AntralBhag1-001

अंडे के छिलके

पात्र

श्याम            वीना

राधा             गोपाल

जमुना            माधव

परदा उठने पर गैलरी वाला दरवाज़ा खुला दिखाई देता है। बाईं ओर के दरवाज़े के आगे परदा लटक रहा है जिससे पता नहीं चलता कि दरवाज़ा खुला है या बंद। कमरे में कोई नहीं है।

श्याम सीटी बजाता गैलरी से आता है, पतलून-कमीज़ के ऊपर बरसाती पहने। सिर भीेगा है। बरसाती से पानी निचुड़ रहा है।

अंदर आकर वह इधर-उधर नज़र दौड़ाता है।

श्याम: अरे! कमरा खाली! न भैया न भाभी! (पुकारकर) भाभी!

दूसरे कमरे से वीना की आवाज़:

वीनाः  कौन? ...श्याम? ...क्या बात है?

श्यामः  इधर आओ, तो बताऊँ क्या बात है।

वीना उधर से आती है।

वीनाः  तुम्हें भी आकर इस तरह आवाज़ देने की ज़रूरत पड़ती है? इस तरह पुकार रहे थे जैसे  किसी पराए घर में आए हो।

श्यामः  पराया घर तो लगता ही है, भाभी। तुमने आते ही वह नक्शा बदला है इस कमरे का, कि मेरा अंदर पैर रखने का हौसला ही नहीं पड़ता। पहले तो इस कमरे की वही हालत रहती थी जो आजकल मेरे कमरे की है। जूते को छोड़कर हर चीज़ या चारपाई पर या मेज़ पर। अब तो मुझे इस कमरे में सिर्फ़ वही एक कोना गोपाल भैया का नज़र आता है जहाँ पतलूनें और कोट एक-दूसरे के ऊपर टँगे हैं। बाकी कमरे की सरकार ही बदल गई है। भैया की टेबल भी क्या याद करती होगी कि किसी का हाथ लगा है। आजकल एेसे चमकती है जैसे नयी-नयी पालिश होकर आई हो।

वीनाः  खड़े गाँव से आए हो जो खड़े-खड़े ही बात करोगे? बरसाती बाहर रख दो, सारा कमरा भिगो रहे हो। फिर बैठकर आराम से बात करो। अभी तुम्हारे भैया आते हैं तो तुम्हें चाय बना देती हूँ।

श्यामः  सिर्फ़ चाय? गलत बात। एेसे सुहाने मौसम में सूखी चाय नहीं पी जा सकती। हरगिज़ नहीं।

उसके सिर पर हाथ रखकर उसका मुँह बाहर की तरफ़ कर देती है।

वीनाः  यह सुहाना मौसम पहले गैलरी में छोड़ आओ। सारा फ़र्श गीला कर रहे हो।

फिर पीछे से खुद ही उसकी बरसाती उतारने लगती है।

लाओ, उतार दो बरसाती। मैं ही बाहर रख आती हूँ।

श्याम उतारते-उतारते जैसे कुछ ध्यान आ जाने से फिर से बरसाती पहन लेता है।

श्यामः  भाभी, एक बात कहता हूँ।

वीनाः  क्या बात? बरसाती तुमने फिर से पहन ली? मैं कहती हूँ तुम तो बस...।

श्यामः  भाभी, बात तो सुन लो। मैं कहता हूँ कि बरसाती आकर एक ही बार उतारूँ। चाय के साथ खाने के लिए भागकर कोई चीज़ ले आऊँ। सूखी चाय का मज़ा नहीं आएगा। इस वक्त पानी ज़रा थमा है, फिर ज़ोर से बरसने लगेगा।

वीनाः  फिर वही खाने की बात! कोई एेसा भी वक्त होता है जब तुम्हें खाने की बात नहीं सूझती? ...अच्छा जाओ, मगर लाओगे क्या?

श्यामः  तुम जो कहो ले आऊँ। इस वक्त गरम-गरम कचौरी और समोसे भी मिल जाएँगे और...

वीनाः  और क्या?

श्यामः  और... और... कहो तो कोई और अच्छी चीज़ भी मिल सकती है...

वीनाः  बरसते पानी में जाओगे तो अच्छी चीज़ ही लाओ। समोसे-कचौरी क्या खाओगे!

श्यामः  अच्छी चीज़... अं... अं... तो अच्छी चीज़ हो सकती है... अं...

वीनाः  जाओ, चार-छः अंडे ले आओ। मैं तुम्हें अंडे का हलुआ बना देती हूँ।

श्यामः  शिव, शिव, शिव! किसी और चीज़ का नाम लो, भाभी। इस घर में अंडे का नाम ले रही हो? जाओ जल्दी से जाकर कुल्ला कर लो। मुँह भ्रष्ट हो गया होगा।

वीनाः  क्या बात करते हो? (दबे स्वर में) यहाँ रोज़ सुबह अंडे का नाश्ता होता है। तुम्हारे भाई साहब ने यह बिजली का स्टोव किसलिए लाकर रखा है? माँजी से तो कहा था कि सुबह बेड-टी लेनी होती है, रसोईघर से बनाकर लाने में ठंडी हो जाती है, इसलिए ये सोलह रुपये खर्च किए हैं। माँजी भी भोली हैं, झट मान जाती हैं। कोई इनसे पूछे कि स्टोव तो बेड-टी के लिए लाए हैं, मगर यह फ्राइंग पैन किस लिए लाए हैं? इसमें क्या दूध गरम होता है?

श्यामः  संयम, संयम, संयम! ज़रा संयम से काम लो, भाभी। चार दिन जो अंडे खा लिए हैं वे छिलकों समेत वसूल हो जाएँगे। अम्माँ के कान में भनक भी पड़ गई तो सारे घर का गंगा इश्नान हो जाएगा। और तुम देख ही रही हो कि बादलों का दिन है। किसी को कुछ हो-हवा गया तो...

