इकाई तीन

भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान चुनौतियाँ


आज भारत की चुनौतियों में निधर्नता, ग्रामीण भारत का विकास तथा आधारिक संरचना का निर्माण प्रमुख है। हम सौ करोड़ लोगों की शक्ति से संपन्न राष्ट्र हैं तथा मानव पूँजी हमारी एक बड़ी संपत्ति है। इसमें शिक्षा तथा स्वास्थ्य में निवेश आवश्यक है। हमें रोजगार के स्वरूप को समझने की एवं देश में और अधिक रोजगार के अवसर के सृजन की ज़रूरत है। हम विकास के निहितार्थों को भी अपने पर्यावरण तथा धारणीय विकास की मांग के संदर्भ में देखेंगे। इन मुद्दों को सुलझाने के क्रम में सरकार की नीतियों का आलोचनात्मक आकलन किए जाने की ज़रूरत है, जिस पर इस इकाई में अलग से चर्चा की गई है।

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निर्धनता

इस अध्याय को पढ़ने के बाद आप

• निर्धनता के विभिन्न लक्षणों को जान सकेंगे;

• निर्धनता की अवधारणा के विभिन्न पक्षों को समझ सकेंगे;

• निर्धनता मापन के तरीकों की आलोचनात्मक समीक्षा कर सकेंगे;

• निर्धनता निवारण के वर्तमान कार्यक्रमों को समझ कर उनकी समीक्षा कर सकेंगे।

कोई भी एेसा समाज कभी सुखी और संपन्न नहीं हो सकता है, जिसके अधिकांश सदस्य निर्धन और दयनीय हों।

-एेडम स्मिथ

4.1 प्रस्तावना

पिछले अध्यायों में आपने सात दशकों से भारत में अपनाई गई आर्थिक नीतियों तथा विभिन्न विकास सूचकों पर उनके प्रभावों का अध्ययन किया है। जन-जन की न्यूनतम मूलभूत आवश्यकताओं की संपूर्ति और निर्धनता निवारण स्वतंत्र भारत का एक प्रमुख लक्ष्य रहा है। हमारी सभी पंचवर्षीय योजनाओं ने विकास के जिस स्वरूप को अंगीकार किया है, उसका उद्देश्य समाज के निर्धनतम और सबसे पिछड़े सदस्यों का उन्नयन (अंत्योदय) रहा है। साथ ही निर्धन वर्गाें को समाज की मुख्यधारा का अंग बना सभी के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित कराने का ध्येय लेकर ही सारे विकास कार्यक्रमों की रचना की गई है।

संविधान सभा को संबोधित करते हुए 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ‘‘स्वतंत्रता की प्राप्ति तो एक कदम मात्र है, एक सुअवसर का आरंभ मात्र है - अभी और बहुत-सी महान उपलब्धियाँ और विजयोत्सव हमारी प्रतीक्षा में हैं। ये होंगे निर्धनता, अज्ञान, रोग और अवसरों की असमानताओं के उन्मूलन के उत्सव।’’

किंतु आज हम कहाँ तक पहुँच पाए हैं, यह जानना भी आवश्यक है। आज विश्व के निर्धनों की कुल संख्या के पाँचवें हिस्से से अधिक निर्धन केवल भारत में रहते हैं। यहाँ लगभग 30 करोड़ एेसे लोग बसे हैं, जो अपनी मूलभूत \ज़रूरतों को भी ढंग से पूरा नहीं कर पाते।

निर्धनता के स्थान-स्थान पर तथा समय-समय पर अलग-अलग स्वरूप हैं। इनकी अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। मोटे तौर पर निर्धनता एेसी दशा तो मानी ही जाती है, जिससे सभी व्यक्ति बचना चाहते हैं। अतः निर्धनता, निर्धन तथा धनी दोनों के लिए विश्व को बदलने का एक आह्वान है ताकि अधिक से अधिक लोगों को पेटभर भोजन नसीब हो सके, सिर छुपाने को बेहतर जगह मिल सके, चिकित्सा व शिक्षा की सुविधाएँ प्राप्त हो सके, हिंसा से उनका बचाव हो सके तथा अपने समाज के घटनाक्रम में उनकी आवाज की भी सुनवाई हो सके।

यह जानने के लिए कि निर्धनता कम करने में कौन-सी नीतियाँ सफल हो सकती हैं और कौन सी नहीं, समयानुसार किन बातों में बदलाव आ सकते हैं, हमें निर्धनता को परिभाषित करना तथा इसका मापन, अध्ययन और अनुभव भी करना होगा। निर्धनता के अनेक आयाम होते हैं, अतः अनेक सूचकों के माध्यम से उनका अवलोकन करना होगा। कहीं आय और उपभोग के स्तर, कहीं सामाजिक सूचकों और जोखिम के प्रति संवेदनशीलता के सूचकों, तो कहीं सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं तक पहुँच या उनमें भागीदारी पर विचार करना होगा।

बॉक्स 4.1 अनु और सुधा

अनु और सुधा का जन्म एक ही दिन हुआ था। अनु के माता-पिता निर्माण कार्य पर लगे मजदूर थे तो सुधा के पिता एक व्यवसायी तथा माँ शिल्पकार (डिजाइनर) थी।

अनु की माँ प्रसव पीड़ा आरंभ होने तक अपने सिर पर ईंटों का भार ढो रही थी। दर्द आरंभ होने पर वह निर्माण स्थल पर ही औजार आदि रखने के स्थान पर चली गई और वहीं उसने अकेले ही अपनी बेटी को जन्म दिया। अपनी बच्ची को दूध पिलाया, पुरानी फटी साड़ी के चीथड़ों में उसे लपेटा और बोरी के झूले में उसे एक पेड़ पर टाँग तुरंत काम पर लौट आई। उसे डर था, कहीं उसका रोजगार न छिन जाए। उसे इतनी आशा थी कि उसकी बेटी शाम तक सोती रहेगी।

सुधा का जन्म शहर के सर्वश्रेष्ठ नर्सिंगहोम में हुआ। विशेषज्ञ डॉक्टरों ने उसकी जाँच की, उसे नहला कर साफ मुलायम कपड़े में लपेट कर उसकी माँ के पास ही एक पालने में लिटा दिया गया। जब भी उसे भूख लगी, उसकी माँ ने उसे दूध पिलाया, दुलारा, प्यार किया और लोरियाँ गुनगुनाते हुए उसे सुला दिया। उसके परिवार तथा पारिवारिक मित्रों ने उसके आगमन का जश्न मनाया।

अनु और सुधा का बचपन भी बहुत ही अलग रहा। अनु ने बहुत कम आयु में ही अपनी देखभाल स्वयं करना सीख लिया। उसे भूख और अभाव की पूरी अनुभूति थी। उसने कूड़े के ढेर से खाने योग्य चीजें बीनना तथा सर्दी की रातों में किसी तरह ‘गर्म’ रहना सीख लिया था। वह यह भी जान गई कि बरसात में कैसे सिर छिपाना है तो धागों, पत्थरों या तिनकों के खेल रचा कर किस प्रकार अपना मनोरंजन करना है। वह स्कूल नहीं जा पाई, क्योंकि उसके माँ-बाप प्रवासी मजदूर थे जो काम की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर में भटकते रहते थे।

अनु को नाचना बेहद पसंद था। जब भी वह संगीत की धुन सुनती, थिरकने लगती। वह बहुत ही सुंदर थी, उसकी भाव भंगिमाएँ भी बहुत अर्थपूर्ण थीं। किसी दिन रंगमंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन उसके जीवन की अभिलाषा थी। वह एक महान नृत्यांगना बन सकती थी। किंतु उसे बारह वर्ष की आयु में काम करना शुरू करना पड़ा। उसे अपने माँ-बाप के साथ अमीरों के लिए भवन बनाने के काम से रोजी कमाने के लिए जुट जाना पड़ा, एेसे मकान बनाने में जिनमें वह स्वयं कभी नहीं रह पाएगी।

सुधा को एक श्रेष्ठ बाल विद्यालय में भेजा गया, जहाँ उसने खेल खेल में ही पढ़ना, लिखना और गिनना सीख लिया। वह नक्षत्रशालाओं, संग्रहालयों, राष्ट्रीय उद्यान आदि के भ्रमण-दर्शन पर भी गई। फिर वह एक बहुत अच्छे स्कूल गई। उसे चित्रकारी से लगाव था तो उसके लिए एक प्रख्यात चित्रकार से प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। उसने आगे चलकर एक ललित कला महाविद्यालय में प्रवेश पाया और आज वह एक प्रख्यात चित्रकार बन चुकी हैै।

4.2 निर्धन कौन हैं?

