QR Code Chapter 17


17. फाँद ली दीवार

चमकते सितारे (इंडियन एक्सप्रेस 2007)

सामने जो अपने परिवार को चलाने के लिए बर्तन माँजती है। लिंग-भेद की दीवार भी जो उसकी माँ ने उसके सामने खड़ी की थी।

आज अफ़साना खुद एक बुलंद, मज़बूत दीवार है- मुंबई की नागपाड़ा बास्केट बॉल एसोसिएशन की। आज वह प्रेरणा है, पाँच अन्य लड़कियों के लिए जो रोज़मर्रा की जिंदगी को छोड़कर पहुँची हैं बास्केटबॉल कोर्ट में।

कुछ लड़कियां बैठी हैं और कुछ उनके पीछे खड़े हैं। एक लड़की हाथ में बास्केट  बाल लिए बीच में बैठी है।

अफ़साना मंसूरी है तो सिर्फ़ तेरह वर्ष की पर वह अभी से दीवार फाँद चुकी है। वह दीवार, जो उसकी झुग्गी और बास्केटबॉल कोर्ट के बीच है। समाज द्वारा खड़ी की गई दीवार! उस लड़की के आज अफ़साना एक सितारा है- एक उभरती टीम का। इस टीम ने मुंबई के कई क्लबों की टीमों को अचरज में डाल दिया है। सिर्फ अपनी हिम्मत और थोड़ी-सी मदद के सहारे यह टीम पहुँची जिला स्तर टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में।

एक मुलाकात

हमने अफ़साना और उसकी नागपाड़ा बास्केटबॉल टीम के बारे में अखबार में पढ़ा। तब सोचा कि क्यों न हम इस टीम की लड़कियों से मिलें और तुम सभी से इनकी पहचान कराएँ। हम मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (रेलवे स्टेशन) पर उतरकर चल पड़े नागपाड़ा की तरफ़। स्टेशन से पैदल चलो तो नागपाड़ा लगभग बीस मिनट की दूरी पर है।

हमने वहाँ अफ़साना और नागपाड़ा बास्केटबॉल एसोसिएशन की लड़कियों से बातें कीं। तुम भी पढ़ो, इनसे हुई हमारी एक मुलाकात।

मिलो इस अनोखी टीम से!

अफ़साना, ज़रीन, खुशनूर, आफ़रीन से। ये लड़कियाँ पहले तो ज़रा चुपचाप थीं, जब शुरू हुईं तो बस...!

ज़रीन ने शुरुआत की। “मेरा घर हमारे इस ग्राउंड के बिल्कुल सामने है। मेरा भाई भी यहाँ खेलता है। मैं अपनी बाल्कनी में खड़े-खड़े लड़कों का खेल देखती रहती। तब मैं सातवीं में पढ़ती थी। जब लड़कों का मैच होता तो बहुत सारे लोग देखने आते। जीतने वाली टीम को बहुत सराहा जाता। खिलाड़ियों को सभी ‘चीयर्स' करते और उनकी हिम्मत बढ़ाते।

यह सब देखकर मुझे लगता, क्यों न मैं भी खेलूँ? क्या मुझे भी अपना हुनर सबके सामने दिखाने का मौका मिलेगा? तब मैंने हमारे 'कोच' को कुछ डरते हुए पूछा। वे मेरे पापा के अच्छे दोस्त भी हैं। उन्होंने कहा, “क्यों नहीं? अगर तुम कुछ और लड़कियों को साथ में ले आओ, तो हम तुम्हें भी सिखाएँगे। फिर तुम्हारी भी टीम बनेगी।"

एक इमारत के सामने एक खेल का मैदान।


पता करो

  • क्या तुम्हारे घर के आस-पास भी कोई खेलने की जगह है?
  • वहाँ कौन-कौन-से खेल खेले जाते हैं? कौन-कौन खेलता है?
  • क्या वहाँ तुम्हारी उम्र के बच्चों को भी खेलने का मौका मिलता है?
  • वहाँ खेल के अलावा और क्या-क्या होता है?

