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स्ववृत्त (बायोडेटा) लेखन और रोज़गार संबंधी आवेदन पत्र

इस पाठ में...

» स्ववृत्त की विशेष ताएँ

» स्ववृत्त का रूप-आकार

» स्ववृत्त की प्रस्तुति

» विविध सूचनाओं का ब्योरा

» स्ववृत्त और आवेदन-पत्र

यह हो सकता है कि कोई अपना रास्ता चुने भी और उस पर अकेला भी न हो?

राजमार्ग पर चलने वाले रास्ता नहीं चुनते, रास्ता उन्हें चुनता है।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

हिंदी साहित्यकार

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विद्यार्थी के मन में अपने भविज़्य को लेकर तरह-तरह की कल्पनाएँ होती हैं। कुछ अपना स्वतंत्र उद्यम या व्यवसाय खड़ा करने का स्वप्न देखते हैं तो कुछ अपनी मनचाही नौकरी पाने का ख्वाब बुनते हैं। कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो कोई इंजीनियर। कोई मैनेजर बनना चाहता है तो कोई बैंकर। वहीं कुछ शि क्षक बनना चाहते हैं। विद्यार्थी जीवन होता ही है कल्पनाओं का संसार रचने और उसे हकीकत में बदलने का प्रयास। एक दिन छात्र-जीवन अपनी परिणति प्राप्त करता है और फिर हम अपनी कल्पना के महल के दरवाज़े पर दस्तक देने लगते हैं, अंदर प्रवेश का अरमान सँजोए।

लेकिन कई बार उस महल के द्वार पर प्रवेशार्थियों की अच्छी खासी भीड़ जमा हो जाती है और अंदर जगह की कमी होती है। कुछ को प्रवेश मिल पाता है और अधिकांश बाहर ही रह जाते हैं। द्वार के दोबारा खुलने की प्रतीक्षा करते हुए। नरेंद्र भी एक वैसा ही प्रतीक्षारत प्रवेशार्थी है।

नरेंद्र मार्केटिंग मैनेजर बनना चाहता है। सच पूछा जाए तो अंतत:इसके भी बहुत आगे जाना चाहता है। इस दिशा की पहली सीढ़ी है मार्केटिंग एक्ज़क्यूटिव का पद। इसके लिए नरेंद्र कुछ समय से जी तोड़ कोशि श कर रहा है। अखबारों, बिज़नेस पत्रिकाओं और इंटरनेट पर वह विज्ञापनों की तलाश करता रहता है और लगातार आवेदन भेजता रहता है मगर या तो आवेदन का उत्तर ही नहीं मिलता या फिर नकारात्मक उत्तर आता है।

आज फिर दरवाज़े की घंटी बजी। बाहर पोस्टमैन खड़ा था। नरेंद्र के दिल की धड़कन

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 बढ़ गई। आशाओं और आशंकाओं के मिश्रित ऊहापोह के साथ उसने दरवाज़ा खोला। पत्र किसी कंपनी से ही आया था। धड़कते हृदय के साथ लिफ़ाफ़ा खोला। फिर वही ढाक के तीन पात। वही
नकारात्मक उत्तर।

नरेंद्र के चाचा जी मुंबई से आजकल घर पर ही आए हुए हैं। चाचा जी मुंबई में एक बड़ी कंपनी के मानव संसाधन विभाग में बड़े पद पर हैं। उनकी नज़र नरेंद्र के उदास चेहरे पर पड़ती है।

नरेंद्र! चेहरा इस तरह उतरा हुआ क्यों है? इतने उदास क्यों नज़र आ रहे हो?

वैसे तो नरेंद्र का अहं उसे अपना दुख बाँटने से रोकता था लेकिन इस समय वह फट पड़ा। जख्म ताज़ा-ताज़ा था।

“चाचा जी! मैं मार्केटिंग एक्ज़क्यूटिव के पद के लिए न जाने कितनी बार प्रयत्न कर चुका हूँ। अगर मुझे साक्षात्कार के लिए बुलावा मिल जाए तो मुझे विश्वास है कि मैं अवश्य ही चुन लिया जाऊँगा। मगर उसकी नौबत ही नहीं आती। या तो जवाब ही नहीं आता या फिर इंकार का पत्र आ जाता है। लगता है अपने भाइयों या रिश्तेदारों को ही चुन लेते हैं।श्

चाचा जी मुसकराए। मानव संसाधन विभाग में काम करने की वजह से एेसी फब्तियाँ सुनने का उनका अनुभव पुराना था। असफल उम्मीदवार कई बार अनेक तरह के उलटे-सीधे पत्र लिखते थे। उन्होंने संयत होकर नरेंद्र से कहा।

