कारक
वाक्य में जिसके द्वारा क्रिया की सिद्धि हो, उसे कारक कहते हैं (क्रियाजनकत्वं कारकत्वम्)।
किसी वाक्य में क्रिया के सम्पादन में सहायता करने वाले को कारक कहते हैं (क्रियां करोति निर्वर्तयतीति कारकम्)।
हे बालका: ! नृपस्य पुत्र: ययाति: स्वभवने कोषात् स्वहस्तेन याचकेभ्य: धनं ददाति
| 1. क: ददाति? | ययाति: (कर्ता) | प्रथमा विभक्ति |
| 2. किं ददाति? |
धनं (कर्म) | द्वितीया विभक्ति |
| 3. केन ददाति? |
हस्तेन (करण) | तृतीया विभक्ति |
| 4. केभ्य: ददाति? |
याचकेभ्य: (सम्प्रदान) |
चतुर्थी विभक्ति |
| 5. कस्मात् ददाति? |
कोषात् (अपादान) | पञ्चमी विभक्ति |
| 6. कुत्र ददाति? |
स्वभवने (अधिकरण) |
सप्तमी विभक्ति |
यहाँ नृपति: आदि पदों का क्रिया के साथ सम्बन्ध है। अत: ये कारक हैं। संस्कृत में सम्बन्ध तथा सम्बोधन को क्रिया से सीधे सम्बद्ध न होने के कारण कारक नहीं माना जाता है। इस वाक्य में नृपस्य पद का ययाति: (कर्ता से) सम्बन्ध है, किन्तु क्रिया ददाति से सीधा सम्बन्ध नहीं है। इसी तरह हे बालका:! का भी क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं है।
- इस तरह कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान तथा अधिकरण— ये छ: कारक हैं।
1. कर्ता— क्रिया को स्वतन्त्र रूप से करने वाले को कर्ता कहते हैं।
यथा— गिरीश: पुस्तकं पठति। यहाँ 'पठति' क्रिया को करने वाला 'गिरीश' है। अतएव यह कर्ता कारक है।
2. कर्म— क्रिया के सम्पादन में कर्ता के सर्वाधिक अभीष्ट को कर्म
कहते हैं।
यथा— गिरीश: पुस्तकं पठति। यहाँ पठन क्रिया के सम्पादन में कर्ता 'गिरीश' के लिए 'पुस्तक' सर्वाधिक अभीष्ट है, अत: कर्मकारक है।
3. करण— क्रिया की सिद्धि में कर्ता के प्रमुख सहायक को करण कहते हैं।
यथा— गौरी जलेन मुखं प्रक्षालयति। यहाँ 'प्रक्षालन' क्रिया का प्रमुख सहायक जल है। अत: 'जल' करण कारक है।
4. सम्प्रदान कारक— जिसे कुछ दिया जाता है या जिसके लिए कोई कार्य किया जाता है, वहाँ सम्प्रदान कारक होता है।
यथा— वागीश: मित्राय लेखनीं ददाति। इस वाक्य में मित्र को लेखनी दी जा रही है, अत: 'मित्राय' सम्प्रदान कारक है। इसी तरह 'माता बालकाय फलम् आनयति' वाक्य में फल लाने का कार्य बालक के लिए हो रहा है, अत: 'बालकाय' सम्प्रदान कारक है।
5. अपादान कारक— जिससे कोई वस्तु अलग होती है, वह अपादान कारक होता है। 'वृक्षात्' पत्राणि पतन्ति। यहाँ पत्ते (पत्राणि) वृक्ष से अलग हो रहे हैं, अत: 'वृक्षात्' अपादान कारक है।
6. अधिकरण कारक— क्रिया का आधार अधिकरण है।
यथा— मुनि: आसने तिष्ठति। इस वाक्य में तिष्ठति क्रिया का आधार 'आसने' है, अत: आसने अधिकरण कारक है।
7. सम्बन्ध और सम्बोधन— जहाँ एक व्यक्ति अथवा वस्तु का दूसरे व्यक्ति अथवा वस्तु से सम्बन्ध प्रकट हो, वहाँ षष्ठी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।
यथा— रामस्य पुत्र: कुश: गच्छति। यहाँ रामस्य पद में षष्ठी विभक्ति है जिसका पुत्र कुश से सीधा सम्बन्ध है। अत: ‘रामस्य’ में सम्बन्धवाचक षष्ठी है। सोहनस्य पुस्तकम् अस्ति। यहाँ सोहन का पुस्तक से सीधा सम्बन्ध है, अत: ‘सोहनस्य’ में सम्बन्ध कारक है।
