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अध्याय-1

ईदगाह

गद्य - खंड

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प्रेमचंद (सन् 1880-1936)


प्रेमचंद का जन्म वाराणसी जिले के लमही ग्राम में हुआ था | उनका मूल नाम धनपतराय था | प्रेमचंद की प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी में हुई | मैट्रिक के बाद वे अध्यापन करने लगे | स्वाध्याय के रूप में ही उन्होंने बी. ए. तक शिक्षा ग्रहण की | असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरी तरह लेखन - कार्य के प्रति समर्पित हो गए |

प्रेमचंद ने अपने लेखन की शुरुआत पहले उर्दू में नवाबराय के नाम से की, बाद में हिंदी में लिखने लगे | उन्होंने अपने साहित्य में किसानों, दलितों, नारियों की वेदना और वर्ण-व्यवस्था की कुरीतियों का मार्मिक चित्रण किया है | वे साहित्य को स्वांतः सुखाय न मानकर सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम मानते थे | वे एक ऐसे साहित्यकार थे, जो समाज की वास्तविक स्थिति को पैनी दृष्टि से देखने की शक्ति रखते थे | उन्होंने समाज-सुधार और राष्ट्रीय - भावना से ओतप्रोत अनेक उपन्यासों एवं कहानियों की रचना की | कथा - संगठन, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन

आदि की दृष्टि से उनकी रचनाएँ बेजोड़ हैं | उनकी भाषा बहुत सजीव, मुहावरेदार और बोलचाल के निकट है | हिंदी भाषा को लोकप्रिय बनाने में उनका विशेष योगदान है | संस्कृत के प्रचलित शब्दों के साथ-साथ उर्दू की रवानी इसकी विशेषता है, जिसने हिंदी कथा भाषा को नया आयाम दिया |

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं मानसरोवर ( आठ भाग), गुप्तधन (दो भाग) (कहानी संग्रह); निर्मला, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, गबन, गोदान (उपन्यास); कर्बला, संग्राम, प्रेम की वेदी (नाटक); विविध प्रसंग (तीन खंडों में, साहित्यिक और राजनीतिक निबंधों का संग्रह); कुछ विचार


(साहित्यिक निबंध) | उन्होंने माधुरी, हंस, मर्यादा, जागरण आदि पत्रिकाओं का संपादन भी किया | इस पाठ्यपुस्तक में उनकी ईदगाह कहानी दी गई है |

हिंदी में बाल मनोविज्ञान से संबंधित कहानियाँ बहुत कम लिखी गई हैं | प्रेमचंद उन दुर्लभ कथाकारों में से हैं जिन्होंने पूरी प्रामाणिकता एवं तन्मयता के साथ बाल-जीवन को अपनी कहानियों में जगह दी है | उनकी कहानियाँ भारत की साझी संस्कृति एवं ग्रामीण जीवन के विविध रंगों से सराबोर हैं |

ईदगाह प्रेमचंद की इन्हीं विशेषताओं को अभिव्यक्त करने वाली प्रतिनिधि कहानी है | इस कहानी में ईद जैसे महत्त्वपूर्ण त्योहार को आधार बनाकर ग्रामीण मुस्लिम जीवन का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया गया है | हामिद का चरित्र हमें बताता है कि अभाव उम्र से पहले बच्चों में कैसे बड़ों जैसी समझदारी पैदा कर देता है | मेले में हामिद अपनी हर चाह पर संयम रखने में विजयी होता है | साथ ही रुस्तमे हिंद चिमटे के माध्यम से प्रेमचंद ने श्रम के सौंदर्य एवं महत्त्व को भी उद्घघाटित किया है | चित्रात्मक भाषा की दृष्टि से भी यह कहानी अनूठी है |