“बेटे एेसी बात नहीं है। जिस तरह तुम्हें अपनी मनचाही नौकरी की तलाश है, उसी तरह कंपनियों को भी मनचाहे उम्मीदवार की खोज रहती है। मगर उनकी समस्या यह है कि वे जब भी कोई विज्ञापन निकालते हैं, उनके पास स्ववृत्तों का ढेर लग जाता है। कई बार तो पाँच पदों के लिए पाँच हज़ार स्ववृत्त आ जाते हैं। एेसे में किसी भी कंपनी के लिए क्या यह संभव है कि वह हर किसी को बुलाए और उनका साक्षात्कार करे? पाँच पदों के लिए अधिक से अधिक पचास उम्मीदवारों को ही बुलाया जा सकता है। ये पचास उम्मीदवार स्ववृत्त के आधार पर ही चुने जाते हैं।श्

नरेंद्र आश्चर्यचकित होकर बोला यानी साक्षात्कार के बाद तो दस में से एक को चुना जाता है लेकिन साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना ज़्यादा कठिन है। सौ में से एक उम्मीदवार को साक्षात्कार के लिए चुनते हैं, स्ववृत्त के आधार पर। “ोज़ निन्यानवे के हाथ निराशा ही लगती है।

चाचा जी बोले, “हाँ बेटे! एेसा ही है। हो सकता है उस निन्यानवे में कई एेसे भी उम्मीदवार हों जो चुने गए उम्मीदवारों से अधिक योग्य हों। मगर चूँकि उनके स्ववृत्त अच्छी तरह बने हुए नहीं होते इसलिए वे पीछे छूट जाते हैं।श्

नरेंद्र के लिए यह चौंकाने वाली बात थी।

चाचा जी आगे बोले, “तुम मार्केटिंग को अपना कैरियर बनाना चाहते हो। मगर नौकरी की तलाश भी एक प्रकार की मार्केटिंग ही है। इसमें तुम अपने ग्राहक को प्रेरित करते हो कि वह तुम्हारे प्रतियोगियों की तुलना में तुम्हें पसंद करे। जिस प्रकार ग्राहकों को आकर्ज़ित करने के लिए निर्माता लुभावने विज्ञापनों का सहारा लेता है उसी प्रकार उम्मीदवार के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपना स्ववृत्त सुंदर और आकर्ज़क बनाए।श्

चाचा जी जारी रहे–श्एक स्ववृत्त की तुलना हम उम्मीदवार के दूत या प्रतिनिधि से कर सकते हैं। जिस प्रकार एक अच्छा दूत या प्रतिनिधि अपने स्वामी का एक सुंदर और आकर्ज़क चित्र प्रस्तुत करता है, उसी प्रकार एक अच्छा स्ववृत्त नियुक्तिकर्ता के मन में उम्मीदवार के प्रति अच्छी और सकारात्मक धारणा उत्पन्न करता है। एक अच्छा स्ववृत्त किसी चुंबक की तरह होता है जो नियुक्तिकर्ता को आकर्ज़ित कर लेता है। नौकरी में सफलता के लिए योग्यता और व्यक्ति के साथ-साथ स्ववृत्त निर्माण की कला में निपुणता भी आवश्यक है। ध्यान रहे! पहली लड़ाई तो तुम्हारा स्ववृत्त ही तुम्हारे लिए लड़ता है। इस लड़ाई में जीतने के बाद ही खुद लड़ने की बारी आती है। अगर स्ववृत्त कमज़ोर हुआ तो लड़ाई शुरू में ही खत्म हो जाती है।श्

नरेंद्र चाचा जी की बातों से अत्यंत प्रभावित हुआ। वह अपने कमरे में जाकर अपना स्ववृत्त ले आया और उसे चाचा जी को देते हुए बोला, “चाचा जी! क्या कमी है मेरे स्ववृत्त में?श्

चाचा जी ने स्ववृत्त पर अपनी अनुभवी नज़र दौड़ाई और परखा। फिर बोले, “तुम्हारा स्ववृत्त सही तरीके से नहीं बना है। इसमें कमियाँ ही कमियाँ हैं। मैं तुम्हें बचपन से जानता हूँ और इसलिए यह कह सकता हूँ कि अगर तुम्हें साक्षात्कार का बुलावा मिल जाए तो तुम्हें सफल होने से कोई रोक नहीं सकता। तुम्हारे व्यक्तित्व में वे सारी खूबियाँ हैं जो एक अच्छे मार्केटिंग एक्ज़क्यूटिव में होनी चाहिए। मगर तुम्हारा स्ववृत्त इतने बुरे तरीके से बना हुआ है कि तुम्हारी गलत तसवीर
पेश करता है और साक्षात्कार की नौबत ही नहीं आने देता। तुम्हें अपना स्ववृत्त दोबारा तैयार
करना होगा।श्

नरेंद्र को अपनी भूल समझ में आ रही थी। वह बोला, “चाचा जी क्या आप अच्छा स्ववृत्त बनाने में मेरा मार्गदर्श न करेंगे?श्

