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शेखर जोशी
शेखर जोशी का जन्म सन् 1932 में अल्मोड़ा, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका पहला कहानी संग्रह कोसी का घटवार सन् 1958 में प्रकाशित हुआ। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं- साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, आदमी का डर, डांगरी वाले, मेरा पहाड़ (कहानी संग्रह), एक पेड़ की याद (शब्दचित्र-संग्रह), स्मृति में रहें वे (संस्मरण), न रोको उन्हें शुभ्रा (कविता संग्रह), मेरा ओलिया गाँव (आत्मवृत्त)। उनकी कहानियों का संग्रह शेखर जोशी कथा समग्र शीर्षक से प्रकाशित है। शेखर जोशी ने ग्रामीण-शहरी मध्यवर्गीय समाज के जीवन-मूल्यों तथा कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के जीवन-संघर्षों को अपनी कहानियों में प्रमुखता से उभारा है।
उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 'महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार' तथा 'साहित्य भूषण सम्मान', मध्य प्रदेश शासन द्वारा 'अखिल भारतीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान' तथा 'श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। सन् 2022 में उनका निधन हो गया।
संवादहीन
गहरी साँस लेकर ताई कहतीं, "भगवान ! कैसे नैया पार लगेगी?" और बंद पिंजड़े में अपने पंखों को फड़फड़ाता, उछल-कूद मचाता मिठू उत्तर देता, "राम-राम कहो, सीताराम कहो।"
ताई दुहरातीं- सीताराम ! सीताराम !
ताई और मिट्ठू
मिठू और ताई।
अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे। ताई ने अपने जीवन में अच्छे दिन भी देखे थे। पूत-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, क्या नहीं था बड़े घर में! देखते ही देखते क्या से क्या हो गया! बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए। बेटियाँ अपने-अपने हाथ पीले कराकर अपनी गृहस्थी में रम गईं, किसके भरोसे कारबार संभलता। धीरे-धीरे सब पराए हाथों में चला गया। जब खेती-बाड़ी नहीं, कारबार नहीं, तो नौकर-चाकर किस दम पर टिकते ! अपनी अकेली जान के लिए ताई दो जून का एक जून चूल्हा फूंक लेतीं, व्रत-उपवास के बहाने चौका-चूल्हा टाल जातीं, पेट की समस्या उनके लिए कभी समस्या नहीं रही, पर सूने घर की भाँय-भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।
भला हो गनपत का, जिसने ताई के सूनेपन को सहारा दे दिया था, वह न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था। ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी। वह रात-दिन मिठू को लेकर ही बेचैन रहने लगीं। जो ताई अपनी खातिर चूल्हा जलाने में आलस्य कर जाती थीं, वही अब नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं। मिट्ठू के वक्त-बेवक्त के तकाजों के लिए रोटी बचाकर रखतीं। अब ताई को इस बात की पूरी जानकारी रहने लगी थी कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं और किस पेड़ में फसल के आखिरी अमरूद बचे हैं।
कुशाग्र बुद्धि छात्र की तरह मिट्टू ताई के पढ़ाए पाठ को न केवल हू-ब-हू दुहरा देता बल्कि एक-दो बार सुनकर याद भी रख लेता था और मौके बे-मौके ताई के सवालों का सटीक उत्तर दे देता। बड़े घर का सूनापन धीरे-धीरे मिठू की बातचीत से अब रौनक में बदल गया था, अड़ोस-पड़ोस की बहू-बेटियाँ बच्चों को गोदी में उठाकर मिट्ठू से उनका मन बहलाने के लिए आ जुटतीं और घर गुलजार हो जाता। सुबह पौ फटने लगती, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं
तो मिट्ठू भी जैसे ताई को भोर की झपकी से जगाने के लिए ही अपना पाठ शुरू कर देते-
हर हर गंगे!
हर हर गंगे!!
सीताराम बोल !
सीताराम बोल !!
मिठू राम राम !
मिठू राम राम !!
ताई अचकचाकर उठ बैठतीं। लाड़ से मिट्ठू को निहारकर आशीष देतीं- "जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ” और मिट्ठू भी बदले में अपनी बुजुर्गी दिखाकर कहते-
खुश रहो !
खुश रहो!!
ताई निहाल हो जातीं। वृद्धावस्था का शरीर और उस पर नई गृहस्थी का भार, काम-काज से थककर ताई जब कभी पिंजरे को बगल में रखकर सुस्ताने लगतीं तो अनायास ही मिट्ठू से सवाल कर बैठतीं, “मिट्ठू! अब कैसे कटेगी?" और नौजवान मिट्ठू ताई के बुढ़ापे का सहारा बनकर दम-खम के साथ उन्हें दिलासा देते-
कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!