ईदगाह

रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आई है | कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है | वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है | आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है | गाँव में कितनी हलचल है | ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं | किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर से सुई - तागा लेने दौड़ा जा रहा है | किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है | जल्दी-जल्दी बैलों को सानी - पानी दे दें | ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगा | तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना - भेंटना, दोपहर के पहले लौटना असंभव है | लड़के सबसे ज्यादा प्रसन्न हैं | किसी ने एक रोज़ा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं; लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज़ है | रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे | इनके लिए तो ईद है | रोज़ ईद का नाम रटते थे आज वह आ गई | अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते | इन्हें गृहस्थी की चिंताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध और शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खाएँगे | वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं | उन्हें क्या खबर कि चौधरी आज आँखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए | उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है | बार- बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं | महमूद गिनता है, एक - दो, दस-बारह ! उसके पास बारह पैसे हैं | मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं | इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लाएँगे खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या- क्या ! और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद | वह चार - पाँच साल का गरीब - सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैज़े की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती होती एक दिन मर गई | किसी को पता न चला, क्या बीमारी है | कहती तो कौन सुनने वाला था | दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी और जब न सहा गया तो संसार से बिदा हो गई | अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है | उसके अब्बाजान रुपये कमाने गए हैं | बहुत-सी थैलियाँ लेकर आएँगे | अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं; इसलिए हामिद प्रसन्न है | आशा तो बड़ी चीज़ है, और फिर बच्चों की आशा ! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है | हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी - धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है | जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें लेकर आएँगी, तो वह दिल के अरमान निकाल लेगा | तब देखेगा महमूद, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहाँ से उतने पैसे निकालेंगे | अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है | आज ईद का दिन और उसके घर में दाना नहीं ! आज आबिद होता तो क्या इसी तरह ईद आती और चली जाती ! इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही है | किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को ? इस घर में उसका काम नहीं; लेकिन हामिद ! उसे किसी के मरने- जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा | विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंद भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी |

हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है - तुम डरना नहीं अम्माँ, मैं सबसे पहले आऊँगा | बिलकुल न डरना |

अमीना का दिल कचोट रहा है | गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं | हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है ! उसे कैसे अकेले मेले जाने दे? उस भीड़-भाड़ में बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी | नन्हीं-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे! पैर में छाले पड़ जाएँगे | जूते भी तो नहीं हैं | वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद ले लेगी; लेकिन यहाँ सेवैयाँ कौन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती | यहाँ तो घंटों चीज़ें जमा करते लगेंगे | माँगे ही का तो भरोसा ठहरा | उस दिन फ़हीमन के कपड़े सिले थे | आठ आने पैसे मिले थे | उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए, लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती! हामिद के लिए कुछ नहीं है, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही | अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं | तीन पैसे हामिद की जेब में, पाँच अमीना के बटुवे में | यही तो बिसात है और ईद का त्योहार, अल्लाह ही बेड़ा पार लगाए | धोबन और नाइन और मेहतरानी और चूड़िहारिन सभी तो आएँगी | सभी को सेवैयाँ चाहिए और थोड़ा किसी की आँखों नहीं लगता | किस-किस से मुँह चुराएगी | और मुँह क्यों चुराए ? साल भर का त्योहार है | जिंदगी खैरियत से रहे, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है | बच्चे को खुदा सलामत रखे, दिन भी कट जाएँगे |

गाँव से मेला चला | और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था | कभी सब-के-सब दौड़कर आगे निकल जाते | फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथवालों का इंतज़ार करते | यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं! हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं | वह कभी थक सकता है ! शहर का दामन आ गया | सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं | पक्की चारदीवारी बनी हुई है | पेड़ों में आम और लीचियाँ लगी हुई हैं | कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशाना लगाता है | माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है | लड़के वहाँ से एक फर्लांग पर हैं | खूब हँस रहे हैं | माली को कैसा उल्लू बनाया है |

बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं | यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब - घर है ! इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं हैं जी ! बड़े-बड़े आदमी हैं, सच ! उनकी बड़ी-बड़ी मूँछें हैं | इतने बड़े हो गए, अभी तक पढ़ने जाते हैं | न जाने कब तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर, हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हैं, बिलकुल तीन कौड़ी के | रोज़ मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले | इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे और क्या | क्लब - घर में जादू होता है | सुना है, यहाँ मुर्दे की खोपड़ियाँ दौड़ती हैं | और बड़े-बड़े तमाशे होते हैं, पर किसी को अंदर नहीं जाने देते | और यहाँ शाम को साहब लोग खेलते हैं | बड़े-बड़े आदमी खेलते हैं, मूँछों - दाढ़ीवाले | और मेमें भी खेलती हैं, सच ! हमारी अम्माँ को वह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सकें | घुमाते ही लुढ़क जाएँ |

