अध्याय 3

अपवाह तंत्र

पने वर्षा ऋतु में बहती नदियाँ, नाले व वाहिकाएँ देखी होंगी, जो अतिरिक्त जल बहाकर ले जाती हैं। अगर ये वाहिकाएँ न होतीं तो बड़े पैमाने पर बाढ़ आ जाती। जहाँ ये वाहिकाएँ अवरूद्ध या अस्पष्ट हैं, वहाँ बाढ़ का आना एक सामान्य परिघटना है।

निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जलप्रवाह को ‘अपवाह’ कहते हैं। इन वाहिकाओं के जाल को ‘अपवाह तंत्र’ कहा जाता है। किसी क्षेत्र का अपवाह तंत्र वहाँ के भूवैज्ञानिक समयावधि, चट्टानों की प्रकृति एवं संरचना, स्थलाकृति, ढाल, बहते जल की मात्रा और बहाव की अवधि का परिणाम है।

क्या आपके शहर या गाँव के पास कोई नदी है? क्या आप कभी वहाँ नौकायन करने अथवा नहाने के लिए गए हैं? क्या यह नदी बारहमासी है या अल्पकालिक (केवल वर्षा ऋतु में पानी अन्यथा सूखी) है? क्या आप जानते हैं कि नदी सदैव एक ही दिशा में क्यों बहती है? आपने भूगोल की अन्य दो पाठ्यपुस्तकों में ढालों के बारे में पढ़ा होगा। तो क्या आप जल के एक दिशा से दूसरी दिशा में बहने का कारण बता सकते हैं? उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में पश्चिमी घाट से निकलने वाली नदियाँ पूर्व की ओर क्यों बहती हैं व बंगाल की खाड़ी में अपना जल विसर्जित क्यों करती हैं? एक नदी विशिष्ट क्षेत्र से अपना जल बहाकर लाती है जिसे ‘जलग्रहण’ (Catchment) क्षेत्र कहा जाता है।

एक नदी एवं उस की सहायक नदियों द्वारा अपवाहित क्षेत्र को ‘अपवाह द्रोणी’ कहते हैं। एक अपवाह द्रोणी को दूसरे से अलग करने वाली सीमा को ‘जल विभाजक’ या ‘जल-संभर’ (Watershed) कहते हैं। बड़ी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को नदी द्रोणी जबकि छोटी नदियों व नालों द्वारा अपवाहित क्षेत्र को ‘जल-संभर’ ही कहा जाता है। नदी द्रोणी का आकार बड़ा होता है, जबकि जल-संभर का आकार छोटा होता है।

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चित्र 3.1 : पर्वतीय क्षेत्र की एक नदी

नदी द्रोणी एवं जल-संभर एकता के परिचायक हैं। इनके एक भाग में परिवर्तन का प्रभाव अन्य भागों व पूर्ण क्षेत्र में देखा जा सकता है। इसीलिए इन्हें सूक्ष्म, मध्यम व बृहत नियोजन इकाइयों व क्षेत्रों के रूप में लिया जा सकता है।

मुख्य अपवाह प्रतिरूप

(i) जो अपवाह प्रतिरूप पेड़ की शाखाओं के अनुरूप हो, उसे वृक्षाकार (Dendritic) प्रतिरूप कहा जाता है, जैसे उत्तरी मैदान की नदियाँ।

(ii) जब नदियाँ किसी पर्वत से निकलकर सभी दिशाओं में बहती हैं, तो इसे अरीय (Radial) प्रतिरूप कहा जाता है। अमरकंटक पर्वत शृंखला से निकलने वाली नदियाँ इस अपवाह प्रतिरूप के अच्छे उदाहरण हैं।

(iii) जब मुख्य नदियाँ एक-दूसरे के समांतर बहती हों तथा सहायक नदियाँ उनसे समकोण पर मिलती हों, तो एेसे प्रतिरूप को जालीनुमा (Trellis) अपवाह प्रतिरूप कहते हैं।

