इकाई तीन
व्यावहारिक लेखन
14

कार्यालयी लेखन और प्रक्रिया
इस पाठ में...
» औपचारिक पत्र
» टिप्पण, मुख्य टिप्पण, आनुषंगिक टिप्पण
» अनुस्मारक
» अर्धसरकारी पत्र
» स्वतः स्पष्ट टिप्पणी
» कार्यसूची
» कार्यवृत्त
» प्रेस विज्ञप्ति
» परिपत्र
जवाब देना है
किसी एेरे-गैरे को नहीं
बल्कि मुझे समंदर को जवाब देना है।
–वेणु गोपाल
हिंदी कवि

आपको किसी आम सरकारी दफ़्तर में जाने का अवसर अवश्य मिला होगा जहाँ आपने कागज़ों और फ़ाइलों के ढेर देखे होंगे। ये फाइलें दफ़्तरों के कामकाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सरकारी कामकाज की गाड़ी फ़ाइलों के पहियों पर ही दौड़ती है।
किसी भी विषय पर विचार करने और उस पर निर्णय लेने के लिए उस विषय से संबंधित एक फ़ाइल होती है। उस विषय से संबंधित जो प्रस्ताव या पत्र बाहरी व्यक्तियों या दूसरे कार्यालयों से प्राप्त होते हैं उन्हें फ़ाइल की दाहिनी तरफ़ रखा जाता है। किसी प्रस्ताव या विषय पर विचार के लिए जो टिप्पणियाँ लिखी जाती हैं या मंतव्य प्रकट किए जाते हैं वे फ़ाइल की बाईं तरफ़ लगे पृष्ठों पर होते हैं।
जैसा कि अभी ऊपर बताया गया, फ़ाइल के बाईं तरफ़ का हिस्सा टिप्पण के लिए और दाहिनी तरफ़ का हिस्सा पत्र व्यवहार को संजोकर रखने के लिए होता है।
सरकारी कार्यालयों की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए इन पत्रों को कई श्रेणियों में बाँट दिया गया है। मसलन, कई पत्र सूचनाएँ माँगने या भेजने के लिए लिखे जाते हैं। कुछ पत्रों द्वारा मुख्यालय या बड़े अधिकारी अपने अधीनस्थ कार्यालयों या अधीनस्थ कर्मचारियों को आदेश भेजते हैं। कुछ पत्र अखबारों को विभागीय गतिविधियों की जानकारी देने के लिए भेजे जाते हैं। हर श्रेणी के पत्र के लिए एक विशेष स्वरूप निर्धारित कर दिया गया है। इस पाठ में हम इन्हीं अलग-अलग स्वरूपों की चर्चा करेेंगे।
इन स्वरूपों की जानकारी प्राप्त करने के लिए हम किसी कार्यालय मेें चलते हैं। आप इसका नाम जानना चाहेंगे? अजी नाम में क्या रखा है! चलिए हम इसका नाम रखते हैं अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान। यह है संस्थान का मुख्यालय जिसे महानिदेशालय के नाम से जाना जाता है। देशभर में फैले तमाम क्षेत्रीय कार्यालय इसी के नियंत्रण में आते हैं। आइए हम इसके अंदर चलें।
यह है महानिदेशालय का प्रशासन विभाग। यहाँ एक अनुभाग अधिकारी शंकरन जी पूरी गंभीरता से किसी मसले को सुलझाने में व्यस्त हैं। सामने एक पत्र पड़ा है जो मसले का केंद्रबिंदु है। पत्र मुंबई के क्षेत्रीय कार्यालय से आया हुआ है और इस प्रकार है–
औपचारिक पत्र (फ़ॉर्मल लेटर)
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान
क्षेत्रीय कार्यालय: मुंबई
फा.संख्याः मुंबई/का./5/2005/206 मुंबई, 15 मार्च 2005
सेवा में,
महानिदेशक
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान
तिलक मार्ग, नयी दिल्ली-110001
विषयः मोबाइल फ़ोन पर होने वाले व्यय के लिए निर्धारित सीमा
महोदय,
कृपया अपने परिपत्र का स्मरण करें जिसकी संख्या 24/13/प्र./2004 थी, जो 23 नवंबर, 2004 को जारी किया गया था। परिपत्र में हिदायत दी गई थी कि मोबाइल फ़ोन पर महीने में दो हज़ार से अधिक खर्च नहीं किया जाना चाहिए।
इस संबंध में निवेदन है कि मुंबई स्थित क्षेत्रीय कार्यालय की गतिविधियाँ अत्यंत व्यापक हैं। देश के तमाम फ़िल्म और टेलीविज़न निर्माता मुंबई में ही हैं। इनकी वजह से विभिन्न विधाओं के कलाकार बड़ी संख्या में मुंबई में ही निवास करते हैं। साथ ही निदेशक को देश के विभिन्न नगरों में स्थित कार्यालयों एवं क्षेत्रीय कार्यालय से भी निरंतर संपर्क में रहना पड़ता है। साथ ही संस्थान की गतिविधियों के लिए प्रायोजक जुटाने के सिलसिले में देश के विभिन्न औद्योगिक संगठनों से भी लगातार बात करनी पड़ती है।
ऊपर बताए तथ्यों की वजह से दो हज़ार रुपए मासिक की सीमा मुंबई कार्यालय के लिए कम पड़ रही है। पिछले छह महीनों से यह देखा जा रहा है कि मासिक खर्च छह हज़ार रुपये के आसपास आता है।
अतः निवेदन है कि मुंबई कार्यालय की विशेष स्थिति को ध्यान में रखते हुए मोबाइल फ़ोन पर मासिक खर्च की सीमा बढ़ाकर छह हज़ार रुपये कर दी जाए।
भवदीय
![]()
(राकेश कुमार)
निदेशक