शिक्षक संकेत-बच्चों के अपने खेल के अनुभवों को सुनें। इन मुद्दों पर बच्चों की अपनी समझ पर चर्चा करवाई जा सकती है-लड़के-लड़कियों के खेल एक-से हों, सभी को खेलने का बराबर मौका मिले, इत्यादि।

हमने पूछा-क्या खेल की शुरुआत करना आसान था?

खुशनूर-शुरू में मम्मी-पापा ने मुझे मना कर दिया। जब मैंने थोड़ी ज़िद की तो वे मान गए।

अफ़साना- मेरी अम्मी बिल्डिंग के घरों में काम करती हैं और हम बच्चों को स्कूल भेजती हैं। मैं भी उनकी मदद करती हूँ। मेरी इस बात को सुनकर अम्मी गुस्सा हो गईं और कहने लगीं, "लड़कियाँ थोड़े ही बास्केटबॉल खेलती हैं? काम करो, स्कूल जाओ, ठीक से पढ़ो। ग्राउंड पर खेलने की कोई ज़रूरत नहीं।" मेरी सहेलियों ने मनाया और कोच सर ने समझाया तो अम्मी मान गईं।

आफ़रीन हाँ, हम लड़कियाँ हैं, इसलिए हमें मना किया जाता है। मेरी दादी बहुत गुस्सा करती हैं। लेकिन हम तीनों बहनें फिर भी यहाँ खेलने आती हैं। दादी आज भी हमें डाँटती हैं। हमारे कोच सर को भी। दादी का कहना है, “खेलने के लिए ठीक सामान चाहिए, ताकत के लिए दूध पीना पड़ेगा। इतने पैसे कहाँ से आएँगे?" मगर डैडी हमारे मन की बात को समझते हैं। वे हमें खेल के पैंतरे भी सिखाते हैं। मेरे डैडी भी अपने बचपन में इसी ग्राउंड में खेला करते थे।

उनके पास न खेलने के जूते थे, न कोई खास कपड़े। वे प्लास्टिक की बॉल से प्रैक्टिस करते थे। __ डैडी बताते हैं कि जब बच्चूखान ने उन्हें देखा तो सोचा, “यह लड़का कितना अच्छा खेलता है। इसे ठीक से सीखना चाहिए।" उन्होंने मेरे डैडी को खेल के कपड़े और जूते दिए। मेरे डैडी बहुत अच्छे खिलाड़ी बन सकते थे। पर घर की ज़िम्मेदारी के कारण उन्हें यह सब छोड़कर काम पर जाना पड़ा। इसलिए वे चाहते हैं कि हम बच्चे खेलें। अच्छे खिलाड़ी बनें।


स्टिक ड्रॉइंग शैली में बने कुछ चित्र जिसमे की एक लड़की कपड़े सूखा रही है, एक पोचा लगा रही है, एक सर पर टोकरी रख कर कुछ बेच रही है, एक लड़की छोटे बच्चे के साथ खेल रही है और एक लड़की बड़ी गेंद से खेल रही है।

बताओ

  • क्या तुम्हारे घर में किसी ने तुम्हें कुछ खेल खेलने से रोका है? कौन-कौन-से खेल?
  • किसने रोका? क्यों? फिर तुमने क्या किया?
  • क्या किसी ने तुम्हारी मदद की, खेलने के लिए प्रोत्साहित किया?

हमने कहा-अपनी टीम के बारे में बताओ

एक लड़की- शुरुआत में हमें थोड़ा अजीब लगता था। यहाँ पर लड़कियों की यह पहली टीम है न! जब हम यहाँ प्रैक्टिस करते थे तो कुछ लोग देखने आते। उन्हें लगता कि लड़कियाँ कैसे बास्केटबॉल खेल रही हैं? मगर अब कोई इतने अचरज से नहीं देखता। अब सब मानने लगे हैं कि हम भी अच्छा खेल सकती हैं।