आपने देखा होगा, प्रायः सभी क्षेत्रों-गाँवों और शहरों में कुछ लोग धनी तो कुछ निर्धन होते हैं। बॉक्स 4.1 में अनु और सुधा की कहानी पढ़ें। उनके जीवन विषमताओं के चरम बिंदुओं के उदाहरण कहे जा सकते हैं। एेसे लोग भी हैं जो इन दोनों चरम बिंदुओं के बीच जीवन निर्वाह कर रहे हैं।

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चित्र 4.2 अनेक निर्धन बच्चे घरों, झोंपड़ियों में रहते हैं

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चित्र 4.3 अधिकांश कृषि मजदूर निर्धन होते हैं

रेहड़ीवाले, गली में काम करने वाले मोची, मालाएँ गूँथने वाली महिलाएँ, कागज़-कतरन बीनने वाले, फेरी वाले, भिखारी आदि शहरी क्षेत्रों के अति निर्धन और जोखिम भरा जीवन व्यतीत करने वाले वर्ग हैं। निर्धन लोगों की परिसंपत्तियाँ बहुत कम होती हैं और ये कच्चे घरों में रहते हैं, जिनकी दीवारें (धूप में सूखी) मिट्टी की तो छतें घास, तिनकों, बाँस और कमजोर लकड़ियों की बनी होती हैं। इनमें से भी जो बहुत निर्धन हैं, उनके पास तो एेसे घर भी नहीं होते। ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनों के पास प्रायः भूमि भी नहीं होती। यदि किसी के पास भूमि हो भी तो वह सूखी और बंजर होती है। कितनों को ही दिन में दो बार भोजन भी नहीं मिल पाता। निर्धनतम परिवारों के जीवन का शाश्वत सत्य भूख और भुखमरी होती है। निर्धन बुनियादी साक्षरता तथा कौशल से भी वंचित रह जाते हैं। इसी कारण उनके लिए आर्थिक अवसर अत्यंत सीमित रह जाते हैं। निर्धन श्रमिकों के रोजगार भी निश्चित नहीं होते। समाज के निर्धन वर्गाें में कुपोषण बहुत ही गंभीर स्तर तक पहुँचा हुआ होता है। अस्वस्थता, अपंगता और गंभीर बीमारियाँ आदि उन्हें शारीरिक रूप से कमजोर बना देती हैं। वे साहूकारों से उधार लेने को विवश होते हैं तथा साहूकार जो उनसे ब्याज की ऊँची दरें वसूल करते हैं, उन्हें जीवनपर्यंत ऋण ग्रस्तता से मुक्त नहीं होने देते। निर्धन का जीवन नित्त जोखिम भरा रहता है। नियोक्ताओं से अपनी कानून द्वारा निर्धारित मज़दूरी बढ़ाने के बारे में बात नहीं कर पाते और इनका शोषण चलता रहता है। अधिकांश निर्धन परिवारों को बिजली उपलब्ध नहीं होती। वे प्रायः लकड़ी और उपलों की आग पर ही अपना खाना पकाते हैं। निर्धन वर्गाें में से अधिकांश को पीने का स्वच्छ सुरक्षित पानी भी सुलभ नहीं होता। लाभपूर्ण रोजगार में भागीदारी में स्त्री-पुरुष के बीच बहुत बड़ी असमानता भी साफ दिखाई देती है। शिक्षा सुविधाओं की उपलब्धता और परिवार की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी भी इसी असमानता से ग्रस्त रहती है। निर्धन महिलाओं को मातृत्व काल में भी कम देखभाल ही प्राप्त हो पाती है। उनके बच्चों के स्वस्थ जन्म लेने और फिर दीर्घ जीवन धारण की संभावनाएँ भी क्षीण होती हैं।

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बॉक्स 4.2 निर्धनता क्या है

दो अध्येताओं, शाहीन रफी खान और डैमियन किल्लेन ने निर्धनता की स्थिति को बहुत ही संक्षेप में व्यक्त किया हैः निर्धनता भूख है। निर्धनता बीमार होना है और डॉक्टर से न दिखा पाने की विवशता है। निर्धनता स्कूल में न जा पाने और निरक्षर रह जाने का नाम है। निर्धनता बेरोजगारी है। निर्धनता भविष्य के प्रति भय है, दिन में एक बार भोजन पाना है। निर्धनता अपने बच्चे को उस बीमारी से मरते देखने को कहते हैं, जो अस्वच्छ पानी पीने से होती है। निर्धनता शक्ति, प्रतिनिधित्व हीनता और स्वतंत्रता की हीनता का नाम है। आपके क्या विचार हैं?

अर्थशास्त्री निर्धनों की पहचान उनके व्यवसाय तथा संपत्ति स्वामित्व के आधार पर करते हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण निर्धन प्रायः भूमिहीन कृषि श्रमिक होते हैं या फिर वे बहुत ही छोटी जोतों के स्वामी किसान होते हैं। वे एेसे भूमिहीन मजदूर भी हो सकते हैं, जो विभिन्न प्रकार के गैर-कृषि कार्य करते हैं या किसी और की जमीन पर आसामी काश्तकार की भाँति खेती करते हैं। शहरी क्षेत्रों में अधिकांश निर्धन वही हैं जो गाँवों से वैकल्पिक रोजगार और निर्वाह की तलाश में शहर चले आए हैं। ये लोग तरह-तरह के अनियमित काम करते हैं। यही स्वनियोजित लोग सड़कों के किनारे, गलियों में घूम-घूम कर कुछ सामान बेचते दिखाई देते हैं।

4.3 निर्धनों की पहचान कैसे होती है?

यदि भारत की निर्धनता की समस्या का समाधान करना है, तो उसे निर्धनता के कारणों का उन्मूलन करने के लिए व्यावहारिक और धारणीय रण-नीतियाँ बनानी होंगी तथा निर्धन जन-समुदाय को उनकी दारुण दशा से उबारने के लिए उपयुक्त योजनाएँ बनानी होंगी। किंतु इस प्रकार की योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए सरकार को निर्धनों की पहचान करने योग्य होना होगा। इसके लिए निर्धनता और उसके कारकों को मापने का एक उपयुक्त स्केल बनाना होगा और उसके लिए कसौटियों व विधियों का बहुत ध्यानपूर्वक चयन करना होगा।

स्वतंत्रता पूर्व भारत में सबसे पहले दादा भाई नौरोजी ने निर्धनता-रेखा की अवधारणा पर विचार किया था। उन्होंने जेल में कैदियों को दिए जा रहे भोजन का बाज़ार कीमतों पर मूल्यांकन कर ‘जेल की निर्वाह लागत’ का आकलन किया था, किंतु बंदीगृहों में तो प्रायः वयस्क व्यक्ति ही होते हैं जबकि वास्तविक समाज में बच्चे भी सम्मिलित हैं। अतः इस जेल निर्वाह लागत में कुछ परिवर्तन कर उन्होंने निर्धनता रेखा तक पहुँचने का प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने यह माना कि कुल जनसंख्या में एक तिहाई संख्या बच्चों की होती है, जिनमें से आधे बच्चों का उपभोग बहुत कम होता है तथा शेष आधे का भोजन भी वयस्कों से आधा ही रहता है। इस प्रकार उन्होंने 3/4 के सूत्र की रचना की। अर्थात्ः 1/6 × 0 + 1/6 × 1/2 + 2/3 × 1 = 1/12 + 2/3 = 1+8/12 = 9/12 = 3/4। जनसंख्या के इन तीन खंडों के उपभोग के भारित औसत को औसत निर्धनता रेखा का मान माना गया था। यह जेल के वयस्कों की निर्वाह लागत का 3/4 अंश था।

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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से भारत में निर्धन जनानुपात के आकलन के कई प्रयास हुए हैं। योजना आयोग (जिसे अब नीति आयोग के नाम से जाना जाता है) द्वारा इस कार्य के लिए 1962 में एक अध्ययन दल का गठन किया गया था। वर्ष 1979 में एक अन्य दल ‘प्रभावी उपभोग माँग और न्यूनतम आवश्यकता अनुमानन कार्य-बल’ गठित हुआ। एक ‘विशेषज्ञ दल’ का गठन इसी कार्य के लिए 1989 और 2005 में भी किया गया। योजना आयोग के अतिरिक्त अनेक अर्थशास्त्रियों ने व्यक्तिगत रूप से भी एेसी ही प्रक्रियाओं के प्रयास किए। निर्धनता को परिभाषित करने की दृष्टि से हम जनसंख्या को दो वर्गाें में बाँट सकते हैं, निर्धन तथा गैर-निर्धन और निर्धनता रेखा इन दोनों वर्गाें को अलग करती है। यद्यपि निर्धन कई प्रकार के होते हैंः पूर्णतः निर्धन, बहुत निर्धन और निर्धन। इसी प्रकार गैर-निर्धन वर्ग में भी कई उपवर्ग हैः मध्यवर्ग, उच्च मध्यवर्ग, धनी, बहुत धनी और पूर्णतः धनी। इन सभी उप वर्गाें को एक निरंतर सरल रेखा पर बहुत निर्धन से लेकर पूर्णतः धनी के रूप में कल्पना करें जिसे निर्धनता रेखा निर्धन और गैर-निर्धन के बीच विभाजित करती है।

