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अध्याय-10
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तरुण के स्वप्न

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नेताजी सुभाषचंद्र बोस ऐसे स्वाधीन संपन्न समाज और राष्ट्र का सपना देखते थे जिसमें व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से भागीदार बने। वे अपने उद्बोधनों में नारी मुक्ति और सभी को शिक्षा तथा समान अवसर मिलने की बात भी करते थे। अपना यह स्वप्न वे युवाओं को सौंपना चाहते थे जिससे आदर्श समाज और आदर्श राष्ट्र का रूप साकार हो सके। आइए, अब हम नेताजी के उस उद्बोधन के विषय में जानते हैं जो उन्होंने मेदिनीपुर जिला युवक-सम्मेलन में 29 दिसंबर, 1929 को युवाओं को संबोधित करते हुए प्रगट किया था।


Screenshot 2025-09-17 154908 स्वप्न तो अनेकों ने देखा। हमारे नेता स्वर्गीय देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न देखा था। वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा। उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं। इसलिए हमारा भी अपना एक स्वप्न है, इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं। वह स्वप्न या आदर्श क्या है? हम चाहते हैं, एक नया सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र। उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं। उस समाज में जातिभेद का स्थान नहीं हो, उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले, उस समाज में अर्थ की विषमता न हो, उस समाज में प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर पाए। जिस समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा,

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 वह राष्ट्र किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा। जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, सर्वोपरि वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा या भारतवासी के आदर्श को सार्थक बनाकर ही स्थिर नहीं होगा, बल्कि विश्व-मानव के समक्ष आदर्श-समाज और आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य होगा। मैं ऐसे समाज और ऐसे राष्ट्र का ही स्वप्न देखता रहा हूँ। यह स्वप्न मेरे समक्ष नित्य एवं अखंड सत्य है। इस सत्य की प्रतिष्ठा के लिए सबकुछ किया जा सकता है, हर प्रकार का त्याग किया जा सकता है, हर संकट को सहा जा सकता है और इस स्वप्न को सार्थक बनाने के दौरान प्राण देना भी है तो 'वह मरण है स्वर्ग समान'। हे मेरे तरुण भाइयो! तुम्हें देने लायक मेरे पास कुछ भी नहीं है, है सिर्फ यही स्वप्न जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है, जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी सार्थक बनाता है। यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ- स्वीकार करो। 


- सुभाषचंद्र बोस 


  लेखक से परिचय

Screenshot 2025-09-17 155931 उड़ीसा (अब ओड़िशा) राज्य के कटक नगर में जन्मे सुभाषचंद्र बोस को पूरा देश 'नेताजी' के नाम से जानता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनका उद्देश्य स्पष्ट था-भारत को अँग्रेजी शासन से मुक्त कराना। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। स्वतंत्रता की लड़ाई में उनकी दूरदर्शिता का पता तब चलता है जब उन्होंने 'आजाद हिंद फौज' का नेतृत्व संभाला। सन् 1857 में भारतीय सैनिकों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जिस तरह एकजुट होकर युद्ध किया, उसके बाद सुभाषचंद्र बोस ही ऐसे महान सेनानी हुए जिन्होंने 'आजाद हिंद फौज' के माध्यम से एकजुट होकर अंग्रेजों को चुनौती दी। उन्होंने सैनिकों को 'दिल्ली चलो' और 'जय हिंद' का नारा दिया। सुभाषचंद्र बोस ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए क्रांति का ऐसा बिगुल बजाया कि पूरा देश 'जय हिंद' के नारों से गूंज उठा। उन्होंने 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा' जैसा प्रेरक नारा भी दिया। सुभाषचंद्र बोस ने एक स्वाधीन राष्ट्र और आत्मनिर्भर समाज का सपना देखा। उनके जीवन के विषय में जानना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को जानना है। द इंडियन स्ट्रगल उनकी चर्चित पुस्तक है। प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस का वाड्मय (संपूर्ण लेखन) प्रकाशित किया है। इस प्रकाशन में उनके उपलब्ध सभी कार्यों, पत्रों, टिप्पणियों, भाषणों आदि को सम्मिलित किया गया है।

पाठ से

आइए, अब हम इस पाठ पर विस्तार से चर्चा करें। आगे दी गई गतिविधियाँ इस कार्य में आपकी सहायता करेंगी।

मेरी समझ से

  1. (क)निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

  2. (1) "उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।" इस कथन में रेखांकित शब्द 'हम' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
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  • सुभाषचंद्र बोस के लिए
  • देश के तरुण वर्ग के लिए
  • चित्तरंजन दास के लिए
  • भारतवासियों के लिए

(2) स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न साकार होगा?
  • आर्थिक असमानता से
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  • स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकारों से
  • श्रम और कर्म की मर्यादा से
  • जातिभेद से

(3) "उनके स्वप्न के उत्तराधिकारी आज हम हैं।" 'उत्तराधिकारी' होने से क्या अभिप्राय है?
  • हमें उनके स्वप्नों को संजोकर रखना है
  • हमें भी उनकी तरह स्वप्न देखने का अधिकार है
  • उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है
  • उनके स्वप्नों पर चर्चा करने का दायित्व हमारा ही है
(4) जब प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा और उन्नति का समान अवसर प्राप्त होगा तब-
  • राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी
  • तरुणों का साहस बढ़ेगा
  • राष्ट्र स्वाधीन बनेगा
  • राष्ट्र स्वप्नदर्शी होगा
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने ?

