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अध्याय-8
भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?
भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म काशी में हुआ था| उनका व्यक्तित्व देश-प्रेम और क्रांति - चेतना से समृद्ध था | किशोर वय में ही उन्होंने स्वदेश की दुर्दशा का त्रासद अनुभव कर लिया था|
भारतेंदु हरिश्चंद्र पुनर्जागरण की चेतना के अप्रतिम नायक थे| बंगाल के प्रख्यात मनीषी और पुनर्जागरण के विशिष्ट नायक ईश्वरचंद्र विद्यासागर से उनका अंतरंग संबंध था| बंधन - मुक्ति की चेतना और आधुनिकता की रोशनी से हिंदी क्षेत्र को आलोकित करने के लिए उनका मानस व्याकुल रहता था| अपनी अभीप्सा को मूर्त करने के लिए उन्होंने समानधर्मा रचनाकारों को प्रेरित - प्रोत्साहित किया, तदीय समाज की स्थापना की, पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं, विविध विधाओं में साहित्य-रचना की| उन्होंने कविवचनसुधा नामक पत्रिका निकाली तथा हरिश्चंद्र मैगज़ीन का संपादन किया| बाद में यही हरिश्चंद्र चंद्रिका नाम से प्रकाशित होने लगी|
स्त्री-शिक्षा के लिए उन्होंने बाला बोधिनी पत्रिका का प्रकाशन किया| उन्होंने बांग्ला के नाटकों का अनुवाद भी किया, जिनमें धनंजय विजय, विद्या सुंदर, पाखंड विडंबन, सत्य हरिश्चंद्र तथा मुद्राराक्षस आदि प्रमुख हैं| उनके मौलिक नाटक हैं वैदिक हिंसा हिंसा न भवति, श्री चंद्रावली, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, नील देवी आदि |
भारतेंदु हरिश्चंद्र की धारणा के मुताबिक सन् 1873 में 'हिंदी नई चाल में ढली '| यह ' चाल ' शिल्प और संवेदना की दृष्टि से सर्वथा नवीन थी| खड़ी बोली गद्य में हिंदी की यात्रा जातीय संवेदना से अनुप्राणित होकर शुरू हुई थी, जिसे भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन रचनाकारों ने अपनी साधना से अपेक्षित गति दी|
हिंदी नाटक और निबंध की परंपरा भारतेंदु से शुरू होती है | भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रभाव उनके समकालीनों पर स्पष्ट देखा जा सकता है| आधुनिक हिंदी गद्य के विकास में उनका उल्लेखनीय योगदान है| उन्होंने अपने समकालीन लेखकों का तो नेतृत्व किया ही, साथ ही परवर्ती लेखकों के लिए पथ-प्रदर्शक का कार्य भी किया| यहाँ पाठ्यपुस्तक के लिए उनका बलिया के ददरी मेले में दिया गया व्याख्यान चुना गया है|
भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है? भारतेंदु का प्रसिद्ध भाषण है| इसमें एक ओर ब्रिटिश शासन की मनमानी पर व्यंग्य है, तो दूसरी ओर अंग्रेज़ों के परिश्रमी स्वभाव के प्रति आदर भी है| भारतेंदु ने आलसीपन, समय के अपव्यय आदि कमियों को दूर करने की बात करते हुए भारतीय समाज की रूढ़ियों और गलत जीवन शैली पर भी प्रहार किया है| जनसंख्या नियंत्रण, श्रम की महत्ता, आत्मबल और त्याग - भावना को भारतेंदु ने उन्नति के लिए अनिवार्य माना है और अत्यंत प्रेरक ढंग से इसे व्यक्त किया है|
भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?
