Chapter-5

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खनिज तथा ऊर्जा संसाधन 

हैबन अपने पिता के साथ दूर के गाँव से गुवाहाटी आया है। वह लोगों को घरों जैसी अजीब चीजों में जाते देखता है। जो सड़क पर चलती हैं। वह एक 'रसोई' को भी बहुत से घरों के साथ जाते देखता है। वह आश्चर्य से अपने पिता से पूछता है. "पिताजी हमारा घर इस प्रकार क्यों नहीं चलता जैसा कि उसने गुवाहाटी में देखा ?"
उसके पिता ने बताया, फ्यह घर नहीं है ये बसें व गाडि़याँ हैं। हमारे घरों की तरह ये ईंटों व पत्थरों से नहीं बनी हैं इन्हें बनाने में लोहा, एल्यूमिनियम जैसी धातुओं का प्रयोग किया गया है। ये अपने आप नहीं चलते। ये इंजन द्वारा चालित होते हैं और इंजन को चलाने के लिए ऊर्जा चाहिये|

हम अपनी रोज़मर्रा कीज़िंदगी में धातु से बनी विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग करते हैं। क्या आप अपने घर में प्रयोग की जाने वाली धातु से बनी चीजों की सूची बना सकते हैं? ये धातुएँ कहाँ से आती हैं?

आपने पढ़ा है कि भू-पर्पटी (पृथ्वी की ऊपरी परत) विभिन्न खनिजों के योग से बनी चट्टानों से निर्मित है। इन खनिजों का उपयुक्त शोधन करके ही ये धातुएँ निकाली जाती है।

खनिज हमारे जीवन के अति अनिवार्य भाग हैं। लगभग हर चीज़ जो हम इस्तेमाल करते हैं – एक छोटी सूई से लेकर एक बड़ी इमारत तक, या फिर एक बड़ा जहाज आदि – सभी खनिजों से बने हैं। रेलवे लाइन और सड़क के पत्थर, हमारे औजार तथा मशीनें – सभी खनिजों से बने हैं। कारें, बसें, रेलगाड़ियाँ, हवाई जहाज सभी खनिजों से निर्मित हैं और धरती से प्राप्त ऊर्जा के साधनों द्वारा चालित होते हैं। यहाँ तक कि भोजन मेंभी खनिज होते हैं जिसे हम खाते हैं। मनुष्य ने विकास की सभी अवस्थाओं में – अपनी जीविका तथा सजावट, त्योहारों व धार्मिक अनुष्ठान के लिए खनिजों का प्रयोग किया है।


खनिज व दंतमंजन से एक उज्ज्वल मुस्कान

दंतमंजन आपके दाँत साफ करते हैं। कुछ अपघर्षक खनिज जैसे सिलिका (silica ) चूना पत्थर (limestone), एल्यूमिनियम ऑक्साइड व विभिन्न फॉस्फेट खनिज स्वच्छता में मदद करते हैं। फ्लुराइड (fluoride) जो दाँतों को गलने से रोकता है, फ्लूओराइट नामक खनिज से प्राप्त होता है। अधिकतर दंतमंजन टिटेनियम ऑक्साइड (Titanium Oxide) से सफेद बनाए जाते हैं जोकि (Rutile, flmenite) यूटाइल, इल्मेनाइट तथा एनाटेज नामक खनिजों से प्राप्त होते हैं। कुछ दंतमंजन जो चमक प्रदान करते हैं, उनका कारण अभ्रक है। टूथब्रश व पेस्ट की ट्यूब पेट्रोलियम से प्राप्त प्लास्टिक की बनी होती है। अब यह बताइये कि ये खनिज कहाँ पाए जाते हैं?

जरा ध्यान से सोचें व बताएँ कि रोशनी देने वाले बल्ब में कितने खनिज प्रयुक्त होते हैं?

सभी सजीव वस्तुओं को खनिजों की आवश्यकता होती है

खनिजों के बिना जीवन प्रक्रिया नहीं चल सकती। यद्यपि हमारे कुल पौष्टिक उपभोग का केवल 0.3 प्रतिशत भाग ही खनिज है; तथापि ये इतने महत्त्वपूर्ण और गुणकारी हैं कि इनके बिना हम 99.7 प्रतिशत भोज्य पदार्थों का उपयोग करने में असमर्थ होंगे।

जरा ध्यान से सोचें व बताएँ तथा भोज्य पदार्थों पर अंकित 'पोषक तथ्यों' को इकट्ठा करें।

खनिज क्या है?

भू-वैज्ञानिकों के अनुसार खनिज एक प्राकृतिक रूप से विद्यमान समरूप तत्त्व है जिसकी एक निश्चित आंतरिक संरचना है। खनिज प्रकृति में अनेक रूपों में पाए जाते हैं जिसमें कठोर हीरा व नरम चूना तक सम्मिलित हैं। खनिज इतने विविध क्यों हैं?

भूगोलविद् स्थलाकृतियों की बेहतर जानकारी हेतु खनिजों का अध्ययन भू-पृष्ठ के एक अंश के रूप में करते हैं। भूगोलवेत्ता खनिज संसाधनों के वितरण व खनिजों से संबंधित आर्थिक क्रियाओं में ज्यादा रूचि रखते हैं। परंतु एक भू-वैज्ञानिक, खनिजों की निर्माण प्रक्रिया, इनकी आयु व खनिजों के भौतिक व रासायनिक संगठन से संबंधित विषयों की जानकारी रखते हैं।

आप चट्टानों के विषय में पहले ही पढ़ चुके हैं। चट्टानें खनिजों के समरूप तत्त्वों के यौगिक हैं। कुछ चट्टानें जैसे चूना पत्थर - केवल एक ही खनिज से बनी हैं; लेकिन अधिकतर चट्टानें विभिन्न अनुपातों के अनेक खनिजों का योग हैं। यद्यपि 2000 से अधिक खनिजों की पहचान की जा चुकी है, लेकिन अधिकतर चट्टानोंमें केवल कुछ ही खनिजों की बहुतायत है।

एक खनिज विशेषजो निश्चित तत्त्वों का योग है, उन तत्त्वों का निर्माण उस समय के भौतिक व रासायनिक परिस्थितियों का परिणाम है। इसके फलस्वरूप ही खनिजों में विविध रंग, कठोरता, चमक, घनत्व तथा विविध क्रिस्टल पाए जाते हैं। भू-वैज्ञानिक इन्हीं विशेषताओं के आधार पर खनिजों का वर्गीकरण करते हैं।