मिलकर करें मिलान

नीचे स्तंभ 1 में पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं और स्तंभ 2 में उन पंक्तियों से संबंधित भाव-विचार दिए गए हैं। स्तंभ 1 में दी गई पंक्तियों का स्तंभ 2 में दिए गए भाव-विचार से सही मिलान कीजिए।
क्रम स्तंभ 1 स्तंभ 2
1. "इसी स्वप्न की प्रेरणा से हम उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं, भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं।" 1.समाज में सभी व्यक्तियों को सभी तरह की स्वतंत्रता हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो।
2. "जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, सर्वोपरि वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा।" 2.हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केंद्रित हैं।
3. "उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं।" 3.जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा।


पंक्तियों पर चर्चा

पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपनी कक्षा में साझा कीजिए।
  1. (क) “उस समाज में अर्थ की विषमता न हो।"

  2. (ख) “वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।"

  3. (ग) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो।"

सोच-विचार के लिए

अब आप इस पाठ को पुनः पढ़िए और निम्नलिखित के विषय में पता लगाकर लिखिए- (
  1. क) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार के राष्ट्र निर्माण का स्वप्न देखा था?

  2. (ख) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस लक्ष्य की प्राप्ति को अपने जीवन की सार्थकता के रूप में देखा?

  3. (ग) “आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा" सुभाषचंद्र बोस ने ऐसा क्यों कहा होगा?

  4. (घ) नेताजी सुभाषचंद्र बोस के लक्ष्यों या ध्येय को पूरा करने के लिए आज की युवा पीढ़ी क्या-क्या कर सकती है?

अनुमान और कल्पना से

  • (क) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो”, सुभाषचंद्र बोस ने किन-किन दृष्टियों से मुक्ति की बात की होगी?
  • (ख) “उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे", सुभाषचंद्र बोस को अपने भाषण में नारी के लिए समान अधिकारों की बात क्यों कहनी पड़ी?
  • (ग) आपके विचार से हमारे समाज में और कौन-कौन से लोग हैं जिन्हें विशेष अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है?
  • (घ) सुभाषचंद्र बोस देश के समस्त युवा वर्ग को संबोधित करते हुए कहते हैं- "हे मेरे तरुण भाइयो !” उनका संबोधन केवल 'भाइयो' शब्द तक ही क्यों सीमित रहा होगा?
  • (ङ) “यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ- स्वीकार करो।" सुभाषचंद्र बोस के इस आह्वान पर श्रोताओं (युवा वर्ग) की क्या प्रतिक्रिया रही होगी?

शीर्षक

  1. (क) आपने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के भाषण का एक अंश पढ़ा है, इसे 'तरुण के स्वप्न' शीर्षक दिया गया है। अपने समूह में चर्चा करके लिखिए कि यह शीर्षक क्यों दिया गया होगा?

  2. (ख) यदि आपको भाषण के इस अंश को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा? यह भी लिखिए।

  3. (ग) सुभाषचंद्र बोस ने अपने समय की स्थितियों या समस्याओं को अपने संबोधन में स्थान दिया है। यदि आपको अपनी कक्षा को संबोधित करने का अवसर मिले तो आप किन-किन विषयों को अपने उद्बोधन में सम्मिलित करेंगे और उसका क्या शीर्षक रखेंगे?

भाषा की बात

(क) सुभाषचंद्र बोस ने अपने भाषण में संख्या, संगठन या भाव आदि का बोध कराने वाले शब्दों के साथ उनकी विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्दों का प्रयोग किया है। उनके भाषण से विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्द ढूँढ़कर दिए गए शब्द समूह को पूरा कीजिए-

अखंड   -   सत्य
----------------   -   समाज
----------------   -   राष्ट्र
----------------   -  जीवन
----------------   -  शक्ति
----------------   -  आनंद
(ख) सुभाषचंद्र बोस ने तो उपर्युक्त विशेषताओं के साथ इन शब्दों को रखा है। आप किन विशेषताओं के साथ इन उपर्युक्त शब्दों को रखना चाहेंगे और क्यों? लिखिए।

विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग

(क) “और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र" इस वाक्यांश में रेखांकित शब्द 'स्वाधीन' का विपरीत अर्थ देने वाला शब्द है 'पराधीन'। इसी प्रकार के कुछ विपरीतार्थक शब्द आगे दिए गए हैं, लेकिन वे आमने-सामने नहीं हैं। रेखाएँ खींचकर विपरीतार्थक शब्दों के सही जोड़े बनाइए- Screenshot 2025-09-17 170116
क्रम स्तंभ 1 स्तंभ 2
1. स्वीकार कर्मण्य/कर्मठ
2. सार्थक विपन्न
3. विषमता अस्वीकार
4. क्षुद्र जीवन
5. संपन्न निरर्थक
6. अकर्मण्य समानता
7. मरण विशाल/वृहत/विराट/महान


(ख) अब स्तंभ 1 और स्तंभ 2 के सभी शब्दों से दिए गए उदाहरण के अनुसार वाक्य बनाकर लिखिए, जैसे-"समाज की उन्नति अकर्मण्य नहीं अपितु कर्मण्य व्यक्तियों पर निर्भर है।"

पाठ से आगे

आपकी बात

  1. (क) आपने सुभाषचंद्र बोस के स्वप्न के बारे में जाना। आप अपने विद्यालय, राज्य और देश के बारे में कैसे स्वप्न देखते हैं? लिखिए।

  2. (ख) हमें बड़े संघर्षों के बाद स्वतंत्रता मिली है। अपनी इस स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए हम अपने स्तर पर क्या-क्या कर सकते हैं? लिखिए।
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मिलान कीजिए