निर्धनता का वर्गीकरणः निर्धनता के वर्गीकरण की भी कई विधियाँ हैं। एक विधि के अनुसार तो हम सदा निर्धन और सामान्यतः निर्धन व्यक्तियों में भी भेद कर सकते हैं। इस सामान्यतः निर्धन वर्ग में वे व्यक्ति आते हैं जिनके पास कभी-कभी कुछ धन भी आ जाता है (उदाहरणार्थ, अनियत मजदूर)। इन दोनों वर्गाें को मिलाकर हम चिरकालिक निर्धन वर्ग का नाम देते हैं। एक एेसा वर्ग भी है जो निरंतर निर्धन और गैर-निर्धन वर्गाें के बीच झूलता रहता है (उदाहरणार्थ, छोटे किसान और मौसमी मजदूर) तथा यदाकदा निर्धन जो अधिकांश समय धनी रहते हैं परंतु कभी-कभी उनका भाग्य साथ नहीं देता। इन्हें अल्पकालिक निर्धन कहते हैं। इसके अतिरिक्त वे लोग जो कभी निर्धन नहीं होते उन्हें गैर-निर्धन कहते हैं (देखें चार्ट 4.2)।

निर्धनता रेखाः आइए, अब इसका परीक्षण करें कि निर्धनता-रेखा कैसे निर्धारित होती है। निर्धनता मापन की कई विधियाँ होती हैं। एक विधि तो न्यूनतम कैलोरी उपभोग के मौद्रिक मान (प्रति व्यक्ति व्यय) का निर्धारण करने की विधि है। इसके अनुसार ग्रामीण व्यक्ति को 2400 कैलोरी तथा शहरी व्यक्ति को 2100 कैलोरी का न्यूनतम उपभोग मिलना चाहिए। वर्ष 2011-12 में निर्धनता-रेखा को ग्रामीण क्षेत्रों में ₹816 प्रतिव्यक्ति प्रति माह उपभोग के रूप में तथा शहरी क्षेत्रों में ₹1000 प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह के रूप में परिभाषित किया गया।

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चित्र 4.3 स्वच्छ पेय जल और अव जल निःसरण व्यवस्था तो सभी के लिए आवश्यक है

यद्यपि हमारी सरकार निर्धन परिवारों की पहचान के लिए मासिक प्रतिव्यक्ति उपभोग व्यय (MPCE) को परिवार की आय के द्योतक के रूप में प्रयोग करती है, पर क्या आप इस विधि को देश में निर्धन परिवारों की पहचान का उपयुक्त तरीका मानेंगे?

अनेक अर्थशास्त्रियों का मत है कि इस तंत्र में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह सभी निर्धनों को एक वर्ग में मान लेता है और अति निर्धनों और अन्य निर्धनों में कोई अंतर नहीं करता (चार्ट 4.2 देखें)। यह विधि भी मुख्यतः भोजन और कुछ चुनी हुई वस्तुओं पर व्यय को आय का प्रतीक मानती है, पर अर्थशास्त्रियों को इस बात पर भी आपत्ति है। इससे सरकार की सहायता के पात्र व्यक्तियों के समूचे समूह का निर्धारण तो हो जाता है, पर इसकी पहचान नहीं हो पाती कि सबसे अधिक सहायता की आवश्यकता किन निर्धनों को है।

आय और संपत्ति स्वामित्व के अतिरिक्त भी कई और कारक हैं जो निर्धनता से संबंधित माने जाते हैं, जैसे बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पेय जल और स्वच्छता आदि की सुलभता। वर्तमान में निर्धनता रेखा का निर्धारण करने वाला तंत्र इन सामाजिक कारकों पर भी ध्यान नहीं देता जो निर्धनता को जन्म देकर इसे निरंतर बनाए रखते हैं जैसे, निरक्षता, अस्वस्थता, संसाधनों की अनुपलब्धता, भेदभाव या नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रताओं का अभाव। निर्धनता निवारण योजनाओं का ध्येय तो मानवीय जीवन में सर्वांगीण सुधार होना चाहिए। उसमें ये बातें अवश्य होनी चाहिए कि मनुष्य क्या बन सकता है और क्या कर सकता है, अर्थात् अधिक स्वस्थ, सुपोषित तथा ज्ञान संपन्न हो सामाजिक जीवन में भागीदारी कर सके। इस दृष्टि से विकास का अर्थ होगा व्यक्ति के कर्म पथ की बाधाओं का निवारण- जैसे उसे निरक्षरता, अस्वस्थता, संसाधनहीनता नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के अभाव आदि से मुक्ति दिलाना।

2088.pngइन्हें कीजिए

► खंड 4.2 तथा 4.3 में आपने पढ़ा है कि निर्धनों की पहचान केवल उनकी कम आय और व्यय ही नहीं है। इसके और कई लक्षण भी हैंः जैसे, भूमि, निवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, स्वच्छता आदि के अभाव। साथ ही भेदभावपूर्ण व्यवहार आदि भी निर्धनता का ही एक लक्षण है। चर्चा करें कि एेसी वैकल्पिक निर्धनता-रेखा, जो इन सभी कारकों को समाहित कर रही हो, की रचना कैसे की जा सकेगी।

► निर्धनता-रेखा की परिभाषा के आधार पर यह जानने का प्रयास करें कि आपके आस-पास के क्षेत्र में घरेलू नौकर, धोबी, अखबार वाले आदि निर्धनता रेखा से ऊपर हैं या नहीं।


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यद्यपि हमारी सरकार का दावा है कि संवृद्धि की उच्च दर, कृषि उत्पादन में वृद्धि, ग्रामीण क्षेत्रों में रो\ज़गार और 1990 के दशक के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों ने निर्धनता के स्तर में काफी कमी की है, किंतु अनेक अर्थशास्त्रियों को सरकार के इस दावे पर संदेह है। उनका मत है कि जिस प्रकार आँकड़े एकत्र किए जाते हैं, अर्थात् जिन वस्तुओं को उपभोग समूह (टोकरी) में शामिल किया जाता है, निर्धनता रेखा के आकलन की कार्यविधि और निर्धनों की संख्या में भी (भारत में निर्धनों की संख्या कम करके दिखाने के लिए) हेराफेरी की जाती है।

निर्धनता के आकलन की सरकारी विधियों की सीमाओं के कारण अनेक विद्वानों ने वैकल्पिक विधियों का प्रयोग करने के प्रयास किए हैं। इनमें से नॉबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्मत्य सेन ने एक सूचकांक का विकास किया जिसे ‘सेन-सूचकांक’ का नाम दिया जाता है। इसके अतिरिक्त ‘निर्धनता अंतराल सूचकांक’ और ‘वर्गित निर्धनता अंतराल’ उपकरणों का भी प्रयोग किया गया है। इनके विषय में आप आगे की कक्षाओं में विस्तार से जान पाएँगे।

4.4 भारत में निर्धनों की संख्या

जब निर्धनों की संख्या का अनुमान निर्धनता-रेखा से नीचे के जनानुपात द्वारा किया जाता है तो उसे हम ‘व्यक्ति गणना अनुपात’ विधि कहते हैं।

चार्ट 4.4ः कुछ बड़े राज्यों में निर्धनता रेखा से नीचे जनसंख्या 1973-2012 (%)

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नोटः उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड, बिहार के साथ झारखंड तथा मध्य प्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ के आँकड़े भी शामिल हैं।

आप संभवतः, भारत में बसे निर्धनों की कुल संख्या जानना चाहेंगे। वे कहाँ रहते हैं और क्या पिछले कुछ वर्षाें में उनकी संख्या या अनुपात में कमी आई है या नहीं। जब इस प्रकार की तुलना सामान्यतः अनुपातों और प्रतिशतों के रूप में करते हैं, तब हमें व्यक्तियों की निर्धनता के विभिन्न स्तरों और विभिन्न प्रांतों में समय-समय पर उनके प्रसार की जानकारी प्राप्त होती है।

निर्धनता विषयक आधिकारिक आँकड़े नीति आयोग उपलब्ध कराता है। ये आँकड़े राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (यह संगठन अब राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय बन गया है) द्वारा उपभोग व्यय के आधार पर आकलित किए जाते हैं। चार्ट 4.3 में 1973-2012 की अवधि में भारत में निर्धनों की संख्या तथा जनसंख्या में उनका अनुपात दर्शाया गया है। वर्ष 1973-74 में 320 मिलियन से अधिक व्यक्ति निर्धनता की रेखा से नीचे थे। वर्ष 2011-12 में यह संख्या कम होकर 270 मिलियन रह गई। आनुपातिक दृष्टि से, 1973-74 में कुल जनसंख्या का 55 प्रतिशत निर्धनता रेखा से नीचे था। यह अनुपात वर्ष 2011-12 में 22 प्रतिशत रह गया। 1973-74 में 80 प्रतिशत से अधिक निर्धन ग्रामीण क्षेत्रों में बसे थे, यह स्थिति 2011-12 में भी नहीं बदली। इसका अर्थ है कि भारत में तीन-चौथाई से अधिक निर्धन गाँवों में ही बसे हैं। इस स्थिति के बारे में आप क्या सोचते हैं? ग्रामीण क्षेत्रों की निर्धनता अब शहरों की ओर भी आ गई है। हम एेसा कैसे कह सकते हैं?