वीनाः भई, तुम लोगों की यह बात मेरी समझ में बिलकुल नहीं आती। अगर खाना ही है तो उसमें छिपाने की क्या बात है? सबके सामने खाओ। माँजी नहीं खातीं, इसलिए रसोईघर की बजाय यहाँ कमरे में बना लेते हैं। और अंडे में जीव कहाँ होता है? जैसे दूध, वैसे अंडा।

श्यामः  हरि, हरि, हरि! फिर वही नाम! भाभी, आज इस बरसते पानी में तुम जान निकलवाओगी। तुमसे कोई कुछ नहीं कहेगा। अम्माँ मेरे सिर हो जाएँगी कि सब तेरी ही करनी है। तुम खाओ, बनाओ, जो चाहे करो। मगर इस चीज़ का नाम मुँह पर मत लाओ। ...लाओ, पैसे निकालो। मैं तुम्हारे रिस्क पर ले आता हूँ। चोरी पकड़ी जाने पर अगर मेरा नाम लिया कि यह लाया है तो मैं साफ़ मुकर जाऊँगा और बेड-टी के साथ फ्राइंग पैन का रिश्ता अम्माँ को अच्छी तरह समझा दूँगा। कितने ले आऊँ–चार कि छः? ...एकाध मेरे कमरे में भी रखा होगा।

वीनाः  अच्छा, तो यह बात है। आप अपने कमरे में...

श्यामः  (बात काटकर) फिर कहता हूँ भाभी कि नाम मत लो। अपने कमरे में न फ्राइंग पैन है न स्टोव जो कोई चीज़ साबित की जा सके। कच्चा लाते हैं और कच्चा खाते हैं। इसीलिए सुबह दूध की तलब कमरे में होती है। रखने-रखाने का इंतज़ाम पक्का है। मगर तुम कहो कि अम्माँ के सामने भी यह बात ज़ाहिर कर दें तो हरगिज़ नहीं। हमें अपनी अम्माँ से भी प्यार है और अपनी खुराक से भी।

वीनाः  बहुत अच्छी बात है न! अम्माँ की रसोई के बरतन रोज़ भ्रष्ट करते हो, यह अच्छा प्यार है! देख लेना, कल से तुम्हारा दूध का गिलास अलग न रखवा दिया तो...।

श्यामः  अच्छी बात है। तुम हमारा दूध का गिलास अलग रखवा देना और हम यह फ्राइंग पैन यहाँ से उठवा देंगे। वैसे चाहो तो अब भी समझौता हो सकता है। तुम ज़बान से खाने का काम लो, शोर मचाने का नहीं, और मैं अभी जाकर आधी दर्जन वह जो तुम कह रही थीं, लाए देता हूँ। इस समझौते की खुशी में पैसे भी अपनी जेब से खर्च किए देता हूँ। मंज़ूर? अच्छा, टा-टा!

गैलरी की तरफ़ चल देता है।

वीनाः  साथ में थोड़ी किशमिश भी ले आना।

श्यामः  ओ.के.। तुम इस बीच चाय का पानी रख दो। आते ही एक प्याली पीऊँगा।

चला जाता है। वीना खूँटी की तरफ़ जाकर वहाँ टँगे हुए कपड़े उतारने और तहाने लगती है।

वीनाः  मैं भी इस घर में आकर बस यहाँ की-सी हुई जा रही हूँ । दो दिन से कपड़े ही प्रेस नहीं किए...। साहब के कपड़ों का यह ढेर तो कभी ठीक ही नहीं होगा। मैं टाइयाँ और कपड़े अब कुर्सियों के पीछे नहीं टाँगने देती, इसलिए हर चीज़ खूँटी पर।

कपड़े उतारते हुए मोज़े का एक जोड़ा नीचे जा गिरता है।

लो, यह पुराना मोज़ा भी खूँटी पर लटकाने­­ की चीज़ है!

कपड़े संदूक पर रखकर मोज़ा उठा लेती है। मोज़ा कुछ भारी लगता है, इसलिए उसे हाथ से मलकर देखती है।

तो यह बात है। कल और परसों के छिलके साहब ने मोज़े में भरकर यहाँ लटका रखे हैं। इनकी यह कैसी आदत है, यह मेरी समझ में नहीं आती। छिलके नाली में डाल दिए जाएँ, गंदगी दूर हो। मगर नहीं। हफ़्ता-भर छिलके इकट्ठे करेंगे, फिर डिब्बे में भरकर बाहर ले जाएँगे, जैसे किसी के लिए सौगात ले जा रहे हों।

मोज़ा कोने में डाल देती है।

अच्छा, श्याम के आने तक चाय का पानी तो रख दूँ।

केतली उठाकर बाईं ओर के दरवाज़े की तरफ़ जाती है। परदा उठाने पर दरवाज़ा बंद मिलता है। किवाड़ खटखटाती है।

राधा जीजी! ...राधा जीजी! इतनी देर में दरवाज़ा बंद करके क्यों पड़ गईं? ज़रा खोलना, मुझे अंदर नल से पानी लेना है।

कुछ क्षणों के बाद दरवाज़े की कुंडी खुलती है।

वीनाः  क्या बात है, जीजी? अभी संझा भी नहीं हुई और तुम दरवाज़े बंद करके पड़ गईं? मैंने सोचा कि कहीं जेठ जी न आ गए हों...।

राधा दरवाज़े से निकलकर अँगड़ाई लेती है, जैसे सचमुच बिस्तर से उठी हो।

राधाः  आज दोपहर से ही शरीर कुछ टूट-सा रहा था। मैंने कहा कि थोड़ी देर लेट लूँ, फिर उठकर रोटी-वोटी का धंधा करना होगा।

वीनाः  यह लेटने का वक्त थोड़े ही है, बीबी? बैठो, मैं चाय बना रही हूँ, अभी सब लोग चाय पिएँगे। ये भी दफ़्तर से आने वाले ही होंगे। बैठो, मैं उधर से पानी लेकर आती हूँ।

अंदर चली जाती है। राधा अनमनी-सी खड़ी रहती है। क्षण भर बाद अंदर से वीना के हँसने का स्वर सुनाई देता है। राधा चौंककर उधर देखती है।

राधाः  क्या बात है वीना? अपने आप ही हँस रही हो?

वीना एक हाथ में पानी की केतली और दूसरे हाथ में एक किताब लिए हँसती हुई उधर से आती है।

वीनाः  हँसने की बात नहीं है, जीजी?... यह तुम्हारी चंद्रकांता...