(क) 1. नीचे स्तंभ 1 में स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित कुछ तथ्य दिए गए हैं और स्तंभ 2 में स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दिए गए हैं। तथ्यों का स्वतंत्रता सेनानियों के नाम से रेखा खींचकर सही मिलान कीजिए। इसके लिए आप अपने शिक्षकों, अभिभावकों और पुस्तकालय तथा इंटरनेट की सहायता ले सकते हैं।


क्रम स्तंभ 1 स्तंभ 2
1. 8 अप्रैल, 1929 को 'सेंट्रल असेंबली' में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी, 'शहीद-ए-आज़म' के नाम से जाने जाते हैं। 1.सरदार वल्लभभाई पटेल
2. 'स्वराज पार्टी' के संस्थापकों में से एक, सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु कहे जाते हैं। 2. महात्मा गाँधी
3. जेल में क्रांतिकारियों के साथ राजबंदियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल शुरू कर दी। अनशन के तिरसठवें दिन जेल में इनका देहांत हो गया। 3. चंद्रशेखर आजाद
4. इनके जन्मदिवस पर 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' मनाया जाता है। 4. चित्तरंजन दास
5. नर्मदा नदी के तट पर इनकी एक विशाल प्रतिमा स्थापित है। जिसे 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' कहा जाता है। 5. जतिन दास
6. 1921 में असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने पर न्यायाधीश ने इनसे पिता का नाम पूछा तो इन्होंने कहा- "मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है।" 6. भगत सिंह


(ख) इनमें से एक स्वतंत्रता सेनानी का नाम 'तरुण के स्वप्न' पाठ में भी आया है। उसे पहचान कर लिखिए।

सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज के लिए प्रयास

नेताजी सुभाषचंद्र बोस और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वाधीन संपन्न समाज की स्थापना के लिए अपने समय में अनेक प्रयास किए। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस दिशा में क्या-क्या उल्लेखनीय प्रयत्न किए गए हैं? अपनी सामाजिक अध्ययन की पाठ्यपुस्तक, अपने अनुभवों एवं पुस्तकालय की सहायता से लिखिए।

स्त्री सशक्तीकरण

  1. (क) सुभाषचंद्र बोस ने स्त्रियों के लिए समान अधिकार की बात की है। अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि उन्हें कौन-कौन से विशेषाधिकार राज्य की ओर से दिए गए हैं?

  2. (ख) सुभाषचंद्र बोस ने 'आजाद हिंद फौज' का नेतृत्व किया था। उसमें एक टुकड़ी स्त्रियों की भी थी। उस टुकड़ी का नाम पता लगाकर लिखिए। उस टुकड़ी की भूमिका क्या थी? यह भी बताइए।

आपके प्रिय स्वतंत्रता सेनानी

आप किस स्वतंत्रता सेनानी के कार्यों व विचारों से प्रभावित हैं? कारण सहित लिखिए और अभिनय (रोल प्ले) करते हुए उनके विचारों को कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा।"

ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में 1944 में सुभाषचंद्र बोस ने 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा' नारे के माध्यम से आह्वान किया था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान और भी बहुत से नारे दिए गए। ये नारे स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस, निर्भीकता और देश-प्रेम को दर्शाते हैं।

नीचे स्तंभ 1 में कुछ नारे दिए गए हैं। नारों के सामने लिखिए कि यह किसके द्वारा दिया गया? आप पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते हैं।
नारा स्वतंत्रता सेनानी
स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।
करो या मरो
मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा
इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद
पूर्ण स्वराज



परियोजना कार्य

आप सभी राज्यों के स्वतंत्रता सेनानियों के विषय में पढ़कर उनमें से 10 महिला एवं 10 पुरुष स्वतंत्रता सेनानियों के चित्रों का संग्रह करके एक संग्रहिका तैयार कीजिए। चित्रों के नीचे उनके विशेष योगदान के बारे में एक-दो वाक्य भी लिखिए। अपनी संग्रहिका तैयार करते समय ध्यान रखिए कि आप किसी भी राज्य से एक से अधिक व्यक्ति न चुने।

झरोखे से

आपने जो पाठ पढ़ा है उसमें सुभाषचंद्र बोस तरुणों से अपने सपनों की बात करते हैं। अब आप नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा लिखित पत्र पढ़िए जिसमें उन्होंने गृह एवं कुटीर उद्योग पर अपने विचार व्यक्त किए हैं-