ताई के थके शरीर में प्राण लौट आते, और तब उस अलस दोपहरी में ताई मिट्ठू को अपनी राम-कहानी सुनाने लगतीं। वैभव और सत्ता के बीते दिनों की गाथा। काल की अतल गहराइयों से झाँकता एक-एक चेहरा ताई को नए-नए प्रसंगों की याद दिला देता- जमींदार साहब का रोबीला चेहरा, उनके उपकारों से दबी प्रजा के अनगिनत चेहरे, वे हाथी, वे घोड़े, वे खेल-तमाशे, वे ब्याह-शादियाँ, तीज-त्योहार, जन्म और मृत्यु-पर्व, वे भोज, वे दावतें, जमींदार साहब के दरबार की रौनक, उनकी गुणग्राहकता, उनकी तुनकमिजाजी, उनका गुस्सा, उनके इशारे पर मर मिटने वाले लोग... ताई घंटों तक मिट्ठू को अपनी जीवन-गाथा सुनाती रहतीं और वह अपनी गर्दन टेढ़ी कर कभी धैर्यवान श्रोता बना रहता और कभी अपनी समझ के अनुसार बीच-बीच में कुछ टीका-टिप्पणी कर देता।
ऐसा नहीं कि ताई और मिट्ठू का संवाद हमेशा प्रेमपूर्ण ही रहता हो, कभी-कभी ताई थकी-माँदी लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्ठू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देते। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देते, तो खीझकर ताई कोसतीं, “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल देते, "मर जा! मर जा! मर जा!" फिर मान-मनौवल का दौर चलता और ताई और मिठू की दुनिया पहले की तरह प्रेम से चलने लगती।
ताई को घड़ी-भर के लिए भी मिठू का वियोग सहन नहीं हो सकता था। कभी-कभार गाँव में थोड़ी देर के लिए भी न्यौते-बुलावे में जातीं, तो दस बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें टोहकर देखतीं, कंजूस के धन की तरह मिठू को छिपाकर रखतीं और जल्दी लौट आने का दिलासा देकर देहरी से पाँव बाहर निकालतीं। लेकिन एक संयोग आ पड़ा कि ताई धर्म-संकट में पड़ गईं। इस लोक में ताई ने बहुत ऊँच-नीच देख लिए थे, अब कभी-कभी परलोक की चिंता भी मन में घर कर जाती। गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे, अच्छा साथ बन रहा था। प्रयाग में कुंभ-स्नान का लोभ जहाँ उन्हें अपनी ओर खींच रहा था, वहीं मिट्ठू की चिंता अपनी ओर खींच रही थी। हँसी-हँसी में किसी ने सलाह दी, “ताई, मिठू को भी साथ ले चलो, उसे भी गंगा-स्नान करा देना।" किसी दूसरे ने टोक दिया कि रेलगाड़ी में उसका भी टिकट लगेगा, आखिर वह भी तो बोलता-बतियाता प्राणी है। ताई पशोपेश में पड़ गईं। टिकट का पैसा भी वह मिट्ठू की खातिर खर्च कर देतीं लेकिन मेले-ठेले, भीड़-भाड़ में उसकी सुरक्षा के बारे में उन्हें पूरा भरोसा नहीं था, अंत में जगन मास्टर की घरवाली ने उनकी चिंता दूर कर दी। वह ताई के लौटने तक मिठू को अपने पास रखने के लिए सहमत हो गई थी। विदा के दिन ताई की आँसुओं की धार रुके नहीं रुकती थी। बार-बार वह मिठू को पुचकारतीं, जल्दी लौट आने का दिलासा देतीं। मिट्ठू भी उनकी बातों के उत्तर में 'हर हर गंगे', 'राम राम सीताराम' कहकर उन्हें भरोसा देते रहे कि वह जगन मास्टर की घरवाली के साथ प्रेम से रह लेंगे।
ताई तो कुंभ-स्नान के लिए चल दीं। लेकिन जगन मास्टर के घर में महाकुंभ हो गया।
अपने पति से सलाह लिए बिना मास्टराइन ने ताई का भार अपना लिया था। जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे। उन्होंने अपने कुछ नियम-सिद्धांत बना रखे थे और भरसक कोशिश करते थे कि उनके कारण किसी को कोई कष्ट न पहुँचे। स्वतंत्र विचारों के आदमी थे। दूसरों की स्वतंत्रता पर बाधा नहीं डालना चाहते थे। पिंजड़े में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होने लगती। जब-जब मिठू को देखते, अपनी पत्नी की बुद्धि पर तरस खाते और अपने आप को भी दोषी अनुभव करते।
