वाक्य की सबसे छोटी इकाई को शब्द कहते हैं। शब्दों के अनेक रूप (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि) होते हैं। व्याकरण की भाषा में िक्रयापदों को छोड़कर वाक्य के अन्य पदों को नाम कहा जाता है। इस प्रकार किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, भाव (क्रिया) आदि का बोध कराने वाले शब्दों को संज्ञा कहते हैं। संस्कृत भाषा में प्रयोग करने के लिए इन शब्दों को 'पद' बनाया जाता है। संज्ञा, सर्वनाम आदि शब्दों को पद बनाने हेतु इनमें प्रथमा, द्वितीया आदि विभक्तियाँ लगाई जाती हैं। इन शब्दरूपों (पदों) का प्रयोग (पुँल्लिङ््ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग तथा एकवचन, द्विवचन और बहुवचन में भिन्न-भिन्न रूपों में) होता है। इन्हें सामान्यतया शब्दरूप कहा जाता है।
संज्ञा आदि शब्दों में जुड़ने वाली विभक्तियाँ सात होती हैं। इन विभक्तियों के तीनों वचनों (एक, द्वि, बहु) में बनने वाले रूपों के लिए जिन विभक्ति-प्रत्ययों की पाणिनि द्वारा कल्पना की गई है, वे 'सुप्' कहलाते हैं। इनका परिचय इस प्रकार है—
| विभक्ति |
एकवचन |
द्विवचन |
बहुवचन |
| प्रथमा |
सु (स् = :) | औ | जस् (अस्) |
| द्वितीया |
अम् | भ्याम् | शस् (अस्) |
| तृतीया |
टा (आ) | भ्याम् | भिस् (भि:) |
| चतुर्थी |
ङे (ए) | भ्याम् |
भ्यस् (भ्य:) |
| पञ्चमी |
ङसि (अस्) | भ्याम् | भ्यस् (भ्य:) |
| षष्ठी |
ङस् (अस्) | ओस् (ओ:) |
आम् |
| सप्तमी |
िङ (इ) | ओस् (ओ:) |
सुप् (सु) |
ये प्रत्यय शब्दों के साथ जुड़कर अनेक रूप बनाते हैं।
इन विभक्तियों के अतिरिक्त सम्बोधन के लिए भी प्रथमा विभक्ति के ही प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है, किन्तु सम्बोधन एकवचन में प्रथमा एकवचन से रूपों में अन्तर होता है। रूप निर्देश से रूपभेद को स्पष्ट किया गया है—
शब्दों के विभिन्न रूपों में भेद होने के कारण 'संज्ञा' आदि शब्दों को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है—
1. संज्ञा शब्द
2. सर्वनाम शब्द
3. संख्यावाचक शब्द
संज्ञा शब्दों के अन्त में 'स्वर' अथवा व्यञ्जन होने के कारण इन्हें पुन: दो वर्गों में रखा जा सकता है—
स्वरान्त (अजन्त)
स्वरान्त (अजन्त) अर्थात् जिन शब्दों के अन्त में अ, आ, इ, ई आदि स्वर होते हैं, उन्हें स्वरान्त कहा जाता है। इनका वर्गीकरण इस प्रकार है—
अकारान्त, आकारान्त, इकारान्त, ईकारान्त, उकारान्त, ऊकारान्त, ऋकारान्त, एकारान्त, ओकारान्त तथा औकारान्त आदि।
यथा— बालक, गुरु, कवि, नदी, लता, पितृ, गो आदि।
व्यञ्जनान्त (हलन्त)
जिन शब्दों के अन्त में क्, च्, ट्, त् आदि व्यञ्जन होते हैं, उन्हें व्यञ्जनान्त कहा जाता है। ङ्, ञ्, ण्, य् इन व्यञ्जनों को छोड़कर प्राय: सभी व्यञ्जनों से अन्त होने वाले शब्द पाए जाते हैं। इनमें भी च्, ज्, त्, द्, ध्, न्, श्, ष्, स् और ह् व्यञ्जनों से अन्त होने वाले शब्द अधिकतर प्रयुक्त होते हैं। अत: इनकी गणना चकारान्त, जकारान्त, तकारान्त, दकारान्त, धकारान्त, नकारान्त, पकारान्त, भकारान्त, रकारान्त, वकारान्त, शकारान्त, षकारान्त, सकारान्त, हकारान्त आदि रूपों में की जाती है,
