विषय-सूची

आमुख iii
शिक्षकों के लिए एक भूमिका vii
मूल्यांकन में शिक्षकों की मदद के लिए कुछ विचार x
इकाई एक: भारतीय लोकतंत्र में समानता
2
अध्याय 1: समानता 4
 इकाई दो: राज्य सरकार 16
 अध्याय 2: स्वास्थ्य में सरकार की भूमिका 18
 अध्याय 3: राज्य शासन कैसे काम करता है 30
 इकाई तीन: लिंग बोध-जेंडर  42
 अध्याय 4: लड़के और लड़कियों के रूप में बड़ा होना 44
 अध्याय 5: औरतों ने बदली दुनिया 54
 इकाई चार: संचार माध्यम 68
 अध्याय 6: संचार माध्यमों को समझना  70
 इकाई पाँच: बाज़ार
80
 अध्याय 7: हमारे आस-पास के बाज़ार 82
 अध्याय 8: बाज़ार में एक कमीज़ 92
भारतीय लोकतंत्र में समानता (अनुबद्ध)
अध्याय 9: समानता के लिए संघर्ष 102
संदर्भ 110


इकाई  एक

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भारतीय लोकतंत्र में समानता


शिक्षकों के लिए

किताब का यह खंड, भारत के विशेष संदर्भ के साथ, लोकतंत्र में समानता की अहम् भूमिका से विद्यार्थियों का परिचय कराता है। भारत का संविधान समस्त नागरिकों को समानता के लिए आश्वस्त करता है। इसके बावज़ूद लोगों का रोज़मर्रा का जीवन समानता से कोसों दूर है। नागरिक शास्त्र की पहले की पाठ्यपुस्तकें समानता की चर्चाओं में संविधान के प्रावधानों को दोहरा भर देती थीं पर लोगों के जीवन की वास्तविक स्थिति पर पर्याप्त ध्यान नहीं देती थीं। यह इकाई एक अलग ढंग से समानता की चर्चा को प्रस्तुत करती हैं। विभिन्न समुदायों द्वारा आज भी कई प्रकार से असमानता का जो व्यवहार किया जाता है और भोगा जाता है, उनके माध्यम से समानता की ज़रूरत को इसमें उभारा जाएगा।

पहला अध्याय विद्यार्थियों को कांता, ओमप्रकाश वाल्मीकि और अंसारी दंपत्ति से मिलवाता है, जिन्होंने अलग-अलग तरह से असमानता का अनुभव किया। इनके अनुभवों के ज़रिए हम मानवीय गरिमा की अवधारणा का परिचय दे रहे हैं। असमानताओं को दूर करने के लिए ज़रूरी कानून और नीतियाँ बनाने में सरकार की भूमिका की चर्चा हम यह दिखाने के लिए कर रहे हैं कि मौज़ूदा असमानताओं को मिटाने की प्रतिबद्धता सरकार के काम का एक बड़ा हिस्सा है।

इस अध्याय में हम संक्षिप्त रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में असमानता के मुद्दे को भी देखते हैं और यह स्पष्ट कर रहे हैं कि असमानता एक विश्वव्यापी मुद्दा है और कई लोकतांत्रिक देशों में देखने को मिलता है।

इस इकाई का दूसरा अध्याय इस पुस्तक का नौवाँ पाठ है। पुस्तक में समानता को लेकर जगह-जगह उठाए गए प्रमुख विचारों को इस अंतिम अध्याय में एक साथ बाँधा गया है। इस अध्याय का एक बड़ा अंश समानता की लड़ाई में विभिन्न लोगों के योगदान की चर्चा करता है। इसमें उदाहरणस्वरूप एक सामाजिक आंदोलन पर विशेष ध्यान दिया गया है और साथ ही उन रचनात्मक तरीकों को भी उभारा गया है (जैसे-लेखन, गीत, कविताएँ), जिनके माध्यम से लोग समानता की माँग व्यक्त करते हैं।

इन दोनों ही अध्यायों का उद्देश्य विद्यार्थियों को यह समझने में मदद करना है कि समानता और लोकतंत्र की अवधारणाएँ गतिमान हैं, स्थिर नहीं। इनकी गतिमयता इस बात से ही दिखाई देती है कि सरकार को समानता के लिए नए-नए कानून और कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं और विभिन्न आर्थिक व सामाजिक मुद्दों पर लोगों के आंदोलन चलते रहते हैं।