गृहउद्योग के विषय में नेताजी का एक पत्र

मुझे जहाँ तक याद है (मैं मात्र एक बार 'पॉलिटेकनीक' में गया था), पॉलिटेकनीक के सभी कामों में एकमात्र बेंत का काम अथवा मिट्टी के खिलौने बनाने का काम हमें गृह-उद्योग के रूप में चलाना होगा। अब यदि अंत में मिट्टी के खिलौने बनाने का काम चलाने का प्रस्ताव हो तो कोई भी कुछ दिनों में ही यह काम सीख सकता है। खर्च कुछ भी नहीं लगेगा और हम जब गृह-उद्योग प्रारंभ करेंगे तब मात्र रंगों के लिए कुछ नकद रुपये खर्च होंगे। इसके अलावा बहुत कम खर्च होगा।
एक बात मेरे मन में बार-बार उठती रहती है- पहले भी शायद इस विषय में मैंने लिखा है- सीप के बटन तैयार करना। बंगाल के बहुत-से गाँवों में यह काम घर-घर में हो रहा है। गरीब गृहस्थों के घरों में स्त्री-पुरुष अपनी फुरसत के समय में यह काम करते रहते हैं। किसी एक कार्यकर्ता को बहुत कम समय में यह काम सिखाया जा सकता है। अथवा यह काम जानने और सिखाने वाले एक नए कार्यकर्ता को आप लोग नियुक्त कर सकते हैं। मुझे लगता है कि पत्थरों के ऊपर घिसकर बटन बनाया जा सकता है- हम चाहें तो बना सकते हैं। सिर्फ पतला कोई यंत्र हो जिससे छेद किया जा सके। इसके अलावा गोल काटने के लिए एक धारदार यंत्र की आवश्यकता पड़ सकती है। समिति की ओर से कुछ यंत्र और एक बोरा सीप मँगाकर ही यह काम प्रारंभ किया जा सकता है। काम सहायता-प्रार्थियों में आबद्ध रहेगा, किंतु एक बार कारगर होने पर आप देखेंगे कि गरीब परिवार अपनी आय बढ़ाने के लिए यह काम स्वयं आरंभ कर देगा। समिति सिर्फ सस्ते दामों में रॉ मैटीरियल आदि जुटा देगी और तैयार वस्तुओं को अधिक दामों में बेचने की व्यवस्था करेगी। यह काम आरंभ करना पड़ा तो पहले-पहल इसके लिए बहुत अधिक समय देना होगा।
बंगाल में बटन-निर्माण गृह-उद्योग के रूप में ही चल रहा है। बहुतों का खयाल है कि बंगाल के बटन फैक्टरी में बनते हैं किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। गाँव-देहात के घर-घर में, फुरसत के समय, यहाँ तक कि रसोई के समय में से बचे खाली समय में भी, स्त्रियाँ यह काम करती रहती हैं इसीलिए इतने सस्ते में यह बटन मिलते हैं।
-दक्षिण कलकत्ता सेवक-समिति के उप-मंत्री, श्री अनिलचंद्र विश्वास को मांडले जेल से लिखे गए
सुभाषचंद्र बोस के पत्र से।


साझी समझ

उपर्युक्त पत्र में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गृह एवं कुटीर उद्योग की बात की है। यह पत्र देश की स्वतंत्रता से पहले लिखा गया था। अपने आस-पास के गृह एवं कुटीर उद्योगों के विषय में अपने साथियों के साथ चर्चा कीजिए।

खोजबीन के लिए

नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग करके आप सुभाषचंद्र बोस पर आधारित फिल्म देख सकते हैं। https://www.youtube.com/watch?v=u_zmDD54dU4
  • 'आजाद हिंद फौज' के विषय में और अधिक जानकारी जुटाइए और अपनी कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।






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शब्दकोश

यहाँ आपके लिए एक छोटा-सा शब्दकोश दिया गया है। इस शब्दकोश में वे शब्द हैं, जो विभिन्न पाठों में आए हैं और आपके लिए नए हो सकते हैं। किसी-किसी शब्द के कई अर्थ भी हो सकते हैं। पाठ के संदर्भ से जोड़कर आप यह अनुमान स्वयं लगाएँ कि कौन-सा अर्थ पाठ के लिए अधिक उपयुक्त है।

कहीं-कहीं शब्दों के अनेक समानार्थी भी दिए गए हैं। इससे आप प्रसंग के अनुसार अनुकूल शब्द का चयन करना सीख सकेंगे। यह शब्दकोश आपको शब्दों के न केवल सही अर्थ जानने में सहायता करेगा अपितु शब्दों की सही वर्तनी भी सिखाएगा।

शब्द का अर्थ देने से पहले मूल शब्द के बाद कोष्ठक में एक संकेताक्षर दिया गया है। इन संकेतों से हमें शब्दों की भाषा और व्याकरण संबंधी जानकारी मिलती है। यहाँ जो संकेताक्षर अथवा संक्षिप्त रूप प्रयुक्त हुए हैं, वे इस प्रकार हैं-

अं. - अंग्रेज़ी
अ. अव्यय
(अ.) – अरबी
अ.क्रि. - अकर्मक क्रिया
पु. - पुंलिंग
फा. - फारसी
वि. - विशेषण
सं. – संस्कृत
स.क्रि. - सकर्मक क्रिया
सर्व. सर्वनाम
स्त्री. - स्त्रीलिंग

  • अंटी [वि.सं. स्त्री.] - धोती की कमर के ऊपर की लपेट, गाँठ
  • अकर्मण्य [वि.सं.] - कर्म के अयोग्य, आलसी, निकम्मा, न करने के योग्य
  • अखण्ड [वि.सं.] - जिसका सिलसिला न टूटे, अविकल, संपूर्ण, पूरा, अटूट, बाधारहित
  • अग्नि [स्त्री.सं.] - आग, उष्णता, प्रकाश, गरमी, जलाने की क्रिया, सोना
  • अति [सं.] - अधिकता, सीमोल्लंघन
  • अतिथि [पु.सं.] - अचानक आया हुआ मेहमान, वह संन्यासी जो कहीं एक रात से अधिक न ठहरे
  • अनगिन [वि.] - अगणित, बेहिसाब, अनगिनत
  • अनुपात [पु.सं.] - सापेक्षिक संबंध, अनुसरण, तीन ज्ञात संख्याओं के आधार पर चौथी को निकालना
  • अपराध [पु.सं.] - दोष, गलती, पाप, जुर्म, दंड योग्य कर्म
  • अप्राप्य [वि.सं.] – न मिलने वाला, अलभ्य
  • अर्थी [वि.सं.] - चाह या गरज रखने वाला, धनी, प्रार्थी, वादी, सेवा करने वाला
  • अवरोहण [पु.सं.] - उतरना, नीचे आने की क्रिया
  • अवाक [वि.सं.] - स्तब्ध, मौन, चुप, दक्षिण की ओर, अधोमुख
  • अविश्वास [पु.सं.] - विश्वास का न होना, शंका, संदेह
  • अहं [पु.] - गर्व, घमंड, 'अहम' का समासगत रूप
  • अहाता [पु. (अ.)] - घेरा, चहारदीवारी से घेरी हुई जगह, सूबा, प्रेसिडेंसी