यथा— जलमुच्, भूभृत्, श्रीमत्, जगत्, राजन्, दिश्, पयस् आदि।
यहाँ अकारान्त पुुुँल्लिङ्ग 'बालक', आकारान्त स्त्रीलिङ्ग 'बालिका', अकारान्त नपुंसकलिङ्ग 'फल' और नकारान्त पुँल्लिङ्ग 'राजन्' शब्दों के विभिन्न विभक्तियों में रूप दिए जा रहे हैं—
1. अकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्द 'बालक'
| विभक्ति |
एकवचन |
द्विवचन |
बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा |
बालक: | बालकौ |
बालका: |
| द्वितीया |
बालकम् |
बालकौ |
बालकान् |
| तृतीया |
बालकेन |
बालकाभ्याम् |
बालकै: |
| चतुर्थी |
बालकाय |
बालकाभ्याम् | बालकेभ्य: |
| पञ्चमी |
बालकात् |
बालकाभ्याम् | बालकेभ्य: |
| षष्ठी |
बालकस्य | बालकयो: | बालकानाम् |
| सप्तमी |
बालके |
बालकयो: |
बालकेषु |
| सम्बोधन |
हे बालक! | हे बालकौ ! | हे बालका:! |
वृक्ष, अध्यापक, छात्र, नर, देव आदि सभी अकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार होंगे।
2. आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द 'बालिका'
| विभक्ति |
एकवचन |
द्विवचन |
बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा |
बालिका |
बालिके |
बालिका: |
| द्वितीया |
बालिकाम् |
बालिके |
बालिका: |
| तृतीया |
बालिकया |
बालिकाभ्याम् |
बालिकाभि: |
| चतुर्थी |
बालिकायै |
बालिकाभ्याम् |
बालिकाभ्य: |
| पञ्चमी |
बालिकाया: |
बालिकाभ्याम् |
बालिकाभ्य: |
| षष्ठी |
बालिकाया: |
बालिकयो: |
बालिकानाम् |
| सप्तमी |
बालिकायाम् |
बालिकयो: |
बालिकासु |
| सम्बोधन |
हे बालिके ! |
हे बालिके ! |
हे बालिका: ! |
लता, बाला, विद्या आदि सभी आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप भी इसी प्रकार होंगे।
3. अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्द 'फल'
| विभक्ति |
एकवचन |
द्विवचन |
बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा |
फलम् | फले |
फलानि |
| द्वितीया |
फलम् |
फले |
फलानि |
| तृतीया |
फलेन |
फलाभ्याम् | फलै: |
| चतुर्थी |
फलाय |
फलाभ्याम् | फलेभ्य: |
| पञ्चमी |
फलात् | फलाभ्याम् | फलेभ्य: |
| पष्ठी |
फलस्य |
फलयो: | फलानाम् |
| सप्तमी |
फले |
फलयो: | फलेषु |
| सम्बोधन |
हे फलम् ! |
हे फले! |
हे फलानि! |
टिप्पणी— अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दों के तृतीया विभक्ति से सप्तमी विभक्ति तक के रूप अकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों के रूपों की भाँति ही होते हैं। अन्य अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्दों (मित्र, वन, अरण्य, मुख, कमल, पुष्प आदि) के रूप भी इसी प्रकार होेंगे।
4. नकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्द 'राजन्'
| विभक्ति |
एकवचन |
द्विवचन |
बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा |
राजा |
राजानौ | राजान: |
| द्वितीया |
राजानम् |
राजानौ |
राज्ञ: |
| तृतीया |
राज्ञा |
राजभ्याम् |
राजभि: |
| चतुर्थी |
राजा ज्ञे |
राजभ्याम् |
राजभ्य: |
| पञ्चमी |
राज्ञ: |
राजभ्याम् | राजभ्य: |
| षष्ठी |
राज्ञ: |
राज्ञो: |
राज्ञाम् |
| सप्तमी |
राज्ञि, राजनि |
राज्ञो: | राजसु |
| सम्बोधन |
हे राजन्! |
हे राजानौ! |
हे राजान:! |
पाठ्यक्रम में निर्धारित अन्य शब्दों के रूप परिशिष्ट में दिए गए हैं। अत: अधोलििखत स्वरान्त, व्यञ्जनान्त एवं सर्वनाम शब्दों के रूप परिशिष्ट में द्रष्टव्य हैं—
(क) स्वरान्त— लता, मुनि, पति, भूपति, नदी, भानु, धेनु, मधु, पितृ, मातृ, गो, द्यौ, नौ और अक्षि।
(ख) व्यञ्जनान्त— भवत्, आत्मन्, विद्वस्, चन्द्रमस्, वाच्, गच्छत्, (शत्रन्त), पुम्, पथिन्, गिर्, अहन् और पयस्।
(ग) सर्वनाम— सर्व, यत्, तत्, एतत्, किम्, इदम् (सभी लिङ्गों में) अस्मद्, युष्मद्, अदस्, ईदृश्, कतिपय, उभ और कीदृश्।
(घ) संख्याशब्द— एक, द्वि, त्रि, चतुर्, पञ्चन् आदि।
अभ्यासकार्यम्
प्र. 1. कोष्ठके प्रदत्तपदानां समुचितविभक्तिप्रयोगेण वाक्यानि पूरयत—
i) ..................... जलं पवित्रं वर्तते। (गङ्गा, षष्ठी, एकवचन)
ii) ..................... इदं कार्यं कृतम्। (बालिका, तृतीया, बहुवचन)
iii) ..................... प्रात: भानु: उदेति। (गगन, सप्तमी, एकवचन)
iv) ..................... दुग्धं मधुरं भवति। (धेनु, षष्ठी, एकवचन)
v) .................... नौकया तरति। (नदी, द्वितीया, एकवचन)
vi) .................... वचांसि सम्माननीयानि। (विद्वस्, षष्ठी, बहुवचन)
vii) स: ............ उपगम्य किं करोति? (भवत्, पुंल्लिंग, द्वितीया, एकवचन)
viii) ....................बालकेन पुष्पं त्रोटितम्। (गच्छत्, तृतीया, एकवचन)
ix) ........................ बालकेभ्य: आचार्य: पुस्तकानि आनयत्। (एतत् पुंल्लिंग, चतुर्थी, बहुवचन)
x) .................. बालिका: उद्याने क्रीडन्ति। (तत्, स्त्री, प्रथमा, बहुवचन)
प्र. 2. कोष्ठके प्रदत्तपदेभ्य: समुचितं पदं चित्वा वाक्यानि पूरयत—
i) ................... उत्तमकार्याणि कुर्म:। (वयम्/यूयम्/ते)
ii) ................... प्रकाश: ग्रीष्मकाले प्रचण्ड:। (भानुना/भानो:/भानुम्)
iii) ......................... शीतलता ग्रीष्मकाले सर्वेभ्य: रोचते। (चन्द्रमसे/ चन्द्रमसा/चन्द्रमस:)
iv) ....................... बहव: गुणा: सन्ति। (मधु/मधुने/मधुनि)
v) ....................... तपस: फलं लभन्ते। (मुनि:/मुनी/मुनय:)
vi) उत्तमबालका: ....................... सेवन्ते। (मातरम्/मात्रे/मातरि)
vii) ......................... कार्ये क: क्षम: ? (अस्मात्/ अस्य/अस्मिन्)
viii) विद्या ......................... शोभते, नहि धनम्। (राज्ञ:/राजसु/राज्ञाम्)
ix) ......................... बालकान् अत्र आह्वय। (सर्वेषाम्/सर्वै:/सर्वान्)
x) ......................... सन्मार्गं प्रदर्शयन्ति। (साधु:/साधू/साधव:)
