अध्याय-4
हरिद्वार
('कविवचन सुधा' 14 अक्टूबर सन् 1871 ई.)
हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध रचनाकार भारतेंदु हरिश्चंद्र अपनी यात्राओं के लिए चर्चित रहे हैं। उन्होंने भारत के अनेक गाँवों और नगरों की यात्राएँ की और उनके विषय में पत्र-पत्रिकाओं में लिखा भी। प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व का अध्ययन करने में यात्राओं से उन्हें बहुत सहायता मिली। वे मानते थे कि शिक्षा की पूर्ति पुस्तकों से ही नहीं यात्राओं से भी होती है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र 1871 ई. में हरिद्वार की यात्रा पर गए थे। वे लिखते हैं- "मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।" हरिद्वार की प्रकृति, वहाँ के पर्वतों, पक्षियों, वृक्षों और कलकल बहती गंगा, वहाँ के घाटों, लोगों, दुकानों और गंगा तट के मनोरम दृश्यों को देखकर वे अति आनंदित हुए। इस पाठ में उन्होंने कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम पत्र लिखते हुए अपनी उसी हरिद्वार-यात्रा का रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है। इस पत्र में प्रयुक्त हिंदी का स्वरूप लगभग 150 वर्ष पुराना है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र 1871 ई. में हरिद्वार की यात्रा पर गए थे। वे लिखते हैं- "मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।" हरिद्वार की प्रकृति, वहाँ के पर्वतों, पक्षियों, वृक्षों और कलकल बहती गंगा, वहाँ के घाटों, लोगों, दुकानों और गंगा तट के मनोरम दृश्यों को देखकर वे अति आनंदित हुए। इस पाठ में उन्होंने कविवचन सुधा पत्रिका के संपादक के नाम पत्र लिखते हुए अपनी उसी हरिद्वार-यात्रा का रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है। इस पत्र में प्रयुक्त हिंदी का स्वरूप लगभग 150 वर्ष पुराना है।
श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु !
मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है कि मैं उस पुण्य भूमि का वर्णन करता हूँ जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है। यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है जिन पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा र ही है और बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़;
यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं। सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं। इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं। वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी। एक ओर त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है। जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है, रंग जल का स्वच्छ और श्वेत है और अनेक प्रकार के जल-जंतु कल्लोल करते हुए। यहाँ श्री गंगा जी अपना नाम नदी सत्य करती हैं अर्थात् जल के वेग का शब्द बहुत होता है और शीतल वायु नदी के उन पवित्र छोटे-छोटे कनों को लेकर स्पर्श ही से पावन करता हुआ संचार करता है। यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं- एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से, इन दोनों धारों के बीच में एक सुंदर नीचा पर्वत है और नील धारा के तट पर एक छोटा-सा सुंदर चुटीला पर्वत है और उसके शिषर पर चण्डिका देवी की मूर्ति है। यहाँ हरि की पैड़ी नामक एक पक्का घाट है और यहीं स्नान भी होता है। विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं। यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं। श्री गंगा जी का पाट भी बहुत छोटा है पर वेग बड़ा है, तट पर राजाओं की धर्मशाला यात्रियों के उतरने के हेतु बनी हैं और दुकानें भी बनी हैं पर रात को बंद रहती हैं। यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा
क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं। पंडे दुकानदार इत्यादि कनखल व ज्वालापुर से आते हैं। पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं। इस क्षेत्र में पाँच तीर्थ मुख्य हैं हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल। हरिद्वार तो हरि की पैंड़ी पर नहाते हैं, कुशावर्त्त भी उसी के पास है, नीलधारा वही दूसरी धारा, विल्व पर्वत भी पास ही एक सुहाना पर्वत है जिस पर विल्वेश्वर महादेव की मूर्ति है और कनखल तीर्थ इधर ही है, यह कनखल तीर्थ बड़ा उत्तम है। किसी काल में दक्ष ने यहीं यज्ञ किया था और यहीं सती ने शिव जी का अपमान न सहकर अपना शरीर भस्म कर दिया। यहाँ कुछ छोटे-छोटे घर भी बने हैं। और भारामल जैकृष्णदास खत्री यहाँ के प्रसिद्ध धनिक हैं। हरिद्वार में यह बखेड़ा कुछ नहीं है और शुद्ध निर्मल साधुओं के सेवन योग्य तीर्थ है। मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है। मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है। चारों ओर से शीतल पवन आती थी। यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया। वैसे ही मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे। निदान इस उत्तम क्षेत्र में जितना समय बीता, बड़े आनंद से बीता। एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे। उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था। चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था। यहाँ और भी कई वस्तु अच्छी बनती हैं, जनेऊ यहाँ का अच्छा महीन और उज्ज्वल बनता है। यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है। निदान यहाँ जो कुछ है, अपूर्व है और यह भूमि साक्षात विरागमय साधुओं और विरक्तों के सेवन योग्य है। और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ और अपने वर्णन द्वारा आपके पाठकों को इस पुण्यभूमि का वृत्तांत विदित करके मौनावलंबन करता हूँ। निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।