महमूद ने कहा-हमारी अम्मीजान का तो हाथ काँपने लगे, अल्ला कसम |

मोहसिन बोला – चलो, मनों आटा पीस डालती हैं | ज़रा-सा बैट पकड़ लेंगी, तो हाथ काँपने लगेंगे? सैकड़ों घड़े पानी रोज़ निकालती हैं | पाँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है | किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े तो आँखों तले अँधेरा आ जाए |

महमूद -लेकिन दौड़तीं तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं |

मोहसिन-हाँ, उछल-कूद नहीं सकतीं, लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, तो अम्माँ इतना तेज़ दौड़ीं कि मैं उन्हें न पा सका, सच |

आगे चले | हलवाइयों की दूकानें शुरू हुईं | आज खूब सजी हुई थीं | इतनी मिठाइयाँ कौन खाता है? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी | सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं | अब्बा कहते थे कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रुपये देता है, बिलकुल ऐसे ही रुपये |

हामिद को यकीन न आया - ऐसे रुपये जिन्नात को कहाँ से मिल जाएँगे? मोहसिन ने कहा – जिन्नात को रुपये की क्या कमी ? जिस खजाने में चाहें चले जाएँ | लोहे के दरवाज़े तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में ! हीरे जवाहरात तक उनके पास रहते हैं | जिससे खुश हो गए उसे टोकरों जवाहरात दे दिए | अभी यहीं बैठे हैं, पाँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाएँ | हामिद ने फिर पूछा जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते होंगे ? मोहसिन एक-एक आसमान के बराबर होता है जी | ज़मीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाए | हामिद – लोग उन्हें कैसे खुश करते होंगे | कोई मुझे वह मंतर बता दे तो एक जिन्न को खुश कर लूँ |

मोहसिन अब यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत से जिन्नात हैं | कोई चीज़ चोरी जाए, चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे और चोर का नाम भी बता देंगे | जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था | तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला | तब झक मारकर चौधरी के पास गए | चौधरी ने तुरंत बता दिया, मवेशीखाने में है और वहीं मिला | जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबरें दे जाते हैं |

अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है, और क्यों उनका इतना सम्मान है |

आगे चले | यह पुलिस लाइन है | यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं | रैटन ! फ़ाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियाँ हो जाएँ |

मोहसिन ने प्रतिवाद किया यह कानिसटिबिल पहरा देते हैं! तभी तुम बहुत जानते हो | अजी हज़रत, यही चोरी कराते हैं | शहर के जितने चोर- - डाकू हैं, सब इनसे मिले रहते हैं | रात को ये लोग चोरों से तो कहते हैं, चोरी करो और आप दूसरे मुहल्ले में जाकर 'जागते रहो ! जागते रहो !' पुकारते हैं | जभी इन लोगों के पास इतने रुपये आते हैं | मेरे मामूँ एक थाने में कानिसटिबिल हैं | बीस रुपया महीना पाते हैं; लेकिन पचास रुपये घर भेजते हैं | अल्ला कसम ! मैंने एक बार पूछा था कि मामूँ, आप इतने रुपये कहाँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे बेटा, अल्लाह देता है | फिर आप ही बोले हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाएँ | हम तो इतना ही लेते हैं. जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए |

हामिद ने पूछा- यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं? मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला अरे पागल, इन्हें कौन पकड़ेगा? पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं; लेकिन अल्लाह इन्हें सज़ा भी खूब देता है | हराम का माल हराम में जाता है | थोड़े ही दिन हुए मामूँ के घर में आग लग गई |

सारी लेई पूँजी जल गई | एक बरतन तक न बचा | कई दिन पेड़ के नीचे सोए, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे ! फिर न जाने कहाँ से एक सौ कर्ज़ लाए तो बरतन - भाँड़े आए |

हामिद एक सौ तो पचास से ज्यादा होते हैं? 