भूगोलविदों व भू-वैज्ञानिकों द्वारा खनिजों का अध्ययन

भूगोलविद् स्थलाकृतियों की बेहतर जानकारी हेतु खनिजों का अध्ययन भू-पृष्ठ के एक अंश के रूप में करते हैं। भूगोलवेत्ता खनिज संसाधनों के वितरण व खनिजों से संबंधित आर्थिक क्रियाओं में ज्यादा रूचि रखते हैं। परंतु एक भू-वैज्ञानिक, खनिजों की निर्माण प्रक्रिया, इनकी आयु व खनिजों के भौतिक व रासायनिक संगठन से संबंधित विषयों की जानकारी रखते हैं।


सामान्य व वाणिज्यिक(व्यापारिक) उद्देश्य हेतु खनिज निम्न प्रकार से वर्गीकृत किये जाते हैं –

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खनिजों का वर्गीकरण

खनिज

धात्विक

लौह धातु (जिसमें लोहे  का अंश हो) जैसे – लौह अयस्क, मैंगनीज़, निकल व कोबाल्ट आदि।

अलौह जैसे – ताँबा, सीसा, जस्ता व बॉक्साइट आदि

बहुमूल्य खनिज जैसे - सोना, चाँदी, प्लेटिनम आदि 

अधात्विक

जैसे - अभ्रक, नमक, पोटाश, सल्फर, चूनाश्म/ चूना पत्थर, संगमरमर तथा बलुआ पत्थर

ऊर्जा खनिज

जैसे - कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस



(खनिजों की उपलब्धता)

खनिज कहाँ पाए जाते हैं?

सामान्यतः खनिज ‘अयस्कों’ में पाए जाते हैं। किसी भी खनिज में अन्य अवयवोंया तत्त्वों के मिश्रण या संचयन हेतु ‘अयस्क’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। खनन का आर्थिक महत्त्व तभी है जब अयस्क में खनिजों का संचयन पर्याप्त मात्रा में हो। खनिजों के खनन की सुविधा इनके निर्माण व संरचनापर निर्भर हैं। खनन सुविधा इसके मूल्य को निर्धारितकरती है। अतः हमारे लिए मुख्य शैल समूहों को समझना अत्यंत आवश्यक है जिनमें ये खनिज पाये जाते हैं।

खनिज प्रायः निम्न शैल समूहों से प्राप्त होते हैं :

(क) आग्नेय तथा कायांतरित चट्टानों में खनिज दरारों, जोड़ों, भ्रंशोंव विदरों में मिलते हैं। छोटे जमाव शिराओं के रूप में और बृहत् जमाव परत के रूप में पाए जाते हैं। इनका निर्माण भी अधिकतर उस समय होता है जब ये तरल अथवा गैसीय अवस्था में दरारों के सहारे भू-पृष्ठ की ओर धकेले जाते हैं। ऊपर आते हुए ये ठंडे होकरजम जाते हैं। मुख्य धात्विक खनिज जैसे – जस्ता, ताँबा, जिंक और सीसा आदि इसी तरह शिराओं व जमावोंके रूप में प्राप्त होते हैं।

(ख) अनेक खनिज अवसादी चट्टानों के अनेक खनिज संस्तरों या परतों में पाए जाते हैं। इनका निर्माण क्षैतिज परतों में निक्षेपण, संचयन व जमाव का परिणाम है। कोयला तथा कुछ अन्य प्रकार के लौह अयस्कों का निर्माण लंबीअवधि तक अत्यधिक ऊष्मा व दबाव का परिणाम है। अवसादी चट्टानों में दूसरी श्रेणी के खनिजों में जिप्सम, पोटाश, नमक व सोडियम सम्मिलित हैं। इनका निर्माण विशेषकर शुष्क प्रदेशों में वाष्पीकरण के फलस्वरूप होता है।

(ग) खनिजों के निर्माण की एक अन्य विधि धरातलीय चट्टानों का अपघटन है। चट्टानों के घुलनशील तत्त्वों के अपरदन के पश्चात् अयस्क वाली अवशिष्ट चट्टानें रह जाती हैं। बॉक्साइट का निर्माण इसी प्रकार होता है।

(घ) पहाड़ियों के आधार तथा घाटी तल की रेत में जलोढ़ जमाव के रूप में भी कुछ खनिज पाए जाते हैं। ये निक्षेप‘प्लेसर निक्षेप’ के नाम से जाने जाते हैं। इनमें प्रायः एेसे खनिज होते हैं जो जल द्वारा घर्षित नहीं होते। इन खनिजों में सोना, चाँदी, टिन व प्लेटिनम प्रमुख हैं।

(ङ) महासागरीय जल मेंभी विशाल मात्रा में खनिजपाए जाते हैं लेकिन इनमेंसे अधिकांश के व्यापक रूप से विसरित होने के कारणइनकी आर्थिक सार्थकता कम है। फिर भी सामान्य नमक, मैगनीशियमतथा ब्रोमाइन ज्यादातर समुद्रीजल से ही प्रग्रहित(derived)होते हैं।महासागरीय तली भी मैंगनीज़ ग्रंथिकाओं(nodules)में धनी हैं।

एक रोचक तथ्य

रैट होल (Rat Hole) खनन - क्या आप जानते हैं कि भारत में अधिकांश खनिज राष्ट्रीयकृत हैं और इनका निष्कर्षण सरकारी अनुमति के पश्चात् ही सम्भव है? किन्तु उत्तर-पूर्वी भारत के अधिकांश जनजातीय क्षेत्रें में, खनिजों का स्वामित्व व्यक्तिगत व समुदायों को प्राप्त है। मेघालय में कोयला, लौह अयस्क, चूना पत्थर व डोलोमाइट के विशाल निक्षेप पाए जाते हैं। जोवाई व चेरापूँजी में कोयले का खनन परिवार के सदस्य द्वारा एक लंबी संकीर्ण सुरंग के रूप में किया जाता है, जिसे रैट होल खनन कहते हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने इन क्रियाकलापों को अवैध घोषित किया है और सलाह दी है कि इसे तुरंत रोक दिया जाना चाहिए।


ज़रा ध्यान से सोचें व बताएँ –एक खुली खदान(Openpitmine),उत्खनन व एक शैफ्टयुक्तभूमिगत खदान में क्या अंतर है?

