vigyan-016





अध्याय 16


प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन


प्रकृति के साथ सद्भाव में रहना हमारे लिए नया नहीं है। जीवन हमेशा भारत की परंपरा और संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। यह हमारी संपोषित लंबी परंपराओं और प्रथाओं, रीति-रिवाजों, कला व शिल्प, त्यौहार, भोजन, आस्थाओं, अनुष्ठान व लोकगीत के साथ एकीकृत है। हमें यह दर्शन है कि ‘‘संपूर्ण प्राकृतिक संसार सद्भाव में रहे’’ जो संस्कृत के प्रसिद्ध वाक्यांश ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ में परिलक्षित होता है जिसका अर्थ है ‘‘संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है।’’ इस वाक्यांश का उल्लेख महाउपनिषद् में मिलता है जो शायद प्राचीन भारतीय साहित्य ‘‘अथर्व वेद’’ का ही एक हिस्सा है।

कक्षा 9 में हमने प्राकृतिक संसाधनों जैसे कि मृदा, वायु एवं जल के बारे में पढ़ा तथा यह भी जाना कि विभिन्न संघटकों का प्रकृति में बार-बार चक्रण किस प्रकार होता

है? पिछले अध्याय में हमने यह भी पढ़ा कि हमारे क्रियाकलापों से इन संसाधनों का प्रदूषण हो रहा है। इस अध्याय में हम कुछ संसाधनों के बारे में जानेंगे तथा यह भी जानेंगे कि हम किस प्रकार उनका उपयोग कर रहे हैं? हो सकता है हम यह भी सोचें कि हमें अपने संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करना चाहिए जिससे संसाधनों का संपोषण हो सके और हम अपने पर्यावरण का संरक्षण भी कर सकें। हम वन, वन्य जीवन, जल, कोयला तथा पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधनों की चर्चा करेंगे तथा उन समस्याओं पर भी विचार करेंगे कि संपोषित विकास हेतु इन संसाधनों का प्रबंधन किस प्रकार किया जाए?

हम अक्सर ही पर्यावरणीय समस्याओं के बारे में सुनते या पढ़ते हैं। यह अधिकतर वैश्विक समस्याएँ हैं तथा इनके समाधान अथवा परिवर्तन में हम अपने आपको असहाय पाते हैं। इनके लिए अनेेक अंतर्राष्ट्रीय कानून एवं विनियमन हैं तथा हमारे देश में  भी पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक कानून हैं। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्य कर रहे हैं।


क्रियाकलाप 16.1


 कार्बन डाइअॉक्साइड के उत्सर्जन के विनियमन के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक का पता लगाइए।

 इस विषय पर कक्षा में चर्चा कीजिए कि हम इन मानकों को प्राप्त करने हेतु किस प्रकार सहयोग कर सकते हैं?


क्रियाकलाप 16.2


 एेसे अनेक संगठन हैं जो पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाने में लगे हैं। वे एेसे क्रियाकलापों का भी प्रोत्साहन करते हैं जिससे हमारे पर्यावरण एवं प्राकृतिक संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। अपने आसपास के क्षेत्र/शहर/कस्बे/गाँव में कार्य करने वाले संगठनों के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।

 पता लगाइए कि इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आप क्या योगदान दे सकते हैं।


संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन (निःशेषण) से उत्पन्न समस्याओ के विषय में जागरूकता हमारे समाज में अपेक्षाकृत एक नया आयाम है। जब यह जागरूकता बढ़ती है तो कुछ न कुछ कदम भी उठाए जाते हैं। आपने गंगा सफ़ाई योजना के विषय में अवश्य ही सुना होगा। कई करोड़ की यह योजना करीब 1985 में इसलिए प्रारंभ की गई क्योंकि गंगा के जल की गुणवत्ता बहुत कम हो गई थी (चित्र 16.1)। कोलिफार्म जीवाणु का एक वर्ग है जो मानव की आंत्र में पाया जाता है, जल में इसकी उपस्थिति, इस रोगजन्य सूक्ष्म जीवाणु द्वारा जल का संदूषित होना दर्शाता है।


चित्र 16.1 गंगा जल में संपूर्ण कोलिफ़ार्म गणना स्तर

स्रोतः केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, 2012



गंगा का प्रदूषण

गंगा हिमालय में स्थित अपने उदगम गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी में गंगा सागर तक 2500 km तक की यात्रा करती है। इसके किनारे स्थित उत्तर प्रदेश, बिहार तथा बंगाल के 100 से भी अधिक नगरों ने इसे एक नाले में बदल दिया है। इसका मुख्य कारण इन नगरों द्वारा उत्सर्जित कचरा एवं मल का इसमें प्रवाहित किया जाना है। इसके अतिरिक्त मानव के अन्य क्रियाकलाप हैं–नहाना, कपड़े धोना, मृत व्यक्तियों की राख एवं शवों को बहाना। यही नहीं उद्योगों द्वारा उत्पादित रासायनिक उत्सर्जन ने गंगा का प्रदूषण-स्तर इतना बढ़ा दिया है कि इसके विषैले आदि अन्यकारण हैं। इससे जल में मछलियाँ मरने लगीं। नमामि गंगे कार्यक्रम जून 2014 में केंद्र सरकार द्वारा एक प्रमुख कार्यक्रम के रूप में अनुमोदित एक एकीकृत संरक्षण मिशन है। यह प्रदूषण संरक्षण और राष्ट्रीय नदी गंगा के कायाकल्प के प्रभावी न्यूनीकरण के दो उद्देश्यों को पूरा करने के लिए शुरू किया गया था। स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्रीय मिशन कार्यान्वयन विंग है, जिसे अक्तूबर 2016 में स्थापित किया गया था।




जैसा कि आप देख सकते हैं कि मापन योग्य कुछ कारकों का प्रयोग करके प्रयुक्त जल की गुणवत्ता का निर्धारण अथवा प्रदूषण मापन किया जाता है। कुछ प्रदूषक अत्यल्प मात्रा में होते हुए भी हानिकारक हो सकते हैं। इनके मापन के लिए हमें अत्यंत परिष्कृत उपस्करों की आवश्यकता होती है। परंतु अध्याय 2 में हम यह भी पढ़ चुके हैं कि जल का pH सरलता से सार्व सूचक की सहायता से मापा जा सकता है।



क्रियाकलाप 16.3


 सार्व सूचक (universal indicator) की सहायता से अपने घर में आपूर्त पानी का pH ज्ञात कीजिए।

 अपने अड़ोस-पड़ोस के जलाशय (तालाब, झील, नदी, झरने) का pH भी ज्ञात कीजिए।

 क्या अपने प्रेक्षणों के आधार पर आप बता सकते हैं कि जल प्रदूषित है अथवा नहीं।


परन्तु हमें समस्या के विशाल रूप को देखकर हताश होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एेसे अनेक कार्य हैं जिनके द्वारा हम स्थिति में अंतर ला सकते हैं। आपने पर्यावरण को बचाने के लिए पाँच प्रकार के 'R' के विषय में तो अवश्य सुना होगा। Refuse (इनकार), Reduce (कम उपयोग), Reuse (पुनः उपयोग), Repurpose (पुनः प्रयोजन) और Recycle (पुनः चक्रण)। ये क्या बताते हैं?