'कहाँ पचास, कहाँ एक सौ पचास एक थैली भर होता है | सौ तो दो थैलियों में भी न आए | '

अब बस्ती घनी होने लगी | ईदगाह जानेवालों की टोलियाँ नज़र आने लगीं | एक से एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए | कोई इक्के - ताँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग | ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल, अपनी विपन्नता से बेखबर, संतोष और धैर्य में मगन चला जा रहा था | बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं | जिस चीज़ की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से बराबर हार्न की आवाज़ होने पर भी न चेतते | हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा |

सहसा ईदगाह नज़र आया | ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है | नीचे पक्का फ़र्श है, जिस पर जाजिम बिछा हुआ है | और रोज़ेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहाँ जाजिम भी नहीं है | नए आनेवाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं | आगे जगह नहीं है | यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता | इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं | इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गए | कितना सुंदर संचालन है, कितनी सुंदर व्यवस्था ! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सब-के-सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हैं, और एक साथ घुटनों के बल बैठ जाते हैं | कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाएँ और यही क्रम चलता रहे | कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है |

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नमाज़ खत्म हो गई है | लोग आपस में गले मिल रहे हैं | तब मिठाई और खिलौने की दूकानों पर धावा होता है | ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है | यह देखो, हिंडोला है | एक पैसा देकर चढ़ जाओ | कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होंगे, कभी ज़मीन पर गिरते हुए | यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट छड़ों से लटके हुए हैं | एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मज़ा लो | महमूद और मोहसिन और नूरे और सम्मी इन घोड़ों और ऊँटों पर बैठते हैं | हामिद दूर खड़ा है | तीन ही पैसे तो उसके पास हैं | अपने कोष का एक तिहाई ज़रा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता |

सब चर्खियों से उतरते हैं| अब खिलौने लेंगे| इधर दूकानों की कतार लगी हुई तरह-तरह के खिलौने हैं - सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भिश्ती और  धोबिन और साधू |वाह!  कितने सुंदर खिलौने हैं| अब बोला ही चाहते हैं|

महमूद सिपाही लेता है, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधे पर बंदूक रखे हुए; मालूम होता है अभी कवायद किए चला आ रहा है | मोहसिन को भिश्ती पसंद आया | कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए है | मशक का मुँह एक हाथ से पकड़े हुए है | कितना प्रसन्न है | शायद कोई गीत गा रहा है | बस, मशक से पानी उड़ेला ही चाहता है | नूरे को वकील से प्रेम है | कैसी विद्वत्ता है उसके मुख पर ! काला चोगा, नीचे सफ़ेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिए हुए | मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे हैं | यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं | हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौने वह कैसे ले ? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े, तो चूर-चूर हो जाए, ज़रा पानी पड़े तो सारा रंग धुल जाए, ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के ?

मोहसिन कहता है  - मेरा भिश्ती रोज़ पानी दे जाएगा, साँझ - सबेरे |

महमूद - और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा | कोई चोर आएगा, तो फ़ौरन बंदूक फ़ैर कर देगा |

नूरे- और मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा |

सम्मी --और मेरी धोबिन रोज़ कपड़े धोएगी |

हामिद खिलौनों की निंदा करता है – मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तो चकनाचूर हो जाएँ; लेकिन ललचाई हुई आँखों से खिलौनों को देख रहा है | और चाहता है कि ज़रा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता | उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं; लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हैं, विशेषकर जब अभी नया शौक है | हामिद ललचाता रह जाता है |

खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं | किसी ने रेवड़ियाँ ली हैं, किसी ने गुलाब - जामुन, किसी ने सोहन हलवा | मज़े से खा रहे हैं | हामिद बिरादरी से पृथक है | अभागे के पास तीन पैसे हैं | क्यों नहीं कुछ लेकर खाता ? ललचाई आँखों से सबकी ओर देखता है |

मोहसिन कहता है- हामिद, रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है!