जगन मास्टर के लिए जब मिठू की यातना असह्य हो गई, तो उन्होंने एक दिन कमरा बंदकर मिट्ठू के पिंजरे को जमीन पर रखा और उसका दरवाजा खोल दिया, ताकि उसे कुछ देर के लिए ही सही, खुली हवा में आने का मौका देकर अपने पाप का थोड़ा प्रायश्चित कर लें। मिट्ठू अब पिंजरे में रहने के इतने आदी हो चुके थे कि उन्होंने बाहर आने की कोई इच्छा नहीं प्रकट की। जगन मास्टर भी अपनी धुन के पक्के थे। निकट ही अनाज का थैला पड़ा हुआ था। उन्होंने मुट्ठी में थोड़ा अनाज लेकर पिंजरे के दरवाजे से लेकर बाहर तक बिखेर दिया और स्वयं अलग हटकर उसे देखते रहे। मिठू धीरे-धीरे दाना चुगते हुए बाहर आ गए तो जगन मास्टर ने संतोष की साँस ली। मिट्ठू फिर पिंजरे की छत पर बैठ गए। एक दो घंटे बाद जगन मास्टर ने उन्हें पकड़कर फिर पिंजरे में बंद कर दिया और चैन की साँस लेकर पिंजरे को बरामदे में टाँग दिया।
अब जगन मास्टर हर रोज कमरा बंद करते। मिठू को बाहर आने का आमंत्रण देते और उनकी आजादी का सुख स्वयं भोगते। यह क्रम तीन-चार दिन तक चला ही था कि एक दिन मिठू की नजर ऊपर खुले रोशनदान पर पड़ गई और सहज कौतूहलवश वह पिंजरे की छत से तिरछी आँख अपने लक्ष्य की ओर देखकर रोशनदान पर पहुँच लिए। जगन मास्टर का ध्यान अचानक 'गीता-रहस्य' से हटकर मिट्ठू के पंखों की फड़फड़ाहट पर गया, फिर रोशनदान पर बैठे मिठू पर। जगन मास्टर हाथ में अनाज लेकर 'आ-आ' की गुहार लगा ही रहे थे कि मिठू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए ! वो गए!! अकेले मिठू क्या उड़े, आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते उड़ गए। ढीली धोती को दोनों हाथों से सँभालते हुए वह बाग में एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पास, 'मिट्ठू आ! मिठू आ!!' पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे और मिट्टू एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख तौलने में मशगूल रहे।
ताई के लौटने का दिन निकट आ रहा था। गाँव में सभी के मन में इस अनहोनी घटना ने एक गहरी आशंका को जन्म दे दिया था। ताई के तेज स्वभाव के अतिरिक्त मिठू के प्रति उनके लगाव को सभी जानते थे और लौटकर मिट्ठू को न पाने पर उनकी क्या दशा हो सकती है, इसका अनुमान वे भली-भाँति लगा सकते थे। बहुत सोच-विचार के बाद आखिर गनपत ने ही एक सुझाव दिया कि मिठू की ही सूरत-शक्ल का एक दूसरा तोता ले आया जाए, ताकि ताई को भ्रम में रखा जा सके और दूसरे दिन सच ही वह तोता लेकर हाजिर हो गया।
अब जगन मास्टर की जिंदगी का एक नया दौर शुरू हुआ। वह तोते को पिंजरे में रखकर पाठ पढ़ाने लगे, ताकि ताई के आने तक वह भी दो अक्षर सीख ले। यह एक संयोग ही है कि जगन मास्टर ने अंतिम दिन ताई के मिट्ठू को गीता के दो-चार श्लोक रटाने की कल्पना की थी, ताकि गंगा-स्नान का पुण्य अर्जन कर लौटी हुई ताई अपने मिठू के मुँह से गीता सुन सकें, लेकिन वह अनहोनी हो गई और अब जगन मास्टर अपनी फिक्र के मारे खाना-पीना छोड़कर घंटों पिंजरे के सामने बैठकर रटते-
मिठू, राम राम
सीताराम सीताराम
हर गंगे, हर गंगे
राम राम, सीताराम
बोलते-बोलते उनका गला सूख जाता, मास्टराइन भोजन ठंडा होने की शिकायत करतीं, तो आग्नेय दृष्टि से उनकी ओर देखकर पानी पीकर फिर दुहराते -
राम राम
सीताराम, हर गंगे...
