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सुभद्रा कुमारी चौहान
सुभद्रा कुमारी चौहान
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 1904 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा प्रयागराज में हुई। अपने समय की प्रसिद्ध रचनाकार होने के साथ-साथ वह एक स्वतंत्रता सेनानी भी थीं जिसके कारण उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा था। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से जनमानस में राष्ट्रीय चेतना जगाई।
उनके लेखन में देशप्रेम, स्त्री-केंद्रित विषयों और स्वाधीनता संग्राम के प्रति गहन प्रतिबद्धता दिखाई देती है। उनकी भाषा की सहजता ने उनकी रचनाओं को व्यापक लोकप्रियता दिलाई। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं— मुकुल, त्रिधारा (कविता संग्रह), बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे-सादे चित्र (कहानी संग्रह), कदंब का पेड़, सभा का खेल (बाल साहित्य)। सुभद्रा कुमारी चौहान को उनके कविता संग्रह मुकुल तथा कहानी संग्रह बिखरे मोती के लिए दो बार ‘सेकसरिया पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। सन् 1948 में उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई। भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।
‘झाँसी की रानी’ सुभद्रा कुमारी चौहान की बहुत प्रसिद्ध कविता है। यह कविता 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। 1857 की क्रांति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अविस्मरणीय अध्याय है। यह कविता रानी लक्ष्मीबाई के जीवन-वृत्त, उनके संघर्ष और विद्रोह से हमारा ओजपूर्ण साक्षात्कार कराती है। यह कविता वीरता, उत्साह और देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत है। यह पाठकों में जोश और साहस का संचार करती है तथा अपने देश के प्रति गर्व एवं स्वतंत्रता के लिए समर्पण की भावना जगाती है। कविता की कथात्मक शैली और गेयता इसे और अधिक जीवंत एवं प्रभावशाली बनाती है।
झाँसी की रानी
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फि़रंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाजी की गाथाएँ
उसको याद ज़बानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी
भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाइ झाँसी में,
सुभट बुँदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया,
शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाइ,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजाजी
रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा
झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फि़रंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,
रानी दासी बनी, बनी यह
दासी अब महरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की
भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
रानी रोइ रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेजार
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
‘नागपूर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार’,
यों परदे की इज़्ज़त पर-
देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो
सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी
कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती
उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबालों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यू रोज आ गया,
हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी
उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई
हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारत वासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी,
तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
1. ‘झाँसी की रानी’ कविता की पंक्ति “बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी” में ‘नई जवानी’ शब्द किस भाव को व्यक्त करता है?
(क) देश का स्वाभिमान
(ख) विद्रोह की चिंगारी
(ग) स्वाधीनता का भय
(घ) भारत की युवावस्था
2. लक्ष्मीबाई को ‘छबीली’ कहना उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(क) विनम्रता
(ख) शोभायुक्त
(ग) सहिष्णुता
(घ) कठोरता
3. “बुझा दीप झाँसी का” पंक्ति का भावार्थ है—
(क) अंग्रेजों का झाँसी पर अधिकार हो जाना
(ख) झाँसी राज्य की उम्मीदों का नष्ट हो जाना
(ग) राजा की आकस्मिक मृत्यु होना
(घ) रानी के जीवन में उदासी होना
4. “इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम” पंक्ति में स्वतंत्रता आंदोलन की किस ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया गया है?
(क) असहयोग आंदोलन
(ख) भारत छोड़ो आंदोलन
(ग) 1857 की क्रांति
(घ) सविनय अवज्ञा आंदोलन
5. “व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया” पंक्ति में ‘यह’ शब्द किसके लिए कहा गया है?
(क) नवाबों के लिए
(ख) जनरल डलहौजी के लिए
(ग) लेफ्टिनेंट वॉकर के लिए
(घ) ब्रिटिश राज के लिए
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—
1. ‘झाँसी की रानी’ कविता के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल कौन-कौन से थे? उनका बचपन दूसरों से किस प्रकार भिन्न था?
2. “किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई” पंक्ति के माध्यम से किस घटना की ओर संकेत किया गया है?
3. “महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी” पंक्ति समाज के विभिन्न वर्गों की एकता को दर्शाती है, इस एकता का स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में क्या महत्व है?