जिसे पुकारा जाए या सम्बोधित किया जाए, उसे सम्बोधन कहते हैं। जैसे— हे बालक! कोलाहलं मा कुरु। इस वाक्य में ‘बालक’ को सम्बोधित किया गया है, अत: सम्बोधन है। क्रिया से सीधा सम्बन्ध न रखने के कारण सम्बन्ध तथा सम्बोधन को संस्कृत में कारक नहीं माना जाता है।
विभक्ति
शब्दों में लगने वाली विभक्तियाँ सात हैं। प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी तथा सप्तमी। इनके तीनों वचनों में अलग-अलग प्रत्यय लगते हैं। ये प्रत्यय 21 हैं, जिन्हें सुप् नाम से जाना जाता है। सुप् प्रत्ययों के लग जाने पर ही शब्द पद बनकर प्रयोग योग्य होते हैं तथा सुबन्त कहलाते हैं।
ये विभक्तियाँ दो तरह से प्रयोग की जाती हैं। कारक विभक्ति के रूप में तथा उपपद विभक्ति के रूप में।
- क्रिया के आधार पर (संज्ञादि शब्दों में) लगने वाली विभक्ति को कारक विभक्ति कहते हैं।
- अन्य पदों के आधार पर लगने वाली विभक्ति को उपपद विभक्ति कहते हैं।
प्रथमा विभक्ति (कर्ता)
- कर्तृवाच्य के कर्ता में और कर्मवाच्य के कर्म में प्रथमा विभक्ति लगती है।
यथा— मोहन: दुग्धं पिबति। यहाँ दूध पीने की क्रिया को करने वाला 'मोहन' है। अत: 'मोहन:' में प्रथमा विभक्ति है।
राम: पुस्तकं पठति। इस वाक्य में पुस्तक पठन की क्रिया को करने वाला ‘राम’ है, जो प्रधान होने के कारण कर्ता है।
सोहनेन ग्रन्थ: पठ्यते। यह वाक्य कर्मवाच्य है, जिसमें कर्म (ग्रन्थ का प\ढ़ना) प्रधान है, अत: ‘ग्रन्थ:’ में प्रथमा विभक्ति हुई।
- किसी शब्द के अर्थ, लिङ्ग एवं परिमाण को प्रकट करने के लिए प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है।
यथा— मोहन:, पुरुष:, लघु:, लता
- इति के योग में प्रथमा विभक्ति होती है।
यथा— वयम् इमं कालिदास इति नाम्ना जानीम:।
द्वितीया विभक्ति
- वाक्य में कर्ता के सर्वाधिक अभीष्ट अर्थात् कर्म में द्वितीया विभक्ति
लगती है।
वैष्णवी चित्रं पश्यति, इस वाक्य में वैष्णवी को चित्र देखना सर्वाधिक अभीष्ट है, अत: चित्र ‘कर्म’ संज्ञा है और उस में द्वितीया विभक्ति है। इसी प्रकार बाल: मोदकं वाञ्छति। यहाँ पर बालक को मोदक अभीष्ट है, अत: वह कर्मसंज्ञक है।
- कर्तृवाच्य के वाक्यों के कर्म में द्वितीया विभक्ति लगती है।
यथा— वैष्णवी चित्रं रचयति, यहाँ 'चित्र' की रचना करना ही कर्ता का कर्म है, अत: चित्र में द्वितीया विभक्ति है।
अभित: (सामने), परित: (चारो तरफ), समया (पास), निकषा (पास), हा (खेद), प्रति (के ओर), उभयत: (दोनों तरफ), सर्वत: (सर्वत्र), धिक् (िधक्), उपरि (ऊपर), अध: (नीचे), िवना (िबना), अन्तरा (िबना), अन्तरेण (िबना) के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।
- i) ग्रामम् अभित: वृक्षा: सन्ति।
- ii) नगरं परित: मार्गा: सन्ति।
- iii) विद्यालयं समया उद्यानम् अस्ति।
- iv) नदीं निकषा शीतल: समीर: वहति।
- v) हा! बालघातिनम्।
- vi) अहं मित्रं प्रति किमपि न कथयिष्यामि।
- vii) मार्गम् उभयत: वृक्षा: सन्ति।
- viii) आश्रमं सर्वत: वनानि सन्ति।
- ix) धिङ् मूर्खम्।