भारतअच्छे और विविध प्रकार के खनिज संसाधनोंमें सौभाग्यशाली है,यद्यपि इनका वितरण असमान है। मोटेतौर पर प्रायद्वीपीय चट्टानोंमें कोयले, धात्विक खनिज, अभ्रक व अन्य अनेक अधात्विक खनिजोंके अधिकांश भंडार संचित हैं। प्रायद्वीप के पश्चिमी और पूर्वीपार्श्वाे पर गुजरात और असम कीतलछटी चट्टानों में अधिकांशखनिज तेल निक्षेप पाए जाते हैं।प्रायद्वीपीय शैल क्रम केसाथ राजस्थान में अनेक अलौहखनिज पाए जाते हैं। उत्तरीभारत के विस्तृत जलोढ़ मैदानआर्थिक महत्त्व के खनिजों सेलगभग विहीन है। ये विभिन्नताएँखनिजों की रचना में अंतरग्रस्तभू-गर्भिक संरचना, प्रक्रियाओं और समय के कारण हैं।

आइए, अबहम भारत में कुछ प्रमुखखनिजों के वितरण का अध्ययनकरें। सदैव स्मरण रखें किअयस्क में खनिज का सांद्रणउत्खनन की सुगमता और बाज़ारकी निकटता, किसी संचय(reserve)की आर्थिक जीव्यता(Viability)को प्रभावित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिकानिभाते हैं। अतः माँग की पूर्तिके लिए अनेक संभवविकल्पों में से चयन करना पड़ता है। एेसा हो जानेके बाद एक खनिज ‘निक्षेप’ अथवा‘भंडार’ खदान में परिवर्तितहो जाता है।

लौह खनिज

लौह खनिजधात्विक खनिजों के कुलउत्पादन मूल्य के तीन-चौथाईभाग का योगदान करते हैं। येधातु शोधन उद्योगों के विकास कोमजबूत आधार प्रदान करतेहैं। भारत अपनी घरेलू माँगको पूरा करने के पश्चात्बड़ी मात्रा में धात्विक खनिजों का निर्यात करता है।

लौह अयस्क(IronOre)

लौह अयस्क एक आधारभूत खनिज है तथाऔद्योगिक विकास कीरीढ़ है। भारत मेंलौह अयस्क के विपुल संसाधन विद्यमान हैं। भारत उच्च कोटिके लोहांशयुक्त लौह अयस्कमें धनी है। मैग्नेटाइट सर्वोत्तम प्रकारका लौह अयस्क है जिसमें70 प्रतिशत लोहांश पाया जाताहै। इसमें सर्वश्रेष्ठ चुंबकीय गुण होते हैं, जो विद्युत उद्योगोंमें विशेष रूप से उपयोगी हैं। हेमेटाइट सर्वाधिकमहत्त्वपूर्ण औद्योगिकलौह अयस्क है जिसका अधिकतममात्रा में उपभोग हुआ है।किंतु इसमें लोहांश की मात्रा मैग्नेटाइट की अपेक्षा थोड़ी-सी कमहोती है। (इसमें लोहांश 50 से 60 प्रतिशत तक पायाजाता है।)

क्या आप जानते हैं ?

कन्नड़ भाषा में ‘कुदरे’ शब्द का अर्थ है घोड़ा। कर्नाटक के पश्चिमी घाट की सबसे ऊँची चोटी घोड़े के मुख से मिलती जुलती है। बेलाडिला की पहाड़ियाँ, बैल केडील (hump) से मिलती-जुलती हैं, जिसके कारण इसका यह नाम पड़ा।

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चित्र 5.2 –लौह अयस्क खदान

भारत में लौह अयस्क की पेटियाँ हैं –

• ओडिशा-झारखंड पेटी –ओडिशा में उच्च कोटिका हेमेटाइट किस्म कालौह अयस्क मयूरभंज व केंदूझर जिलों में बादाम पहाड़ खदानोंसे निकाला जाता है। इसी से सन्निद्धझारखंड के सिंहभूमजिले में गुआ तथा नोआमुंडी सेहेमेटाइट अयस्क का खननकिया जाता है।

• दुर्ग-बस्तर-चन्द्रपुर पेटी –यह पेटीमहाराष्ट्र व छत्तीसगढ़राज्योंकेअंतर्गत पाई जाती है।छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले मेंबेलाडिलापहाड़ी श्रृंखलाओं मेंअति उत्तमकोटिकाहेमेटाइटपायाजाताहैजिसमेंइसगुणवत्ताकेलौहके14जमावमिलतेहैं।इसमेंइस्पात बनानेमें आवश्यक सर्वश्रेष्ठ भौतिकगुण विद्यमान हैं। इन खदानों कालौह अयस्क विशाखापट्टनम् पत्तनसेजापानतथादक्षिणकोरियाकोनिर्यातकियाजाताहै।

• बल्लारि-चित्रदुर्ग, चिक्कमंगलूरु-तुमकूरु पेटी –कर्नाटक की इस पेटी मेंलौह अयस्क की बृहत्राशि संचित है। कर्नाटक में पश्चिमी घाट मेंअवस्थित कुद्रेमुख कीखानें शत् प्रतिशतनिर्यात इकाई हैं। कुद्रेमुखनिक्षेप संसार के सबसे बड़ेनिक्षेपों में से एक मानेजाते हैं। लौह अयस्क कर्दम(Slurry)रूप में पाइपलाइन द्वारामंगलूरु के निकट एक पत्तन पर भेजा जाता है।

• महाराष्ट्र-गोआ पेटी –यह पेटी गोआ तथा महाराष्ट्रराज्य के रत्नागिरी जिले मेंस्थित है। यद्यपि यहाँ का लोहा उत्तम प्रकार का नहींहै तथापि इसका दक्षता से दोहन किया जाता है। मरमागाओपत्तन से इसका निर्यात कियाजाता है।

मैंगनीज़

मैंगनीज़ मुख्यरूप से इस्पात के विनिर्माणमें प्रयोग किया जाता है।एक टन इस्पात बनाने में लगभग 10 किग्रा. मैंगनीज़ कीआवश्यकता होती है। इसका उपयोग ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक दवाएँ वपेंट बनाने में किया जाता है।

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चित्र 5-3 - मैंगनीज उत्पादन में राज्यों का अंश (प्रतिशत में) - 2018-19

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भारत –महत्त्वपूर्ण खनिजों का वितरण

भारत में उड़ीसा मैंगनीज़का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। वर्ष 2000-01 में देशके कुल उत्पादन का एक तिहाईभाग यहाँ से प्राप्तहुआ।