4. “सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार” पंक्ति में ‘नीलाम छापते’ शब्द किसकी ओर संकेत करता है? यह भी बताइए कि किसकी नीलामी की जाती थी और क्यों?
5. “अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी” पंक्ति में ‘अवतारी’ शब्द व्यक्ति के विशेष गुणों की ओर इंगित कर रहा है। कविता के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के किन गुणों के कारण उनको ‘अवतारी’ कहा गया है?
विधा से संवाद
कविता में कहानी
यह कविता लक्ष्मीबाई के जीवन की घटनाओं पर आधारित है और अपनी संरचना में एक कथात्मक कविता है। कथात्मक कविता ऐसी कविता को कहते हैं जिसमें कविता और कहानी के तत्व परस्पर जुड़े होते हैं तथा घटनाओं का एक क्रम होता है। इस कविता में भी लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर वीरगति प्राप्त होने तक की कथा क्रम से देखने को मिलती है। पाठ की संरचना को समझते हुए इसमें वर्णित प्रमुख घटनाओं को समय-रेखा (टाइमलाइन) पर दर्शाएँ।
विषयों से संवाद
साझा साथ/साझा संघर्ष
1. “लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया”, ब्रिटिश राज किस नीति के कारण ‘लावारिस का वारिस’ बन जाता था? अपने इतिहास के शिक्षक से पता लगाकर उस नीति के विषय में लिखिए।
2. इस कविता में लक्ष्मीबाई की जीवन-गाथा के साथ-साथ अनेक वीरों के त्याग और बलिदान का भी उल्लेख है। उनकी सूची बनाइए तथा शिक्षक की सहायता से 1857 की क्रांति में उनके योगदान
के विषय में लिखिए।
3. यह कविता जिस समय और परिवेश में लिखी गई है, उसमें युद्ध और अन्य साहसिक कार्य करना सामान्यत: पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। वर्तमान में लगभग हर क्षेत्र में महिलाएँ कार्य कर रही हैं। नीचे कुछ ऐसे ही कार्यक्षेत्र दिए गए हैं। इन क्षेत्रों में काम करने वाली स्त्रियों के नाम और उनके विषय में लिखिए। आप चाहें तो इसमें अपनी समझ के अनुसार कुछ और कार्यक्षेत्र भी जोड़ सकते हैं।
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कार्यक्षेत्र |
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1. दमकल केंद्र (फायर ब्रिगेड) |
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2. रेलगाड़ी चालक |
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3. खेल के विभिन्न क्षेत्र |
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4. व्यापार और प्रबंधन |
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5. विज्ञान और तकनीक |
4. कविता में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित अनके स्थानों के नाम आए हैं। अपने शिक्षक की सहायता से दिए गए मानचित्र में उन स्थानों/नगरों को चिह्नित करके नाम लिखिए।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
शब्द एक अर्थ अनेक
1. “कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी”
उपर्युक्त पंक्ति में रेखांकित शब्द पर ध्यान दीजिए। कविता में ‘नाना’ शब्द ‘नाना धुंधूपंत’ के लिए प्रयुक्त हुआ है। लेकिन इस शब्द का प्रयोग संदर्भ के अनुसार अन्य अर्थों में भी होता है। जैसे– माता के पिता के लिए तथा अनेक के अर्थ में। इस प्रकार अनेकार्थी शब्द वह शब्द है जिसके एक से अधिक अर्थ होते हैं। नीचे तालिका में दी गई कविता की पंक्तियों में रेखांकित शब्द अनेकार्थी शब्द हैं। कविता के संदर्भ में उनके सही अर्थ पर घेरा लगाइए।
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काव्य-पंक्ति |
अर्थ |
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• तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाइ |
नदी का किनारा, बाण, सीसा |
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• रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई |
शास्त्र में लिखी व्यवस्था, प्रणाली, विधाता, तरीका |
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• रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में |
युद्ध, संशय, युग्म |
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• हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी |
किसी पदार्थ का गोल पिंड, रस्सी/सूत/बर्फ का गोला, तोप से दागने वाले गोले, नारियल |
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• मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी |
आभा, गति, तेज चाकू (धार) |
2. “कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी”
“मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी”
उपर्युक्त पंक्तियों में रेखांकित शब्दों की वर्तनी पर ध्यान दीजिए। दोनों शब्दों की वर्तनी में थोड़ी भिन्नता है। कई बार रचनाकार कविता की लय, अर्थ की लय इत्यादि को ध्यान में रखते हुए भाषा के स्तर पर इस प्रकार का प्रयोग करते रहे हैं। इस कविता में अन्य शब्दों के भी ऐसे प्रयोग मिलते हैं, उन्हें ढूँढ़कर लिखिए और कक्षा में चर्चा कीजिए।
इसी पाठ्यपुस्तक की अन्य कविताओं में भी आपने ऐसा प्रयोग देखा होगा। जहाँ किसी शब्द की मानक वर्तनी से भिन्न वर्तनी का प्रयोग किया गया है। अपने शिक्षक के साथ इस विषय पर चर्चा कीजिए। चर्चा से उभरे बिंदुओं को लिखकर उन पर अपने शिक्षक के साथ पुन: चर्चा कीजिए कि ऐसे प्रयोग क्यों किए गए हैं?