- x) मम गृहम् उपरि वायुयानं गच्छति।
- xi) भूमिम् अध: जन्तव: सन्ति।
- xii) पुत्रं विना माता दु:खिता अभवत्।
- xiii) परिश्रमम् अन्तरा सुखं नास्ति।
- xiv) हास्यम् अन्तरेण जीवनं निरर्थकम्।
अधि उपसर्ग पूर्वक शीङ् स्था, आस्, वस् धातुओं के योग में द्वितीया विभक्ति होती है—
- i) राजकुमार: पर्यङ्कम् अधिशेते।
- ii) विष्णु: वैकुण्ठम् अधितिष्ठति।
- iii) प्राचार्य: उच्चासनम् अध्यास्ते।
- iv) मुनि: वनम् अधिवसति।
व्यवधान रहित कालवाची एवं मार्गवाची शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है—
- i) छात्र: द्वादशवर्षाणि अपठत्।
- ii) छात्र: मासं पुस्तकम् अपठत्।
- iii) मथुरानगरम् इत: क्रोशं वर्तते।
- iv) विद्यालयात् क्रोशद्वयं पर्वत: वर्तते।
निम्नलिखित के योग में द्वितीया विभक्ति होती है—
सेव् (सेवा करना) — पुत्र: पितरं सेवते।
आ + रुह् (च\ढ़ना) — बालक: वृक्षम् आरोहति।
(अनु) (पीछे) — पुत्र: पितरम् अनुगच्छति।
निन्द् (निन्दा करना) — दुष्ट: सज्जनं निन्दति।
रक्ष् (रक्षा करना) — रक्षका: ग्रामं रक्षन्ति।
गम् (जाना) — बालिका: नगरं गच्छन्ति।
दुह् (दुहना) — राधा गां पय: दोग्धि।
याच् (मागना) — पुत्री मातरं धनं याचते।
पच् (पकाना) — स: तण्डुलान् ओदनं पचति।
दण्ड् (दण्ड देना) — राजा चौरं शतं दण्डयति।
प्रच्छ् (पूछना) — शिष्य: गुरुं प्रश्नं पृच्छति।
नी (ले जाना) — कृषक: अजां ग्रामं नयति।
चि (चुनना) — मालाकार: पादपं पुष्पाणि चिनोति।
ब्रू (बोलना) — गुरु: शिष्यं धर्मं ब्रूते (वदति)।
शास् (शिक्षा देना) — गुरु: शिष्यं शास्ति।
जि (जीतना) — पाण्डवा: कौरवान् अजयन्।
मथ् (मथना) — गोपी दधि नवनीतं मथ्नाति।
मुष् (चुराना) — चौर: धनं मुष्णाति।
दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मथ्, मुष्, नी, हृ, कृष्, वह् ये धातुएँ द्विकर्मक होती हैं। इनके दोनों ही कर्मों में द्वितीया विभक्ति होती है। उपर्युक्त उदाहरणों में अधिकांश में दो कर्मों का प्रयोग किया गया है। कुछ में (जि, शास्, मुष्) एक ही कर्म का प्रयोग किया गया है। पर यदि वहाँ दूसरे कर्म का प्रयोग होगा तो भी दोनों में द्वितीया विभक्ति ही लगेगी।
तृतीया विभक्ति
- जिसकी सहायता से कार्य किया जाता है उसमें तृतीया विभक्ति होती है। रचना कलमेन पत्रं लिखति। वाक्य में पत्र का लेखन कलम की सहायता से किया जा रहा है, अत: पत्र लेखन में सहायक होने के कारण 'कलम' में तृतीया विभक्ति है। राम: रावणं 'बाणेन' हतवान्। इस वाक्य
में रावण को मारने में 'बाण' प्रमुख साधन है। अत: ‘बाणेन’ में तृतीया
विभक्ति है। - अधोलिखित शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है—
सह (साथ) — सोहन: रामेण सह गच्छति।
सार्धम् (साथ) — गोपाल: रामपालेन सार्धम् क्रीडति।
सदृशम् (समान) — सीताया: मुखं चन्द्रेण सदृशम् अस्ति।
समम् (साथ) — भोजनेन समं जलं पिब।
सम: (समान) — भोज: पराक्रमे विक्रमेण सम: आसीत्।
अलम् (बस) — अलं विवादेन।
विना (बिना) — रामेण विना सीता दु:खिता अभवत्।
- जिस अङ्ग में कोई विकार प्रदर्शित करना हो, उस अङ्गवाची शब्द में तृतीया विभक्ति होती है—