चाचा जी ने सोफ़े पर अपनी मुद्रा बदली और बोले, “हाँ नरेंद्र, क्यों नहीं। मगर शुरुआत कहाँ से करूँ? चलो, इतना तो अब तक तुम्हें भी मालूम हो गया है कि स्ववृत्त एक विशेष प्रकार का लेखन है, जिसमें व्यक्ति विशेष के बारे में किसी विशेष प्रयोजन को ध्यान में रखकर सिलसिलेवार ढंग से सूचनाएँ संकलित की जाती हैं।श्

नरेंद्र बोल पड़ा, “वाह चाचा जी! एक ही वाक्य में इतनी सारी बातें। यह तो गागर में सागर वाली बात हुई।श्

चाचा जी आगे बोले, “हाँ बेटे! स्ववृत्त के दो पक्ष हैं। पहले पक्ष में वह व्यक्ति है जिसको केंद्र में रखकर सूचनाएँ संकलित की गई होती हैं। दूसरा पक्ष उस व्यक्ति या संस्था का है जिसके लिए या जिसके प्रयोजन को ध्यान में रखकर सूचनाएँ जुटाई जाती हैं। पहला पक्ष है उम्मीदवार और दूसरा पक्ष नियोक्ता।श्

“सच है चाचा जी किसी भी व्यक्ति से संबंधित सूचनाओं का तो कोई अंत ही नहीं है। लेकिन हर सूचना नियोक्ता के काम की नहीं हो सकती। इसीलिए स्ववृत्त में वही सूचनाएँ डाली जा सकती हैं जिनमें दूसरे पक्ष यानी नियोक्ता की दिलचस्पी हो।श्

“वाह नरेंद्र! तुम तो खासे समझदार हो! कुछ बातें जो मैं तुम्हें बताना चाहूँगा, उनमें पहली तो यह है कि स्ववृत्त में ईमानदारी होनी चाहिए। किसी भी प्रकार के झूठे दावे या अतिशयोक्ति से बचना चाहिए। यह मत भूलो कि नियोक्ता को उम्मीदवारों के चयन का अच्छा खासा अनुभव होता है। गलत या बढ़ा-चढ़ा कर किए गए दावों से उन्हें धोखा देने की कोशि श खतरनाक बन सकती है। अगर साक्षात्कार के लिए बुला भी लिया गया तो उस दौरान कलई खुलने का पूरा अंदेशा रहता है।श्

“मगर इसका यह अर्थ भी नहीं है कि अपनी खूबियाँ और अच्छाइयाँ बताने में तुम कंजूसी बरतो। अपने व्यक्तित्व, ज्ञान और अनुभव के सबल पहलुओं पर ज़ोर देना तो कभी भी नहीं भूलना चाहिए।श् नरेंद्र चाचा की बातें गौर से सुन रहा था। उसके मन में एक प्रश्न उभरा।

“चाचा जी! स्ववृत्त की भाज़ा-शैली कैसी होनी चाहिए?श्

“स्ववृत्त में आलंकारिक भाज़ा की गुंजाइश नहीं है। इसीलिए इसकी शै ली–सरल, सीधी, सटीक और साफ़ होनी चाहिए ताकि पढ़ने वाले को सारी बातें एक ही नज़र में स्पज़्ट हो जाएँ और अर्थ निकालने के लिए दिमाग पर ज़ोर न डालना पड़े।श्

नरेंद्र ने अगला प्रश्न पूछा, “क्या स्ववृत्त के आकार-प्रकार को लेकर भी कोई नियम है?श्

चाचा जी ने जवाब दिया–श्इसका कोई निεश्चत नियम तो नहीं है लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि स्ववृत्त न तो ज़रूरत से अधिक लंबा हो न ही ज़्यादा छोटा। अगर बहुत संक्षिप्त हुआ तो इसमें अनेक ज़रूरी चीज़ें आने से रह जाएँगी। दूसरी ओर यदि बहुत लंबा हुआ तो पढ़ने वाला अनेक पहलुओं को नज़रअंदाज कर सकता है।श्

“लेकिन चाचा जी आप अपने अनुभव के आधार पर कुछ गुर तो बता ही सकते हैं।श्

“बेटे, ध्यान देने की बात यह है कि जब पद बहुत बड़ा होता है तो उसके लिए उम्मीदवार भी कम होते हैं। मसलन यदि मैनेजिंग डायरेक्टर के पद के लिए विज्ञापन दिया जाए तो गिनती के लोग ही अपना स्ववृत्त भेजेंगे। ये सारे लोग अच्छी योग्यता और व्यापक अनुभव वाले होंगे। अत:इस स्थिति में स्ववृत्त यदि नौ-दस पृज़्ठों का भी हुआ तो उसे ध्यानपूर्वक और बारीकी से पढ़ा जाएगा। लेकिन यदि नीचे के पद के लिए विज्ञापन दिया जाए तो बड़ी संख्या में आवेदन आएँगे। यहाँ पर यदि स्ववृत्त दो-तीन पृज़्ठों से अधिक लंबा हुआ तो पढ़ने वाला अपना धैर्य खो सकता है।श्