  • आँगन [पु.] - चौक, घर के भीतर का सहन
  • आंतरिक [वि.सं.] – भीतरी, जिसका संबंध भीतरी बातों से हो, हार्दिक
  • आगंतुक [वि.सं.] - बिना बुलाए आने वाला, अचानक आने या होने वाला, अजनबी
  • आदर्श [पु.सं.] – नमूना, असल, व्याख्या, आईना, शीशा, मूल लेख
  • आपा [पु.] - सुध-बुध, अहंकार, अपना स्वरूप, गर्व, सत्ता
  • आरोहण [पु.सं.] – चढ़ना, सवार होना, ऊपर को जाना, सीढ़ी, अँखुवा फूटना, नृत्य आदि के लिए बना हुआ मंच



  • ईर्ष्या [स्त्री.सं.] - जलन, डाह, दूसरों की बढ़ती न देख सकना



  • उत्तराधिकारी [वि.सं.] - किसी के बाद उसकी संपत्ति पाने का हकदार, वारिस
  • उत्स [पु.सं.] - सोता, स्रोत, जलमय स्थान
  • उद्धार [पु.सं.] - मुक्ति, बाहर निकालना (विपत्ति, दुर्दशा आदि से), ऊपर उठाना, छुटकारा
  • उपभोग [पु.सं.] - भोगना, फलभोग, सुख, स्वाद लेना, व्यवहार



  • औरन / और [अ.वि.] - दूसरा, अधिक


  • कदाचित [अ.सं.] - कभी, शायद
  • कन [पु.] - कण, बूँद, संक्षिप्त रूप
  • कल्लोल [पु.सं.] - कुछ ऊँची और आवाज करने वाली लहर, मौज, आनंद, क्रीड़ा
  • कसरत [स्त्री. (अ.)] - शरीर को पुष्ट एवं बलवान बनाने वाली क्रियाएँ, व्यायाम, वर्जिश, बहुलता
  • कालीन [पु. (अ.)] - गलीचा, सूत या ऊन के धागे से बना हुआ बिछौना
  • किरण [स्त्री.सं.] - रश्मि, ज्योति से प्रवाह रूप में निकलने वाली रेखा, अंशु, धूलिकण, सूर्य
  • कुटी [स्त्री.सं.] - झोपड़ी, कुटिया, मोड़, घुमाव
  • कुशा [स्त्री.सं.] - रस्सी, कड़ी और नुकीली पत्तियों वाली एक घास जो यज्ञ, पूजन आदि धर्म कृत्यों की आवश्यक सामग्री है।



  • खजाना [पु.फा.] - भंडार, कोश, राजस्व, रूपया, सोना-चाँदी रखने का स्थान
  • ख़ाक [स्त्री.फा.] - धूल, मिट्टी, कुछ नहीं, तुच्छ, छोटा
  • खाट [स्त्री.] - चारपाई, खटिया
  • खानि [स्त्री.सं.] - खान, स्रोत, भंडार, वह जगह जहाँ से धातु कोयला आदि खोदकर या पत्थर की सिलें तोड़कर निकाली जाए
  • खीझ [स्त्री.] - खीझने का भाव, झुंझलाहट, कुढ़न, गुस्सा
  • खोय (खोना) [स.क्रि.] - गँवाना, अपनी चीज कहीं भूल या छोड़ आना


  • गज [पु.फा.] - लंबाई का एक मान, 36 इंच
  • गण्य [वि.सं.] - गणनीय गिनने लायक, मान्य, लिहाज करने योग्य
  • गति [स्त्री.सं.] – चाल, गमन, रफ्तार, हरकत, प्रवेश, जाना, दशा, हालत
  • गर्वित [वि.सं.] - गर्वयुक्त, घमंडी
  • गुमसुम [वि.] - चुप और निश्चेष्ट, स्तब्ध होना
  • गोविंद [पु.सं] – गोपालक, कृष्ण, बृहस्पति



  • घाटी [स्त्री.] - दो पहाड़ों के बीच की नीची जमीन, पहाड़ का ढाल, मैदान, दर्रा
  • घृणा [स्त्री.सं.] - घिन, नफरत, दया, करुणा



  • चर्राना [अ.क्रि.] - खाल में खुश्की से तनाव या हलका दर्द होना, चर-चर करके टूटना, प्रबल इच्छा होना
  • चुग्गा [पु.] - चिड़ियों के चुगने के लिए डाली गई चीज, वह चारा जो चिड़िया चोंच से उठाकर बच्चे के मुँह में दे
  • चुटीला [वि.] - जो चोट खाए हो, चोट करने वाला, जख्मी, चोटी का या सबसे बढ़िया



  • छज्जा [पु.] - छत का दीवार के बाहर निकला हुआ भाग, बारजा, धूप से बचने के लिए
  • छावनी [स्त्री.] - वह स्थान जहाँ सेना रखी जाए, शिविर, पड़ाव