2000 दशक के आरंभ में जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनों की निरपेक्ष संख्या में कमी आई है, वहीं शहरी क्षेत्रों में उनकी संख्या में कुछ वृद्धि दिखाई पड़ी है। वैसे शहरी और ग्रामीण, दोनों ही क्षेत्रों में निर्धनों का संख्या-अनुपात निरंतर कम हुआ है। आप देख सकते हैं कि 1973-2012 की अवधि में निर्धनों की संख्या व अनुपात दोनों कम हुए हैं, किंतु इन दोनों परिमाणों की गिरावट का स्वरूप बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहा है। देश में निर्धनता की निरपेक्ष संख्या की तुलना में यह अनुपात बहुत धीमी गति से नीचे आ रहा है। यहाँ आप यह भी देखेंगे कि जहाँ शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धनता की संख्याओं का अंतर बिल्कुल कम नहीं हुआ, वहीं अनुपात में अंतर 1993–94 तक निरंतर पूर्ववत् बना रहा। और 2011-12 में बढ़ गया।

गरीबी में राज्य स्तर के रुझान चार्ट 4.4 में दिखाए गए हैं। चार्ट में दो पंक्तियाँ राष्ट्रीय गरीबी के स्तर का संकेत करती हैं। नीचे से पहली पंक्ति 2011-12 के दौरान गरीबी के स्तर का संकेत है और दूसरी पंक्ति वर्ष 1973-74। इसका मतलब है कि 1973-2012 के दौरान भारत में गरीबों का अनुपात 55 से 22 आ गया है, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा- 1973-74 में गरीबों का एक बड़ा वर्ग छह राज्यों में है। 1973-2012 के दौरान, कई भारतीय राज्यों ने काफी हद तक गरीबी के स्तर को कम कर दिया। फिर भी, चार राज्यों में गरीबी का स्तर - ओडिशा, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश में अभी भी राष्ट्रीय गरीबी के स्तर से ऊपर है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु ने अन्य राज्यों की तुलना में काफी बेहतर गरीबी के स्तर को कम किया है। कैसे वे अन्य राज्यों की तुलना में काफी बेहतर करने के लिए सक्षम हुए हैं?

4.5 निर्धनता क्यों होती है?

समग्र निर्धनता वैयक्तिक निर्धनता का योग ही है। निर्धनता की व्याख्या अर्थव्यवस्था में व्याप्त इन समस्याओं के कारण भी हो सकती हैः
(क) निम्न पूँजी निर्माण (ख) आधारिक संरचनाओं का अभाव (ग) माँग का अभाव (घ) जनसंख्या का दबाव और (ङ) सामाजिक/कल्याण व्यवस्था का अभाव।

आपने पहले अध्याय में भारत में ब्रिटिश शासन के बारे में पढ़ा। वैसे तो उस शासन व्यवस्था के प्रभावों के विषय में अभी भी विवाद चल रहा है-पर भारत की अर्थव्यवस्था और जन सामान्य के जीवन स्तर पर उसके बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़े। अंग्रेजी राज के समय बड़े स्तर पर वि-औद्योगीकरण हुआ था। इंग्लैंड में लंकाशायर विनिर्मित सूती कपड़े के आयात ने काफी मात्रा में स्थानीय उत्पादन को विस्थापित कर दिया और भारत कपड़े के स्थान पर सूती धागों का निर्यातक होकर रह गया।

अंग्रेज़ी राज की अवधि के दौरान 70 प्रतिशत से अधिक भारतीय कृषि पर आश्रित थे, अतः उस क्षेत्रक में जीवन-निर्वाह पर, अन्य बातों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी नीतियों ने ग्रामीण करों के भार को बहुत अधिक कर दिया था जिससे व्यापारी और महाजनों को बड़े भू-स्वामी बनने में सहायता मिली। ब्रिटिश राज में भारत ने खाद्यान्नों का निर्यात आरंभ कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1875 से 1900 की अवधि के अकालों के दौरान 260 लाख व्यक्तियों की मृत्यु हो गई।

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चित्र 4.4 स्वरोजगार की गुणवत्ता का निम्न स्तर निर्धनता का पोषक है

भारत में अंग्रेज़ी राज का मुख्य उद्देश्य तो यही था कि उन्हें भारत में अपने निर्यात का बाज़ार मिल जाए, भारत अंग्रेज़ाें के ऋणों का भुगतान करता रहे तथा अंग्रेज़ी साम्राज्यवादी सेनाओं के लिए मानव-शक्ति प्रदान करता रहे।

ब्रिटिशराज ने करोड़ाें भारतीयों को निर्धन बना दिया। हमारे प्राकृतिक संसाधनाें को लूटा गया, उद्योगाें को सस्ते दामाें पर अपना उत्पादन अंग्रेज़ों के हाथाें बेचना पड़ा और हमारे खाद्यान्नों का भी निर्यात कर दिया गया। कितने ही लोग अकाल और भूख के कारण मर गए। 1857-58 में स्थानीय नेताओं को हटाने, किसानाें पर भारी कर थोपने तथा और अन्य आक्रोशों ने सिपाहियों द्वारा अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ विद्रोह का रूप ले लिया।

आज भी कृषि ही ग्रामीण जनता की जीविका का मुख्य आधार है तथा भूमि ही उनकी प्राथमिक परिसंपत्ति है, भू-स्वामित्व को ही भौतिक संपन्नता का प्रमुख निर्धारक माना जाता है और कहा जाता है कि जिसके पास जमीन है, वही जीवन स्तर सुधारने में समर्थ हो सकता है।

स्वतंत्रता के बाद से सरकार ने भूमि के पुनर्वितरण के प्रयास किए हैं। जिनके पास अधिक भूमि थी, उनसे भूमि ले कर उसे भूमिहीनों के बीच बाँटा गया जो अपनी ही भूमि पर मजदूरों के रूप में कार्य करते थे। किंतु इन प्रयासों को सीमित सफलता ही मिल पायी है, क्योंकि अधिकांश किसानों के पास जो खेत थे वे बहुत छोटे थे। उनके पास भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए धन और योग्यता का अभाव था और जोतों का आकार व्यावहारिक रूप से बहुत छोटा था। अधिकांश भारतीय राज्य भूमि के पुनर्वितरण की नीती को लागू करने में भी असफल रहे हैं। ग्रामीण भारत में बसे निर्धन अधिकांशतः बहुत छोटे किसान ही हैं। उनकी भूमि आमतौर पर कम उपजाऊ और वर्षा पर निर्भर होती है। उनकी जीविका निर्वाह-फसलों पर और कभी-कभी पशुधन पर निर्भर होती है। जनसंख्या की तीव्र वृद्धि और रोजगार के वैकल्पिक स्रोतों के अभाव में कृषि के लिए प्रति व्यक्ति भूमि की उपलब्धता धीरे-धीरे घट रही है, जिससे जोतों का विखंडन हो रहा है। इन छोटी-छोटी जोतों से प्राप्त आय से परिवार की मूलभूत आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पातीं। आपने सुना होगा कि कृषि और अन्य घरेलू आवश्यकताओं हेतु लिए गए ऋणों का भुगतान न कर पाने के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं क्योंकि उनकी फसलें सूखे या प्राकृतिक आपदाओं के कारण नष्ट हो गई हैं (देखें बॉक्स 4.3)।

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चित्र 4.5 उच्च गुणवत्ता युत्तη रोजगार अभी भी निर्धनाें के लिए एक स्वप्न बना हुआ है

2088.pngइन्हें कीजिए

► आप अपने पड़ोस के धोबी और नाइयों को देखते होंगे। यह जानने का प्रयास करें कि वे यह काम क्याें कर रहे हैं। वे अपने परिवार के साथ कहाँ रहते हैं, दिन में कितनी बार उन्हें खाना मिल पाता है, उनकी भौतिक संपत्ति क्या है और वे नौकरी क्याें नहीं कर पाते। इस तरह एकत्र जानकारी पर कक्षा में चर्चा करें।

► ग्रामीण और शहरी लोगाें के कार्यों की अलग-अलग सूचियाँ बनाइए। आप गैर-निर्धन वर्गों के सदस्याें की गतिविधियाें की भी सूचियाँ बना सकते हैं। अपनी कक्षा में उन सूचियाें की तुलना कर यह जानने का प्रयास करें कि निर्धन लोग गैर-निर्धन लोगों द्वारा किए जाने वाले कार्य क्याें नहीं कर पाते?


