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अध्याय 7

प्राणियो मे संरचनात्मक संगठन

7.1 अंग एवअंग तंत्र

7.2 मेंढक

आपने पिछले अध्याय मेप्राणि जगत के अनेक एक कोशिकीय (unicellular) व बहुकोशिकीय (multicellular) जीवोका अध्ययन किया एक कोशिकीय प्राणियो मे जीवन की समस्त जैविक क्रियाएजैसे- पाचन, श्वसन तथा जनन, एक ही कोशिका द्वारा संपन्न होती हैं बहुकोशकीय प्राणियोके जटिल शरीर मेउपर्युक्त आधारभूत क्रियाए भिन्न-भिन्न कोशिका समूहोद्वारा व्यवस्थित रूप से संपन्न की जाती है सरल प्राणी हाइड्रा का शरीर विभिन्न प्रकार की कोशिकाओ का बना हुआ है, जिनमें प्रत्येक कोशिका की संख्या हजारो मे होती है मानव का शरीर अरबो कोशिकाओ का बना हुआ है, जो विविध कार्य संपन्न करता है ये कोशिकाएशरीर मेएक साथ कैसे काम करती हैं? बहुकोशिकीय प्राणियो मे समान कोशिकाओ का समूह, अंतर कोशिकीय पदार्थो सहित एक विशेष कार्य करता है, कोशिकाओ का एेसा संगठन ऊतक (tissue) कहलाता है

आपको आश्चर्य हो सकता है कि सभी जटिल प्राणियोका शरीर केवल चार प्रकार के आधारभूत ऊतकोका बना हुआ है ये सब ऊतक एक विशेष अनुपात एवप्रतिरूप से संगठित होकर अंगों का निर्माण करते हैं, जैसे- आमाशय, फुप्फुस (lungs), हृदय और वृक्क (kidney) जब दो या दो से अधिक अंग अपनी भौतिक एव रासायनिक पारस्परिक-क्रिया से एक निश्चित कार्य को संपन्न कर अंग-तंत्र का निर्माण करते हैजैसे-पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र इत्यादि समस्त शरीर की जैविक क्रियाएं, कोशिका, ऊतक, अंग तथा अंग तंत्र मेश्रम विभाजन के द्वारा संपन्न होती हैऔर पूरे शरीर को जीवित रखने के लिए योगदान देती हैं

7.1 अंग और अंगतंत्र

बहुकोशीय प्राणियो मे उपर्युक्त वर्णित ऊतक संगठित होकर अंग और अंगतंत्र की रचना करते हैइस तरह का संगठन लाखो कोशिकाओ द्वारा निर्मित जीव की सभी क्रियाओको अधिक दक्षतापूर्वक एव समन्वित रूप से चलाने के लिए आवश्यक होता है शरीर के प्रत्येक अंग एक या एक से अधिक प्रकार के ऊतकोसे बना होता है उदाहरणार्थ, हृदय मे चारोतरह के ऊतक होते हैं, उपकला, संयोजी, पेशीय तथा तंत्रकीय ऊतक ध्यान पूर्वक अध्ययन के बाद हम यह देखते हैकि अंग और अंगतंत्र की जटिलता एक निश्चित इंद्रियगोचर प्रवृत्ति को प्रदर्शित करती है यह इंद्रियगोचर प्रवृत्ति एक विकासीय प्रवृत्ति कहलाती है (इसके बारे मेआप कक्षा 12 में विस्तार से पढ़ेंगे)