शंकरन जी ने पत्र को पढ़कर बुरा-सा मुँह बनाया। वे पत्र में बताए गए कारणों से कतई सहमत नहीं थे। उन्हें लग रहा था कि खर्च की सीमा को बढ़ाना फ़िजूलखर्ची को दावत देना है। अगर एक जगह ढील दे दी जाए तो एेसी दस माँगें लेकर लोग सामने आ जाते हैं। लेकिन यह तो उनकी व्यक्तिगत राय थी।
दफ़्तर का एक अपना तरीका होता है और निर्णय में अन्य दूसरे लोगों की भी भूमिका होती है। लिहाज़ा उन्होंने वह पत्र अपने सहायक ज्ञान प्रकाश जी को इस निर्देश के साथ भेजा कि इस पर आवश्यक कार्रवाई की जाए।
ध्यान देने की बातें
» सरकारी पत्र औपचारिक पत्र की श्रेणी में आते हैं।
» प्रायः ये पत्र एक कार्यालय, विभाग अथवा मंत्रालय से दूसरे कार्यालय, विभाग या मंत्रालय को लिखे जाते हैं।
» पत्र के शीर्ष पर कार्यालय, विभाग या मंत्रालय का नाम व पता लिखा
जाता है।
» पत्र के बाईं तरफ़ फ़ाइल संख्या लिखी जाती है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि पत्र किस विभाग द्वारा किस विषय के तहत कब लिखा जा रहा है।
» जिसे पत्र लिखा जा रहा है उसका नाम, पता आदि बाईं तरफ़ लिखा जाता है। कई बार अधिकारी का नाम भी दिया जाता है।
» ‘सेवा में’ का प्रयोग धीरे-धीरे कम हो रहा है।
» ‘विषय’ शीर्षक के अंतर्गत संक्षेप में यह लिखा जाता है कि पत्र किस प्रयोजन के लिए या किस संदर्भ में लिखा जा रहा है।
» विषय के बाद बाईं तरफ़ ‘महोदय’ संबोधन लिखा जाता है।
» पत्र की भाषा सरल एवं सहज होनी चाहिए। क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए।
» अनेक बार सटीक अर्थ प्रेषित करने के लिए प्रशासनिक शब्दावली का प्रयोग करना ही उचित होता है।
» इस पत्र के बाईं ओर प्रेषक का पता और तारीख दी जाती है।
» पत्र के अंत में ‘भवदीय’ शब्द का प्रयोग अधोलेख के रूप में होता है।
» भवदीय के नीचे पत्र भेजने वाले के हस्ताक्षर होते हैं। हस्ताक्षर के नीचे कोष्ठक में पत्र लिखने वाले का नाम मुद्रित होता है। नाम के नीचे पदनाम लिखा जाता है।
ज्ञान प्रकाश जी खुर्राट सहायकों में से एक हैं। विभाग में लंबे अर्से से हैं और इस वजह से वे विभागीय ज्ञान के भंडार हैं। उन्हें कार्यालय नियमावली की चलती-फिरती लाइब्रेरी कहना कोईं अतिशयोक्ति नहीं होगी।
ज्ञान प्रकाश जी ने तुरंत वह फ़ाइल निकाली जो मोबाइल फ़ोन के खर्च में कटौती से संबंधित थी। फ़ाइल और इसमें लगे परिपत्र उन्हें मुखाग्र थे। फिर भी उन्होंने उन पर एक नज़र डालने के बाद फ़ाइल पर कुछ इस प्रकार की टिप्पणी लिखी–
मुख्य टिप्पण (नोटिंग)
यह टिप्पणी मुंबई स्थित क्षेत्रीय कार्यालय के निदेशक के उस पत्र से संबंधित है जिसकी फ़ा.संख्या मुंबई/का./5/2005 है और जो दिनांक 15 मार्च, 2005 को भेजी गई है। पत्र में ये निदेशक ने मोबाइल फ़ोन के मासिक व्यय पर लगाई गई सीमा को दो हज़ार रुपये से छह हज़ार रुपये तक बढ़ाए जाने का आग्रह किया है।
इस संदर्भ में महानिदेशालय द्वारा दिनांक 23 नवंबर, 2004 को जारी परिपत्र पर ध्यान देना आवश्यक है जो इस फ़ाइल की पृष्ठ संख्या 12 पर है। इस परिपत्र में खर्च की सीमा दो हज़ार रुपये निर्धारित कर दी गई है और किसी भी परिस्थिति में किसी प्रकार की छूट का प्रावधान नहीं है।
इस सिलसिले में कृपया इस फ़ाइल में इसी विषय पर की गई पहले की टिप्पणी को देखें जो पृष्ठ संख्या 8/टिप्पण पर है। टिप्पणी को पढ़ने से स्पष्ट है कि खर्च की सीमा का निर्धारण सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद सोच समझकर लिया गया है।
यह भी विचारणीय है कि खर्च की सीमा बोर्ड की स्वीकृति से निर्धारित हुई है और बिना बोर्ड की अनुमति के इसमें किसी भी प्रकार का बदलाव संभव नहीं है।
विचारार्थ प्रस्तुत
![]()
अनुभाग अधिकारी (ज्ञान प्रकाश)
सहायक
ध्यान देने की बातें
» किसी भी विचाराधीन पत्र अथवा प्रकरण को निपटाने के लिए उस पर जो राय, मंतव्य, आदेश अथवा निर्देश दिया जाता है वह टिप्पणी कहलाती है।
» टिप्पणी शब्द अंग्रेजी के नोटिंग शब्द के अर्थ में प्रयुक्त होता है। टिप्पणी लिखने की प्रक्रिया को हम टिप्पण यानी नोटिंग कहते हैं।
» टिप्पणी का उद्देश्य उन तथ्यों को स्पष्ट तथा तर्कसंगत रूप से प्रस्तुत करना है जिन पर निर्णय लिया जाना है। साथ ही उन बातों की ओर भी संकेत करना है जिनके आधार पर उक्त निर्णय संभवतः लिया जा सकता है।
» टिप्पण का उद्देश्य मामलों को नियमानुसार निपटाना है।