मुहावरे
- “ दूर फि़रंगी को करने की सबने मन में ठानी थी”
उपर्युक्त पंक्ति में ‘दृढ़ निश्चय करने’ के अर्थ को व्यक्त करने के लिए ‘मन में ठान लेना’ वाक्यांश का प्रयोग हुआ है जो एक मुहावरा है। ‘मुहावरे’ ऐसे वाक्यांश होते हैं जो अपने शाब्दिक अर्थ से भिन्न एक विशेष और लाक्षणिक अर्थ व्यक्त करते हैं। इनके प्रयोग से भाषा में सौंदर्य और प्रभाव उत्पन्न होता है।
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। उन पंक्तियों में आए मुहावरे ढूँढ़कर लिखिए और उन मुहावरों का प्रयोग करते हुए नए वाक्य भी बनाइए। आपकी सुविधा के लिए एक उदाहरण दिया गया है।
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काव्य पंक्ति |
प्रयुक्त मुहावरा |
नया वाक्य |
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1. |
अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी |
मुँह की खाना |
मोहन ने सोचा था कि वह आसानी से जीत जाएगा लेकिन अंत में उसे मुँह की खानी पड़ी। |
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2. |
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया |
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3. |
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया |
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4. |
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो/ सोई ज्योति जगानी थी |
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5. |
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी |
सृजन
1. लक्ष्मीबाई की सखियों काना तथा मंदरा की ओर से लक्ष्मीबाई को एक पत्र लिखिए जिसमें काना तथा मंदरा द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध युद्ध की रणनीति पर चर्चा की गई हो।
2. युद्धपूर्व रात्रि में झाँसी की रानी के मन में अगले दिन की संभावनाओं को लेकर कई तरह के भाव और विचार उठ रहे होंगे। आपके जीवन में भी कई ऐसे क्षण आए होंगे जब आपने मानसिक ऊहापोह का अनुभव किया होगा। ऐसी किसी घटना के विषय में अपनी डायरी में लिखिए, जैसे– परीक्षा के एक दिन पूर्व की स्थिति या नौंवी कक्षा में पहला दिन आदि।
गतिविधियाँ
- शौर्य के समाचार
यह कविता रानी लक्ष्मीबाई के जीवन की घटनाओं, उनकी वीरता और पराक्रम से हमारा साक्षात्कार कराती है। कविता में वर्णित घटनाओं को एक समाचार-वाचक की तरह समाचार के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
(संकेत– “आज झाँसी की रणभूमि पर रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी अद््भुत वीरता और शौर्य का परिचय दिया…।”)
- ‘हरबोलों’ और हमारी कहानी
“बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।”
‘हरबोला’ बुंदेलखंड क्षेत्र में रहने वाले लोकगायकों का एक समुदाय है जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की वीरतापूर्ण गाथा को अपने गीतों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का काम किया। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लोकगायकों की एक लंबी और समृद्ध परंपरा रही है। इनके द्वारा गाए जाने वाले गीत सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों को संरक्षित करने का एक जीवंत माध्यम हैं। आपके क्षेत्र में अथवा आपकी भाषा में भी ऐसे लोकगायक और उनके द्वारा गाए जाने वाले देशभक्तिपूर्ण गीत अवश्य प्रचलित होंगे। ऐसे गीतों का एक संकलन तैयार कीजिए और कक्षा में साझा कीजिए।
"कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन 'छबीली' थी।"
नीचे 'बहन' शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
बहन (हिंदी); भगिनी, स्वसृः (संस्कृत); भैंण (पंजाबी); बहन, हमशीरा (उर्दू); बैनी (कश्मीरी); भेण (सिंधी); बहीण (मराठी); बहेन (गुजराती); भयण (कोंकणी); बैनी, दीदी (नेपाली); बोन, भगिनी (बांग्ला); भनी, बाइ, बाइदेउ (असमिया); मचन, मनाओ (मणिपुरी); भउणी (ओड़िआ); अक्कँ, चेल्लेलु (तेलुगू); तंगै, अक्का (तमिल); सहोदरि, पेङळ् (मलयालम); सोदरि, अक्क, तंगि (कन्नड़)।
- इनके अतिरिक्त यदि आप 'बहन' शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
- उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए। https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp
झरोखे से