(iv) जब सभी दिशाओं से नदियाँ बहकर किसी झील या गर्त में विसर्जित होती हैं, तो एेसे अपवाह प्रतिरूप को अभिकेंद्री (Centripetal) प्रतिरूप कहते हैं।

भूगोल भाग-I, अध्याय 5 (रा०शै०अ०प्र०प०, 2006) के प्रायोगिक कार्य में इन अपवाह प्रतिरूपों में से कुछ को ढूँढिए।

भारतीय अपवाह तंत्र को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है। समुद्र में जल विसर्जन के आधार पर इसे दो समूहों में बाँटा जा सकता है (i) अरब सागर का अपवाह तंत्र व (ii) बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र। ये अपवाह तंत्र दिल्ली कटक, अरावली एवं सहयाद्रि द्वारा विलग किए गए हैं (चित्र 3.1 में इस जल-विभाजक को एक रेखा द्वारा दर्शाया गया है)। कुल अपवाह क्षेत्र का लगभग 77 प्रतिशत भाग, जिसमें गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा आदि नदियाँ शामिल हैं, बंगाल की खाड़ी में जल विसर्जित करती हैं, जबकि 23 प्रतिशत क्षेत्र, जिसमें सिंधु, नर्मदा, तापी, माही व पेरियार नदियाँ हैं, अपना जल अरब सागर में गिराती हैं।

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चित्र 3.2 : भारत की मुख्य नदियाँ

जल-संभर क्षेत्र के आकार के आधार पर भारतीय अपवाह द्रोणियों को तीन भागों में बाँटा गया है : (1) प्रमुख नदी द्रोणी, जिनका अपवाह क्षेत्र 20,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक है। इसमें 14 नदी द्रोणियाँ शामिल हैं, जैसे - गंगा, बह्मपुत्र, कृष्णा, तापी, नर्मदा, माही, पेन्नार, साबरमती, बराक आदि (परिशिष्ट III)। (2) मध्यम नदी द्रोणी जिनका अपवाह क्षेत्र 2,000 से 20,000 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 44 नदी द्रोणियाँ हैं, जैसे - कालिंदी, पेरियार, मेघना आदि। (3) लघु नदी द्रोणी, जिनका अपवाह क्षेत्र 2,000 वर्ग किलोमीटर से कम है। इसमें न्यून वर्षा के क्षेत्रों में बहने वाली बहुत-सी नदियाँ शामिल हैं।

यदि आप चित्र 3.1 देखें तो आप पाएँगे कि अनेक नदियों का उद्गम स्रोत हिमालय पर्वत है और वे अपना जल बंगाल की खाड़ी या अरब सागर में विसर्जित करती हैं। उत्तर भारत की इन नदियों की पहचान कीजिए। प्रायद्वीपीय पठार की बड़ी नदियों का उद्गम स्थल पश्चिमी घाट है और ये नदियाँ बंगाल की खाड़ी में जल विसर्जन करती हैं। दक्षिण भारत की इन नदियों की भी पहचान कीजिए।

नर्मदा और तापी दो बड़ी नदियाँ इसका अपवाद हैं। ये और अनेक छोटी नदियाँ अपना जल अरब सागर में विसर्जित करती हैं। पश्चिमी तटीय क्षेत्र में कोंकण से मालाबार तट तक बहने वाली नदियों के नाम बताएँ।

उद्गम के प्रकार, प्रकृति व विशेषताओं के आधार पर भी भारतीय अपवाह तंत्र को हिमालयी अपवाह तंत्र व प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र में विभाजित किया जाता है। यद्यपि इस विभाजन योजना में चंबल, बेतवा, सोन आदि नदियों के वर्गीकरण में समस्या उत्पन्न होती है, क्योंकि उत्पत्ति व आयु में ये हिमालय से निकलने वाली नदियों से पुरानी हैं। फिर भी यह अपवाह तंत्र वर्गीकरण का सर्वाधिक मान्य आधार है। इस पुस्तक में इसी का अनुसरण किया गया है।

