QR Code Chapter 3

9 - एक माँ की बेबसी

इस कविता को पढ़ते समय, आँखों के सामने कई चित्र बनते हैं। बचपन का चित्र, बचपन के खास समय-खेल और साथियों का चित्र, उन साथियों में एक खास साथी रतन का और एक माँ का चित्र। इसे पढ़ो और महसूस करो।

कविता धीरे-धीरे पढ़ने की चीज़ है। उसे मन में उतरने में काफी समय लगता है। कभी-कभी तो बरसों बाद हम बचपन की पढ़ी कविता पढ़ते हैं तो लगता है - पहली बार पढ़ा है इसे। कविता पढ़ने के बाद मन के किसी कोने में घर बना लेती हैं। किसी मौके पर वह उभर आती है।

कविता, कहानी, सबके साथ यह होता है। इसीलिए हमें इससे चिंतित होने की ज़रूरत नहीं कि कविता एक बार में पूरी तरह समझ में रही है या नहीं। अगर उससे सिर्फ़ एक चित्र ही उभरता है तो भी कविता कामयाब है।

कुछ बच्चे पतंग उढ़ा रहे हैं और एक बच्चा अपनी माँ को उन बच्चों की ओर उंगली से इशारा कर के दिखा रहा है।

न जाने किस अदृश्य पड़ोस से

निकल कर आता था वह 

खेलने हमारे साथ 

रतन, जो बोल नहीं सकता था 

खेलता था हमारे साथ 

एक टूटे खिलौने की तरह 

देखने में हम बच्चों की ही तरह 

था वह भी एक बच्चा। 

लेकिन हम बच्चों के लिए अजूबा था 

क्योंकि हमसे भिन्न था। 

थोड़ा घबराते भी थे हम उससे 

क्योंकि समझ नहीं पाते थे 

उसकी घबराहटों को, 

न इशारों में कही उसकी बातों को, 

न उसकी भयभीत आँखों में 

हर समय दिखती 

उसके अंदर की छटपटाहटों को। 

जितनी देर वह रहता 

पास बैठी उसकी माँ 

निहारती रहती उसका खेलना। 

अब जैसे-जैसे 

कुछ बेहतर समझने लगा हूँ 

उनकी भाषा जो बोल नहीं पाते हैं 

याद आती 

रतन से अधिक

उसकी माँ की आँखों में 

झलकती उसकी बेबसी।

कुँवर नारायण

एक अधूरा चित्र जिसमे एक व्यक्ति मिट्टी पर बैठा दिख रहा है।

कविता से

  1. यह बच्चा कवि के पड़ोस में रहता था, फिर भी कविता 'अदृश्य पड़ोस' से शुरू होती है। इसके कई अर्थ हो सकते हैं, जैसे

() कवि को मालूम नहीं था कि यह बच्चा ठीक-ठीक किस घर में रहता था।

() पड़ोस में रहने वाले बाकी बच्चे एक-दूसरे से बातें करते थे, पर यह बच्चा बोल नहीं पाता था, इसलिए पड़ोसी होने के बावजूद वह दूसरे बच्चों के लिए अनजाना था। इन दो में से कौन-सा अर्थ तुम्हें ज़्यादा सही लगता है? क्या कोई और अर्थ भी हो सकता है?

  1. 'अंदर की छटपटाहट' उसकी आँखों में किस रूप में प्रकट होती थी?
(क)  चमक के रूप में
(ख)  डर के रूप में
(ग)  जल्दी घर लौटने की इच्छा के रूप में

तरह-तरह की भावनाएँ

  1. नीचे लिखी भावनाएँ कब या कहाँ महसूस होती हैं?

() छटपटाहट

● अधीरता - कहीं जाने की जल्दी हो और जाना संभव हो जैसे- स्कूल की छुट्टी में अभी काफ़ी देर हो, पर घर पर ऐसा कोई मेहमान आने वाला हो जिसे तुम बहुत पसंद करते हो
● इच्छा - किसी चीज़ को पाने की इच्छा हो पर वह तुरंत मिल सकती हो जैसे भूख लगी हो, पर खाना तैयार हो
● संदेश - हम कोई संदेश देना चाह रहे हों पर दूसरे समझ पा रहे हों जैसे शिक्षक से कहना हो कि घंटी बज गई है, अब पढ़ाना बंद करें, पर उन्हें घंटी सुनाई दी हो

इनमें से कौन-सा अर्थ या संदर्भ इस बच्चे पर लागू होता है?