अफ़साना- जब हमने खेलना शुरू किया, तब मैं ग्यारह साल की थी। तब हमें मैच के लिए किसी और जगह जाना भी मना था। अब दो साल बीत गए। अब हम और जगह भी मैच खेलने जाते हैं। मगर यह हुआ हमारी मेहनत से और कोच सर के सिखाने से।

दूसरी लड़की- हाँ, बहुत मेहनत करते हैं हम। हमारे सर बहुत सख्त हैं। हम साथ मिलकर पहले दौड़ लगाते हैं, फिर कसरत करते हैं। सर हमें अच्छा खेलना सिखाते हैं। बॉल को कैसे अपने पास टिकाए रखना है, दूसरी टीम के खिलाड़ियों

को छकाना है, बास्केट में बॉल कैसे डालना है, एक-दूसरे को बॉल कैसे-कैसे देना चाहिए, दौड़ लगाना, गोल करना इन सबकी प्रैक्टिस करवाते हैं।

आफ़रीन- सर कहते हैं, “तुम यह सोचकर मत खेलो कि तुम लड़कियाँ हो। एक

खिलाड़ी की तरह खेलो। अगर कभी छोटी-मोटी चोट लगे तो भी खेलते रहो।" हम एक-दूसरे को सहारा देते हैं। कह देते हैं, चल उठ, कुछ नहीं हुआ। अब हमारा खेल भी बहुत अच्छा हो गया है। सब कहते हैं, हमारा खेल भी लड़कों की टीम की तरह हो रहा है।

बास्केटबॉल खेलती कुछ लड़कियां।


शिक्षक संकेत-कक्षा में बच्चों की टोलियाँ बनाकर उन्हें अलग-अलग खेल खेलने के मौके दें। बच्चों को प्रोत्साहित करें कि वे 'टीम गेम्स' में अपने लिए न खेलकर टीम के लिए मिलकर खेलें।

एक लड़की- हम लड़कों की टीम के साथ भी खेलते हैं। तब हम चाहते हैं कि लड़के भी हमें खिलाड़ियों की नज़र से देखें। हम लड़कियाँ है, इसलिए हमें कोई छूट न मिले। कभी-कभी लड़के हमारे खेल की नकल करते हैं, तब हमें गुस्सा आता है। पर हम उसे एक चैलेंज की तरह लेकर अपनी गलतियाँ सुधारते हैं। अगर लड़के चीटिंग करते हैं तो हम उन्हें डाँट भी देते हैं।

चर्चा करो

  • क्या तुम्हारे इलाके या स्कूल में लड़के और लड़कियाँ अलग-अलग तरह के खेल खेलते हैं? अगर हाँ, तो लड़के क्या खेलते हैं और लड़कियाँ क्या खेलती हैं?
  • तुम क्या सोचते हो कि लड़के-लड़कियों के खेल और खेलने के तरीकों में कोई अंतर होता है?
  • तुम्हें क्या लगता है, लड़के लड़कियों के खेलों में अंतर करना चाहिए या नहीं?

हमने कहा-अपनी टीम के बारे में और बताओ

एक लड़की- हमारी टीम बहुत खास है। हमारी टीम में एकता है। झगड़ा हो जाए तो जल्दी ही सुलझा लेते हैं। जल्दी ही भूल भी जाते हैं। साथ में मिलकर रहना हमने यहाँ सीखा। हमारी टीम में से कुछ लड़कियों को मुंबई शहर की तरफ़ से खेलने का मौका मिला। यह मैच शोलापुर में हुआ था।

ज़रीन-जब हम मैच खेलने शोलापुर गए तो उस टीम की बाकी लड़कियाँ अलग-अलग जगहों से आई थीं। वे हम से ठीक से बात भी नहीं करती थीं। हम से जूनियर की तरह बर्ताव करती थीं। हमें बराबर खेलने का मौका भी नहीं देती थीं। हमें बहुत बुरा लगता था। उस टीम में आपसी सहयोग बिल्कुल भी नहीं था।


शिक्षक संकेत-बच्चों की यह समझ बनाने की कोशिश करें कि खिलाड़ी की योग्यता की पहचान उसके खेल से है, न कि उसकी जाति या आर्थिक स्थिति से।