कांता, ओमप्रकाश, अंसारी दंपति और तवा मत्स्य संघ, इन सभी के अनुभवों जैसे ही विभिन्न स्थानीय अनुभव हर जगह मौज़ूद होंगे। इस इकाई में निहित अवधारणाओं को विद्यार्थियों के लिए अधिक प्रासंगिक, व्यावहारिक और उपयुक्त बनाने के लिए स्थानीय स्थितियों का हवाला दिया जाना चाहिए।

कक्षा में समानता के मुद्दे पर चर्चा होना शिक्षक से एेसी संवेदना और दृढ़ प्रतिबद्धता की माँग करता है जिससे प्रत्येक विद्यार्थी की गरिमा अक्षुण्ण बनी रह सके।




अध्याय 1

समानता

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चुनाव के दिन कांता और उसकी दोस्त सुजाता वोट डालने की बारी का इंतज़ार कर रही हैं...

भारत एक लोकतंत्रीय देश है। कक्षा 6 की पुस्तक में हमने लोकतंत्रीय सरकार के मुख्य तत्त्वों के बारे में पढ़ा था, जैसे-लोगों की भागीदारी, संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान, समानता और न्याय। ‘समानता’, लोकतंत्र की मुख्य विशेषता है और इसकी कार्यप्रणाली के सभी पहलुओं को प्रभावित करती है। इस अध्याय में आप समानता के बारे में और अधिक जानेंगे-यह क्या है, लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक क्यों हैं, और भारत में सब समान हैं या नहीं। हम कांता की कहानी से चर्चा आरंभ करते हैं।

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मताधिकार की समानता

कहानी का प्रारंभ कांता के वोट देने की लाइन में खड़े होने से होता है। पुनः उन विभिन्न लोगों की ओर देखो, जो उसके साथ लाइन में खड़े हैं। कांता अपने मालिक अशोक जैन को पहचान लेती है और अपने पड़ोसी छोटेलाल को भी। भारत जैसे एक लोकतंत्रीय देश में सब वयस्कों को मत देने का अधिकार है; चाहे उनका धर्म कोई भी हो, शिक्षा का स्तर या जाति कुछ भी हो, वे गरीब हों या अमीर। इसे, जैसा कि आप पिछले वर्ष की पुस्तक में पढ़ चुके हैं, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार कहा जाता है और यह सभी लोकतंत्रों का आवश्यक पहलू है। ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विचार’, समानता के विचार पर आधारित है, क्योंकि यह घोषित करता है कि देश का हर वयस्क स्त्रीपुरुष चाहे उसका आर्थिक स्तर या जाति कुछ भी क्यों न हो, एक वोट का हकदार है। कांता वोट देने के लिए बहुत उत्सुक है और यह देख कर बहुत खुश है कि वह अन्य सबके बराबर है, क्योंकि उन सबके पास भी एक ही वोट है।

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परंतु जैसे-जैसे दिन बीतता जाता है, कांता के मन में समानता के वास्तविक अर्थ के बारे में शंका होने लगती है।

वह क्या बात है, जिसने कांता के मन में शंका पैदा कर दी? आओ, उसके जीवन की दिनचर्या देखें। वह एक झोपड़पट्टी में रहती है और उसके घर के पीछे एक नाला है। उसकी बेटी बीमार है, परंतु वह अपने काम से एक दिन की भी छुट्टी नहीं ले सकती क्योंकि उसे अपने मालिक से बच्ची को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए पैसे उधार लेने हैं। घरेलू काम की नौकरी उसे थका देती है और अंततः उसके दिन की समाप्ति फिर लंबी लाइन में खड़े होकर होती है। सरकारी अस्पताल के सामने लगी यह लाइन, उस लाइन से भिन्न है, जिसमें वह सुबह लगी थी, क्योंकि इस लाइन में खड़े अधिकांश लोग गरीब हैं।
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अन्य प्रकार की असमानताएँ