() घबराहट

हमें जब किसी बात की आशंका हो तो घबराहट महसूस होती है। जैसे

() अँधेरा होने वाला हो और हम घर से काफ़ी दूर हों या अकेले हों

() समय कम हो और हमें कोई काम पूरा कर लेना हो- जैसे परीक्षा में देखा जाता है

() यह डर हो कि दूसरे के मन में क्या चल रहा है

जैसे-पापा को मालूम चल गया हो कि काँच का गिलास तुमसे टूटा है

  1. जो बच्चा बोल नहीं सकता, वह किस-किस बात की आशंका से 'घबराहट' महसूस कर सकता है?

  1. थोड़ा घबराते भी थे हम उससे, क्योंकि समझ नहीं पाते थे उसकी घबराहटों को"

  • रतन क्या सोचकर घबराता होगा?
  • अपने दोस्तों से पूछकर पता करो, कौन क्या सोचकर और किस काम को करने में घबराता है। कारण भी पता करो।

दोस्त/सहेली का नाम

किस बात से घबराता है?

घबराने का कारण

भाषा के रंग

  1. कवि ने इस बच्चे को 'टूटे खिलौने' की तरह बताया है। जब कोई खिलौना टूट जाता है तो वह उस तरह से काम नहीं कर पाता जिस तरह से पहले करता था। संदर्भ के अनुसार खाली स्थान भरो।

खिलौना

टूटने का कारण

नतीजा

गाड़ी

पहिया निकल जाने पर

चल नहीं पाती

गुड़िया

सीटी निकल जाने पर

गेंद

जोकर

चाबी निकल जाने पर

  1. 'बेबस' शब्द 'वे' और 'वश' को जोड़कर बना है। यहाँ बे का अर्थबिना' है। नीचे दिए शब्दों में यही 'बे' छिपा है। इस सूची में तुम और कितने शब्द जोड़ सकती हो?

बेजान

बेचैन

बेसहारा

बेहिसाब

देखने के तरीके

1. इस कविता में देखने से संबंधित कई शब्द आए हैं। ऐसे छह शब्द छाँटकर लिखो।

2. “माँ की आँखों में झलकती उसकी बेबसी"

आँखें बहुत कुछ कहती हैं। वे तरह-तरह के भाव लिए हुए होती हैं। नीचे ऐसी कुछ आँखों का वर्णन है। इनमें से कौन-सी नज़रें तुम पहचानते हो-

सहमी नजरें

क्रोध भरी आँखें

शरारती आँखें

प्यार भरी नजरें

उनींदी आँखें

डरावनी आँखें

  1. नीचे आँखों से जुड़े कुछ मुहावरे दिए गए हैं। तुम इनका प्रयोग किन संदर्भो में करोगे?

आँख दिखाना

नज़र चुराना

आँख का तारा

नज़रें फेर लेना

आँख पर पर्दा पड़ना

माँ

'याद आती रतन से अधिक

उसकी माँ की आँखों में झलकती उसकी बेबसी"

  1. रतन की माँ की आँखों में किस तरह की बेबसी झलकती होगी?
  2. अपनी माँ के बारे में सोचते हुए नीचे लिखे वाक्यों को पूरे करो-

() मेरी माँ बहुत खुश होती हैं जब _____________________

_____________________________________________

() माँ मुझे इसलिए डाँटती हैं, क्योंकि _____________________

_____________________________________________

() मेरी माँ चाहती हैं कि मैं _____________________

_____________________________________________

() माँ उस समय बहुत बेबस हो जाती हैं जब_____________________

_____________________________________________

() मैं चाहती / ता हूँ कि मेरी माँ _____________________

_____________________________________________

मज़ाखटोला

मज़ाखटोला

किताब का यह भाग हास्य या हँसी की रचनाओं का है। ‘किसी बात या रचना में ऐसा क्या है कि उसे सुनने या पढ़ने से हमें हँसी आ जाती है?’ इस प्रश्न का उत्तर हम एक चुटकुले की मदद से ढूँढ़ सकते हैं-

अध्यापक- ‘मैंने तुम्हें गाय और घास का चित्र बनाने के लिए कहा था, पर तुम्हारा कागज़ तो कोरा पड़ा है।’

दिनेश- ‘सर, मैं घास और गाय का चित्र बना रहा था पर जब तक चित्र पूरा होता, गाय घास खाकर अपने घर चली गई।’

इस चुटकुले में तीन ऐसी चीज़ें साफ़-साफ़ देखी जा सकती हैं जो लगभग हरेक हास्य रचना में होती हैं-