भारत के अपवाह तंत्र

भारतीय अपवाह तंत्र में अनेक छोटी-बड़ी नदियाँ शामिल हैं। ये तीन बड़ी भू-आकृतिक इकाइयों की उद्-विकास प्रक्रिया तथा वर्षण की प्रकृति व लक्षणों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई हैं।

हिमालयी अपवाह

हिमालयी अपवाह तंत्र भूगर्भिक इतिहास के एक लंबे दौर में विकसित हुआ है। इसमें मुख्यतः गंगा, सिंधु व बह्मपुत्र नदी द्रोणियाँ शामिल हैं। यहाँ की नदियाँ बारहमासी हैं, क्योंकि ये बर्फ पिघलने व वर्षण दोनों पर निर्भर हैं। ये नदियाँ गहरे महाखड्डों (Gorges) से गुजरती हैं, जो हिमालय के उत्थान के साथ-साथ अपरदन क्रिया द्वारा निर्मित हैं। महाखड्डों के अतिरिक्त ये नदियाँ अपने पर्वतीय मार्ग में V-आकार की घाटियाँ, क्षिप्रिकाएँ व जलप्रपात भी बनाती हैं। जब ये मैदान में प्रवेश करती हैं, तो निक्षेपणात्मक स्थलाकृतियाँ जैसे– समतल घाटियों, गोखुर झीलें, बाढ़कृत मैदान, गुंफित वाहिकाएँ और नदी के मुहाने पर डेल्टा का निर्माण करती हैं। हिमालय क्षेत्र में इन नदियों का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा है, परंतु मैदानी क्षेत्र में इनमें सर्पाकार मार्ग में बहने की प्रवृत्ति पाई जाती है और अपना रास्ता बदलती रहती हैं। कोसी नदी, जिसे बिहार का शोक (Sorrow of Bihar) कहते हैं, अपना मार्ग बदलने के लिए कुख्यात रही है। यह नदी पर्वतों के ऊपरी क्षेत्रों से भारी मात्रा में अवसाद लाकर मैदानी भाग में जमा करती है। इससे नदी मार्ग अवरूद्ध हो जाता है व परिणामस्वरूप नदी अपना मार्ग बदल लेती है। कोसी नदी ऊपरी पर्वतीय क्षेत्र से इतनी भारी मात्रा में अवसाद क्यों लाती है? क्या आप सोचते हैं कि सामान्यतः नदियों में और विशेष तौर पर कोसी नदी में जल का बहाव व मात्रा एक समान रहती है या घटती-बढ़ती रहती है? नदी में कब जल की मात्रा अत्यधिक होती है? बाढ़ के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव क्या हैं?

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चित्र 3.3 : क्षिप्रिकाएँ

हिमालय पर्वतीय अपवाह तंत्र का विकास

हिमालय पर्वतीय नदियों के विकास के बारे में मतभेद है। यद्यपि भूवैज्ञानिक मानते हैं कि मायोसीन कल्प में (लगभग 2.4 करोड़ से 50 लाख वर्ष पहले) एक विशाल नदी, जिसे शिवालिक या इंडो-ब्रह्म कहा गया है, हिमालय के संपूर्ण अनुदैर्ध्य विस्तार के साथ असम से पंजाब तक बहती थी और अंत में निचले पंजाब के पास सिंध की खा\ड़ी में अपना पानी विसर्जिन करती थी (भूवैज्ञानिक काल मापक्रम के लिए ‘भौतिक भूगोल के आधार रा.शै.अ.प्र.प., 2006’ नामक पुस्तक का अध्याय 2 देखें)। शिवालिक पहाड़ियों की असाधारण निरंतरता, इनका सरोवरी उद्गम और इनका जलोढ़ निक्षेप से बना होना जिसमें रेत, मृत्तिका, चिकनी मिट्टी, गोलाश्म व कोंगलोमेरेट शामिल है, इस धारणा की पुष्टि करते हैं।