आपका मित्र
यात्री
- भारतेंदु हरिश्चंद्र

लेखक से परिचय
'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल' का उद्घोष करने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविता, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत आदि अनेक विधाओं में लेखन कार्य किया। इन्होंने कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन, हरिश्चंद्र चंद्रिका और स्त्रियों के लिए बालाबोधिनी पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं। इनकी रचनाओं में समाज-सुधार, राष्ट्र-प्रेम, अंग्रेजी शासन का विरोध, स्वाधीनता की भावना के स्वर सुनाई देते हैं। इन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है। सत्य हरिश्चन्द्र, भारत-दुर्दशा, अंधेर नगरी और सरयूपार की यात्रा इनकी उल्लेखनीय
कृतियाँ हैं।पाठ से
आइए, अब हम इस पत्र को थोड़ा और विस्तार से समझते हैं। नीचे दी गई गतिविधियाँ इस कार्य में आपकी सहायता करेंगी।मेरी समझ से
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।
1. "सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं" का क्या अर्थ है?
- लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं।
- लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं।
- लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे।
- लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़कर खाना पसंद था।
- शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी
- आर्थिक संतोष और मानसिक विकास
- मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव
- सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम
- संतुष्टि में सुख होता है।
- सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं।
- लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी।
- पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।
- अंधविश्वास और लालच
- मानवता और देशप्रेम
- सादगी और आत्मनिर्भरता
- स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
5.लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?
- राजनीतिक
- आध्यात्मिक
- सामाजिक
- प्राकृतिक
- कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता
- मुहावरों का अधिक प्रयोग
- सरलता और चित्रात्मकता
- जटिलता और संक्षिप्तता
मिलकर करें मिलान
पाठ से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। आपस में चर्चा कीजिए और इनके उपयुक्त संदर्भों से इनका मिलान कीजिए-
| क्रम | शब्द | संदर्भ |
|---|---|---|
| 1. | हरिद्वार | 1.मान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप। |
| 2. | गंगा | 2. यह अठारह पुराणों में से सर्वप्रसिद्ध एक पुराण है। इसमें अधिकांश श्री कृष्ण संबंधी कथाएँ हैं। |
| 3. | भगीरथ | 3. यह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। |
| 4. | चण्डिका | 4. यह एक पेड़ का नाम है। यह दक्षिण भारत में बहुतायत से मिलता है। इस पेड़ की सुगंधित छाल दवा और मसाले के काम में आती है। इसे दारचीनी भी कहते हैं। |
| 5. | भागवत | 5. यह भारतवर्ष की एक प्रधान नदी है जो हिमालय से निकलकर लगभग 1560 मील पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके अनेक नाम हैं, जैसे- भागीरथी, त्रिपथगा, अलकनंदा, मंदाकिनी, सुरनदी आदि। |
| 6. | दालचीनी | 6. ये अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे। कहा जाता है कि ये घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। इसीलिए गंगा का एक नाम 'भागीरथी' भी है। |
मिलकर करें चयन
(क)पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो निष्कर्ष दिए गए हैं- एक सही और एक भ्रामक। अपने समूह में इन पर विचार कीजिए और उपयुक्त निष्कर्ष पर सही का चिह्न लगाइए।| क्रम | पंक्ति | निष्कर्ष |
|---|---|---|
| 1. | पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है। |
|
| 2. | बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। |
|
| 3. | इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं। |
|
| 4. | जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है। |
|
| 5. | एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। |
|
| 6. | निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। |
|
पंक्तियों पर चर्चा
पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए।- (क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।"
- (ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।"
सोच-विचार के लिए
पाठ को पुनः ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए।- (क) “और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ..."