“यानी मेरी तरह जो कॉलेज से तुरंत निकला है उनका स्ववृत्त दो-तीन पृज़्ठों से अधिक लंबा नहीं होना चाहिए।श्

चाचा जी बोले, “हाँ! मोटेतौर पर तुम एेसा मान सकते हो। एक और बात–स्ववृत्त साफ़-सुथरे ढंग से टंकित या कंप्यूटर-मुद्रित होना चाहिए। व्याकरण संबंधी भूलों को भी दूर कर लेना चाहिए। ये बातें छोटी लग सकती हैं मगर उम्मीदवार के प्रति विपरीत धारणा उत्पन्न करती हैं। नियोक्ता को एेसा लग सकता है कि उम्मीदवार या तो लापरवाह है या फिर उसकी शि क्षा-दीक्षा ढंग से नहीं हुई है।श्

नरेंद्र ने बात को आगे बढ़ाया, “चाचाजी! शुरू  में आपने कहा था कि स्ववृत्त व्यक्ति विशेष के बारे में सूचनाओं का सिलसिलेवार संकलन है। क्या आप इसे और समझाएँगे! सूचनाओं का सिलसिला किस प्रकार का होना चाहिए।श्

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चाचा जी अपनी अनुभव सिद्ध वाणी में बोले–श्बेटे स्ववृत्त सूचनाओं का एक अनुशासित प्रवाह है। यानी इसमें प्रवाह और अनुशासन दोनों ही होने चाहिए। प्रवाह व्यक्ति परिचय से प्रारंभ होता है और शै क्षणिक योग्यता, अनुभव, प्रशि क्षण, उपलब्धियाँ, कार्येतर गतिविधियाँ इत्यादि पड़ावों को पार करता हुआ अपनी पूर्णता प्राप्त करता है। स्ववृत्त के जो ये अवयव मैंने तुम्हें बताए हैं वे केवल उदाहरण के लिए हैं। आवश्यकतानुसार इनमें फेरबदल किया जा सकता है।श्

नरेंद्र ने जिज्ञासा प्रकट की कि व्यक्ति परिचय में क्या-क्या बातें होनी चाहिए।

चाचा जी ने समझाया कि व्यक्ति परिचय के अंतर्गत उम्मीदवार का नाम, जन्मतिथि, उम्र, पत्र व्यवहार का पता, टेलीफ़ोन नंबर, ई-मेल का पता आदि सूचनाएँ दी जाती हैं। व्यक्ति परिचय में जन्म तिथि और माता-पिता का नाम अवश्य डालना चाहिए। जिन पदों के लिए बड़ी संख्या में आवेदन आते हैं वहाँ एक ही नाम के कई उम्मीदवार होते हैं। पिता के नाम और जन्मदिन के आधार पर उनमें आसानी से भेद किया जा सकता है।

नरेंद्र ने अगला सवाल उठाया, “चाचाजी व्यक्ति परिचय के बाद किस प्रकार की सूचनाएँ डाली जानी चाहिए?श्

“यदि उम्मीदवार किसी बड़े पद के लिए आवेदन कर रहा है और बहुत अनुभवी है तो अनुभव की चर्चा व्यक्ति परिचय के तुरंत बाद डाली जा सकती है। लेकिन तुम्हारी तरह जो कॉलेज से तुरंत ही बाहर निकले हैं उन्हें व्यक्ति परिचय के तत्काल बाद अपनी शै क्षणिक योग्यताओं की चर्चा करनी चाहिए। शै क्षणिक योग्यताओं से संबंधित सूचनाएँ एक सारणी के रूप में प्रस्तुत की जानी चाहिए जिनमें प्राप्त डिप्लोमा या डिग्री का विवरण, स्कूल या कॉलेज का नाम, बोर्ड या विश्वविद्यालय का नाम, संबंधित परीक्षा का वर्ज़, परीक्षा के विज़य, प्राप्तांक प्रतिशत और श्रेणी का उल्लेख होना चाहिए।श्

नरेंद्र ने सवाल किया पढ़ाई-लिखाई या अनुभव की चर्चा तो ठीक है मगर कार्येतर गतिविधियों की चर्चा क्यों ज़रूरी है।

चाचा जी सोफ़े पर बैठे-बैठे थोड़े बोर हो रहे थे। वे खड़े होकर कमरे में चहलकदमी करने लगे और खिड़की के पास खड़े होकर कहने लगे, “जब नियोक्ता किसी उम्मीदवार को चुनने का निर्णय लेता है तो उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को ध्यान में रखता है। कार्येतर गतिविधियों के माध्यम से उम्मीदवार के व्यक्तित्व के बारे में अच्छी जानकारियाँ मिलती हैं और पद के लिए उसकी योग्यता को तय करना आसान हो जाता है। मसलन यदि कोई उम्मीदवार अच्छा फुटबॉल खिलाड़ी है तो यह माना जा सकता है कि उसमें टीम भावना अवश्य ही होगी। अगर किसी को भाज़ण या वाद-विवाद में ढेरों पुरस्कार मिल चुके हैं तो इससे उसकी वाक्पटुता और संभाज़ण कला का पता चलता है। यदि तुम्हारी एेसी कोई गतिविधि या हॉबी हो, जो तुम्हारी उम्मीदवारी को सबल बनाते हों तो उनकी चर्चा करना मत भूलना।श्

