2. दो गौरैया
घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं- माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।
आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैयाँ। वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!
घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गरमी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है।
मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही 'फिर आऊँगी' कहकर चली जाती है। शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी हैं। दिन-भर 'गुटर गू गुटर गूँ' का संगीत सुनाई देता रहता है। इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियाँ भी हैं और बरें भी हैं और चींटियों की तो जैसे फौज ही छावनी डाले हुए है।
अब एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर। फिर जैसे आई थीं वैसे ही उड़ भी गईं। पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है और सामान भी ले आईं हैं और मजे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। जाहिर है, उन्हें घर पसंद आ गया था।
माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद माँ सिर हिलाकर बोलीं, "अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।"
इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, “देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीज हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ।"
"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" माँ ने व्यंग्य से कहा।
माँ कोई बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं, वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं। वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुँह से 'श... शू' कहा, बाँहें झुलाई, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाँहें झुलाते, कभी 'श... शू' करते।
गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ 'चीं-चीं' करने लगीं। और माँ खिलखिलाकर हँसने लगीं।
पिताजी को गुस्सा आ गया, "इसमें हँसने की क्या बात है?"
माँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मजाक सूझता है। हँसकर बोली, "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?"
तब पिताजी को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया और वह पहले से भी ज्यादा ऊँचा कूदने लगे।
गौरैयाँ घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं। उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था। माँ फिर हँसने लगीं, "ये निकलेंगी नहीं, जी। अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे।"
"निकलेंगी कैसे नहीं?" पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरैयाँ फिर घोंसले में जा बैठी थीं। उन्होंने लाठी ऊँची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा । 'चीं-चीं' करती गौरैयाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं।
"इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं।" माँ ने हँसकर कहा।
पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डंडे की ओर लपके। एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाजे पर जा बैठी। दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाजे पर।
माँ फिर हँस दी। “तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो। एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।"
अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाजे बंद कर दे!"
मैंने भागकर दोनों दरवाजे बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाजा खुला रहा।
पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरैयों पर हमला बोल दिया। एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची। चीं-चीं करती चिड़ियाँ कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं। आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाजे में से बाहर निकल गईं। माँ तालियाँ बजाने लगीं। पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।
"आज दरवाजे बंद रखो” उन्होंने हुक्म दिया। “एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।"
तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। और माँ खिलखिलाकर हँस दी। मैंने सिर उठाकर ऊपर की ओर देखा, दोनों गौरैयाँ फिर से अपने घोंसले में मौजूद थीं।
"दरवाजे के नीचे से आ गई हैं," माँ बोलीं।
मैंने दरवाजे के नीचे देखा। सचमुच दरवाजों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी।
पिताजी को फिर गुस्सा आ गया। माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं।
अब तो पिताजी गौरैयों पर पिल पड़े। उन्होंने दरवाजों के नीचे कपड़े ठूंस दिए ताकि कहीं कोई छेद बचा नहीं रह जाए। और फिर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े। चिड़ियाँ चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गईं। पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं। अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं जिसका एक शीशा टूटा हुआ था।
“देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो,” माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा, अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।
"क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ?" पिताजी बोले और कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूंस दिया और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़ दिया। दोनों पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं।
इतने में रात पड़ गई। हम खाना खाकर ऊपर जाकर सो गए। जाने से पहले मैंने आँगन में झाँककर देखा, चिड़ियाँ वहाँ पर नहीं थीं। मैंने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गई होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी।
दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली। उस दिन उन्हें गौरैयों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी।
अब तो रोज यही कुछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जातीं पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं।
पिताजी परेशान हो उठे। आखिर कोई कहाँ तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार-बार कहें, “मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।” पर आखिर वह भी तंग आ गए थे। आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई तो वह कहने लगे कि वह गौरैयों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे। और वह फौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए।
घोंसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए। “किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए,” उन्होंने गुस्से से कहा।
घोंसले में से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरैयों ने सजावट के लिए मानो झालर टाँग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकों पर जमाया और दाईं ओर को खींचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे।
"चलो, दो तिनके तो निकल गए" माँ हँसकर बोलीं, "अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे !"
तभी मैंने बाहर आँगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरैयाँ नजर आईं। दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।
अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे-रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे-लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए और घोंसला लाठी के इर्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच खींचकर लाठी के सिरे के इर्द-गिर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रुई के फाहे और धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा जोर की आवाज आई, "चीं-चीं, चीं-चीं!!!"
पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैयाँ लौट आई हैं? मैंने झट से बाहर की ओर देखा। नहीं, दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं।
"चीं-चीं, चीं-चीं!” फिर आवाज आई। मैंने ऊपर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत-सा हिस्सा था। नन्हीं-नन्हीं दो गौरैयाँ ! वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?
मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा। फिर मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं। और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए हैं। इस बीच माँ कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। नन्हीं चिड़ियाँ अभी भी हाँफ-हाँफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं।
उनके माँ-बाप झट-से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे। माँ-पिताजी और मैं उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।
- भीष्म साहनी
लेखक से परिचय
भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा के लेखक थे। उन्होंने अपनी कहानियों में देश विभाजन और मानवीय मूल्यों की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास तमस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था। साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने पद्म भूषण से अलंकृत किया था। बच्चों के लिए उन्होंने 'गुलेल का खेल' आदि कई कहानियाँ लिखी हैं।
आइए, अब हम इस कहानी को थोड़ी और स्पष्टता से समझते हैं। नीचे दी गई गतिविधियाँ इस कार्य में आपकी सहायता करेंगी।
मेरी समझ से
- निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
- पिताजी ने कहा कि घर सराय बना हुआ है क्योंकि-
- घर की बनावट सराय जैसी बहुत विशाल है
- घर में विभिन्न पक्षी और जीव-जंतु रहते हैं
- पिताजी और माँ घर के मालिक नहीं हैं
- घर में विभिन्न जीव-जंतु आते-जाते रहते हैं
- कहानी में 'घर के असली मालिक' किसे कहा गया है?
- माँ और पिताजी को जिनका वह मकान है
- लेखक को जिसने यह कहानी लिखी है
- जीव-जंतुओं को जो उस घर में रहते थे
- मेहमानों को जो लेखक से मिलने आते थे
- गौरैयों के प्रति माँ और पिताजी की प्रतिक्रियाएँ कैसी थीं?
- दोनों ने खुशी से घर में उनका स्वागत किया
- पिताजी ने उन्हें भगाने की कोशिश की लेकिन माँ ने मना किया
- दोनों ने मिलकर उन्हें घर से बाहर निकाल दिया
- माँ ने उन्हें निकालने के लिए कहा लेकिन पिताजी ने घर में रहने दिया
- माँ बार-बार पिताजी की बातों पर मुसकराती और मजाक करती थीं। इससे क्या पता चलता है?
- माँ चाहती थीं कि गौरैयाँ घर से भगाई न जाएँ
- माँ को पिताजी के प्रयत्न व्यर्थ लगते थे
- माँ को गौरैयों की गतिविधियों पर हँसी आ जाती थी
- माँ को दूसरों पर हँसना और उपहास करना अच्छा लगता था
- कहानी में गौरैयों के बार-बार लौटने को जीवन के किस पहलू से जोड़ा जा सकता है?
- दूसरों पर निर्भर रहना
- असफलताओं से हार मान लेना
- अपने प्रयास को निरंतर जारी रखना
- संघर्ष को छोड़कर नए रास्ते अपनाना
- हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ विचार कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने ?
- पक्षियों का शोर बहुत तेज होता है, लेकिन लोग उसे संगीत की तरह सराहते हैं।
- पिताजी को पक्षियों का चहकना शोर जैसा लगता था लेकिन लोगों को वह संगीत जैसा लगता था।
- आम के पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के पक्षी हर समय निवास करते हैं।
- पक्षी पेड़ पर तंबू लगाकर रहते हैं जैसे किसी मेले में डेरा डाला जाता है।
- पिताजी की भागदौड़ और शोर इतना होता है कि घर के चूहे चैन से सो नहीं पाते।
- चूहों की भागदौड़ और शोर इतना होता है कि घर के लोग चैन से सो नहीं पाते।
- पिताजी माँ का मजाक समझ जाते हैं।
- पिताजी को ऐसा भ्रम होने लगता है कि माँ उनकी चेष्टाओं का उपहास कर रही हैं।
- पिताजी ने लाठी एक ओर रख दी और गर्व से, विजयी मुद्रा में बैठ गए।
- पिताजी की छाती और साँस फूलने लगी और उन्होंने लाठी एक ओर रख दी।
- रात किसी भारी चीज की तरह ऊपर से गिर पड़ी।
- कहानी की घटनाओं के बीच धीरे-धीरे रात हो गई और अँधेरा छा गया।
- गौरैयाँ फिर से लौट आई थीं और शांत व प्रसन्न भाव से चहचहा रही थीं जैसे कोई राग गा रही हों।
- गौरैयाँ शास्त्रीय संगीत का अभ्यास कर रही थीं और 'राग मल्हार' गा रही थीं।
मिलकर करें मिलान
(क) पाठ में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो अर्थ दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सबसे उपयुक्त अर्थ से मिलाइए।
| क्रम | वाक्य | अर्थ |
|---|---|---|
1. |
वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं! |
|
2. |
आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। |
|
3. |
वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। |
|
4. |
वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं। |
|
5. |
पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे। |
|
6. |
इतने में रात पड़ गई। |
|
7. |
जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं। |
|
(ख) अपने उत्तर को अपने मित्रों के उत्तर से मिलाइए और विचार कीजिए कि आपने कौन-से अर्थ का चुनाव किया है और क्यों?
पंक्तियों पर चर्चा
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए।
- “अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।"
- “एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।"
- “किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए।"
सोच-विचार के लिए
पाठ को पुनः ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए।
- आपको कहानी का कौन-सा पात्र सबसे अच्छा लगा - घर पर रहने आई गौरैयाँ, माँ, पिताजी, लेखक या कोई अन्य प्राणी? आपको उसकी कौन-कौन सी बातें अच्छी लगीं और क्यों?
- लेखक के घर में चिड़िया ने अपना घोंसला कहाँ बनाया? उसने घोंसला वहीं क्यों बनाया होगा?
- क्या आपको लगता है कि पशु-पक्षी भी मनुष्यों के समान परिवार और घर का महत्व समझते हैं? अपने उत्तर के समर्थन में कहानी से उदाहरण दीजिए।
- “अब मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।" इस कथन से पिताजी के स्वभाव के कौन-से गुण उभरकर आते हैं?