फिर खीझकर कहते - मर जा! मर जा!!
पर वह पिंजरे के अंदर से टुकुर-टुकुर उन्हें देखता रहता या शायद उनकी बेवकूफी पर हँसता रहता हो।
कुंभ-स्नान से लौटकर सभी तीर्थयात्री अपने-अपने घरों की ओर चल दिए लेकिन ताई सीधे बड़े घर की ओर न जाकर जगन मास्टर के दरवाजे पहुंचीं। ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू 'राम राम सीताराम' की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा, पिंजड़े में कूद-फाँद मचाकर तूफान खड़ा कर देगा, लेकिन वहाँ बैठे एवजी मिट्टू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की, वह केवल इधर-उधर ताकता रहा।
ताई अपने मिट्ठू को गुहार कर थक गईं लेकिन उनके सूनेपन का साथी न जाने किन अमराइयों में घूम रहा होगा।
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- कहानी में ताई और मिट्ठू का संबंध किस भाव को दर्शाता है?
- परोपकार और त्याग
- ममता और स्नेह
- करुणा और क्रोध
- जिज्ञासा और सहायता
- जगन मास्टर द्वारा मिट्ठू को पिंजरे से बाहर निकालना किस भावना या मूल्य का संकेत देता है?
- अनुशासन और परंपरा
- उदासीनता और असावधानी
- आत्मगौरव और विद्रोह
- करुणा और नैतिकता
- मिठू का उड़ जाना किस विचार को प्रस्तुत करता है?
- भोजन की खोज
- प्रेम की आकांक्षा
- स्वतंत्रता की चाह
- पक्षियों में सम्मान की प्रवृत्ति
- ताई के जीवन के दुख का मुख्य कारण क्या था?
- सम्मान और प्रतिष्ठा में कमी आना
- परिवार से दूरी और संवाद का अभाव
- आर्थिक विपन्नता और निर्धनता
- मिठू के प्रति प्रेम और संवाद
- कहानी में मानव-समाज में व्याप्त किस विसंगति को उजागर किया गया है?
- मजबूरी
- कर्मपरायणता।
- अकेलापन
- संवादधर्मिता
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
- "भगवान ! कैसे नैया पार लगेगी?" ताई इस वाक्य में किस 'नैया' की बात कर रही हैं? वे यह बात क्यों कह रही हैं?
- "धीरे-धीरे सब पराए हाथ में चला गया।" इस वाक्य में किस घटना की ओर संकेत किया गया है?
- "ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी।" क्यों?
- "अब ताई को इस बात की पूरी जानकारी रहने लगी थी कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं और किस पेड़ में फसल के आखिरी अमरूद बचे हैं।" इस वाक्य द्वारा ताई के व्यक्तित्व में आए परिवर्तनों के विषय में क्या-क्या पता चलता है?
- - "जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे।" जगन मास्टर का व्यक्तित्व कैसा था? कहानी में से उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
- कहानी का शीर्षक 'संवादहीन' किसके लिए सबसे अधिक सार्थक प्रतीत होता है- ताई, जगन मास्टर, मिठू या नया तोता? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।।
- "अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे।” ताई के बड़े से घर को सूना खंडहर क्यों कहा गया होगा?
मेरे प्रश्न
नीचे कुछ उत्तर और उनके दो-दो प्रश्न दिए गए हैं। पहचानिए कि इनमें से कौन-सा प्रश्न उस उत्तर के लिए उपयुक्त है?
1. उत्तर : ताई के अकेलेपन को मिट्ठू ने सहारा दिया।
प्रश्न क : ताई के सूनेपन को किसने सहारा दिया था?
प्रश्न ख : ताई को मिट्ठू किसने भेंट में दिया था?
2.उत्तर : ताई के लौटने से पहले मिट्ठू उड़ गया था।
प्रश्न क : ताई के लौटने के बाद मिट्ठू कहाँ चला गया था?
प्रश्न ख : ताई के प्रयागराज से लौटने से पहले क्या अनहोनी हुई?
3. उत्तर : गाँववालों को डर था कि ताई को सच्चाई जानकर सदमा लगेगा।
प्रश्न क : गाँववाले ताई की वापसी से क्यों चिंतित थे?
प्रश्न ख : गाँववाले मिट्ठू के उड़ने से खुश क्यों थे?