- लेखक का यह वाक्य क्या दर्शाता है? क्या आपने कभी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा अनुभव किया है? कब-कब?
- (संकेत- किसी स्थान से लौटने के बाद भी उसी के विषय में सोचते रहना)
- (ख) “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।"
- लेखक का यह कथन आज के समाज में कितना सच है? क्या अब भी ऐसे संतोषी लोग मिलते हैं? अपने विचार उदाहरण सहित लिखिए।
- (ग) “मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है।"
- आपके विचार से लेखक ने उस स्थान को 'टिकने योग्य' क्यों कहा है? उस स्थान में कौन-कौन सी विशेषताएँ होंगी जो उसे 'टिकने योग्य' बनाती होंगी?
- (संकेत - केवल आराम, सुविधा या कोई और कारण भी।)
- (घ) “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।"
- इस वाक्य के माध्यम से आपको वृक्षों के महत्व के बारे में कौन-कौन सी बातें सूझ रही हैं?
अनुमान और कल्पना से
(ख) “जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे।"
कल्पना कीजिए कि आप गंगा के तट पर हैं और पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं। अपने अनुभवों को अपनी कल्पना से लिखिए।
(ग) “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।"
यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?
(घ) “यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं- एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।"
इस पाठ में 'गंगा' शब्द के साथ 'श्री' और 'जी' लगाया गया है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?
(
ङ) कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार एक श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ गए हैं। उसकी यात्रा को अच्छा बनाने के लिए कुछ सुझाव दीजिए।
लिखें संवाद
(क) “मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।"
लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।
(ख) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।"
लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए- जैसे पर्वत बोल रहे हों।
'है' और 'हैं' का उपयोग
इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों के प्रयोग पर ध्यान दीजिए-
- विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं।
- यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं।
इसका कारण यह है कि कभी-कभी हम आदर-सम्मान प्रदर्शित करने के लिए एकवचन संज्ञा शब्दों को भी बहुवचन के रूप में प्रयोग करते हैं। इसे 'आदरार्थ बहुवचन' प्रयोग कहते हैं। उदाहरण के लिए-
अब 'आदरार्थ बहुवचन' को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए-
- मेरे पिता जी सो रहे हैं।
- भारत के प्रधानमंत्री भाषण दे रहे हैं।
अब 'आदरार्थ बहुवचन' को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए- 1. प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं ———,वे अभी सभा में उपस्थित ———|
2. माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते ——— , हमें उनका कहना मानना चाहिए।
3. मेरी बहन बाजार जा रही ———वहाँ से किताबें ले आएगी।
4. बाहर फेरीवाला ——— ———। ——— बुला लाओ |
5. डाकिया जी आए ———। उन्हें भी बुला लाओ।
6. आप तो बहुत दिन बाद ———, ——— का स्वागत है।
7. डॉक्टर साहब बहुत विद्वान ———,———से परामर्श लेना चाहिए।
8. आपके माता-पिता कहाँ ———? क्या मैं ———से मिल सकता हूँ?