कांता उन बहुत-से लोगों में से एक है, जो भारतीय लोकतंत्र में रहते हैं और जिन्हें मताधिकार प्राप्त है, लेकिन जिनका दैनिक जीवन और कार्य करने की स्थितियाँ समानता से बहुत दूर हैं। निर्धन होने के अतिरिक्त भारत में लोगों को अन्य अनेक कारणों से भी असमानता का सामना करना पड़ता है। इसका आशय हम निम्नलिखित दो कहानियों को पढ़कर समझेंगे। ये दोनों ही वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं और भारत में होने वाली विभिन्न प्रकार की असमानताओं पर प्रकाश डालती हैं।

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भारत में सामान्यतः प्रचलित असमानताओं में से एक है- जातिगत व्यवस्था। यदि आप ग्रामीण भारत में रहते हैं, तो जातिगत पहचान का अनुभव शायद बहुत छोटी आयु में ही हो जाता है। यदि आप भारत के शहरी क्षेत्र में रहते हैं, तो शायद यह सोचेंगे कि लोग अब जात-पात में विश्वास नहीं करते। परंतु ज़रा एक प्रमुख समाचारपत्र के वैवाहिक विज्ञापन के कॉलम को देखिए, तो आप पाएँगे कि उच्च शिक्षा प्राप्त शहरी भारतीय के दिमाग में भी जाति कितनी महत्त्वपूर्ण है।

आइए, अब एक कहानी स्कूल जाने वाले एक दलित बच्चे के अनुभवों के बारे में पढ़ें। दलितों के बारे में आप पहले ही पिछले वर्ष की पुस्तक में पढ़ चुके हैं। ‘दलित’ एक एेसा शब्द है, जो निचली कही जानी वाली जाति के लोग स्वयं को संबोधित करने के लिए प्रयोग में लाते हैं। ‘दलित’ का अर्थ होता है-कुचला हुआ या टूटा हुआ और इस शब्द का इस्तेमाल करके दलित यह संकेत करते हैं कि पहले भी उनके साथ बहुत भेदभाव होता था और आज भी हो रहा है।

ओमप्रकाश वाल्मीकि (1950-2013) एक प्रसिद्ध दलित लेखक हैं। अपनी आत्मकथा जूठन में वे लिखते हैं- "स्कूल में दूसरों से दूर बैठना पड़ता था, वह भी जमीन पर। अपने बैठने की जगह तक आते-आते चटाई छोटी पड़ जाती थी। कभी-कभी तो एकदम पीछे दरवाजे के पास बैठना पड़ता था जहाँ से बोर्ड पर लिखे अक्षर धुँधले दिखते थे। कभी-कभी बिना कारण पिटाई भी कर देते थे।" जब वे कक्षा चार में थे, प्रधानाध्यापक ने ओमप्रकाश से स्कूल और खेल के मैदान में झाड़ू लगाने को कहा। वे लिखते हैं- "लंबा-चौड़ा मैदान मेरे वजूद से कई गुना बड़ा था, जिसे साफ करने से मेरी कमर दर्दकरने लगी थी। धूल से चेहरा, सिर अँट गया था। मुँह के भीतर धूल घुस गई थी। मेरी कक्षा में बाकी बच्चे पढ़ रहे थे और मैं झाड़ू लगा रहा था। हेडमास्टर अपने कमरे में बैठे थे लेकिन निगाह मुझ पर टिकी थी। पानी पीने तक की इजाजत नहीं थी। पूरा दिन मैं झाड़ू लगाता रहा।... स्कूल के कमरों की खिड़की, दरवाजों से मास्टरों और लड़कों की आँखें छिपकर तमाशा देख रही थीं।" ओमप्रकाश से अगले दो दिनों तक स्कूल और खेल के मैदान में झाड़ू लगवाई जाती रही और यह क्रम तभी रुका, जब उधर से गुज़रते हुए उसके पिता ने अपने बेटे को झाड़ू लगाते देखा। उन्होंने शिक्षकों का साहसपूर्वक सामना किया और ओमप्रकाश का हाथ पकड़ कर स्कूल से बाहर जाते हुए ऊँचे स्वर में सबको सुनाते हुए कहा... "मास्टर हो...इसलिए जा रहा हूँ...पर इतना याद रखिए मास्टर...