ज़रा ध्यान से सोचें व बताएँ –भारत में लौह अयस्क, मैंगनीज़, कोयला तथा लोहाइस्पात उद्योग के वितरण वाले मानचित्रोंको अध्यारोपित करें। क्याआप इनमें कोई संबंध देखतेहैं? स्पष्ट करें।

अलौह खनिज

भारतमेंअलौहखनिजोंकीसंचितराशिवउत्पादनअधिकसंतोषजनकनहीं है। यद्यपि ये खनिज जिनमें ताँबा, बॉक्साइट,सीसा और सोना आते हैं, धातु शोधन, इंजीनियरिंग व विद्युतउद्योगों मेें महत्त्वपूर्णभूमिका निभातेहैं। आइए! हम ताँबा बॉक्साइटका वितरण समझें।

ताँबा

भारतमें ताँबे के भंडार वउत्पादन क्रांतिक रूप से न्यून हैं। घातवर्ध्य(malleable), तन्यऔर ताप सुचालक होने के कारणताँबे का उपयोग मुख्यतःबिजली के तार बनाने, इलैक्ट्रोनिक्स और रसायन उद्योगों में कियाजाता है। मध्य प्रदेश की बालाघाट खदानें देश का लगभग52 प्रतिशत ताँबा उत्पन्न करती हैं। झारखंड का सिंहभूम जिलाभी ताँबे का मुख्य उत्पादक है। राजस्थान की खेतड़ी खदानेंभी ताँबे के लिए प्रसिद्ध थी।

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चित्र 5.4 –मलंजखंड में ताँबा खदान

बॉक्साइट

यद्यपि अनेक अयस्कोंमें एल्यूमिनियम पाया जाता है परंतु सबसे अधिक एल्यूमिना क्ले(Clay)जैसे दिखने वाले पदार्थ बॉक्साइट से ही प्राप्त कियाजाता है बॉक्साइट निक्षेपों की रचनाएल्यूमिनियम सीलिकेटों से समृद्धव्यापक भिन्नता वाली चट्टानों के विघटन से होती है।

एल्यूमिनियमएक महत्त्वपूर्ण धातु है क्योंकियह लोहे जैसी शक्ति केसाथ-साथ अत्यधिक हल्का एवंसुचालक भी होता है। इसमें अत्यधिकघातवर्ध्यता(malleability)भी पाई जाती है।

भारत में बॉक्साइट केनिक्षेप मुख्यतः अमरकंटक पठार, मैकाल पहाड़ियों तथा बिलासपुर-कटनी के पठारी प्रदेश में पाए जाते हैं।

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चित्र 5.5–बॉक्साइट उत्पादन में राज्यों का अंश (प्रतिशत में)-2018-19

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चित्र 5.6 –बॉक्साइट खदान

ओडिशा भारत का सबसे बड़ाबॉक्साइट उत्पादक राज्य है, (2018-19) यहाँ कोरापुट जिले में पंचपतमालीनिक्षेप राज्य के सबसे महत्त्वपूर्ण बॉक्साइटनिक्षेप हैं।

ज़रा ध्यान से सोचें व बताएँ –भारतके भौतिक मानचित्र पर बॉक्साइट की खानें चिह्नित करें।

एक रोचक तथ्य

एल्यूमिनियम की खोज के बाद सम्राट नेपोलियन तृतीय अपने कपड़ों पर एल्यूमिनियम से बने हुक व बटन पहनता था तथा अपने खास मेहमानों को एल्यूमिनियम से बने बर्तनों में भोजन कराता, तथा आम मेहमानों को सोने व चाँदी के बर्तनों में भोजन परोसा जाता। इस घटना के तीस वर्ष बाद पेरिस में भिखारियों के पासएल्यूमिनियम के बर्तन एक आम बात थी।
अधाात्विक खनिज

अभ्रक –अभ्रक एक एेसा खनिजहै जो प्लेटों अथवापत्रण क्रम में पाया जाताहै। इसका चादरों मेंविपाटन(split)आसानी से हो सकता है। ये परतें इतनीमहीन हो सकती हैं किइसकी एक हज़ार परतें कुछसेंटीमीटर ऊँचाई में समाहित हो सकतीहैं। अभ्रक पारदर्शी, काले,हरे, लाल, पीले अथवा भूरेरंग का हो सकता है।

इसकीसर्वोच्चपरावैद्युतशक्ति,ऊर्जाह्रासकानिम्नगुणांक,विंसवाहनकेगुणऔरउच्चवोल्टेजकी

प्रतिरोधिताके कारण अभ्रकविद्युत व इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों मेंप्रयुक्त होने वाले अपरिहार्य खनिजोंमें से एक है।

अभ्रक केनिक्षेप छोटानागपुर पठार केउत्तरी पठारी किनारों पर पाए जाते हैं।बिहार-झारखंड की कोडरमा-गया-हजारीबाग पेटी अग्रणी उत्पादक हैं।राजस्थान के मुख्य अभ्रक उत्पादकक्षेत्र अजमेर के आस पास हैं। आंध्र प्रदेश की नेल्लोरअभ्रक पेटी भी देश की महत्त्वपूर्ण उत्पादक पेटी है।

चट्टानी खनिज

चूनापत्थर(Limestone)–चूना पत्थर कैल्शियम याकैल्शियम कार्बोनेट तथा मैगनीशियमकार्बोनेट से बनी चट्टानों मेंपाया जाता है। यह अधिकांशतःअवसादी चट्टानों में पाया जाताहै। चूना पत्थर सीमेंट उद्योगका एक आधारभूत कच्चा माल होताहै। और लौह-प्रगलन कीभट्टियों के लिए अनिवार्य है।

ज़रा ध्यान से सोचें व बताएँ –मानचित्र का अध्ययन करेंतथा बताएँ कि छोटानागपुर क्षेत्रखनिजों का भंडार क्यों है?

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चित्र 5.7 –चूना पत्थर उत्पादन में राज्यों का अंश(प्रतिशत में) - 2018-19

खनन को घातक उद्योग(KillerIndustry)बनने से रोकने के लिए दृढ़ सुरक्षा विनियम और पर्यावरणीय कानूनोंका क्रियांवयन अनिवार्य है।


क्या आपने कभी खनिकों द्वारा आपके जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए किये गये प्रयासों के बारे में सोचा है? खनन का खनिकों के स्वास्थ्य तथा पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है?