- कहानी में गौरैयों के व्यवहार में कब और कैसा बदलाव आया? यह बदलाव क्यों आया? (संकेत - कहानी में खोजिए कि उन्होंने गाना कब बंद कर दिया?)
- कहानी में गौरैयाँ ने किन-किन स्थानों से घर में प्रवेश किया था? सूची बनाइए।
- इस कहानी को कौन सुना रहा है? आपको यह बात कैसे पता चली?
- माँ बार-बार क्यों कह रही होंगी कि गौरैयाँ घर छोड़कर नहीं जाएँगी?
अनुमान और कल्पना से
- कल्पना कीजिए कि आप उस घर में रहते हैं जहाँ चिड़ियाँ अपना घर बना रही हैं। अपने घर में उन्हें देखकर आप क्या करते?
- मान लीजिए कि कहानी में चिड़िया नहीं, बल्कि नीचे दिए गए प्राणियों में से कोई एक प्राणी घर में घुस गया है। ऐसे में घर के लोगों का व्यवहार कैसा होगा? क्यों?
(प्राणियों के नाम - चूहा, कुत्ता, मच्छर, बिल्ली, कबूतर, कॉकरोच, तितली, मक्खी) - “मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा।" लेखक को विस्मय या हैरानी किसे देखकर हुई? उसे विस्मय क्यों हुआ होगा?
- “माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं।" माँ ने गौरैयों को निकालने में पिताजी की सहायता क्यों नहीं की होगी?
- “एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है।" लेखक ने चूहे के विशेष व्यवहार से अनुमान लगाया कि उसे सर्दी लगती होगी। आप भी किसी एक अपरिचित व्यक्ति या प्राणी के व्यवहार को ध्यान से देखकर अनुमान लगाइए कि वह क्या सोच रहा होगा, क्या करता होगा या वह कैसा व्यक्ति होगा आदि। (संकेत- आपको उसके व्यवहार पर ध्यान देना है, उसके रंग-रूप या वेशभूषा पर नहीं)
- “पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है।" सराय और घर में कौन-कौन से अंतर होते होंगे?
संवाद और अभिनय
नीचे दी गई स्थितियों के लिए अपने समूह में मिलकर अपनी कल्पना से संवाद लिखिए और बातचीत को अभिनय द्वारा प्रस्तुत कीजिए-
- “वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँ हैं" नन्हीं-नन्हीं दो गौरैया क्या-क्या बोल रही होंगी?
- “चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" घोंसले से झाँकती गौरैयाँ क्या-क्या बातें कर रही होंगी?
- “एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं।" जब उन्होंने पहली बार घर में प्रवेश किया तो उन्होंने आपस में क्या बातें की होंगी?
- “उनके माँ-बाप झट से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे।" गौरैयों और उनके बच्चों ने क्या-क्या बातें की होंगी?
बदली कहानी
मान लीजिए कि घोंसले में अंडों से बच्चे न निकले होते। ऐसे में कहानी आगे कैसे बढ़ती? यह बदली हुई कहानी लिखिए।
कहने के ढंग/क्रिया विशेषण
"माँ खिलखिलाकर हँस दीं।"
इस वाक्य में 'खिलखिलाकर' शब्द बता रहा है कि माँ कैसे हँसी थीं। कोई कार्य कैसे किया गया है, इसे बताने वाले शब्द 'क्रिया विशेषण' कहलाते हैं। 'खिलखिलाकर' भी एक क्रिया विशेषण शब्द है।
अब नीचे दिए गए रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। इन शब्दों का प्रयोग करते हुए अपने मन से वाक्य बनाइए।
- पिताजी ने झिड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है?"
- “देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो”, माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा।
- “किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए", उन्होंने गुस्से में कहा।
अब आप इनसे मिलते-जुलते कुछ और क्रिया विशेषण शब्द सोचिए और उनका प्रयोग करते हुए कुछ वाक्य बनाइए।
(संकेत- धीरे से, जोर से, अटकते हुए, चिल्लाकर, शरमाकर, सहमकर, फुसफुसाते हुए आदि।)
घर के प्राणी
कहानी में आपने पढ़ा कि लेखक के घर में अनेक प्राणी रहते थे। लेखक ने उनका वर्णन ऐसे किया है जैसे वे भी मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हैं। कहानी में से चुनकर उन प्राणियों की सूची बनाइए और बताइए कि वे मनुष्यों जैसे कौन-कौन से काम करते थे?