यो...यहीं पढ़ेगा...इसी मदरसे में। और यो ही नहीं, इसके बाद और भी आवेंगे पढ़ने कू।"

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ओमप्रकाश वाल्मीकि की किताब जूठन का मुखपृष्ठ, जिसमें उन्होंने एक दलित बालक के रूप में बड़े होने के अनुभवों को प्रस्तुत किया है।

आपके विचार से ओमप्रकाश वाल्मीकि के साथ उसके शिक्षक और सहपाठियों ने असमानता का व्यवहार क्यों किया था? अपने आपको ओमप्रकाश वाल्मीकि की जगह रखते हुए चार पंक्तियाँ लिखिए कि उक्त स्थिति में आप कैसा अनुभव करते?

दूसरी कहानी एक एेसी घटना पर आधारित है, जो भारत के एक बड़े शहर में घटी और देश के अधिकांश भागों में एेसा होना एक सामान्य बात है। यह कहानी श्री और श्रीमती अंसारी की है, जो शहर में किराए पर एक मकान लेना चाहते थे। वे पैसे वाले थे, इसलिए किराए की कोई समस्या नहीं थी। वे मकान ढूँढ़ने में मदद लेने एक प्रॉपर्टी डीलर के पास गए। डीलर ने उन्हें बताया कि वह कई खाली मकानों के बारे में जानता है, जो किराए पर मिल सकते हैं। वे पहला मकान देखने गए। अंसारी दंपति को मकान बहुत अच्छा लगा और उन्होेंने मकान लेने का निर्णय कर लिया। फिर जब मकान-मालकिन ने उनके नाम सुने, तो वे बहाने बनाने लगीं कि वो मांसाहारी लोगों को मकान नहीं दे सकतीं, क्योंकि उस बिलि्ंडग में कोई-भी मांसाहारी व्यक्ति निवास नहीं करता। प्रॉपर्टी डीलर और अंसारी दंपति, दोनों ही यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि पड़ोस से मछली पकाने की गंध आ रही थी। उनके सामने उन दूसरे और तीसरे मकानों में भी जो उन्हें पसंद आए थे, यही बहाना दुहराया गया। अंत में प्रॉपर्टी डीलर ने सुझाव दिया कि क्या वे अपना नाम बदल कर श्री और श्रीमती कुमार रखना चाहेंगे। अंसारी दंपति एेसा करने के इच्छुक नहीं थे, इसलिए उन्होंने कुछ और मकान देखने का निश्चय किया। अंत में लगभग एक महीने ढूँढ़ने के बाद उन्हें एक मकान-मालकिन मिलीं, जो उन्हें किराए पर मकान देने को तैयार थीं।
आपके विचार से अंसारी दंपति के साथ असमानता का व्यवहार क्यों किया जा रहा था? यदि आप अंसारी दंपति की जगह होते और आपको रहने के लिए इस कारण जगह न मिलती क्योंकि कुछ पड़ोसी आपके धर्म के कारण आपके पास नहीं रहना चाहते, तो आप क्या करते?

मानवीय गरिमा का मूल्य

अब तक आप समझ गये होगे कि प्रायः कुछ लोगों के साथ असमानता का व्यवहार बस इस कारण होता है कि उनका जन्म किस जाति, लिंग या धर्म में हुआ और वे उच्च वर्ग के हैं या मध्यम या निम्न वर्ग के। ओमप्रकाश वाल्मीकि और अंसारी परिवार के साथ असमानता का व्यवहार जातिगत और धर्मगत कारणों से हुआ।
जब लोगों के साथ असमानता का व्यवहार होता है, तो उनके सम्मान को ठेस पहुँचती है। ओमप्रकाश वाल्मीकि तथा अंसारी दंपति, के साथ किए गए व्यवहार के कारण उनकी गरिमा को ठेस पहुँची। ओमप्रकाश वाल्मीकि को उनकी जाति के कारण स्कूल में झाड़ू लगवाकर शिक्षकों और छात्रों ने उनके सम्मान को बुरी तरह आहत किया और उन्हें यह महसूस कराया कि वे विद्यालय के अन्य छात्रों के समान नहीं, उनसे कमतर हैं। बच्चा होने के कारण ओमप्रकाश वाल्मीकि स्वयं इस बारे में अधिक कुछ नहीं कर सके। किंतु जब उनके पिता ने अपने बेटे को झाड़ू लगाते देखा, तो उन्हें इस असमान व्यवहार पर क्रोध आया और उन्होंने शिक्षकों के समक्ष विरोध प्रकट किया। जब लोगों ने अंसारी दंपति को अपना मकान किराए पर देने से इंकार कर दिया, तब उनके सम्मान को भी चोट पहुँची। फिर जब प्रॉपर्टी डीलर ने उन्हें नाम बदलने का सुझाव दिया, तब उनके आत्मसम्मान ने उन्हें एेसा करने से रोक दिया और उन्होंने उस सुझाव को ठुकरा दिया।