 खदानों में काम करने वाले श्रमिक लगातार धूल व हानिकारक धुएँ में साँस लेते हुए फेफड़ों संबंधी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। खदानों की छतों के गिरने, सैलाब आने (जलप्लावित होना), कोयले की खदानों में आग लगने आदि, खतरे खदान श्रमिकों के लिए स्थाई हैं। खदान क्षेत्रें में खनन के कारण जल स्रोत संदूषित हो जाते हैं। अवशिष्ट पदार्थों तथा खनिज तरल के मलबे के खत्ता लगाने से भूमि व मिट्टी का अवक्षय होता है और सरिताओं तथा नदियों का प्रदूषण बढ़ता है।

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चित्र 5-8 - खनन क्षेत्रें में धूल उठने से वायु प्रदूषण

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खनिजों का संरक्षण
हम सभी को उद्योग औरकृषि की खनिज निक्षेपों औरउनसे विनिर्मित पदार्थों पर भारीनिर्भरता सुप्रेक्षित है। खनन योग्यनिक्षेप की कुल राशि असार्थकअंश है, अर्थात् भू-पर्पटीका एक प्रतिशत। जिन खनिज संसाधनोंके निर्माण व सांद्रण मेंलाखों वर्ष लगे हैं, हमउनका शीघ्रता से उपभोग कर रहेहैं। खनिज निर्माण कीभूगर्भिक प्रक्रियाएँ इतनी धीमी हैकि उनके वर्तमान उपभोग कीदर की तुलना में उनके पुनर्भरण की दर अपरिमित रूपसे थोड़ी है। इसीलिए खनिज संसाधनसीमित तथा अनवीकरण योग्यहैं। समृद्ध खनिज निक्षेप हमारे देशकी अत्यधिक मूल्यवान संपत्तिहैं, लेकिन ये अल्पजीवी हैं।अयस्कों के सतत् उत्खनन सेलागत बढ़ती है क्योंकि खनिजोंके उत्खनन की गहराई बढ़नेके साथ उनकी गुणवत्ता घटतीजाती है।

आपने खनिज संसाधनों को सुनियोजित एवं सतत् पोषणीय ढंग से प्रयोग करने के लिए एक तालमेल युक्त प्रयास करना होगा। निम्न कोटि के अयस्कों का कमलागतों पर प्रयोग करने के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों का सतत् विकास करते रहना होगा। धातुओं का पुनः चक्रण, रद्दी धातुओं का प्रयोग तथा अन्य प्रतिस्थापनों का उपयोग भविष्य में हमारे खनिज संसाधनों के संरक्षण के उपाय हैं।

ज़रा ध्यान से सोचें व बताएँ –उन पदार्थों की सूची बनाएँजहाँ खनिजों की अपेक्षाउनके प्रतिस्थापनों का प्रयोग होरहा है। ये प्रतिस्थापन क्याहैं और कहाँ से प्राप्तहोतेहैं?

ऊर्जा संसाधन

ऊर्जा सभीक्रियाकलापों के लिए आवश्यक हैं। खाना पकाने में, रोशनी वताप के लिए, गाड़ियों केसंचालन तथा उद्योगों में मशीनोंके संचालन में ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

ऊर्जा काउत्पादन ईंधन खनिजों जैसे – कोयला,पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, यूरेनियमतथा विद्युत से किया जाता है।ऊर्जा संसाधनों को परंपरागततथा गैर-परंपरागत साधनों में वर्गीकृत किया जा सकता है। परंपरागतसाधनों में लकड़ी, उपले, कोयला,पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा विद्युत(दोनाें जल विद्युत व ताप विद्युत) सम्मिलितहैं। गैर-परंपरागत साधनोंमें सौर, पवन, ज्वारीय, भू-तापीय,बायोगैस तथा परमाणु ऊर्जा शामिलकिये जाते हैं। ग्रामीण भारतमें लकड़ी व उपले बहुतायतमें प्रयोग किये जाते हैं।एक अनुमान के अनुसार ग्रामीणघरों में आवश्यक ऊर्जा का70 प्रतिशत से अधिक इनदो साधनों से प्राप्त होताहै; लेकिन अब घटते वनक्षेत्र के कारण इनका उपयोगकरते रहना कठिन होता जारहा है। इसके अतिरिक्त उपलों काउपभोग भी हतोत्साहित कियाजा रहा है क्योंकि इससे सर्वाधिक मूल्यवान खाद्य का उपभोगहोता हैं जिसे कृषि मेंप्रयोग किया जा सकता है।

परंपरागत ऊर्जा के स्रोत

कोयला –भारत में कोयला बहुतायातमें पाया जाने वालाजीवाश्म ईंधन है। यह देशकी ऊर्जा आवश्यकताओंका महत्त्वपूर्ण भाग प्रदान करता है। इसका उपयोग ऊर्जा उत्पादनतथा उद्योगों और घरेलू ज़रूरतोंके लिए ऊर्जा की आपूर्तिके लिए किया जाता है। भारतअपनी वााणिज्यिक ऊर्जा आवश्यकताओंकी पूर्ति हेतु मुख्यतः कोयलेपर निर्भर है।

जैसा किआप पहले से ही जानते हैंकि कोयले का निर्माणपादप पदार्थों के लाखों वर्षोंतक संपीडन से हुआ है।इसीलिए संपीडन की मात्रा, गहराईऔर दबने के समय केआधार पर कोयला अनेक रूपों मेंपाया जाता है। दलदलोंमें क्षय होते पादपों से पीटउत्पन्न होता है, जिसमेंकम कार्बन, नमी की उच्चमात्रा व निम्न ताप क्षमताहोती है। लिग्नाइट एक निम्नकोटि का भूरा कोयला होताहै। यह मुलायम होने के साथअधिक नमीयुक्त होता है।लिग्नाइट के प्रमुख भंडार तमिलनाडु के नैवेली में मिलते हैंऔर विद्युत उत्पादन में प्रयोग किएजाते हैं। गहराई मेंदबे तथा अधिक तापमान से प्रभावितकोयले को बिटुमिनस कोयलाकहा जाता है। वाणिज्यिक प्रयोगमें यह सर्वाधिक लोकप्रिय है।धातुशोधन में उच्च श्रेणी के बिटुमिनसकोयले का प्रयोग कियाजाता है जिसका लोहे के प्रगलनमें विशेष महत्त्व है।एंथ्रेसाइट सर्वोत्तम गुण वाला कठोरकोयला है।

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चित्र 5.9 (अ) –कोयला खदान का आंतरिक दृश्य
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भारत –परंपरागत ऊर्जा स्रोत
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चित्र 5.9 (ब) –कोयला खदान का बाह्य दृश्य