बॉक्स 4.3 कपास किसानाें की आपदा

अनेक छोटे भूस्वामी किसान परिवार और बुनकर वैश्वीकरण से जुड़े आहतों के कारण ऋणपाश में फँसते जा रहे हैं। भारत के अपेक्षाकृत प्रगतिशील प्रांताें में भी आय उपार्जन के अवसराें का प्रायः अभाव ही है। यदि परिवार अपनी परिसंपत्ति बेचने, उधार लेने या अन्य रोजगाराें के सहारे आय सृजन करने में सफल रहे तो कदाचित उनकी समस्याएँ भी अस्थाई सिद्ध हो जाएंँ। किंतु यदि किसी के पास बेचने को कुछ नहीं बचा हो, कहीं उधार पा सकने की संभावना भी नहीं हो - या फिर कोई बहुत ही उच्च दर के ब्याज पर उधार लेकर ऋण पाश में फँस चुका हो, तो ये परिवार को निर्धनता की रेखा से नीचे धकेल देते हैं। इसी संकट का गंभीरतम आयाम किसानाें की बड़े स्तर पर आत्महत्याएँ हैं। सन् 2001 से भारत में मुख्यतः महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश में 12,000 से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

भारत विश्व का सबसे बड़ा कपास उत्पादक क्षेत्र है, जहाँ वर्ष 2017-2018 में 125 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती होती थी। किंतु यहाँ कपास की पैदावार मात्र 476 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। इस नाते भारत विश्व के कपास उत्पादकाें की गणना में तीसरे क्रम पर आता है। उच्च उत्पादन लागतें, निम्न एवं अस्थिर उत्पादकता, विश्व कीमतों में गिरावट, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य देशों द्वारा अपने कपास उत्पादकों को दी जाने वाली सहायिकी के कारण विश्व उत्पादन में गिरावट, वैश्वीकरण के कारण घरेलू बा\ज़ार के खुलने के कारण आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कपास उत्पादक किसानों को कृषि के क्षेत्र में निराशा और आत्महत्या की विवशता की ओर ले गई। यहाँ प्रश्न लाभ कमाने या उच्च प्रतिफल का नहीं है। ये तो कृषि पर आधारित लाखाें छोटे और सीमांत किसानाें के लिए आजीविका कमाने और जीवित रह पाने की समस्या बन गई है।

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शांताबाई जो नीलकांथ सीताराम खोके की पत्नी हैं, जिन्होंने, यामाता महाराष्ट्र में आत्महत्या की थी।

विद्वानों ने किसानाें की आत्महत्या के लिए विवश करने वाले अनेक कारकाें की व्याख्या की है। ये कारक हैं (क) परंपरागत कृषि से हटकर उच्च उत्पादकता व्यावसायिक खेती की ओर उस समय अग्रसर होना जब कि पर्याप्त तकनीकी सुविधाआें का नितांत अभाव है और सरकार भी अपनी तकनीक प्रसार योजनाआें के माध्यम से किसानाें की सहायता के कार्यक्रमाें को समाप्त कर चुकी है, (ख) पिछले दो दशकाें में कृषि में सार्वजनिक निवेश में निरंतर गिरावट, (ग)अंतर्राष्ट्रीय कंपनियाें के बी\ज़ाें में प्रस्फुटन की निम्न दर और निजी दलालाें द्वारा नकली बीजाें व कीटानाशकाें की पूर्ति, (घ) कीट संक्रमण, अकाल और फसल का विनाश, (ङ) महाजनाें से 36 से लेकर 120 प्रतिशत ब्याज की ऊँची दरों पर लिए गए ऋण, (च) सस्ते आयात के कारण कीमत और लाभों में गिरावट तथा (छ) सिंचाई की सुविधाआें का अभाव जिसने किसानाें को बहुत गहराई से पानी निकालने वाले पंप लगाने के लिए (जो असफल रहा) अति उच्च ब्याज पर उधार लेने को विवश किया है।

स्रोतः ए. के. मेहता, सौरभ घोष, ‘रितु एलाव\ड़ी के सहयोग से किए गए अध्ययन’ वैश्वीकरण, आजीविका की हानि और निर्धनता के पाश में फँसना; अॉल्टरनेटिव इकनॉमिक सर्वे, भारत 2004-05, अॉल्टरनेटिव सर्वे ग्रुप, दानिश बुक्स, दिल्ली तथा पी साईनाथ; स्वैलींग रजिस्टर अॉफ डेथ्स, द हिन्दू, 29 दिसंबर, 2005; शशि आर्य, टाइम्स अॉफ इण्डिया, 25 सितम्बर 2019, पिछले 5 वर्षों में 40 प्रतिशत से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है, फिर भी यह चुनाव का मुद्दा नहीं है।

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अधिकांश सदस्य उभरते हुए रोजगार के अवसरों में इसलिए भागीदारी नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि उनके पास इसके लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल की कमी है। भारत में अधिकांश शहरी निर्धन का एक बड़ा वर्ग वे हैं जिन्होंने रोजगार और जीविकोपार्जन की तलाश में शहरी क्षेत्रों में प्रवसन किया है। औद्योगीकरण इन सबों को काम दे पाने में विफल रहा है। शहरी निर्धन या तो बेरोजगार हैं या अनियत मजदूर हैं, जिन्हें कभी-कभी रोजगार मिलता है। ये अनियत मजदूर समाज के बहुत ही दयनीय सदस्य हैं क्योंकि इनके पास रोजगार सुरक्षा, परिसंपत्तियाँ, वांछित कार्य कौशल, पर्याप्त अवसर तथा निर्वाह के लिए अधिशेष नहीं होते हैं।

अतः निर्धनता का संबंध व्यक्ति के रोजगार के स्वरूप से भी रहता है। बेरोजगारी, अल्परोजगार, कभी-कभी काम मिलना आदि। शहरी व ग्रामीण मजदूरों को ऋण लेने को विवश कर देते हैं उससे उनकी निर्धनता और बढ़ जाती है। ऋण-ग्रस्तता निर्धनता का एक महत्वपूर्ण कारक है।

खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं के दाम विलासिता की वस्तुओं से कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहे हैं। इससे भी निम्न आय वर्गों की कठिनाइयाँ और अभाव और बढ़ जाते हैं। आय और परिसंपत्तियों के वितरण की विषमताएँ भी निर्धनता की समस्या को बनाए रखने में अपना योगदान दे रही हैं।

इन सभी कारकों ने कुल मिलाकर समाज को दो वर्गों में विभाजित कर दिया हैः वे जो उत्पादक संसाधनों के स्वामी हैं और बहुत अच्छी आय कमाते हैं तथा वे जिनके पास जीवित रहने के लिए केवल अपना श्रम है। भारत में निर्धन-धनी के बीच की खाई निरंतर विस्तृत होती जा रही है। निर्धनता देश के समक्ष एक एेसी बहुआयामी चुनौती है, जिसका युद्ध स्तर पर सामना करने की आवश्यकता है।

4.6 निर्धनता निवारण के लिए नीतियाँ और कार्यक्रम

भारतीय संविधान और पंचवर्षीय योजनाओं ने सामाजिक न्याय को सरकार की विकास रण-नीतियों का प्राथमिक उद्देश्य माना है। पहली पंचवर्षीय योजना (1951–56) के अनुसार वर्तमान परिस्थितियों में आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की अंतः प्रेरणा का उदय तो निर्धनता और आय, संपत्ति तथा अवसरों की असमानताओं से होता है। दूसरी योजना (1956-61) में भी कहा गया है, ‘‘आर्थिक विकास के अधिकाधिक लाभ समाज के अपेक्षाकृत कम भाग्यशाली वर्गों तक पहुँचने चाहिए’’। प्रायः सभी नीति विषयक दस्तावेजों में निर्धनता निवारण और इस दिशा में सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली रण-नीतियों की चर्चा हुई है।

सरकार ने निर्धनता निवारण के लिए त्रि-आयामी नीति अपनाई। पहली संवृद्धि आधारित रण-नीति है। यह इस आशा पर आधारित है कि आर्थिक संवृद्धि के (अर्थात् सकल घरेलू उत्पाद और प्रतिव्यक्ति आय में तीव्र वृद्धि के) प्रभाव समाज के सभी वर्गो तक पहुँच जाएँगे - ये समाज के निर्धनतम वर्गों तक भी धीरे-धीरे पहुँच पायेंगे। 1950 से 1960 के दशक के पूर्वार्द्ध में हमारी योजनाओं का मुख्य उद्देश्य यही था। यह माना जा रहा था कि तीव्र दर से औद्योगिक विकास और चुने हुए क्षेत्राें में हरित क्रांति के माध्यम से कृषि का पूर्ण काया-कल्प निश्चय ही समाज के अधिक पिछड़े वर्गों को लाभान्वित करेगा। आपने अध्याय 2 तथा 3 में पढ़ा था कि संवृद्धि और कृषि तथा उद्योग क्षेत्राें में सर्वांगीण वृद्धि अधिक प्रभावशाली नहीं रही हैं। जनसंख्या वृद्धि के परिणामस्वरूप प्रतिव्यक्ति आय में बहुत कमी हुई, इन्हीं कारणाें से धनी और निर्धन के बीच की खाई और भी बढ़ गई। हरित क्रांति ने विभिन्न भौगोलिक क्षेत्राें के बीच तथा छोटे और बड़े किसानों के बीच का फासला बहुत ब\ढ़ा दिया है। भूमि के पुनर्वितरण की इच्छा तथा योग्यता का अभाव था। अर्थशास्त्रियों के कथनानुसार आर्थिक संवृद्धि के लाभ निर्धनों तक नहीं पहुँच पाए। निर्धनों के विकास के लिए विकल्पों की खोज के क्रम में नीति निर्धारकों को एेसा लगा कि अतिरिक्त परिसंपत्तियों और कार्य-सृजन के साधनों द्वारा निर्धनों के लिए आय और रोजगार को बढ़ाया जा सकता है। एेसा विशेष निर्धनता निवारण कार्यक्रमाें के माध्यम से ही हो पाएगा। इस दूसरी नीति को तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) से आरंभ किया गया और तब से धीरे-धीरे बढ़ाया गया। इसी क्रम में 1970 के दशक में चलाया गया ‘काम के बदले अनाज’ एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम रहा।