4. उत्तर : कहानी का शीर्षक 'संवादहीन' जीवन के मौन का प्रतीक है।
प्रश्न क : कहानी का शीर्षक 'संवादहीन' क्यों उपयुक्त नहीं है?
प्रश्न ख : शीर्षक 'संवादहीन' का क्या भावार्थ है?
मेरे अनुभव मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभवों के आधार पर दीजिए-
- "कभी-कभार गाँव में थोड़ी देर के लिए भी न्यौते-बुलावे में जातीं, तो दस बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें टोहकर देखतीं..." ताई की तरह जब आप अपने घर या परिवार से दूर होते हैं, तो किसी वस्तु या व्यक्ति की चिंता आपको भीतर से कैसे परेशान करती है?
- "आखिर वह भी तो बोलता-बतियाता प्राणी है।" क्या आप मानते हैं कि पशु-पक्षियों में भी संवेदनाएँ होती हैं? अपने किसी अनुभव का वर्णन करते हुए लिखिए।
- "गनपत ने ही एक सुझाव दिया कि मिट्ठू की ही सूरत-शक्ल का एक दूसरा तोता ले आया जाए ताकि ताई को भ्रम में रखा जा सके..." ताई को भ्रम में रखना उचित था या नहीं? तर्क सहित अपने विचार लिखिए।
- "ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू 'राम राम सीताराम' की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा।" क्या कभी ऐसा हुआ कि आपने सोचा कुछ और, हुआ कुछ और? उस अनुभव को लिखिए।
- "मिट्ठू अब पिंजरे में रहने के इतने आदी हो चुके थे कि उन्होंने बाहर आने की कोई इच्छा नहीं प्रकट की।" क्या प्राणी सचमुच पिंजरे में रहने के आदी हो सकते हैं? अपने उत्तर के समर्थन में अपने आस-पास से उदाहरण भी दीजिए।
विधा से संवाद
कहानी का सौंदर्य
संवादहीन कहानी में अनेक विशेष बिंदु हैं जो इसे प्रभावपूर्ण बनाते हैं। नीचे कहानी के कुछ विशेष बिंदु और उनके उदाहरण दिए गए हैं। आप भी कहानी से इसी प्रकार के एक-एक उदाहरण खोजकर लिखिए-
| विशेष बिंदु | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| चित्रात्मकता (दृश्य बिंब) | शब्दों के माध्यम से पाठक के मन में स्पष्ट और जीवंत चित्र या छवियाँ बनाना। | मिट्टू एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख तौलने में मशगूल रहे। |
| संवादात्मकता | कथ्य को आगे बढ़ाने के लिए, पात्रों के विचार, भाव आदि व्यक्त करने के लिए बातचीत और संवादों का प्रयोग। | "राम-राम कहो, सीताराम कहो।" |
| पुनरुक्ति | शब्दों की बार-बार पुनरावृत्ति से भाव की तीव्रता। | "कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!" |
| अतिशयोक्ति | किसी पात्र, घटना, भाव या वस्तु का वर्णन इतना बढ़ाकर करना कि वह असंभव या अविश्वसनीय लगे। | रेलगाड़ी में उसका भी टिकट लगेगा, आखिर वह भी तो बोलता-बतियाता प्राणी है।। |
| लोकधर्मी भाषा | ग्रामीण, सहज, बोल-चाल की भाषा। | भगवान ! कैसे नैया पार लगेगी? |
| प्रश्नोत्तर शैली | पात्रों या लेखक द्वारा प्रश्न पूछना। | मिट्ठू ! अब कैसे कटेगी? |
कहानी का अंत
किसी कहानी का अंत अनेक प्रकार से हो सकता है जैसे-
- सुखांत - जब कहानी का अंत प्रसन्नता, सफलता से होता है।
- दुखांत - जब कथा का अंत दुख, वियोग, मृत्यु या हानि से होता है।
- मुक्त अंत – जब कहानी स्पष्ट रूप से खत्म नहीं होती, बल्कि सोचने के लिए छोड़ दी जाती है।
- अप्रत्याशित अंत – जब अंत अचानक और अप्रत्याशित रूप से सामने आता है।
- यथार्थवादी अंत – जब कहानी का अंत जीवन की सच्चाई जैसा लगे।
- प्रेरणात्मक अंत - जब कहानी के अंत में कोई प्रेरणा या सकारात्मक सोच दी जाए।
- व्यंग्यात्मक अंत – जब कहानी का अंत व्यंग्य या कटाक्ष से किसी सत्य को प्रकट करता है।
आपके अनुसार 'संवादहीन' कहानी के अंत को किस श्रेणी में रखा जा सकता है? अपने उत्तर के कारण भी बताइए। आप इस कहानी का नया अंत किस प्रकार करना चाहेंगे?