- बिल्ली 'फिर आऊँगी' कहकर चली जाती है।
- _____________________
- _____________________
- _____________________
- _____________________
हेर-फेर मात्रा का
"माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे।"
“पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं।"
उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। आपने ध्यान दिया होगा कि शब्द में एक मात्रा-भर के अंतर से उसके अर्थ में परिवर्तन हो जाता है।
अब नीचे दिए गए शब्दों की मात्राओं और अर्थों के अंतर पर ध्यान दीजिए। इन शब्दों का प्रयोग करते हुए अपने मन से वाक्य बनाइए।
- नाच-नाचा-नचा
- हार-हरा-हारा
- पिता-पीता
- चूक-चुक
- नीचा-नीचे
- सहसा-साहस
वाद-विवाद
कहानी में माँ द्वारा कही गई कुछ बातें नीचे दी गई हैं-
"अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं।"
“एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।"
“देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो। अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब यहाँ से नहीं जाएँगी।"
कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। वाद-विवाद का विषय है-
"माँ चिड़ियों को घर से निकालना चाहती थीं।"
कक्षा में आधे समूह इस कथन के पक्ष में और आधे समूह इसके विपक्ष में तर्क देंगे।
कहानी की रचना
"कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।"
इस पंक्ति में बताया गया है कि पिताजी का दृष्टिकोण कैसे बदल गया। इस प्रकार यह विशेष वाक्य है। इस तरह के वाक्यों से कहानी और अधिक प्रभावशाली बन जाती है।
- आपको इस कहानी में ऐसी अनेक विशेषताएँ दिखाई देंगी। उन्हें अपने समूह के साथ मिलकर ढूंढ़िए और उनकी सूची बनाइए।
- इस कहानी की कुछ विशेषताओं को नीचे दिया गया है। इनके उदाहरण कहानी में से चुनकर लिखिए।
आपकी बात
| कहानी की विशेषताएँ | कहानी में से उदाहरण |
|---|---|
1. किसी बात को कल्पना से बढ़ा-चढ़ाकर कहना |
जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। |
2. हास्य यानी हँसी-मज़ाक का उपयोग किया जाना |
|
3. सोचा कुछ और, हुआ कुछ और |
|
4. दूसरों के मन के भावों का अनुमान लगाना |
|
5. किसी की कही बात को उसी के शब्दों में लिखना |
|
6. किसी प्राणी या उसके कार्य को कोई अन्य नाम देना |
|
7. किसने किससे कोई बात कही, यह सीधे-सीधे बताए बिना उस संवाद को लिखना |
- "गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ 'चीं-चीं' करने लगीं।" आपने अपने घर के आस-पास पक्षियों को क्या-क्या करते देखा है? उनके व्यवहार में आपको कौन-कौन से भाव दिखाई देते हैं?
- “कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।" कहानी के अंत में पिताजी गौरैयों का अपने घर में रहना स्वीकार कर लेते हैं। क्या आप भी कोई स्थान या वस्तु किसी अन्य के साथ साझा करते हैं? उनके बारे में बताइए। साझेदारी में यदि कोई समस्या आती है तो उसे कैसे हल करते हैं?
- परिवार के लोग गौरैयों को घर से बाहर भगाने की कोशिश करते हैं, किंतु गौरैयों के बच्चों के कारण उनका दृष्टिकोण बदल जाता है। क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि किसी को देखकर या किसी से मिलकर आपका दृष्टिकोण बदल गया हो?
चिड़ियों का घोंसला
घोंसला बनाना चिड़ियों के जीवन का एक सामान्य हिस्सा है। विभिन्न पक्षी अलग-अलग तरह के घोंसले बनाते हैं। इन घोंसलों में वे अपने अंडे देते हैं और अपने चूजों को पालते हैं।
(क) अपने आस-पास विभिन्न प्रकार के घोंसले ढूंढ़िए और उन्हें ध्यान से देखिए और नीचे दी गई तालिका को पूरा कीजिए। (सावधानी - उन्हें हाथ न लगाएँ अन्यथा पक्षियों, उनके अंडों और आपको भी खतरा हो सकता है)
| क्रम संख्या | घोंसले को कहाँ देखा | घोंसला किन चीजों से बनाया गया था | घोंसला खाली था या नहीं | घोंसला किस पक्षी का था |
|---|---|---|---|---|
(ख) विभिन्न पक्षियों के घोंसलों के संबंध में एक प्रस्तुति तैयार कीजिए। उसमें आप चाहें तो उनके चित्र और थोड़ी रोचक जानकारी सम्मिलित कर सकते हैं।
मल्हार
"जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं।"
'मल्हार' भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक प्रसिद्ध राग का नाम है। यह राग वर्षा ऋतु से जुड़ा है। आप जानते ही हैं कि आपकी हिंदी पाठ्यपुस्तक का नाम मल्हार भी इसी राग के नाम पर है।
नीचे दी गई इंटरनेट कड़ियों के माध्यम से राग मल्हार को सुनिए और इसका आनंद लीजिए-
https://www.youtube.com/watch?v=3iQHe2hIJGM https://www.youtube.com/watch?v=pHbXFAhQtpI https://www.youtube.com/watch?v=7K3SYX8THkw
हास्य-व्यंग्य
"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे! माँ ने व्यंग्य से कहा।"
आप समझ गए होंगे कि इस वाक्य में माँ ने पिताजी से कहा है कि वे चिड़ियों को नहीं निकाल सकते। इस प्रकार से कही गई बात को 'व्यंग्य करना' कहते हैं।