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चित्र 4.6 ‘काम के बदले अनाज’ कार्यक्रम के अंतर्गत रोजगार

इस दिशा में चल रहे अधिकतर गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम दसवीं पंचवर्षीय योजना
की विकास दृष्टि पर आधारित हैं। अब स्वरोजगार तथा मजदूरी पर आधारित रोजगार कार्यक्रमों को निर्धनता निवारण का मुख्य माध्यम माना जा रहा है। सन् 2008 तक लागू किए गए स्वरोजगार कार्यक्रमों के उदाहरण थे, ग्रामीण रोजगार सृजन कार्यक्रम (
REGP), प्रधानमंत्री की रोजगार योजना (PMRY) तथा स्वर्णजयंती शहरी रोजगार योजना (SJSRY)। पहले कार्यक्रम का उद्देश्य शहरों में स्वरोजगार के अवसरों का सृजन था। इसे खादी ग्रामोद्योग आयोग के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा था। इसके अंतर्गत छोटे उद्योग लगाने के लिए बैंक ऋणों के माध्यम से वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराया जाता है। प्रधानमंत्री रोजगार योजना के अंतर्गत ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में निम्न आय वर्ग परिवारों के शिक्षित बेरोजगार किसी भी प्रकार के उद्यम को शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त कर सकते हैं। स्वर्ण जयंती शहरी रोजगार योजना का ध्येय शहरी क्षेत्रों में स्वरोजगार तथा मजदूरी पर रोजगार के अधिक अवसरों का सृजन था। यह अब राष्ट्रीय ग्रामीण जीविका मिशन (रा.ग्रा.जी.मि.) के रूप में पुनर्स्थापित हो गया। इन सभी कार्यक्रमों को प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम में सम्मिलित किया गया है (PMEGP)।

पहले के स्वरोजगार कार्यक्रमों के अंतर्गत परिवारों और व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती थी। पर 1990 के दशक से इस नीति में बदलाव आया है। अब इन कार्यक्रमों का लाभ चाहने वालों को स्वयं सहायता समूहों का गठन करने के लिए प्रेरित किया जाता है। प्रारंभ में उन्हें अपनी ही बचतों को एकत्र कर परस्पर उधार देने को प्रोत्साहित किया जाता है। बाद में सरकार बैंकों के माध्यम से उन स्वयं-सहायता समूहों को आंशिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। ये समूह इसका निश्चय करते हैं कि स्वरोजगार कार्यक्रम के लिए किसे ऋण दिया जाय। स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना एेसा ही एक कार्यक्रम है। इसी तरह का एक कार्यक्रम राष्ट्रीय शहरी स्वरोजगार योजना है। यह योजना अब दीनदयाल उपाध्याय अंत्योदय योजना के रूप में जानी जाती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अकुशल निर्धन लोगों के लिए मजदूरी पर रोजगार के सृजन के लिए भी सरकार के पास अनेक कार्यक्रम हैं। अगस्त, 2005 में संसद में एक विधेयक पारित कर प्रत्येक ग्रामीण परिवार के एक इच्छुक वयस्क को वर्ष में 100 दिनों तक के लिए अकुशल शारीरिक श्रम कार्य उपलब्ध कराने की गारंटी देने का निर्णय किया गया है। इसे महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 (मनरेगा) का नाम दिया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत जो भी निर्धन निर्धारित न्यूनतम मजदूरी पर काम करने को तैयार हो, वह जहाँ यह कार्यक्रम चलाया जा रहा हो, वहाँ रिपोर्ट कर सकता है। 2018-19 में, 5 करोड़ परिवारों को इस अधिनियम के अंतर्गत रोजगार के अवसर दिये गये।

निर्धनता निवारण की दिशा में तीसरा आयाम लोगों को न्यूनतम आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना है। भारत विश्व के उन प्रथम देशों में से एक है जहाँ एेसा सोचा गया। सस्ता अनाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल पूर्ति और स्वच्छता आदि सामाजिक उपयोग आवश्यकताओं पर सार्वजनिक व्यय लोगों के जीवन स्तर को सुधार सकता है। इस विधि के अंतर्गत निर्धनों के उपभोग, रोजगार अवसरों का सृजन तथा स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार की संपूर्ति की जायेगी। यह विधि पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में अपनाई गई है। उस योजना के दस्तावेज में कहा गया है ‘‘रोजगार के अवसरों में विस्तार के बाद भी निर्धन व्यक्ति अपने लिए सभी आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं को नहीं खरीद पाएँगे। एक निश्चित सामाजिक न्यूनतम स्तर तक उनके उपभोग और निवेश को समर्थन देना निम्नलिखित रूपों में अनिवार्य रहेगा–अनिवार्य खाद्यान्न, पेय-जल, शिक्षा, पोषण-स्वास्थ्य सेवाएँ, संचार और विद्युत पूर्तिं।’’ निर्धनों के खाद्य उपभोग और पोषण स्तर को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख कार्यक्रम ये हैंः सार्वजनिक वितरण व्यवस्था, एकीकृत बाल विकास योजना तथा मध्यावकाश भोजन योजना। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और वाल्मीकि अंबेडकर आवास योजना आधारिक संरचना और आवास की उपलब्धि की दिशा में किए जा रहे प्रयास हैं। अब हम संक्षेप में यह तो कह ही सकते हैं कि भारत में अनेक दिशाओं में संतोषजनक प्रगति हुई है।

सरकार के पास विशेष समूहाें की सहायता के लिए कुछ अन्य सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम भी हैं। केंद्र सरकार इसी शृंखला में राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम चला रही है। इसके अंतर्गत निराश्रित वृद्धजनाें को निर्वाह के लिए पेंशन दी जाती है। अति निर्धन महिलाएँ और अकेली विधवाएँ भी इसी योजना के अंतर्गत आती हैं। सरकार ने गरीब लोगों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान करने की कुछ योजनाएँ आरंभ की हैं।

1853.pngइन्हें कीजिए

► तटीय, रेगिस्तानी, पहाड़ी जनजातीय क्षेत्राें और अन्य जनजातीय क्षेत्रों में संभव तीन प्रकार के एेसे रोजगार अवसराें पर चर्चा कर उन्हें सूचीबद्ध करें जो (क) मनरेगा तथा (ख) स्वरोजगार कार्यक्रम के अंतर्गत आ सकते हों।

► आपको अपने क्षेत्र में या आस-पास सड़क निर्माण, किसी सरकारी अस्पताल या स्कूल आदि के भवन का निर्माण होता अवश्य दिख जाएगा। एेसे निर्माण स्थलों पर जाकर वहाँ चल रहे काम, उन कामों में लगाए गए श्रमिकाें की संख्या, उन्हें दी जा रही मजदूरी आदि के बारे में दो-तीन पृष्ठाें की रिपोर्ट तैयार करें।

वर्ष 2014 से "प्रधानमंत्री जन-धन योजना" नामक एक एेसी योजना उपलब्ध है जिसके अन्तर्गत भारतवासियों को बैंक खाता खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। बचत के अभ्यास को बढ़ावा देने के साथ-साथ इस योजना का उद्देश्य सरकारी योजनाओं के अंतर्गत मिलने वाले लाभों तथा आर्थिक सहायता को सीधे खाताधारियों को हस्तांतरित करना भी है। प्रत्येक खाताधारी को 1 लाख रुपये के जीवन बीमा तथा 30,000/- रुपये के जीवन बीमा रक्षा का अधिकार है।