9. ये हमारे हिंदी के अध्यापक ———, हम ——— से बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।
10. बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर ——— ——— |
भावों की पहचान
प्रेम, संतोष, भक्ति,
श्रद्धा, वैराग्य, आश्चर्य,
करुणा, हास्य, शांति,
परोपकार, दया,
दुख
नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं। सोचिए कि इनमें कौन-सा भाव प्रकट हो रहा है? पहचानिए और चुनकर लिखिए-
1. उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।
——————————
2. चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।
——————————
3. पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं।
——————————
4. हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।
——————————
5. सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।
——————————
काल की पहचान
"यहाँ हरि की पैड़ी नामक एक पक्का घाट है और यहीं स्नान भी होता है।"
आप जानते ही होंगे कि काल के तीन भेद होते हैं- भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल। परस्पर चर्चा करके पता लगाइए कि ऊपर दिए गए वाक्य में कौन-सा काल प्रदर्शित हो रहा है? सही पहचाना, यह वाक्य वर्तमान काल को प्रदर्शित कर रहा है।
(क) नीचे दी गई पाठ की इन पंक्तियों को पढ़कर बताइए, इनमें क्रिया कौन-से काल को प्रदर्शित कर रही है? (भूतकाल/वर्तमान/भविष्य)
1. निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।
2. यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।
3. वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं।
4. चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।
5. मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था।
(ख) अब इन वाक्यों के काल को अन्य कालों में बदलकर लिखिए और नए वाक्य बनाइए।
पत्र की रचना
"और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ...
"
इस पंक्ति में लेखक संपादक महोदय को संबोधित करके अपनी बात लिख रहे हैं। आप जानते ही होंगे कि पत्र जिस व्यक्ति के लिए लिखा जाता है, उसे संबोधित किया जाता है। पत्र के अंत में अपना नाम लिखा जाता है ताकि पत्र पाने वाले को पता चल सके कि पत्र किसने लिखा है।
नीचे इस पत्र की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। अपने समूह के साथ मिलकर इन विशेषताओं से जुड़े वाक्यों से इनका मिलान कीजिए-
| क्रम | पत्र की विशेषताएँ | पत्र से उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. | व्यक्तिपरकता पत्र लेखन में लेखक के विचार, अनुभव और भावनाएँ प्रमुख होते हैं। | "ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया... |
| 2. | संवादात्मकता- पत्र संवाद का रूप है; पाठक से सीधा संवाद होता है। | श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु ! |
| 3. | स्वाभाविक शैली- भाषा कृत्रिम नहीं होती; भावनाओं के अनुरूप होती है। | आपका मित्र- यात्री |
| 4. | व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन - जहाँ लेखक अपने वास्तविक अनुभव को साझा करता है | मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है... |
| 5. | अभिवादन या संबोधन पत्र- का आरंभ, जिसमें संबोधित व्यक्ति को आदरपूर्वक संबोधित किया जाता है। | हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिकता, साधु-संन्यासियों का जीवन, नदी, पर्वत, जल, गंगा स्नान आदि का अत्यंत विस्तार से वर्णन।
जैसे- "यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है..." |
| 6. | हस्ताक्षर - लेखक अपने नाम या संबंध से पत्र को समाप्त करता है। | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ... निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। |
| 7. | उपसंहार और निवेदन- लेखक पत्र समाप्त करता है और अपनी इच्छा या निवेदन प्रकट करता है। | एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके... |
| 8. | मुख्य विषय-वस्तु | और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ... |
पत्र
आपने जो यात्रा-वर्णन पढ़ा है, इसे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने एक संपादक को पत्र के रूप में लिखकर भेजा था। आप भी अपनी किसी यात्रा के विषय में अपने किसी परिचित को पत्र लिखकर बताइए।शब्द से जुड़े शब्द
नीचे दिए गए स्थानों में 'हरिद्वार' से जुड़े शब्द अपने मन से या पाठ से चुनकर लिखिए
लेखन के अनोखे तरीके
(क) 'हरिद्वार' पाठ में लेखक ने हरिद्वार के अपने अनुभवों को बहुत ही साहित्यिक और कल्पनाशील भाषा में प्रस्तुत किया है जिसमें कई स्थानों पर उन्होंने तुलनात्मक वाक्यों के माध्यम से दृश्यों का वर्णन किया है। जैसे - हरी-भरी लताओं की तुलना सज्जनों से इस प्रकार की गई है-
"पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है।"
नीचे कुछ तुलनात्मक वाक्य दिए गए हैं। पाठ में ढूंढ़िए कि इन तुलनात्मक वाक्यों को लेखक ने किस प्रकार विशिष्ट तरीके से लिखा है यानी विशिष्टता प्रदान की है?