आज बड़े ही आनंद का दिन है कि इस छोटे-से नगर बलिया में हम इतने मनुष्यों को बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं| इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत कुछ है| बनारस ऐसे - ऐसे बड़े नगरों में जब कुछ नहीं होता तो यह हम क्यों न कहेंगे कि बलिया में जो कुछ हमने देखा, वह बहुत ही प्रशंसा के योग्य है| इस उत्साह का मूल कारण जो हमने खोजा, तो प्रगट हो गया कि इस देश के भाग्य से आजकल यहाँ सारा समाज ही ऐसा एकत्र है | जहाँ रॉबर्ट साहब बहादुर जैसे कलेक्टर हों, वहाँ क्यों न ऐसा समाज हो | जिस देश और काल में ईश्वर ने अकबर को उत्पन्न किया था, उसी में अबुल फजल, बीरबल, टोडरमल को भी उत्पन्न किया | यहाँ रॉबर्ट साहब अकबर हैं, तो मुंशी चतुर्भुज सहाय, मुंशी बिहारीलाल साहब आदि अबुल फजल और टोडरमल हैं| हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं| यद्यपि फर्स्ट क्लास, सेकेंड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े - बड़े महसूल की इस ट्रेन में लगी हैं पर बिना इंजिन ये सब नहीं चल सकतीं, वैसे ही हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलानेवाला हो, तो ये क्या नहीं कर सकते| इनसे इतना कह दीजिए, 'का चुप साधि रहा बलवाना" फिर देखिए कि हनुमान जी को अपना बल कैसे याद आ जाता है| सो बल कौन याद दिलावे या हिंदुस्तानी राजे-महाराजे या नवाब रईस या हाकिम| राजे-महाराजों को अपनी पूजा, भोजन, झूठी गप से छुट्टी नहीं | हाकिमों को कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है, कुछ बॉल, घुड़दौड़, थिएटर, अखबार में समय गया| कुछ समय बचा भी तो उनको क्या गरज है कि हम गरीब गंदे काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोवैं| बस वही मसल हुई – “तुम्हें गैरों से कब फ़ुरसत हम अपने गम से कब खाली | चलो, बस हो चुका मिलना न हम खाली न तुम खाली | " तीन मेंढक एक के ऊपर एक बैठे थे| ऊपरवाले ने कहा 'ज़ौक शौक', बीचवाला बोला, ' गुम सुम', सबके नीचेवाला पुकारा ' गए हम' | सो हिंदुस्तान की साधारण प्रजा की दशा यही है – गए हम |
पहले भी जब आर्य लोग हिंदुस्तान में आकर बसे थे, राजा और ब्राह्मणों ही के ज़िम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलावैं और अब भी ये लोग चाहैं तो हिंदुस्तान प्रतिदिन कौन कहै, प्रतिछिन बढ़ै | पर इन्हीं लोगों को सारे संसार के निकम्मेपन ने घेर रक्खा है | " बौद्धारो मत्सरग्रस्ता अभवः स्मरदूषिताः | " हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जब इनके पुरुषों के पास कोई भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पत्ते और मिट्टी की कुटियों में बैठकर बाँस की नलियों से जो तारा ग्रह आदि वेध करके उनकी गति लिखी है, वह ऐसी ठीक है कि सोलह लाख रुपये के लागत की विलायत में जो दूरबीनें बनी हैं उनसे उन ग्रहों को वेध करने में भी वही गति ठीक आती है और जब आज इस काल में हम लोगों को अंग्रेज़ी विद्या की ओर जगत की उन्नति की कृपा से लाखों पुस्तकें और हज़ारों यंत्र तैयार हैं| तब हम लोग निरी चुंगी की कतवार फेंकने की गाड़ी बन रहे हैं| यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है| अमेरिकन, अंग्रेज़ फ़रांसीस आदि तुरकी ताजी सब सरपट्ट दौड़े जाते हैं | सबके जी में यही है कि पाला हमीं पहले छू लें| उस समय हिंदू काठियावाड़ी खाली खड़े-खड़े टाप से मिट्टी खोदते हैं| इनको, औरों को जाने दीजिए, जापानी टट्टुओं को हाँफते हुए दौड़ते देखकर भी लाज नहीं आती| यह समय ऐसा है कि जो पीछे रह जाएगा, फिर कोटि उपाय किए भी आगे न बढ़ सकैगा | इस लूट में, इस बरसात में भी जिसके सिर पर कमबख्ती का छाता और आँखों में मूर्खता की पट्टी बँधी रहे उन पर ईश्वर का कोप ही कहना चाहिए|