ओमप्रकाश और अंसारी दंपति के साथ एेसा व्यवहार नहीं होना चाहिए था। वे उसी सम्मान और उसी गरिमा के हकदार थे, जो अन्य किसी व्यक्ति को मिलती है।

यदि आप अंसारी परिवार के एक सदस्य होते, तो प्रॉपर्टी डीलर के नाम बदलने के सुझाव का उत्तर किस प्रकार देते?

क्या आपको अपने जीवन की कोई एेसी घटना याद है, जब आपकी गरिमा को चोट पहुँची हो? आपको उस समय कैसा महसूस हुआ था?

 

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1975 में बनी दीवार फ़िल्म में जूते पॉलिश करने वाला एक लड़का फ़ेंक कर दिए गए पैसे को उठाने से इंकार कर देता है। वह मानता है कि उसके काम की भी गरिमा है और उसे उसका भुगतान आदर के साथ किया जाना चाहिए।


भारतीय लोकतंत्र में समानता

भारतीय संविधान सब व्यक्तियों को समान मानता है। इसका अर्थ है कि देश के व्यक्ति चाहे वे पुरुष हों या स्त्री, किसी भी जाति, धर्म, शैक्षिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंध रखते हों, वे सब समान माने जाएँगे। लेकिन इसके बाद भी हम यह नहीं कह सकते कि असमानता खत्म हो गई है। यह खत्म नहीं हुई है, लेकिन फिर भी कम-से-कम भारतीय संविधान में सब व्यक्तियों की समानता के सिद्धांत को मान्य किया गया है। जहाँ पहले भेदभाव और दुर्व्यवहार से लोगों की रक्षा करने के लिए कोई कानून नहीं था, अब अनेक कानून लोगों के सम्मान तथा उनके साथ समानता के व्यवहार को सुनिश्चित करने के लिए मौज़ूद हैं।


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संसद हमारे लोकतंत्र का आधार स्तंभ है और हम अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से उसमें प्रतिनिधित्व पाते हैं।

समानता को स्थापित करने के लिए संविधान में जो प्रावधान हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं - प्रथम, कानून की दृष्टि में हर व्यक्ति समान है। इसका तात्पर्य यह है कि हर व्यक्ति को देश के राष्ट्रपति से लेकर कांता जैसी घरेलू काम की नौकरी करने वाली महिला तक, सभी को एक ही जैसे कानून का पालन करना है। दूसरा, किसी भी व्यक्ति के साथ उसके धर्म, जाति, वंश, जन्मस्थान और उसके स्त्री या पुरुष होने के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। तीसरा, हर व्यक्ति सार्वजनिक स्थानों पर जा सकता है, जिनमें खेल के मैदान, होटल, दुकानें और बाज़ार आदि सम्मिलित हैं। सब लोग सार्वजनिक कुँओं, सड़कों और नहाने के घाटों का उपयोग कर सकते हैं। चौथा, अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिया गया है।
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सतत विकास लक्ष्य 2ः भूखमरी समाप्त करना

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शासन ने संविधान द्वारा मान्य किए गए समानता के अधिकार को दो तरह से लागू किया है - पहला, कानून के द्वारा और दूसरा, सरकार की योजनाओं व कार्यक्रमों द्वारा सुविधाहीन समाजों की मदद करके। भारत में एेसे अनेक कानून हैं, जो व्यक्ति के समान व्यवहार प्राप्त करने के अधिकार की रक्षा करते हैं। कानून के साथ-साथ सरकार ने उन समुदायों जिनके साथ सैकड़ों वर्षों तक असमानता का व्यवहार हुआ है, उनका जीवन सुधारने के लिए अनेक कार्यक्रम और योजनाएँ लागू की हैं। ये योजनाएँ यह सुनिश्चित करने के लिए चलाई गई हैं कि जिन लोगों को अतीत में अवसर नहीं मिले, अब उन्हें अधिक अवसर प्राप्त हों।