एेसा माना जाता है कि कालांतर में इंडो-ब्रह्म नदी तीन मुख्य अपवाह तंत्रों में बँट गईः (1) पश्चिम में सिंध और इसकी पाँच सहायक नदियाँ, (2) मध्य में गंगा और हिमालय से निकलने वाली इसकी सहायक नदियाँ और (3) पूर्व में बह्मपुत्र का भाग व हिमालय से निकलने वाली इसकी सहायक नदियाँ। विशाल नदी का इस तरह विभाजन संभवतः प्लीस्टोसीन काल में हिमालय के पश्चिमी भाग में व पोटवार पठार (दिल्ली रिज) के उत्थान के कारण हुआ। यह क्षेत्र सिंधु व गंगा अपवाह तंत्रों के बीच जल विभाजक बन गया। इसी प्रकार मध्य प्लीस्टोसीन काल में राजमहल पहाड़ियों और मेघालय पठार के मध्य स्थित माल्दा गैप का अधोक्षेपण हुआ जिसमें गंगा और बह्मपुत्र नदी तंत्रों का दिक्परिवर्तन हुआ और वे बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित हुई।

हिमालयी अपवाह तंत्र की नदियाँ

हिमालयी अपवाह में अनेक नदी तंत्र हैं, मगर निम्नलिखित नदी तंत्र प्रमुख हैंः

सिंधु नदी तंत्र

यह विश्व के सबसे ब\ड़े नदी द्रोणियों में से एक है, जिसका क्षेत्रफल 11 लाख, 65 हजार वर्ग किलोमीटर है। भारत में इसका क्षेत्रफल 3,21,289 वर्ग कि.मी. है। इसकी कुल लंबाई 2,880 कि.मी. है और भारत में इसकी लंबाई 1,114 किलोमीटर है। भारत में यह हिमालय की नदियों में सबसे पश्चिमी है। इसका उद्गम तिब्बती क्षेत्र में कैलाश पर्वत श्रेणी में बोखर चू (Bokhar chu) के निकट एक हिमनद (31°15' और 80°40' पू.) से होता है, जो 4,164 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। तिब्बत में इसे सिंगी खंबान (Singi khamban) अथवा शेर मुख कहते हैं। लद्दाख व जास्कर श्रेणियों के बीच से उत्तर-पश्चिमी दिशा में बहती हुई यह लद्दाख और बालतिस्तान से गुजरती है। लद्दाख श्रेणी को काटते हुए यह नदी जम्मू और कश्मीर में गिलगित के समीप एक दर्शनीय महाखड्ड का निर्माण करती है। यह पाकिस्तान में चिल्लस के निकट दरदिस्तान प्रदेश में प्रवेश करती है। मानचित्र पर इस क्षेत्र को रेखांकित करें।

सिंधु नदी की बहुत-सी सहायक नदियाँ हिमालय पर्वत से निकलती हैं, जैसे - शयोक, गिलगित, जास्कर, हुंजा, नुबरा, शिगार, गास्टिंग व द्रास। अंततः यह नदी अटक के निकट पहाड़ियों से बाहर निकलती है, जहाँ दाहिने तट पर काबुल नदी इसमें मिलती है। इसके दाहिने तट पर मिलने वाली अन्य मुख्य सहायक नदियाँ खुर्रम, तोची, गोमल, विबोआ और संगर हैं। ये सभी नदियाँ सुलेमान श्रेणियों से निकली हैं। यह नदी दक्षिण की ओर बहती हुई मीथनकोट के निकट पंचनद का जल प्राप्त करती है। पंचनद नाम पंजाब की पाँच मुख्य नदियों सतलुज, व्यास, रावी, चेनाब और झेलम को दिया गया है। अंत में सिंधु नदी कराची के पूर्व में अरब सागर में जा गिरती है। भारत में सिंधु, जम्मू और कश्मीर राज्य में बहती है।

झेलम, जो सिंधु की महत्त्वपूर्ण सहायक नदी है, कश्मीर घाटी के दक्षिण-पूर्वी भाग में पीर पंजाल गिरिपद में स्थित वेरीनाग झरने से निकलती है। पाकिस्तान में प्रवेश करने से पहले यह नदी श्रीनगर और वूलर झील से बहते हुए एक तंग व गहरे महाखड्ड से गुजरती है, पाकिस्तान में झंग के निकट यह चेनाब नदी से मिलती है।