इनकार : इसका अर्थ है कि जिन वस्तुओं की आपको आवश्यकता नहीं है, उन्हें लेने से इनकार करना। उन उत्पादों को खरीदने से इनकार करें जो आपको, आपके परिवार और पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकते हैं। प्लास्टिक के थैलों को लेने के लिए इनकार करें।

कम उपयोग : इसका अर्थ है कि आपको कम से कम वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए। आप बिजली के पंखे एवं बल्ब का स्विच बंद करके बिजली बचा सकते हैं। आप टपकने वाले नल की मरम्मत करके जल की बचत कर सकते हैं। आपको आहार व्यर्थ नहीं करना चाहिए। क्या आप कुछ अन्य वस्तुओं के विषय में सोच सकते हैं, जिनका उपयोग कम किया जा सकता है?

पुनः उपयोग : यह पुनःचक्रण से भी अच्छा तरीका है क्योंकि पुनःचक्रण में कुछ ऊर्जा व्यय होती है। पुनः उपयोग के तरीके में आप किसी वस्तु का बार-बार उपयोग करते हैं। लिफाफों के फेंकने की अपेक्षा आप फिर से उपयोग में ला सकते हैं। विभिन्न खाद्य पदार्थों के साथ आई प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बे इत्यादि का उपयोग में रसोईघर में वस्तुओं को रखने के लिए किया जा सकता हैं। अन्य कौन-सी वस्तुएँ हैं जिन्हें हम पुनः उपयोग में ला सकते हैं?

पुनः प्रयोजन : इसका अर्थ यह है कि जब कोई वस्तु जिस उपयोग के लिए बनी है जब उस उपयोग में नहीं लाई जा सकती है तो उसे किसी अन्य उपयोगी कार्य के लिए प्रयोग करें। उदाहरण के लिए टूटे-फूटे चीनी मिट्टी के बर्तनों में पौधे उगाना।

पुनः चक्रण : इसका अर्थ है कि आपको प्लास्टिक, कागज़, काँच, धातु की वस्तुएँ तथा एेसे ही पदार्थों का पुनःचक्रण करके उपयोगी वस्तुएँ बनानी चाहिए। जब तक अति आवश्यक न हो इनका नया उत्पादन/संश्लेषण विवेकपूर्ण नहीं है। इनके पुनः चक्रण के लिए पहले हमें अपद्रव्यों को अलग करना होगा जिससे कि पुनःचक्रण योग्य वस्तुएँ दूसरे कचरे के साथ भराव क्षेत्र में न फेंक दी जाएँ। क्या आपके गाँव, कस्बे अथवा नगर में एेसा कोई प्रबंध है जिससे इन पदार्थों का पुनःचक्रण किया जा सके?

यही नहीं अपनी दैनिक आवश्यकताओं और क्रियाकलापों पर निर्णय लेते समय भी हम पर्यावरण संबंधी निर्णय ले सकते हैं। इसके लिए, हमें यह जानने की आवश्यकता है कि हमारे चयन से पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ सकता है, ये प्रभाव तात्कालिक, दीर्घकालिक अथवा व्यापक हो सकते हैं। संपोषित विकास की संकल्पना मनुष्य की वर्तमान आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति एवं विकास को प्रोत्साहित तो करती ही है साथ ही साथ भावी संतति के लिए संसाधनों का संरक्षण भी करती है। आर्थिक विकास पर्यावरण संरक्षण से संबंधित है। अतः संपोषित विकास से जीवन के सभी आयाम में परिवर्तन निहित है। यह लोगों के ऊपर निर्भर है कि वे अपने चारों ओर के आर्थिक- सामाजिक एवं पर्यावरणीय स्थितियों के प्रति अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाएँ तथा प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के संसाधनों के वर्तमान उपयोग में परिवर्तन के लिए तैयार रहना होगा।



क्रियाकलाप 16.4


 क्या आप कई वर्षों के बाद किसी गाँव अथवा शहर में गए हैं? यदि हाँ, तो क्या पिछली बार की अपेक्षा नए घर एवं सड़कें बन गईं हैं? आपके विचार में इन्हें बनाने के लिए आवश्यक वस्तुएँ कहाँ से प्राप्त हुई होंगी?

 उन पदार्थों की सूची बनाइए तथा उनके स्रोतों का भी पता लगाइए।

 अपने द्वारा बनाई गई सूची को अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए। क्या आप एेसे उपाय सुझा सकते हैं जिनसे इन वस्तुओं के उपयोग में कमी लाई जा सके।


16.1 हमें संसाधनों के प्रबंधन की क्यों आवश्यकता है?

केवल सड़कें एवं इमारतें ही नहीं परंतु वे सारी वस्तुएँ जिनका हम उपयोग करते हैं; जैसे–भोजन, कपड़े, पुस्तकें, खिलौने, फर्नीचर, औज़ार तथा वाहन इत्यादि सभी हमें पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त होती हैं। हमें केवल एक ही वस्तु पृथ्वी के बाहर से प्राप्त होती है, वह है ऊर्जा जो हमें सूर्य से प्राप्त होती है। परंतु यह ऊर्जा भी हमें पृथ्वी पर उपस्थित जीवों के द्वारा प्रक्रमों से, तथा विभिन्न भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रमों द्वारा ही प्राप्त होती है।

हमें अपने संसाधनों की सावधानीपूर्वक (विवेकपूर्ण ढंग से) उपयोग की क्यों आवश्यकता है? क्योंकि यह संसाधन असीमित नहीं हैं। स्वास्थ्य-सेवाओं में सुधार के कारण हमारी जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। जनसंख्या में वृद्धि के कारण सभी संसाधनों की माँग भी कई गुना तेजी से बढ़ी है। प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करते समय दीर्घकालिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखना होगा कि ये अगली कई पीढ़ियों तक उपलब्ध हो सकें। संसाधनों का अर्थ उनका दोहन अथवा शोषण नहीं है। इस प्रबंधन में इस बात को भी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि इनका वितरण सभी वर्गों में समान रूप से हो, न कि मात्र मुट्ठी भर अमीर और शक्तिशाली लोगों को इनका लाभ मिले।

एक बात पर और ध्यान देने की आवश्यकता है कि जब हम इन संसाधनों का दोहन करते हैं तो हम पर्यावरण को क्षति पहुँचाते हैं। उदाहरण के लिए, खनन से प्रदूषण होता है क्योंकि धातु के निष्कर्षण के साथ-साथ बड़ी मात्रा में धातुमल भी निकलता है। अतः संपोषित प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में अपशिष्टों के सुरक्षित निपटान की भी व्यवस्था होनी चाहिए।

संपोषित विकास व प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की वर्तमान वैश्विक चिंताएँ हमारे देश में प्राकृतिक संरक्षण की लंबी परंपरा व संस्कृति की तुलना में हाल ही की हैं। पूर्व एेतिहासिक भारत में प्रकृति संरक्षण व संपोषित विकास के सिद्धांत की स्थिरता अपने सबसे अच्छे रूप में स्थापित की गई थी।