1. वृक्षों की तुलना साधुओं से की गई है।
2. गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से की गई है।
3. हरियाली की तुलना गलीचे से की गई है।
4. नदी की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश (कीर्ति) से की गई है।
(ख) “मैं उस पुण्य भूमि का वर्णन करता हूँ जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है।"
“पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।"
उपर्युक्त पंक्तियों को ध्यान से देखिए, ये आज की हिंदी की तरह नहीं लिखी गई हैं। इसे लेखक ने न केवल अपनी शैली में लिखा है, अपितु इसमें प्राचीन हिंदी भाषा की छवि भी दिखाई देती है। नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं आप इन्हें आज की हिंदी में लिखिए।
1. "इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।"
2. "वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दृष्टि पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।"
3. "यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।"
4. "मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।"
5. "यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।"
6. "उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।"
7. "निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।"
(ग) इस रचना में हरिश्चंद्र जी ने कहीं-कहीं प्राचीन वर्तनी का प्रयोग किया है, जैसे- शिखर के लिए शिषर, यात्रियों के लिए जात्रियों। ऐसे शब्दों की सूची बनाइए। आप इन शब्दों को कैसे लिखते हैं? कक्षा में चर्चा कीजिए।
1. "मैंने गंगा जी के तट पर रसोई करके... भोजन किया।"
पाठ से आगे
आपकी बात
क्या आपने कभी खुले वातावरण में या प्रकृति के पास भोजन किया है? वह अनुभव घर के खाने से कैसे भिन्न था?
2. "उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।"
आपके जीवन में ऐसा कोई क्षण आया, जब किसी सामान्य-सी वस्तु ने आपको गहरा सुख दिया हो? उसके बारे में बताइए।
3. "हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।"
आपको किस स्थान पर पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है? क्या कोई ऐसा स्थान है जहाँ जाते ही मन शांत हो गया हो? उस स्थान की कौन-सी बातें आपको अच्छी लगीं?
4. पाठ में वर्णित है, यहाँ के वृक्ष "फल, फूल, गंध... जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।"
क्या आपके जीवन में कोई पेड़, फूल या प्राकृतिक वस्तु है जिससे आप विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं? क्यों?
"यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है..."
प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण
आपने पत्र में पढ़ा कि हरिद्वार का प्राकृतिक सौंदर्य अद्भुत है। इस सौंदर्य को बनाए रखने में प्रत्येक मानव की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस विषय में अपने समूह में चर्चा कीजिए। इसके बाद अपने समूह के साथ मिलकर "तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!” विषय पर जन-जागरूकता पोस्टर बनाइए।
स्वास्थ्य और योग
"चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।"
अनेक लोग आज भी मन की शांति, स्वास्थ्य लाभ और भक्ति के लिए तीर्थ और पर्वतीय स्थानों की यात्रा करते हैं। मन की शांति और स्वास्थ्य के लिए हमारे देश में हजारों वर्षों से योग भी किया जाता रहा है।
(क) 5 मिनट ध्यान लगाकर या मौन बैठकर अपने आस-पास की ध्वनियों को सुनिए, अपनी श्वास पर ध्यान दीजिए तथा ध्यान को केंद्रित करने का प्रयास कीजिए। इस अनुभव के विषय में एक अनुच्छेद लिखिए।