» टिप्पण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं–सहायक स्तर पर टिप्पण तथा अधिकारी स्तर पर टिप्पण।
» कार्यालय में टिप्पण कार्य अधिकतर सहायक स्तर पर होता है।
» इसे आरंभिक टिप्पण या मुख्य टिप्पण कहते हैं जिसमें सहायक विचाराधीन मामले का संक्षिप्त ब्योरा देते हुए उसका विवेचन करता है।
» इस प्रकार के टिप्पण में सबसे पहले मूल पत्र या आवती में दिए गए विवरण या तथ्य का सार दिया जाता है। फिर निहित प्रस्ताव की व्याख्या की जाती है और संबंधित नियमों-विनियमों का हवाला देते हुए अपनी राय दी जाती है।
» टिप्पणी लिखने के बाद सहायक अधिकारी दाहिनी ओर अपने हस्ताक्षर कर उसे अपने अधिकारी के सम्मुख प्रस्तुत करता है। जिस अधिकारी को प्रस्तुत किया जाना है उसका पदनाम वहाँ बाईं ओर लिखा जाता है।
» टिप्पणी लिखने से पूर्व सहायक के लिए संबंधित विषय को समझना बहुत आवश्यक होता है।
» टिप्पणी अपने आप में पूर्ण एवं स्पष्ट होनी चाहिए। इसमें असली मुद्दे पर अधिक बल देना चाहिए।
» टिप्पणी संक्षिप्त, विषय-संगत, तर्कसंगत और क्रमबद्ध होनी चाहिए।
» टिप्पणकार को अपने विचार संतुलित एवं शिष्ट भाषा में देने चाहिए। इसमें व्यक्तिगत आक्षेप, उपदेश या पूर्वाग्रहों के लिए कोई स्थान नहीं होता।
» टिप्पणी सदैव अन्य पुरुष में लिखी जाती है।
श्री ज्ञान प्रकाश जी के ज्ञान से प्रकाशित होने के बाद फ़ाइल अब शंकरन जी के पास आ गई। वे तो पहले से ही भरे बैठे थे।
ज्ञान प्रकाश जी की टिप्पणी को पढ़ने के बाद उनकी बाछें खिल गईं। ज्ञान प्रकाश जी की मुख्य टिप्पणी के नीचे उन्होंने अपनी आनुषंगिक टिप्पणी कुछ इस प्रकार से दर्ज की–
आनुषंगिक टिप्पणी
मैं ऊपर लिखी टिप्पणी से सहमत हूँ, साथ ही इस ओर भी ध्यान दिलाना चाहूँगा कि मुंबई कार्यालय के निदेशक पिछले छह महीने से निर्धारित सीमा से अधिक खर्च करते रहे हैं, जो परिपत्र का उल्लंघन है। चूँकि परिपत्र में किसी प्रकार की छूट का प्रावधान नहीं है। अतः अतिरिक्त राशि निदेशक द्वारा देय होनी चाहिए। यह राशि निदेशक के वेतन से काटी जा सकती है।
विचारार्थ
![]()
(जी. शंकरन)
उपनिदेशक (प्रशासन) अनुभाग अधिकारी
ध्यान देने की बातें
» सहायक, आरंभिक या मुख्य टिप्पणी को जब संबंधित अधिकारी के पास भेजता है तो वह अधिकारी टिप्पणी पढ़ने के बाद नीचे मंतव्य लिखता है। इसे आनुषंगिक टिप्पणी कहते हैं और यह क्रिया आनुषंगिक टिप्पण कहलाती है।
» अगर अधिकारी अपने अधीनस्थ की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत है तो इस प्रकार की टिप्पणी की आवश्यकता नहीं होती। अधिकारी अधीनस्थ की टिप्पणी के नीचे या तो केवल हस्ताक्षर भर करता है या ‘मैं उपर्युक्त टिप्पणी से सहमत हूँ’, लिखता है।
» अगर अधिकारी अपने अधीनस्थ की टिप्पणी से पूरी तरह सहमत है मगर उसे और सशक्त एवं तर्कसंगत बनाने के लिए अपनी ओर से भी कुछ जोड़ना चाहता है तो वह अपना मंतव्य आनुषंगिक टिप्पणी के रूप में दर्ज कर देता है।
» यदि अधिकारी पूर्णतः असहमत है या आंशिक रूप से सहमत है तो वह अपने तर्क और कारणों के साथ अपनी आनुषंगिक टिप्पणी करता है।
» अधिकारी को अधीनस्थ की टिप्पणी को काटने, बदलने या हटाने का अधिकार नहीं है। वह केवल अपनी सहमति, आंशिक सहमति या असहमति व्यक्त कर सकता है।
» आनुषंगिक टिप्पणी प्रायः संक्षिप्त होती है लेकिन असहमति की स्थिति में कई बार इस प्रकार की टिप्पणी बड़ी भी हो सकती है।
अब फ़ाइल एक और सीढ़ी चढ़कर राजकुमार शर्मा जी की मेज़ पर आ गई जो उपनिदेशक (प्रशासन) हैं। कामकाज को वे बड़ी ही दक्षता और फुर्ती से निपटाते हैं, वे नियमों के पाबंद हैं और उसमें कोताही उन्हें पसंद नहीं। जब भी कोई फ़ाइल उन तक पहुँचती है, तो वे उसमें किसी गोताखोर की तरह डुबकी लगाते हैं और मोती निकाल लाते हैं। इस फ़ाइल की गहराई में भी वे कुछ इसी प्रकार उतरे। विचार के जो मोती निकले उसे उन्होंने फ़ाइल पर इस प्रकार जड़ा–
मैं सहायक से सहमत हूँ। साथ ही यह भी जोड़ना चाहूँगा कि 23 नवंबर, 2004 को जब परिपत्र जारी किया गया था तब कॉल की दरें ज़्यादा थीं जो अब काफ़ी गिर चुकी हैं। एेसे में यह साफ़ है कि प्रकारांतर से निर्धारित व्यय सीमा अपने आप ही बढ़ गई है। इसे और घटा दिया जाए तो संस्था के खर्च में कमी आएगी जो लोकहित में होगा।