कविता में लक्ष्मीबाई की दो सखियों ‘काना’ और ‘मंदरा’ का उल्लेख मिलता है जो युद्धक्षेत्र में अंत तक लक्ष्मीबाई के साथ रहीं। लक्ष्मीबाई की सहेलियों में ऐसी ही एक और वीरांगना का नाम आता है, जिनका नाम था ‘झलकारी बाई’। इन्होंने भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बहुत ही वीरता के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। नीचे दिए गए लेख को पढ़कर आप 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के विषय में जान सकते हैं।
झलकारी बाई
इतिहास के पन्नों में लुप्त, यह एक महान योद्धा की कहानी है जिसने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बहादुरी से लड़ाई लड़ी थी। एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाली झलकारी बाई केवल अपनी दृढ़ता और साहस से प्रेरित थीं जो आगे चलकर एक आदरणीय योद्धा बनीं।
झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1830 को झाँसी के निकट भोजला गाँव में हुआ था। वह बड़ी होकर एक सैनिक और रानी लक्ष्मीबाई की विश्वसनीय सलाहकारों में से एक बन गइ। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही घुड़सवारी, अस्त्र-शस्त्र की कला और एक योद्धा की तरह लड़ना सीख लिया था। उन्होंने अपने पति पूरन कोरी से तीरंदाजी, कुश्ती और निशानेबाजी भी सीखी। पूरन कोरी रानी लक्ष्मीबाई के पति राजा गंगाधर राव की सेना में एक सैनिक थे।
झलकारी बाई अकसर अपने पति के साथ शाही महल जाया करती थीं। रानी लक्ष्मीबाई को उनकी बहादुरी के बारे में पता चलने के बाद, वे उनकी अच्छी सहेली बन गइ। झलकारी बाई का शारीरिक गठन और उनका चेहरा रानी लक्ष्मीबाई से मिलता-जुलता था।
जल्द ही, झलकारी बाई को रानी लक्ष्मीबाई की ‘दुर्गा दल’ नामक महिला सेना में पद मिल गया और वे अकसर रानी की तरफ से महत्वपूर्ण निर्णय लिया करती थीं।
राजा गंगाधर राव के निधन के बाद, अंग्रेजों को उनका उत्तराधिकारी स्वीकार्य नहीं था, परंतु अंग्रेजों के विरोध के बावजूद, रानी लक्ष्मीबाई ने शासन की बागडोर संभालने का फैसला किया। लक्ष्मीबाई ने निकट भविष्य में होने वाली लड़ाई के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं। 1857 में, सिपाहियों का विद्रोह बढ़ गया और उत्तरी एवं मध्य भारत के बड़े हिस्सों में फैल गया। वे सिपाही रानी लक्ष्मी बाई का समर्थन करने के लिए एकत्र हुए। झलकारी बाई को सेना की महिला टुकड़ी का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
1858 में जब जनरल सर ह्यू रोज की कमान में अंग्रेजी सेना ने झाँसी के किले पर हमला किया और किले को घेर लिया तो झलकारी बाई और पूरन कोरी दोनों ने उसका कड़ा प्रतिरोध किया। झलकारी बाई ने जमकर लड़ाई लड़ी और रानी को अपने बच्चे के साथ महल छोड़ने का सुझाव दिया।
झलकारी बाई ने स्वयं रानी लक्ष्मीबाई का वेश धारण किया, सेना की कमान संभाली और अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। उनकी सरूपता ने अंग्रेजों को भ्रमित किए रखा और उनकी यह चाल लंबे समय तक काम करती रही। झलकारी बाई की असली पहचान के बारे में अंग्रेज अनिश्चित थे और उनकी वजह से ही रानी लक्ष्मीबाई अपने बेटे के साथ अपने महल से भाग सकीं।
हालाँकि उसी लड़ाई में, पूरन कोरी अंग्रेजों से लड़ते हुए मारे गए और जब झलकारी बाई ने यह सुना तो वह क्रोधित हो गइ। उन्होंने कई अंग्रेज सैनिकों को मार डाला और उनसे जमकर लड़ाई लड़ी।
झलकारी बाई की यह कहानी बुंदेलखंड की लोक स्मृति का एक हिस्सा है। आज तक, उनकी स्मृति लोगों के मन में जीवित है और उनके बहादुर करतब वहाँ की लोककथाओं में बार-बार उभर कर सामने आते हैं। उनके सम्मान में हर साल झलकारी बाई जयंती मनाई जाती है। ‘अमर शहीद’ झलकारी बाई 1890 तक जीवित रहीं और वे अपने समय की शौर्य की प्रतिमूर्ति बन गइ थीं।
साभार : https://indianculture.gov.in/hi/node/2790247
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नीचे दी गई इंटरनेट कड़ियों तथा पुस्तकों के माध्यम से आप लक्ष्मीबाई तथा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अन्य वीरांगनाओं और राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित बालिका कांति के अदम्य साहस के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं—