मुझको मेरे मित्रों ने कहा था कि तुम इस विषय पर आज कुछ कहो कि हिंदुस्तान की कैसे उन्नति हो सकती है| भला इस विषय पर मैं और क्या कहूँ भागवत' में एक श्लोक “ नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरु कर्णधारं | मयाऽनुकूलेन नभः स्वतेरितुं पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा | " भगवान कहते हैं कि पहले तो मनुष्य जनम ही बड़ा दुर्लभ है, सो मिला और उस पर गुरु की कृपा और मेरी अनुकूलता| इतना सामान पाकर भी जो मनुष्य इस संसार - सागर के पार न जाए, उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए| वही दशा इस समय हिंदुस्तान की है | अंग्रेज़ों के राज्य में सब प्रकार का सामान पाकर, अवसर पाकर भी हम लोग जो इस समय पर उन्नति न करैं तो हमारा केवल अभाग्य और परमेश्वर का कोप ही है| सास के अनुमोदन से एकांत रात में सूने रंगमहल में जाकर भी बहुत दिन से जिस प्रान से प्यारे परदेसी पति से मिलकर छाती ठंडी करने की इच्छा थी, उसका लाज से मुँह भी न देखे और बोल भी न तो उसका अभाग्य ही है| वह तो कल फिर परदेस चला जाएगा| वैसे ही अंग्रेज़ों के राज्य में भी जो हम कुँए के मेंढक, काठ के उल्लू, पिंजड़े के गंगाराम ही रहैं तो हमारी कमबख्त कमबख्ती फिर कमबख्ती है|
बहुत लोग यह कहेंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुट्टी ही नहीं रहती बाबा, हम क्या उन्नति करैं? तुम्हारा पेट भरा है तुमको दून की सूझती है| यह कहना उनकी बहुत भूल है| इंग्लैंड का पेट भी कभी यों ही खाली था| उसने एक हाथ से अपना पेट भरा, दूसरे हाथ से उन्नति की राह के काँटों को साफ़ किया| क्या इंग्लैंड में किसान, खेतवाले, गाड़ीवान, मजदूर, कोचवान आदि नहीं हैं? किसी देश में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते| किंतु वे लोग जहाँ खेत जोतते - बोते हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते हैं कि ऐसी और कौन नई कल या मसाला बनावैं, जिसमें इस खेती में आगे से दूना अन्न उपजै | विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं| जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गद्दी के नीचे से अखबार निकाला| यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पिएगा या गप्प करेगा| सो गप्प भी निकम्मी | वहाँ के लोग गप्प ही में देश के प्रबंध छाँटते हैं| सिद्धांत यह कि वहाँ के लोगों का यह सिद्धांत है कि एक छिन भी व्यर्थ न जाए|
उसके बदले यहाँ के लोगों में जितना निकम्मापन हो उतना ही वह बड़ा अमीर समझा जाता है| आलस यहाँ इतनी बढ़ गई कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला “ अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम| दास मलूका कहि गए, सबके दाता राम | " चारों ओर आँख उठाकर देखिए तो बिना काम करनेवालों की ही चारों ओर बढ़ती है| रोज़गार कहीं कुछ भी नहीं है, अमीरों की मुसाहबी, दल्लाली या अमीरों के नौजवान लड़कों को खराब करना या किसी की जमा मार लेना, इनके सिवा बतलाइए और कौन रोज़गार है| जिससे कुछ रुपया मिलै | चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हुई है| किसी ने बहुत ठीक कहा है कि दरिद्र कुटुंबी इस तरह अपनी इज़्ज़त को बचाता फिरता है, जैसे लाजवंती कुल की बहू फटे कपड़ों में अपने अंग को छिपाए जाती है| वही दशा हिंदुस्तान की है|
मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन - दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन-दिन कमती होता जाता है| तो अब बिना ऐसा उपाय किए काम नहीं चलेगा कि रुपया भी बढ़े और वह रुपया बिना बुद्धि बढ़े न बढ़ेगा| भाइयो, राजा - महाराजों का मुँह मत देखो, मत यह आशा रक्खो कि पंडित जी कथा में कोई ऐसा उपाय भी बतलावेंगे कि देश का रुपया और बुद्धि बढ़े| तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो| कब तक अपने को जंगली हूस मूर्ख बोदे डरपोकने पुकरवाओगे| दौड़ो, इस घोड़दौड़ में जो पीछे पड़े तो फिर कहीं ठिकाना नहीं है| “फिर कब राम जनकपुर ऐहैं| " अबकी जो पीछे पड़े तो फिर रसातल ही पहुँचोगे | जब पृथ्वीराज को कैद करके गोरे ले गए तो शहाबुद्दीन के भाई गियासुद्दीन से किसी ने कहा कि वह शब्दभेदी बाण बहुत अच्छा मारता है | एक दिन सभा नियत हुई और सात लोहे के तावे बाण से फोड़ने को रखे गए| पृथ्वीराज को लोगों ने पहले ही से अंधा कर दिया था| संकेत यह हुआ कि जब गियासुद्दीन 'हूँ' करे तब वह तावों पर बाण मारे| चंद कवि भी उसके साथ कैदी था | यह सामान देखकर उसने यह दोहा पढ़ा|
“अबकी चढ़ी कमान को जानै फिर कब चढ़े| जिनि चुक्के चौहान, इक्के मारय इक्क सर || ” उसका संकेत समझकर जब गियासुद्दीन ने 'हूँ' किया तो पृथ्वीराज ने उसी को बाण मार दिया| वही बात अब है| अबकी चढ़ी, इस समय में सरकार का राज्य पाकर और उन्नति का इतना सामान पाकर भी तुम लोग अपने को न सुधारो तो तुम्हीं रहो और वह सुधारना भी ऐसा होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो | धर्म में, घर के काम में, बाहर के काम में, रोज़गार में, शिष्टाचार में, चाल-चलन में, शरीर के बल में, मन के बल में, समाज में, बालक में, युवा में, वृद्ध में, स्त्री में, पुरुष में, अमीर में, गरीब में, भारतवर्ष की सब अवस्था, सब जाति सब देश में उन्नति करो| सब ऐसी बातों को छोड़ो जो तुम्हारे इस पथ के कंटक हों, चाहे तुम्हैं लोग निकम्मा कहैं या नंगा कहैं, कृस्तान कहैं या भ्रष्ट कहैं | तुम केवल अपने देश की दीनदशा को देखो और उनकी बात मत सुनो|
अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः |
स्वकार्य्यं साधयेत् धीमान् कार्य्यध्वंसो हि मूर्खता ||
जो लोग अपने को देश हितैषी लगाते हों, वह अपने सुख को होम करके, अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कस के उठो | देखादेखी थोड़े दिन में सब हो जाएगा| अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजो| कोई धर्म की आड़ में, कोई देश की चाल की आड़ में, कोई सुख की आड़ में छिपे हैं| उन चोरों को वहाँ-वहाँ से पकड़-पकड़कर लाओ| उनको बाँध बाँधकर कैद करो| हम इससे बढ़कर क्या कहें कि जैसे तुम्हारे घर में कोई पुरुष व्यभिचार करने आवै तो जिस क्रोध से उसको पकड़कर मारोगे और जहाँ तक तुम्हारे में शक्ति होगी उसका सत्यानाश करोगे | उसी तरह इस समय जो-जो बातैं तुम्हारे उन्नति - पथ में काँटा हों, उनकी जड़ खोदकर फेंक दो| कुछ मत डरो| जब तक सौ-दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बाहर न निकाले जाएँगे, दरिद्र न हो जाएँगे, कैद न होंगे, वरंच जान से न मारे जाएँगे तब तक कोई देश भी न सुधरैगा |
अब यह प्रश्न होगा कि भाई, हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधरना किस चिड़िया का नाम है | किसको अच्छा समझैं ? क्या लें, क्या छोड़ें? तो कुछ बातें जो इस शीघ्रता में मेरे ध्यान में आती हैं, उनको मैं कहता हूँ, सुनो