मैं अनुभाग अधिकारी के इस सुझाव से सहमत नहीं हूँ कि सीमा से अधिक की धन राशि निदेशक के वेतन से वसूली जानी चाहिए। लेकिन उनसे विस्तार में स्पष्टीकरण माँगा जा सकता है।
विचारार्थ
![]()
(राज कुमार शर्मा)
उपमहानिदेशक (प्रशासन) उपनिदेशक (प्रशासन)
फ़ाइल अब गुफ़रान अहमद, उप महानिदेशक (प्रशासन) के पाले में थी। उन्होंने फ़ाइल को पढ़ने के बाद सहमति स्वरूप हस्ताक्षर कर दिए। फ़ाइल का अगला पड़ाव महानिदेशक के पास था। मणिकांत मंडल, महानिदेशक थे। अपनी पूरी व्यस्तता के बावजूद वे हर फ़ाइल पूरी गहराई से पढ़ते थे। दफ़्तर में दस घंटे बैठने पर भी काम का बोझ बना रहता था और जब वे देर रात घर लौटते तो फ़ाइलों का गट्ठर साथ-साथ जाता। घर आई फ़ाइलें उनकी पत्नी को सौत की तरह लगतीं मगर वह भी थक-हारकर समझौता कर चुकी थीं।
मंडल जी एक अनुभवी और सुलझे इंसान थे। फ़ाइल पढ़कर उन्होंने महसूस किया कि नीचे के अधिकारियों ने नियमानुसार सही टिप्पणी लिखी है। लेकिन वे मुंबई कार्यालय के निदेशक के पक्ष से भी सहमत थे। दौरे पर मुंबई आते-जाते उन्हें वहाँ की परिस्थितियों का ज्ञान था। उन्होंने सोच-विचार के बाद अपनी टिप्पणी इस प्रकार लिखी।
खर्च की सीमा संबंधी परिपत्र तैयार करने के क्रम में अलग-अलग केंद्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में नहीं रखा गया है। मुंबई की तुलना अन्य स्थानों से नहीं हो सकती। अतः मुंबई के लिए खर्च की सीमा बढ़ा कर छह हज़ार रुपए प्रतिमास करना युक्तिसंगत प्रतीत होता है।
चूँकि मासिक व्यय संबंधी पिछला परिपत्र बोर्ड की अनुमति के बाद जारी किया गया था। अतः बोर्ड की अगली बैठक में इस पूरे मसले को प्रस्तुत कर उनकी अनुमति ली जानी चाहिए।
(मणिकांत मंडल)
उपमहानिदेशक (प्रशासन) महानिदेशक
उधर अपने पत्र का कोई जवाब न पा कर मुंबई केंद्र के निदेशक राकेश कुमार जी चिंता में पड़ गए। उन्होंने महानिदेशालय को अपनी पहली चिट्ठी की याद दिलाने के लिए स्मरण पत्र या अनुस्मारक (रिमाइंडर) भेजा जो इस प्रकार था–

अनुस्मारक या स्मरण पत्र
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान
क्षेत्रीय कार्यालय: मुंबई
फा.संख्याःमुंबई/वा/5/2005/372 मुंबई, 26 अप्रैल, 2005
सेवा में,
महानिदेशक
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान,
तिलक मार्ग, नयी दिल्ली 110001
विषय: मोबाइल फ़ोन पर होने वाले व्यय के लिए निर्धारित सीमा।
महोदय,
कृपया उपर्युक्त विषय पर इस कार्यालय द्वारा भेजे गए समसंख्यक पत्र का स्मरण करें जो 15 मार्च,2005 को भेजा गया था।
निवेदन है कि मोबाइल फ़ोन की मासिक व्यय सीमा को बढ़ाने संबंधी इस कार्यालय के अनुरोध पर विचार कर कृपया आवश्यक स्वीकृति जारी की जाए।
भवदीय
(राकेश कुमार)
निदेशक
ध्यान देने की बातें
» जब किसी पत्र, ज्ञापन इत्यादि का उत्तर समय पर प्राप्त नहीं होता तो याद दिलाने के लिए ‘अनुस्मारक’ भेजा जाता है। इसे ‘स्मरण पत्र’ भी कहते हैं।
» इसका प्रारूप औपचारिक पत्र की तरह ही होता है मगर आकार छोटा होता है।
» अनुस्मारक के शुरू में पूर्व पत्र का हवाला दिया जाता है।
» जब एक से अधिक अनुस्मारक भेजे जाते हैं, तो पहले अनुस्मारक को ‘अनुस्मारक-1’, दूसरे को ‘अनुस्मारक-2’, तीसरे को ‘अनुस्मारक-3’ इत्यादि लिखते हैं।
महानिदेशक ने इस अनुस्मारक को गुफ़रान अहमद, उपमहानिदेशक के पास इस हिदायत के साथ भेजा कि मुंबई कार्यालय के निदेशक को एक अंतरिम उत्तर भेज दिया जाए।
गुफ़रान अहमद के पास फ़ाइल भी लौट चुकी थी। महानिदेशक ने निचले अधिकारियों द्वारा की गई अनुशंसा को बिलकुल ही उलट दिया था। यह बात एक क्षण के लिए गुफ़रान अहमद को चुभी तो ज़रूर, लेकिन अनुभव ने उन्हें अच्छी तरह सिखा दिया था कि कार्यालय के दैनिक कार्यव्यापार में एेसी उलट-फेर होती ही रहती है और इसे खेल भावना से ही लिया जाना चाहिए। उन्होंने तय किया कि बोर्ड की स्वीकृति के लिए भेजी जाने वाली टिप्पणी वे स्वयं ही तैयार करेंगे, और राकेश कुमार को अंतरिम उत्तर भी खुद ही भेजेंगे। मुंबई केंद्र के निदेशक राकेश कुमार को उन्होंने एक अंतरिम उत्तर अर्धसरकारी पत्र (डी.ओ. लेटर) के रूप में कुछ इस प्रकार भेजा–
अर्धसरकारी पत्र
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान
महानिदेशालय
नयी दिल्ली, 4 मई, 2005
फा.संख्याः3/2/2005/ प्र.