यहाँ पर आपको तीन जीवोके विभिन्न विकासीय स्तर के बारे मेबताया जा रहा है, जिसमेआपको शारीर (anatomy) और आकारिकी (mortphology) के संगठन एव क्रियाविधि के बारे मेजानकारी प्राप्त होगी आकारिकी आपको जीवोकी बाह्य संरचना या बाह्य दिखने वाले आकार का अध्ययन कराती है पौधों या सूक्ष्म जीवोके संदर्भ में, आकारिकी शब्द का वस्तुतः मतलब यही है प्राणियोके संबंध मेआकारिकी का मतलब शरीर के बाह्य अंगोकी बनावट या शरीर के बाह्य भागोका अध्ययन है प्राणियोमेशारीर का पारंपरिक मतलब आंतरिक अंगोकी संरचना के अध्ययन से है अब आप केंचुए, कॅाकरोच तथा मेंढक के आकारिकी एवशारीरकी का अध्ययन करेंगे जो अकशेरुकी तथा कशेरुकी का क्रमशः प्रतिनिधित्व करते हैं

7.2 मेंढक

मेंढक वह प्राणी है जो मीठे जल तथा धरती दोनोपर निवास करता है तथा कशेरुकी संघ के एंफीबिया वर्ग से संबंधित होता है भारत मेपाई जाने वाली मेंढक की सामान्य जाति राना टिग्रीना है I

इसके शरीर का ताप स्थिर नहीहोता है शरीर का ताप वातावरण के ताप के अनुसार परिवर्तित होता रहता है इस प्रकार के प्राणियोको असमतापी या अनियततापी कहते हैमेंढक के रंग को परिवर्तित होते हुए आपने अवश्य देखा होगा, जिस समय ये घास तथा नम जमीन पर होते हैक्या आप बता सकते हो, एेसा क्योहोता है? उनमेअपने शत्रुओसे छिपने के लिए रंग परिवर्तन की क्षमता होती है, जिसे छद्मावरण कहा जाता है इस रक्षात्मक रंग परिवर्तन क्रिया को अनुहरण (minimicry) कहते हैआपने यह भी देखा होगा कि मेंढक शीत व ग्रीष्म ऋतु मेनहीदिखते इस अंतराल मेये सर्दी तथा गर्मी से अपनी रक्षा करने के लिए गहरे गड्ढोमेचले जाते हैइस प्रक्रिया को क्रमशः शीत निष्क्रियता (hibernation) व ग्रीष्म निष्क्रियता (aestivation) कहते हैं I

7.1

7.2.1 बाह्य आकारिकी

क्या आपने कभी मेंढक की त्वचा को छुआ है? मेंढक की त्वचा श्लेषमा (म्युकस) से ढकी होने के कारण चिकनी तथा फिसलनी होती है इसकी त्वचा सदैव आर्द्र रहती है मेंढक की ऊपरी सतह धानी हरे रंग की होती है, जिसमे अनियमित धब्बे होते हैं, जबकि नीचे की सतह हल्की पीली होती है मेंढक कभी पानी नहीं पीता; बल्कि त्वचा द्वारा इसका अवशोषण करता है I

मेंढक का शरीर सिर व धड़ मे विभाजित रहता है (चित्र 7.1) पूंछ व गर्दन का अभाव होता है मुख के ऊपर एक जोड़ी नासिका द्वार खुलते है आँखे बाहर की ओर निकली व निमेषक पटल से ढकी होती हैताकि जल के अंदर आँखोका बचाव हो सके आँखोके दोनोओर (कान) टिम्पैनम या कर्ण पटह उपस्थित होते हैं, जो ध्वनि संकेतोको ग्रहण करने का कार्य करते हैअग्र व पश्चपाद चलने, फिरने, टहलने व गड्ढा बनाने का काम करते हैअग्र पाद मेचार अंगुलियाँ होती हैं; जबकि पश्चपाद मेपाँच होती हैतथा पश्चपाद लंबेव मांसल होते हैपश्च पाद की झिल्लीयुक्त अंगुलि जल मेतैरने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है मेंढक मेलैंगिक द्विरूपता देखी जाती है नर मेंढक मेआवाज उत्पन्न करने वाले वाक् कोष (vocal sacs) के साथ-साथ अग्रपाद की पहली अंगुलि मेमैथुनांग होते हैये अंग मादा मेंढक मे नही मिलते हैं