भारत में कोयला दो प्रमुख भूगर्भिक युगों के शैल क्रम में पाया जाता है - एक गोंडवाना जिसकी आयु 200 लाख वर्ष से कुछ अधिक है और दूसरा टरशियरी निक्षेप जो लगभग 55 लाख वर्ष पुराने हैं। गोंडवाना कोयले, जो धातुशोधन कोयला है, के प्रमुख संसाधन दामोदर घाटी (पश्चिमी बंगाल तथा झारखंड), झरिया, रानीगंज, बोकारो में स्थित हैं जो महत्त्वपूर्ण कोयला क्षेत्र हैं। गोदावरी, महानदी, सोन व वर्धा नदी घाटियों में भी कोयले के जमाव पाए जाते हैं।

टरशियरी कोयला क्षेत्र उत्तर-पूर्वी राज्यों - मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश व नागालैंड में पाया जाता है। 

यह स्मरण रहे कि कोयला स्थूल पदार्थ है। जिसका प्रयोग करने पर भार घटता है क्योंकि यह राख में परिवर्तित हो जाता है। इसी कारण भारी उद्योग तथा ताप विद्युत गृह कोयला क्षेत्रें अथवा उनके निकट ही स्थापित किये जाते हैं।

पेट्रोलियम

भारतमें कोयले के पश्चात्ऊर्जा का दूसरा प्रमुख साधन पेट्रोलियमया खनिज तेल है।यह ताप व प्रकाश के लिएईंधन, मशीनों को स्नेहकऔर अनेक विनिर्माण उद्योगोंको कच्चा माल प्रदान करता है।तेल शोधन शालाएँ - संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा असंख्य रासायनउद्योगों में एक नोडीय बिंदुका काम करती हैं।

भारतमें अधिकांश पेट्रोलियम की उपस्थिति टरशियरी युग की शैल संरचनाओंके अपनति व भ्रंश ट्रैपमें पाई जाती है। वलन,अपनति और गुंबदों वाले प्रदेशोंमें यह वहाँ पाया जाताहै जहाँ उद्ववलन के शीर्षमें तेल ट्रैप हुआ होताहै। तेल धारक परत संरध्र चूनापत्थर या बालुपत्थर होताहै जिसमें से तेल प्रवाहित होसकता है। मध्यवर्ती असरंध्रपरतें तेल को ऊपर उठनेव नीचे रिसने से रोकतीहैं।

पेट्रोलियम संरध्र और असरंध्रचट्टानों के बीच भ्रंश ट्रैपमें भी पाया जाता है।प्राकृतिकगैस हल्की होने केकारण खनिज तेल के ऊपर पाईजाती है।

भारतमेंमुम्बईहाई,गुजरातऔरअसमप्रमुखपेट्रोलियमउत्पादकक्षेत्र हैं।भारत के मानचित्र में तीन प्रमुखअपतटीय तेल क्षेत्र चिह्नितकरें। अंकलेश्वर गुजरात का सबसेमहत्त्वपूर्ण तेल क्षेत्र है। असमभारत का सबसे पुराना तेल उत्पादक राज्यहै। डिगबोई, नहरकटियाऔर मोरन-हुगरीजन इस राज्य के महत्त्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्र हैं।

प्राकृतिक गैस

प्राकृतिक गैस पेट्रोलियम के भंडार के साथ पाई जाती है और जब कच्चे तेल को सतह पर लाया जाता है तो यह मुक्त हो जाती है। इसका उपयोग घरेलू और औद्योगिक ईंधन के रूप में किया जा सकता है। इसका उपयोग बिजली क्षेत्रा में ईंधन के रूप में बिजली पैदा करने के लिए, उद्योगों में हीटिंग के उद्देश्य वेफ लिए, रासायनिक, पेट्रोकेमिकल और उर्वरक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में, परिवहन ईंधन के रूप में और खाना पकाने के ईंधन के रूप में किया जाता है। गैस के बुनियादी ढाँचे में विस्तार और स्थानीय शहर गैस वितरण (सी.ओ.डी.) नेटवर्क के विस्तार के साथ प्राकृतिक गैस पसंदीदा परिवहन ईंधन (सी.एन.जी.) और घरों में खाना पकाने के ईंधन (पी.एन.जी.) के रूप में भी उभर रहा है। भारत के प्रमुख गैस भंडार मुंबई हाई और अन्य संबद्द क्षेत्र पश्चिमी तट पर पाए जाते हैं जिनको खंभात बेसिन में पाए जाने वाले क्षेत्र संपूरित करते है| पूर्वी तट पर कृष्णा-गोदावरी बेसिन में प्राकृतिक गैस के नए भंडार की खोज की गई है।

गेल द्वारा निर्मित पहली 1,700 किलोमीटर लंबी हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (एच.वी.जे.) क्रॉस कंट्री गैस पाइपलाइन ने मुंबई हाई और बसीन गैस क्षेत्रों को पश्चिमी और उत्तरी भारत में विभिन उर्वरक, बिजली और औद्योगिक परिसरों से जोड़ा है। इन गैस पाइप लाइनो ने भारतीय गैस बाज़ार के विकास को गति प्रदान की। कुल मिलाकर, भारत के गैस बुनियादी ढाँचे का विस्तार क्रॉस-कंट्री पाइपलाइनों के 1700 किलोमीटर से बढ़कर 18500 किलोमीटर तक, दस गुना से अधिक हो गया है और पूर्वोत्तर राज्यों सहित देश भर में सभी गैस स्रोतों और उपभोक्ता बाजारों को जोड़कर गैस ग्रिड के रूप में जल्द ही 34000 किलोमीटर से अधिक तक पहुँचने की सम्भावना है।

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विद्युत

आधुनिक विश्व में विद्युत के अनुप्रयोग इतने ज्यादा विस्तृत हैं कि इसके प्रति व्यक्ति उपभोग को विकास का सूचकांक माना जाता है। विद्युत मुख्यतः दो प्रकार से उत्पन्न की जाती है – (क) प्रवाही जल से जो हाइड्रो-टरबाइन चलाकर जल विद्युत उत्पन्न करता है; (ख) अन्य ईंधन जैसे कोयला पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस कोजलाने से टरबाइन चलाकर ताप विद्युत उत्पन्न की जाती है। एक बार उत्पन्न हो जाने के बाद विद्युत एक जैसी ही होती है।