गुफ़रान अहमद,
उपमहानिदेशक
प्रिय श्री कुमार,
कृपया 15 मार्च, 2005 और 26 अप्रैल, 2005 को भेजे गए अपने पत्रों का स्मरण करें, जो मोबाइल फ़ोन पर किए जाने वाले मासिक व्यय की सीमा बढ़ाने के बारे में थे।
आपके अनुरोध पर कार्रवाई की जा रही है। चूँकि व्यय सीमा में बढ़ोतरी के लिए बोर्ड की अनुमति आवश्यक है अतः हम इस मसले को बोर्ड की अगली बैठक में प्रस्तुत करेंगे।
इस मसले पर बोर्ड के निर्णय से हम आपको अवगत करा देंगे।
शुभकामनाओं सहित
आपका
![]()
(गुफ़रान अहमद)
निदेशक
श्री राकेश कुमार
दूरदर्शन केंद्र, मुंबई
ध्यान देने की बातें
» औपचारिक-पत्र के विपरीत अर्ध-सरकारी पत्र में अनौपचारिकता का पुट होता है। इसमें एक मैत्री भाव होता है।
» अर्ध-सरकारी पत्र तब लिखे जाते हैं जब लिखने वाला अधिकारी संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत स्तर पर जानता है।
» इस प्रकार का पत्र एेसी स्थिति में भी लिखा जाता है जब किसी खास मसले पर संबोधित अधिकारी का ध्यान व्यक्तिगत रूप से आकर्षित कराया जाता है या उसका व्यक्तिगत परामर्श लिया जाए।
» प्रारूप में बाईं ओर शीर्ष पर प्रेषक का नाम होता है। इसके नीचे उसका पदनाम होता है।
» अर्ध-सरकारी पत्र के लिए अमूमन कार्यालय के ‘लेटर हेड’ का प्रयोग होता है, अगर उपलब्ध हो।
» पत्र के प्रारंभ में संबोधन के रूप में महोदय या प्रिय महोदय का प्रयोग नहीं होता। एेसे पत्र में आमतौर पर प्रयोग किया जाने वाला संबोधन ‘प्रिय श्री...’ या ‘प्रियवर श्री..., हो सकता है।
» पत्र के अंत में अधोलेख के रूप में दाहिनी ओर ‘भवदीय’ के स्थान पर ‘आपका’ का प्रयोग किया जाता है।
» अंत में बाईं ओर संबोधित अधिकारी का नाम, पदनाम और पूरा पता दिया जाता है।
गुफ़रान अहमद की अगली जवाबदेही इस मसले को बोर्ड के समक्ष रखने की थी। उन्होंने पूरी फ़ाइल को विस्तार से पढ़ा और बोर्ड के विचारार्थ एक विस्तृत टिप्पणी तैयार की जिसमें पूरे मसले की पृष्ठभूमि और निदेशक के अनुरोध के औचित्य का विश्लेषण था और अंत में यह सिफ़ारिश की गई थी कि मुंबई केंद्र के लिए सीमा बढ़ा दी जाए। टिप्पणी इस प्रकार थीः
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड की पचपनवीं बैठक के विचारार्थ प्रस्तुत टिप्पणी
विषय: मोबाइल फ़ोन के लिए निर्धारित व्यय सीमा
बोर्ड ने 12 नवंबर, 2004 को हुई अपनी तैंतालीसवीं बैठक में निर्णय लिया था कि विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों के निदेशकों को कार्यालय द्वारा प्रदान मोबाइल फ़ोन पर किए जाने वाले खर्च की सीमा दो हज़ार रुपए प्रतिमाह हो (बैठक के कार्यवृत्त का संबंधित अंश संलग्न है)।
बोर्ड के निर्णय का पालन करते हुए महानिदेशालय ने इस संबंध में 23 नवंबर, 2004 को एक परिपत्र जारी किया था। जिसकी एक प्रति संलग्न है।
संस्थान के मुंबई स्थित क्षेत्रीय कार्यालय में एेसा महसूस किया जा रहा है कि यह सीमा कार्यालय के दक्ष, सुचारु और प्रभावी संचालन में बाधक बन रही है।
निदेशक ने सूचित किया है कि कार्यालय की गतिविधियों में निरंतर वृद्धि हुई है। जिसकी वजह से निदेशक को मोबाइल फ़ोन का अत्यधिक प्रयोग करना पड़ रहा है। उन्हें विभिन्न विशेषज्ञों, कलाकारों, साहित्यकारों, संगीतकारों, प्रायोजकों, वरिष्ठ अधिकारियों, सहकर्मियों और अन्य कर्मियों के साथ निरंतर संपर्क में रहना पड़ता है।
कार्यालय की गतिविधियों में जो बढ़ोतरी हुई है उससे कार्यालय का राजस्व भी बढ़ा है। एेसे में यह आवश्यक प्रतीत होता है कि केंद्र के अनुरोध को स्वीकार करते हुए उनकी मासिक व्यय सीमा दो हज़ार रुपये से बढ़ा कर छह हज़ार रुपये कर दी जाए।
बोर्ड के विचारार्थ प्रस्तुत
ध्यान देने की बातें
» यह अपने स्वरूप में आरंभिक या मुख्य टिप्पणी से काफ़ी मिलती है।
» चूँकि यह टिप्पणी फ़ाइल के ऊपर लिख कर स्वतंत्र रूप से भेजी जाती है अतः इसके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि यह अपने आप में संपूर्ण हो और केवल इस टिप्पणी को पढ़ लेने भर से पूरा मसला समझ में आ जाए।
» यदि आवश्यक हो तो संदर्भ के लिए किसी पिछली टिप्पणी, पत्र, ज्ञापन इत्यादि को संलग्नक के रूप में टिप्पणी के साथ लगाया जा सकता है।
» बोर्ड के पास भेजी जाने वाली स्वतः स्पष्ट टिप्पणी किसी मसले पर बोर्ड की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए होती है। इसके लिए प्रारंभ में मसले की पृष्ठभूमि दी जाती है और उसके विभिन्न पहलुओं का विवेचन किया जाता है। इसके बाद स्वीकृति क्यों दी जानी चाहिए उसके समर्थन में तर्क दिए जाते हैं। अंत में स्वीकृति प्रदान किए जाने का अनुरोध होता है।