  • ज़माना [पु. (अ.)] – काल, युग, अरसा, अवधि, बहुत समय, दुनिया, संसार
  • ज़मींदार [पु.फा.] - जमीन का मालिक, किसान, काश्तकार
  • जावित्री [स्त्री.] - जायफल का छिलका जो मसाले और दवा के रूप में काम में लाया जाता है।
  • जोश [पु.फा.] - उत्साह, आवेश, उबाल, उफान, गरमी



  • झलना [स.क्रि.] - पंखा आदि हिलाकर हवा करना, हवा करने के लिए हिलाना
  • झालर [स्त्री.] - लटकने वाला हासिया, किनारा, एक तरह का घंटा या घड़ियाल



टोकरी [स्त्री.] - घास, फल, तरकारी आदि रखने का बाँस या झाऊ आदि का बना गोला, गहरा पात्र, खँचिया



  • ठिठक [अ.क्रि.] – चलते-चलते सहसा रुक जाना, बिल्कुल स्थिर हो जाना
  • ठूंसना [स.क्रि.] - दबा-दबाकर भरना, कसकर रखना


  • डेरा [पु.] - टिकाव, पड़ाव, ठहरने के लिए, फैलाया हुआ सामान, रहने की जगह, घर, मकान
  • डैना [पु.] - पंख, पर, नाव खेने का डंडा


  • तकलीफ [स्त्री. (अ.)] – दुःख, कष्ट, क्लेश
  • तज- दारचीनी की जाति का एक वृक्ष जिसकी छाल दवा के काम आती है (इसके पत्ते को तेजपत्ता कहते हैं)
  • तप [पु.सं.] - तपस्या, ताप, दाह, सूर्य, ग्रीष्म ऋतु
  • तर [वि.फा.] – ठंढा, ठंढक पैदा करने वाला, आर्द्र, अत्यंत शिक्त
  • तरुण [वि.सं.] - युवा, सोलह वर्ष से ऊपर की अवस्था वाला
  • तहवाँ [अ.] - वहाँ
  • तार [पु.] - वह तार जिसके द्वारा बिजली की शक्ति से समाचार भेजे जाते हैं, तार द्वारा भेजी हुई खबर
  • तुनककर/तुनकना [अ.क्रि.] - छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाना


त्र
  • त्रिभुवन [पु.सं.] - स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल इन तीनों भुवनों का समाहार


  • थिगली [स्त्री.] - छेद बंद करने के लिए टाँका गया कपड़े, पैबंद, चमड़े आदि का टुकड़ा, चकती
  • थोथा [वि.] - भीतर से खाली, खोखला, निकम्मा, निःसार



  • दक्ष [वि.सं.] - निपुण, कुशल, माहिर, जिसमें किसी विषय को तत्काल समझने तथा कोई कार्य शीघ्र करने की शक्ति हो
  • दालचीनी [स्त्री.] - दारचीनी, एक प्रकार का तज जिसका छिलका दवा और मसाले के काम आता है।
  • दीप्ति [स्त्री.सं.] - चमक, कांति, प्रभा, ज्ञान का प्रकाश, छटा, ज्ञान की अभिव्यक्ति
  • दोऊ [वि.] - दोनों



धन-मद [वि.पु.] - धन का गर्व धमा-चौकड़ी [स्त्री.] - उछल-कूद, कूद-फाँद, ऊधम धर्मशाला [स्त्री.सं.] - वह स्थान जहाँ धर्मार्थ अन्नादि बँटता हो, यात्रियों के लिए निःशुल्क ठहरने के लिए बनवाया हुआ स्थान धूम [पु.सं.] – धुआँ, कुहरा, बादल, मकान बनाने के लिए तैयार किया गया स्थान



  • नकद [पु. (अ.)] - वह धन जो सिक्कों के रूप में हो, वह रकम जो फौरन अदा की जाए
  • नक्षत्र [पु.सं.] - तारा, अश्वनी, रोहिणी, चित्रा, स्वाती, विशाखा
  • नगर [पु.सं.] - शहर, कस्बे से बड़ी और समृद्ध बस्ती जिसमें अनेक जातियों और पेशों के लोग बसते हों
  • नभ [पु.सं.] - आकाश, सावन का महीना
  • निंदक [वि.सं] – निंदा, बदगोई करने वाला, किसी के दोष का वर्णन करने वाला
  • नियरे [अ.] - निकट, पास
  • निरीक्षण [पु.सं.] - गौर से देखना, जाँच करना, देखरेख करना, आशा
  • निर्झर [पु.सं.] - झरना, प्रपात, हाथी, भूसी की आग
  • निर्दयी [वि.सं.] - दयारहित, निष्ठुर, कठोर हृदय वाला, प्रचंड, उग्र
  • निर्मल [वि.सं.] - स्वच्छ, शुद्ध, पवित्र, दोषों से रहित
  • निष्फल [वि.सं.] - जिससे कुछ अर्थ न सिद्ध हो, बेकार, जिसका कुछ फल ना हो
  • नुक्कड़ [पु.] - मोड़, छोर, निकला हुआ कोना, नाका, नोंक
  • नेपथ्य [पु.सं.] - रंगमंच के परदे के पीछे की वह जगह जहाँ कलाकार की वेश रचना की जाती है, वेश-भूषा