विषयों से संवाद
- "अंत में जगन मास्टर की घरवाली ने उनकी चिंता दूर कर दी।"
- "गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे"
- 'कुंभ-स्नान' एक सुप्रसिद्ध आयोजन है जिसमें करोड़ों लोग भाग लेते हैं। पता लगाइए-
- इसका आयोजन क्यों किया जाता है?
- पिछली बार इसका आयोजन कब और कहाँ हुआ था?
- अगला आयोजन कब और कहाँ होगा?
- मान लीजिए कि ताई आपके मोहल्ले में रहती हैं। वे कुंभ-स्नान के लिए कैसे गई होंगी? उनकी यात्रा का वर्णन लिखिए।
- आपके गाँव या नगर में कौन-सा मेला, उत्सव या पर्व मनाया जाता है? वहाँ का दृश्य, भीड़, श्रद्धा और वातावरण का वर्णन कीजिए। मेले में कैसी आवाजें, रंग, गंध, खान-पान, दृश्य और भाव होंगे?
कहानी में रेखांकित पात्र का नाम नहीं दिया गया है। इसे कहीं 'मास्टराइन', तो कहीं 'जगन मास्टर की घरवाली' कहा गया है। आपके अनुसार कहानी में ऐसा क्यों किया गया होगा?
(संकेत- कहाँ से कहाँ तक की यात्रा, टिकट, यात्रा के साधन, संगी-साथी, खान-पान, ठहरना आदि।)
(संकेत- उनका वर्णन पाँच ज्ञानेंद्रियों- देखने, सुनने, सूँघने, छूने और स्वाद महसूस करने के आधार पर कीजिए।)
सृजन
- "बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए।"
- "वहाँ बैठे एवजी मिठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की"
- "अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे।"
- “मिट्ठू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए! वो गए!!"
अपना घर छोड़कर नए स्थान पर बस जाना आसान नहीं होता है। ताई के बहू-बेटों ने गाँव क्यों छोड़ा होगा? गाँव छोड़ते समय क्या-क्या सोचा होगा? अपना घर छोड़ने के लिए स्वयं को कैसे तैयार किया होगा?
ताई सोच रही थीं कि मिट्ठू 'राम राम सीताराम' कहेगा, लेकिन एवजी मिट्ठू चुप था। कल्पना कीजिए कि एक दिन असली मिट्टू वापस आ गया। मिठू ने नए तोते को देखकर क्या कहा होगा? आगे की कहानी लिखिए।
(संकेत- प्रारंभ कीजिए- "एक दिन आकाश में वही हरे पंख चमके...")
आज घर जाकर अपने किसी बड़े या बुजुर्ग से बात कीजिए। उनसे पूछिए "आप जब मेरी आयु के थे, तब समय कैसे बिताया करते थे; क्या-क्या बातें या काम करते थे? आदि"। उनके कहे हुए अनुभव अपनी पुस्तिका में लिखिए।
4. मान लीजिए कि जगन मास्टर ने मिट्ठू की खोज के लिए एक विज्ञापन प्रकाशित किया है। अपनी कल्पना से वह विज्ञापन बनाइए।
(संकेत- आप समाचार पत्रों में प्रकाशित खोया-पाया या तलाश संबंधी विज्ञापन देख सकते हैं।)
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
'मिट्टू' शब्द का अर्थ होता है- मधुरभाषी, मीठा बोलनेवाला या तोता।
यह शब्द इतना अधिक प्रचलित है कि इसका प्रयोग एक मुहावरे में भी किया जाता है- 'अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना' जिसका अर्थ है 'अपनी प्रशंसा आप करना' या 'अपने मुँह से अपनी बड़ाई करना'।
आप कुछ ऐसे मुहावरों की सूची बनाइए जिनमें किसी अन्य जीव-जंतु का उल्लेख किया गया हो, जैसे नीचे लिखे इस वाक्य में है-
"अकेले मिठू क्या उड़े, आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते उड़ गए।"
ध्वन्यात्मकता शब्दों से
"जगन मास्टर का ध्यान अचानक 'गीता-रहस्य' से हटकर मिट्ठू के पंखों की 'फड़फड़ाफट' पर गया।"
पक्षी के उड़ने पर पंखों के हिलने-डुलने से उत्पन्न ध्वनि 'फड़फड़ाफट' कहलाती है। ध्वनियों का आभास कराने वाले कुछ और शब्द लिखिए और उनसे नए वाक्य बनाइए।
शब्द-युग्म
"अपनी अकेली जान के लिए ताई दो जून का एक जून चूल्हा फूँक लेतीं, व्रत-उपवास के बहाने चौका-चूल्हा टाल जातीं।"
उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। ये शब्द-युग्म हैं। वे शब्द जो जोड़े में लिखे जाते हैं, उन्हें शब्द-युग्म कहा जाता है। शब्द-युग्म मुख्यतः निम्न प्रकार के होते हैं-
- पुनरुक्त शब्द-युग्म, जैसे- बार-बार
- सजातीय शब्द-युग्म, जैसे-उठना-बैठना
- समानार्थक शब्द-युग्म, जैसे- दिन-प्रतिदिन
- विपरीतार्थक शब्द-युग्म, जैसे- दिन-रात
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द-युग्म नीचे दिए गए हैं। उनका अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्य में प्रयोग कीजिए-
वक्त-बेवक्त, नियम-सिद्धांत, शादी-ब्याह, तीज-त्योहार
खोजबीन शब्दों की
"ढीली धोती को दोनों हाथों से सँभालते हुए वह बाग में एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पास, 'मिठू आ! मिठू आ!!' पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे और मिट्ठू एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख तौलने में मशगूल रहे।"
उपर्युक्त अनुच्छेद में से खोजिए-
- ऐसा शब्द जो 'तंग' का विपरीतार्थक है।
- ऐसा वाक्यांश जो एक मुहावरा है।
- ऐसा शब्द जो एक क्रिया है।
- ऐसा शब्द जो एक संज्ञा है।
- ऐसा शब्द जो एक सर्वनाम है।
- ऐसा शब्द जो एक विशेषण है।
- ऐसा शब्द जो एक कारक है।
- ऐसा शब्द जो एक कर्ता है।
अर्थ के आधार पर वाक्य
आप जानते ही हैं कि अर्थ के आधार पर वाक्यों के कई भेद होते हैं जैसे- विधानवाचक, निषेधवाचक, प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक, आज्ञावाचक (विधिवाचक), इच्छावाचक, संदेहवाचक और संकेतवाचक।
| वाक्य का भेद | अर्थ/उपयोग | उदाहरण | |
|---|---|---|---|
| 1 | विधानवाचक वाक्य | किसी घटना या स्थिति के बारे में कथन करने वाला वाक्य। | जगन मास्टर ने पिंजरे का दरवाजा खोल दिया। |
| 2 | निषेधवाचक वाक्य | किसी कार्य के न होने या मना करने का भाव व्यक्त करने वाला वाक्य। | मिठू ने कोई हरकत नहीं की। |
| 3 | प्रश्नवाचक वाक्य | किसी बात को पूछने या जानने के लिए प्रयुक्त वाक्य। | मिट्ठू! अब कैसे कटेगी? |
| 4 | विस्मयादिबोधक वाक्य | आश्चर्य, प्रसन्नता या दुख प्रकट करने वाला वाक्य। | मिट्ठू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए ! वो गए !! |
| 5 | आज्ञावाचक वाक्य | किसी को कुछ करने का आदेश या आग्रह व्यक्त करने वाला वाक्य। | राम-राम कहो, सीताराम कहो। |
| 6 | इच्छावाचक वाक्य | किसी आकांक्षा, आशा या इच्छा को प्रकट करने वाला वाक्य। | जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ! |
| 7 | संदेहवाचक वाक्य | किसी बात को लेकर शंका या अनिश्चितता प्रकट करने वाला वाक्य। | ताई के सूनेपन का साथी न जाने किन अमराइयों में घूम रहा होगा। |
| 8 | संकेतवाचक वाक्य | इसमें एक बात या कार्य का होना या न होना किसी दूसरी बात या कार्य के होने या न होने पर निर्भर होता है। | जब खेती-बाड़ी नहीं, कारबार नहीं, तो नौकर-चाकर किस दम पर टिकते ! |
अब आप भी अपनी पुस्तक में से प्रत्येक प्रकार का एक-एक वाक्य चुनकर लिखिए।
गतिविधियाँ
नीचे दी गई गतिविधियाँ अपने समूह के साथ मिलकर कीजिए-
- कहानी के रंग
- पंखों की योजना
- "पेट की समस्या उनके लिए कभी समस्या नहीं रही"
समूहों को अलग-अलग भावनाएँ (दुख, स्नेह, आजादी) दीजिए और इसे मूक अभिनय द्वारा प्रस्तुत कीजिए।
छोटे समूहों में सोचें कि अगर आपको मिट्टू की तरह उड़ने का मौका मिले तो आप कहाँ जाते और क्यों?