हामिद को संदेह हुआ, यह केवल क्रूर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है; लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है | मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है | हामिद हाथ फैलाता है | मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है | महमूद, नूरे और सम्मी खूब तालियाँ बजा-बजाकर हँसते हैं | हामिद खिसिया जाता है |

मोहसिन - अच्छा, अबकी ज़रूर देंगे हामिद अल्ला कसम, ले जा |

हामिद - रखे रहो | क्या मेरे पास पैसे नहीं हैं?

सम्मी- तीन ही पैसे तो हैं | तीन पैसे में क्या - क्या लोगे?

महमूद - हमसे गुलाब जामुन ले जाव हामिद | मोहसिन बदमाश है |

हामिद – मिठाई कौन बड़ी नेमत है | किताब में इसकी कितनी बुराइयाँ लिखी हैं |

 मोहसिन - लेकिन दिल में कह रहे होंगे कि मिले तो खा लें | अपने पैसे क्यों नहीं निकालते?

महमूद- हम समझते हैं, इसकी चालाकी | जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जाएँगे,

तो हमें ललचा - ललचाकर खाएगा |

मिठाइयों के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीज़ों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की | लड़कों के लिए यहाँ कोई आकर्षण न था | वे सब आगे बढ़ जाते हैं | हामिद लोहे की दूकान पर रुक जाता है | कई चिमटे रखे हुए थे | उसे खयाल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है | तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है; अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी ! फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी | घर में एक काम की चीज़ हो जाएगी | खिलौने से क्या फ़ायदा | व्यर्थ में पैसे खराब होते हैं | ज़रा देर ही तो खुशी होती है | फिर तो खिलौने को कोई आँख उठाकर नहीं देखता | या तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूटकर बराबर हो जाएँगे | चिमटा कितने काम की चीज़ है | रोटियाँ तवे से उतार लो, चूल्हे में सेंक लो | कोई आग माँगने आए तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो | अम्माँ बेचारी को कहाँ फ़ुरसत है कि बाज़ार आएँ और इतने पैसे ही कहाँ मिलते हैं | रोज़ हाथ जला लेती हैं | हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं | सबील पर सब-के-सब शरबत पी रहे हैं | देखो, सब कितने लालची हैं! इतनी मिठाइयाँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी | उस पर कहते हैं, मेरे साथ खेलो | मेरा यह काम करो | अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूंगा | खाएँ मिठाइयाँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़े फुंसियाँ निकलेंगी, आप ही ज़बान चटोरी हो जाएगी | तब घर से पैसे चुराएँगे और मार खाएँगे | किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी हैं | मेरी ज़बान क्यों खराब होगी | अम्माँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी मेरा बच्चा अम्माँ के लिए चिमटा लाया है | हज़ारों दुआएँ देंगी | फिर पड़ोस की औरतों को दिखाएँगी | सारे गाँव में चर्चा होने लगेगी, हामिद चिमटा लाया है | कितना अच्छा लड़का है | इन लोगों के खिलौनों पर कौन इन्हें दुआएँ देगा ? बड़ों की दुआएँ सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं और तुरंत सुनी जाती हैं | मेरे पास पैसे नहीं हैं | तभी तो मोहसिन और महमूद यों मिज़ाज दिखाते हैं | मैं भी इनसे मिज़ाज दिखाऊँगा | खेलें खिलौने और खाएँ मिठाइयाँ | मैं नहीं खेलता खिलौने, किसी का मिज़ाज क्यों सहूँ | मैं गरीब सही, किसी से कुछ माँगने तो नहीं जाता | आखिर अब्बाजान कभी-न-कभी आएँगे | अम्माँ भी आएँगी ही | फिर इन लोगों से पूछूंगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूँ और दिखा दूँ कि दोस्तों के साथ इस तरह सलूक किया जाता है | यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियाँ लीं तो चिढ़ा - चिढ़ाकर खाने लगे | सब-के-सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है | हँसें ! मेरी बला से ! उसने दूकानदार से पूछा यह चिमटा कितने का है ?

दूकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा – तुम्हारे काम का नहीं है जी !

'बिकाऊ है कि नहीं?'

'बिकाऊ क्यों नहीं है | और यहाँ क्यों लाद लाए हैं?

'तो बताते क्यों नहीं, के पैसे का है?'