नरेंद्र बोल पड़ा, “चाचाजी मुझे तो भाज़ण और वाद-विवाद में बहुत सारे पुरस्कार मिले हैं। पर्यटन का भी मुझे शौक है। क्या मुझे अपने स्ववृत्त में इनकी चर्चा करनी चाहिए थी।श्

“चाचा जी थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोले, क्या अब तक तुम इनकी चर्चा करना भूल जाते थे? अगर तुम मार्केटिंग एक्ज़क्यूटिव का पद पाना चाहते हो तो तुम्हारी इस प्रकार की गतिविधियाँ तुम्हें अन्य उम्मीदवारों से मीलों आगे ले जा सकती हैं। मार्केटिंग एक्ज़क्यूटिव के रूप में वैसे लोग सफल साबित होते हैं जो वाक्पटु हों और जिन्हें घूमना-फिरना अच्छा लगता हो।श्

चाचा जी को अचानक एक और बात याद आई। स्ववृत्त में दो-तीन वैसे लोगों के नाम पते भी दिए जा सकते हैं जो उम्मीदवार के रिश्तेदार न हों मगर उसकी योग्यताओं एवं क्षमताओं से परिचित हों। जिन लोगों का विवरण दिया जाए वे प्रतिज़्ठित व्यक्ति हों। यदि वे उसी क्षेत्र के जाने-माने लोग हों जिस क्षेत्र में उम्मीदवार आवेदन कर रहा है तो यह सोने पर सुहागा वाली बात है।

“मगर चाचा जी! जो उम्मीदवार पहले से कहीं काम कर रहे हैं वे तो इस प्रकार का विवरण आसानी से जुटा लेंगे, मगर वे क्या करें जो कॉलेज से तुरंत निकले हैं और संबंधित उद्योग या क्षेत्र के लोगों से जिनका परिचय नहीं है।श्

चाचा जी का उत्तर था–श्जो कॉलेज से तुरंत निकले हैं उन्हें अपने प्रिंसिपल या प्रोफ़ेसरों के नाम-पते देने चाहिए। कालेज से तुरंत निकले छात्रों के मामले में नियोक्ता, प्रिंसिपल या प्रोफ़ेसरों की राय को महत्त्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि इन लोगों ने उम्मीदवार को विद्यार्थी रूप में कई वर्ज़ों तक नज़दीक से देखा-परखा होता है।श्

नरेंद्र की सभी शंकाओ का समाधान हो गया था। चाचा जी को धन्यवाद देते हुए बोला, “चाचाजी आपने इतनी बहुमूल्य जानकारियाँ दीं। अब शायद स्ववृत्त की वजह से मैं खारिज नहीं किया जाऊँगा। शायद अगली बार मैं ज़रूर सफल हो जाऊँगा।श्

चाचा जी मुसकराते हुए बोले, “धन्यवाद इस प्रकार नहीं। पहले मम्मी को चाय के लिए बोलो और आज का अखबार लेकर आओ। मैंने अब तक अखबार नहीं देखा है। और हाँ! जब तक मैं अखबार का दैनिक पारायण संपन्न करता हूँ तब तक तुम मुझे अपना एक स्ववृत्त बनाकर दिखलाओ। मैं भी तो देखूँ कि मेरी बातों का तुम पर क्या असर पड़ा है।श्

चाचा जी अखबार के साथ चाय की चुस्कियाँ लेने लगे और नरेंद्र अपने कमरे में अपना स्ववृत्त तैयार करने लगा। कुछ समय के बाद वह बाहर निकला और चाचा जी के सामने उसने अपना स्ववृत्त पेश कर दिया।

स्ववृत्त इस प्रकार था–


स्ववृत्त

नाम: नरेंद्र कुमार

पिता का नाम: सुरेश कुमार

माँ का नाम: शबनम

जन्म तिथि: 18 नवंबर, 1982

वर्तमान पता: डी 72, पाकेट चार, मयूर विहार (फ़ेज एक) दिल्ली 110092

स्थायी पता: वही

टेलीफ़ोन नं.: 011-22718296

मोबाइल नं.: 9868234859

ई-मेल: 85[email protected]

शै क्षणिक योग्यताएँ

क्र.सं. परीक्षा/डिग्री/वर्ज़ विद्यालय/ बोर्ड/ विज़य श्रेणी प्रतिशत

डिप्लोमा महाविद्यालय/

विश्वविद्यालय

1. दसवीं कक्षा 1997 राजकीय विद्यालय अंग्रेजी, हिंदी, प्रथम 93%

सीबीएसई विज्ञान, गणित

सामाजिक विज्ञान

2. बारहवीं 1999 वही अंग्रेजी, भौतिकी,
सीबीएसई रसायन विज्ञान प्रथम 95%

जीव विज्ञान, गणित

3. बी.एस.सी. 2002 हिंदू कॉलेज, कंप्यूटर साइंस प्रथम 84% (आनर्स) दिल्ली विश्वविद्यालय,

दिल्ली

4. एमबीए 2004 आदर्श इन्स्टीट्यूट प्रथम 85%
अॉफ़ मैनेजमेंट

अन्य संबंधित योग्यताएँ

» कंप्यूटर का अच्छा ज्ञान और अभ्यास (एम.एस.अॉफ़िस तथा इंटरनेट)

» फ्रांसीसी भाज़ा का कार्य योग्य ज्ञान

उपलब्धियाँ

» अखिल भारतीय वाद-विवाद प्रतियोगिता (वर्ज़ 2001) में प्रथम पुरस्कार

» राजीव गाँधी स्मारक निबंध प्रतियोगिता (2002) में प्रथम पुरस्कार

» विद्यालय और महाविद्यालय क्रिकेट टीमों का कप्तान


कार्येतर गतिविधियाँ और अभिरुचियाँ

» उद्योग व्यापार संबंधी पत्रिकाओं और अखबारों का नियमित पाठन

» देश भ्रमण का शौक

» इंटरनेट सर्फ़िंग

» फुटबाल और क्रिकेट में अभिरुचि

वैसे सम्मानित व्यक्तियों का विवरण जो उम्मीदवार के व्यक्तित्व और उपलब्धियों से

परिचित हों

1. श्री जे. रामनाथन, निदेशक, आदर्श इंस्टीट्यूट अॉफ़ मैनेजमेंट, लोदी इस्टेट, नयी दिल्ली

2. श्री देवेंद्र गुप्ता, प्राध्यापक (मार्केटिंग), आदर्श इंस्टीट्यूट अॉफ़ मैनेजमेंट लोदी इस्टेट, 
नयी दिल्ली

तिथि

स्थान

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हस्ताक्षर


चाचा जी ने स्ववृत्त पर नज़र डाली और नरेंद्र की ओर देखकर संतोज़ और प्रशंसा के सम्मिलित भाव से मुसकराए। थोड़ा विराम देकर वे आगे कहने लगे, “अब तुम्हारा स्ववृत्त पूरी तरह से तैयार है। इसे सुरक्षित रखो। जब भी आवेदन करना हो इसे भेज दो। हाँ, विज्ञापन में वर्णित योग्यताओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए इसमें थोड़ा हेर-फेर या जोड़-घटाव करना मत भूलना।"

इसके बाद चाचा जी ने क्षणभर की एक अर्थपूर्ण चुप्पी साधी। फिर बोले–श्लेकिन नरेंद्र, यह तो आधी ही लड़ाई हुई। आधी तो अभी बाकी ही है।"

“क्या मतलब!श् नरेंद्र की उत्सुकता बढ़ गई।

“मतलब यह कि सिर्फ़ स्ववृत्त देने भर से ही काम नहीं चलता। स्ववृत्त के साथ एक आवेदन-पत्र भी लिखना होता है। इस आवेदन-पत्र के साथ हम स्ववृत्त को लगाते हैं और नियोक्ता को उसके विचार के लिए भेज देते हैं।श्

“मगर चाचा जी, जब स्ववृत्त में सारी जानकारियाँ दे ही दी जाती हैं तो फिर अलग से आवेदन-पत्र लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ती है?श्

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“यह अच्छा सवाल है। स्ववृत्त तो बना-बनाया रखा होता है। विज्ञापन देखा और भेज दिया। अत:सिर्फ़ स्ववृत्त से यह पता नहीं चलता कि उम्मीदवार पद और संबंधित संस्थान को लेकर कितना गंभीर है। स्ववृत्त की एक कमी यह होती है कि यह सूचनाओं के सिलसिलेवार संकलन के रूप में होता है। इसमें भाज़ा का वह वैयक्तिक स्पर्श नहीं आ पाता। दूसरी ओर, आवेदन-पत्र हर विज्ञापन के लिए विशेष तौर पर लिखे जाते हैं। ये उम्मीदवार के भाज़ा-ज्ञान और अभिव्यक्ति की क्षमता की तो जानकारी देते ही हैं, साथ ही यह भी दर्शाते हैं कि उम्मीदवार पद और संस्थान को लेकर गंभीर है या नहीं। नियोक्ता को योग्य उम्मीदवार की तलाश तो होती ही है, वह यह अपेक्षा रखता है कि चयन के बाद वह नौकरी में कम से कम कुछ वर्ज़ों तक अवश्य टिके। आवेदन-पत्र से बहुत कुछ इन बातों का भी आभास नियोक्ता को मिल जाता है।श्