- i) देवदत्त: नेत्रेण काण: अस्ति।
- ii) अश्व: पादेन खञ्ज: अस्ति।
- फल प्राप्ति या कार्य की पूर्णता के अर्थ में समय की निरन्तरता का बोध कराने वाले शब्दों में तृतीया विभक्ति होती है—
- i) राम: सप्ताहेन पुस्तकं समाप्तवान्।
- ii) बाल: सप्तभि: दिवसै: नीरोग: जात:।
- पृथक्, विना तथा नाना के योग में द्वितीया, तृतीया या पञ्चमी विभक्तियों में से कोई भी एक लगती है—
i) जलं जलेन जलात् वा विना न कोऽपि जीवितुं शक्नोति।
ii) ईश्वरम् ईश्वरेण ईश्वरात् वा पृथक् न कोऽपि अस्मान् रक्षितुं समर्थ:।
iii) विद्यां विद्यया विद्याया: वा नाना न सुखम्।
चतुर्थी विभक्ति
- सम्प्रदान कारक के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।
- 'दा' धातु के योग में जिसे दिया जा रहा है उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।
यथा— पिता पुत्राय पुस्तकं यच्छति।
राजा भिक्षुकाय वस्त्रं ददाति।
अधोलिखित शब्दों या धातुओं के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है—
रुच् (अच्छा लगना) — बालकाय मोदकं रोचते।
क्रुध् (क्रोध करना) — स्वामी सेवकाय क्रुध्यति।
कुप् (क्रोध करना) — माता पुत्राय कुप्यति।
द्रुह् (द्रोह करना) — मन्दमति: छात्र: योग्याय छात्राय द्रुह्यति।
स्पृह् (चाहना) — आभूषणेभ्य: स्पृहयति नारी।
ईर्ष्य् (ईर्ष्या करना) — दुर्योधन: अर्जुनाय ईर्ष्यति।
असूय् (निन्दा करना) — धनहीन: धनिकाय असूयति।
नम: (नमस्कार) — गुरवे नम:।
स्वस्ति (कल्याण हो) — स्वस्ति प्राणिभ्य:।
स्वधा (पितरों को जल देना) — पितृभ्य: स्वधा।
स्वाहा (समर्पित) — अग्नये स्वाहा।
नि + विद् (निवेदन करना) — स: गुरवे निवेदयति।
पञ्चमी विभक्ति
- अपादान कारक में पञ्चमी विभक्ति होती है।
- जिसे नियम पूर्वक प\ढ़ा जाए उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है।
यथा— अहं गुरो: संस्कृतं पठामि।
- जहाँ से कोई वस्तु उत्पन्न होती है उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है।
i) गङ्गा हिमालयात् प्रभवति।
ii) बीजात् जायते वृक्ष:।
- जहाँ से कोई व्यक्ति या वस्तु अलग होती है वहाँ पञ्चमी विभक्ति
होती है—
i) मोहन: विद्यालयात् आगच्छति।
ii) वृक्षात् पत्राणि पतन्ति।
भी, त्रा तथा त्रस् धातुओं के योग में (भय हेतु में) पञ्चमी विभक्ति
होती है—
i) राम: पापात् बिभेति।
ii) रक्षक: चौरात् त्रायते।
iii) गोकुल: दुर्जनात् त्रस्त:।
िनम्न अव्ययों के योग से पञ्चमी विभक्ति होती है—
ऋते (विना) — ईश्वरात् ऋते न कोऽपि मम रक्षक:।
प्रभृति (से लेकर, शुरू करके) — तत: प्रभृति स: नित्यं विद्यालयं गच्छति।
पृथक् (अलग) — ईश्वरात् पृथक् नास्ति कोऽपि रक्षक:।
दूरम् (दूर) — प्राथमिकविद्यालय: ग्रामात् दूरम् अस्ति।
बहि: (बाहर) — मूषक: बिलात् बहि: आगच्छत्।
आरभ्य (आरम्भ करके) — सोमवासरात् आरभ्य वृष्टि: जायते।
आरात् (निकट) — ग्रामात् आरात् नदी अस्ति।
अनन्तरम् (बाद) — त्वम् पठनात् अनन्तरं क्रीडाक्षेत्रं गच्छ।
प्रमाद (उपेक्षा, आलस्य) — पठनात् मा प्रमाद:।
अन्य (दूसरा) — ईश्वरात् अन्य: कोऽपि पालक: नास्ति ?