क्रियाकलाप

कुछ नदी घाटी परियोजनाओंके नाम बताएँ तथाइन नदियों पर बने बाँधोंका नाम लिखिए।

तेज बहते जल सेजल विद्युत उत्पन्नकी जाती हैजो एक नवीकरण योग्यसंसाधन है। भारत में अनेक बहु-उद्देशीय परियोजनाएँ हैं जो विद्युतऊर्जा उत्पन्न करती हैं; जैसे- भाखड़ा नांगल, दामोदर घाटीकारपोरेशन और कोपिलीहाइडल परियोजना आदि।

ताप विद्युत-कोयला, पेट्रोलियम तथाप्राकृतिक गैस के प्रयोग सेउत्पन्न की जाती है। तापविद्युत गृह अनवीकरण योग्य जीवश्मी ईंधन का प्रयोग कर विद्युतउत्पन्न करते हैं।

अपने राज्य के ताप विद्युतगृह की जानकारी एकत्रकीजिए तथा उसमें प्रयुक्त ईंधनका नाम भी लिखिए।

गैर-परंपरागत ऊर्जा के साधन

ऊर्जा के बढ़ते उपभोग नेदेश को कोयला, तेल औरगैस जैसे जीवाश्मी ईंधनों परअत्यधिक निर्भर कर दियाहै। गैस व तेल की बढ़तीकीमतों तथा इनकी संभाव्य कमीने भविष्य में ऊर्जाआपूर्ति की सुरक्षा के प्रति अनिश्चितताएँउत्पन्न कर दी हैं।इसके राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था कीवृद्धि पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं।इसके अतिरिक्त जीवाश्मीईंधनों का प्रयोग गंभीर पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्नकरता है। अतः नवीकरण योग्य ऊर्जा संसाधनों जैसे – सौरऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैविक ऊर्जा तथा अवशिष्ट पदार्थजनित ऊर्जा के उपयोग की बहुतज़रूरत है। ये ऊर्जाके गैर-परंपरागत साधन कहलाते हैं।

भारत धूप, जल तथा जीवभारसाधनों में समृद्ध है। भारत मेंनवीकरण योग्य ऊर्जा संसाधनोंके विकास हेतु बृहत् कार्यक्रम भी बनाए गए हैं।

परमाणु अथवा आणविक ऊर्जा

परमाणु अथवा आणविक ऊर्जा अणुओं की संरचना को बदलने से प्राप्त की जाती है। जब एेसा परिवर्तन किया जाता है तो ऊष्मा के रूप में काफी ऊर्जा विमुक्त होती है; और इसका उपयोग विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने में किया जाता है। यूरेनियम और थोरियम जो झारखंड और राजस्थान की अरावली पर्वत श्रृंखला में पाए जाते हैं, का प्रयोग परमाणु अथवा आणविक ऊर्जा के उत्पादन में किया जाता है। केरल में मिलने वाली मोनाजाइट रेत में भी थोरियम की मात्रा पाई जाती है।

भारत के मानचित्र पर 6 परमाणु ऊर्जासंयंत्रों की अवस्थिति दिखाएँ तथाउनके राज्यों के नाम ज्ञात करें जिनमें ये अवस्थित हैं।

सौर-ऊर्जा
भारत एक उष्ण-कटिबंधीय देश है। यहाँ सौर ऊर्जा के दोहन की असीम संभावनाएँ हैं। फोटोवोल्टाइक प्रौद्योगिकी द्वारा धूप को सीधे विद्युत में परिवर्तित किया जाता है। भारत के ग्रामीण तथा सुदूर क्षेत्रों में सौर ऊर्जा तेजी से लोकप्रिय हो रही है। कुछ बड़े सौर ऊर्जा संयंत्र देश के विभिन्न भागों में स्थापित किए जा रहे हैं। एेसी अपेक्षा है कि सौर ऊर्जा के प्रयोग से ग्रामीण घरों में उपलों तथा लकड़ी पर निर्भरता को न्यूनतम किया जा सकेगा। फलस्वरूप यह पर्यावरण संरक्षण में योगदान देगा और कृषि में भी खाद्य की पर्याप्त आपूर्ति होगी।
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चित्र5.10–सौर ऊर्जा संचालित इलेक्ट्रॉनिक दुग्ध परीक्षण उपकरण

क्रियाकलाप

भारत में नए स्थापित सौर ऊर्जा संयंत्रों के बारे में जानकारी एकत्र करें।

पवन ऊर्जा

भारतमेंपवनऊर्जा के उत्पादन की महान संभावनाएँ हैं। भारत में पवनऊर्जा फार्मकेविशालतमपेटीतमिलनाडुमेंनागरकोइलसेमदुरईतक अवस्थित है। इसके अतिरिक्त आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, केरल,महाराष्ट्र तथा लक्षद्वीप में भी महत्त्वपूर्ण पवन ऊर्जा फार्म हैं।नागरकोइल और जैसलमेर देशमें पवन ऊर्जा के प्रभावी प्रयोगके लिए जाने जाते हैं।

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चित्र 5.11 –पवन चक्की-नागरकोइल
बायोगैस

ग्रामीण इलाकों में झाड़ियों, कृषि अपशिष्ट, पशुओं और मानव जनित अपशिष्ट के उपयोग से घरेलू उपभोग हेतु बायोगैस उत्पन्न की जाती है। जैविक पदार्थों के अपघटन से गैस उत्पन्न होती है, जिसकी तापीय सक्षमता मिट्टी के तेल, उपलों व चारकोल की अपेक्षा अधिक होती है। बायोगैस संयत्र नगरपालिका, सहकारिता तथा निजी स्तर पर लगाए जाते हैं। पशुओं का गोबर प्रयोग करने वाले संयंत्र ग्रामीण भारत में ‘गोबर गैस प्लांट’ के नाम से जाने जाते हैं। ये किसानों को दो प्रकार से लाभांवित करते हैं– एक ऊर्जा के रूप में और दूसरा उन्नत प्रकार के उर्वरक के रूप में। बायोगैस अब तक पशुओं के गोबर का प्रयोग करने में सबसे दक्ष है। यह उर्वरक की गुणवत्ता को बढ़ाता है और उपलों तथा लकड़ी को जलाने से होने वाले वृक्षों के नुकसान को रोकता है।

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चित्र 5.12 –बायोगैस संयंत्र
ज्वारीय ऊर्जा

महासागरीय तरंगोंका प्रयोग विद्युत उत्पादन केलिए किया जा सकता है। सँकरी खाड़ी के आर-पार बाढ़द्वार बना कर बाँध बनाए जातेहैं। उच्च ज्वार मेंइस सँकरी खाड़ीनुमा प्रवेश द्वार से पानी भीतर भर जाताहै और द्वार बन्द होने पर बाँध में ही रहजाता है। बाढ़ द्वार के बाहर ज्वार उतरने पर, बाँधके पानी को इसी रास्तेपाइप द्वारा समुद्र की तरफबहाया जाता है जो इसे ऊर्जा उत्पादक टरबाइन की ओरले जाता है।