चेनाब, सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह चंद्रा और भागा दो सरिताओं के मिलने से बनती है। ये सरिताएँ हिमाचल प्रदेश में केलाँग के निकट तांडी में आपस में मिलती हैं। इसलिए इसे चंद्रभागा के नाम से भी जाना जाता है। पाकिस्तान में प्रवेश करने से पहले यह नदी 1,180 कि०मी० बहती है।

रावी, सिंधु की एक अन्य महत्त्वपूर्ण सहायक नदी है। यह हिमाचल प्रदेश की कुल्लू पहाड़ियों में रोहतांग दर्रे के पश्चिम से निकलती है और राज्य की चंबा घाटी से बहती है। पाकिस्तान में प्रवेश करने व सराय सिंधु के निकट चेनाब नदी में मिलने से पहले यह नदी पीर पंजाल के दक्षिण-पूर्वी भाग व धौलाधर के बीच प्रदेश से प्रवाहित होती है।

व्यास, सिंधु की अन्य महत्त्वपूर्ण सहायक नदी है, जो समुद्र तल से 4,000 मीटर की ऊँचाई पर रोहतांग दर्रे के निकट व्यास कुंड से निकलती है। यह नदी कुल्लू घाटी से गुजरती है और धौलाधर श्रेणी में काती और लारगी में महाखड्ड का निर्माण करती है। यह पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है जहाँ हरिके के पास सतलुज नदी में जा मिलती है।

सतलुज नदी तिब्बत में 4,555 मीटर की ऊँचाई पर मानसरोवर के निकट राक्षस ताल से निकलती है, जहाँ इसे लॉगचेन खंबाब के नाम से जाना जाता है। भारत में प्रवेश करने से पहले यह लगभग 400 किलोमीटर तक सिंधु नदी के समांतर बहती है और रोपड़ में एक महाखड्ड से निकलती है। यह हिमालय पर्वत श्रेणी में शिपकीला से बहती हुई पंजाब के मैदान में प्रवेश करती है। यह एक पूर्ववर्ती नदी है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण सहायक नदी है, क्योंकि यह भाखड़ा नांगल परियोजना के नहर तंत्र का पोषण करती है।

गंगा नदी तंत्र

अपनी द्रोणी और सांस्कृतिक महत्त्व दोनों के दृष्टिकोणों से गंगा भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी है। यह नदी उत्तराखण्ड राज्य के उत्तरकाशी जिले में गोमुख के निकट गंगोत्री हिमनद से 3,900 मीटर की ऊँचाई से निकलती है। यहाँ यह भागीरथी के नाम से जानी जाती है। यह मध्य व लघु हिमालय श्रेणियों को काट कर तंग महाखड्डों से होकर गुजरती है। देवप्रयाग में भागीरथी, अलकनंदा से मिलती है और इसके बाद गंगा कहलाती है। अलकनंदा नदी का स्रोत बद्रीनाथ के ऊपर सतोपथ हिमनद है। ये अलकनंदा, धौली और विष्णु गंगा धाराओं से मिलकर बनती है, जो जोशीमठ या विष्णुप्रयाग में मिलती है। अलकनंदा की अन्य सहायक नदी पिंडार है, जो इससे कर्ण प्रयाग में मिलती है, जबकि मंदाकिनी या काली गंगा इससे रूद्रप्रयाग में मिलती है। गंगा नदी हरिद्वार में मैदान में प्रवेश करती है। यहाँ से यह पहले दक्षिण की ओर, फिर दक्षिण-पूर्व की ओर और फिर पूर्व की ओर बहती है। अंत में, यह दक्षिणमुखी होकर दो जलवितरिकाओं (धाराओं) भागीरथी और पदमा में विभाजित हो जाती है। इस नदी की लंबाई 2,525 किलोमीटर है। यह उत्तराखण्ड में 110 किलोमीटर, उत्तरप्रदेश में 1,450 किलोमीटर, बिहार में 445 किलोमीटर और पश्चिम बंगाल में 520 किलोमीटर मार्ग तय करती है। गंगा द्रोणी केवल भारत में लगभग 8.6 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है। यह भारत का सबसे बड़ा अपवाह तंत्र है, जिससे उत्तर में हिमालय से निकलने वाली बारहमासी व अनित्यवाही नदियाँ और दक्षिण में प्रायद्वीप से निकलने वाली अनित्यवाही नदियाँ शामिल हैं। सोन इसके दाहिने किनारे पर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदी है। बाँये तट पर मिलने वाली महत्त्वपूर्ण सहायक नदियाँ रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक, कोसी व महानंदा हैं। सागर द्वीप के निकट यह नदी अंततः बंगाल की खाड़ी में जा मिलती है।