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मैच के दौरान जब मैंने बॉल को टीम की एक लड़की की तरफ़ फेंका, तो वह ठीक से पकड़ नहीं पाई। फिर मुझे ही डाँटने लगी कि मेरी ही गलती है। ऐसी ही गलतफहमी में हम वह मैच हार गए। मगर हमारी अपनी टीम में ऐसा नहीं होता है। हम एक-दूसरे की गलती सँभाल लेते हैं। अगर खेल में दूसरे की गलती के कारण गोल न बना पाएँ, तो भी हम चिढ़ते नहीं हैं। सोचते हैं- 'कोई बात नहीं! अगली बार ज़रूर अच्छा करेंगे।' एक-दूसरे को सँभाल लेना ही असली बात है क्योंकि हम एक टीम के खिलाड़ी हैं।

बास्केट बॉल कोर्ट में खड़ी कुछ लड़कियां।

आफ़रीन-शोलापुर में खेलने के बाद हमें अपनी टीम की खासियत समझ आई। हमें पता चला कि हमारा आपसी सहयोग कितना अच्छा है। हम एक-दूसरे को समझ लेते हैं। सँभाल भी लेते हैं। हर एक खिलाड़ी कितना भी अच्छा हो, अगर टीम ठीक से साथ मिलकर न खेले तो हम हार भी सकते हैं। टीम के लिए हर खिलाड़ी की ताकत और कमज़ोरी को समझना ज़रूरी है।

स्टिक ड्रॉइंग शैली में बने कुछ चित्र जिसमे एक लड़की धीरे धीरे बाल को बास्केट में डाल रही है। पहले जमीन पर बाल है, फिर ऊपर, फिर थोड़ी और ऊपर और अंत में बास्केट में।

लिखो

  • क्या तुमने या तुम्हारे किसी दोस्त ने कभी अपने स्कूल, क्लास या मोहल्ले की टीम में खेला है? किसके साथ? कौन-सा खेल? टीम के लिए खेलना या अपने लिए खेलने में क्या अंतर है? तुम्हें क्या अच्छा लगता है? क्यों?
  • तुम्हारी टीम अफ़साना के शोलापुर वाली टीम जैसी है या नागपाड़ा की टीम जैसी? क्यों?
  • टीम में रहते हुए भी टीम के लिए खेलना या सिर्फ अपने लिए खेलने में से तुम्हें क्या अच्छा लगता है? क्यों?

हमने कहा-यहाँ तक पहुँचे हो, अब आगे क्या?

अफ़साना- जब से हम अच्छा खेल रहे हैं, तब से हमें कई जगह जाने के मौके मिल रहे हैं। हम अपने राज्य और शहर के लिए खेले हैं। हमें उम्मीद है कि कड़ी मेहनत करके हम अपने देश के लिए भी खेलेंगे।

हाँ, फिर क्रिकेट खिलाड़ियों की तरह हमें भी सब जानेंगे!

हम सब चाहते हैं कि हम अच्छा खेलें। अपने इलाके और आगे चलकर अपने देश का नाम आगे बढ़ाएँ। 'भारत की लड़कियाँ गोल्ड मेडल जीतें', यह (NAK करके दिखाएँ।

एक बोर्ड टूर्नामेंट कार्यक्रम दिखा रहा है।

एक लड़की बाल को बास्केट में डाल रही है और कुछ बच्चे खड़े हो कर देख  रहे हैं।

चर्चा करो

  • अपने स्कूल या इलाके की तरफ़ से तुमने किसी खेल या प्रतियोगिता में कभी हिस्सा लिया है? तब तुम्हें कैसा लगा?
  • क्या तुम खेलने के लिए दूसरी जगह गए थे? कैसी थी वह जगह? तुम्हें दूसरी जगह जाना कैसा लगा?
  • क्या तुमने भारत और दूसरे देशों के बीच कोई मैच देखे हैं? कौन-से?