(ख) अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में अपने विद्यालय के कार्यक्रमों को बताने के लिए एक 'सूचना' लिखिए जिसे सूचना-पट पर लगाया जा सके।
सज्जन वृक्ष
"सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।" आप जानते ही हैं कि पेड़-पौधे हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। किंतु हमारे ही कार्यों के कारण वे कम होते जा रहे हैं। आइए, पेड़-पौधों को अपना मित्र बनाएँ।
(क) एक पौधा लगाइए और उसकी देखभाल कीजिए ताकि वह कुछ वर्षों में बड़ा पेड़ बन सके। उसे एक नाम दीजिए और उसका मित्र बनिए।
(ख) उसके बारे में अपनी दैनंदिनी में नियमित रूप से लिखिए।
अपने शब्द
आइए, एक रोचक गतिविधि करते हैं। 'शीतल' शब्द को केंद्र में रखिए और उसके चारों ओर ये चार बातें लिखिए-
अब इसी प्रकार आपके समूह का प्रत्येक सदस्य इस पत्र से एक-एक शब्द चुनकर उसके लिए ऐसा ही शब्द-चित्र बनाए।
यात्रा के व्यय की गणना
(क) मान लीजिए कि यात्रा के लिए आपको ₹1000 दिए गए हैं। यात्रा, खाना आदि सब मिलाकर एक व्यय विवरण बनाइए।
(ख) मान लीजिए कि आप इस यात्रा में एक छोटी वस्तु (स्मृति चिह्न) खरीदना चाहते हैं। आप क्या खरीदेंगे और क्यों? (संकेत - सोचिए, क्या वह आवश्यक है? बजट कैसे संभालेंगे?)
(क) कल्पना कीजिए कि कुछ मित्रों का समूह एक यात्रा पर जा रहा है। आप एक मार्गदर्शक या टूरिस्ट गाइड हैं। आप इन सबकी यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखेंगे?
यात्रा सबके लिए
उपर्युक्त चित्र में सबकी अलग-अलग आवश्यकताएँ हो सकती हैं। इन्हें ध्यान में रखते हुए सोचिए कि वहाँ पहुँचने, घूमने, भोजन आदि में आप कैसे सहायता करेंगे?
(ख) अपने किसी मित्र के साथ बिना बोले संवाद कीजिए- संकेतों से। अब सोचिए कि यात्रा में श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए क्या-क्या आवश्यक होगा?
(ग) यात्रा करते हुए ऐतिहासिक धरोहरों या भवनों की सुरक्षा के लिए आप किन किन बातों का ध्यान रखेंगे?
आज की पहेली
पाठ में से शब्द खोजिए और नीचे दिए गए रिक्त स्थानों में लिखिए-
1. एक मसाले का नाम ———————
2. कपास से जुड़ा एक शब्द ———————
3. जहाँ स्नान होता है———————
4. वृक्ष के किसी अंग का नाम———————
5. एक नगर या तीर्थ का नाम ———————
6. व्यापार से जुड़ा स्थान ———————
7. एक नदी का नाम ———————
8. एक पर्वत का नाम ———————
9. एक धार्मिक ग्रंथ का नाम———————
झरोखे से
भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखे एक और पत्र का एक अंश नीचे दिया गया है। इसे पढ़िए और आपस में विचार कीजिए।
हरिद्वार के मार्ग में
हरिद्वार के मार्ग में अनेक प्रकार के वृक्ष और पक्षी देखने में आए। एक पीले रंग का पक्षी छोटा बहुत मनोहर देखा गया। बया एक छोटी चिड़िया है उसके घोंसले बहुत मिले। ये घोंसले सूखे बबूल काँटे के वृक्ष में हैं और एक-एक डाल में लड़ी की भाँति बीस-बीस, तीस-तीस लटकते हैं। इन पक्षियों की शिल्पविद्या तो प्रसिद्ध ही है, लिखने का कुछ काम नहीं है। इसी से इनका सब चातुर्य प्रगट है कि सब वृक्ष छोड़ के काँटे के वृक्ष में घर बनाया है। इसके आगे ज्वालापुर और कनखल और हरिद्वार हैं, जिसका वृत्तांत अगले नंबरों में लिखूँगा।
खोजबीन के लिए
भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक प्रसिद्ध नाटक है- अंधेर नगरी। इसे पुस्तकालय या इंटरनेट से ढूँढ़कर पढ़िए और अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए।