Skip to content

7

कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'

1

हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' का जन्म सन् 1906 ई. में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुआ था। कन्हैयालाल मिश्र का मुख्य कार्यक्षेत्र पत्रकारिता था। उन्होंने नया जीवन और विकास पत्रों का संपादन किया। प्रारंभ से ही स्वतंत्रता संग्राम एवं सामाजिक कार्यों में भाग लेने के कारण उन्हें अनेक बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक जीवन से संबंध रखने वाले अनेक निबंध लिखे। अपनी उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं के लिए उन्हें 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।

उनके संस्मरणात्मक निबंध-संग्रह दीप जले शंख बजे, जिंदगी मुसकरायी, बाजे पायलिया के घुँघरू, जिंदगी लहलहाई, क्षण बोले कण मुसकाए, कारवाँ आगे बढ़े, माटी हो गई सोना, महके आँगन चहके द्वार और आकाश के तारे धरती के फूल गहन मानवतावादी दृष्टिकोण और जीवन-दर्शन के परिचायक हैं। सन् 1995 में उनका निधन हो गया।

'मैं और मेरा देश' एक ऐसी रचना है जो व्यक्ति और राष्ट्र के अविभाज्य संबंध को गहराई से स्थापित करती है। इस निबंध के अनुसार व्यक्ति की पूर्णता उसकी निजता में ही नहीं होती, बल्कि उसके परिवार, क्षेत्र विशेष और राष्ट्र की पहचान तक से जुड़ी होती है। व्यक्ति द्वारा किया गया हर कार्य उसकी पहचान के साथ-साथ उसके परिवार, क्षेत्र और राष्ट्र से भी जुड़ा होता है। इसी विचार से लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि देश का सम्मान और नागरिक का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े होते हैं।

निबंध में नागरिक के अधिकार, उसके कर्तव्य और देश की उन्नति तथा कुशल नेतृत्वकर्ता कैसा हो, इस पर भी विचार किया गया है। लेखक इस बात पर बल देता है कि देश के लिए हर एक नागरिक महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है, यदि वह देश के 'शक्तिबोध' और 'सौंदर्यबोध' को हानि न पहुँचाकर सशक्त करता है।

मैं और मेरा देश

मैं अपने घर में जनमा था, पला था।

अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों का ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।

अपने नगर में घूम-फिरकर, वहाँ के विशाल समाज का संपर्क पा, वहाँ के संचित ज्ञान-भंडार का उपयोग कर, उसे अपनी सेवाओं का दान दे, उसकी सेवाओं का सहारा पा और इस तरह एक मनुष्य से भरा-पूरा नगर बनकर मैं खड़ा हुआ था।

मैं अपने नगर के लोगों का सम्मान करता था, वे भी मेरा सम्मान करते थे।

मुझे बहुतों की अपने लिए जरूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की जरूरत का उनके लिए जवाब था।

इस तरह मैं समझ रहा था कि मैं अपने में अब पूरा हो गया हूँ, पूरा फैल गया हूँ, पूरा मनुष्य हो गया हूँ।

मैं सोचा करता था कि मेरी मनुष्यता में अब कोई अपूर्णता नहीं रही, मुझे अब कुछ न चाहिए, जो चाहिए, वह सब मेरे पास है- मेरा घर, मेरा पड़ोस, मेरा नगर और मैं। वाह कैसी सुंदर, कैसी संगठित और कैसी पूर्ण है मेरी स्थिति !

एक दिन आनंद की इस दीवार में एक दरार पड़ गई और तब मुझे सोचना पड़ा कि अपने घर, अपने पड़ोस, अपने नगर की सीमाओं में ममता, सहारा, ज्ञान और आनंद के उपहार पाकर भी मेरी स्थिति एकदम हीन है और हीन भी इतनी कि मेरा कहीं भी और कोई भी अपमान कर सकता है- एक मामूली अपराधी की तरह और मुझे यह भी अधिकार नहीं कि मैं उस अपमान का बदला लेना तो दूर रहा, उसके लिए कहीं अपील या दया-प्रार्थना ही कर सकूँ।

क्या कोई भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई?

बड़े महत्व का प्रश्न है। इस अर्थ में भी कि यह बात को खिलने का, आगे बढ़ने का अवसर देता है और इस अर्थ में भी कि ठीक समय पर पूछा गया है। ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है, तो उत्तर यह है आपके प्रश्न का-

जी हाँ, एक भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई और लीजिए आपको कोई नया प्रश्न न पूछना पड़े, इसलिए मैं अपनी ओर से ही कह रहा हूँ कि यह दीवार थी मानसिक विचारों की; इसलिए यह भूकंप भी किसी प्रांत या प्रदेश में नहीं उठा, मेरे मानस में ही उठा था।

मानस में भूकंप उठा था?

हाँ जी, मानस में भूकंप उठा था और भूकंप में क्या कोई धरती थोड़े ही हिली थी, आकाश थोड़े ही काँपा था, एक तेजस्वी पुरुष का अनुभव ही वह भूकंप था, जिसने मुझे हिला दिया।

वे तेजस्वी पुरुष थे स्वर्गीय पंजाब केसरी लाला लाजपत राय। अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए और जो घोर अंधकार और भयंकर बवंडरों के झकझोरों में जीवन-भर खेल, उन दीपकों को बुझने से बचाते रहे, उन्हीं में एक थे लालाजी। उनकी कलम और वाणी दोनों में तेजस्विता की अद्भुत किरणें थीं।

वे उन्हीं दिनों सारे संसार में घूमे थे। उनके व्यक्तित्व के गठन में, उनके परिवार, उनके पास-पड़ोस और उनके नगर ने अपने सर्वोत्तम रत्नों की ज्योति उन्हें भेंट दी थी। अजी, क्या बात थी उनके व्यक्तित्व की, क्या देखने में, क्या सुनने में! वे एक अपूर्व मनुष्य थे। कौन था दुनिया में जिस पर वे मिलते ही छा न जाते, पर संसार के देशों में घूमकर वे अपने देश में लौटे, तो उन्होंने अपना सारा अनुभव एक ही वाक्य में भरकर बिखेर दिया। वह अनुभव ही तो वह भूकंप था, जिसने मेरी पूर्णता को एक ही ठसक में अपूर्णता की कसक से भर दिया।

उनका वह अनुभव था कि “मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया और संसार के दूसरे देशों में भी घूमा, पर जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।" क्या सचमुच यह अनुभव एक मानसिक भूकंप नहीं है, जो मनुष्य को झकझोर कर कहे कि किसी मनुष्य के पास संसार के ही नहीं, यदि स्वर्ग के भी सब उपहार और साधन हों, पर उसका देश गुलाम हो या किसी भी दूसरे रूप में हीन हो तो वे सारे उपहार और साधन उसे गौरव नहीं दे सकते।

इस अनुभव की छाया में मैं सोचता हूँ कि मेरा कर्तव्य है कि मुझे निजी रूप में सारे संसार का राज्य भी क्यों न मिलता हो, मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे, उसकी किसी भी प्रकार की शक्ति में कमी आए; साथ ही उसके एक नागरिक के रूप में मेरा यह अधिकार भी है कि अपने देश के सम्मान का पूरा-पूरा भाग मुझे मिले और उसकी शक्तियों से अपने सम्मान की रक्षा का मुझे, जहाँ भी मैं हूँ, भरोसा रहे।

अजी, भला एक आदमी अपने इतने बड़े देश के लिए कर ही क्या सकता है! फिर कोई बड़ा वैज्ञानिक हो तो वह अपने आविष्कार से ही देश को कुछ बल दे या फिर कोई बहुत बड़ा धनपति हो तो वह अपने धन का भामाशाह की तरह समय पर त्याग कर ही कुछ काम आ सकता है, पर हरेक आदमी न तो ऐसा वैज्ञानिक ही हो सकता है, न धनिक ही। फिर जो बेचारा अपनी ही दाल-रोटी की फिक्र में लगा हुआ हो, वह अपने देश के लिए चाहते हुए भी क्या कर सकता है?

आपका प्रश्न विचारों को उत्तेजना देता है, इसमें कोई संदेह नहीं; पर इसमें भी संदेह नहीं कि इसमें जीवनशास्त्र का घोर अज्ञान भी भरा हुआ है। अरे भाई, जीवन कोई आपके मुन्ने की गुड़िया थोड़े ही है कि आप कह सकें कि बस यह है, इतना ही है। वह तो एक विशाल समुंदर का तट है, जिस पर हरेक अपने लिए स्थान पा सकता है।

लो, एक और बात बताता हूँ आपको। जीवन को दर्शनशास्त्रियों ने बहुमुखी बताया है, उसकी अनेक धाराएँ है। सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता। लड़ने वालों को रसद न पहुँचे तो वे कैसे लड़ें। किसान ही खेती न उपजाए तो रसद पहुँचाने वाले क्या करें और लो, जाने दो बड़ी-बड़ी बातें- युद्ध में जय बोलने वालों का भी महत्व है।

जय बोलने वालों का?

हाँ जी, युद्ध में जय बोलने वालों का भी बहुत महत्व है। कभी मैच देखने का अवसर मिला ही होगा आपको; देखा नहीं आपने कि दर्शकों की तालियों से खिलाड़ियों के पैरों में बिजली लग जाती है और गिरते खिलाड़ी उभर जाते हैं? कवि सम्मेलनों और मुशायरों की सारी सफलता दाद देने वालों पर ही निर्भर करती है, इसलिए मैं अपने देश का कितना भी साधारण नागरिक क्यों न हूँ, अपने देश के सम्मान की रक्षा के लिए बहुत कुछ कर सकता हूँ। अकेला चना क्या भाड़ फोड़े- यह कहावत, अपने अनुभव के आधार पर ही आपसे कह रहा हूँ कि सौ फीसदी झूठ है। इतिहास साक्षी है, बहुत बार अकेले चने ने ही भाड़ फोड़ा है और ऐसा फोड़ा है कि भाड़ खील-खील ही नहीं हो गया, उसका निशान तक ऐसा छूमंतर हुआ कि कोई यह भी न जान पाया कि वह बेचारा आखिर था कहाँ।

मैं जानता हूँ, इतिहास की गहराइयों में उतरने का समय नहीं है, पर दो छोटी कहानियाँ तो सुन ही सकते हैं आप; और कहानियाँ भी न प्रेमचंद की हैं, न अंतोन चेखव की। दो युवकों के जीवन की दो घटनाएँ हैं, पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है, जो नागरिक और देश को एक साथ बाँधती है कि आप दो बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर भी उसे इतना साफ नहीं देख सकते।

हमारे देश के महान संत स्वामी रामतीर्थ एक बार जापान गए। वे रेल में यात्रा कर रहे थे कि एक दिन ऐसा हुआ कि उन्हें खाने को फल न मिले और उन दिनों फल ही उनका भोजन था। गाड़ी एक स्टेशन पर ठहरी तो वहाँ भी उन्होंने फलों की खोज की, पर वे पा न सके। उनके मुँह से निकला - जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते !

एक जापानी युवक प्लेटफार्म पर खड़ा था। वह अपनी पत्नी को रेल में बैठाने आया था, उसने यह शब्द सुन लिए। सुनते ही वह अपनी बात बीच में छोड़कर भागा और कहीं दूर से एक टोकरी ताजे फल लाया। वे फल उसने स्वामी रामतीर्थ को भेंट करते हुए कहा- लीजिए, आपको ताजे फलों की जरूरत थी।

स्वामी जी ने समझा कि यह कोई फल बेचने वाला है और उनके दाम पूछे, पर उसने दाम लेने से इनकार कर दिया। बहुत आग्रह करने पर उसने कहा- आप इनका मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।

स्वामी जी युवक का यह उत्तर सुनकर मुग्ध हो गए, और वे क्या मुग्ध हो गए, उस युवक ने अपने इस कार्य से अपने देश का गौरव जाने कितना बढ़ा दिया !

35

इस गौरव की ऊँचाई का अनुमान आप दूसरी घटना सुनकर ही पूरी तरह लगा सकते हैं। एक दूसरे देश का निवासी एक युवक जापान में शिक्षा लेने आया। एक दिन वह सरकारी पुस्तकालय से एक पुस्तक पढ़ने को लाया जिसमें कुछ दुर्लभ चित्र थे। ये चित्र इस युवक ने पुस्तक में से निकाल लिए और पुस्तक वापस कर आया। किसी जापानी विद्यार्थी ने यह देख लिया और पुस्तकालय को इसकी सूचना दे दी। पुलिस ने तलाशी लेकर वे चित्र उस विद्यार्थी के कमरे से बरामद किए और उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया।

मामला यहीं तक रहता तो कोई बात न थी। अपराधी को दंड मिलना ही चाहिए, पर मामला यहीं तक न रुका और पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया कि उस देश का (जिसका वह विद्यार्थी था) कोई निवासी इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता।

मतलब साफ है, एकदम साफ- कि जहाँ एक युवक ने अपने काम से अपने देश का सिर ऊँचा किया था, वहीं एक युवक ने अपने देश के मस्तक पर कलंक का ऐसा टीका लगाया, जो जाने कितने वर्षों तक संसार की आँखों में उसे लांछित करता रहा।

इन घटनाओं से क्या यह स्पष्ट नहीं होता है कि हरेक नागरिक अपने देश के साथ बंधा हुआ है और देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है?

मैं अपने देश का नागरिक हूँ और मानता हूँ कि मैं अपना देश हूँ। जैसे मैं अपने लाभऔर सम्मान के लिए हरेक छोटी-छोटी बात पर ध्यान देता दूँ, वैसे ही मैं अपने देश के लाभऔर सम्मान के लिए भी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दूँ, यह मेरा कर्तव्य है और जैसे मैं अपने सम्मान और साधनों से अपने जीवन में सहारा पाता हूँ, वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से भी सहारा पाऊँ, यह मेरा अधिकार है। बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।

मैंने जो कुछ जीवन में अध्ययन और अनुभव से सीखा है, वह यही है कि महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है। बड़े से बड़ा कार्य हीन है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं है और छोटे से छोटा कार्य भी महान है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना है।

महान कमालपाशा उन दिनों अपने देश तुर्की के राष्ट्रपति थे। राजधानी में अपनी वर्षगाँठ का उत्सव समाप्त कर जब वे अपने भवन में ऊपर चले गए, तो एक देहाती बूढ़ा उन्हें वर्षगाँठ का उपहार भेंट करने आया। सेक्रेटरी ने कहा- अब तो समय बीत गया है। बूढ़े ने कहा- मैं तीस मील से पैदल चलकर आ रहा हूँ, इसलिए मुझे देर हो गई।

36

राष्ट्रपति तक उसकी सूचना भेजी गई, कमालपाशा विश्राम के वस्त्र बदल चुके थे, वे उन्हीं कपड़ों में नीचे चले आए और उन्होंने बूढ़े किसान का उपहार स्वीकार किया। यह उपहार मिट्टी की छोटी हँडिया में पाव-भर शहद था, जिसे बूढ़ा स्वयं तोड़कर लाया था। कमालपाशा ने हँडिया को स्वयं खोला और उसमें से दो उँगलियाँ भरकर चाटने के बाद तीसरी उँगली शहद में भरकर बूढ़े के मुँह में दे दी, बूढ़ा निहाल हो गया।

राष्ट्रपति ने कहा- दादा, आज सर्वोत्तम उपहार तुमने ही मुझे भेंट किया क्योंकि इसमें तुम्हारे हृदय का शुद्ध प्यार है। उन्होंने आदेश दिया कि राष्ट्रपति की शाही कार में शाही सम्मान के साथ उनके दादा को गाँव तक पहुँचाया जाए।

क्या यह शहद बहुत कीमती था? क्या उसमें मोती-हीरे मिले हुए थे? ना, उस शहद के पीछे उसके लाने वाले की भावना थी जिसने उसे सौ लालों का एक लाल बना दिया।

हमारे देश में भी एक ऐसी ही घटना घटी थी। एक किसान ने रंगीन सुतलियों से एक खाट बुनी और उसे रेल में रखकर वह दिल्ली लाया। दिल्ली स्टेशन से उस खाट को अपने कंधे पर रखे वह भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की कोठी पर पहुँचा। पंडितजी कोठी से बाहर आए तो वह खाट उसने उन्हें दी। पंडितजी को देखकर वह इतना भाव-मुग्ध हो गया कि मुँह से कुछ कह ही न सका। पंडितजी ने पूछा कि क्या चाहते हो तुम?

उसने कहा, यही कि आप इसे स्वीकार करें। प्रधानमंत्री ने उसका यह उपहार स्वीकार ही नहीं किया, अपना एक फोटो दस्तखत कर उसे स्वयं उपहार में दिया- दस्तखती फोटो के लिए देश के बड़े-बड़े लोग, विद्वान और धनी तरसते हैं! वह क्या उस मामूली खाट के बदले में दिया गया था? ना, वह तो उस खाट वाले की भावना का ही सम्मान था।

क्यों जी, हम यह कैसे जान सकते हैं कि हमारा काम देश के अनुकूल है या नहीं?

वाह, क्या सवाल पूछा है आपने। सवाल क्या, बातचीत में आपने तो एक कीमती मोती ही जड़ दिया यह, पर इसके उत्तर में सिर्फ हाँ या ना से काम न चलेगा, मुझे थोड़ा विवरण देना पड़ेगा।

हम अपने कार्यों को देश के अनुकूल होने की कसौटी पर कसकर चलने की आदत डालें, यह बहुत उचित है, बहुत सुंदर है; पर हम इसमें तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि हम अपने देश की भीतरी दशा को ठीक से न समझ लें और उसे हमेशा अपने सामने न रखें।

हमारे देश को दो बातों की सबसे पहले और सबसे ज्यादा जरूरत है। एक शक्ति-बोध और दूसरा सौंदर्य-बोध। बस, हम यह समझ लें कि हमारा कोई भी काम ऐसा न हो जो देश में कमजोरी की भावना को बल दे या कुरुचि की भावना को ही।

जरा अपनी बात को और स्पष्ट कर दीजिए, यह आपकी राय है और मैं इससे बहुत ही खुश हूँ कि आप मुझसे यह स्पष्टता माँग रहे हैं।

क्या आप चलती रेलों में, मुसाफिरखानों में, क्लबों में, चौपालों पर और मोटर-बसों में कभी ऐसी चर्चा करते हैं कि हमारे देश में यह नहीं हो रहा है, वह नहीं हो रहा है और गड़बड़ है, बड़ी परेशानी है; साथ ही इन स्थानों में या इसी तरह के दूसरे स्थानों में आप कभी अपने देश के साथ दूसरे देशों की तुलना करते हैं और इस तुलना में अपने देश को हीन और दूसरे देश को श्रेष्ठ सिद्ध किया जाता है?

यदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ है तो आप देश के शक्ति-बोध को भयंकर चोट पहुँचा रहे हैं और आपके हाथों देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास हो रहा है। सुनी है आपने शल्य की बात? वह महाबली कर्ण का सारथी था। जब भी कर्ण अपने पक्ष के विजय की घोषणा करता, हुंकार भरता, वह अर्जुन की अजेयता का एक हल्का-सा उल्लेख कर देता। बार-बार के इस उल्लेख ने कर्ण के सघन आत्मविश्वास में संदेह की तरेड़ डाल दी, जो उसके मन में भावी पराजय की नींव रखने में सफल हो गई।

अच्छा, आप इस तरह की चर्चा कभी नहीं करते ! तो मैं आपसे दूसरा प्रश्न पूछता हूँ। क्या आप कभी केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकते हैं, अपने घर का कूड़ा बाहर फेंकते हैं; मुँह से गंदे शब्दों में गंदे भाव प्रकट करते हैं, इधर की उधर, उधर की इधर लगाते हैं; अपना घर, दफ्तर, गली गंदा रखते हैं, होटलों-धर्मशालाओं में या ऐसे ही दूसरे स्थानों में, ज़ीनों में, कोनों में पीक थूकते हैं? उत्सवों, मेलों, रेलों और खेलों में ठेलमठेल करते हैं और इसी तरह किसी भी रूप में क्या सुरुचि और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?

यदि आपका उत्तर हाँ है, तो आपके द्वारा देश के सौंदर्य-बोध को भयंकर आघात लग रहा है और आपके द्वारा देश की संस्कृति को गहरी चोट पहुँच रही है। क्या कोई ऐसी कसौटी भी बनाई जा सकती है, जिससे देश के नागरिकों को आधार बनाकर देश की उच्चता और हीनता को हम तोल सकें?

लीजिए, चलते-चलते आपको इस प्रश्न का भी उत्तर दे ही दूँ। इस उच्चता और हीनता की कसौटी है चुनाव।

जिस देश के नागरिक यह समझते हैं कि चुनाव में किसे अपना मत देना चाहिए और किसे नहीं, वह देश उच्च है; जहाँ के नागरिक गलत लोगों के उत्तेजक नारों या व्यक्तियों के गलत प्रभाव में आकर मत देते हैं, वह हीन है।

इसलिए मैं कह रहा हूँ कि मेरा यानी हरेक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह जब भी कोई चुनाव हो, ठीक मनुष्य को अपना मत दें और मेरा अधिकार है कि मेरा मत लिए बिना कोई भी आदमी, वह संसार का सर्वश्रेष्ठ महापुरुष ही क्यों न हो, किसी अधिकार की कुरसी पर न बैठ सके।

अभ्यास

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

  1. "एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई", इस पंक्ति में रेखांकित शब्द 'दरार' किस ओर संकेत करता है?
    • पूर्णता के भाव की तुष्टि
    • पारस्परिक संबंध टूटने की स्थिति
    • पूर्णता के भाव पर प्रहार
    • सुख-सुविधाओं का अभाव
  2. निबंध में कहा गया है कि "ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है।" लेखक को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद की अनुभूति होती है?
    • बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का
    • बात का निष्कर्ष प्रस्तुत करने वाले प्रश्नों का
    • बिना किसी संदर्भ के पूछे गए प्रश्नों का
    • किसी की समझ का आकलन करने वाले प्रश्नों का
  3. "अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए", इस वाक्य में पराधीनता के दिनों को दीन कहा गया है क्योंकि पराधीन भारत में-
    • भोजन, आवास और वस्त्र जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था।
    • लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।
    • महत्वपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी।
    • धार्मिक रीति-रिवाजों को मनाने पर रोक लगाई जाती थी।
  4. निबंध के अनुसार मनुष्य साधन-संपन्न होते हुए भी गौरव का अनुभव नहीं कर सकते यदि-
    • उन्हें विदेश भ्रमण के अवसर न मिलें।
    • उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।
    • उनके नगर की शासन प्रणाली कमजोर हो।
    • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होता हो।
  5. "पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है", इस वाक्य में रेखांकित शब्द 'गाँठ' किन दो बातों को साथ बाँधती है?
    • देश और नागरिक
    • देश और संविधान
    • देश और विदेश
    • व्यवसाय और आजीविका
  6. प्रस्तुत निबंध में मुख्यतः कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?
    • लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था
    • पारिवारिक संबंधों का महत्व
    • व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध
    • देश का महत्व और व्यक्ति की उपेक्षा

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

  1. स्वामी रामतीर्थ फल देने वाले युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध क्यों हो गए?
  2. जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिए गए फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा? आपके मन में उस युवक के व्यक्तित्व की कौन-सी छवि उभरती है, यह भी लिखिए।
  3. "बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज तो हैं ही नहीं।" स्वयं को देश से अलग न मानने के पीछे क्या तर्क हो सकते हैं, उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।

मेरे अनुभव मेरे विचार

  1. देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है", अपने आस-पास के विभिन्न उदाहरणों के द्वारा इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
  2. "मुझे बहुतों की अपने लिए जरूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की जरूरत का उनके लिए जवाब था।"
    • प्रातःकाल से लेकर रात्रि तक आप अपने किन-किन कार्यों में किस-किसका क्या सहयोग लेते हैं और आप दूसरों को किस तरह का सहयोग देते हैं? अपने अनुभव लिखिए।
    • उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित शब्द 'बहुतों' में कौन-कौन सम्मिलित होंगे, अनुमान के आधार पर लिखिए।
    • रचनाकार को स्वयं के लिए दूसरे लोगों से किस प्रकार के सहयोग की आवश्यकता पड़ती होगी और वह दूसरों को किस प्रकार का सहयोग देता होगा, अनुमान के आधार पर लिखिए।
  3. "सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता।"
    • उपर्युक्त वाक्य के रेखांकित अंश "युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता" के आधार पर लिखिए कि देश की प्रगति, विकास एवं सुरक्षा के प्रति हम सभी के क्या-क्या दायित्व हैं? अपने उत्तर को विस्तार देने के लिए अपने घर या पास-पड़ोस के बड़ों और अध्यापक से चर्चा करके लिखिए।
    • अपने पास-पड़ोस में विचरने वाले पशु-पक्षियों की जीवनचर्या का अवलोकन कीजिए और अपने अवलोकन के आधार पर लिखिए कि आप उनके संघर्षों को किस रूप में देखते हैं?

      (संकेत- आप अपनी पाठ्यपुस्तक में दी गई कहानी 'दो बैलों की कथा' के मुख्य पात्रों के अनुभवों को भी आधार बना सकते हैं।)

    • इस निबंध में जीवन को युद्ध क्यों कहा गया है? आप अपने घर के बड़ों से इस विषय पर चर्चा करके उनके और अपने विचार लिखिए।
    • देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं। इसी तरह हमारे आस-पास हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक लोग कार्यरत हैं। ये कौन-कौन लोग हैं और उनके लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं?
  4. "अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।"
    • उपर्युक्त पंक्ति के आधार पर लिखिए कि पास-पड़ोस के लोगों में किस तरह के पारस्परिक संबंध रहे होंगे?
    • वर्तमान समय में ऐसे संबंधों में किस तरह के परिवर्तन आए हैं और इनके क्या कारण हो सकते हैं? लिखिए।
  5. "क्या सुरुचि और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?" अपने घर/विद्यालय के आस-पास, सार्वजनिक संसाधनों और ऐतिहासिक महत्व के स्थानों की स्वच्छता एवं सौंदर्य को बनाए रखने के लिए आप और आपके सहपाठी, संबंधी क्या-क्या करते हैं?
  6. “मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे।” देश के सम्मान को धक्का न पहुँचे, इसके लिए क्या करें और क्या नहीं करें? अपने-अपने समूह में इसकी चर्चा कीजिए और चर्चा से उभरे बिंदुओं को प्रातः कालीन सभा में पढ़कर सुनाइए।

मेरे प्रश्न

"ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है"

निबंध के उपर्युक्त संदर्भ से आपके लिए दो प्रश्न बनाए गए हैं-

  • रचनाकार को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद आता है?
  • आपको किस तरह के प्रश्नों को बूझना रोचक लगता है?

अब इस निबंध के आलोक में नीचे दी गई सामग्री को पढ़कर तीन प्रश्न बनाइए और लिखिए।

यह सोचना एकदम निराधार है कि केवल संपन्न व्यक्ति ही देश की प्रगति और विकास में योगदान दे सकते हैं। देश की सुरक्षा का विषय हो अथवा ऐश्वर्य व संपन्नता का, सभी नागरिकों का अपनी ही तरह से योगदान होता है। हम सब नागरिक अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। हम यदि कुछ भी गलत करते हैं तो उससे अपनी छवि ही धूमिल नहीं होती अपितु अपने देश की छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

विधा से संवाद

आपने अब तक अपनी पाठ्यपुस्तकों और अन्य पुस्तकों में बहुत से निबंध पढ़े होंगे और लिखे भी होंगे। निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं? आइए, इस विधा से संबंधित कुछ विचार-विमर्श करते हैं-

  1. निबंध' का शाब्दिक अर्थ है- 'बाँधना' (निबंध)। अर्थात भली-भाँति बँधा या गठा हुआ। यह गद्य की वह विधा है जिसमें रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार, दृष्टिकोण और भावनाओं को तार्किक, भावनात्मक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप से प्रस्तुत करते हैं। एक विधा के रूप में निबंध की कुछ विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-
  2. उपर्युक्त बिंदुओं से संबंधित संदर्भ 'मैं और मेरा देश' निबंध से खोजकर लिखिए।

  3. "क्या कोई भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई?

    बड़े महत्व का प्रश्न है। इस अर्थ में भी कि यह बात को खिलने का, आगे बढ़ने का अवसर देता है और इस अर्थ में भी कि ठीक समय पर पूछा गया है। ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है, तो उत्तर यह है आपके प्रश्न का..."

    निबंध के उपर्युक्त अंश को ध्यान से देखिए। इसकी पहली पंक्ति में एक प्रश्न है और बाद के अंश में उसका उत्तर दिया गया है। आपने ध्यान दिया होगा कि यह पूरा निबंध इसी तरह की प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया है। यह प्रश्नोत्तर या संवादात्मक शैली इस निबंध की संरचना को विशेष बनाती है। इसी तरह की और भी अन्य विशेषताएँ इस निबंध में से छाँटकर लिखिए।

  4. नीचे कुछ विषय दिए गए हैं, आप इनमें से किन विषयों पर निबंध लिखना चाहेंगे, कारण सहित लिखिए-
    • मेरा भारत मेरा गौरव
    • चाँद के साथ गपशप
    • जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि
    • गागर में सागर
    • यथा नाम तथा गुण
    • दूध का दूध और पानी का पानी
38

विषयों से संवाद

चुनाव एवं आपके अनुभव

"क्या कोई ऐसी कसौटी भी बनाई जा सकती है, जिससे देश के नागरिकों को आधार बनाकर देश की उच्चता और हीनता को हम तोल सकें?"

रचनाकार के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर है- निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया।

  1. जब कोई चुनाव प्रक्रिया आपके क्षेत्र में शुरू होती है तो किस तरह की गतिविधियाँ होती हैं?
  2. "जब भी कोई चुनाव हो, ठीक मनुष्य को अपना मत दें", आपके विचार से एक अच्छे उम्मीदवार में क्या-क्या गुण होने चाहिए?
  3. चुनाव से जुड़ा अपना कोई अनुभव लिखिए। (संकेत- विद्यालय में कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव)
  4. यदि आप किसी सभा, क्लब आदि के चुनाव में उम्मीदवार हों तो आपके क्या-क्या मुद्दे होंगे?

अधिकार और कर्तव्य

इस निबंध में किसी भी स्वतंत्र देश में नागरिक के अधिकार और उसके कर्तव्य की बात की गई है। आपकी पाठ्यपुस्तक के प्रारंभिक पृष्ठ पर भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार और कर्तव्य दिए गए हैं। उसे पढ़कर अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए।

सृजन

हमारा पुस्तकालय

आप अपने विद्यालय एवं सार्वजनिक पुस्तकालय में जाते हैं। हो सकता है, आपको कभी कोई पुस्तक फटी हुई मिली हो या उसमें से कुछ पृष्ठ गायब हों अथवा उसमें पेन से निशान लगे हों-

  • ऐसा होने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
  • ऐसा न हो, इसके लिए क्या किया जा सकता है?
  • आप पुस्तकालय में किन नियमों का पालन करते हैं, उन नियमों का पालन करना क्यों अनिवार्य है? इस पर अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और लिखिए।

ब्रेल लिपि में पुस्तकें

आपके विद्यालय में रोचक पुस्तकों का भंडार है परंतु आपके 'दृष्टिबाधित' सहपाठी स्वयं पढ़कर इनका आनंद नहीं उठा पाते हैं। प्रधानाध्यापक को ब्रेल लिपि में पुस्तकें मँगवाने के संदर्भ में पत्र लिखिए।

कृतज्ञता ज्ञापन

"अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीप जलाए..."

देश के विकास में सभी का सहयोग होता है जो सीमा पर तैनात हैं और जो देश के भीतर हैं, जैसे-अध्यापक, किसान, श्रमिक, कलाकार, वैज्ञानिक, अभियंता आदि। इन सभी के अमूल्य योगदान के लिए कृतज्ञता ज्ञापन तैयार करके लिखिए।

विज्ञापन

"ठीक मनुष्य को अपना मत दें।"

उपर्युक्त पंक्ति में चुनाव में योग्य उम्मीदवार को चुनने का संदेश दिया गया है। आप भी चुनाव में योग्य उम्मीदवार को चुनने के लिए एक आकर्षक विज्ञापन तैयार कीजिए।

39

स्वच्छता और आचरण

"क्या आप कभी केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकते हैं..."

निबंध के इस अंश को पुनः पढ़िए। इस प्रकार के और कौन-कौन से आचरण हो सकते हैं जिनसे देश के सौंदर्य को आघात लगता है? इस विषय पर अपने अभिभावकों, सहपाठियों और शिक्षकों के साथ चर्चा कीजिए।

(संकेत - ऐतिहासिक या सार्वजनिक स्थानों पर अपना नाम आदि लिखना।)

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

संदर्भ में शब्द

नीचे लिखे वाक्यों पर ध्यान दीजिए-

  • एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई।
  • क्या कोई भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई।
40

दीवार में पैदा हुई चटक/तरेड़/फाँक/टूटन के लिए 'दरार' शब्द का प्रयोग करते हैं। भूकंप आने पर अथवा किसी भी प्रकार के तोड़-फोड़ का कार्य होने पर भवनों की छतों और दीवारों में दरार पड़ जाती है। इस शब्द का प्रयोग ऐसे भी किया जाता है-

  • वे बहुत अच्छे मित्र थे। न जाने ऐसा क्या हुआ कि उनके संबंधों में दरार पड़ गई।
  • भेदभाव की भावना सामाजिक एकता में दरार डालती है।

अब इसी प्रकार 'गाँठ' शब्द के प्रयोग पर ध्यान दीजिए-

  • "पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है, जो नागरिक और देश को एक साथ बाँधती है"
  • माला गूँथते समय धागे के एक सिरे पर गाँठ बाँध दीजिए।

इसी प्रकार 'पानी' शब्द का प्रयोग देखिए-

  • बहुत प्यास लगी है, पानी दीजिए।
  • जब उस लड़के की पुस्तक से पन्ने फाड़ने की बात सामने आई तो वह पानी-पानी हो गया।
  • इतनी अधिक वर्षा हुई कि चारों ओर पानी-पानी हो गया।
  • अब इनके कामों के बारे में और क्या कहा जाए, इनका तो पानी ही उतर चुका है।

अब अपनी पाठ्यपुस्तक में से ऐसे अन्य शब्द छाँटकर लिखिए जो संदर्भ के अनुसार भिन्न-भिन्न अर्थ देते हों।

मिलते-जुलते भाव वाले 'शब्द-युग्म'

  • "अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।"
  • "इस तरह एक मनुष्य से भरा-पूरा नगर बनकर मैं खड़ा हुआ था।"

पहले वाक्य में 'ममता-दुलार' और दूसरे वाक्य में 'भरा-पूरा' शब्द मिलता-जुलता भाव दे रहे हैं। ये शब्द-युग्म हैं। शब्द-युग्म प्रायः दो शब्दों के समूह होते हैं। ये कई प्रकार से बनते और बनाए जाते हैं। कभी अर्थ की दृष्टि से समान होते हैं, कभी उच्चारण की दृष्टि से समान होते हैं परंतु अर्थ में अंतर होता है, कभी विपरीत भाव भी देते हैं। इस प्रकार के शब्दों के प्रयोग से भाषा में सजीवता आती है।

आप इस निबंध में से मिलते-जुलते अर्थ वाले और पुनरुक्त (एक ही शब्द को फिर से कहना) शब्द-युग्म छाँटकर लिखिए।

शब्दों की कड़ियाँ श्रृंखला

"मैं सोचा करता था कि मेरी मनुष्यता में अब कोई अपूर्णता नहीं रही।"

उपर्युक्त वाक्य के रेखांकित शब्द 'अपूर्णता' में उपसर्ग और प्रत्यय दोनों का ही प्रयोग चिह्नित किया गया है। इस प्रयोग को समझकर नीचे दिए गए शब्दों में उपसर्ग और प्रत्यय शब्द पहचानकर लिखिए-

अलौकिक, निरक्षरता, सम्मानित, अनावश्यक, अपमानित, अभिमानी
शब्द उपसर्ग मूल शब्द प्रत्यय
अपूर्णता पूर्ण ता

(आपकी पाठ्यपुस्तक के 'क्या लिखूँ?' पाठ में भी उपसर्ग और प्रत्यय के प्रयोग के विषय में जानकारी दी गई है।)

गतिविधियाँ

'देश मात्र एक भौगोलिक सीमा क्षेत्र नहीं है।'

इस विषय पर परिचर्चा का आयोजन कीजिए और परिचर्चा में उभरकर आए बिंदुओं की रिपोर्ट तैयार कीजिए। रिपोर्ट को पावर प्वांइट प्रस्तुतीकरण या चार्ट के माध्यम से कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।

भाषा संगम

"मैं अपने देश का नागरिक हूँ"

नीचे 'देश' शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।

देश (हिंदी); देशः, क्षेत्रम् (संस्कृत); देस, देश (पंजाबी); खित्ता, इलाक़ा (उर्दू); दीश, मुलुख (कश्मीरी); देशु, देसु (सिंधी); देश (मराठी); देश, प्रदेश (गुजराती); देश (कोंकणी); देश, मुलुक, राष्ट्र (नेपाली); प्रदेश, अञ्चल, राज्य (बांग्ला); देश, राज्य, प्रदेश (असमिया); लैबाक, मफम, लम (मणिपुरी); देश, राज्य, प्रदेश, अंचल (ओड़िआ); प्रदेशमु (तेलुगु); इडम्, पिरदेशम् (तमिल); देशम् (मलयालम); देश (कन्नड़)।