'छह पैसे लगेंगे | '

हामिद का दिल बैठ गया |

'ठीक-ठीक बताओ!'

'ठीक-ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो | '

हामिद ने कलेजा मज़बूत करके कहा तीन पैसे लोगे?

यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दूकानदार की घुड़कियाँ न सुने | लेकिन दूकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दीं | बुलाकर चिमटा दे दिया | हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया | ज़रा सुनें, सब-के-सब क्या - क्या आलोचनाएँ करते हैं |

मोहसिन ने हँसकर कहा यह चिमटा क्यों लाया पगले; इसे क्या करेगा ? हामिद ने चिमटे को ज़मीन पर पटककर कहा ज़रा अपना भिश्ती ज़मीन पर गिरा दो | सारी पसलियाँ चूर-चूर हो जाएँ बचा की |

महमूद बोला- तो यह चिमटा कोई खिलौना है?

हामिद- खिलौना क्यों नहीं है? अभी कंधे पर रखा, बंदूक हो गई | हाथ में ले लिया, फकीरों का चिमटा हो गया, चाहूँ तो इससे मजीरे का काम ले सकता हूँ | एक चिमटा जमा दूँ, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए |

तुम्हारे खिलौने कितना ही ज़ोर लगाएँ, मेरे चिमटे का बाल भी बाँका नहीं कर सकते | मेरा बहादुर शेर है चिमटा |

सम्मी ने खँजरी ली थी | प्रभावित होकर बोला - मेरी खँजरी से बदलोगे? दो आने की है |

हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा - मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारे खँजरी का पेट फाड़ डाले | बस एक चमड़े की झिल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी | ज़रा-सा पानी लग जाए तो खतम हो जाए | मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आँधी में, तूफ़ान में बराबर डटा खड़ा रहेगा |

चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, लेकिन अब पैसे किसके पास धरे हैं | फिर मेले से दूर निकल आए हैं, नौ कब के बज गए, धूप तेज़ हो रही है | घर पहुँचने की जल्दी हो रही है | बाप से ज़िद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता | हामिद है बड़ा चालाक | इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे |

अब बालकों के दो दल हो गए हैं | मोहसिन, महमूद, सम्मी और नूरे एक तरफ़ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ़ | शास्त्रार्थ हो रहा है | सम्मी तो विधर्मी हो गया | दूसरे पक्ष से जा मिला; लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी, हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं | उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति | एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फ़ौलाद कह रहा है | वह अजेय है, घातक है | अगर कोई शेर आ जाए, तो मियाँ भिश्ती के छक्के छूट जाएँ, मियाँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागें, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुँह छिपाकर ज़मीन पर लेट जाएँ | मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रुस्तमे - हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी आँखें निकाल लेगा |

मोहसिन ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर कहा -अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता |

हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा- भिश्ती को एक डाँट बताएगा तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्वार पर छिड़कने लगेगा |

मोहसिन परास्त हो गया; पर महमूद ने कुमुक पहुँचाई – अगर बचा पकड़ जाएँ तो अदालत में बँधे - बँधे फिरेंगे | तब तो वकील साहब के

पैरों पड़ेंगे| हामिद इस प्रबल तर्क का जवाब न दे सका | उसने पूछा - 

 हमें पकड़ने कौन आएगा ?

नूरे ने अकड़कर कहा - यह सिपाही बंदूकवाला | 

हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा - यह बेचारे हम बहादुर रुस्तमे - हिंद को पकड़ेंगे ! अच्छा लाओ, अभी ज़रा कुश्ती हो जाए | इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे | पकड़ेंगे क्या बेचारे !

मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई  - तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज़ आग में जलेगा |

उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा; लेकिन यह बात न हुई | हामिद ने तुरंत जवाब दिया - आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिश्ती लेडियों की तरह घर में घुस जाएँगे | आग में कूदना वह काम हैं, जो यह रुस्तमे -हिंद ही कर सकता है |

महमूद ने एक ज़ोर लगाया - वकील साहब कुर्सी-मेज़ पर बैठेंगे, तुम्हारे चिमटा तो बावर्चीखाने में ज़मीन पर पड़ा रहेगा |

 इस तर्क ने सम्मी और नूरे को भी सजीव कर दिया | कितने ठिकाने की बात कही है पट्टे ने | चिमटा बावर्चीखाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है?

हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा तो उसने धाँधली शुरू की - मेरा चिमटा बाबर्चीखाने में नहीं रहेगा | वकील साहब कुर्सी पर बैठेंगे, तो जाकर उन्हें ज़मीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा |

बात कुछ बनी नहीं | खासी गाल -गलौज थी; लेकिन कानून को पेट में डालने वाली बात छा गई | ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए, मानो कोई धेलचा

कनकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो | कानून मुँह से बाहर निकलने वाली चीज़ है | उसको पेट के अंदर डाल दिया जाना, बेतुकी - सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है | हामिद ने मैदान मार लिया | उसका चिमटा रुस्तमे -हिंद है | अब इसमें मोहसिन, महमूद, नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती |

विजेता को हारने वालों से जो सत्कार मिलना स्वाभाविक है, वह हामिद को भी मिला | औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज़ न ले सके | हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया | सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाएँगे | हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों !

संधि की शर्तें तय होने लगीं | मोहसिन ने कहा - ज़रा अपना चिमटा दो हम भी देखें | तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो |

महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए |

हामिद को इन शर्तों के मानने में कोई आपत्ति न थी | चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया; और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए | कितने खूबसूरत खिलौने हैं !


हामिद ने हारने वालों के आँसू पोंछे -  मैं तुम्हें चिढ़ा रहा था, सच ! यह चिमटा भला इन खिलौनों की क्या बराबरी करेगा; मालूम होता है, अब बोले, अब बोले | 

लेकिन मोहसिन की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता | चिमटे का सिक्का खूब बैठ गया है | चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है | 

मोहसिन - लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा? महमूद - दुआ को लिए फिरते हो | उलटे मार न पड़े | अम्माँ ज़रूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने तुम्हें मिले?

हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की माँ इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी | तीन पैसों ही में तो उसे सब कुछ करना था और उन पैसों के इस उपयोग पर पछतावे की बिलकुल ज़रूरत न थी | फिर अब तो चिमटा रुस्तमे -हिंद है और सभी खिलौनों का बादशाह !

रास्ते में महमूद को भूख लगी | उसके बाप ने केले खाने को दिए | महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया | उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गए | यह उस चिमटे का प्रसाद था |

3

ग्यारह बजे गाँव में हलचल मच गई | मेले वाले आ गए | मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जो उछली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे | इस पर भाई - बहन में मार-पीट हुई | दोनों खूब रोए | उसकी अम्माँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चाँटे और लगाए |

मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज़्यादा गौरवमय हुआ | वकील ज़मीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता | उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा | दीवार में दो खूटियाँ गाड़ी गईं | उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया | पटरे पर कागज़ का कालीन बिछाया गया | वकील साहब राजा भोज की भाँति सिंहासन पर बिराजे | नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया | अदालतों में खस की टट्टियाँ और बिजली के पंखे रहते हैं | क्या यहाँ मामूली पंखा भी न हो ! कानून की गरमी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं | बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने लगे | मालूम नहीं, पंखे की हवा से, या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया | फिर बड़े ज़ोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थि घूर पर डाल दी गई |

अब रहा महमूद का सिपाही | उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया; लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चले | वह पालकी पर चलेगा | एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाए गए; जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे | नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे | उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरफ़ से 'छोनेवाले, जागते लहो' पुकारते चलते हैं | मगर रात तो अँधेरी होनी चाहिए; महमूद को ठोकर लग जाती है | टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बंदूक लिए ज़मीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है | महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डॉक्टर है | उसको ऐसा मरहम मिल गया है जिससे वह टूटी टाँग को आनन- फानन जोड़ सकता है | केवल गूलर का दूध चाहिए | गूलर का दूध आता है | टॉंग जोड़ दी जाती है लेकिन सिपाही को ज्यों ही खड़ा किया जाता है, टाँग जवाब दे देती है | शल्यक्रिया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है | अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है | एक टाँग से तो न चल सकता था; न बैठ सकता था | अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है | अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है | कभी-कभी देवता भी बन जाता है | उसके सिर का झालरदार साफ़ा खुरच दिया गया है | अब उसका जितना रूपांतर चाहो, कर सकते हो | कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है |

अब मियाँ हामिद का हाल सुनिए | अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी | सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी |

' यह चिमटा कहाँ था?'