यह वाक्य बताता है कि ताई ने भोजन संबंधी अपनी आवश्यकताओं पर कभी ध्यान नहीं दिया अथवा उन्हें महत्वपूर्ण नहीं माना। हमारे परिवेश में ऐसी बहुत-सी महिलाएँ हैं जो परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देती हैं और अपनी आवश्यकताओं की अनदेखी करती हैं।
अपने घर की महिलाओं की भोजन संबंधी रुचियों के विषय में जानिए और समझिए कि उनकी पंसद का भोजन माह में कब-कब बनता है।
मेरी पहेली
अपने समूह के साथ मिलकर ऐसी पहेलियाँ या प्रश्न बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों-
तोता, ताई, कुंभ, पिंजरा, कमरा, गंगा
भाषा संगम
"वह न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था।"
नीचे 'तोता' शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
तोता (हिंदी); शुकः (संस्कृत); तोता (पंजाबी); तोता (उर्दू); तोतुं (कश्मीरी); तोतो (सिंधी); पोपट (मराठी); पोपट, सूडो (गुजराती); पोपट (कोंकणी); सुगा (नेपाली); तोता (बांग्ला); भाटौ (असमिया); तेनवा (मणिपुरी); शुआ (शुक); (ओड़िआ); चिलुक (तेलुगु); किळि (तमिल); शुकम्, तत्त (मलयालम); गिळि (कन्नड़)।
- इनके अतिरिक्त यदि आप 'तोता' शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
- उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
खोजबीन
शेखर जोशी
https://www.youtube.com/watch?v=Q0fTM4VlPGs https://www.youtube.com/watch?v=1LKQA85Dam0तोता
https://www.youtube.com/watch?v=eSV2dzX5gyUतोते को गीत सिखाना
https://www.youtube.com/watch?v=lvmwy5JeNe4तोते की कहानी
https://www.youtube.com/watch?v=4UBNp3elJjYशब्द-संपदा
| ढोर — | पालतू गोजातीय पशुओं के लिए प्रयुक्त शब्द, चौपाया, डंगर |
| तकाजा — | आवश्यकता, इच्छा, अनुरोध, कोई काम करने के लिए किसी से बार-बार कहना, माँगना |
| कुशाग्र — | तीव्र, कुश की नोंक जैसा तीक्ष्ण |
| पौ फटना — | प्रातःकाल का प्रकाश, तड़का होना |
| अचकचाना — | भौचक्का होना, चौंक उठना |
| निहाल — | प्रसन्न, हर तरह से तृप्त |
| सत्ता — | अस्तित्व, यथार्थता, अधिकार, प्रभुत्व, प्रभुसत्ता |
| अतल — | अथाह, तलहीन |
| प्रसंग — | प्रकरण, संबंध, विषय का तारतम्य, एक प्रकार की संगति, लगाव |
| रोबीला — | प्रभावशाली |
| तुनकमिजाज — | जो झटपट या छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाए, नाजुक मिजाज, चिड़चिड़ा |
| वियोग — | विच्छेद, विरह, अभाव, छुटकारा |
| साँकल — | जंजीर, सिकड़ी, श्रृंखला |
| टोह — | खोज, अनुसंधान, पता, देखभाल |
| देहरी/देहली — | घुसते-निकलते हैं, देहली पर रखा हुआ दीया दरवाजे की चौखट में नीचे वाली लकड़ी जिसे लाँघकर घर में |
| मिजाज — | स्वभाव, तबीयत, प्रकृति, आदत, गर्व, घमंड |
| प्रायश्चित — | शोधन, वह शास्त्र-विहित कर्म जो पाप का मार्जन करने के लिए किया जाए |
| कौतूहलवश — | उत्सुकता, अचंभा, कुतूहल, त्योहार, उत्सव |
| मशगूल — | कार्यरत, किसी काम या शगल में लगा हुआ |
| अर्जन — | कमाना, संग्रह करना |
| एवजी — | बदले में काम करने वाला, स्थानापन्न |
| आग्नेय — | अग्नि से उत्पन्न, अग्नि जैसा, अग्नि-संबंधी, अग्नि को अर्पित |
| जून — | वक्त, वेला, दिन का अर्द्ध भाग, ईसवी सन् का छठा महीना |