इस दिशा में सरकार द्वारा उठाया गया एक कदम है-मध्याह्न भोजन की व्यवस्था। इस कार्यक्रम के अंतर्गत सभी सरकारी प्राथमिक स्कूलों के बच्चों को दोपहर का भोजन स्कूल द्वारा दिया जाता है। यह योजना भारत में सर्वप्रथम तमिलनाडु राज्य में प्रारंभ की गई और 2001 में उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्य सरकारों को इसे अपने स्कूलों में छह माह के अंदर आरंभ करने के निर्देश दिए। इस कार्यक्रम के काफ़ी सकारात्मक प्रभाव हुए। उदाहरण के लिए, दोपहर का भोजन मिलने के कारण गरीब बच्चों ने अधिक संख्या में स्कूल में प्रवेश लेना और नियमित रूप से स्कूल जाना शुरू कर दिया। शिक्षक बताते हैं कि पहले बच्चे खाना खाने घर जाते थे और फिर वापस स्कूल लौटते ही नहीं थे। परंतु अब, जब से स्कूल में मध्याह्न भोजन मिलने लगा है, उनकी उपस्थिति में सुधार आया है। वे माताएँ जिन्हें पहले अपना काम छोड़कर दोपहर को बच्चों को खाना खिलाने घर आना पड़ता था, अब उन्हें एेसा नहीं करना पड़ता है। इस कार्यक्रम से जातिगत पूर्वाग्रहों को कम करने में भी सहायता मिली है, क्योंकि स्कूल में सभी जातियों के बच्चे साथ-साथ भोजन करते हैं और कुछ स्थानों पर तो भोजन पकाने के लिए दलित महिलाओं को काम पर रखा गया है। मध्याह्न भोजन कार्यक्रम ने निर्धन विद्यार्थियों की भूख मिटाने में भी सहायता की है, जो प्रायः खाली पेट स्कूल आते हैं और इस कारण पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं।

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उत्तराखंड की एक शासकीय शाला में बच्चों को उनका मध्याह्न भोजन परोसा जा रहा है।


मध्याह्न भोजन कार्यक्रम क्या है? क्या आप इस कार्यक्रम के तीन लाभ बता सकते हैं? आपके विचार से यह कार्यक्रम किस प्रकार समानता की भावना बढ़ा सकता है? 

अपने क्षेत्र में लागू की गई किसी एक सरकारी योजना के बारे में पता लगाइए। इस योजना में क्या किया जाता है? यह किस के लाभ के लिए बनाई गई है?

यद्यपि शासकीय कार्यक्रम, अवसरों की समानता बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, किंतु अभी-भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। मध्याह्न भोजन कार्यक्रम ने निर्धन बच्चों का स्कूलों में प्रवेश और उनकी उपस्थिति तो बढ़ा दी है, लेकिन फिर भी इस देश में वे स्कूल जहाँ अमीरों के बच्चे जाते हैं, उन स्कूलों से बहुत अलग हैं जहाँ गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं। आज भी देश में कई स्कूल हैं, जिनमें ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे दलित बच्चों के साथ भेदभाव और असमानता का व्यवहार किया जाता है। इन बच्चों को एेसी असमान स्थितियों में ढकेला जाता है, जहाँ उनके सम्मान की रक्षा नहीं हो पाती है। एेसा इसलिए है, क्योंकि कानून बन जाने के बाद भी लोग उन्हें समान समझने से इंकार कर देते हैं।

इसका मुख्य कारण यह है कि दृष्टिकोण में बहुत धीरे-धीरे परिवर्तन आता है। यद्यपि लोग यह जानते हैं कि भेदभाव का व्यवहार कानून के विरुद्ध है, फिर भी वे जाति, धर्म, अपंगता, आर्थिक स्थिति और महिला होने के आधार पर लोगों से असमानता का व्यवहार करते हैं। वर्तमान दृष्टिकोण को बदलना तभी संभव है, जब लोग यह विश्वास करने लगें कि कोई भी कमतर नहीं है और हर व्यक्ति सम्मानजनक व्यवहार का अधिकारी है। प्रजातंत्रीय समाज में समानता स्थापित करना एक सतत् संघर्ष है, जिसमें व्यक्तियों और विभिन्न समाजों को सहयोग देना है। इस पुस्तक में आप इसके बारे में और अधिक पढ़ेंगे।