पूर्वं (पहले) — विद्यालयगमनात् पूर्वं गृहकार्यं कुरु।
बहि: (बाहर) — मूषक: बिलात् बहि: आगच्छत्।
प्राक् — सोमवासरात् प्राक् रविवासर: भवति।
षष्ठी विभक्ति
- सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति होती है
i) रामस्य पुस्तकम्
ii) कृष्णस्य ग्राम:
iii) मृत्तिकाया: घट:
निम्नलिखित शब्दों के योग में षष्ठी विभक्ति होती है—
कृते (लिए) — बालकस्य कृते जलम् आनय।
हेतु: (कारण) — कस्य हेतो: अयम् उत्सव: ?
समक्षम् (सामने) — गुरो: समक्षम् असत्यं मा वद।
मध्ये (बीच में) — हंसानां मध्ये बक: न शोभते।
अन्त: (अन्दर) — अतििथ: गृहस्य अन्त: प्राविशत्।
दूरम् (दूर) — किं दूरं व्यवसायिनाम्।
अनादरम् (अनादर) — कस्यापि अनादरम् मा कुरु।
- कतिपय (तसिल््) तस् प्रत्ययान्त पदों के साथ षष्ठी होती है।
यथा— ग्रामस्य पूर्वत: नदी वहति।
- अनेक में एक का निश्चय करने में षष्ठी एवं सप्तमी दोनों विभक्तियाँ
होती हैं—
i) सोहन: वीराणां/वीरेषु वा महावीर: अस्ति।
ii) कवीनां / कविषु वा कालिदास: श्रेष्ठ:।
अध: (नीचे) — वृक्षस्य अध: श्रमिक: शेते।
उपरि (ऊपर) — भवनस्य उपरि पक्षिण: सन्ति।
पुर: / पुरस्तात् (सामने) — गृहस्य पुर:/ पुरस्तात् निम्बवृक्ष: अस्ति।
सप्तमी विभक्ति
अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है—
i) वृक्षे फलानि सन्ति।
ii) सिंह: वने वसति।
- जिसके समस्त अवयवों में कोई वस्तु व्याप्त हो वहाँ सप्तमी विभक्ति
होती है—
तिलेषु तैलं विद्यते।
- जो कर्ता की इच्छा में विद्यमान हो, वहाँ सप्तमी विभक्ति होती है—
रामस्य पठने अनुराग: अस्ति।
- जहाँ एक क्रिया के अनन्तर दूसरी क्रिया का होना पाया जाए वहाँ सप्तमी विभक्ति होती है—
i) सूर्ये अस्तं गते पक्षिण: नीडं गता:।
ii) रामे वनं गते दशरथ: प्राणान् अत्यजत्।
iii) रुदति बालके पिता कार्यालयं गत:।
- समूह में किसी एक की श्रेष्ठता के निर्धारण में सप्तमी / षष्ठी दोनों विभक्तियों का प्रयोग होता है—
i) बालकेषु बालकानां वा रमेश: श्रेष्ठ:।
ii) पक्षिषु पक्षिणां वा काक: चतुर:।
iii) वीरेषु वीराणां वा राणाप्रताप: श्रेष्ठ:।
iv) पशुषु पशूनां वा सिंहो राजा भवति।
v) धावत्सु धावतां वा कपिल: श्रेष्ठ:।
- निमित्त (कारण) अर्थ में सप्तमी विभक्ति होती है—
चर्मणि मृगं हन्ति—
- प्रवीण: (कुशल), चतुर शब्दों के प्रयोग में सप्तमी िवभिक्त होती है—
प्रवीण: (कुशल) — वीणायां प्रवीण:।
चतुर: (चतुर) — रमा वार्तालापे चतुरा।
अभ्यासकार्यम्
प्र. 1. कोष्ठकेषु मूलशब्दा: प्रदत्ता:। तेषु उचितविभक्ती: योजयित्वा रिक्तस्थानानानि पूरयत—
i) बालका: .............................. पृच्छन्ति। (अम्बा)
ii) नास्ति .............................. सम: शत्रु:। (क्रोध)
iii) .............................. भीत: बालक: क्रन्दति। (चौर)
iv) शिष्या: .............................. विद्यां गृह्णन्ति। (गुरु)
v) अहं .............................. प्राक् आगमिष्यामि। (अध्यापक)
vi) अस्माकम् बालिका: ............................ कुशला: सन्ति। (गायन)
vii) माता .............................. स्निह्यति। (शिशु)
viii) .............................. क्रोध: जायते। (काम)
ix) .............................. नम:। (सरस्वती)
x) अलम् .............................. । (विवाद)
xi) भिक्षुक: .............................. याचते। (भिक्षा)
xii) धिक् देशस्य .............................. । (शत्रु)
xiii) वीर: .............................. न विरमति। (धर्मयुद्ध)