हमारा प्राचीन साहित्य एेसे उदाहरणों से भरा है जहाँ मूल्य और प्रकृति के प्रति मनुष्य की संवेदनशीलता की महिमा और सिद्धांत की स्थिरता अपने सबसे अच्छे रूप में स्थापित की गई थी।


क्रियाकलाप 16.5


 अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उपयोगी व प्रकृति संरक्षण के लिए परंपरागत तरीकों का अवलोकन करें। अपना अनुभव सभी सहपाठियों को बताएँ। एक रिपोर्ट/विवरणी बनाकर जमा करें।


भारतीय साहित्य जैसे उपनिषद व स्मृतियों में जंगलों के उपयोग व प्रबंधन तथा संपोषितता को एक अंतर्निहित विषय के रूप में ज़ोर दिया गया है। संस्कृत साहित्य ‘‘अथर्व वेद’’ की एक ऋचा (12.1.11) के अनुसार

हे पृथिवि देवी! तुम्हारे बिना बर्फ वाले और बर्फ वाले पर्वत और जंगल कलयाणकारी हों।

हे विभिन्न रंगों वाली स्थिर एवं रक्षित पृथ्वी जिस पर मैं अजेय, अनाहत, अक्षत होकर रहूँ।

एक अन्य ऋचा के अनुसार

हे भूमि! मैं जो तुम में खड्डा (गर्त) खोदता हूँ, वह शीघ्र ही भर जावे। मैं तुम्हारे मर्म (चराचर जगत) को और हृदय को हत करने वाला न बनूँ।

बाद में देवी चंद द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘अथर्व वेद-संस्कृत टेक्स्ट विद् इंग्लिश ट्रांसलेशन’’ में अंग्रेजी अनुवाद किया गया है।



वैदिक काल के दौरान जंगल वनस्पति के उत्पादक व साथ ही सुरक्षात्मक पहलू, दोनों पर बल दिया गया। वैदिक काल के अंत में कृषि एक प्रमुख आर्थिक गतिविधि के रूप में उभरी। यह वह समय था जब पवित्र जंगलों व गुफ़ाओं, पवित्र गलियारों व विभिन्न प्रकार की जातीय-वानिकी प्रथाओं जैसी सांस्कृतिक परिदृश्य की अवधारणाएँ विकसित हुइं। जो वैदिक काल के बाद भी लगातार चलती रहीं। साथ ही, व्यापक श्रेणी की जातीय-वानिकी प्रथाओं को परंपराओं, प्रथाओं व अनुष्ठानों के साथ एकीकृत करते हुए, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा की जाती रही।



प्रश्न

1. पर्यावरण-मित्र बनने के लिए आप अपनी आदतों में कौन-से परिवर्तन ला सकते हैं?

2. संसाधनों के दोहन के लिए कम अवधि के उद्देश्य के परियोजना के क्या लाभ हो सकते हैं?

3. यह लाभ, लंबी अवधि को ध्यान में रखकर बनाई गई परियोजनाओं के लाभ से किस प्रकार भिन्न हैं।

4. क्या आपके विचार में संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए? संसाधनों के समान वितरण के विरुद्ध कौन-कौन सी ताकतें कार्य कर सकती हैं?



16.2 वन एवं वन्य जीवन

वन ‘जैव विविधता के विशिष्ट (Hotspots) स्थल’ हैं। जैव विविधता का एक आधार उस क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न स्पीशीज़ की संख्या है। परंतु, जीवों के विभिन्न स्वरूप (जीवाणु, कवक, फर्न, पुष्पी पादप, सूत्रकृमि, कीट, पक्षी, सरीसृप इत्यादि) भी महत्वपूर्ण हैं। वंशागत जैव विविधता को संरक्षित करने का प्रयास प्राकृतिक संरक्षण के मुख्य उद्देश्यों में से एक है। प्रयोगों और वस्तुस्थिति के अध्ययन से हमें पता चलता है कि विविधता के नष्ट होने से पारिस्थितिक स्थायित्व भी नष्ट हो सकता है।



क्रियाकलाप 16.6


 जिन वन उत्पाद का आप प्रयोग करते हैं उनकी एक सूची बनाइए।

 आपके विचार में वन के निकट रहनेवाला व्यक्ति किन वस्तुओं का उपयोग करता होगा?

 वन के अंदर रहने वाला व्यक्ति किन वस्तुओं का उपयोग करता होगा?

 अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए कि उपरोक्त व्यक्तियों की आवश्यकताओं में क्या कोई अंतर है अथवा कोई अंतर नहीं है एवं इनके कारण का भी पता लगाइए।


16.2.1 स्टेकहोल्डर (दावेदार)

हम सभी विभिन्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं। परंतु वन संसाधनों पर हमारी निर्भरता में अंतर है। हममें से कुछ लोगों के पास कुछ विकल्प हैं, परंतु कुछ के पास नहीं। जब हम वन संरक्षण की बात सोचते हैं तो हमें यह भी सोचना होगा कि इसके दावेदार कौन हैं-

(i) वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले लोग अपनी अनेक आवश्यकताओं के लिए वन पर निर्भर रहते हैं।

(ii) सरकार का वन विभाग जिनके पास वनों का स्वामित्व है तथा वे वनों से प्राप्त संसाधनों का नियंत्रण करते हैं।

(iii) उद्योगपति जो तेंदु पत्ती का उपयोग बीड़ी बनाने से लेकर कागज़ मिल तक विभिन्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं, परंतु वे वनों के किसी भी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं करते।

(iv) वन्य जीवन एवं प्रकृति प्रेमी जो प्रकृति का संरक्षण इसकी आद्य अवस्था में करना चाहते हैं।

आइए, देखें कि प्रत्येक समूह की वन आवश्यकताएँ क्या हैं अथवा वन से उन्हें क्या प्राप्त होता है। स्थानीय लोगों को ईंधन के लिए जलाऊ (लकड़ी) छोटी लकड़ियाँ एवं छाजन की काफी मात्रा में आवश्यकता होती है। बाँस का उपयोग झोपड़ी बनाने, भोजन एकत्र करने एवं भंडारण के लिए होता है। खेती के औज़ार, मछली पकड़ने एवं शिकार के औज़ार मुख्यतः लकड़ी के बने होते हैं इसके अतिरिक्त वन, मछली पकड़ने एवं शिकार-स्थल भी होते हैं। विभिन्न व्यक्ति फल, नट्स तथा औषधि एकत्र करने के साथ-साथ अपने पशुओं को वन में चराते हैं अथवा उनका चारा वनों से एकत्र करते हैं।