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"अपने आत्मसम्मान को दाँव पर लगा कर जीवित रहना अशोभनीय है। आत्मसम्मान जीवन का सबसे \ज़रुरी हिस्सा है। इसके बिना व्यक्ति नगण्य है। आत्मसम्मान के साथ जीवन बिताने के लिए व्यक्ति को कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करनी होती है। केवल कठिन और निरंतर संघर्ष से ही व्यक्ति बल, विश्वास और मान्यता प्राप्त कर सकता है।" 

"मनुष्य नाशवान है। हर व्यक्ति को किसी-न-किसी दिन मरना है, परंतु व्यक्ति को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह अपने जीवन का बलिदान, आत्मसम्मान के उच्च आदर्शों को विकसित करने और अपने मानव जीवन को बेहतर बनाने में करेगा। किसी साहसी व्यक्ति के लिए आत्मसम्मान रहित जीवन जीने से अधिक अशोभनीय और कुछ नहीं है।"

– बी.आर. अंबेडकर

 

अन्य लोकतंत्रों में समानता के मुद्दे

शायद आप सोच रहे होंगे कि क्या भारतीय लोकतंत्र ही एेसा है जहाँ असमानता का अस्तित्व है और जहाँ समानता के लिए संघर्ष जारी है। सच तो यह है कि संसार के अधिकांश लोकतंत्रीय देशों मेें, समानता के मुद्दे पर विशेष रूप से संघर्ष हो रहे हैं। उदाहरण के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकन लोग, जिनके पूर्वज गुलाम थे और अफ्रीका से लाए गए थे, वे आज भी अपने जीवन को मुख्य रूप से असमान बताते हैं। जबकि 1950 के अंतिम दशक में अफ्रीकी-अमेरिकनों को समान अधिकार दिलाने के लिए आंदोलन हुआ था। इससे पहले अफ्रीकी-अमेरिकनों के साथ संयुक्त राज्य में बहुत असमानता का व्यवहार होता था और कानून भी उन्हें समान नहीं मानता था। उदाहरण के लिए बस से यात्रा करते समय उन्हें बस में पीछे बैठना पड़ता था या जब भी कोई गोरा आदमी बैठना चाहे, उन्हें अपनी सीट से उठ जाना पड़ता था।

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रो\ज़ा पार्क्स, एक अफ्रीकी-अमेरिकन औरत, जिनकी एक विद्रोही प्रतिक्रिया ने अमेरिकी इतिहास की दिशा बदल दी।

रोज़ा पार्क्स (1913-2005) एक अफ्रीकी-अमेरिकन महिला थीं। 1 दिसंबर 1955 को दिन भर काम करके थक जाने के बाद बस में उन्होंने अपनी सीट एक गोरे व्यक्ति को देने से मना कर दिया। उस दिन उनके इंकार से अफ्रीकी-अमेरिकनों के साथ असमानता को लेकर एक विशाल आंदोलन प्रारंभ हो गया, जो नागरिक अधिकार आंदोलन (सिविल राइट्स मूवमेंट) कहलाया। 1964 के नागरिक अधिकार अधिनियम ने नस्ल, धर्म और राष्ट्रीय मूल के आधार पर भेदभाव को निषेध कर दिया। इसने यह भी कहा कि अफ्रीकी-अमेरिकन बच्चों के लिए सब स्कूलों के दरवाज़े खोले जाएँगे और उन्हें उन अलग स्कूलों में नहीं जाना पड़ेगा, जो विशेष रूप से केवल उन्हीं के लिए खोले गए थे। इतना होने के बावज़ूद भी अधिकांश अफ्रीकी-अमेरिकन गरीब हैं। अधिकतर अफ्रीकी-अमेरिकन बच्चे केवल एेसे सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने की ही सामर्थ्य रखते हैं, जहाँ कम सुविधाएँ हैं और कम योग्यता वाले शिक्षक हैं; जबकि गोरे विद्यार्थी निजी स्कूलों में जाते हैं या उन क्षेत्रों में रहते हैं, जहाँ के सरकारी स्कूलों का स्तर निजी स्कूलों जैसा ही ऊँचा है।


भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 के अंश

धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध-

(1) राज्य, किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा।

(2) कोई नागरिक केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर -

(क) दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश

या

(ख) पूर्णतः या भागतः राज्य-निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुँओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग,के संबंध में किसी भी निर्योग्यता, दायित्त्व, निर्बंधन या शर्त के अधीन नहीं होगा।


लोकतंत्र की चुनौती

किसी भी देश को पूरी तरह से लोकतंत्रीय नहीं कहा जा सकता। हमेशा से ही एेसे समुदाय और व्यक्ति होते हैं, जो लोकतंत्र को नए अर्थ देते हैं और अधिक से अधिक समानता लाने के लिए नए-नए सवाल उठाते हैं। इसके केंद्र में वह संघर्ष है, जो सब व्यक्तियों को समानता और सम्मान दिलाने का पक्षधर है। इस पुस्तक में आप पढ़ेंगे कि किस तरह समानता का प्रश्न भारतीय लोकतंत्र में हमारे दैनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित करता है। इन पाठों को पढ़ते हुए विचार कीजिए कि क्या सब व्यक्तियों की समानता और उनके आत्मसम्मान को ऊँचा रखने की भावना को लोग स्वीकार कर रहे हैं या नहीं।


अभ्यास

1. लोकतंत्र में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार क्यों महत्त्वपूर्ण है?

2. बॉक्स में दिए गए संविधान के अनुच्छेद 15 के अंश को पुनः पढ़िए और दो एेसे तरीके बताइए, जिनसे यह अनुच्छेद असमानता को दूर करता है?

3. ओमप्रकाश वाल्मीकि का अनुभव, अंसारी दंपति के अनुभव से किस प्रकार मिलता था?

4. "कानून के सामने सब व्यक्ति बराबर हैं"-इस कथन से आप क्या समझते हैं? आपके विचार से यह लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण क्यों है?

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http://disabilityaffairs.gov.in
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5. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016, के अनुसार उनको समान अधिकार प्राप्त हैं और समाज में उनकी पूरी भागीदारी संभव बनाना सरकार का दायित्त्व है। सरकार को उन्हें निःशुल्क शिक्षा देनी है और विकलांग बच्चों को स्कूलों की मुख्यधारा में सम्मिलित करना है। कानून यह भी कहता है कि सभी सार्वजनिक स्थल, जैसे-भवन, स्कूल आदि में ढलान बनाए जाने चाहिए, जिससे वहाँ विकलांगों के लिए पहुँचना सरल हो।

चित्र को देखिए और उस बच्चे के बारे में सोचिए, जिसे सीढ़ियों से नीचे लाया जा रहा है। क्या आपको लगता है कि इस स्थिति में उपर्युक्त कानून लागू किया जा रहा है? वह भवन में आसानी से आ-जा सके, उसके लिए क्या करना आवश्यक है? उसे उठाकर सीढ़ियों से उतारा जाना, उसके सम्मान और उसकी सुरक्षा को कैसे प्रभावित करता है?

शब्द-संकलन

सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार- यह लोकतंत्रीय समाज का अत्यंत महत्त्वपूर्ण पहलू है। इसका अर्थ है कि सभी वयस्क (18 वर्ष एवं उससे अधिक आयु के) नागरिकों को वोट देने का अधिकार है, चाहे उनकी सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो।

गरिमा- इसका तात्पर्य अपने-आपको और दूसरे व्यक्तियों को सम्मान योग्य समझने से है।

संविधान- यह वह दस्तावेज़ है, जिसमें देश की जनता व सरकार द्वारा पालन किए जाने वाले नियमों और अधिनियमों को निरूपित किया गया है।

नागरिक अधिकार आंदोलन- एक आंदोलन, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में 1950 के दशक के अंत में प्रारंभ हुआ और जिसमें अफ्रीकी-अमेरिकन लोगों ने नस्लगत भेदभाव को समाप्त करने और समान अधिकारों की माँग की।