श्री गुफ़रान अहमद ने बोर्ड को भेजी जाने वाली टिप्पणी के मसौदे को महानिदेशक के पास स्वीकृति के लिए भेजा। स्वीकृति मिलते ही यह टिप्पणी बोर्ड के सचिव श्री विष्णु सहाय के पास इस अनुरोध के साथ भेज दी गई कि इसे बोर्ड की पचपनवीं बैठक के समक्ष स्वीकृति के लिए प्रस्तुत कर दिया जाए जो 17 मई, 2005 को निर्धारित है।
श्री सहाय को जब यह अनुरोध मिला तो वे 17 मई को होने वाली बैठक की कार्यसूची बना रहे थे। उन्होंने इस मुद्दे को भी कार्य सूची में शामिल कर लिया। कार्यसूची (एजेंडा) इस प्रकार थी–
कार्यसूची
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड की पचपनवीं बैठक की कार्यसूची
1. चौवनवीं बैठक के कार्यवृत्त की संपुष्टि
2. पिछली बैठकों के लिए किए गए निर्णयों के अनुपालन की समीक्षा
3. लेखकों, कलाकारों और विशेषज्ञों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक की समीक्षा
4. संस्थान द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की गुणवत्ता बढ़ाए जाने संबंधी प्रतिवेदन पर चर्चा
5. मोबाइल फ़ोन पर होने वाले मासिक व्यय पर लगाई गई सीमा की समीक्षा
6. अध्यक्ष की अनुमति से किसी भी अन्य विषय पर विमर्श
बोर्ड की बैठक अपनी निर्धारित तिथि यानी 17 मई 2005 को संपन्न हो गई। यह बोर्ड एक शीर्ष संगठन था जिसका काम अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संगठन के कामकाज पर निगरानी रखना और इसके लिए आवश्यक नीतियाँ तय करना था। इस बोर्ड में संस्थान के उच्च अधिकारियों के अलावा बाहरी सदस्य भी थे जो अपने-अपने क्षेत्रों के जाने-माने लोग थे। इन्होंने पूरे मसले पर जम कर चर्चा की और हर पक्ष को अच्छी तरह जाँचा परखा और बैठक की समाप्ति के बाद बोर्ड के सचिव श्री विष्णु सहाय ने बैठक का कार्यवृत्त तैयार किया जो इस प्रकार था–
ध्यान देने की बातें
किसी भी संस्था की औपचारिक बैठक की कार्यसूची उस बैठक में चर्चा के लिए निर्धारित विषयों की अग्रिम जानकारी देती है। इससे बैठक के अनुशासित संचालन में सहायता मिलती है।
निर्धारित विषयों से संबंधित स्वतः स्पष्ट टिप्पणियाँ अपने संलग्नकों के साथ सदस्यों को कार्यसूची के साथ अग्रिम रूप से भेजी जानी चाहिए ताकि वे बैठक में पूरी तैयारी से आ सकें।
कार्यवृत्त (मिनिट्स)
दिनांक 17 मई, 2005 को आयोजित अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड की पचपनवीं बैठक का कार्यवृत्त
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड की पचपनवीं बैठक बोर्ड मुख्यालय के समिति कक्ष में दिनांक 17 मई, 2005 को संपन्न हुई। बैठक की अध्यक्षता बोर्ड के अध्यक्ष श्री नरेंद्र देसाई ने की। बैठक में भाग लेने वाले माननीय सदस्यों की सूची इस प्रकार है–
1. विंसेंट अब्राहम, मुख्य कार्यकारी
2. श्रीमती देविका घोषाल, सदस्य (वित्त)
3. श्री राजकुमार मीना, सदस्य (कार्मिक)
4. श्री अक्षय पटनायक, सदस्य (योजना एवं विकास)
5. श्री मणिकांत मंडल, महानिदेशक, अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान
6. श्रीमती राधिका बरुआ, सदस्य
7. श्री सुदीप हेम्ब्रम, सदस्य
8. श्री आर. कृष्णास्वामी, सदस्य
कार्रवाई के प्रारंभ में अध्यक्ष ने अपनी दक्षिण अफ्रीका यात्रा की चर्चा करते हुए वहाँ की संस्कृति पर भूमंडलीकरण के प्रभावों का ज़िक्र किया। उन्होंने यह भी बताया कि दक्षिण अफ्रीका के अनुभवों से हम क्या सबक ले सकते हैं।
उपर्युक्त सामान्य चर्चा के बाद बैठक की कार्यसूची में वर्णित विषयों पर विमर्श हुआ जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है–
1. चौवनवीं बैठक के कार्यवृत्त की संपुष्टि।
बोर्ड ने चौवनवीं बैठक के कार्यवृत्त की संपुष्टि कर दी। इसमें लिए गए निर्णयों के अनुपालन पर एक प्रतिवेदन अगली बैठक में प्रस्तुत किया जाएगा।
2. पिछली बैठकों में लिए गए निर्णयों के अनुपालन की समीक्षा।
बोर्ड ने पिछली बैठक में लिए गए निर्णयों के अनुपालन संबंधी प्रतिवेदन की विस्तार से समीक्षा की। जहाँ उन्होंने यह संतोष व्यक्त किया कि अधिकांश निर्णयों का पूर्ण रूप से अनुपालन हो चुका है वहीं उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि जिन निर्णयों का अनुपालन शेष है उन्हें अगली बैठक के पहले कार्यान्वित कर दिया जाना चाहिए।
3. लेखकों, कलाकारों और विशेषज्ञों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक की समीक्षा।
