति में संख्याओं को निरूपित करने वाले प्रतीकों को संख्यांक कहा जाता है।
- किसी संख्या पद्धति में सांकेतिक संख्याएँ वे संख्याएँ होती हैं जिन्हें सरलता से पहचाना जा सकता है और जिनका उपयोग अन्य संख्याओं को समझने और उनके साथ गणनाएँ आदि करने के लिए संदर्भ बिंदुओं के रूप में किया जाता है। ये संख्या पद्धति स्थिरता को प्रदान करने का काम करती हैं जिससे उपयोगकर्ताओं को स्वयं को दिशा निर्दिष्ट करने और राशियों, विशेषकर बड़ी राशियों को समझने में सहायता मिलती है।
- वह संख्या पद्धति जिसकी सांकेतिक संख्याएँ n की घातें होती है उसे आधार-n संख्या पद्धति कहा जाता है।
- वह संख्या पद्धति जिसकी सांकेतिक संख्याएँ n की घातें होती हैं उसे आधार-n संख्या पद्धति कहा जाता है।
- ऐसी संख्या पद्धतियाँ जिनमें कोई आधार होता है और जिनमें सांकेतिक संख्या को निर्धारित करने के लिए प्रतीक की स्थिति का उपयोग किया जाता है इन्हें स्थानिक संख्या पद्धतियाँ कहा जाता है।
- स्थानीय मान निरूपण का उपयोग मेसोपोटामिया (बेबीलोन) की सभ्यता, माया सभ्यता, चीनी सभ्यता और भारतीय सभ्यता में किया जाता था।
- वर्तमान में पूरे विश्व में हम जिस संख्यांक पद्धति का उपयोग करते हैं वह हिंदू संख्या पद्धति है (जिसे कभी-कभी भारतीय संख्या पद्धति या हिंदू-अरबी संख्या पद्धति भी कहा जाता है)। यह एक स्थानीय मान पद्धति है जिसमें (सामान्यतः) 10 अंक होते हैं। इसमें अंक 0 भी सम्मिलित है जिसे अन्य अंकों के समान माना जाता है। 0 को एक संख्या के रूप में उपयोग करने के कारण यह पद्धति सीमित प्रतीकों का उपयोग करके सभी संख्याओं को स्पष्ट रूप से लिखने में हमें सक्षम बनाती है और साथ ही हमें दक्षता से गणनाएँ करने में समर्थ बनाती है। इस पद्धति की उत्पत्ति लगभग 2000 वर्ष पूर्व भारतवर्ष में हुई थी और इसके पश्चात यह संपूर्ण विश्व में फैल गई और इसे मानव इतिहास के सबसे महान आविष्कारों में से एक माना जाता है।