सब उन्नतियों का मूल धर्म है| इससे सबके पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है| देखो, अँग्रेज़ों की धर्मनीति और राजनीति परस्पर मिली है, इससे उनकी दिन-दिन कैसी उन्नति है| उनको जाने दो, अपने ही यहाँ देखो! तुम्हारे यहाँ धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति, समाज गठन, वैद्यक आदि भरे हुए हैं| दो-एक मिसाल सुनो| यही तुम्हारा बलिया का मेला और यहाँ स्नान क्यों बनाया गया है? जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते, दस-दस, पाँच-पाँच कोस से वे लोग साल में एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें| एक-दूसरे का दुःख-सुख जानैं| गृहस्थी के काम की वह चीजैं जो गाँव में नहीं मिलती, यहाँ से ले जाएँ| एकादशी का व्रत क्यों रखा है ? जिसमें महीने में दो-एक उपवास से शरीर शुद्ध हो जाए| गंगा जी नहाने जाते हो तो पहिले पानी सिर पर चढ़ाकर तब पैर डालने का विधान क्यों है? जिसमें तलुए से गरमी सिर में चढ़कर विकार न उत्पन्न करे|
दीवाली इसी हेतु है कि इसी बहाने साल-भर में एक बेर तो सफाई हो जाए| होली इसी हेतु है कि बसंत की बिगड़ी हवा स्थान-स्थान पर अग्नि बलने से स्वच्छ हो जाए| यही तिहवार ही तुम्हारी मानो म्युनिसिपालिटी हैं| ऐसे ही सब पर्व, सब तीर्थ व्रत आदि में कोई हिकमत है| उन लोगों ने धर्मनीति और समाजनीति को दूध - पानी की भाँति मिला दिया है| खराबी जो बीच में भई है वह यह है कि उन लोगों ने ये धर्म क्यों मानने लिखे थे, इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक धर्म मान लिया| भाइयो, वास्तविक धर्म तो केवल परमेश्वर के चरण कमल का भजन है| ये सब तो समाज धर्म हैं जो देशकाल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं| दूसरी खराबी यह हुई कि उन्हीं महात्मा बुद्धिमान ऋषियों के वंश के लोगों ने अपने बाप-दादों का मतलब न समझकर बहुत से नए-नए धर्म बनाकर शास्त्रों में धर दिए| बस सभी तिथि - व्रत और सभी स्थान तीर्थ हो गए| सो इन बातों को अब एक बेर आँख खोलकर देख और समझ लीजिए कि फलानी बात उन बुद्धिमान ऋषियों ने क्यों बनाई और उनमें देश और काल के जो अनुकूल और उपकारी हों, उनको ग्रहण कीजिए | बहुत सी बातैं जो समाज - विरुद्ध मानी हैं, किंतु धर्मशास्त्रों में जिनका विधान है, उनको चलाइए| जैसे जहाज़ का सफ़र, विधवा - विवाह आदि | लड़कों को छोटेपन ही में ब्याह करके उनका बल, वीर्य, आयुष्य सब मत घटाइए| आप उनके माँ-बाप हैं या उनके शत्रु हैं? वीर्य उनके शरीर में पुष्ट होने दीजिए, विद्या कुछ पढ़ लेने दीजिए; नोन, तेल, लकड़ी की फ़िक्र करने की बुद्धि सीख लेने दीजिए तब उनका पैर काठ में डालिए | कुलीन - प्रथा, बहु-विवाह आदि को दूर कीजिए | लड़कियों को भी पढ़ाइए, किंतु उस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती हैं जिससे उपकार के बदले बुराई होती है| ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुलधर्म सीखें, पति की भक्ति करैं और लड़कों को सहज में शिक्षा दें| वैष्णव, शाक्त इत्यादि नाना प्रकार के मत के लोग आपस का वैर छोड़ दें| यह समय इन झगड़ों का नहीं| हिंदू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए | जाति में कोई चाहे ऊँचा हो चाहे नीचा हो, सबका आदर कीजिए, जो जिस योग्य हो उसको वैसा मानिए| छोटी जाति के लोगों को तिरस्कार करके उनका जी मत तोड़िए | सब लोग आपस में मिलिए |