बोर्ड ने लेखकों, कलाकारों और विशेषज्ञों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक पर विस्तृत चर्चा की। एेसा महसूस किया गया कि लेखकों, कलाकारों और विशेषज्ञों को दिया जाने वाला मौजूदा पारिश्रमिक पाँच वर्ष पूर्व निर्धारित किया गया था, जो समय और परिस्थितियों के आलोक में अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। अतः पारिश्रमिक की दरों में वृद्धि अत्यावश्यक है ताकि अच्छे लेखक, कलाकार और विशेषज्ञ, संस्थान से जुड़े रहें और उनका सर्वश्रेष्ठ योगदान संस्थान को प्राप्त हो। इस संबंध में बोर्ड ने संस्थान द्वारा प्रस्तावित नयी दरों पर दृष्टि डाली और उन्हें संतोषजनक पाते हुए अपनी स्वीकृति दे दी। बोर्ड ने यह भी टिप्पणी की कि ये दरें अविलंब लागू की जानी चाहिए।
4. संस्थान द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की गुणवत्ता बढ़ाए जाने संबंधी प्रतिवेदन पर चर्चा बोर्ड ने संस्थान द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की गुणवत्ता बढ़ाए जाने संबंधी राधानंदन समिति की सिफ़ारिशों पर भी चर्चा की। बोर्ड ने महसूस किया कि इन सिफ़ारिशों का अध्ययन और भी गहनता से किया जाना चाहिए। इसके लिए बोर्ड ने श्रीमती देविका घोषाल, सदस्य (वित्त) की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति के अन्य सदस्य श्री सुदीप हेम्ब्रम और श्री आर. कृष्णास्वामी होंगे। समिति अपनी रिपोर्ट दो माह के अंदर देगी।
5. मोबाइल फ़ोन पर होनेवाले व्यय पर लगाई गई सीमा की समीक्षा समिति ने इस मुद्देे पर विचार करते हुए संबंधित प्रस्ताव को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी।
बैठक में यह निर्णय भी लिया गया कि बोर्ड की अगली बैठक 14 और 15 जुलाई, 2005 को बंगलौर में होगी।
बोर्ड में लिए गए फ़ैसले के अनुसार लेखकों, कलाकारों और विशेषज्ञों के पारिश्रमिक में बढ़ोतरी के संबंध में एक प्रेस विज्ञप्ति भी जारी करनी थी। उन्होंने जनसंपर्क अधिकारी श्री देवेन्द्र शर्मा से इस बारे में अनुरोध किया। श्री शर्मा ने जो विज्ञप्ति जारी की वह इस प्रकार थी–
ध्यान देने की बातें
»कार्यसूची में रेखांकित कार्यों पर हुए विचार-विमर्श का संक्षिप्त विवरण कार्यवृत्त में प्रस्तुत किया जाता है।
»इसमें क्रमशः उपस्थित लोगों की राय का पूरा विवरण दिया जाना चाहिए।
»उपस्थित व्यक्तियों के नाम पदानुसार दिए जाने चाहिए।
प्रेस विज्ञप्ति (प्रेस रिलीज़)
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड
प्रेस विज्ञप्ति
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान द्वारा आयोजित कार्यक्रमों से जुड़े लेखकों और कलाकारों के पारिश्रमिक में वृद्धि
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड ने निर्णय लिया है कि अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान द्वारा आयोजित कार्यक्रमों से जुड़े लेखकों, कलाकारों और विशेषज्ञों के पारिश्रमिक में तत्काल प्रभाव से वृद्धि कर दी जाए।
ध्यान दें कि इसके पूर्व लेखकों, कलाकारों के पारिश्रमिक में सन् 2000 में संशोधन किया गया था। पिछले कुछ समय से लेखकों और कलाकारों द्वारा यह शिकायत की जा रही थी कि संस्थान द्वारा दिए जाने वाले पारिश्रमिक की राशि बहुत कम है जिनके कारण अच्छी प्रतिभाएँ संस्थान से विमुख हो रही हैं।
लेखकों और कलाकारों की शिकायतों को ध्यान में रखते हुए बोर्ड ने पारिश्रमिक की बढ़ी दरों को मंज़ूरी देते हुए यह विश्वास व्यक्त किया है कि इससे अच्छी प्रतिभाओं को आकर्षित करने में तो मदद मिलेगी ही कार्यक्रमों की गुणवत्ता में भी सुधार होगा।
ध्यान देने की बातें
कोई संस्थान या व्यक्ति किसी विषय या किसी बैठक में जो निर्णय लेता है, उसे प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से सर्वसामान्य तक पहुँचाया जाता है। निर्णय में विलंब का कारण और उससे होने वाले लाभ के बारे में भी जानकारी दी जाती है।
हम प्रेस विज्ञप्ति के चक्कर में मुख्य कथानक से हट गए हैं। आइए वापस लौटें। वैसे अब पटाक्षेप ही शेष है और यह काम गुफ़रान अहमद जी को सौंपा गया है। उन्हें बोर्ड के व्यय सीमा संबंधी फ़ैसले को कार्यान्वित करने के लिए एक परिपत्र जारी करना है। इस कथानक की चरम परिणति इस परिपत्र (सर्कुलर) के रूप में हुई–
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति संस्थान
महानिदेशालय
पत्रांक: 24/13/प्र.2005 नयी दिल्ली, 27 मई 2005
परिपत्र