राधा झपटकर किताब उसके हाथ से छीनना चाहती है, मगर वीना उसे झाँसा देकर उसके पास से निकल जाती है। केतली मेज़ पर रखकर वह किताब पीछे छिपा लेती है। राधा पास आकर किताब उससे छीनने का प्रयत्न करती है।

छीनाझपटी में नहीं दूँगी, जीजी! एेसे माँग लो तो दे दूँगी। मगर इसमें इस तरह छिपाकर पढ़ने की क्या बात है? मैंने तो चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति और भूतनाथ सब पढ़ रखी हैं। जब हम मिडिल में थीं तो स्कूल की लाइब्रेरी से लेकर पढ़ी थीं। इसमें एेसा तो कुछ भी नहीं है कि इसे तकिए के नीचे छिपाकर रखा जाए और दरवाज़े बंद करके पढ़ा जाए।

राधाः  न भइया न! हम माँजी के सामने एेसी चीज़ कभी नहीं पढ़ सकते। कोई खराब बात चाहे न हो मगर माँजी देखेंगी तो क्या सोचेंगी कि रामायण नहीं, महाभारत नहीं, दिनभर बैठकर एेसे किस्से ही पढ़ा करती हैं। और हम पढ़ते भी कहाँ हैं? हमको तो कौशल्या भाभी ने ज़बरदस्ती दे दी तो हम उठा लाए, नहीं हम तो एेसी चीज़ कभी नहीं पढ़ते। घर के काम-धंधे से फ़ुरसत लगे, तो कुछ पढ़ें भी। और हमारे पास अपनी गुटका रामायण है, कभी-कभी उसमें से ही थोड़ा-बहुत बाँच लेते हैं। तुम जानो इस घर में ये सब पढ़ेंगे तो जान नहीं निकाल दी जाएगी? यह तो कौशल्या भाभी हमारे पीछे पड़ गईं कि ज़रूर पढ़ो नहीं तो क्या...

वीनाः  यह तो मैं भी कहती हूँ, जीजी, कि ज़रूर पढ़ो। बहुत ही इंट्रेस्टिंग किताब है। ज़रा बचकाना टेस्ट की ज़रूर है, मगर...

राधाः  (चिढ़कर) हाँ भाई, हम तुम्हारी तरह पढ़े-लिखे तो हैं नहीं!

वीनाः  मेरा यह मतलब थोड़े ही है, जीजी! मेरा मतलब तो यह है कि तुम रामायण, महाभारत पढ़ने वाली हो, तुम्हें यह किताब ज़रा बचकाना टेस्ट की मालूम होगी।

राधाः  वह बात तो है ही। ...मगर सच कहें, वीना, तो इसमें भी तो शूरवीरता की ही कहानी है। जिस तरह भगवान राम सीता के लिए वन-वन में मारे-मारे फिरते हैं, उसी तरह कुँअर वीरेंद्र सिंह चंद्रकांता के लिए तिलिस्म के अंदर घूमते-फिरते हैं और...

वीनाः  (हँसती हुई) और जिस तरह भगवान राम समुद्र लाँघकर सीता का उद्धार करते हैं, उसी तरह कुँअर वीरेंद्र सिंह तिलिस्म तोड़कर चंद्रकांता का उद्धार करते हैं। तिलिस्म तोड़ना बल्कि समुद्र लाँघने से ज़्यादा मुश्किल काम है।

राधाः  (उत्सुकतापूर्वक) अच्छा, एक बात तो बताओ, वीना। तुमने तो सारी किताब पढ़ी है। अंत में जाकर वनकन्या का क्या होता है? कुँअर वीरेंद्र सिंह के साथ उसका ब्याह हो जाता है कि नहीं? मेरा दिल तो कहता है कि हो जाता है।

वीनाः  हाँ, हाँ, ज़रूर हो जाता है।

राधाः  और चंद्रकांता के साथ?

वीनाः  उसके साथ भी हो जाता है।

राधाः  दोनों के साथ ही हो जाता है?

वीनाः  हाँ भी और नहीं भी।

राधाः  हाँ भी और नहीं भी, यह कैसे?

वीनाः  यही बता दिया तो फिर पढ़ना क्या रह गया? जब पढ़ लोगी तो अपने आप पता चल जाएगा, (किताब देती हुई) यह किताब ले लो। मगर अभी से दरवाज़ा बंद करके नहीं पढ़ने दूँगी। रात को जब सब लोग सो जाएँगे तो मोमबत्ती जलाकर पढ़ना। मैं भी कई दिनों से सोचती थी कि रात को तुम मोमबत्ती जलाकर क्या करती रहती हो। ...अभी यहाँ बैठो।

उसे बाँह पकड़कर पलंग पर बैठा देती है और दी हुई किताब भी उसके हाथ से लेकर पलंग पर फेंक देती है।

राधाः  अच्छा वीना, ये बाबा जी महाराज कौन हैं?

वीनाः  कौन से बाबा जी महाराज?

राधाः  वही जो वीरेंद्र सिंह को आत्महत्या से रोकते हैं।

वीनाः  तुम अभी तक उसी दुनिया में घूम रही हो, जीजी? अब थोड़ी देर के लिए तो तिलिस्म से बाहर निकल आओ।

केतली स्टोव पर रखकर स्विच अॉन कर देती है। बाहर से गोपाल आता है। वर्षा की फुहार से उसके कपड़े ज़रा-ज़रा भीग रहे हैं।

गोपालः  वाह, आज केतली पहले से ही रखी हुई है! बहुत सही अंदाज़ा है वक्त का।

वीनाः  इस गलतफ़हमी में मत रहिए कि आपके लिए चाय का पानी रखा गया है। यह केतली श्याम के लिए रखी गई है। आप आ गए हैं इसलिए एक प्याली आपको भी मिल जाएगी।

गोपालः  क्या बात है, आजकल श्याम पर बहुत मेहरबान हो रही हो?

वीनाः  जीजी बैठी हैं, ये तो मुझसे ज़्यादा जानती होंगी।

गोपालः  देखो, हमारी भाभी के लिए कुछ मत कहना। हमारी भाभी देवी की प्रतिमा हैं, तुम्हारी तरह नहीं हैं। तुम तो दिनभर बैठी ‘संज़ एंड लवर्ज़’ पढ़ती रहती हो और भाभी पढ़ती हैं रामायण, महाभारत।

वीनाः  (शरारत के लहजे में) सच?