मुसलमान भाइयों को भी उचित है कि इस हिंदुस्तान में बसकर वे लोग हिंदुओं को नीचा समझना छोड़ दें| ठीक भाइयों की भाँति हिंदुओं से बरताव करें| ऐसी बात, जो हिंदुओं का जी दुखानेवाली हों, न करें| घर में आग लगै, तब जिठानी - द्यौरानी को आपस का डाह छोड़कर एक साथ वह आग बुझानी चाहिए| जो बात हिंदुओं को नहीं मयस्सर हैं, वह धर्म के प्रभाव से मुसलमानों को सहज प्राप्त हैं| उनमें जाति नहीं, खाने-पीने में चौका- चूल्हा नहीं, विलायत जाने में रोक-टोक नहीं| फिर भी बड़े ही सोच की बात है, मुसलमानों ने अभी तक अपनी दशा कुछ नहीं सुधारी | अभी तक बहुतों को यही ज्ञान है कि दिल्ली, लखनऊ की बादशाहत कायम है| यारो ! वे दिन गए| अब आलस, हठधर्मी यह सब छोड़ो| चलो, हिंदुओं के साथ तुम भी दौड़ो, एक-एक दो होंगे | पुरानी बातैं दूर करो| मीरहसन की ' मसनवी' और 'इंदरसभा' पढ़ाकर छोटेपन ही से लड़कों को सत्यानाश मत करो| होश सम्हाला नहीं कि पट्टी पार ली, चुस्त कपड़ा पहना और गज़ल गुनगुनाए | “ शौक तिफ़्ली से मुझे गुल की जो दीदार का था | न किया हमने गुलिस्ताँ का सबक याद कभी" | भला सोचो कि इस हालत में बड़े होने पर वे लड़के क्यों न बिगड़ेंगे| अपने लड़कों को ऐसी किताबें छूने भी मत दो| अच्छी-से-अच्छी उनको तालीम दो | पिनशिन और वज़ीफा या नौकरी का भरोसा छोड़ो| लड़कों को रोज़गार सिखलाओ| विलायत भेजो|
छोटेपन से मिहनत करने की आदत दिलाओ| सौ-सौ महलों के लाड़-प्यार दुनिया से बेखबर रहने की राह मत दिखलाओ|
भाई हिंदुओ ! तुम भी मत-मतांतर का आग्रह छोड़ो| आपस में प्रेम बढ़ाओ| इस महामंत्र का जाप करो| जो हिंदुस्तान में रहे, चाहे किसी रंग, किसी जाति का क्यों न हो, वह हिंदू| हिंदू की सहायता करो| बंगाली, मराठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्रह्मो, मुसलमान सब एक का हाथ एक पकड़ो| कारीगरी जिसमें तुम्हारे यहाँ बढ़े, तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही देश में रहै वह करो| देखो, जैसे हज़ार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली हैं, वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हज़ार तरह से इंग्लैंड, फरांसीस, जर्मनी, अमेरिका को जाती हैं| दीआसलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है| ज़रा अपने ही को देखो | जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बिनी है| जिस लंकिलाट का तुम्हारा अंगा है वह इंग्लैंड का है| फरांसीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो और जर्मनी की बनी चरबी की बत्ती तुम्हारे सामने बल रही है| यह तो वही मसल हुई कि एक बेफ़िकरे मँगनी का कपड़ा पहिनकर किसी महफिल में गए| कपड़े को पहिचानकर एक ने कहा, 'अजी यह अंगा तो फलाने का है|' दूसरा बोला, 'अजी टोपी भी फलाने की है|' तो उन्होंने हँसकर जवाब दिया कि 'घर की तो मूछें ही मूछें हैं| ' हाय अफ़सोस, तुम ऐसे हो गए कि अपने निज के काम की वस्तु भी नहीं बना सकते | भाइयो, अब तो नींद से चौंको, अपने देश की सब प्रकार उन्नति करो| जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो, वैसे ही खेल खेलो, वैसी ही बातचीत करो | परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो| अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो|
प्रश्न- अभ्यास
1. पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि 'इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत कुछ है' क्यों कहा गया है?