शिक्षक संकेत- बच्चों में यह समझ बनाना आवश्यक है कि किसी भी खेल में खिलाड़ी की पहचान उसकी लगन से है न कि इससे कि वह किस स्तर के लिए खेलता है। अगर बच्चा पूरी लगन से स्कूल के स्तर पर ही खेलता है तो यही उसकी उपलब्धि है। फिर वह किस नंबर पर आया, इसका महत्व नहीं है।

  • हम भारत के क्रिकेट खिलाड़ियों के बारे में जानते हैं, उन्हें चाहते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्या किसी और खेल के भारतीय खिलाड़ियों को भी ऐसे ही सब जानते और चाहते हैं? (हाँ या नहीं)। तुम्हें इसके बारे में क्या लगता है? जैसे भारत के फुटबॉल या कबड्डी टीम के खिलाड़ियों को तुम पहचानते हो?

हमने पूछा-क्या कुछ और भी परेशानियाँ आईं?

खुशनूर-सच में देखो तो आज जो हम हैं, वह हमें आसानी से नहीं मिला। हम लड़कियों को बहुत मेहनत करनी पड़ी। घर वालों को समझाना पड़ा। कभी झगड़ा भी करना पड़ा। यह सब इसलिए क्योंकि आज भी लड़कियों को कम खेलने देते हैं। पहले समय में खेल-कूद तो बहुत दूर की बात, कुछ लोग तो लड़कियों को पढ़ाते तक भी नहीं थे। मेरी माँ चाहती थीं कि वे भी कुछ खास कर सकें। पर उन्हें कोई मौका नहीं मिला। इसलिए मेरी माँ मुझे पढ़ाई के साथ सभी तरह के कामों में भाग लेने को कहती हैं-फिर वे चाहे खेल हों, तैरना हो या फिर ड्रामा।

अफ़साना-वैसे आज भी हम सबको खेल खत्म होते ही घर पहुँचना पड़ता है। लड़के तो खेल के बाद यहाँ-वहाँ घूमकर बातें करके आराम से घर जाएँ, तो भी किसी को फ़र्क नहीं पड़ता। मैं खुद स्कूल से घर आने के बाद अपनी मम्मी के साथ दो-तीन घरों में साफ़-सफ़ाई का काम करती हूँ, फिर पढ़ाई करती हूँ। इस सबके बाद ही खेलने जा पाती हूँ। अपने घर में भी मम्मी की मदद करती हूँ। मेरे भाई को अगर चाय चाहिए और वह खुद बनाए तो माँ कहती हैं, “तीन-तीन बहनें हैं, फिर भी भाई को काम करना पड़ता है।"

एक लड़की- अब ज़रीन के छोटे भाई को ही देखो। यह सिर्फ पाँच-छ: साल का है। वह भी बोलता है, “मम्मी तुम दीदी को क्यों भेजती हो? दीदी अच्छी नहीं लगती ग्राउंड में खेलते हुए।" अगर उससे पूछो कि तू खुद खेलेगा? तो बोलता है, “हाँ, मैं तो लड़का हूँ, खेलूँगा।"

अफ़साना–लेकिन सभी बच्चों के लिए खेलना अच्छा है। कितना फ़ायदा होता है खेलने से, यह हम अब समझे। मैं चाहती हूँ कि मैं बहुत अच्छी खिलाड़ी बनूँ ताकि सब लड़कियाँ और लड़के भी चाहें कि वे मेरे जैसे बनें।

चर्चा करो

  • लड़कियों को पढ़ाई, खेल या उनकी पसंद के कामों से रोका जाए तो क्या होगा?
  • अगर तुम्हें किसी खेल या ड्रामे में शामिल होने से रोका जाए तो तुम्हें कैसा लगेगा?
  • खेल के क्षेत्र में तुमने किन-किन महिला खिलाड़ियों के बारे में सुना है? कौन-कौन और किस खेल में हैं?
  • तुमने खेल के अलावा और किस क्षेत्र में पहचान बनाने वाली महिलाओं के बारे में सुना है? तुम्हें क्या लगता है कि पहचान बनाने वाली महिलाओं के नाम पुरुष या लड़कों के नामों की अपेक्षा कम जाने जाते हैं? ऐसा क्यों?
  • अगर सभी लड़कियों को खेल या ड्रामे का मौका न दिया जाए तो ऐसी दुनिया तुम्हें कैसी लगेगी? ऐसा ही सभी लड़कों के साथ हो तो तुम्हें कैसा लगेगा?
  • क्या तुम किसी लड़की या महिला को जानते हो, जिसके जैसा तुम बनना चाहते हो? (फ़िल्म एक्टर और मॉडल छोड़कर कुछ और सोचो।)