व्यंग्य का अर्थ होता है- हँसी-मज़ाक या उपहास के माध्यम से किसी कमी, बुराई या विडंबना को उजागर करना।
व्यंग्य में बात को सीधे न कहकर उलटा या संकेतात्मक ढंग से कहा जाता है ताकि उसमें चुटकीलापन भी हो और गंभीर सोच की संभावना भी बनी रहे। अनेक बार व्यंग्य में हास्य भी छिपा होता है।
- आपको इस कहानी में कौन-कौन से वाक्य पढ़कर हँसी आई? उन वाक्यों को चुनकर लिखिए।
- अब चुने हुए वाक्यों में से कौन-कौन से वाक्य 'व्यंग्य' कहे जा सकते हैं? उन पर सही का चिह्न लगाइए।
आज की पहेली
नीचे दी गई चित्र-पहेली में बिल्ली को चूहे तक पहुँचाइए।
झरोखे से
'दो गौरैया' कहानी में आपने पढ़ा कि 'दो गौरैया' लेखक के घर में बिन बुलाए अतिथि की तरह आ जाती हैं। पिछले कई वर्षों से गाँव-नगरों में इन नन्हीं चिड़ियों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। इसलिए भारत सरकार ने इनके संरक्षण के लिए 20 मार्च को 'विश्व गौरैया दिवस' घोषित किया है। आइए, पढ़ते हैं 'विश्व गौरैया दिवस' पर प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा प्रकाशित लेख का एक अंश-
कभी बहुतायत में पाई जाने वाली घरेलू गौरैया अब कई जगहों पर एक दुर्लभ दृश्य और रहस्य बन गई है। इन छोटे प्राणियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनकी रक्षा करने के लिए, हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।
भारत में गौरैया सिर्फ़ पक्षी नहीं हैं; वे साझा इतिहास और संस्कृति का प्रतीक हैं। हिंदी में "गौरैया”, तमिल में "कुरुवी” और उर्दू में "चिरिया" जैसे कई नामों से जानी जाने वाली गौरैया पीढ़ियों से दैनिक जीवन का हिस्सा रही हैं।
उनकी महत्ता के बावजूद, गौरैया तेजी से लुप्त हो रही हैं। इस गिरावट के कई कारण हैं। सीसा रहित पेट्रोल के उपयोग से जहरीले यौगिक पैदा हुए हैं जो उन कीटों को नुकसान पहुँचाते हैं, जिन पर गौरैया भोजन के लिए निर्भर हैं। शहरीकरण ने उनके प्राकृतिक घोंसले के स्थान भी छीन लिए हैं। आधुनिक इमारतों में वे स्थान नहीं होते जहाँ गौरैया घोंसला बना सकें, जिससे उनके बच्चों को पालने के लिए जगह कम हो गई है।
साभार - पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (भारत सरकार)
साझी समझ
नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग कर इस लेख को पूरा पढ़िए और कक्षा में चर्चा कीजिए।
https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2112370मित्रलाभ
दक्षिण देश के एक प्रांत में महिलारोप्य नाम का एक नगर था। वहाँ एक विशाल वटवृक्ष की शाखाओं पर लघुपतनक नाम का कौआ रहता था। एक दिन वह अपने आहार की चिंता में शहर की ओर चला ही था कि उसने देखा कि एक फटे पाँव और बिखरे बालों वाला भयंकर व्याध उधर ही चला आ रहा है। कौवे को उसे देखकर वृक्ष पर रहने वाले अन्य पक्षियों की चिंता हुई। उन्हें व्याध के चंगुल से बचाने के लिए वह पीछे लौट पड़ा और वहाँ सब पक्षियों को सावधान कर दिया और कहा कि जब यह व्याध वृक्ष के पास भूमि पर अनाज के दाने बिखेरे, तब कोई भी पक्षी उन्हें चुगने के लालच से न जाय, उन दानों को कालकूट की तरह जहरीला समझे।
कौआ अभी यह कह ही रहा था कि व्याध ने वटवृक्ष के नीचे आकर दाने बिखेर दिए और स्वयं दूर जाकर झाड़ी के पीछे छिप गया। पक्षियों ने भी लघुपतनक का उपदेश मानकर दाने नहीं चुगे। वे उन दानों को हलाहल विष की तरह मानते रहे किंतु, इसी बीच में व्याध के सौभाग्य से कबूतरों का राजा चित्रग्रीव अपने हजारों अनुचरों के सहित उड़ता हुआ वहाँ आया। लघुपतनक ने उसे भी चेतावनी दी परंतु वह भूमि पर बिखरे हुए उन दानों को चुगने की लालसा को न रोक सका। परिणाम यह हुआ कि वह अपने परिजनों समेत जाल में फँस गया। लोभ का यही परिणाम होता है। लोभ से विवेकशक्ति नष्ट हो जाती है। जाल में फँसने के बाद चित्रग्रीव ने अपने साथी कबूतरों को समझाया कि वे डरें नहीं और एकजुट होकर पूरी शक्ति से जाल समेत उड़कर व्याध की दृष्टि से ओझल हो जाएँ तो बच जाएँगे। तत्पश्चात सब कबूतर जाल लेकर उड़ गये और व्याध देखता रह गया! लघुपतनक ने जब देखा तो वह कौतूहलवश कबूतरों के पीछे-पीछे उड़ने लगा।
व्याध जब दूर हो गया तब चित्रग्रीव ने अपने साथियों को कहा- "व्याध तो लौट गया। अब चिंता की कोई बात नहीं। चलो, हम महिलारोप्य शहर के पूर्वोत्तर भाग की ओर चलें। वहाँ मेरा घनिष्ठ मित्र हिरण्यक नाम का चूहा रहता है। उससे हम अपने जाल को कटवा लेंगे। तभी हम आकाश में स्वच्छंद घूम सकेंगे।"
वहाँ हिरण्यक नाम का चूहा अपने एक हजार बिलों वाले दुर्ग में रहता था। इसीलिए उसे डर नहीं लगता था। चित्रग्रीव ने उसके द्वार पर पहुँच कर पुकारा - "मित्र हिरण्यक! शीघ्र आओ। मुझ पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है।"
उसकी आवाज सुनकर हिरण्यक ने अपने ही बिल में छिपे-छिपे प्रश्न किया- "तुम कौन हो? कहाँ से आए हो? क्या प्रयोजन है?..."