“चाचा जी, आवेदन-पत्र तो हम लोग स्कूल के ज़माने से ही लिखते रहे हैं। क्या नौकरी के आवेदन-पत्र अपने स्वरूप में अन्य आवेदन-पत्रों से भिन्न होता है?श्

“आवेदन का ढाँचा या स्वरूप तो वैसा ही होता है जैसा अन्य दूसरे आवेदन-पत्रों का होता है। लेकिन इसका उद्देश्य अलग होता है–पद के लिए अपनी योग्यता और गंभीरता के प्रति नियोक्ता का विश्वास जगाना। उद्देश्य की भिन्नता की वजह से इसकी विज़य-वस्तु अन्य आवेदन-पत्रों से भिन्न होती है।श्

“चाचा जी, फिर आप यह भी बता दें कि विज़य-वस्तु के अंतर्गत क्या होगा और हम उसे आकार कैसे देंगे?श्

“बेटे, इस प्रकार के आवेदन-पत्रों की विज़य-वस्तु के मुख्यत:चार हिस्से होते हैं। पहला हिस्सा भूमिका का होता है, जिसमें उम्मीदवार विज्ञापन और विज्ञापित पद का हवाला देते हुए अपनी उम्मीदवारी की इच्छा प्रकट करता है। दूसरे खंड में उम्मीदवार यह बतलाता है कि वह विज्ञापन में वर्णित योग्यताओं और आवश्यकताओं को पूरा करने में किस प्रकार सक्षम है। तीसरे खंड में उम्मीदवार पद और संस्थान के प्रति अपनी गंभीरता और अभिरुचि को अभिव्यक्त करता है। चौथा खंड उपसंहार यानी आवेदन-पत्र की विज़य-वस्तु के औपचारिक समापन के लिए होता है।श्

नरेश को चाचा जी की बातें तो समझ में आ रही थीं मगर एक शंका भी थी। उसने पूछा तीसरे खंड के बारे में अभी-अभी आपने बताया कि इसमें उम्मीदवार पद और संस्थान के बारे में अपनी गंभीरता को अभिव्यक्त करता है। यह बात पूरे तौर पर साफ़ नहीं हुई।

चाचा जी ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा–श्नरेंद्र, जिस प्रकार नियोक्ता अपनी पसंद का उम्मीदवार चुनता है उसी प्रकार उम्मीदवार को भी नियोक्ता का संस्थान पसंद आना चाहिए। तभी उम्मीदवार के लंबे समय तक टिकने की संभावना रहती है। जब उम्मीदवार पद और संस्थान को लेकर गंभीर होता है तो वह उसके बारे में जानकारियाँ हासिल करता है और यह तय करता है कि वे उसके सपनों और भावी योजनाओं के अनुरूप हैं या नहीं। अगर उम्मीदवार ने जानकारी जुटाने के बाद संस्थान को अपनी इच्छाओं के अनुरूप पाया है तो आवेदन-पत्र में इसकी चर्चा अवश्य होनी चाहिए। नियोक्ता पर इसका बहुत ही अच्छा असर होता है।श्

“चाचा जी, अभी तक तो मैं विज्ञापन के जवाब में केवल स्ववृत्त ही भेजा करता था मगर अब मैं स्ववृत्त को आवेदन-पत्र के साथ भेजा करूँगा।श्

चाचा जी बोल पड़े फिर शुभ कार्य में देर किस बात की।

फिर वे अखबार के पन्ने पलटते हुए बोले, “मैंने इसमें तुम्हारे लिए अभी-अभी एक विज्ञापन देखा है। इंडिया केमिकल्स लि. को मार्केटिंग एक्ज़क्यूटिव्स की ज़रूरत है। तुम इसके लिए आवेदन-पत्र तैयार क्यों नहीं करते? आवेदन का आवेदन होगा और इस बात की परीक्षा भी हो जाएगी कि अभी-अभी तुमने मुझसे कितना सीखा है?श्

नरेंद्र को अखबार पकड़ाने के बाद अब चाचा जी पड़ोस में अपने मित्र से मिलने चले गए और नरेंद्र अपने कमरे में आवेदन-पत्र लिखने चला गया। जब आवेदन-पत्र तैयार हुआ तो वह इस प्रकार था–

 

सेवा में,

महाप्रबंधक (मानव संसाधन)