गोपालः  सच नहीं तो क्या? क्यों भाभी?

राधाः  (खिसियाई-सी) भई, हम कुछ भी नहीं पढ़ते। हमें दिनभर काम से फ़ुरसत मिलती है जो पढ़ें-पढ़ाएँ? कभी दस मिनट मिल गए तो चार अक्षर बाँच लिए।

गोपालः  वक्त न मिले, यह और बात है। पर पढ़ने के लिए तुमने गुटका रामायण रख तो छोड़ी है? मन में भावना होनी चाहिए।

वीनाः  आज जीजी की गुटका रामायण मैं इधर उठा लाई हूँ। जीजी तो लाने ही न देती थीं। अभी-अभी आपके आने से पहले मैं इनसे समुद्र लंघन की कथा सुन रही थी।

गोपालः  यह तो बहुत ही अच्छी बात है। तुमने बी.ए. पास तो किया है, मगर जो विद्या तुम्हें भाभी से मिल सकती है, वह स्कूलों-कालेजों में नहीं पढ़ाई जाती। क्यों भाभी?

राधाः  भैया, हम किसी को क्या पढ़ाएँगे? हम तो आप ही अनपढ़ हैं। हम तो वीना के पास इसीलिए आ बैठते हैं कि दो-चार अच्छे अक्षर इससे सीख जाएँ।

गोपालः  तुम, और इससे सीखोगी? यह उलटी रीत यहाँ नहीं चल सकती, भाभी! दस्तूर यही है कि बड़ा बड़े की जगह और छोटा छोटे की जगह। 

वीनाः  हाँ, हाँ, क्यों पता चला होगा? बीबी ने जेठ जी को बताया थोड़े  ही होगा?

राधाः  हमसे कोई कसम उठवा ले जो हमने बताया हो। हमारी यह आदत नहीं है कि इधर की बात उधर और उधर की बात इधर लगाते फिरें। जब एक बार हमने कह दिया कि किसी से नहीं कहेंगे, तो किसी से नहीं कहा। दिल में रखने की बात हम दिल में ही रखते हैं।

गोपालः  और क्या? दिल में रखने की बात दिल में रखनी ही चाहिए। ...पानी खौल गया कि नहीं?

वीनाः  बस अभी हुआ जाता है। उतनी देर में श्याम भी आ जाएगा!

श्याम बरसाती की जेबों में हाथ डाले हुए बाहर से आता है।

श्यामः  लो भाभी, ले आया। अब तुम जानो और तुम्हारा काम।

राधा को देखकर ज़रा असमंजस में पड़ जाता है।

अरे, बड़ी भाभी भी यहाँ पर हैं? तब तो...

गला साफ़ करते हुए चुप कर जाता है।

वीनाः  यह अपनी बरसाती तो बाहर उतार दो। अभी तक इससे पानी टपक रहा है।

श्यामः  वह बात तो ठीक है भाभी, मगर...

वीनाः  मगर क्या?

श्यामः  मगर यह कि भाभी वह जो... वह जो तुमने कहा था, वह...

वीनाः  लाए नहीं?

श्यामः  ल-लाया तो ज़रूर हूँ म-मगर...

वीनाः  मगर जीजी से डर लगता है, यही न? डरने की कोई बात नहीं, जीजी किसी से नहीं कहेंगी। लाओ, निकालो।

श्यामः  (ज़रा खँखारकर) और अगर बाद में...?

वीनाः  नहीं, बाद में कुछ नहीं होता। लाओ, निकालो।

गोपालः  क्या चीज़ है जिसके लिए इतनी हील-हुज्जत हो रही है?

वीनाः  कुछ नहीं, आधा दर्जन अंडे मँगवाए हैं। कह रहा था कि सूखी चाय नहीं पीऊँगा, तो मैंने कहा कि अंडे का हलुआ बनाए देती हूँ ।

गोपालः  अंडे का हलुआ? यह तुम्हें क्या सूझी है? मैंने तुम्हें अच्छी तरह समझा दिया था, फिर भी तुम...?

वीनाः  (श्याम से) तुम क्यों काठ से वहाँ खड़े हो? अंडे मुझे दे दो, और बरसाती उतारकर बाहर रख दो। (गोपाल से) आपको जब दीदी से सिगरेट का छिपाव नहीं है, तो अंडे का छिपाव रखने की क्या ज़रूरत है? (श्याम से) लाओ श्याम, दो मुझे।

श्याम क्षण भर की हिचकिचाहट के बाद दोनों जेबों से हाथ निकालता है। उसके एक-एक हाथ में तीन-तीन अंडे हैं। वीना अंडे उससे ले लेती है और वह बरसाती उतारकर गैलरी में छोड़ आता है।

गोपालः  (अव्यवस्थित-सा) देखो वीना...मैंने तुमसे कहा था कि घर में...घर में यह चीज़ ठीक नहीं है। आदमी बाहर जाकर खा ले, वह और बात है। मगर घर में...

वीनाः  घर में घर के आदमी देख लेंगे, इतनी ही तो बात है न? तो जीजी से तो किसी बात का परदा है नहीं। ये आज न देखतीं तो किसी और दिन देख लेतीं। जब रोज़ सवेरे...

गोपालः  अललललल, क्या बक रही हो? कुछ होश की दवा करो।

राधाः  सच पूछो गोपाल तो हमें इस चीज़ का पहले से ही पता है।

श्याम मुसकराता है। गोपाल कस-सा आराम कुरसी पर पड़ जाता है।

गोपालः  किस चीज़ का पता है?

राधाः  इस चीज़ का कि रोज़ सवेरे चाय के साथ तुम्हारे कमरे में क्या बनता है। तलने की आवाज़ तो छोड़ो, तुम जानो खुशबू भी तो उधर जाती है।

गोपालः  किस चीज़ की खुशबू जाती है?

राधाः  जो चीज़ बनती है, उसी की खुशबू आती है, और किस चीज़ की आएगी?

वीनाः  लीजिए, और छिपाइए। जीजी तो खुशबू से यह भी पहचान लेती होंगी कि किस दिन आमलेट बनता है और किस दिन अंडे फ्राई होते हैं।

राधाः  ज़रूर जान लेते हैं। आज सवेरे तुमने आमलेट बनाए थे। बनाए थे कि नहीं?