क्या आप सोचते हैं कि वन संपदा का इस प्रकार उपयोग करने से इन संसाधनों का ह्रास हो जाएगा? यह मत भूलिए कि अंग्रेजों के भारत आने से पहले लोग इन्हीं वनों में शताब्दियों से रह रहे थे। अंग्रेजों ने वनों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। उनसे पहले यहाँ के मूल निवासियों ने एेसी विधियों का विकास किया जिससे संपोषण भी होता रहे। अंग्रेजों ने न केवल वनों पर आधिपत्य जमाया वरन् अपने स्वार्थ के लिए उनका निर्ममता से दोहन भी किया। यहाँ के मूलनिवासियों को एक सीमित क्षेत्र में रहने के लिए मजबूर किया गया तथा वन संसाधनों का किसी सीमा तक अत्यधिक दोहन भी प्रारंभ हो गया। स्वतंत्रता के बाद वन विभाग ने अंग्रेजों से वनों का नियंत्रण तो अपने हाथ में ले लिया, परंतु प्रबंधन व्यवहार में स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं एवं ज्ञान की उपेक्षा होती रही। अतः वनों के बहुत बड़े क्षेत्र एक ही प्रकार के वृक्षों जैसे कि पाइन (चीड़), टीक अथवा यूक्लिप्टस के वनों में परिवर्तित हो गए। इन वृक्षों को उगाने के लिए सर्वप्रथम सारे क्षेत्र से अन्य सभी पौधों को हटा दिया गया जिससे क्षेत्र की जैव विविधता बड़े स्तर पर नष्ट हो गई। यही नहीं स्थानीय लोगों की विभिन्न आवश्यकताओं जैसे कि पशुओं के लिए चारा, औषधि हेतु वनस्पति, फल एवं नट इत्यादि की आपूर्ति भी नहीं हो सकी। इस प्रकार के रोपण से उद्योगों को लाभ मिला जो वन विभाग के लिए भी राजस्व का मुख्य स्रोत बन गया।

चित्र 16.2

वन्यजीवन का एक दृश्य

क्या आप जानते हैं कि कितने उद्योग वन उत्पादों पर निर्भर करते हैं? टिम्बर (इमारती लकड़ी), कागज़, लाख तथा खेल के समान इसके कुछ उदाहरण हैं।

उद्योेग इन वनों को अपनी फैक्टरी के लिए कच्चे माल का स्रोत मात्र ही मानते हैं। निहित स्वार्थ से लोगों का एक बड़ा वर्ग सरकार से उद्योगों के लिए कच्चे माल को बहुत कम मूल्य पर प्राप्त करने में लगा रहता है। क्योंकि स्थानीय निवासियों की अपेक्षा इन व्यक्तियों की पहुँच सरकार में काफ़ी ऊपर तक होती है, अतः उन्हें उस क्षेत्र के संपोषित विकास में कोई रुचि नहीं होती। उदाहरण के लिए, किसी वन के टीक के सभी वृक्षों को काटने के बाद, वे दूरस्थ वनों से टीक प्राप्त करने लगेंगे। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि वे इनका इष्टतम उपयोग सुनिश्चित करें जिससे कि वह आगे आने वाली पीढ़ियों को भी उपलब्ध हो सके। आपके विचार में लोगों को इस प्रकार व्यवहार करने से कैसे रोका जा सकता है?


क्रियाकलाप 16.7


 किन्हीं दो वन उत्पादों का पता लगाइए जो किसी उद्योग के आधार हैं।

 चर्चा कीजिए कि यह उद्योग लंबे समय तक संपोषित हो सकता है। अथवा क्या हमें इन उत्पादों की खपत को नियंत्रित करने की आवश्यकता है?


अंत में हम चर्चा करते हैं प्रकृति एवं वन्य-जीवन प्रेमियों की जो वन पर निर्भर तो नहीं हैं, परंतु वनों के प्रबंधन में उनकी बात को बहुत महत्त्व दिया जाता है। संरक्षण का प्रारंभ बड़े जंतुओं जैसे कि शेर, चीता, हाथी एवं गैंडा से हुआ था अब उन्होंने संपूर्ण जैव विविधता को पूर्ण रूप से संरक्षित रखने के महत्त्व को समझ लिया है। परंतु क्या हमें एेसे व्यक्तियों को पर्याप्त महत्त्व नहीं देना चाहिए जो वन तंत्र का भाग बन गए हैं इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि स्थानीय निवासी परंपरानुसार वनों के संरक्षण का प्रयास कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, राजस्थान के विश्नोई समुदाय के लिए वन एवं वन्य प्राणि संरक्षण उनके धार्मिक अनुष्ठान का भाग बन गया है। भारत सरकार ने पिछले दिनों जीव संरक्षण हेतु अमृता देवी विश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार की व्यवस्था की है। यह पुरस्कार अमृता देवी विश्नोई की स्मृति में दिया जाता है जिन्होंने 1731 में राजस्थान के जोधपुर के पास खेजराली गाँव में ‘खेज़री वृक्षों’ को बचाने हेतु 363 लोगों के साथ अपने आपको बलिदान कर दिया था।

अध्ययनों ने इस बात को स्थापित कर दिया है कि वनों के परंपरागत उपयोग के तरीकों के विरुद्ध पूर्वाग्रह का कोई ठोस आधार नहीं है। उदाहरणतः, विशाल हिमालय राष्ट्रीय उद्यान के सुरक्षित क्षेत्र में एल्पाइन के वन हैं जो भेड़ों के चरागाह थे। घुमंतु (खानाबदोश) चरवाहे प्रत्येक वर्ष ग्रीष्मकाल में अपनी भेडें़ घाटी से इस क्षेत्र में चराने के लिए ले जाते थे। परंतु इस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना के बाद इस परंपरा को रोक दिया गया। अब यह देखा गया है कि पहले तो यह घास बहुत लंबी हो जाती है, फिर लंबाई के कारण जमीन पर गिर जाती है जिससे नयी घास की वृद्धि रुक जाती है। संरक्षित क्षेत्रों में स्थानीय निवासियों को बलपूर्वक रोकने की प्रबंधन नीति संभवतः लंबे समय तक सफ़ल नहीं हो पाई। किसी भी प्रकार से वनों को होने वाली क्षति के लिए केवल स्थानीय निवासियों को ही उत्तरदायी ठहराना ठीक नहीं है। हम औद्योगिक आवश्यकताओं एवं विकास परियोजनाओं जैसे कि सड़क एवं बाँध निर्माण से वनों के विनाश अथवा इसको होने वाली क्षति से आँखें नहीं मूँद सकते। इन संरक्षित क्षेत्रों में पर्यटकों के द्वारा अथवा उनकी सुविधा के लिए की गई व्यवस्था से होने वाली क्षति के बारे में भी विचार करना होगा।

चित्र 16.3

खेज़री वृक्ष

हमें मानना होगा कि वनों की प्राकृतिक छवि में मनुष्य का हस्तक्षेप बहुत अधिक है। हमें इस हस्तक्षेप की प्रकृति एवं सीमा को नियंत्रित करना होगा। वन संसाधनों का उपयोग इस प्रकार करना होगा जो पर्यावरण एवं विकास दोनों के हित में हो। दूसरे शब्दों में, जब पर्यावरण अथवा वन संरक्षित किए जाएँ, उसके सुनियोजित उपयोग का लाभ स्थानीय निवासियों को मिलना चाहिए। यह विकेंद्रीकरण की एक एेसी व्यवस्था है जिसमें आर्थिक विकास एवं पारिस्थितिक संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। जिस प्रकार का आर्थिक एवं सामाजिक विकास हम चाहते हैं, उससे ही अंततः यह निर्णय होगा कि उससे पर्यावरण का संरक्षण हो रहा है अथवा इसका और विनाश हो रहा है। पर्यावरण को पौधों और जंतुओं का सजावटी संग्रह मात्र नहीं माना जा सकता। यह एक जटिल व्यवस्था है जिससे हमें उपयोग हेतु अनेक प्रकार के प्राकृतिक संसाधन प्राप्त होते हैं। हमें अपने आर्थिक एवं सामाजिक विकास की आपूर्ति हेतु इन संसाधनों का सावधानीपूर्वक उपयोग करना होगा।