मानव संसाधन विभाग

इंडिया केमिकल्स लिमिटेड

36, न्यू लिंक रोड

अंधेरी, मुंबई-400053

विज़य:  मार्केटिंग एक्ज़क्यूटिव पद के लिए आवेदन

महोदय,

आज दिनांक 16 अप्रैल, 2006 को दिल्ली से प्रकाशि त नवभारत टाइम्स के प्रात:संस्करण में प्रकाशि त विज्ञापन से ज्ञात हुआ है कि आपकी कंपनी को मार्केटिंग एक्ज़क्यूटिव्स की आवश्यकता है। मैं इस पद के लिए अपना आवेदन प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मेरा स्ववृत्त इस आवेदन के साथ संलग्न है। इसका अवलोकन करने पर आप पाएँगे कि मैं इस पद के लिए पूरी तरह से उपयुक्त उम्मीदवार हूँ। मैं विज्ञापन में आपके द्वारा वर्णित सभी योग्यताओं और अर्हताओं को पूरा करता हूँ। संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है–

(क) मैं विज्ञान का छात्र रहा हूँ और रसायन शास्त्र मेरा प्रिय विज़य रहा है। मैंने इस विज़य में आनर्स के साथ प्रथम श्रेणी में स्नातक की उपाधि पाई है। मैं आपकी कंपनी की गतिविधियों और उत्पादों के वैज्ञानिक पहलुओं से न केवल पूरी तरह से वाकिफ़ हूँ बल्कि उन्हें आपके ग्राहकों के समक्ष सरल शब्दों में प्रस्तुत करने की भी क्षमता रखता हूँ।

(ख) मैंने मार्केटिंग में प्रथम श्रेणी में एमबीए किया है और मुझे मार्केटिंग के विभिन्न सैद्धांतिक और व्यावहारिक पहलुओं का पूरा ज्ञान है।

(ग) मैं लिखित और मौखिक दोनों प्रकार से स्वयं को अभिव्यक्त करने में सक्षम हूँ। मुझे वाद-विवाद और निबंध की अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार 
मिले हैं।

(घ) मैं अपने विद्यालय और महाविद्यालय की क्रिकेट टीमों का कप्तान रहा हूँ। इससे मेरी टीम भावना और नेतृत्व क्षमता प्रमाणित होती है।

(ङ) मैं पर्यटन का शौक रखता हूँ और लगभग पूरे देश के महत्त्वपूर्ण स्थानों का दौरा कर चुका हूँ। मेरी यह प्रकृति पद की आवश्यकता के अनुकूल है।

मैं उद्योग और व्यवसाय से जुड़ी पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक रखता हूँ। इनके माध्यम से मैं आपकी कंपनी की गतिविधियों से निरंतर अवगत रहा हूँ कि अपनी स्थापना के कुछ ही वर्ज़ों के अंदर कंपनी की गतिविधियों में व्यापक विस्तार हुआ है। मेरी सूचना के अनुसार कंपनी ने भविज़्य के लिए अत्यंत महत्त्वाकांक्षी योजनाएँ बनाई हैं। मैं महसूस करता हूँ कि एेसे माहौल में मुझे न केवल अपनी उन्नति और विकास का अवसर मिलेगा बल्कि मैं कंपनी की उन्नति और विकास में भी योगदान कर सकूँगा।

अनुरोध है कि उपर्युक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मेरे आवेदन पर सकारात्मक रूप से विचार करें और मुझे मार्केटिंग एक्ज़क्यूटिव के पद पर नियुक्त करें।

सधन्यवाद

भवदीय

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(नरेंद्र कुमार)


जब तक नरेंद्र का आवेदन-पत्र तैयार हुआ, चाचा जी पड़ोस से वापस आ चुके थे।

उन्होंने आवेदन-पत्र को पढ़ा और गहरी साँस खींचते हुए कहा, “वैसे तो मैं कंपनी के मानव संसाधन विकास के महाप्रबंधक को अच्छी तरह से जानता हूँ मगर मैं तुम्हारी सिफ़ारिश नहीं करूँगा। मुझे विश्वास है कि तुम यह पद अपनी योग्यता के बल पर हासिल कर सकोगे।श्

दो महीने बाद मुंबई में चाचा जी के फ़्लैट की घंटी बजी। दरवाज़ा खोलने के बाद चाचा जी ने दरवाज़े पर नरेंद्र को खड़ा पाया। हाथ में मिठाई का डिब्बा और गरम सूट का एक पैकेट था। दोनों की नज़रें मिलीं। नरेंद्र ने चाचा जी के पैर छुए और चाचा जी ने बधाई देते हुए उसे गले लगा लिया।

अभ्यास

पाठ से संवाद

1. कल्पना कीजिए कि आपने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना अध्ययन पूरा कर लिया है और किसी प्रसिद्ध अखबार में पत्रकार पद के लिए आवेदन भेजना है। इसके लिए एक आवेदन-पत्र लिखिए। 

2. राजीव गांधी फ़ाउंडेशन उच्च शि क्षा हेतु स्कॉलरशि प प्रदान करती है अत:उसे भेजने के लिए अपना ‘बायोडेटा’ तैयार कीजिए।


3. स्ववृत्त में कौन-कौन से बिंदुओं को शामिल किया जाता है और उनकी प्रस्तुति का क्या प्रभाव पड़ता है? उदाहरण सहित स्पज़्ट कीजिए।