चित्रग्रीव ने कहा- “मैं तुम्हारा मित्र चित्रग्रीव हूँ। तुम जल्दी बाहर आओ; मुझे तुमसे विशेष काम है।"
यह सुनकर हिरण्यक प्रफुल्लित होकर अपने बिल से बाहर आया। अपने मित्र चित्रग्रीव को साथियों सहित जाल में फँसा देखकर दुखित स्वर में बोला, "मित्र! यह क्या हो गया तुम्हें?" चित्रग्रीव ने कहा - "जीभ के लालच से हम जाल में फँस गए। तुम हमें जाल से मुक्त कर दो।”
हिरण्यक जब चित्रग्रीव के जाल का धागा काटने लगा तब उसने कहा- "पहले मेरे साथियों के बंधन काट दो, बाद में मेरे काटना।"
हिरण्यक "तुम इन सब के नायक हो, पहले अपने बंधन कटवा लो, साथियों के पीछे कटवाना।"
चित्रग्रीव– “वे मेरे अनुचर हैं, अपने घर-बार को छोड़कर मेरे साथ आए हैं। मेरा धर्म है कि पहले इनकी सुख-सुविधा को दृष्टि में रखूँ।"
हिरण्यक चित्रग्रीव की यह बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सबके बंधन काटकर चित्रग्रीव से कहा- "मित्र ! अब अपने घर जाओ। विपत्ति के समय फिर मुझे याद करना।” उन्हें भेजकर हिरण्यक चूहा अपने बिल में घुस गया। चित्रग्रीव भी मित्रों सहित अपने घर चला गया।
लघुपतनक कौआ यह सब दूर से देख रहा था। वह हिरण्यक के कौशल और उसकी सज्जनता पर मुग्ध हो गया। उसने मन ही मन सोचा- "यद्यपि मेरा स्वभाव है कि मैं किसी का विश्वास नहीं करता, किसी को अपना हितैषी नहीं मानता, तथापि इस चूहे के गुणों से प्रभावित होकर मैं इसे अपना मित्र बनाना चाहता हूँ।"
यह सोचकर वह हिरण्यक के बिल के दरवाजे पर जाकर चित्रग्रीव के समान ही आवाज बनाकर हिरण्यक को पुकारने लगा। उसकी आवाज सुनकर हिरण्यक ने सोचा, यह कौन-सा कबूतर है? क्या इसके बंधन कटने शेष रह गए हैं?
हिरण्यक ने पूछा- "तुम कौन हो?"
लघुपतनक- “मैं लघुपतनक नाम का कौआ हूँ।"
हिरण्यक- “मैं तुम्हें नहीं जानता, तुम अपने घर चले जाओ।"
लघुपतनक- "मुझे तुम से बहुत जरूरी काम है; एक बार दर्शन तो दे दो।”
हिरण्यक- "मुझे तुम्हें दर्शन देने का कोई प्रयोजन दिखाई नहीं देता।"
लघुपतनक – “चित्रग्रीव के बंधन काटते देखकर मुझे तुमसे बहुत प्रेम हो गया है। कभी मैं भी बंधन में पड़ जाऊँगा तो तुम्हारी सेवा में आना पड़ेगा।"
हिरण्यक- “तुम भोक्ता हो, मैं तुम्हारा भोजन हूँ; हम में प्रेम कैसा? जाओ, दो प्रकृति से विरोधी जीवों में मैत्री नहीं हो सकती।"
लघुपतनक- “हिरण्यक ! मैं तुम्हारे द्वार पर मित्रता की भीख लेकर आया हूँ। तुम मैत्री नहीं करोगे तो यहीं प्राण दे दूँगा।"
हिरण्यक- "हम सहज-वैरी हैं, हममें मैत्री नहीं हो सकती।"
लघुपतनक- “मैंने तो कभी तुम्हारे दर्शन भी नहीं किए। हममें वैर कैसा?"
हिरण्यक- “वैर दो तरह का होता है- सहज और कृत्रिम। तुम मेरे सहज-वैरी हो।"
लघुपतनक- “मैं दो तरह के वैरों का लक्षण सुनना चाहता हूँ।"
हिरण्यक – “जो वैर कारण से हो वह कृत्रिम होता है, कारणों से ही उस वैर का अंत भी हो सकता है। स्वाभाविक वैर निष्कारण होता है, उसका अंत हो ही नहीं सकता।"
लघुपतनक ने बहुत अनुरोध किया, किंतु हिरण्यक ने मैत्री के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। तब लघुपतनक ने कहा- "यदि तुम्हें मुझ पर विश्वास न हो तो तुम अपने बिल में छिपे रहो; मैं बिल के बाहर बैठा-बैठा ही तुमसे बातें कर लिया करूँगा।"
हिरण्यक ने लघुपतनक की यह बात मान ली। किंतु, लघुपतनक को सावधान करते हुए कहा- "कभी मेरे बिल में प्रवेश करने की चेष्टा मत करना।" कौआ इस बात को मान गया। उसने शपथ ली कि कभी वह ऐसा नहीं करेगा।
तब से वे दोनों मित्र बन गए। नित्यप्रति परस्पर बातचीत करते थे। दोनों के दिन बड़े सुख से कट रहे थे। कौआ कभी-कभी इधर-उधर से अन्न संग्रह करके चूहे को भेंट में भी देता था। मित्रता में यह आदान-प्रदान स्वाभाविक था। धीरे-धीरे दोनों की मैत्री घनिष्ठ होती गई। दोनों एक क्षण भी एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकते थे।
बहुत दिन बाद एक दिन आँखों में आँसू भर कर लघुपतनक ने हिरण्यक से कहा- "मित्र! अब मुझे इस देश से विरक्ति हो गई है, इसलिए दूसरे देश में चला जाऊँगा।”
कारण पूछने पर उसने कहा- "इस देश में अनावृष्टि के कारण दुर्भिक्ष पड़ गया है। लोग भूखे मर रहे हैं, एक दाना भी नहीं रहा। घर-घर में पक्षियों के पकड़ने के लिए जाल बिछ गए हैं। मैं तो भाग्य से ही बच गया। ऐसे देश में रहना ठीक नहीं है।"
हिरण्यक- "कहाँ जाओगे?"