  • इनके अतिरिक्त यदि आप 'देश' शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
  • उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp

झरोखे से

इस निबंध में स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय का उल्लेख किया गया है। इसमें नागरिक के कर्तव्य एवं अधिकारों की बात की गई है। अब आप लाला लाजपत राय के नीचे दिए गए कुछ विचारों को पढ़िए।

41

खोजबीन

निबंध में स्वामी रामतीर्थ के अनुभव का उल्लेख किया गया है। आप अपने पुस्तकालय या इंटरनेट से उनके विषय में सामग्री खोजकर पढ़िए और सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए।

शब्द-संपदा

संचित— इकट्ठा किया हुआ, जमा किया हुआ, ढेर लगाया हुआ
मानस — मन, चित्त, मन से उत्पन्न, मानसरोवर, रामचरितमानस
तेजस्वी — तेजवाला, प्रतापी, शक्तिशाली, प्रभावशाली
ठसक — चाल-ढाल का बनावटीपन, जिससे रूप, धन आदि का गर्व सूचित होता हो; ऐंठ, शान, नखरा
धनिक — धनवान, धनी, स्वामी
रसद — अनाज, खाने का सामान, भत्ता, राशन
दाद देना — न्यायोचित प्रशंसा करना, न्याय करना
साक्षी — गवाही, गवाह का बयान
लांछित — दोषयुक्त, कलंकित
हँडिया — एक प्रकार का मिट्टी का बर्तन
सुतली — सन या पटसन के रेशों से बटकर बनाई हुई डोरी
चौपाल — खुली या छायी हुई मंडपाकार बैठक जहाँ गाँव के लोग बैठकर पंचायत आदि करते हों; छायादार बड़ा चबूतरा या दालान
सघन — घना, गझिन, ठोस
तरेड़ — दरार
ज़ीना — सीढ़ी, सोपान
साथ-साथ पढ़ें

निर्मल जीत सिंह सेखों

सरदार त्रिलोक सिंह सेखों एवं हरबंस कौर के पुत्र निर्मल जीत सिंह सेखों का जन्म 17 जुलाई 1945 को हुआ था। उनका गाँव इसवाल पंजाब के लुधियाना के समीप हलवारा एयरफोर्स स्टेशन के पास था। संभवतः इसीलिए वे बचपन से ही वायुयान के प्रति आकर्षित रहे। 19वीं शताब्दी की शुरुआत के एक प्रसिद्ध योद्धा हरी सिंह नलवा की कहानियों के प्रति उनकी विशेष अनुरक्ति थी। यही नहीं, वे अपने पिता से भी बेहद प्रभावित थे, जिन्होंने भारतीय वायुसेना में अपनी सेवाएँ दी थीं। आसमान से जुड़ी रोमांचक और प्रेरक कहानियों को बेहद उत्साहपूर्वक सुनने वाले निर्मल जीत सिंह ने एक दिन खुद को भी भारतीय वायुसेना से जोड़ने का सपना देखा था। उन्होंने लड़ाकू विमान चालक बनने का दृढ़ निश्चय बचपन में ही कर लिया था।

42

निर्मल जीत ने लुधियाना के समीप अजितसर मोहे में स्थित खालसा हाई स्कूल से अपनी शिक्षा प्राप्त की तथा मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए। उन्होंने सन् 1962 में दयालबाग इंजीनियरिंग कॉलेज आगरा में दाखिला लिया। 'नेशनल कैडेट कोर' (एन. सी.सी.) में कैडेट रहते हुए, निर्मल जीत ने एरो-मॉडलिंग में अपनी गहरी रुचि प्रदर्शित की। हालाँकि 1965 के युद्ध के बाद उन्होंने भारतीय वायुसेना में शामिल होने के अपने सपने को साकार करने के लिए बीच में ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दी।

अनेक बाधाओं के बावजूद निर्मल जीत सिंह सेखों की आकांक्षा जल्द ही पूरी हो गई। 4 जून 1967 को उन्हें भारतीय वायुसेना में नियुक्ति मिल गई। चूँकि वे बहुत लंबी कद-काठी के थे, इसलिए उनके लिए छोटे लड़ाकू विमान 'नैट' में बैठना असहज था। हालाँकि जल्द ही वे इन लड़ाकू विमानों 'नैट्स' को उड़ाने में सिद्धहस्त हो गए। अपने उदार एवं मैत्रीपूर्ण स्वभाव के लिए पहचाने जाने वाले निर्मल जीत सिंह को सभी प्यार से 'भाई' कहकर पुकारते थे। अक्टूबर 1968 में वे फ्लाइंग ऑफिसर के रूप में 'फ्लाइंग बुलेट्स' कही जाने वाली संख्या 18 स्क्वाड्रन में शामिल हो गए।

43

आसमान की सुरक्षा

1971 में पाकिस्तान ने भारत के उत्तर-पश्चिमी भागों में हवाई हमले द्वारा युद्ध छेड़ दिया। कई हवाई क्षेत्र पाकिस्तानी वायुसेना के हवाई हमलों के शिकार हो गए। भारत, श्रीनगर में हवाई सुरक्षा के लिए किसी एयरक्राफ्ट को नहीं रख सकता था, क्योंकि इस संबंध में 1948 में एक अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ था। लेकिन युद्ध के कारण कश्मीर घाटी की सुरक्षा के लिए श्रीनगर में नैट स्क्वाड्रन टुकड़ी को रखा गया था। ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में निर्मल जीत सिंह सेखों इस टुकड़ी में शामिल हुए। उन्होंने जल्द ही अपने को भयानक ठंड के अनुकूल ढाल लिया और निर्भीकतापूर्वक पाकिस्तानी वायुसेना को मुँहतोड़ जवाब दिया।

14 दिसंबर को पेशावर हवाई अड्डे से उड़ान भरने वाले पाकिस्तानी वायुसेना के एफ-86 सेबर जेट फाइटर ने श्रीनगर हवाई क्षेत्र पर हमला शुरू कर दिया। फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों उस वक्त मुस्तैदी के साथ ड्यूटी पर तैनात थे। पाकिस्तानी विमान चालकों द्वारा लगातार किए जा रहे हमलों ने सेखों को अपनी असाधारण वीरता प्रदर्शित करने का अवसर दिया। अपनी जान की परवाह किए बगैर वे नैट एयरक्राफ्ट लेकर उड़ पड़े। प्रारंभ से ही दिखाई दे रहा था कि परिस्थितियाँ उनके अनुकूल नहीं हैं। लेकिन इस विषम परिस्थिति में भी वे असफल नहीं हुए और उन्होंने दुश्मन को आसमान में ही एक भयंकर युद्ध में घेरना शुरू कर दिया।