वीनाः  जीजी, जब तुम खुशबू पहचानती हो, तब तो ज़रूर तुम भी...

राधाः  (बात काटकर) न। हम कभी नहीं खाते। चाहे हमें किसी की कसम दिला लो। खुशबू तो तुम जानो हर चीज़ की अलग ही होती है। खाया नहीं है तो क्या!

श्यामः  सूँघा भी नहीं है? ...बड़ी भाभी, तुम्हारी नाक बहुत तेज़ है।

वीना इस बीच अंडे एक कप में तोड़ने लगती है और छिलके मेज़ पर रखती जाती है।

राधाः  बड़ी भाभी की नाक ही नहीं, आँखें भी बहुत तेज़ हैं।

गोपालः  (राधा से) देखो भाभी, अब तुम्हें सब मालूम ही है, मगर भैया को नहीं बताना। उनका स्वभाव तो तुम जानती ही हो। माफ़ कर दें तो बड़ी-बड़ी बात माफ़ कर दें। और नाराज़ हों जाएँ तो बस छोटी से छोटी बात पर...

राधाः  वे नाराज़ होते हैं तो किसी बात पर ही नाराज़ होते हैं। मगर तुम कहते हो कि उन्हें न बताऊँ, तो मैं नहीं बताऊँगी। मगर यह बात ठीक नहीं कि सब दरवाज़े खुले हैं और तुम यहाँ अंडे बना रहे हो। कोई बाहर से आ गया तो हमारा कहना न कहना सब बराबर है।

केतली में पानी खौलने लगता है। वीना अंडे फेंटती है।

गोपालः  यह बात तुम ठीक कह रही हो, भाभी। मैंने कितनी ही बार इससे कहा है कि कुछ बनाना ही हो तो सब दरवाज़े बंद कर लिया करो। श्याम, बाहर का दरवाज़ा बंद कर दे।

वीनाः  श्याम, पहले ज़रा ये केतली स्टोव से उतारकर उधर रख दे और मुझे घी का डिब्बा पकड़ा दे। मैं झट से हलुआ बना दूँ। बनने में तो दो-एक मिनट ही लगेंगे।

श्याम उस तरफ़ चला जाता है और उसका काम करने लगता है।

अलमारी से प्लेटें भी निकाल लो। (राधा से) जीजी, थोड़ा-सा हलुआ तो तुम भी लोगी न?

फ्राइंग पैन स्टोव पर रखकर उसमें घी डालती है।

राधाः  (अनमने स्वर में) भैया, हमने कह दिया कि हमने न कभी खाया है और न ही कभी खा सकते हैं। पास बैठे हैं, इसलिए चाय की एक प्याली ज़रूर ले लेंगे।

वीना अंडे का घोल चीनी मिलाकर फ्राइंग पैन में डाल देती है और जल्दी-जल्दी हिलाने लगती है। श्याम प्लेटें निकालकर लाता है।

वीनाः  तुमसे कहा था साथ किशमिश भी लाना, लाए हो?

श्यामः  किशमिश तो भूल ही गया, भाभी। कहो तो अब जाकर...

वीनाः  अब रहने दो। मुझसे यह नहीं कहना कि हलुआ अच्छा नहीं बना। बगैर किशमिश के अंडे का हलुआ!

दूर से जमुना देवी की आवाज़ सुनाई देती हैः

जमुनाः  वीना! ओ वीना! गोपाल अभी आया है कि नहीं?

गोपालः  (दबे हुए स्वरों में) श्याम! तुमसे कहा था दरवाज़ा बंद कर दो और तुम...!

श्यामः अभी कर रहा हूँ।

जल्दी से जाकर दरवाज़े के किवाड़ मिला देता है और वहीं खड़ा हो जाता है।

राधाः  माँजी आ रही हैं, अब जल्दी से कुछ इंतज़ाम करो।

गोपालः  हाँ, हाँ जल्दी कुछ इंतज़ाम करो। यह छिलके...यह हलुआ...

जल्दी से वीना का जंपर उठाकर छिलकों पर डाल देता है और चीनी की एक प्लेट लेकर फ्राइंग पैन को उससे ढँक देता है।

जमुनाः  वीना!... वीना!

दरवाज़े के पास आकर दरवाज़े को धकेलकर खोलती है। श्याम कंधे हिलाकर पास से हट जाता है।

जमुनाः  क्या बात है, इस तरह दरवाज़ा बंद क्यों कर रखा था? श्याम तो दरवाज़े के आगे एेसे खड़ा था जैसे अंदर किसी और को रोक रखा हो। क्या बात है, सब लोग इस तरह चुपचाप क्यों हो गए हो?

गोपालः  कु-कुछ नहीं, माँ ! तु-तुम अ-आओ आओ। दरवाज़ा खुला ही था। श्याम तो एेसे ही वहाँ खड़ा था। आओ, बैठो।

जमुनाः  आज दो घंटे से मेरे कमरे की छत चू रही है। मैंने कितनी बार कहा था कि लिपाई करा दो, नहीं तो बरसात में तकलीफ़ होगी। मगर मेरी बात तो तुम सब लोग सुनी-अनसुनी कर देते हो। कुछ भी कहूँ, बस हाँ माँ, कल करा देंगे माँ, कहकर टाल देते हो। अब देखो चलकर कैसे हर चीज़ भीग रही है! ...क्या बात है, सब लोग गुमसुम क्याें हो गए हो? ...वीना, तू इस वक्त यह चम्मच लिए क्यों खड़ी है? और गोपाल तू वहाँ क्या कर रहा है कोने में?

गोपालः  कु-कुछ नहीं, माँ, यह...वह...वह वहाँ पर...क्या नाम है उसका... वह...वह...वीना का हाथ ज़रा जल गया था। मैं इसके लिए मरहम ढूँढ़ रहा था।

जमुनाः  हाथ जल गया, कैसे? मैं देखूँ तो।

पास जाकर वीना के दोनों हाथ पकड़कर देखती है।

वीनाः  नहीं माँजी, एेसा कुछ नहीं जला है। ये तो बस यूँ ही...यूँ ही चिंता करने लगते हैं। बस ज़रा-सा ही था। हाथ से मल दिया, ठीक हो गया।

गोपालः  हाँ, वैसे तो बिलकुल ठीक हो गया। मगर मैंने कहा कि मरहम मिल जाए तो फिर भी लगा दूँ। कभी वक्त पर पता नहीं चलता और बाद में तकलीफ़ बढ़ जाती है। कहते हैं कि प्रिवेंशन इज़ बैटर दैन क्योर, मतलब कि बाद में इलाज करने से पहले एहतियात बरतना ज़्यादा अच्छा है। इसलिए मैंने सोचा कि एहतियात के तौर पर थोड़ी मरहम लगा दूँ।

जमुनाः  मगर इसका हाथ जला कैसे? इस वक्त यह एेसा क्या काम कर रही थी?