लघुपतनक- "दक्षिण दिशा की ओर एक तालाब है। वहाँ मन्थरक नाम का एक कछुआ रहता है। वह भी मेरा वैसा ही घनिष्ठ मित्र है जैसे तुम हो। उसकी सहायता से मुझे पेट भरने योग्य अन्न-मांस आदि अवश्य मिल जाएगा।"
हिरण्यक – “यही बात है तो मैं भी तुम्हारे साथ जाऊँगा।
लघुपतनक- “किंतु, मैं तो आकाश में उड़ने वाला हूँ। मेरे साथ तुम कैसे जाओगे?”
हिरण्यक- "मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर वहाँ ले चलो।"
लघुपतनक यह बात सुनकर प्रसन्न हुआ। हिरण्यक चूहा लघुपतनक कौवे की पीठ पर बैठ गया। दोनों आकाश में उड़ते हुए तालाब के किनारे पहुँचे।
मन्थरक ने जब देखा कि कोई कौआ चूहे को पीठ पर बिठा कर आ रहा है तो वह डर के मारे पानी में घुस गया। लघुपतनक को उसने पहचाना नहीं।
तब लघुपतनक हिरण्यक को थोड़ी दूर छोड़कर पानी में लटकती हुई शाखा पर बैठ कर जोर-जोर से पुकारने लगा - "मन्थरक! मन्थरक !! मैं तुम्हारा मित्र लघुपतनक आया हूँ। आकर मुझसे मिलो।"
लघुपतनक की आवाज सुनकर मन्थरक प्रसन्न होकर बाहर आया। हिरण्यक भी तब वहाँ आ गया और मन्थरक को प्रणाम करके वहीं बैठ गया।
मन्थरक कछुआ, लघुपतनक कौआ और हिरण्यक चूहा वहाँ बैठे-बैठे बातें कर रहे थे कि वहां चित्रांग नाम का हिरन कहीं से दौड़ता-हाँफता आ गया। एक व्याध उसका पीछा कर रहा था। उसे आता देखकर कौआ उड़कर वृक्ष की शाखा पर बैठ गया। हिरण्यक पास के बिल में घुस गया और मन्थरक तालाब के पानी में जा छिपा।
कौवे ने हिरन को अच्छी तरह देखने के बाद मन्थरक से कहा- "मित्र मन्थरक ! यह हिरन पानी पीने के लिए तालाब पर आया है।"
मन्थरक- "यह हिरन बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा है और डरा हुआ सा है। इसलिए यह प्यासा नहीं, बल्कि व्याध के डर से भागा हुआ है। देखो तो सही, इसके पीछे व्याध आ रहा है या नहीं?"
दोनों की बात हिरन ने सुन ली और बोला- "मन्थरक! मेरे भय का कारण तुम जान गए हो। मैं व्याध के बाणों से डरकर बड़ी कठिनाई से यहाँ पहुँच पाया हूँ। तुम मेरी रक्षा करो। अब तुम्हारी शरण में हूँ। मुझे कोई ऐसी जगह बतलाओ जहाँ व्याध न पहुँच सके।"
मन्थरक ने हिरन को घने जंगलों में भाग जाने की सलाह दी। किंतु लघुपतनक ने ऊपर से देखकर बतलाया कि व्याध दूसरी दिशा में चला गया है, इसलिए अब डर की कोई बात नहीं है। अब चित्रांग की भी लघुपतनक, हिरण्यक और मन्थरक से गाढ़ी मित्रता हो गई।
एक दिन हिरन घूमता हुआ जंगल में चला गया और शाम तक वापस नहीं लौटा। उसके तीनों मित्रों को संदेह होने लगा कि कहीं वह व्याध के जाल में न फँस गया हो; अथवा शेर, बाघ आदि ने उस पर हमला न कर दिया हो। घर में बैठे स्वजन अपने प्रवासी प्रियजनों के संबंध में सदा शंकित रहते हैं।
बहुत देर तक भी चित्रांग हिरन नहीं आया तो मन्थरक कछुए ने लघुपतनक कौवे को जंगल में जाकर हिरन को खोजने की सलाह दी। लघुपतनक ने कुछ दूर जाकर देखा कि वहाँ चित्रांग एक जाल में बँधा हुआ है। लघुपतनक उसके पास गया। उसे देखकर चित्रांग की आँखों में आँसू आ गए। वह बोला- "अब मेरी मृत्यु निश्चित है। अन्तिम समय में तुम्हारे दर्शन कर के मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। प्राण विसर्जन के समय मित्र-दर्शन बड़ा सुखद होता है। मेरे अपराध क्षमा करना।"
लघुपतनक ने धीरज बँधाते हुए कहा- "घबराओ मत! मैं अभी हिरण्यक चूहे को बुला लाता हूँ। वह तुम्हारे जाल काट देगा।"
यह कहकर वह हिरण्यक के पास चला गया और शीघ्र ही उसे पीठ पर बिठाकर ले आया। हिरण्यक अभी जाल काटने की सोच ही रहा था कि लघुपतनक ने वृक्ष के ऊपर से किसी को देखकर कहा – “यह तो बहुत बुरा हुआ।"
हिरण्यक ने पूछा- "क्या कोई व्याध आ रहा है?"