  • पंडे/पंडा [पु.] - तीर्थ, मंदिर या घाट पर धर्मकृत्य कराने वाला, तीर्थ का पुजारी, रसोइया
  • पंथी [पु.] - यात्री, बटोही, किसी मत को मानने वाला
  • पना [पु.] - पन्ना, अपने से पके या आग में पकाए हुए आम, इमली आदि के रस या गूदे से तैयार किया जाने वाला एक प्रकार का पेय पदार्थ
  • परमानंद [पु.सं.] - उत्तम आनंद, उत्तम आनंदरूप परमात्मा
  • परवाना [पु.फा.] - पतिंगा, पंखी, आज्ञापत्र, नियुक्तिपत्र
  • परिधि [स्त्री.सं.] - लकड़ी आदि का घेरा या बाड़ा, परिवेश, वृत्त बनाने वाली गोल रेखा, पहिये का घेरा
  • पलंग [पु.] - बड़ी और बढ़िया चारपाई, अधिक लंबी-चौड़ी और सुंदर चारपाई
  • पश्चाताप [अ.सं.] – पछतावा, कोई अनुचित कार्य करने के बाद में उसके लिए दुःखी होना
  • पसीजा- पसीजना [अ.क्रि.] दया से आर्द्र होना, खिन्न होना
  • पाँय [पु.] - पैर, चरण
  • पाट [पु.सं.] - विस्तार, फैलाव, चौड़ाई, रेशम, वस्त्र, सिंहासन, पत्थर की पटिया, पीढ़ा, चक्की के दो भागों में से कोई एक
  • पार – किसी वस्तु का दूसरा किनारा, अंत, हद, पारा
  • पारायण [पु.सं.] - किसी ग्रंथ का आदि से अंत [आद्यंत] पाठ, संपूर्णता, पार जाना
  • पावन [वि.सं] - पवित्र, शुद्ध, शुद्ध करने वाला
  • प्रबंध [पु.सं.] - व्यवस्था, आयोजन, ग्रंथ, कथा आदि की रचना
  • प्रेरणा [स्त्री.सं.] - किसी को किसी कार्य में प्रकृत करने की क्रिया, उकसाने की क्रिया, फेंकना, भेजना



  • फाहा [पु.] - घी आदि में तर की हुई रुई या कपड़ा, मरहम चुपड़ी हुई पट्टी, इत्र



  • बंधु - भाई, मित्र, स्वजन, आत्मीय
  • बखेड़ा [पु.] - झंझट, झगड़ा, परेशानी, टंटा, कठिनाई
  • बधिक [पु.] - बहेलिया, व्याध, वध करने वाला, जल्लाद
  • बरें [पु.] - ततैया, भिड़, सरसों के आकार का एक काँटेदार पौधा जिसमें केसरिया रंग के फूल लगते हैं और बीज तेलहन के काम आता है
  • बलिहारी [स्त्री.] - निछावर होना, कुर्बान जाना
  • बहुतेरा [वि.] - बहुत-सा, अनेक
  • बानी-वाणी [स्त्री.सं.] - वचन, सार्थक शब्द, स्वर, जीभ, प्रशंसा
  • बिछायत [स्त्री.] - बिछाने की चीज, बिछावन, बिछौना
  • ब्रह्मांड [पु.सं.] - विश्व गोलक, सम्पूर्ण विश्व, खोपड़ी



  • भट्टी [स्त्री.] - खास कामों के लिए बना हुआ बड़ा चूल्हा
  • भाड़ [पु.] - भड़ भेंजे की भट्टी जिसमें बालू गरम कर वह दाना भूनता है
  • भावना [स्त्री.सं.] - चिंतन, खयाल, कल्पना, इच्छा, ध्यान, स्मरण, उत्पादन
  • भावै [अ.] - मन में आए, जी चाहे तो
  • भू [स्त्री.सं.] - भूमि, धरती, जमीन, स्थान, पदार्थ, एक का संकेत
  • भोगी [वि.सं.] - भोग करने वाला, भोग-विलास में रत, कुंडलीयुक्त


  • मचलना [अ.क्रि.] - किसी चीज को लेने या देने का हठ पकड़ लेना, किसी चीज के लिए रोना-धोना
  • मठ [पु.सं.] - साधु-संन्यासियों के रहने का स्थान, आश्रम, देवालय
  • मनोरथ [पु.सं.] - मनोर्थ, मन की कामना, अभिलाषा
  • मर्यादा [स्त्री.सं.] - सीमा, परंपरा आदि द्वारा निर्धारित सीमा, अवधि, नदी, समुद्र का किनारा, सदाचार, प्रतिष्ठा
  • मलमल [स्त्री.] - भारत का एक बारीक, सफेद सूती कपड़ा जो बहुत पुराने जमाने से प्रसिद्ध था
  • मिष्ट [वि.सं] - मीठा, स्वादिष्ट, तर, मिठास, मिठाई
  • मुक्त [वि.सं.] - बंधन रहित, खुला हुआ, मोक्ष प्राप्त, छूटा हुआ, फेंका हुआ
  • मेघ [पु.सं.] - बादल, बरसने वाला बादल, समूह, छः मुख्य रागों में से एक, मोथा



  • रूठना [अ.क्रि.] - नाराज होना, अप्रसन्न



  • लज्जित [वि.सं.] - शर्मिंदा, लज्जायुक्त, लजाया हुआ
  • लासानी [स्त्री. वि.] - बेजोड़, जिसका सानी न हो
  • लीन [वि.सं.] - विलीन, ध्यानमग्न, तन्मय, तत्पर, छिपा हुआ, पिघला हुआ