गोपालः  कुछ नहीं, कुछ नहीं। कर कुछ नहीं रही थी। श्याम ने कहा था ज़रा चाय बना दो तो उसके लिए चाय बना रही थी। यूँ चाय बनाने में हाथ जलना नहीं चाहिए, मगर बाज़ वक्त होता है। जलना था, सो जल गया। वैसे चिंता की कोई बात नहीं। मैं अभी मरहम लगा देता हूँ। और मरहम नहीं भी मिलता तो कोई बात नहीं। अपने आप ठीक हो जाएगा। बिलकुल मामूली-सा भी क्या, यही समझो कि जला ही नहीं है। अब तो महसूस भी नहीं होता होगा। क्यों वीना?

वीनाः  जी हाँ, बिलकुल महसूस नहीं होता।

गोपालः  और क्या? महसूस होने की कोई बात नहीं थी। तुम नाहक फ़िक्र कर रही हो अम्माँ, फ़िक्र करने की कोई बात ही नहीं है। तुम खुद देख रही हो, हाथ बिलकुल ठीक हो गया है।

जमुनाः  मैं पहले ही कह रही थी कि यह मरदूद बिजली का चूल्हा घर में न लाओ। मगर माँ की बात किसी के कान में जाती हो तो न! यह मरदूद हाथ नहीं जलाएगा, तो करंट मारेगा, करंट नहीं मारेगा तो हाथ जलाएगा। हमारे ज़माने में किसी ने एेसी चीज़ों का नाम भी नहीं सुना था...यह इसके ऊपर क्या रखा है?

गोपालः  यह स्टोव के ऊपर? यह...यह...अम्माँ फ्राइंग पैन है...फ्राइंग पैन...मतलब तलने की वह...क्या कहते है, वह...।

जमुनाः  तलने की क्या? क्या बहू यहाँ अलग से तुम्हें चीज़ें तल-तलकर खिलाती है? लगता है इसमें कोई चीज़ बनाकर रखी है। (पास जाती हुई) मैं भी तो देखूँ कि नयी बहू क्या-क्या बनाकर खिलाती है।

फ्राइंग पैन से प्लेट उठाने लगती है। गोपाल जाकर उसे बीच में ही रोक देता है।

गोपालः  न न न न न अम्माँ, इसे हाथ मत लगाना, हाथ मत लगाना। तु-तुम आप ही कह रही थीं कि यह हाथ नहीं जलाएगा तो करंट मारेगा, और करंट नहीं मारेगा तो हाथ जलाएगा। एेसी मरदूद चीज़ का कुछ पता थोड़े ही है, अम्माँ! मैं तो पछता रहा हूँ कि क्यों इसे घर में ले आया। वह वापस ले ले तो मैं अभी जाकर इसे वापस कर दूँ। मुझे पता थोड़े ही था कि इसकी वजह से...

श्याम इस बीच चारपाई से चंद्रकांता उठाकर उसके पन्ने पलटने लगता है। एक बार राधा की ओर देखकर वह थोड़ा खँखारता है। राधा गंभीर मुद्रा बनाए बैठी रहती है।

जमुनाः  मगर यह तो बुझा हुआ है। यह बुझा हुआ भी करंट मारता है क्या?

गोपालः  हाँ अम्माँ, कभी-कभी यह बुझा हुआ भी करंट मार देता है। इसका कोई भरोसा थोड़े ही है? एेसी चीज़ से दूर ही रहा जाए तो अच्छा है। कहीं तुम्हारा भी हाथ जल-जला गया तो मुसीबत होगी।

जमुनाः  अच्छा नहीं हाथ लगाती। मगर बता तो सही कि इस पर छोटी बहू तेरे लिए बनाती क्या-क्या है। इस वक्त भी तो कुछ बना रखा है।

गोपालः  कुछ नहीं अम्माँ, इसमें कुछ खास चीज़ नहीं है। यह श्याम ज़रा कह रहा था, तो उसके लिए...

श्यामः  (सहसा चौंककर जैसे सफ़ाई देता हुआ) भैया, मैंने कहाँ कहा था? वह तो खुद भाभी का ही खयाल था। क्यों भाभी?

वीनाः  हाँ, हाँ, मैं कब कहती हूँ कि मैंने नहीं कहा था? ठीक है, मैंने ही तुमसे कहा था...!

राधा सहसा उठकर पास आ जाती है।

राधाः  वीना ने भी नहीं, बल्कि हमने कहा था...!

गोपालः  (जैसे आसमान से गिरकर) भाभी!

राधाः  हाँ, हाँ, ठीक बात तो हैं हमीं ने वीना से ज़ोर देकर कहा था कि पुलटिस बनाकर श्याम के बाँध दो। इसे अपने तनबदन की होश तो रहती नहीं। क्रिकेट खेलने में कहीं टखने पर गेंद लग गई है। दो दिन से कह रहा है कि चलने में ज़ोर पड़ता है। हमने कहा कि ठंड का दिन है, कहीं दर्द बढ़-बढ़ा गया तो बैठकर दो दिन हमीं से मालिश करवाते रहेंगे। वीना ने पुलटिस बना दिया है। अभी बाँध देंगे तो रात तक ठीक हो जाएगा।

गोपाल कृतज्ञता के भाव से राधा की तरफ़ देखता है।

गोपालः  यही तो मैं कह रहा था। यह लड़का अपनी सेहत का ज़रा खयाल नहीं रखता। बाद में जब ज़्यादा बिगाड़ हो जाता है तो मुसीबत घर वालों की होती है। (श्याम को आँख से इशारा करके) अब पुलटिस बँधवाकर चुपके से लेट रहना। समझे?