लघुपतनक- "नहीं, व्याध तो नहीं, किंतु मन्थरक कछुआ इधर चला आ रहा है।"
हिरण्यक – “तब तो खुशी की बात है। दुखी क्यों होते हो?"
लघुपतनक- "दुखी इसलिए होता हूँ कि व्याध के आने पर मैं ऊपर उड़ जाऊँगा, हिरण्यक बिल में घुस जाएगा, चित्रांग भी छलागें मारकर घने जंगल में घुस जाएगा; लेकिन मन्थरक कैसे अपनी जान बचाएगा? यही सोचकर चिंतित हो रहा हूँ।"
मन्थरक के वहाँ आने पर हिरण्यक ने मन्थरक से कहा- "मित्र! तुमने यहाँ आकर अच्छा नहीं किया। अब भी वापस लौट जाओ, कहीं व्याध न आ जाए।"
इसीलिए मन्थरक ने कहा- "मित्र! मैं अपने मित्र को आपत्ति में जानकर वहाँ नहीं रह सका। सोचा, उसकी आपत्ति में हाथ बटाऊँगा, तभी चला आया।"
ये बातें हो ही रही थीं कि उन्होंने व्याध को उसी ओर आते देखा। उसे देखकर चूहे ने उसी क्षण चित्रांग के बंधन काट दिए। चित्रांग भी उठकर घूम-घूमकर पीछे देखता हुआ आगे भाग खड़ा हुआ। लघुपतनक वृक्ष पर उड़ गया। हिरण्यक पास के बिल में घुस गया।
व्याध अपने जाल में किसी को न पाकर बड़ा निराश हुआ। वहाँ से वापस जाने को मुड़ा ही था कि उसकी दृष्टि धीरे-धीरे जाने वाले मन्थरक पर पड़ गई। उसने सोचा, “आज हिरन तो हाथ आया नहीं, कछुए को ही ले चलता हूँ। कछुए को ही आज भोजन बनाऊँगा। उससे ही पेट भरूँगा।" यह सोचकर वह कछुए को जाल में बाँधकर कंधे पर डालकर चल दिया। उसे ले जाते देख हिरण्यक और लघुपतनक को बड़ी चिंता हुई। दोनों मित्र मन्थरक को बड़े प्रेम और आदर से देखते थे। चित्रांग ने भी मन्थरक को व्याध के कन्धों पर देखा तो व्याकुल हो गया। तीनों मित्र मन्थरक की मुक्ति का उपाय सोचने लगे।
कौवे ने तब एक उपाय ढूंढ निकाला। वह यह कि चित्रांग व्याध के मार्ग में तालाब के किनारे जाकर लेट जाए। मैं तब उसे चोंच मारने लगूंगा। व्याध समझेगा कि हिरन मरा हुआ है। वह मन्थरक को जमीन पर रखकर इसे लेने के लिए जब आएगा तो हिरण्यक तीव्रता से मन्थरक के बंधन काट दे। मन्थरक तालाब में घुस जाए और चित्रांग छलांगें मारकर घने जंगल में चला जाय। मैं उड़कर वृक्ष पर चला ही जाऊँगा। सभी बच जाएँगे, मन्थरक भी छूट जाएगा!
तीनों मित्रों ने यही उपाय किया। चित्रांग तालाब के किनारे मृतवत जा लेटा। कौआ उसकी गरदन पर सवार होकर चोंच चलाने लगा। व्याध ने देखा तो समझा कि हिरन जाल से छूट कर दौड़ता-दौड़ता यहाँ मर गया है। उसे लेने के लिए वह जाल-बद्ध कछुए को जमीन पर छोड़कर आगे बढ़ा तो हिरण्यक ने अपने तीखे दाँतों से जाल काट दिया। मन्थरक पानी में घुस गया। चित्रांग भी भाग गया।
व्याध ने चित्रांग को दौड़ते देखा तो आश्चर्य में डूब गया। फिर देखा कि कछुआ भी जाल से निकलकर भाग गया है, तब वह और भी विस्मित हुआ और निराश होकर चला गया।
उधर चारों मित्र लघुपतनक, मन्थरक, हिरण्यक और चित्रांग प्रसन्नता से फूले नहीं समाते थे। मित्रता के बल पर ही चारों ने व्याध से मुक्ति पाई थी।
मित्रता में बड़ी शक्ति है। हमें अपने मित्रों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।
अभी आपने जो कहानी पढ़ी वह पंचतंत्र से ली गई है। पंचतंत्र हमारे देश की ऐसी अद्भुत पुस्तक है जो आज भी विश्व में मनोरंजन और नैतिक ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से पढ़ी-पढ़ाई जाती है। अपने पुस्तकालय में से पंचतंत्र की कहानियों की पुस्तक खोजकर पढ़िए और इसकी कोई एक कहानी कक्षा में सुनाइए।