7.2

7.2.2 आंतरिक आकारिकी

मेंढक की देह गुहा में पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, तंत्रिका तंत्र, संचरण तंत्र, जनन तंत्र पूर्ण अच्छी तरह परिवर्धित संरचनाओ एव कार्योयुक्त होते हैं मेंढक का पाचन तंत्र आहार नाल तथा आहर ग्रंथि का बना होता है (चित्र 7.2) मेंढक मांसाहारी है, अतः इसकी आहारनाल लंबाई मेछोटी होती है इसका मुख, मुखगुहिका में खुलता है जो ग्रसनी से होते हुए ग्रसिका तक जाती है ग्रसिका एक छोटी नली है जो आमाशय मे खुलती है आमाशय आगे चलकर आंत्र, मलाशय और अंत मेअवस्कर (cloaca) द्वारा बाहर खुलता है इसका मुँह मुखगुहिका द्वारा ग्रसनी मेखुला है जो ग्रसिका तक जाती हैI

यकृत पित्त रस स्रावित करता है जो पित्ताशय मेएकत्रित रहता है अग्नाश्य जो एक पाचक ग्रंथि है, जो अग्नाशयी रस स्रवित करता है जिसमे पाचक एंजाइम होते हैमेंढक अपनी द्विपालित जीभ से भोजन का शिकार पकड़ता है इसके भोजन का पाचन आमाशय की दीवारोद्वारा स्रवित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रसोद्वारा होता है अर्धपाचित भोजन काइम कहलाता है जो आमाशय से ग्रहणी में जाता है ग्रहणी पित्ताशय से पित्त और अग्नाशय से अग्नाशयी रस मूल पित्त वाहिनी द्वारा प्राप्त करती है पित्तरस वसा तथा अग्नाशयी रस कार्बोहाइड्रेटो तथा प्रोटीन का पाचन करता है पाचन की अंतिम प्रक्रिया आँत मेहोती है पाचित भोजन आँत के अंदर अंकुर और सूक्ष्मांकुरो द्वारा अवशोषित होते है अपाचित भोजन अवस्कर द्वार से बाहर निष्कासित कर दिया जाता हैI

मेंढक जल व थल दोनो स्थानो पर दो विभिन्न विधियोद्वारा श्वसन कर सकते हैइसकी त्वचा एक जलीय श्वसनांग का कार्य करती है इसे त्वचीय श्वसन कहते हैं विसरण द्वारा पानी मेघुली हुई अॉक्सीजन का विनिमय होता है जल के बाहर त्वचा, मुख गुहा और फेफड़े वायवीय श्वसन अंगोका कार्य करते हैफेफड़ोके द्वारा श्वसन फुप्फसीय श्वसन कहलाता है फेफेड़े एक लंबेअंडाकार गुलाबी रंग की थैलीनुमा संरचनाए होती हैं, जो देहगुहा के वक्षीय भाग मे पाई जाती हैवायु नासा छिद्रोसे होकर मुख गुहा तथा फेफड़ो मे पहुँचती है ग्रीष्म निष्क्रियता व शीत निष्क्रियता के दौरान मेंढक त्वचा से श्वसन करते हैंI