क्या आप जानते हैं?

"नमामी गंगे परियोजना", एक एकीकृत संरक्षण मिशन है, जिसे जून 2014 में केंद्र सरकार द्वारा ‘प्रमुख कार्यक्रम’ के रूप में अनुमोदित किया गया। इसमें राष्ट्रीय नदी गंगा से संबंधित दो उद्देश्य हैं - प्रदूषण के प्रभाव को कम करना तथा उसके संरक्षण और कायाकल्प को पूरा करना।

नमामी गंगे कार्यक्रम के मुख्य स्तंभ हैं-

सीवेज ट्रीटमेंट व्यवस्था

नदी-किनारे का विकास

नदी सतह सफ़ाई

जैव विविधता

वनीकरण

जन जागरूकता

औद्योगिक अपशिष्ट निगरानी

गंगा ग्राम

आप इस परियोजना के बारे में और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं - http://nmcg.nic.in//NamamiGanga. aspx#

यमुना, गंगा की सबसे पश्चिमी और सबसे लंबी सहायक नदी है। इसका स्रोत यमुनोत्री हिमनद है, जो हिमालय में बंदरपूँछ श्रेणी की पश्चिमी ढाल पर 6,316 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। प्रयाग (इलाहाबाद) में इसका गंगा से संगम होता है। प्रायद्वीप पठार से निकलने वाली चंबल, सिंध, बेतवा व केन इसके दाहिने तट पर मिलती हैं। जबकि हिंडन, रिंद, संेंगर, वरुणा आदि नदियाँ इसके बाँये तट पर मिलती हैं। इसका अधिकांश जल सिंचाई उद्देश्यों के लिए पश्चिमी और पूर्वी यमुना नहरों तथा आगरा नहर में आता है।

उन राज्यों के नाम लिखिए जो यमुना नदी द्वारा अपवाहित हैं।

चंबल नदी मध्य प्रदेश के मालवा पठार में महु के निकट निकलती है और उत्तरमुखी होकर एक महाखड्ड से बहती हुई राजस्थान में कोटा पहुँचती है, जहाँ इस पर गांधीसागर बाँध बनाया गया है। कोटा से यह बूँदी, सवाई माधोपुर और धौलपुर होती हुई यमुना नदी में मिल जाती है। चंबल अपनी उत्खात् भूमि वाली भू-आकृति के लिए प्रसिद्ध है, जिसे चंबल खड्ड (Ravine) कहा जाता है।

गंडक नदी दो धाराओं कालीगंडक और त्रिशूलगंगा के मिलने से बनती है। यह नेपाल हिमालय में धौलागिरी व माऊंट एवरेस्ट के बीच निकलती है और मध्य नेपाल को अपवाहित करती है। बिहार के चंपारन जिले में यह गंगा मैदान में प्रवेश करती है और पटना के निकट सोनपुर में गंगा नदी में जा मिलती है।

घाघरा नदी मापचाचुँगों हिमनद से निकलती है तथा तिला, सेती व बेरी नामक सहायक नदियों का जलग्रहण करने के उपरांत यह शीशापानी में एक गहरे महाखड्ड का निर्माण करते हुए पर्वत से बाहर निकलती है। शारदा नदी (काली या काली गंगा) इससे मैदान में मिलती है और अंततः छपरा में यह गंगा नदी में विलीन हो जाती है।