  • वल्ली [स्त्री.सं.] - लता, बेल, जमीन या किसी आधार पर फैलने वाला पौधा
  • विचरण [पु.सं.] - घूमना-फिरना, भ्रमण करना, पर्यटन, चलना
  • विजातीय [वि.सं.] - भिन्न जाति, दूसरी जाति का, वर्ग का
  • विदित [पु.सं.] - अवगत, जाना हुआ, स्वीकृत, सूचना, विद्वान, कवि, प्रसिद्धि, लाभ, प्राप्ति
  • विमुख [वि.सं.] - वंचित, हताश, मुखहीन, विरत, उदासीन, बहिर्मुख
  • विराट [वि.सं.] - बहुत बड़ा, विश्व, ब्रह्मा, मत्स्य देश का राजा
  • विलक्षण [वि.सं.] - असाधारण, अलौकिक, भिन्न चिह्नों वाला
  • वृद्धाकाल [पु.वि.सं.] - बुढ़ापा
  • वैद्य [वि.सं.] - आयुर्वेद का ज्ञाता, चिकित्सक, विद्वान, वेद-संबंधी
  • वैराग्य [पु.सं.] - विषयवासना और संसारिक संबंधों से मन उचट जाना, उदासीनता, रंग बदलना



  • शंख [पु.वि.] - सौ पद्म की संख्या, सौ पद्म, समुद्र में पैदा होने वाले एक जंतु का खोल या घर जो पत्थर-सा कड़ा और सफेद होता है
  • शिखर [पु.सं.] - पर्वताग्र, पहाड़ का सबसे ऊँचा भाग, मकान का सबसे ऊँचा हिस्सा, मुड़ेर, कलश, गुंबद, वृक्षों का सबसे ऊँचा हिस्सा
  • शिल्प [पु.सं.] - कारीगरी, दक्षता, हुनर, हस्तकर्म, रूप, आकृति, निर्माण, सृष्टि, अनुष्ठान



  • संख्यातीत [वि.सं.] - अगणित, बेशुमार
  • संग [पु.सं.] - साथ, साथ होना, योग, मिलन
  • संगति [स्त्री.सं.] - मिलन, योग सभा, समाज, साथ, मोक्ष
  • संदूक [पु. (अ.)] - लकड़ी या लोहे का बकस जो कपड़े आदि रखने के काम आता है
  • संस्कृति [स्त्री.] - आचरणगत परंपरा, सभ्यता का वह स्वरूप जो आध्यात्मिक एवं मानसिक वैशिष्टय का द्योतक होता है, सजावट
  • सकपकाकर [स्त्री.] - हिचककर, घबराकर
  • सराय [स्त्री. फा.] - धर्मशाला, मुसाफिरखाना, घर, जमीन के नीचे का तल
  • सर्वांगीण [वि.सं.] - सब वेदांगों से संबंध रखने वाला, सब अंगों में व्याप्त होने वाला
  • सर्वोपरि [अ.सं.] - सबसे ऊपर या बढ़कर
  • सलवट [स्त्री.] - सिलवट, शिकन, सिकुड़न
  • साँच [वि.] - सच्ची बात, सत्य, ठीक
  • साधू [पु.वि.सं.] - सच्चा या नेक आदमी, संत, मुनि, सदाचारी
  • सार [पु.वि.सं.] - सारांश, यथार्थ बात, मूल भाग
  • सीतल/शीतल [वि.सं] - ठंढा, शांत, संतुष्ट, आनंदित, मृदु, सौम्य
  • सुकुमार [वि.सं.] - कोमल, बहुत नाजुक, साँवा, ईख का एक भेद
  • सुभाय [पु.] - स्वभाव, आदत, अपनी अवस्था, मिजाज, सहज प्रकृति
  • सूप [पु.] - अनाज पछोरने का बाँस के छिलके या सींक आदि का बना हुआ पात्र, छाज
  • सृष्टि [स्त्री.सं.] - जगत, संसार, परित्याग, निर्माण, निर्मित
  • सौरभ [पु.वि.सं.] - खुशबूदार, सुगंधित, आम, धनिया, केसर
  • स्वप्न [पु.सं.] - सपना, ख्वाब, ऊँची कल्पना, निद्रा, कोई महत्वपूर्ण कार्य करने का विचार
  • स्वाधीन [वि.सं.] - स्वतंत्र, स्वच्छंद, जो अपने ही अधीन हो, दूसरे के नहीं, आजाद
  • स्वार्थ [पु.सं.] - अपना मतलब, अपना धन, अपना लाभ, गरज, प्रयोजन



  • हर्ज [पु. (अ.)] - हरज, हानि, क्षति, काम में होने वाली रुकावट, देर, समय-नाश


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पहेलियों के उत्तर

पाठ संख्या
4. हरिद्वार आज की पहेली 1. दालचीनी / जावित्री
2. जनेऊ (जिसे सामान्यतः सूती धागे से बनाया जाता है)
3. हरि की पैरी, घाट
4. फल, फूल, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ (कोई भी एक)
5. कनखल, हरिद्वार आदि।
6. दुकान
7. गंगा
8. विल्व पर्वत
9. श्री भागवत

पढ़ने के लिए

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निराला की इस संगीतात्मक कविता को पढ़कर आनंद लीजिए।

विस्तार से इस कविता को आप आगे की कक्षा में पढ़ेंगे-

भारति, जय, विजय करे !

  1. भारति, जय, विजय करे !
  2. कनक-शस्य-कमल धरे !
  1. लंका पदतल शतदल
  2. गर्जितोर्मि सागर-जल,
  3. धोता-शुचि चरण युगल
  4. स्तव कर बहु-अर्थ-भरे ।
  1. तरु-तृण-वन-लता वसन,
  2. अंचल में खचित सुमन,
  3. गंगा ज्योतिर्जल-कण
  4. धवल धार हार गले।
  1. मुकुट शुभ्र हिम-तुषार
  2. प्राण प्रणव ओंकार,
  3. ध्वनित दिशाएँ उदार,
  4. शतमुख-शतरव-मुखरे !

- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'