मेंढक का परिसंचरण तंत्र, सुविकसित बंद प्रकार का होता है इसमे लसीका परिसंचरण भी पाया जाता है अर्थात् अॉक्सीजनित अथवा वि अॉक्सीजनित रक्त हृदय मे मिश्रित हो जाते हैरुधिर परिसंचरण तंत्र हृदय, रक्त वाहिकाओ और रुधिर से मिलकर बनता है लसीका तंत्र लसीका, लसीका नलिकाओ और लसीका ग्रंथियोका बना होता है हृदय एक त्रिकोष्ठीय मांसल संरचना है, जो कि देह गुहा के ऊपरी भाग में स्थित है यह पतली पारदर्शी झिल्ली, हृदय-आवरण (पेरीकार्डियम) द्वारा ढका रहता है एक त्रिकोष्ठीय संरचना, जिसे शिराकोटर (साइनस वेनोसस) कहते हैं, हृदय के दाहिने अलिंद से जुड़ा रहता है तथा महाशिरा ओसे रक्त प्राप्त करता है हृदय की अधर सतह पर दाए अ लिंद के ऊपर एक थैलानुमा रचना धमनी शंकु होता है, जिसमे निलय (ventricle) खुलता है हृदय से रक्त धमनियोद्वारा शरीर के सभी भागोमेभेजा जाता है इसे धमनी तंत्र कहते है शिराएशरीर के विभिन्न भागो से रक्त एकत्रित कर हृदय मे पहुँचाती हैं, यह शिरा-तंत्र कहलाता है मेंढक मेविशेष संयोजी शिराएयकृत तथा अाँतो के मध्य वृक्क तथा शरीर के निचले भागोके मध्य पाई जाती है इन्हे क्रमशः यकृत निवाहिका तंत्र एवं वृक्कीय निवाहिका तंत्र कहते है रक्त प्लेज्मा तथा रक्त-कणिकाओ से मिलकर बना है रक्त कणिकाए हैं- लाल रुधिर कणिका ए(रक्ताणु) एवश्वेत रुधिर कणिकाए (श्वेताणु) एवपट्टिकाणु (प्लेटलेट) लाल रुधिर कणिकाओमे लाल रंग का श्वसन रंजक हीमोग्लोबिन पाया जाता है इन कणिकाओमेकेंद्रक पाया जाता है लसीका रुधिर से भिन्न होता है; क्योंकि इसमे कुछ प्रोटीन व लाल रुधिर कणिकाए अनुपस्थित होती है परिसंचरण के दौरान रक्त पोषकों गैसोव जल को नियत स्थानोतक ले जाता है रुधिर परिसंचरण मांसल हृदय की पंपन क्रिया द्वारा होता हैI

नाइट्रोजनी अपशिष्ट को शरीर से बाहर निकालने के लिए मेंढक मे पूर्ण विकसित उत्सर्जी तंत्र होता है उत्सर्जी अंग में मुख्यतः एक जोड़ी वृक्क, मूत्रवाहिनी, अवस्कर द्वार तथा मूत्राशय होते हैये गहरे लाल रंग के सेम के आकार के होते हैऔर देहगुहा मेथोड़ा सा पीछे की ओर केशेरुक दंड के दोनोओर स्थित होते है प्रत्येक वृक्क कई सरंचनात्मक व क्रियात्मक इकाइयों, मूत्रजन नलिकाओया वृक्काओका बना होता है नर मेंढक मेमूत्र नलिका वृक्क से मूत्र जनन नलिका के रूप मेबाहर आती है मूत्रवाहिनी अवस्कर द्वार मेखुलती है मादा मेंढक मेमूत्र वाहिनी एवअंडवाहिनी अवस्कर द्वार मेअलग-अलग खुलती हैएक पतली दीवार वाला मूत्राशय भी मलाशय के अधर भाग पर स्थित होता है, जो कि अवस्कर में खुलता है मेंढक यूरिया का उत्सर्जन करता है इसलिए यूरिया-उत्सर्जी प्राणी कहलाता है उत्सर्जी अपशिष्ट रक्त द्वारा वृक्क मेपहुँचते हैं, जहाँ पर ये अलग कर दिए जाते है और उनका उत्सर्जन कर दिया जाता हैI