'मैंने मोल लिया है | '

'कै पैसे में?'

'तीन पैसे दिए | '

अमीना ने छाती पीट ली | यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया | लाया क्या, चिमटा ! सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?

हामिद ने अपराधी -भाव से कहा तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं; इसलिए मैंने उसे लिया |

बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है | यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ | बच्चे में कितना त्याग, कितना सदभाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना ज़ब्त इससे हुआ कैसे? वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही | अमीना का मन गद्गद हो गया |

और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई | हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र | बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था | बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई | वह रोने लगी | दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी | हामिद इसका रहस्य क्या समझता !

प्रश्न- अभ्यास

1. 'ईदगाह' कहानी के उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे ईद के अवसर पर ग्रामीण परिवेशका उल्लास प्रकट होता है |

2. 'उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा | विपत्ति अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद  की आनंद भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी | ' इस कथन से लेखक का क्या आशय है?

3. 'उन्हें क्या खबर कि चौधरी आज आँखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाए | '

इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए |

4. 'मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए

कथन के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए कि 'धर्म तोड़ता नहीं जोड़ता है |

5. निम्नलिखित गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए

(क) कई बार यही क्रिया होती है"......... 'आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है|

(ख) बुढ़िया का क्रोध....... स्वाद से भरा हुआ|

6. हामिद ने चिमटे की उपयोगिता को सिद्ध करते हुए क्या-क्या तर्क दिए?

7. गाँव से शहर जानेवाले रास्ते के मध्य पड़नेवाले स्थलों का ऐसा वर्णन लेखक ने किया है मानो आँखों के सामने चित्र उपस्थित हो रहा हो | अपने घर और विद्यालय के मध्य पड़नेवाले स्थानों का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए |

8. 'बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था | बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई | ' इस कथन में 'बूढ़े हामिद' और 'बालिका अमीना' से लेखक का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए |

9. 'दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी | हामिद इसका रहस्य क्या समझता ! ' लेखक के अनुसार हामिद अमीना की दुआओं और आँसुओं के रहस्य को क्यों नहीं समझ पाया ? कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए |

10. हामिद की जगह आप होते तो क्या करते?

योग्यता - विस्तार

1. प्रेमचंद की कहानियों का संग्रह 'मानसरोवर' नाम से आठ भागों में प्रकाशित है | अपने पुस्तकालय से लेकर उसे पढ़िए |

2. इस कहानी में लोक प्रचलित मुहावरों की भरमार है, -जैसे नानी मरना, छक्के छूटना - आदि | इसमें आए मुहावरों की एक सूची तैयार कीजिए |

शब्दार्थ और टिप्पणी

बला -
कष्ट, आपत्ति, बहुत कष्ट देनेवाली वस्तु
बदहवास-
घबराना, होश - हवास ठीक न होना
निगोड़ी -
अभागी, निराश्रय, जिसका कोई न हो
चितवन-
किसी की ओर देखने का ढंग, दृष्टि, कटाक्ष
वज़ू-
नमाज़ से पहले यथाविधि हाथ-पाँव और मुँह धोना
सिजदा-
माथा टेकना खुदा के आगे सिर झुकाना
हिंडोला-
झूला, पालना
मशक-
भेड़ या बकरी की खाल को सीकर बनाया हुआ थैला जिससे भिश्ती पानी ढोते हैं
अचकन-
लंबा कलीदार अँगरखा जिसमें पहले गरेबाँ से कमर - पट्टी तक अर्धचंद्राकार बंद लगते थे और अब सीधे बटन टँकते हैं
नेमत-
बहुत बढ़िया
ज़ब्त-
सहन करना
दामन-
पल्लू, आँचल