16.2.2 संपोषित प्रबंधन

हमें इस पर विचार करना होगा कि क्या उपरोक्त सभी दावेदारों के लक्ष्य वन प्रबंधन के संदर्भ में समान हैं। उद्योगों को वन संपदा अधिकतर बाज़ार के मूल्य से बहुत कम मूल्य पर उपलब्ध कराई जाती है, जबकि स्थानीय निवासियों को उनसे वंचित रखा जाता है। ‘चिपको आंदोलन’ स्थानीय निवासियों को वनों से अलग करने की नीति का ही परिणाम है। यह आंदोलन हिमालय की ऊँची पर्वत शृंखला में गढ़वाल के ‘रेनी’ नामक गाँव में एक घटना से 1970 के प्रारंभिक दशक में हुआ था। यह विवाद लकड़ी के ठेकेदार एवं स्थानीय लोगों के बीच प्रारंभ हुआ क्याेंकि गाँव के समीप के वृक्ष काटने का अधिकार उसे दे दिया गया था। एक निश्चित दिन ठेकेदार के आदमी वृक्ष काटने के लिए आए जबकि वहाँ के निवासी पुरुष वहाँ नहीं थे। बिना किसी डर के वहाँ की महिलाएँ फौरन वहाँ पहुँच गईं तथा उन्होंने पेड़ों को अपनी बाँहों में भर कर (चिपक कर) ठेकेदार के आदमियों को वृक्ष काटने से रोका। अंततः ठेकेदार को अपना काम बंद करना पड़ा।

प्राकृतिक संसाधनों के नियंत्रण की इस प्रतियोगिता में पुनः पूर्ति होने वाले इन संसाधनों का संरक्षण अंतर्निहित है। इसी उद्देश्य से उनके उपयोग के तरीके पर प्रश्न उठाए गए। लकड़ी के ठेकेदार ने उस क्षेत्र के सारे वृक्षों को काट कर गिरा दिया होता और क्षेत्र सदा के लिए वृक्षहीन हो जाता। स्थानीय समुदाय, वृक्षों के ऊपर चढ़कर कुछ शाखाएँ एवं पत्तियाँ ही काटता है जिससे समय के साथ-साथ उनका पुनः पूरण भी होता रहता है। ‘चिपको आंदोलन’ बहुत तेज़ी से बहुत से समुदायों में फैल गया एवं जन संचार ने भी इसमें योगदान दिया तथा सरकार को यह सोचने पर मज़बूर कर दिया कि वन किसके हैं तथा वन संसाधनों के समुचित उपयोग के लिए प्राथमिकता तय करने के लिए पुनर्विचार पर मज़बूर कर दिया। अनुभव ने लोगों को सिखा दिया है कि वनों के विनाश से केवल वन की उपलब्धता ही प्रभावित नहीं होती वरन् मिट्टी की गुणवत्ता एवं जल स्रोत भी प्रभावित होते हैं। स्थानीय लोगों की भागीदारी से निश्चित रूप से वनों के प्रबंधन की दक्षता बढ़ेगी।

वन प्रबंधन में लोगों की भागीदारी का एक उदाहरण

1972 में पश्चिम बंगाल वन विभाग को प्रदेश के दक्षिण पश्चिम जिलों में नष्ट हुए साल के वनों को पुनःपूरण करने की अपनी योजना के असफल होने के कारणों का पता लगा। सतर्कता की परंपरागत विधियों और पुलिस की कार्रवाई से स्थानीय लोग और प्रशासन में बहुत दूरी हो गई जिसके फलस्वरूप वन कर्मचारियों और ग्रामवासियों में अक्सर झड़पें होने लगीं। इन झगड़ों ने नक्सली जैसे हिंसक आंदोलनों को और भी हवा दी।

अतः वन विभाग ने अपनी नीति में बदलाव कर दिया तथा मिदनापुर के अराबाड़ी वन क्षेत्र में एक योजना प्रारंभ की। यहाँ वन विभाग के एक दूरदर्शी अधिकारी ए.के.बनर्जी ने ग्रामीणों को अपनी योजना में शामिल किया तथा उनके सहयोग से बुरी तरह से क्षतिग्रस्त साल के वन की 1272 हेक्टेयर क्षेत्र का संरक्षण किया। इसके बदले में निवासियों को क्षेत्र की देखभाल की ज़िम्मेदारी के लिए रोज़गार मिला साथ ही उन्हें वहाँ से उपज की 25 प्रतिशत के उपयोग का अधिकार भी मिला और बहुत कम मूल्य पर ईρंधन के लिए लकड़ी और पशुओं को चराने की अनुमति भी दी गई। स्थानीय समुदाय की सहमति एवं सक्रिय भागीदारी से 1983 तक अराबाड़ी का सालवन समृद्ध हो गया तथा पहले बेकार कहे जाने वाले वन का मूल्य 12.5 करोड़ आँका गया।


क्रियाकलाप 16.8


निम्न के द्वारा वनों को होने वाली क्षति पर परिचर्चा कीजिएः

1. राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटकों के लिए आरामगृह (Rest house) का निर्माण करना।

2. राष्ट्रीय उद्यानों में पालतू पशुओं को चराना।

3. पर्यटकों द्वारा प्लास्टिक बोतल, थैलियों तथा अन्य कचरों को राष्ट्रीय उद्यान में फेंकना।


प्रश्न

1. हमें वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण क्यों करना चाहिए?

2. संरक्षण के लिए कुछ उपाय सुझाइए।


16.3 सभी के लिए जल


क्रियाकलाप 16.9


महाराष्ट्र के एक गाँव में जल की कमी की दीर्घकालीन समस्या से जूझ रहे ग्रामीण एक जल मनोरंजन पार्क का घेराव कर लेते हैं। इस पर परिचर्चा कीजिए कि क्या यह उपलब्ध जल का समुचित उपयोग है?


धरती पर रहने वाले सभी जीवों की मूल आवश्यकता जल है। हम कक्षा 9 में एक संसाधन के रूप में जल के महत्त्व तथा जल के चक्र के बारे में पढ़ चुके हैं। मनुष्य ने किस प्रकार जल स्रोतों को प्रदूषित किया है साथ ही मनुष्य की प्रकृति में दखल से अनेक क्षेत्रों में जल की उपलब्धता भी प्रभावित हुई है।


क्रियाकलाप 16.10


 एक एटलस की सहायता से भारत में वर्षा के पैटर्न का अध्ययन कीजिए।

 एेसे क्षेत्रों की पहचान कीजिए जहाँ पर जल की प्रचुरता है तथा एेसे क्षेत्रों की जहाँ इसकी बहुत कमी है।


उपरोक्त क्रियाकलाप के बाद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जल की कमी वालेे क्षेत्रों एवं अत्यधिक निर्धनता वाले क्षेत्रों में घनिष्ट संबंध है।