आफ़रीन– मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि जब तुम कुछ बनने का सपना देखते हो तो उसे करने की पूरी कोशिश करो।

खुशनूर – अगर यह लगता है कि हमें कुछ बनना है तो उसके लिए पहले खुलकर कहना चाहिए। अपनी इच्छा बतानी चाहिए। अगर यह नहीं किया तो बाद में पछतावा होगा।

हमने कहा-तुम्हारे बारे में अखबार में आया। अब इस किताब में भी तुम्हारे बारे में छपेगा। यह सोचकर तुम्हें कैसा लगता है?

आफ़रीन- यह जानकर बहुत खुशी हुई, अजीब सी खुशी। ऐसा लगता है कि हम और अच्छा खेलें। अपने इलाके का, देश का नाम आगे बढ़ाएँ।

सब लड़कियाँ- हाँ, हमारी भी यही इच्छा है।


कोच सर

इस टीम की शुरुआत करने वाले और इन्हें खेल सिखाने वाले नूर खान ने बताया इस इलाके में यह एक ही ग्राउंड है, खेलने के लिए। मुंबई की यह जगह बहुत भीड़भाड़ वाली है। वहीं है हमारा छोटा-सा मैदान- बच्चूखान प्ले ग्राउंड। मुस्तफ़ा खान नाम के एक आदमी हमारे यहाँ रहते थे। उनसे सब बहुत डरते थे। मगर बच्चे उन्हें बेहद चाहते थे। इसलिए उन्हें सब बच्चूखान कहने लगे। तब इस जगह पर आज जैसा ग्राउंड नहीं था। यहीं मिी के मैदान में वे बच्चों को खेल सिखाते। उन बच्चों में हम भी थे। बच्चूखान की लगन से ही हमारे यहाँ के कई लोग आज विदेशों की टीमों के साथ मैच खेलते हैं। हमने भी बच्चूखान की तरह अपने इलाके के बच्चों को तैयार किया है। आज हमारी टीम में कई अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं। कुछ खिलाड़ियों को अर्जुन पुरस्कार भी मिला है।

नूर खान ने बताया, “पिछले कुछ सालों से हमने यहाँ की लड़कियों की टीम भी तैयार की हैं। हमारी लडकियाँ महाराष्ट्र के लिए भी खेलती हैं। सभी बहुत मेहनत करती हैं। हमारे लड़के-लड़कियाँ अलग-अलग तरह के परिवारों से आते हैं। कोई छोटे घर से तो कोई थोड़े बड़े। कोई उर्दू मीडियम से तो कोई अंग्रेज़ी। मगर यहाँ आकर ये सब एक टीम बनाते हैं।"


सोचकर लिखो

  • अखबार की रिपोर्ट में लिखा था, "अफ़साना दीवार फाँद चुकी है। लिंग-भेद की दीवार भी जो इसकी माँ ने खड़ी की है।" सोचकर अपने शब्दों में लिखो कि वह कौन-सी दीवार थी। लिंग-भेद का क्या मतलब होगा?

एक लड़की रिंग में बास्केटबॉल लगा रही है जबकि दूसरी लड़कियां खड़ी हैं और उसे देख रही हैं।

हम क्या समझे

  • तुम क्या सोचते हो लड़के-लड़कियों के खेलों में अंतर करना चाहिए कि नहीं। लिखो।
  • अगर तुम अपनी टीम के लीडर बनोगे तो अपनी टीम को तुम कैसे तैयार करोगे?