जमुनाः  लाओ मैं ही पुलटिस बाँध देती हूँ। कोई पुराना कपड़ा-वपड़ा हो तो दो! ...कहीं कोई नयी धोती न फाड़ देना। यह देखो, नए कपड़ों का क्या हाल कर रखा है? यह रेशमी जंपर मेज़ पर क्यों डाल रखा है? यह मेज़ साफ़ करने के लिए है?

मेज़ से जंपर उठाना चाहती है। मगर गोपाल फिर बीच में आकर रोक देता है।

गोपालः  रहने दो, रहने दो अम्माँ, क्या गज़ब करती हो? ये काम तुम्हारे करने के हैं जो तुम कर रही हो? मैला कपड़ा है, खूँटी से मेज़ पर गिर गया होगा। अभी वीना उठाकर रख देगी।

जमुनाः  यह मैला कपड़ा है? और वहाँ उतनी दूर खूँटी से कूदकर यहाँ मेज़ पर आ गया? तुम लोगों के लच्छन ज़रा भी मेरी समझ में नहीं आते। नया जंपर है, अभी दो बार भी नहीं पहना होगा, और इस तरह यहाँ गिरा रखा है। हटो, तुम लोग घर उजाड़ने पर तुले हो, तो मुझे तो घर की चिंता है। इतने कपड़े इधर-उधर बिखरे पड़े हैं, इनमें टिड्डियाँ लग जाएँगी तो?

फिर जंपर उठाने लगती है, मगर गोपाल उसे कंधे से पकड़कर पलंग की तरफ़ ले चलता है।

गोपालः  अम्माँ, नहीं लगेंगी टिड्डियाँ। तुम तो खामखाह चिंता करती हो यहाँ पलंग पर बैठो और थोड़ी देर आराम करो। बैठो, बैठो...यह इस तरफ़...!

उसे दोनों कंधों से पकड़कर पलंग पर बिठा देता है।

जमुनाः  हाँ, हाँ, बैठकर आराम करूँ और मेरी जगह काम कोई दूसरा करेगा। घर में करने को इतने काम पड़े हैं। इसे पुलटिस बाँध दूँ तो जाऊँ। दूसरों की मुसीबत कर देता है और आप किताबें पढ़ता रहता है। ...ला, मुझे दे यह किताब और यहाँ आकर लेट जा।

उठकर श्याम के हाथ से किताब ले लेती है।

यह कौन सी किताब है?

श्यामः  यह किताब? ...यह अम्माँ...यह मेरे कोर्स की...मतलब मेरे कोर्स की किताब नहीं है यह...शायद यह भाभी की किताब है...

वीनाः  यह जीजी की गुटका रामायण है, माँजी! जीजी पढ़ती-पढ़ती यहाँ ले
आई थीं।

श्यामः  हाँ, हाँ, हाँ! भाभी की गुटका रामायण ही तो है। मैं कह रहा था कि लगती तो गुटका रामायण जैसी ही है।

जमुनाः  मगर गुटका रामायण तो बहुत छोटी होती है। यह तो इतनी बड़ी किताब है।

श्यामः  हाँ अम्माँ, पहले यह छोटी थी, अब यह...मेरा मतलब है अम्माँ कि इसका पहला एडीशन छोटा था, मगर जो नया एडीशन आया है, वह पहले से बड़ा है। इनके साइज़ बदलते रहते हैं, यह कोई खास बात नहीं है! चलो अम्माँ, तुम्हें बहुत काम है, मैं तुम्हें तुम्हारे कमरे में पहुँचा दूँ, गैलरी में अँधेरा है, कहीं पैर उलटा-सीधा पड़ गया तो और मुसीबत होगी।

चलने को तैयार हो जाता है।

जमुनाः  पाँव मेरा उलटा पड़ेगा या तेरा जिसे चोट लगी है? मैं कह रही हूँ लेट जा, और वह मुझे कमरे में छोड़ने जाएगा।

श्यामः  अरे हाँ! मेरे तो पाँव में चोट लगी है मैं यह बात भूल ही गया था। मैं भाभी से पुलटिस बँधवाता हूँ। गोपाल भैया तुम्हें छोड़ आते हैं।

गोपालः  हाँ, अम्माँ, चलो मैं छोड़ आता हूँ।

जमुनाः  मगर मैं कहती थी कि मैं इसे पुलटिस बाँध देती...

गोपालः  उसकी तुम चिंता न करो, अम्माँ। वीना बहुत अच्छी तरह बाँध देगी। आओ, मेरा हाथ पकड़कर साथ-साथ आ जाओ। गैलरी में वाकई बहुत अँधेरा है।

बाँह पकड़कर उसे साथ ले चलता है। उसके बाहर निकलते ही श्याम फ्राइंग पैन पर झपट पड़ता है।

श्यामः  भाभी, मैं ज़रा जल्दी से यह पुलटिस निगल लूँ। अगर बड़े भैया भी आ गए तो कहीं सचमुच ही इसे टखने पर न बँधवाना पड़े।

वीनाः  ठहरो, ज़रा सब्र से काम लो, उन्हें भी आ जाने दो।

श्यामः  गलत बात है।

चम्मच भर-भरकर हलुआ मुँह में डालने लगता है।

भाभी, सच कहता हूँ कि बगैर किशमिश के भी इतना मज़ेदार बना है, इतना मज़ेदार बना है कि जितनी तारीफ़ करूँ थोड़ी है।

गोपाल घबराया-सा जल्दी-जल्दी आता है।

गोपालः  इस पुलटिस को जल्दी से इधर-उधर करो, भैया आ रहे हैं।

श्यामः  पुलटिस की तो आप ज़रा चिंता न करें। इसे तो मैं अभी साफ़ किए देता हूँ, आप छिलकों के इंतज़ाम की सोचें।

जल्दी-जल्दी खाता है। गोपाल जंपर उठाकर वीना को देता है।

गोपालः  इस जंपर को उधर रखो और ये छिलके...इन्हें तुम जल्दी से मेरे किसी मोज़े में डाल दो।

वीनाः  मगर आपके सब मोज़े तो पहले ही पुराने छिलकों से भरे हुए हैं।

गोपाल छिलके मेज़ से उठा लेता है और उन्हें हाथों में लिए हुए असमंजस में इधर-उधर देखता है।

गोपालः  तो और किस चीज़ में डाल दें? मेरा टोप ही ले आओ, या जल्दी से मेरे कोट की जेब में भर दो।

सहसा माधव गैलरी से अंदर आ जाता है।

माधवः  क्यों भाई, क्या भर रहे हो कोट की जेबों में? कोई मेरे न देखने की चीज़ तो नहीं?