विषय: मोबाइल फ़ोन पर होने वाले व्यय के लिए निर्धारित सीमा
महानिदेशालय ने उपर्युक्त विषय पर दिनांक 23 नवंबर, 2004 को एक समसंख्यक परिपत्र जारी किया था।
उपर्युक्त परिपत्र द्वारा मोबाइल फ़ोन पर होने वाले व्यय की सीमा दो हज़ार रुपए प्रतिमाह निर्धारित की गई थी।
अखिल भारतीय साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड द्वारा इस सीमा पर पुनर्विचार किया गया। तद्नुसार उपर्युक्त परिपत्र में आंशिक संशोधन करते हुए यह निर्णय लिया गया है कि मुंबई क्षेत्रीय कार्यालय के लिए यह सीमा छह हज़ार रुपये प्रतिमाह होगी।
उपर्युक्त परिपत्र के अन्य प्रावधान पूर्ववत रहेंगे।
यह निर्णय तत्काल प्रभाव से लागू होगा।
अभ्यास
पाठ से संवाद
1. नीचे कुछ स्थितियाँ दी गई हैं। इनमें आप पत्राचार के किस रूप का प्रयोग करेंगे ? लिखिए-
(क) किसी सरकारी-पत्र की कार्रवाई के रूप में फ़ाइल शुरू करके विषय का निपटान करना।
(ख) विचाराधीन मामलों को निपटाने के लिए लिखित सुझाव देना।
(ग) जब सरकार को जन-सामान्य तक कोई सूचना पहुँचानी हो।
(घ) किसी विभाग को कोई सूचना अपने विभाग के कर्मचारियों, अधिकारियों को देनी हो।
(ङ) विभाग द्वारा श्रीमती रूपाली को अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान का डिप्लोमा करने संबंधी अनुमति प्रदान करना।
(च) मंत्रालय द्वारा श्रीमती सुलेखा को शिक्षा-शिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने संबंधी सूचना देना।
(छ) किसी कार्य का अनुपालन न होने की स्थिति में उसके बारे में पुनः स्मरण कराना।
(ज) अपने समकक्ष अधिकारी से किसी संदर्भ में परामर्श लेना।
2. आप राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.फ़िल करना चाहते हैं। विभाग से एम.फ़िल करने की अनुमति प्राप्त करने के लिए पत्र लिखिए।
3. विद्यालय में हुए पुरस्कार वितरण समारोह का कार्यवृत्त तैयार कीजिए।
ध्यान देने की बातें
बैठक में लिए गए महत्त्वपूर्ण निर्णयों को कार्यान्वित करने के लिए परिपत्र जारी किया जाता है। जिस मुद्दे को लेकर पहला परिपत्र जारी किया जाता है उस मुद्दे पर होने वाला फ़ैसला भी परिपत्र के रूप में जारी किया जाता है जिसमें निर्णय को कार्यान्वित किए जाने के निर्देश होते हैं।
4. निम्नलिखित पत्र को ध्यानपूर्वक पढ़िए।
भारतीय रिज़र्व बैंक
नयी दिल्ली
कार्यपालक निदेशक
आर.बी.आई./2006/136
फा.सं. 118/11/37.01/2005-06
6 अप्रैल, 2006
अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक
सभी सार्वजनिक और निजी बैंक
नयी दिल्ली
विषय: सिक्के की स्वीकृति और वितरण संबंधी
महोदय/महोदया,
आप अपनी शाखाओं को तत्काल आदेश दें कि वे जनता के किसी भी सदस्य से बिना किसी प्रतिबंध के सभी मूल्यवर्गों के सिक्के स्वीकार करें। यदि कोई उपभोक्ता सिक्कों की माँग करता है तो उसे सभी मूल्यवर्गों के सिक्के भी उपलब्ध करवाने होंगे।
हालाँकि 5, 10 और 20 पैसे मूल्यवर्गों के छोटे सिक्के बनाना बंद कर दिया गया है जबकि पहले जारी सिक्के जो अब भी प्रचलन में हैं। वे वैध मुद्रा बने रहेंगे।
कृपया इसकी पावती भेजें तथा अपनी कार्यवाही से अवगत करवाएँ।
भवदीया
![]()
(डॉ रश्मि सिन्हा)
कार्यपालक निदेशक
(1) (क) पंजाब नेशनल बैंक द्वारा इसकी पावती रिज़र्व बैंक को भेजिए।
(ख) इस पत्र की विषय-वस्तु के आधार पर रिज़र्व बैंक द्वारा प्रेस विज्ञप्ति तैयार कीजिए।
(ग) रिज़र्व बैंक को अभी भी उपभोक्ताओं द्वारा शिकायतें मिल रही हैं। अतः रिज़र्व बैंक के महाप्रबंधक को दूसरे बैंकों को अनुस्मारक भेजना है, अतः इस अनुस्मारक को तैयार करने में उनकी मदद कीजिए।
(घ) पंजाब नेशनल बैंक ने अपनी सभी शाखाओं को कार्यालय आदेश भेजा। उपर्युक्त पत्र के आधार पर आप कार्यालय आदेश तैयार कीजिए।
(2) (क) पंजाब नेशनल बैंक की भीकाजी कामा प्लेस और सफ़दरजंग एंक्लेव की शाखाओं से अभी भी रिज़र्व बैंक को शिकायतें मिल रहीं हैं कि इन शाखाओं में सिक्कों को स्वीकार नहीं किया जाता, इसलिए कार्यपालक निदेशक को पंजाब नेशनल बैंक के अध्यक्ष को एक अर्ध-सरकारी पत्र लिखना है, जिसे आप तैयार कीजिए।
(ख) पंजाब नेशनल बैंक के महाप्रबंधक को जब यह पत्र मिलता है तब वह अपने अधिकारी से इसका जवाब माँगता है। इस विषय-वस्तु को ध्यान में रखते हुए सहायक और अधिकारी की टिप्पणी लिखिए।
(संकेत–सहायक बैंक की शाखा में पिछले छह महीनों का ब्योरा देगा कि कितने सिक्के उन्होंने स्वीकार किए और कितने सिक्के जारी किए। अधिकारी अपनी टिप्पणी में इसे निराधार बताएगा।)