अपने नैट एयरक्राफ्ट का कुशलतापूर्वक संचालन करते हुए, निर्मल जीत सिंह सेखों ने छह पाकिस्तानी सेबर फाइटर एयरक्राफ्ट को मार्ग में रोक दिया। उन्होंने इन लड़ाकू विमानों पर आक्रमण किया तथा ज्यादातर को नष्ट कर दिया। अपने फौलादी संकल्प के बारे में 'कॉम्बेट एयर पैट्रॉल' (सी.ए.पी.) कंट्रोल रूम को बताते हुए उन्होंने कहा, “मैं दो सेबर फाइटर एयरक्राफ्ट के पीछे लगा हूँ। मैं उन्हें भागने नहीं दूँगा।" सेखों भले ही भयानक परिस्थितियों में लड़ रहे थे, लेकिन उन्होंने पाकिस्तानी वायुसेना को भारी क्षति पहुँचाई। अपनी योग्यता पर पूर्ण विश्वास रखने वाले निर्मल जीत सिंह ने आकाश में आखिरी दम तक वीरतापूर्वक युद्ध किया। उनके निर्भीक हवाई युद्ध ने शत्रु चालकों के इरादों पर सेंध लगा दी, जिसके कारण वे कश्मीर में कोई विशिष्ट सफलता प्राप्त न कर सके।

फ्लाइंग ऑफिसर सेखों की उम्र मात्र 26 वर्ष थी, जब उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया था। वे अपने पीछे अपनी पत्नी मनजीत सेखों को छोड़ गए, जिनसे उनका विवाह महज 10 माह पूर्व ही हुआ था (बाद में उनका पुनर्विवाह हो गया)। भारतीय वायुसेना के वे एकमात्र नायक हैं, जिन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। जो लोग हवाई-युद्ध-कौशल में प्रवीण होना चाहते हैं, उनके लिए फ्लाइंग ऑफिसर सेखों का अभूतपूर्व उड़ान-कौशल तथा विषम से विषम परिस्थितियों में भी किए गए असाधारण कार्य प्रेरणा के स्रोत हैं।

7 अक्टूबर 1982 को भारतीय वायुसेना की पचासवीं वर्षगाँठ पर सेना के डाक विभाग ने फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों के सम्मान में एक विशेष डाक आवरण जारी किया था। सन् 2000 में 50वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत सरकार द्वारा आपके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया। पंजाब के लुधियाना जिला न्यायालय के प्रांगण तथा एयरफोर्स म्यूजियम, पालम, नई दिल्ली में नैट एयरक्राफ्ट के साथ इनकी प्रतिमा लगाई गई है। चेतन आनंद द्वारा निर्देशित फिल्म 'हिन्दुस्तान की कसम' (1973), भारतीय वायुसेना के 1971 के युद्ध के गौरवशाली अध्याय पर आधारित है।

स्रोत- वीरगाथा - परम वीर चक्र विजेताओं की कहानियाँ, रा.शै.अ.प्र.प.

44
एयरफोर्स म्यूजियम, पालम, नई दिल्ली में स्थापित 'नैट एयरक्राफ्ट' के साथ फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों की प्रतिमा
45
46

प्रशस्ति पत्र

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों

(10877), फ्लाइंग ब्रांच (पायलट)

फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह सेखों श्रीनगर में स्थित 'नैट डिटैचमेंट' के पायलट थे, जहाँ उन्हें पाकिस्तानी हवाई हमले से घाटी की रक्षा करनी थी। युद्ध के शुरुआती दौर से ही वे और उनके सहयोगी पाकिस्तानी विमानों द्वारा एक के बाद एक हो रहे तूफानी हमलों का बहादुरी और दृढ़ता से सामना करते हुए नैट एयरक्राफ्ट की उत्तम साख को कायम रखे हुए थे। 14 दिसंबर 1971 को श्रीनगर हवाई पट्टी पर दुश्मन के छह सेबर एयरक्राफ्ट के एक दल द्वारा हमला किया गया था। उस समय फ्लाइंग ऑफिसर सेखों रेडिनेस ड्यूटी पर थे। तत्काल ही दुश्मन के कम से कम 6 लड़ाकू विमान ऊपर मँडराने लगे और हवाई पट्टी पर ताबड़तोड़ बमबारी शुरू कर दी। इस हमले के दौरान जानलेवा खतरे के बावजूद फ्लाइंग ऑफिसर सेखों ने उड़ान भरी और तुरंत ही दो हमलावर सेबर फाइटर एयरक्राफ्ट को युद्ध में उलझा लिया। इस लड़ाई में यह हुआ कि उन्होंने एक एयरक्राफ्ट को मार गिराया तथा दूसरे को आग के हवाले कर दिया। इतने में दूसरे सेबर लड़ाकू विमान संकट में फँसे अपने साथियों की सहायता के लिए आ गए और उन्होंने फिर फ्लाइंग ऑफिसर सेखों के 'नैट एयरक्राफ्ट' को घेर लिया, इस बार एक के पीछे चार थे। हालाँकि बराबरी की टक्कर न होते हुए भी फ्लाइंग ऑफिसर सेखों ने अकेले ही दुश्मनों को पूरी टक्कर दी। इस लड़ाई में जो कि एक वृक्ष जितनी ऊँचाई पर लड़ी जा रही थी, सेखों ने अपनी पूरी वीरता दिखाई, लेकिन अंत में अधिक संख्या ने उन्हें मात दे दी। उनका विमान गिरकर ध्वस्त हो गया और वे वीरगति को प्राप्त हो गए।

ऐसे समय में जब मृत्यु निश्चित थी, फ्लाइंग ऑफिसर सेखों ने सर्वोच्च वीरता, हवाई रण-कौशल और असाधारण संकल्प का परिचय अपने निहित कर्तव्यों से भी ऊपर उठकर देते हुए वायुसेना की परंपराओं को नई ऊँचाइयाँ दीं।

गजट ऑफ इंडिया नोटिफिकेशन

सं. 7-प्रेसी./72