4.7 निर्धनता निवारण कार्यक्रम - एक समीक्षा

स्वतंत्रता के बाद निर्धनता निवारण के प्रयासों के परिणाम तब सामने आए, जब कुछ राज्यों में निर्धनों की निरपेक्ष संख्या तथा उनका प्रतिशत निर्धनता के राष्ट्रीय औसत के काफी नीचे आ गए। निर्धनता, भूख, कुपोषण, निरक्षरता और बुनियादी सुविधाआें के अभाव को दूर करने की अनेक नीतियों को चलाने के बाद भी देश के कई भाग में ये अभी भी पाए जाते हैं। यद्यपि निर्धनता निवारण नीतियों का पिछले साढ़े पाँच दशकाें से निरंतर विकास होता रहा है, फिर भी इसमें कुल मिला कर कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं आया है। कार्यक्रमों के नाम बदलते रहे हैं-कहीं कई कार्यक्रमों को मिलाकर एक बना दिया गया तो कहीं अलग-अलग कार्यक्रम रहे। किंतु, किसी भी कार्यक्रम से न तो उत्पादन परिसंपत्तियों के स्वामित्व में कोई परिवर्तन आया, न उत्पादन प्रक्रिया में और न ही जरूरतमंदों की बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धि में ही सुधार आ पाया। इन कार्यक्रमों की समीक्षा कर रहे विद्वानों ने इनके सफल क्रियान्वयन से जुड़े तीन बड़े पक्षों को स्पष्ट किया है, जो इनको सफलतापूर्वक लागू करने में बाधा डालते हैं। भूमि और अन्य परिसंपत्तियों के वितरण की विषमताओं के कारण प्रत्यक्ष निर्धनता निवारण कार्यक्रमों का लाभ प्रायः गैर निर्धन वर्ग के लोग ही उठा पाए। निर्धनता की गहनता की तुलना में इन कार्यक्रमों के लिए आबंटित संसाधन नितांत ही अपर्याप्त रहे हैं। यही नहीं, ये कार्यक्रम सरकार और बैंक अधिकारियों के सहारे ही चलाए जाते हैं। इन अधिकारियों में उपयुक्त चेतना के अभाव, अपर्याप्त प्रशिक्षण और भ्रष्टाचार के साथ-साथ स्थानीय सशक्त वर्गों के अनेक प्रकार के दबावों के कारण प्रायः संसाधनों का दुरुपयोग और बर्बादी ही होती है। इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में स्थानीय स्तर की संस्थाओं की भागीदारी भी शून्य होती है।

सरकारी नीतियों ने दयनीय दशा से ग्रस्त उस विशाल जन समुदाय की सुध भी नहीं ली है जो निर्धनता-रेखा या उससे जरा सा ही ऊपर रह रहे हैं। इससे यह भी स्पष्ट है कि केवल उच्च संवृद्धि ही निर्धनता कम करने में पर्याप्त नहीं होती। निर्धनों की सक्रिय भागीदारी के बिना किसी भी कार्यक्रम का सफल क्रियांवयन असंभव है।

बॉक्स 4.4 रामदास कोड़वा की मंजिल विहीन सड़क

रचकेठा गांव के रामदास कोड़वा को शायद ही यह जान कर खुशी हुई हो कि सरकार के लिए उसका मूल्य 17.44 लाख रुपये था। वर्ष 1993 के अंत में आदिवासी विकास के नाम पर सरकार ने रचकेठा गाँव तक 3 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण 17.44 लाख रुपयों की लागत से करने का निश्चय किया।

भारत के एक निर्धनतम जनपद सरगुज़ा में 55 प्रतिशत आबादी जनजातीय वर्गों की ही है। पहाड़ी कोड़वा वर्ग को तो सरकार ने आदिम जनजाति माना हुआ है और ये निर्धनों के भी सबसे नीचे वाले 5 प्रतिशत अंश में आते हैं। उनके विकास के लिए विशेष प्रयास चल रहे हैं और उनके नाम पर बड़ी-बड़ी धन राशियों का प्रावधान किया जा रहा है। पहाड़ी कोड़वा नामक एक केंद्र प्रायोजित योजना पर ही पाँच वर्षों में 42 करोड़ की धनराशि व्यय की जा रही है। देश मे पहाड़ी कोड़वा जनजाति की संख्या लगभग 15,000 है, जिसका सबसे बड़ा समुदाय सरगुजा में बसा है। किंतु किन्हीं राजनीतिक कारणों से इस पहाड़ी कोड़वा विकास प्रकल्प का आधार रायगढ़ जिले में बनाया गया है। रचकेठा गाँव में पहाड़ी कोड़वा मार्ग के निर्माण में बस एक ही छोटी सी समस्या थी - वहाँ कोई भी पहाड़ी कोड़वा नहीं रहता था। रामदास का परिवार ही एक मात्र अपवाद है।

एक गैर-सरकारी संगठन के कार्यकर्ता का कहना है कि इस बात का कोई मतलब नहीं है कि पहाड़ी कोड़वों को किसी काम से कोई लाभ होता है या नहीं। यहाँ तो बंगलों और तरण तालों का निर्माण भी जनजाति विकास के नाम पर होगा। रामदास के पुत्र रामावतार कोड़वा का कहना है कि किसी ने ये जानने की कोशिश ही नहीें की कि इस गाँव में कितने परिवार पहाड़ी कोड़वा हैं-एक कच्ची सड़क तो पहले ही यहाँ मौजूद थी। उन्होंने उसी कच्ची सड़क पर कुछ लाल मिट्टी और डाल दी, बस। आज भी वह सड़क कच्ची ही है-पक्की नहीं बनी है। हाँ, 17.44 लाख रुपये अवश्य खर्च हो गए हैं।

रामदास की माँग तो बहुत ही साधारण सी है। उसे तो बस थोड़ा-सा पानी चाहिए। हम पानी के बिना खेती कैसे करें? बार-बार ज़ोर डालने पर उसने बस यही कहा कि उस सड़क पर 17.44 लाख रुपये खर्च करने के स्थान पर मेरी जमीन के पास के जीर्ण अवस्था में पड़े कुएँ का कुछ हजार रुपये लगाकर उद्धार कर दिया जाता, तो कहीं अधिक अच्छा रहता। जमीन की दशा में भी सुधार की जरूरत है, पर अगर वे कुछ पानी देने से ही शुरुआत कर दें, तो भी बहुत है।

रामदास की समस्याओं पर ध्यान देने की किसे फुरसत थी। सरकार को तो अपना एक लक्ष्य पूरा करना था। यदि सारी धन राशि को एक बैंक में सावधि जमा खाते में डाल दिया जाए तो इन पहाड़ी कोड़वा व्यक्तियों को कभी जीविका के लिए काम करने की ज़रूरत नहीं रहे, ब्याज से ही इनका सरगुजा के स्तर पर गुजर बसर हो जाएगा। किसी सरकारी अफसर ने मजाक में एेसा कहा।

किसी ने रामदास से नहीं पूछा कि उसकी समस्या क्या थी, उसकी जरूरत क्या थी। न ही किसी ने उसे उन समस्याओं के समाधान में शामिल करना आवश्यक माना। बस उसके नाम पर 17.44 लाख रुपये की एक सड़क बना दी, जिस पर वह कभी पाँव भी नहीं रखता। जैसे ही हमने उस कहीं भी न पहुंचाने वाली सड़क पर चलने के लिए पाँव उठाए, वह गिड़गिड़ाता हुआ कहने लगा, साहब हमारी पानी की समस्या के लिए कुछ कीजिए ना।

स्रोत पी साईंनाथ : एवरीबॉडी लब्ज ए गुड ड्राउट स्टोरीज, प्रुॉम इंडियाज पुअरेस्ट डिस्ट्रिक्ट्स, पेंग्विन बुक्स, नई दिल्ली से संकलित।

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चित्र 4.7 रोजगार कार्यक्रमों का कुप्रबंधन ही लोगों को एेसे कम आमदनी वाले काम करने को बाध्य करता है

निर्धनता का वास्तविक अंत तो तभी होगा जब निर्धन भी अपनी सक्रिय भागीदारी के माध्यम से आर्थिक संवृद्धि में योगदान देना आरंभ करेंगे। एेसा सामाजिक संघटन के माध्यम से निर्धनों द्वारा विकास प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने से और उनके सशक्त होने से ही संभव हो पाएगा। इससे रोजगार के अवसरों की रचना होगी, जिससे आय के स्तर में सुधार होगा, कौशल का विकास होगा, तथा स्वास्थ्य और साक्षरता के स्तर ऊँचे उठेंगे। साथ ही निर्धनता ग्रस्त क्षेत्रों की सही पहचान कर वहाँ स्कूल, सड़कें, विद्युत, संचार, सूचना, प्रौद्योगिकी सेवाएँ तथा प्रशिक्षण संस्थानों जैसी आधारिक संरचनाएँ उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