कोसी एक पूर्ववर्ती नदी है जिसका स्रोत तिब्बत में माऊंट एवरेस्ट के उत्तर में है, जहाँ से इसकी मुख्य धारा अरुण निकलती है। नेपाल में, मध्य हिमालय को पार करने के बाद इसमें पश्चिम से सोन, कोसी और पूर्व से तमुर कोसी मिलती है। अरुण नदी से मिलकर यह सप्तकोसी बनाती है।

रामगंगा नदी गैरसेन के निकट गढ़वाल की पहाड़ियों से निकलने वाली अपेक्षाकृत छोटी नदी है। शिवालिक को पार करने के बाद यह अपना मार्ग दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर बनाती है और उत्तर प्रदेश में नजीबाबाद के निकट मैदान में प्रवेश करती है। अंत में कन्नौज के निकट यह गंगा नदी में मिल जाती है।

छोटानागपुर पठार के पूर्वी किनारे पर दामोदर नदी बहती है और भ्रंश घाटी से होती हुई हुगली नदी में गिरती है। बराकर इसकी एक मुख्य सहायक नदी है। कभी बंगाल का शोक (Sorrow of Bengal) कही जाने वाली इस नदी को दामोदर घाटी कार्पोरेशन नामक एक बहुद्देशीय परियोजना ने वश में कर लिया है।

शारदा या सरयू नदी का उद्गम नेपाल हिमालय में मिलाम हिमनद में है, जहाँ इसे गौरीगंगा के नाम से जाना जाता है। यह भारत-नेपाल सीमा के साथ बहती हुई, जहाँ इसे काली या चाइक कहा जाता है, घाघरा नदी में मिल जाती है।

गंगा नदी की एक अन्य महत्त्वपूर्ण सहायक नदी महानंदा है, जो दार्जिलिंग पहाड़ियों से निकलती है। यह नदी पश्चिमी बंगाल में गंगा के बाएँ तट पर मिलने वाली अंतिम सहायक नदी है।

गंगा के दक्षिण तट पर सोन एक बड़ी सहायक नदी है, जो अमरकंटक पठार से निकलती है। पठार के उत्तरी किनारे पर जलप्रपातों की शृंखला बनाती हुई यह नदी पटना से पश्चिम में आरा के पास गंगा नदी में विलीन हो जाती है।

ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

विश्व की सबसे बड़ी नदियों में से एक ब्रह्मपुत्र का उद्गम कैलाश पर्वत श्रेणी में मानसरोवर झील के निकट चेमायुँगडुंग (Chemayungdung) हिमनद में है। यहाँ से यह पूर्व दिशा में अनुदैर्ध्य रूप में बहती हुई दक्षिणी तिब्बत के शुष्क व समतल मैदान में लगभग 1,200 किलोमीटर की दूरी तय करती है, जहाँ इसे सांग्पो (Tsangpo) के नाम से जाना जाता है जिसका अर्थ है ‘शोधक’। तिब्बत के रागोंसांग्पो इसके दाहिने तट पर एक प्रमुख सहायक नदी है। मध्य हिमालय में नमचा बरवा (7,755 मीटर) के निकट एक गहरे महाखड्ड का निर्माण करती हुई यह एक प्रक्षुब्ध व तेज बहाव वाली नदी के रूप में बाहर निकलती है। हिमालय के गिरिपद में यह सिशंग या दिशंग के नाम से निकलती है। अरुणाचल प्रदेश में सादिया कस्बे के पश्चिम में यह नदी भारत में प्रवेश करती है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहते हुए इसके बाएँ तट पर इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ दिबांग या सिकांग और लोहित मिलती हैं और इसके बाद यह नदी ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है।