वर्षा के प्रतिरूप के अध्ययन से भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जल उपलब्धता का पूर्ण सत्य सामने नहीं आता। भारत में वर्षा मुख्यतः मानसून पर निर्भर करती है। इसका अर्थ है कि वर्षा की अवधि वर्ष के कुुछ महीनों तक ही सीमित रहती है। प्रकृति में मानसून के अभिदान के बाद भी क्षेत्रों के वनस्पति आच्छादन कम होने के कारण भूजल स्तर की उपलब्धता में काफ़ी कमी आई है; फसलों के लिए जल की अधिक मात्रा की माँग, उद्योेगों से प्रवाहित प्रदूषक एवं नगरों के कूड़ा-कचरे ने जल को प्रदूषित कर उसकी उपलब्धता की समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है। बाँध, जलाशय एवं नहरों का उपयोग भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सिंचाई के लिए प्राचीन समय से किया जाता रहा है। पहले इन तकनीकों का प्रयोग स्थानीय लोगों द्वारा की गई दखल थी तथा स्थानीय निवासी उसका प्रबंधन कृषि एवं दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे जिससे जल पूरे वर्ष उपलब्ध रह सके। इस भंडारित जल का नियंत्रण भली प्रकार से किया जाता था तथा जल की उपलब्धता और दशकों एवं सदियों के अनुभव के आधार पर इष्टतम फसल प्रतिरूप अपनाए जाते थे। सिंचाई के इन संसाधनों का प्रबंधन भी स्थानीय लोगों द्वारा किया जाता था।

अंग्रेजों ने भारत आकर अन्य बातों के साथ-साथ इस पद्धति को भी बदल दिया। बड़ी परियोजनाओं जैसे कि विशाल बाँध तथा दूर तक जाने वाली बड़ी-बड़ी नहरों की सर्वप्रथम संकल्पना कर उन्हें क्रियान्वित करने का कार्य भी अंग्रेज़ों द्वारा ही किया गया जिसे हमारे स्वतंत्र होने पर हमारी सरकार ने भी पूरे जोश के साथ अपनाया। इन विशाल परियोजनाओं से सिंचाई के स्थानीय तरीके उपेक्षित होते गए तथा सरकार धीरे-धीरे इनका प्रबंधन एवं प्रशासन अपने हाथ में लेती चली गई जिससे जल के स्थानीय स्रोतों पर स्थानीय निवासियों का नियंत्रण समाप्त हो गया।


हिमाचल प्रदेश में कुल्ह


लगभग 400 वर्ष पूर्व हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में नहर सिंचाई की स्थानीय प्रणाली (व्यवस्था) का विकास हुआ। इन्हें ‘कुल्ह’ कहा जाता है। झरनों से बहने वाले जल को मानव-निर्मित छोटी-छोटी नालियों से पहाड़ी पर स्थित निचले गाँवों तक ले जाया जाता है। इन कुल्ह से प्राप्त जल का प्रबंधन क्षेत्र के सभी गाँवों की सहमति से किया जाता था। आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि कृषि के मौसम में जल सर्वप्रथम दूरस्थ गाँव को दिया जाता था फिर उत्तरोतर ऊँचाई पर स्थित गाँव उस जल का उपयोग करते थे। कुल्ह की देख-रेख एवं प्रबंधन के लिए दो अथवा तीन लोग रखे जाते थे जिन्हें गाँव वाले वेतन देते थे। सिंचाई के अतिरिक्त इन कुल्ह से जल का भूमि में अंतःस्रवण भी होता रहता था जो विभिन्न स्थानों पर झरने को भी जल प्रदान करता रहता था। सरकार द्वारा इन कुल्ह के अधिग्रहण के बाद इनमें से अधिकतर निष्क्रिय हो गए तथा जल के वितरण की आपस की भागीदारी की पहले जैसी व्यवस्था समाप्त हो गई।


16.3.1 बाँध

हम बाँध क्याें बनाना चाहते हैं? बड़े बाँध में जल संग्रहण पर्याप्त मात्रा में किया जा सकता है जिसका उपयोग केवल सिंचाई के लिए ही नहीं वरन् विद्युत उत्पादन के लिए भी किया जाता है जिसके विषय में आप पिछले अध्याय में पढ़ चुके हैं। इनसे निकलने वाली नहरें जल की बड़ी मात्रा को दूरस्थ स्थानों तक ले जाती हैं। उदाहरणतः, इंदिरा गांधी नहर से राजस्थान के काफ़ी बड़े क्षेत्र में हरियाली आ गई है। परंतु जल के खराब प्रबंधन के कारण मात्र कुछ व्यक्तियों द्वारा लाभ उठाने के कारण जल प्रबंधन के लाभ से बहुत से लोग वंचित रह गए हैं। जल का समान वितरण नहीं है, अतः जल स्रोत के निकट रहने वाले व्यक्ति गन्ना एवं धान जैसी अधिक जल-खपत वाली फसल उगा लेते हैं जबकि दूर के लोगों को जल मिल ही नहीं पाता। उन व्यक्तियों की व्यथा और भी बढ़ जाती है तथा असंतोष होता है जबकि उन व्यक्तियों को जिन्हें बाँध एवं नहर बनाते समय विस्थापित किया गया और उस समय किए गए वायदे भी पूरे नहीं किए गए।

बड़े बाँधों के बनाने के विरोध में उठ रहे उन कारणों की चर्चा हम पिछले अध्याय में कर चुके हैं। गंगा नदी पर बना टिहरी बाँध इसका एक उदाहरण है। आपने ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के विषय में भी अवश्य ही पढ़ा होगा जिसमें नर्मदा नदी पर बनने वाले बाँध की ऊँचाई बढ़ाने का विरोध हो रहा है। बड़े बाँध के विरोध में मुख्यतः तीन समस्याओं की चर्चा विशेष रूप से होती है-

(i) सामाजिक समस्याएँ, क्योंकि इससे बड़ी संख्या में किसान और आदिवासी विस्थापित होते हैं और इन्हें मुआवजा भी नहीं मिलता।

(ii) आर्थिक समस्याएँ, क्योंकि इनमें जनता का बहुत अधिक धन लगता है और उस अनुपात में लाभ अपेक्षित नहीं है।

(iii) पर्यावरणीय समस्याएँ, क्याेंकि उससे बड़े स्तर पर वनों का विनाश होता है तथा जैव विविधता की क्षति होती है।

विकास की विभिन्न परियोजनाओं में विस्थापित होने वाले अधिकतर व्यक्ति गरीब आदिवासी होते हैं जिन्हें इन परियोजनाओं से कोई लाभ नहीं होता तथा उन्हें अपनी भूमि एवं जंगलों से भी हाथ धोना पड़ता है जिसकी क्षतिपूर्ति भी समुचित नहीं होती। 1970 में बने तावा बाँध के विस्थापितों को अभी भी वह लाभ नहीं मिल सके जिनका उनसे वायदा किया गया था।