नियंत्रण व समन्वय तंत्र मेंढक मेपूर्ण विकसित होता है इनमेअंतः स्रावी ग्रंथियाँ (endocrine system) व तंत्रिका तंत्र दोनो पाए जाते है विभिन्न अंगोमेआपसी समन्वयन कुछ रसायनोद्वारा होता है जिन्हें हॅार्मोन कहते हैये अंतःस्रावी ग्रंथियोद्वारा स्रावित होते हैमेंढक की मुख्य अंतःस्रावी ग्रंथियाँ है- पीयूष (पिट्यूटरी), अवटु (थॉइराइड), परावटु (पैराथाइॅराइड), थाइमस, पीनियल काय, अग्नाशयी द्वीपकाएं, अधिवृक्क (adrenal) और जनद (gonad) तंत्रिका तंत्र (मस्तिष्क तथा मेरु रज्जु) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, परिधीय तंत्रिका तंत्र (कपालीय व मेरु तंत्र) और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (ओटोनोमिक नर्वस सिस्टम) अनुकंपी और परानुकंपी (सिंपेथेटिक व पैरासिंपेथिटक) तंत्र का बना होता है मस्तिष्क से 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएनिकलती है मस्तिष्क, हड्डियोसे निर्मित मस्तिष्क बॉक्स अथवा कपाल के अंदर बंद रहता है यह अग्र मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क और पश्च मस्तिष्क मेविभाजित होता है अग्र मस्तिष्क मेघ्राण पालियाँ, जुड़वाँ, युग्मित, प्रमस्तिष्क गोलार्ध और केवल एक अग्रमस्तिष्क पश्च (diencephalon) होते हैं मध्य मस्तिष्क एक जोड़ा दृक पालियोका बना होता है पश्च मस्तिष्क, अनुमस्तिष्क एवं मेडूला अॉब्लांगेटा का बना होता है मेडूला अॉब्लांगेटा महारंध्र से निकलकर मे रुदंड मेस्थित मेरुरज्जु से जुड़ा रहता हैI

मेंढक मेभिन्न प्रकार के संवेदी अंग पाए जाते हैजैसे- स्पर्श अंग (संवेदी पिप्पल) स्वाद अंग (स्वाद कलिकाएं) गंध (नासिका उपकला) दृष्टि (नेत्र) व श्रवण (कर्ण पटह और आंतरिक कर्ण) इन सब मे आँखे और आंतरिक कर्ण सुव्यवस्थित होते हैं और बचे हुए दूसरे संवेदी अंग केवल तंत्रिका सिरोपर कोशिकाओके गुच्छे होते हैं मेंढक मेएक जोड़ी गोलाकार नेत्र गड्ढोमेस्थित होते हैये साधारण नेत्र होते हैमेंढक मेबाह्य कर्ण अनुपस्थित होता है केवल कर्णपट ही बाहर से दिखाई देता है कर्ण एक एेसा अंग है जो सुनने के साथ-साथ संतुलन का काम भी करता हैI

7.3

मेंढक मेमादा व नर जनन तंत्र अलग एवं पूर्ण सुव्यवस्थित होते हैं नर जननांग एक जोड़ी पीले अंडाकार वृषण होते है जो, वृक्क के ऊपरी भाग से पेरिटोनियम के दोहरीवलय, मेजोर्कियम नामक झिल्ली द्वारा चिपके रहते है (चित्र 7.3) शुक्र वाहिकाएसंख्या में 10-12 होती हैजो वृषण से निकलने के बाद अपनी ओर के वृक्क मेधंस जाती हैवृक्क मेये विडर नाल मेखुलती हैं, जो अंत मेमूत्रवाहिनी मेखुलती है अब मूत्रवाहिनी मूत्र-जनन वाहिनी कहलाती है, जो वृक्क से बाहर आकर अवस्कर में खुलती है अवस्कर एक छोटा मध्यकक्ष होता है, जो कि उत्सर्जी पदार्थ, मूत्र तथा शुक्राणुओको बाहर भेजने का कार्य करता हैI