xiv) दुर्योधन: .............................. जुगुप्सति स्म। (पाण्डव)
xv) .............................. अर्जुन: श्रेष्ठ: धनुर्धर:। (भ्रातृ)
xvi) पितरौ .............................. सर्वस्वं यच्छत:। (अस्मद्)
xvii) किम् .............................. एतत् गीतं रोचते ? (युष्मद्)
xviii) .............................. परित: वायुमण्डलम् अस्ति। (पृथ्वी)
xix) .............................. बहि: छात्रा: कोलाहलं कुर्वन्ति? (कक्षा)
xx) अहम् ....................... पूर्वं ...................... वन्दे। (शयन, ईश्वर)
xxi) परिश्रमिण: .............................. स्पृहयन्ति। (सफलता)
xxii) वाल्मीकि: .............................. रचयिता ? (रामायणम्)
xxiii) .............................. विभाति सर:। (पंकज)
प्र. 2. कोष्ठकेभ्य: शुद्धम् उत्तरं चित्वा रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत—
i) .............................. सह सीता वनम् अगच्छत्। (रामस्य/रामेण)
ii) माता .............................. स्निह्यति। (माम्/मयि)
iii) .............................. मोदकं रोचते। (मोहनम्/मोहनाय)
iv) स: .............................. धनं ददाति। (रमेशम्/रमेशाय)
v) .............................. पत्राणि पतन्ति। (वृक्षेण/वृक्षात्)
vi) अध्यापिका .................... पुस्तकं यच्छति। (सुलेखाम्/सुलेखायै)
vii) .......................... परित: वृक्षा: सन्ति। (विद्यालयम्/विद्यालयस्य)
viii) .............................. नम:। (गुरवे/गुरुम्)
प्र. 3. उचितविभक्तिप्रयोगं कृत्वा अधोलिखितपदानां सहायतया वाक्यरचनां कुरुत—
i) समम् ii) धिक्
iii) उभयत: iv) विना
v) अन्ध: vi) बहि:
vii) प्रवीण: viii) अलम्
ix) विभेति x) श्रेष्ठ:
प्र. 4. 'क' स्तम्भे शब्दा: दत्ता: सन्ति, 'ख' स्तम्भे च विभक्तय:। कस्य योगे का विभक्ति: प्रयुज्यते इति योजयित्वा लिखत—
| 'क' |
'ख' |
| i) 'रुच्' धातु योगे |
(क) तृतीया |
| ii) 'सह' शब्द योगे |
(ख) चतुर्थी |
| iii) 'नम:' शब्द योगे |
(ग) पञ्चमी |
| iv) 'भी' 'त्रा' धातु योेगे |
(घ) चतुर्थी |
| v) 'दा' धातु योगे |
(ङ) प्रथमा |
| vi) कर्तृवाच्यस्य कर्तरि |
(च) तृतीया |
| vii) कर्मवाच्यस्य कर्तरि |
(छ) चतुर्थी |
| viii) 'विना' योगे |
(ज) तृतीया |
| ix) यस्मिन् अङ्गे विकार: भवति तस्मिन् |
(झ) द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी |
| x) कर्मवाच्यस्य कर्मणि |
(ञ) प्रथमा |
प्र. 5. 'स्थूलपदानां' स्थाने शुद्धपदं लिखत—
i) अध्यापिकाया: परित: छात्रा: सन्ति। .....................................
ii) छात्र: आचार्याय प्रश्नम् पृच्छति। ..........................................
iii) सीता लेखन्या: लेखं लिखति। ..............................................
iv) गोपाल: शिवस्य सह वार्तां करोति। ........................................
v) चौरा: आरक्षिणा विभ्यति। ..................................................
vi) महापुरुषम् नम:। ..............................................................
vii) त्वाम् किम् रोचते? ............................................................
viii) कवये कालिदास: श्रेष्ठ:। .....................................................
ix) सा गृहकर्मण: निपुण:। .......................................................
x) अहम् रेलयानात् कालिकातां गमिष्यामि। ................................