भारत में खम्भात की खाड़ी, कच्छ कीखाड़ी तथा पश्चिमी तटपर गुजरात में और पश्चिम बंगालमेें सुंदर वन क्षेत्र मेंगंगा के डेल्टा में ज्वारीयतरंगों द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करने कीआदर्श दशाएँ उपस्थित हैं।

भू-तापीय ऊर्जा

पृथ्वी के आंतरिक भागों से ताप का प्रयोग कर उत्पन्न की जाने वाली विद्युत को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं।

भू-तापीय ऊर्जा इसलिए अस्तित्व में होती है क्योंकि बढ़ती गहराई के साथ पृथ्वी प्रगामी ढंग से तप्त होती जाती है। जहाँ भी भू-तापीय प्रवणता अधिक होती है वहाँ उथली गहराइयों पर भी अधिक तापमान पाया जाता है। ऐसे क्षेत्रें में भूमिगत जल चट्टðानों से ऊष्मा का अवशोषण कर तप्त हो जाता है। यह इतना तप्त हो जाता है कि यह पृथ्वी की सतह की ओर उठता है तो यह भाप में परिवर्तित हो जाता है। इसी भाप का उपयोग टरबाइन को चलाने और विद्युत उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।

 भारत में सैंकड़ों गर्म पानी के चश्मे हैं, जिनका विद्युत उत्पादन में प्रयोग किया जा सकता है। भू-तापीय ऊर्जा के दोहन के लिए भारत में दो प्रायोगिक परियोजनाएँ शुरू की गई हैं। एक हिमाचल प्रदेश में मणिकरण के निकट पार्वती घाटी में स्थित है तथा दूसरी लद्दाख में पूगा घाटी में स्थित है।

ऊर्जा संसाधनों का सरंक्षण

आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा एक आधारभूत आवश्यकता है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक सेक्टर - कृषि, उद्योग, परिवहन, वाणिज्य व घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऊर्जा के निवेश की आवश्यकता है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् क्रियांवित आर्थिक विकास की योजनाओं को चालू रखने के लिए ऊर्जा की बड़ी मात्रा की आवश्यकता थी। फलस्वरूप पूरे देश में ऊर्जा के सभी प्रकारों का उपभोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है।

इस पृष्ठभूमि में ऊर्जा के विकासके सतत् पोषणीय मार्ग केविकसित करने की तुरंत आवश्यकताहै। ऊर्जा संरक्षण की प्रोन्नतिऔर नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों काबढ़ता प्रयोग सतत् पोषणीयऊर्जा के दो आधार हैं।

वर्तमान में भारत विश्व के अल्पतम ऊर्जादक्ष देशों में गिना जाता है। हमें ऊर्जा के सीमित संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग के लिए सावधानीपूर्ण उपागम अपनाना होगा। उदाहरणार्थ एक जागरूक नागरिक के रूप में हम यातायात के लिए निजी वाहन की अपेक्षा सार्वजनिक वाहन का उपयोग करके, जब प्रयोग न हो रही हो तो बिजली बन्द करके विद्युत बचत करने वाले उपकरणों के प्रयोग से तथा गैर पारंपरिक ऊर्जा साधनों के प्रयोग से हम अपना छोटा योगदान दे सकते हैं। आखिरकार‘ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा उत्पादन है।’

अभ्यास

1.बहुवैकल्पिक प्रश्न

(i)निम्नलिखित में से कौन-सा खनिज अपक्षयित पदार्थ के अवशिष्ट भार को त्यागता हुआ चट्टानों के अपघटन से बनता है?

(क) कोयला (ख) बॉक्साइट (ग) सोना (घ) जस्ता

(ii) झारखंड में स्थित कोडरमा निम्नलिखित से किस खनिज का अग्रणी उत्पादक है?

(क) बॉक्साइट (ख) अभ्रक (ग) लौह अयस्क (घ) ताँबा

(iii) निम्नलिखित चट्टानों में से किस चट्टान के स्तरों में खनिजों का निक्षेपण और संचयन होता है?

(क) तलछटी चट्टानें (ग) आग्नेय चट्टानें

(ख) कायांतरित चट्टानें (घ) इनमें से कोई नहीं

(iv) मोनाजाइट रेत में निम्नलिखित में से कौन-सा खनिज पाया जाता है?

(क) खनिज तेल (ख) यूरेनियम (ग) थोरियम (घ) कोयला

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

(i)निम्नलिखित में अंतर 30 शब्दों से अधिक न दें।

(क) लौह और अलौह खनिज (ख) परंपरागत तथा गैर परंपरागत ऊर्जा साधन

(ii) खनिज क्या हैं?

(iii) आग्नेय तथा कायांतरित चट्टानों में खनिजों का निर्माण कैसे होता है?

(iv) हमें खनिजों के संरक्षण की क्यों आवश्यकता है?

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 120 शब्दों में दीजिए।

(i) भारत में कोयले के वितरण का वर्णन कीजिए।

(ii) भारत में सौर ऊर्जा का भविष्य उज्जवल है। क्यों?

क्रियाकलाप

नीचे दी गई वर्ग पहेली में उपयुक्त खनिजों का नाम भरें –

नोट : पहेली के उत्तर अंग्रेज़ी के शब्दों में हैं।

29

क्षैतिज

1. एक लौह खनिज (9)

2. सीमेंट उद्योग में प्रयुक्त कच्चा माल (9)

3. चुंबकीय गुणों वाला सर्वश्रेष्ठ लोहा (10)

4. उत्कृष्ट कोटि का कठोर कोयला (10)

5. इस अयस्क से एल्यूमिनियम प्राप्त किया जाता है। (7)

6. इस खनिज के लिए खेतरी खदानें प्रसिद्ध हैं। (6)

7. वाष्पीकरण से निर्मित (6)

ऊर्ध्वाधर

1. प्लेसर निक्षेपों से प्राप्त होता है।

2. बेलाडिला में खनन किया जाने वाला लौह-अयस्क (8)

3. विद्युत उद्योग में अपरिहार्य (4)

4. उत्तरी-पूर्वी भारत में मिलने वाले कोयले की भूगर्भिक आयु (8)

5. शिराओं तथा शिरानिक्षेपों में निर्मित (3)