16.3.2 जल संग्रहण

जल संभर प्रबंधन में मिट्टी एवं जल संरक्षण पर जोर दिया जाता है जिससे कि ‘जैव-मात्रा’ उत्पादन में वृद्धि हो सके। इसका प्रमुख उद्देश्य भूमि एवं जल के प्राथमिक स्रोतों का विकास, द्वितीयक संसाधन पौधों एवं जंतुओं का उत्पादन इस प्रकार करना जिससे पारिस्थितिक अंसतुलन पैदा न हो। जल संभर प्रबंधन न केवल जल संभर समुदाय का उत्पादन एवं आय बढ़ता है वरन् सूखे एवं बाढ़ को भी शांत करता है तथा निचले बाँध एवं जलाशयों का सेवा काल भी बढ़ाता है। अनेक संगठन प्राचीनकालीन जल संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करने में लगे हैं जो बाँध जैसी बड़ी परियोजनाओं का विकल्प बन सकते हैं। इन समुदायों ने जल संरक्षण के एेसे सैकड़ों तरीके विकसित किए हैं जिनके द्वारा धरती पर पड़ने वाली प्रत्येक बूँद का संरक्षण किया जा सके। यथा छोटे-छोटे गड्ढे खोदना, झीलों का निर्माण, साधारण जल संभर व्यवस्था की स्थापना, मिट्टी के छोटे बाँध बनाना, रेत तथा चूने के पत्थर के संग्रहक बनाना तथा घर की छतों से जल एकत्र करना। इससे भूजल स्तर बढ़ जाता है तथा नदी भी पुनः जीवित हो जाती है।



एक पारंपरिक प्रौद्योगिकी द्वारा भारत के ‘वाटर मैन’ देश के सबसे शुष्क क्षेत्र के सूखाग्रस्त गाँवों के हज़ारों ग्रामीणों की ज़िंदगी बदल पाए।

दो दशकों के प्रयास के बाद डॉ. राजेन्द्र सिंह ने राजस्थान में पानी इकट्ठा करने के लिए 8600 जोहेड और अन्य संरचनाओं का निर्माण किया तथा राज्य भर के 1000 गाँवों में पानी वापस लाया गया। 2015 में उन्होंने स्टॉकहोम पुरस्कार जीता। यह बहुत ही प्रतिष्ठित पुरस्कार है जो ग्रह और इसके निवासियों की भलाई के लिए जल संसाधनों के सुरक्षित संरक्षण में योगदान करने वाले व्यक्ति का सम्मान करता है।


जल संग्रहण (water harvesting) भारत में बहुत पुरानी संकल्पना है। राजस्थान में खादिन, बड़े पात्र एवं नाड़ी, महाराष्ट्र के बंधारस एवं ताल, मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में बंधिस, बिहार में अहार तथा पाइन, हिमाचल प्रदेश में कुुल्ह, जम्मू के काँदी क्षेत्र में तालाब तथा तमिलनाडु में एरिस (Tank) केरल में सुरंगम, कर्नाटक में कट्टा इत्यादि प्राचीन जल संग्रहण तथा जल परिवहन संरचनाएँ आज भी उपयोग में हैं। (उदाहरण के लिए चित्र 16.3 देखिए)। जल संग्रहण तकनीक, स्थानीय होती हैं तथा इसका लाभ भी स्थानीय/सीमित क्षेत्र को होता है। स्थानीय निवासियों को जल-संरक्षण का नियंत्रण देने से इन संसाधनों के अकुशल प्रबंधन एवं अतिदोहन कम होते हैं अथवा पूर्णतः समाप्त हो सकते हैं।

बड़े समतल भूभाग में जल संग्रहण स्थल मुख्यतः अर्धचंद्राकार मिट्टी के गड्ढे अथवा निचले स्थान, वर्षा ऋतु में पूरी तरह भर जाने वाली नालियाँ/प्राकृतिक जल मार्ग पर बनाए गए ‘चेक डैम’ जो कंक्रीट अथवा छोटे कंकड़ पत्थरों द्वारा बनाए जाते हैं। इन छोटे बाँधों के अवरोध के कारण इनके पीछे मानसून का जल तालाबों में भर जाता है। केवल बड़े जलाशयों में जल पूरे वर्ष रहता है। परंतु छोटे जलाशयों में यह जल 6 महीने या उससे भी कम समय तक रहता है उसके बाद यह सूख जाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य जल संग्रहण नहीं है परंतु जल-भौम स्तर में सुधार करना है। जल के भौम जल के रूप में संरक्षण के कई लाभ हैं। भौम जल से अनेक लाभ हैं। यह वाष्प बन कर उड़ता नहीं, परंतु यह आस-पास में फैल जाता है, बड़े क्षेत्र में वनस्पति को नमी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त इससे मच्छरों के जनन की समस्या भी नहीं होती। भौम जल मानव एवं जंतुओं के अपशिष्ट से झीलों तालाबों में ठहरे पानी के विपरीत संदूषित होने से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहता है।


चित्र 16.3 जल संग्रहण की पारंपरिक व्यवस्था-खादिन पद्धति का आदर्श व्यवस्थापन


प्र्शन 


1. अपने निवास क्षेत्र के आस-पास जल संग्रहण की परंपरागत पद्धति का पता लगाइए।

2. इस पद्धति की पेय जल व्यवस्था (पर्वतीय क्षेत्रों में, मैदानी क्षेत्र अथवा पठार क्षेत्र) से तुलना कीजिए।

3. अपने क्षेत्र में जल के स्रोत का पता लगाइए। क्या इस स्रोत से प्राप्त जल उस क्षेत्र के सभी निवासियों को उपलब्ध है।


16.4 कोयला एवं पेट्रोलियम

हमने कुुछ स्रोत जैसे कि वन, वन्य जीवन तथा जल के संरक्षण एवं संपोषण से संबंधित अनेक समस्याओं की चर्चा की है। यदि हम इनके संपोषण के उपाय अपनाएँ तो इससे हमारी आवश्यकता की पूर्ति भी होती रहेगी। अब हम एक और महत्वपूर्ण संसाधन जीवाश्म ईंधन अर्थात कोयला एवं पेट्रोलियम पर चर्चा करेंगे जो ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। औद्योगिक क्रांति के समय से हम उत्तरोत्तर अधिक ऊर्जा की खपत कर रहे हैं। इस ऊर्जा का प्रयोग हम दैनिक ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति तथा जीवनोपयोगी पदार्थों के उत्पादन हेतु कर रहे हैं। ऊर्जा संबंधी यह आवश्यकता हमें कोयला तथा पेट्रोलियम से प्राप्त होती है।

इन ऊर्जा स्रोतों का प्रबंधन अन्य संसाधनों की अपेक्षा कुछ भिन्न तरीके से किया जाता है। पेट्रोलियम एवं कोयला लाखों वर्ष पूर्व जीवों की जैव-मात्रा के अपघटन से प्राप्त होते हैं। अतः चाहे हम जितनी भी सावधानी से इनका उपयोग करेें फिर भी यह स्रोत भविष्य में समाप्त हो जाएँगे। अतः तब हमें ऊर्जा के विकल्पी स्रोतों की खोज करने की आवश्यकता होगी। यह संसाधन यदि वर्तमान दर से प्रयोग में आते रहे तो ये कितने समय तक उपलब्ध रहेंगे, इस बारे में विभिन्न आकलनों के आधार पर हम कह सकते हैं कि हमारे पेट्रोलियम के संसाधन लगभग अगले 40 वर्षों में तथा कोयला अगले 200 वर्षों तक उपलब्ध रह सकते हैं।