गोपालः  (हताश भाव से) आइए, आइए भैया। आ जाइए, आ जाइए। मैं यूँ ही ज़रा इन लोगों से मज़ाक कर रहा था।

माधवः  मज़ाक कर रहे थे कि छिलके तुम्हारी जेब में छिपा दिए जाएँ।

हँसता हुआ स्टोव की तरफ़ जाता है।

गोपालः  जी हाँ...जी नहीं...मज़ाक नहीं...मेरा मतलब यह है कि...

माधवः  तुम्हारा मतलब मैं समझता हूँ। और तुम क्या खाकर मुँह पोंछ रहे हो
श्याम बाबू?

श्यामः  मैं? मैं भैया...यह मेरे लिए...मेरे लिए भाभी ने पुलटिस बनाई थी...

माधवः  पुलटिस बनाई थी? और तुम वह पुलटिस गले से नीचे उतार गए! (हँसकर) खूब! तो आजकल पुलटिस खाने के काम भी आने लगी। भला यह तो बताओ कि किस चीज़ की पुलटिस थी? जिस चीज़ के यह छिलके हैं, उसी की या...?

श्याम बिलकुल घबरा जाता है।

श्यामः  भैया, थी तो यह पुलटिस ही, मगर जल्दी में मैंने...मेरा मतलब है कि मैंने जल्दी में...

माधवः  तुमने जल्दी में सोचा कि इसे खा डाला जाए! (फिर हँसकर) बहुत अच्छा किया। बनी हुई चीज़ का कोई तो इस्तेमाल होना ही चाहिए। और तुम गोपाल, तुम ये छिलके जेब में क्यों भरते हो? बाहर जाकर इन्हें नाली में डाल दो। आगे से डिब्बे में भरकर बाहर ले जाने की ज़रूरत नहीं...

गोपालः  मगर भैया...!

माधवः  भैया, सब जानते हैं, राजा! वे यह भी जानते हैं कि तुम्हारे बाएँ हाथ की उँगलियाँ किस तरह पीली हुई हैं। यह भी जानते हैं कि श्याम बाबू का दूध कमरे में क्यों जाता है। और यह भी जानते हैं कि उनके सो जाने पर उनकी बीवी मोमबत्ती जलाकर कौन सी किताब पढ़ा करती है।

सबके मुँह से आश्चर्य से तरह-तरह के शब्द निकलते हैं। माधव हँसता रहता है।

गोपालः  भैया, अब आप से क्या छिपाना है, आप तो सबकुछ जानते हैं। मगर देखिए, अम्माँ से नहीं कहिएगा। अम्माँ को पता चल गया तो बस किसी की खैर नहीं!

माधवः  अम्माँ से न कहूँ? (हँसकर) तुम समझते हो कि अम्माँ यह सब नहीं जानतीं?

श्याम और गोपालः  एें? अम्माँ भी जानती हैं?

माधवः  क्यों नही जानतीं? अम्माँ तो शायद मेरी वे बातें भी जानती हैं जो मैं समझता हूँ कि वे नहीं जानतीं। (हँसकर) आज से छिलके नाली में डाल दिया करो, इनके लिए डिब्बा रखने की ज़रूरत नहीं। ...और जहाँ तक अम्माँ का सवाल है, अम्माँ इन्हें नाली में पड़े हुए भी  नहीं देखेंगी।

हलकी-हलकी हँसी हँसता रहता है।

प्रश्न-अभ्यास

  1. अंडे के छिलके को जुराब में, कोट की जेब में या नाली में फेंकना बिल्कुल ठीक नहीं! इस पर अपनी राय लिखिए।
  2. ‘अण्डा खाना क्या कोई अपराध है?’ इस विषय पर निबंध लिखिये।
  3. "पराया घर तो लगता ही है, भाभी" अपनी भाभी-भाई के कमरे में श्याम को पराएपन का अहसास क्यों होता है?
  4. एकांकी में अम्माँ की जो तसवीर उभरती है, अंत में वह बिलकुल बदल जाती है–टिप्पणी कीजिए।
  5. अंडे खाना, ‘चंद्रकांता संतति’ पढ़ना आदि किन्हीं संदर्भों में गलत नहीं है, फिर भी नाटक के पात्र इन्हें छिपकर करते हैं। क्यों? आप उनकी जगह होते तो क्या करते?
  6. राधा के चरित्र की एेसी कौन सी विशेषताएँ हैं जिन्हें आप अपनाना चाहेंगे?
  7. अण्डे का छिलका अनुपयोगी या कूड़ा समझा जाता है तो फिर इसे कहाँ रखा जाना चाहिए? क्या स्वच्छता अभियान मिशन का इस पाठ से कोई संबंध है?
  8. स्वच्छता अभियान मिशन पर विद्यार्थी-अध्यापक-अभिभावकों की उपस्थिति में बालसभा का आयोजन कीजिए।
  9. कमरे में कौन सी चीज कहाँ रखनी चाहिए? जैसे जंपर, कोट, कपड़ा, जूता, कापी-किताब, कूड़ा-करकट (अण्डे के छिलके) आदि।

शब्दार्थ और टिप्पणी

पुलटिस - हलवे की तरह पकाई हुई एक घरेलू दवा जो  घाव पर बाँधी जाती है।

कृतज्ञता - आभार

लच्छन - लक्षण

टिड्डियाँ - पंखों वाले लाल रंग के कीड़े जो दल बनाकर चलते हैं और फसल को हानि पहुँचाते हैं।

खामखाह - बिना कारण, बेवजह

मरदूद - निकम्मा

एहतियात - बचाव, होशियारी

करतूत - काम, करनी

महरी - घर का काम करने वाली स्त्री

हील-हुज़्ज़त - कोशिश

दस्तूर - रीति, तरीका

तिलिस्म - जादू, इंद्रजाल

संझा - संध्या

झाँसा - धोखा

बाँच - पढ़

तलब - इच्छा, माँग

सौगात - तोहफ़ा, उपहार

इश्नान - स्नान