4.8 निष्कर्ष

हम स्वतंत्रता के बाद से लगभग 7 दशकों की यात्रा कर चुके हैं। हमारी सभी नीतियों का ध्येय समता और सामाजिक न्याय सहित तीव्र और संतुलित आर्थिक विकास बताया गया है। चाहे जो भी सरकार सत्ता में रही हो, सभी ने निर्धनता निवारण को ही भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती माना है। देश में निर्धनों की निरपेक्ष संख्या में कमी आई है और कुछ राज्यों में राष्ट्रीय औसत से निर्धनों का अनुपात कम है। यद्यपि इस काम के लिए बहुत विशाल धन राशियाँ आबंटित और खर्च की जा चुकी हैं किंतु फिर भी हम लक्ष्य से बहुत दूर हैं। प्रति व्यक्ति आय और औसत जीवन स्तर में सुधार हुए हैं, बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में भी कुछ प्रगति अवश्य हुई है। किंतु अन्य देशों की तुलना में हमारी यह प्रगति प्रभावहीन प्रतीत होती है। यही नहीं, विकास के लाभ हमारी जनता के सभी वर्गों तक नहीं पहुँच पाए हैं। वैसे सामाजिक और आर्थिक विकास की कसौटियों पर हमारे देश के कुछ क्षेत्रक, अर्थव्यवस्था के कुछ वर्ग और समाज के कुछ अंश तो अनेक विकसित देशों से भी स्पर्धा कर सकते हैं, फिर भी एेसा बहुत बड़ा समुदाय है जो अभी निर्धनता के दुष्चक्र से मुक्ति नहीं पा सका है।


पुनरावर्तन

भारत की विकासात्मक रण-नीतियों का एक प्रमुख उद्देश्य निर्धनता को कम करना है।

• न्यूनतम गैर-खाद्य व्यय के साथ औसत प्रति व्यक्ति दैनिक आवश्यकता को पूरा करने लायक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय स्तर ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी को ही निर्धनता रेखा या निरपेक्ष निर्धनता कहते हैं।

• जब निर्धनों की संख्या और उनके अनुपात की तुलना की जाती है, तो हमें विभिन्न राज्यों में और विभिन्न समयों पर लोगों की निर्धनता के विभिन्न स्तरों के बारे में पता चलता है।

• भारत में निर्धनों की संख्या और कुल जनसंख्या में उनका अनुपात पर्याप्त मात्रा में कम हुआ है। 1990 के दशक में पहली बार निर्धनों की निरपेक्ष संख्या में कमी आई है।

• अधिकतर निर्धन ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं और अनियत और अकुशल कार्याें में लगे होते हैं।

• आय तथा व्यय आधारित विधि निर्धन लोगों के अन्य गुणों पर विचार नहीं करती।

• कई वर्षाें से सरकार निर्धनता कम करने के लिए तीन विधियों का प्रयोग कर रही हैः संवृद्धि-उन्मुख विकास, विशेष निर्धनता निवारण कार्यक्रम और निर्धनों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति।

• परिसंपत्तियों के स्वामित्व, उत्पादन की प्रक्रियाएँ तथा निर्धनों की आधारभूत सुविधाओं में अभी भी सरकार द्वारा पहल किया जाना बाकी है।


अभ्यास

1. कैलोरी आधारित तरीका निर्धनता की पहचान के लिए क्यों उपयुक्त नहीं है?

2. ‘मनरेगा’ कार्यक्रम का क्या अर्थ है?

3. भारत में निर्धनता से मुक्ति पाने के लिए रोजगार सृजन करने वाले कार्यक्रम क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?

4. आय अर्जित करने वाली परिसंपत्तियों के सृजन से निर्धनता की समस्या का समाधान किस प्रकार हो सकता है?

5. भारत सरकार द्वारा निर्धनता पर त्रि-आयामी प्रहार निर्धनता दूर करने में सफल नहीं रहा है। चर्चा करें।

6. सरकार ने बुजुर्गों, निर्धनों और असहाय महिलाओं के सहायतार्थ कौन से कार्यक्रम अपनाए हैं?

7. क्या निर्धनता और बेरोजगारी के बीच कोई संबंध है? समझाइए?

8. मान लीजिए कि आप एक निर्धन परिवार से हैं और छोटी सी दुकान खोलने के लिए सरकारी सहायता पाना चाहते हैं। आप किस योजना के अंतर्गत आवेदन देंगे और क्यों?

9. ग्रामीण और शहरी बेरोजगारी में अंतर स्पष्ट करें। क्या यह कहना सही होगा कि निर्धनता गाँवों से शहरों में आ गई है? अपने उत्तर के पक्ष में निर्धनता अनुपात प्रवृत्ति का प्रयोग करें।

10. मान लीजिए कि आप किसी गाँव के निवासी हैं। अपने गाँव से निर्धनता निवारण के कुछ सुझाव दीजिए।

11. अगर आप शहरी क्षेत्र में रहते हैं तो आप देख सकते हैं कि गरीब लोग सड़कों, रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंड के किनारे झुग्गियों में रहते हैं। उनके रहने की दशाओं में सुधार हेतु कुछ उपाय सुझाएँ।

अतिरिक्त गतिविधियाँ

1. अपने आस-पास के तीस व्यक्तियों से विभिन्न वस्तुओं के दैनिक उपभोग के आँकड़े एकत्र करें। सापेक्ष निर्धनता के मान को निर्धारित करने के लिए उन व्यक्तियों को सापेक्ष रूप से बेहतर और बदतर के अनुसार क्रमबद्ध करें।

2. चार परिवारों द्वारा विभिन्न वस्तुओं पर किए गए व्यय से संबंधित आंकड़े एकत्रित करें और निम्न सारणी की पूर्ति करें। इस अनुसंधान का विश्लेषण करें और पता करें कि कौन-सा परिवार अन्य परिवारों की तुलना में अधिक निर्धन है। यदि निर्धनता-रेखा का स्तर 500 रुपये प्रतिव्यक्ति हो तो कौन-सा परिवार पूर्ण रूप से निर्धन होगा?

वस्तुएँ परिवार क परिवार ख परिवार ग परिवार घ
गेहूँ / चावल
वनस्पति तेल
चीनी
बिजली/प्रकाश
घी
कपड़े
मकान का किराया

3. निम्न सारणी भारत में तथा दिल्ली की झुग्गी-झोंपड़ियों में उपभोग पर प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह व्यय को प्रतिशत के रूप में व्यक्त करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में 25 प्रतिशत चावल और गेहूँ का अर्थ है प्रति सौ रुपये के व्यय पर, 25 रुपये केवल चावल और गेहूँ पर खर्च हो जाते हैं। ये आँकड़े कुुल व्यय में उन पदार्थाें के प्रतिशत अंश को दिखाते हैं। इस सारणी को पढ़कर इस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर देंः

मदें ग्रामीण शहरी दिल्ली की झुग्गी झोपड़ियाँ
चावल और गेहूँ
दाल और दाल उत्पाद
दूध और दूध उत्पाद
फल सब्जियाँ
माँस, मछली, अंडे
चीनी
नमक और मसाले
अन्य खाद्य वस्तुएँ

25.0
5.7
17.4
15.1
6.3
3.3
10.8
16.5


35.4
6.1
14.1
12.7
5.3
3.8
10.8
11.3


28.7
9.9
10.3
19.6
13.1
4.0
8.1
6.4

कुल खाद्य पदार्थ 100 100 100
सकल व्यय में खाद्य पदार्थों का अंश 62.9 72.2 72.8

• विभिन्न वर्गों के खाद्य पदार्थों पर व्यय के अनुपात और उनकी प्राथमिकताओं की तुलना करें।

• क्या आप एेसा सोचते हैं कि झुग्गी-झोंपड़ियों के परिवार अनाजों और दालों पर अधिक निर्भर हैं?

• विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोग किस मद पर सबसे कम खर्च करते हैं? उनमें तुलना करें।

• क्या आप एेसा सोचते हैं कि झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाले माँस, मछलियों और अंडों को अधिक महत्व देते हैं।

 संदर्भ

पुस्तकें

दांडेकर वी. एम. एंड नीलकांथ रथ 1971. पावर्टी इन इंडिया, इंडियन स्कूल अॉफ पोलिटिकल अकॉनामी, पुणे।

ड्रेज़ जीन, अमर्त्य सेन एंड अख्तर हुसैन (ए.ड.) 1995. दी पोलिटिकल इकॉनामी अॉफ हंगर, कैलेंडान प्रेस, अॉक्सफोर्ड।

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निबंध

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सरकारी रिपोर्ट आदि

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एस. सुब्रह्मण्यम (सं) 2001, इंडियन डेवेलपमेंट एक्सपीरियंस सिलेक्टिड राइटिग्ंस अॉफ एस. गुहान, अॉक्सफोर्ड यूनि. प्रेस, नई दिल्ली।

आर्थिक सर्वेक्षण (विभिन्न वर्षों के) वित्त मंत्रालय, भारत सरकार।

दसवीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) खंड दो , क्षेत्रीय नीतियां और कार्यक्रम, योजना आयोग, भारत सरकार, नई दिल्ली।

बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) वोल्यूम - I,II,III, सेज पब्लिकेशन्स प्राइवेट लिमिटेड, नयी दिल्ली (योजना आयोग, भारत सरकार के लिए)।

स्टेट अॉफ इंडियन एग्रीकल्चर 2017, मिनिस्ट्री अॉफ एग्रीकल्चर एण्ड फार्मर्स वेलफेयर, गवर्नमेन्ट अॉफ इण्डिया, नई दिल्ली।