2. 'जहाँ रॉबर्ट साहब बहादुर जैसे कलेक्टर हों, वहाँ क्यों न ऐसा समाज हो' वाक्य में लेखक ने किस प्रकार के समाज की कल्पना की है?
3. जिस प्रकार ट्रेन बिना इंजिन के नहीं चल सकती ठीक उसी प्रकार 'हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलानेवाला हो' से लेखक ने अपने देश की खराबियों के मूल कारण खोजने के लिए क्यों कहा है?
4. देश की सब प्रकार से उन्नति हो, इसके लिए लेखक ने जो उपाय बताए उनमें से किन्हीं चार का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए |
5. लेखक जनता से मत-मतांतर छोड़कर आपसी प्रेम बढ़ाने का आग्रह क्यों करता है?
6. आज देश की आर्थिक स्थिति के संदर्भ में नीचे दिए गए वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए- 'जैसे हज़ार धारा होकर गंगा समुद्र में मिली हैं, वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हज़ार तरह से इंग्लैंड, फरांसीस, जर्मनी, अमेरिका को जाती हैं| '
7. आपके विचार से देश की उन्नति किस प्रकार संभव है? कोई चार उदारहण तर्क सहित दीजिए |
8. भाषण की किन्हीं चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए| उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए कि पाठ ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?' एक भाषण है|
9. ' अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो' से लेखक का क्या तात्पर्य है? वर्तमान संदर्भों में इसकी प्रासंगिता पर अपने विचार प्रस्तुत कीजिए |
10. निम्नलिखित गद्यांशों की व्याख्या कीजिए -
(क) सास के अनुमोदन से.................फिर परदेस चला जाएगा|
(ख) दरिद्र कुटुंबी इस तरह................वही दशा हिंदुस्तान की है|
(ग) वास्तविक धर्म तो.................शोधे और बदले जा सकते हैं|
योग्यता - विस्तार
1. देश की उन्नति के लिए भारतेंदु ने जो आह्वान किया है उसे विस्तार से लिखिए |
2. पाठ में आए बोलचाल के शब्दों की सूची बनाइए और उनके अर्थ लिखिए|
3. भारतेंदु उर्दू में किस उपनाम से कविताएँ लिखते थे? उनकी कुछ उर्दू कविताएँ ढूँढ़कर लिखिए |
4. पृथ्वीराज चौहान की कथा अपने शब्दों में लिखिए|
शब्दार्थ और टिप्पणी
| महसूल | कर, टैक्स |
| चुंगी की कतवार | म्युनिसिपालिटी का कचरा |
| रंगमहल | भोग विलास का स्थान |
| कमबख्ती | अभागापन |
| मर्दुमशुमारी | जनगणना |
| तिफ्ली | बचपन से संबंधित |