1- स्थिति का दबाव या लाचारी

2- लाचारी से निपटने के लिए कोई एकदम नई कल्पना या सूझ 

3- शुरू की स्थिति का उलट जाना

चुटकुले की शुरुआत में दिनेश पर यह दबाव है कि वह अपना चित्र दिखाए। चित्र उसने बनाया ही नहीं है, दिखाएगा क्या? मगर अपनी कल्पना से वह एक ऐसा उत्तर देता है जिसमें कमी ढूँढ़ना मुश्किल है। उसके उत्तर को हम कल्पनाशील कह सकते हैं। जो चीज़ हमें हँसने के लिए मजबूर करती है, वह यही कल्पनाशीलता या सूझबूझ है जो एक दबाव वाली स्थिति को बदल देती है।

इस तरह देखें तो हम कह सकते हैं कि हर हास्य रचना एक काल्पनिक स्थिति का निर्माण करती है। हमें हँसाकर वह रोज़ाना की वास्तविक दुनिया या जि़ंदगी के दबावों से थोड़ी देर के लिए मुक्ति दिलाती है। हास्य रचनाएँ हमें कुछ सिखाने की कोशिश नहीं करतीं, वे केवल हँसाती हैं। पर ऐसी रचनाओं को गौर से देखकर हम यह समझ सकते हैं कि कोई रचना या उसकी भाषा हमें क्यों और कैसे हँसाती है।

ऊपर दी गई तीन विशेषताओं को इस खंड में शामिल रचनाओं में ढूँढ़ा जा सकता है। चावल की रोटियाँ शीर्षक नाटक में कोको नाम के लड़के की लाचारी बढ़ती चली जाती है। चावल की रोटियाँ अकेले बैठकर खाने की उसकी इच्छा अंत तक पूरी नहीं होती। दूसरी तरफ़ एक दिन की बादशाहत में रोज़ाना रहने वाली स्थिति उलट जाती है।

घर के बड़ों को एक दिन बच्चों की तरह जीना पड़ता है। उलटी हुई स्थिति का मज़ा हम गुरु और चेला में भी देख सकते हैं। यह एक ऐसी अँधेर नगरी की कहानी है जहाँ हर चीज़ एक समान कीमत पर बिकती है। ऐसी नगरी में गुरु और चेला एक मुसीबत में बुरी तरह फँस जाते हैं, पर अंत में एक अनोखी स्थिति बनती है और वे बच जाते हैं। इस कविता की भाषा पर ध्यान दें तो हम शब्दों और मुहावरों के प्रयोग में छिपी हँसी को पहचान सकते हैं।

स्वामी की दादी शीर्षक कहानी में स्वामीनाथन के भोले-भाले प्रश्न सुनकर उसकी दादी मन-ही-मन खुश होती है। शायद दो बातें इस कहानी को मज़ेदार बनाती हैं- एक, दादी स्वामी के सवालों को बहुत ज़्यादा गंभीरता से लेती हैं। दूसरे, दादी-पोता दोनों में अपनी-अपनी बात कहने का उतावलापन और होड़ होती है।

पहेली बुझाने वाली कहानियाँ भी एक अलग तरह का आनंद देती हैं। अकबर-बीरबल के किस्से इसीलिए लोकप्रिय हैं कि उनमें अकबर के कठिन प्रश्नों का जवाब बीरबल बड़ी चतुराई से देते हैं। गोनू झा के किस्से भी इसी प्रकार के हैं।

मज़ा देने वाली रचनाओं को हम एक और कोण से देख सकते हैं-

हाजि़रजवाबी, व्यंग्य और हँसाने वाली परिस्थितियाँ, घटनाक्रम तथा अतिशयोक्ति। यदि हम मज़ाखटोला की रचनाओं को इस दृष्टि से देखें तो गुरु और चेला तथा गोनू झा का किस्सा बिना जड़ का पेड़ हाजि़रजवाबी और सूझबूझ के नमूने हैं। चावल की रोटियाँ और एक दिन की बादशाहत में हास्य के तत्त्व परिस्थितियों और घटनाक्रम से पैदा होते हैं। स्वामी की दादी हमें हँसाता नहीं है, पर दादी-पोते के बीच मज़ेदार संवाद पढ़कर हम मुस्कुराते ज़रूर हैं। ढब्बू जी के पहले कार्टून में अतिशयोक्ति से हास्य पैदा होता है तो दूसरा कार्टून व्यंग्य का उदाहरण है।

बच्चों में स्वस्थ और बुद्धिमत्ता पूर्ण हास्यबोध पैदा करने के लिए हाजि़रजवाबी और सूझबूझ की लोककथाएँ, कार्टून और हास्य-व्यग्ंय की रचनाएँ अधिक-से-अधिक उपलब्ध कराई जानी चाहिए।