परंतु जब हम कोयले एवं पेट्रोलियम की खपत के बारे में विचार करते हैं तो ऊर्जा के अन्य स्रोतों के विषय में विचार का एकमात्र आधार नहीं है। क्योंकि कोयला एवं पेट्रोलियम जैव-मात्रा से बनते हैं जिनमें कार्बन के अतिरिक्त हाइड्रोजन, नाइट्रोजन एवं सल्फर (गंधक) भी होते हैं। जब इन्हें जलाया (दहन किया) जाता है तो कार्बन डाइअॉक्साइड, जल, नाइट्रोजन के अॉक्साइड तथा सल्फर के अॉक्साइड बनते हैं। अपर्याप्त वायु (अॉक्सीजन) में जलाने पर कार्बन डाइअॉक्साइड के स्थान पर कार्बन मोनोअॉक्साइड बनाती है। इन उत्पादों में से नाइट्रोजन एवं सल्फर के अॉक्साइड तथा कार्बन मोनोअॉक्साइड विषैली गैसें हैं तथा कार्बन डाइअॉक्साइड एक ग्रीन हाउस गैस है। कोयला एवं पेट्रोलियम पर विचार करने का एक अन्य दृष्टिकोण यह भी है कि ये कार्बन के विशाल भंडार हैं, यदि इनकी संपूर्ण मात्रा का कार्बन जलाने पर कार्बन डाइअॉक्साइड में परिवर्तित हो गया तो वायुमंडल में कार्बन डाइअॉक्साइड की मात्रा अत्यधिक हो जाएगी जिससे तीव्र वैश्विक ऊष्मण होने की संभावना है। अतः इन संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता है।


क्रियाकलाप 16.11


 कोयले का उपयोग ताप-बिजलीघरों में एवं पेट्रोलियम उत्पाद जैसे कि डीजल एवं पेट्रोल का यातायात के विभिन्न साधनों–मोटरवाहन, जलयान एवं वायुयान–में प्रयोग किया जाता हैं। आज के युग में विद्युत साधित्राें एवं यातायात में विद्युत के प्रयोग के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अतः क्या आप कुछ एेसी युक्ति सोच सकते हैं जिससे कोयला एवं पेट्रोलियम के उपयोग को कम किया जा सके?


कुछ सरल विकल्पों से हमारे ऊर्जा की खपत में अंतर पड़ सकता है। आनुपातिक लाभ-हानि एवं पर्यानुकूलन पर विचार कीजिएः

(i) बस में यात्रा, अपना वाहन प्रयोग में लाना अथवा पैदल/साइकिल से चलना।

(ii) अपने घरों में बल्ब, फ्लोरोसेंट ट्यूब का प्रयोग करना।

(iii) लिफ्ट का प्रयोग करना अथवा सीढ़ियों का उपयोग करना।

(iv) सर्दी में एक अतिरिक्त स्वेटर पहनना अथवा हीटर या सिगड़ी का प्रयोग करना।

कोयला एवं पेट्रोलियम का उपयोग हमारी मशीनों की दक्षता पर भी निर्भर करता हैं। यातायात के साधनों में मुख्यतः आंतरिक दहन-इंजन का उपयोग होता है। आजकल अनुसंधान इस विषय पर केंद्रित है कि इनमें ईंधन का पूर्ण दहन किस प्रकार सुनिश्चित किया जा सकता है जिससे कि इनकी दक्षता भी बढ़े तथा वायु प्रदूषण को भी कम किया जा सके।


क्रियाकलाप 16.12

 आपने वाहनाें से निकलने वाली गैसों के यूरो-1 एवं यूरो-II मानक के विषय में तो अवश्य ही सुना होगा। पता लगाइए कि ये मानक वायु प्रदूषण कम करने में किस प्रकार सहायक हैं?



16.5 प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन का दृश्यावलोकन

प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबंधन एक कठिन कार्य है। इस पर विचार करने के लिए हमें खुले दिमाग से सभी पक्षों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना होगा। हमें यह तो मानना ही होगा कि लोग अपने हित को प्राथमिकता देने का भरपूर प्रयास करेंगे। परंतु इस वास्तविकता को लोग धीरे-धीरे स्वीकार करने लगे हैं कि कुछ व्यक्तियों के निहित स्वार्थ बहुसंख्यकों के दुख का कारण बन सकते हैं तथा हमारे पर्यावरण का पूर्ण विनाश भी संभव है। कानून, नियम एवं विनियमन से आगे हमें अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक आवश्यकताओं को सीमित करना होगा जिससे कि विकास का लाभ सभी को एवं सभी भावी पीढ़ियों को उपलब्ध हो सके।


आपने क्या सीखा


 हमारे संसाधनों; जैसे–वन, वन्य जीवन, कोयला एवं पेट्रोलियम का उपयोग संपोषित रूप से करने की आवश्यकता है।

 ‘कम उपयोग, पुनः उपयोग एवं पुनः चक्रण’ की नीति अपना कर हम पर्यावरण पर पड़ने वाले दबाव को कम कर सकते हैं।

 वन-संपदा का प्रबंधन सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

 जल संसाधनों के संग्रहण हेतु बाँध बनाने में सामाजिक-आर्थिक, एवं पर्यावरणीय समस्याएँ आती हैं। बड़े बाँधाें का विकल्प उपलब्ध है। यह स्थान/क्षेत्र विशिष्ट हैं तथा इनका विकास किया जा सकता है जिससे स्थानीय लोगों को उनके क्षेत्र के संसाधनों का नियंत्रण सौंपा जा सके।

 जीवाश्म ईंधन, जैसे कि कोयला एवं पेट्रोलियम, अंततः समाप्त हो जाएँगे। इनकी मात्रा सीमित है और इनके दहन से पर्यावरण प्रदूषित होता है, अतः हमें इन संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता है।



अभ्यास


1. अपने घर को पर्यावरण-मित्र बनाने के लिए आप उसमें कौन-कौन से परिवर्तन सुझा सकते हैं?

2. क्या आप अपने विद्यालय में कुछ परिवर्तन सुझा सकते हैं जिनसे इसे पर्यानुकूलित बनाया जा सके।

3. इस अध्याय में हमने देखा कि जब हम वन एवं वन्य जंतुओं की बात करते हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं। इनमें से किसे वन उत्पाद प्रबंधन हेतु निर्णय लेने के अधिकार दिए जा सकते हैं? आप एेसा क्यों सोचते हैं?

4. अकेले व्यक्ति के रूप में आप निम्न के प्रबंधन में क्या योगदान दे सकते हैं। (a) वन एवं वन्य जंतु (b) जल संसाधन(c) कोयला एवं पेट्रोलियम?

5. अकेले व्यक्ति के रूप में आप विभिन्न प्राकृतिक उत्पादों की खपत कम करने के लिए क्या कर सकते हैं?

6. निम्न से संबंधित एेसे पाँच कार्य लिखिए जो आपने पिछले एक सप्ताह में किए हैं-

(a) अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।

(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को और बढ़ाया है।

7. इस अध्याय में उठाई गई समस्याओं के आधार पर आप अपनी जीवन-शैली में क्या परिवर्तन लाना चाहेंगे जिससे हमारे संसाधनों के संपोषण को प्रोत्साहन मिल सके?