7.4

मादा मेवृक्क के पास एक जोड़ी अंडाशय उपस्थित होते है(चित्र 7.4) लेकिन इनका वृक्क से कोई क्रियात्मक संबंध नहीहोता है एक जोड़ी अंडवाहिनियाँ अवस्कर में अलग-अलग खुलती हैएक परिपक्व मादा एक बार मे2,500 से 3,000 अंडे दे सकती है इनमेबाह्य निषेचन पानी मेहोता है भ्रूण परिवर्धन लार्वा के माध्यम से होता है, लार्वा टैडपोल कहलाता हैI

मेंढक मनुष्य के लिए लाभदायक प्राणी है यह कीटो को खाता है और इस तरह फसलो की रक्षा करता है मेंढक वातावरण संतुलन बनाए रखते हैं; क्योंकि यह पारिस्थितिकी तंत्र की एक महत्वपूर्ण भोजन शृंखला की एक कड़ी है कुछ देशो मे मांसल पाद मनुष्यों द्वारा भोजन के रूप मे इस्तेमाल किए जाते हैI


सारांश

कोशिका ऊतक, अंग और अंग तंत्र कार्य को इस प्रकार विभक्त कर लेते हैकि शरीर का बना रहना सुनिश्चित रहे और इस तरह वे श्रम विभाजन प्रदर्शित करते है कोशिकाओ का एेसा समूह जो अंतराकोशीय पदार्थो से बना होता है तथा एक या अधिक कार्य करता है, ऊतक कहलाता है उपकला शरीर के चादर जैसे ऊतक होते है बाह्य सतह और गुहिकाओं, वाहिनियो और नलिकाओ का आस्तर है उपकलाओ की एक मुक्त सतह होती है जिसके एक तरफ शरीर तरह तथा दूसरी तरफ बाह्य वातावरण होता है इनकी कोशिकाए संरचनात्मक एवक्रियात्मक रूप से संधियोसे जुड़ी रहती हैंI
भारतीय बुलफ्राग, राना टिग्रीना भारत मेपाया जाने वाला सामान्य मेंढक है इसका शरीर त्वचा से ढका रहता है त्वचा पर श्लेष्म ग्रंथियाँ पाई जाती है जो अत्यधिक संवहनी होती है तथा श्वसन (जल तथा थल) मेसहायता करती है शरीर, सिर और धड़ में विभक्त रहता है एक पेशीय जिह्वा उपस्थित रहती है जो किनारे से कटी हुई ओर द्विपालित (वाईलोब्ड) होती है यह शिकार को पकड़ने मेमदद करती है आहारनाल, ग्रसिका, आमाशय, अांत्र और मलाशय की बनी होती है, जो अवस्कर द्वारा बाहर की ओर खुलती है मुख्य पाचन ग्रंथियाँ, यकृत और अग्नाशय हैयह पानी मेत्वचा द्वारा तथा जमीन पर फेफड़ोद्वारा श्वसन करता है रुधिर परिसंचरण तंत्र बंद और एकल प्रकार का होता है लाल रुधिर कणिकाए केंद्रक युक्त होती है तंत्रिका तंत्र, केंद्रीय, परिधीय और स्वायत्त प्रकार का होता है जनन तंत्र के मूल अंग वृक्क एवमूत्र जनन नलिकाएहैं, जो अवस्कर मे खुलती है नर जननांग एक जोड़ी वृषण तथा मादा जननांग एक जोड़ी अंडाशय होते है एक मादा एक बार मे 2500 से 3000 अंडे देती है निषेचन और परिवर्धन बाह्य होता है अंडोसे टेडपोल निकलता है, जो मेंढक मे कायांतरित हो जाता हैI

अभ्यास

1. मेंढक के पाचन तंत्र का नामांकित चित्र बनाइए
2. निम्न के कार्य बताइएः
(अ) मेंढक की मूत्रवाहिनी 
(ब) मैलपिगी नलिका 
(स) केंचुए की देहभित्ति