संस्कृत के वे शब्द जो सर्वदा एक जैसे ही रहते हैं (जिनमें विभक्ति, वचन तथा लिङ्ग के आधार पर कोई परवर्तन नहीं होता है।) उन्हें अव्यय कहते हैं—
सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु, सर्वासु च विभक्तिषु ।
वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ।।
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अव्यय |
अर्थ |
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अचिरम् |
शीघ्र ही |
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यावत् |
जब तक |
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तावत् |
तब तक |
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सहसा |
अचानक |
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श्व: |
आने वाला कल |
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ह्य: |
बीता हुआ कल |
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शनै: शनै: |
धीरे-धीरे |
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सम्प्रति/साम्प्रतम्/अधुना/इदानीम् |
इस समय |
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अत्र |
यहाँ |
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अत्यन्तम् |
बहुत |
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अथ |
आरम्भ या इसके बाद |
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अलम् |
निषेधार्थक (योगे तृतीया वि.) |
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पर्याप्त |
समर्थ (योगे चतुर्थी विभक्ति) |
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अद्य |
आज |
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अथवा |
या |
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अपि |
भी |
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अन्यथा |
नहीं तो |
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अत: |
इसलिए |
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अतीव |
बहुत अधिक |
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आम् |
हाँ |
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इतस्तत: |
इधर-उधर |
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इति |
समाप्तऐसा |
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उच्चै: |
जोर-जोर से, ऊँचे |
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एव |
ही |
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एकदा |
एक बार |
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एवम् |
इस प्रकार, ऐसे |
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किम् |
क्या |
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किन्तु |
परन्तु, लेकिन |
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कदा |
कब |
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कुत: |
कहाँ से |
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कुत्र/ क्व/ क्वचित् |
कहाँ |
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च |
और |
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अभित: |
दोनों ओर |
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परित: |
चारों ओर |
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सर्वत: |
सभी ओर |
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उभयत: |
दोनों ओर |
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चेत् |
यदि |
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चिरम् |
देर से, देर तक |
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तत्र |
वहाँ |
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इत: |
इधर से, यहाँ से |
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तत: |
उसके बाद, वहाँ से |
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तथापि |
फिर भी |
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तदातदानीम् |
तब |
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तर्हि |
तो |
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तु |
तो |
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तावत् |
तब तक |
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तूष्णीम् |
चुप |
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दिवा |
दिन |
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न |
नहीं |
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नीचै: |
नीचे |
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नूनम् |
निश्चय ही |
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नो चेत् |
नहीं तो |
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पुन: |
फिर |
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प्रात: |
सवेरे |
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पश्चात् |
बाद |
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प्रभृति |
से, लेकर |
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परन्तु |
किन्तुलेकिन |
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पुरा |
पुराने समय में, पहले |
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सायम् |
शाम |
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श्व: |
कल (आने वाला) |
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ह्य: |
कल (बीता हुआ) |
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सह |
साथ |
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स्वयम् |
अपने आप |
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सहसा |
अचानक |
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स्म |
था, थी, थे |
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सर्वत्र |
सब जगह |
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अथ किम् |
और क्या |
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तथा |
वैसे |
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परस्परम् |
आपस में |
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बहि: |
बाहर |
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बहुधा |
अक्सर |
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बाढम् |
हाँ |
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मा |
नहीं |
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मुहुर्मुहु:भूय:, वारं |
वारम् बार-बार |
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यत् |
कि |
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यत्र |
जहाँ |
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यदि |
अगर |
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यद्यपि |
अगर |
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यावत् |
जब तक |
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यत: |
जहाँ से |
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यदा |
जब |
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वा |
या/ अथवा |
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विना |
बिना |
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वृथा |
व्यर्थ |
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शनै: |
धीरे |
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सर्वदासदा, सदैव |
नित्य |
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हि/ यत:/ यतोहि |
क्योंकि |
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खलु |
निश्चय ही |
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ईषत् |
थोड़ा ही |
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जातु |
कभी |
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धिक् |
धिक्कार |
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नक्तम् |
रात |
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प्रसह्य |
बलात् |
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नम: नमस्कार, |
प्रणाम |
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पुर:पुरस्तात्, पुरत: |
सामने |
वाक्येषु केषािञ्चत् अव्ययपदानां प्रयोगान् पश्यत—
कच्छप: शनै: शनै: चलति।
अचिरं गृहं गच्छ।
अहं श्व: वाराणसीं गमिष्यामि।
ह्य: मम गृहे उत्सव: आसीत्।
सहसा निर्णय: न करणीय:।
इदानीम् अहं संस्कृत पठामि।
यद्यपि अद्य अवकाश: अस्ति तथापि अहं कार्यमुक्त: नास्मि।
अथ रामायणकथा आरभ्यते।
अत्र आगच्छ।
अहं कुत्रापि न गमिष्यामि।
कुक्कुर: इतस्तत: भ्रमति।
यत्र-यत्र धूम: तत्र-तत्र अग्नि:।
अधुना गल्पं न करणीयम्।
नक्तम् दधि न भुञ्जीत।
कक्षायां तूष्णीम् तिष्ठ।
पुरा अशोक: राजा आसीत्।
तौ परस्परम् आलपत:।
अद्य प्रभृति अहं धूमपानं न करिष्यामि।
शीघ्रं कार्यं समापय अन्यथा विलम्ब: भविष्यति।
वृथा कलहम् मा कुरु।
यदा अहं गमिष्यामि तदा स: अत्र आगमिष्यति।
ईषत् हसित्वा स: तस्य उपहासं कृतवान्।
अहं त्वाम् भूयोभूय: नमामि।
स: मुहुर्मुहु: किम् पश्यति ?
यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि यकार एवं तकार वाले, जैसे कि— यद्यपि तथापि, यथा-तथा, यदि-तर्हि, यत्र-तत्र, यावत्-तावत्, यदा-तदा इत्यादि अव्ययों का वाक्यों में प्रयोग प्रायश: एक साथ ही करना चाहिए, अन्यथा वाक्य अपूर्ण ही रहता है।
अभ्यासकार्यम्
प्र. 1. समुचितै: अव्ययै: (मंजूषात: गृहीत्वा) रिक्तस्थानानि पूरयत—
i) स: .................................... वनं गतवान्।
ii) स: .................................... गच्छति ?
iii) गज: .................................. चलति।
iv) स: .................................... स्वपिति।
v) सिंह: ................................. गर्जति।
vi) स: .................................... विजेष्यते।
vii) परिश्रमं कुरु, .........................अनुत्तीर्ण: भविष्यसि।
viii) गृहात् ................................. मा गच्छ।
ix) स: ..................................... माम् उद्वेजयति।
x) कोलाहलं ............................ कुरु।
मञ्जूषा
प्र. 2. अधोलिखितेषु वाक्येषु अव्ययपदं चित्वा लिखत—
i) यावत् परीक्षाकाल: नायाति तावत् परिश्रमं कुरु। .......................
ii) अस्माभि: सर्वदा सत्यं वक्तव्यम्। ....................................
iii) काल: वृथा न यापनीय:। ....................................
iv) अहं सम्प्रति गृहं गन्तुम् इच्छामि। ....................................
v) त्वं कुत: समायात: ? ....................................
vi) अहं श्व: ग्रामं गमिष्यामि। ....................................
vii) तौ परस्परम् आलपत:। ....................................
viii) अद्यप्रभृति अहं धूमपानं न करिष्यामि। ....................................
ix) धनं विना जीवनं वृथा भवति। ....................................
x) अथ रामायणकथा आरभ्यते। ....................................
प्र. 3. कोष्ठकेभ्य: शुद्धम् अव्ययपदं चित्वा रिक्तस्थानं पूरयत्—
i) अहम् ............................... भ्रमणाय गमिष्यामि। (श्व:/ह्य:)
ii) त्वम् कस्य ............................ गच्छसि ? (परित:/पुरत:)
iii) विद्यालयम् .............................. उद्यानम् अस्ति। (परित:/ एव)
iv) स: यदा आगमिष्यति .................. अहं गमिष्यामि। (तदैव/तथैव)
v) परिश्रमं कुरु.....................अनुत्तीर्ण: भविष्यसि। (सर्वदा/ अन्यथा)
vi) त्वं ................................... कुत्र गच्छसि ? (जातु / साम्प्रतम्)
vii) यूयम् ................................. ध्यानेन पठत । (बाढम् / नूनम्)
viii) श्याम: ................................. पठति श्यामा न । (एव/ विना)
ix) छात्रा: पुस्तकम् .............................. न शोभन्ते । (यदि / विना)
x) यथा वप्स्यसि ............................ फलं प्राप्स्यसि। (तदा / तथा)