https://www.naidunia.com/chhattisgarh/ambikapur-national-bravery-award-sevenyearold-kanti-of-chhattisgarh-who-saves-her-sister-from-elephants-will-get-national-bravery-award-4677447
https://youtu.be/nyoqcOrlWPw?si=JT63xysbj_qgstCC - NCERT OFFICIAL
‘भारत की महान नारियाँ’ ाृंखला की पुस्तकें, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित
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फि़रंगी |
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अंग्रेज, विलायती |
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मर्दानी/मर्दाना |
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बहादुर, पुरुषोचित |
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छबीली/छबीला |
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तेजस्वी, सुंदर, छबिवाली, सजीली |
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बरछी |
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छोटा भाला |
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ढाल |
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तलवार, भाले आदि के आघात को रोकने का लोहे का बना कछुए की पीठ जैसा एक साधन |
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गाथाएँ/गाथा |
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कथा, प्रशंसागीत |
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अवतार |
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उतरना, नीचे आना, किसी देवता या ईश्वर का मनुष्यादि के रूप में जन्म लेना |
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नाना |
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माता का पिता, मातामह, अनेक प्रकार के, कई तरह के, विविध, अनेक ,बहुत |
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दुर्ग |
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गढ़, किला, कठिन या तंग रास्ता |
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सुभट |
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रणकुशल योद्धा |
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विरुदावलि/विरुद |
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विस्तृत यशोगान, कीर्ति-गाथा, वह कविता आदि जिसमें किसी के यश आदि का वर्णन किया गया हो, प्रशंसासूचक पदवी |
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विधि |
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सृष्टि की रचना करने वाला, कार्य करने का ढंग, संगति, मेल, प्रयोग, शास्त्रसम्मत, व्यवस्था, धर्मग्रंथ, समय |
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बिरानी/बिराना |
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पराया |
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बिसात |
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फैलाव, हैसियत, शक्ति, सामर्थ्य, पूंजी |
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निपात |
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गिरना, चलाना, फेंकना, पतन, विनाश |
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बेजार |
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दुखी, ऊबा हुआ |
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सन्मुख |
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सम्मुख, जो सामने हो, भिड़ने वाला, अनुकूल |
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कृतज्ञ |
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उपकार मानने वाला, एहसानमंद |
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अविनाशी |
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नाशरहित, अक्षय, नित्य |
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मदमाती/मदमाता |
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मस्त, मदमत्त |
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स्मारक |
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किसी की स्मृति-रक्षा के अभिप्राय से संस्थापित संस्था, भवन, स्तंभ आदि, याद दिलाने वाला |