असम घाटी में अपनी 750 किलोमीटर की यात्रा में ब्रह्मपुत्र में असंख्य सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं। इसके बाएँ तट की प्रमुख सहायक नदियाँ बूढ़ी दिहिंग और धनसरी (दक्षिण) हैं, जबकि दाएँ तट पर मिलने वाली महत्त्वपूर्ण सहायक नदियों में सुबनसिरी, कामेग, मानस व संकोश हैं। सुबनसिरी जिसका उद्गम तिब्बत में है, एक पूर्ववर्ती नदी है। बह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है और फिर दक्षिण दिशा में बहती है। बांग्लादेश में यह जमुना कहलाती है और तिस्ता नदी इसके दाहिने किनारे पर मिलती है। अंत में, यह नदी पद्मा के साथ मिलकर बंगाल की खा\ड़ी में जा गिरती है। बह्मपुत्र नदी बाढ़, मार्ग परिवर्तन एवं तटीय अपरदन के लिए जानी जाती है। एेसा इसलिए है, क्योंकि इसकी अधिकतर सहायक नदियाँ बड़ी हैं और इनके जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण इनमें अत्यधिक अवसाद बहकर आ जाता है।

प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र

प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र हिमालयी अपवाह तंत्र से पुराना है। यह तथ्य नदियों की प्रौढ़ावस्था और नदी घाटियों के चौड़ा व उथला होने से प्रमाणित होता है। पश्चिमी तट के समीप स्थित पश्चिमी घाट बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली प्रायद्वीपीय नदियों और अरब सागर में गिरने वाली छोटी नदियों के बीच जल-विभाजक का कार्य करता है। नर्मदा और तापी को छोड़कर अधिकतर प्रायद्वीपीय नदियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं। प्रायद्वीप के उत्तरी भाग में निकलने वाली चंबल, सिंध, बेतवा, केन व सोन नदियाँ गंगा नदी तंत्र का अंग हैं। प्रायद्वीप के अन्य प्रमुख नदी-तंत्र महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी हैं। प्रायद्वीपीय नदियों की विशेषता है कि ये एक सुनिश्चित मार्ग पर चलती हैं, विसर्प नहीं बनातीं और ये बारहमासी नहीं हैं, यद्यपि भ्रंश घाटियों में बहने वाली नर्मदा और तापी इसका अपवाद हैं।

प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र का उद्विकास

अतिप्राचीन काल की तीन प्रमुख भूगर्भिक घटनाओं ने आज के प्रायद्वीपीय भारत के अपवाह तंत्र को स्वरूप प्रदान किया है : (1) आरंभिक टर्शियरी काल के दौरान प्रायद्वीप के पश्चिमी पार्श्व का अवतलन या धँसाव जिससे यह समुद्रतल से नीचे चला गया। इससे मूल जल संभर के दोनों ओर नदी की सामान्यतः सममित योजना में गड़बड़ी हो गई। (2) हिमालय में होने वाले प्रोत्थान के कारण प्रायद्वीप खंड के उत्तरी भाग का अवतलन हुआ और परिणामस्वरूप भ्रंश द्रोणियों का निर्माण हुआ। नर्मदा और तापी इन्हीं भ्रंश घाटियों में बह रही हैं और अपरद पदार्थ से मूल दरारों को भर रही हैं। इसीलिए, इन नदियों में जलोढ़ व डेल्टा निक्षेप की कमी पाई जाती है। (3) इसी काल में प्रायद्वीप खंड उत्तर-पश्चिम दिशा से, दक्षिण-पूर्व दिशा में झुक गया। परिणामस्वरूप इसका अपवाह बंगाल की खा\ड़ी की ओर उन्मुख हो गया।

प्रायद्वीपीय नदी तंत्र

प्रायद्वीपीय अपवाह में अनेक नदी तंत्र हैं। प्रमुख प्रायद्वीपीय नदी तंत्रों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है :

महानदी छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में सिहावा के निकट निकलती है और ओडिशा से बहती हुई अपना जल बंगाल की खाड़ी में विसर्जित करती है। यह नदी 851 किलोमीटर लंबी है और इसका जलग्रहण क्षेत्र लगभग 1.42 लाख वर्ग किलोमीटर है। इसके निचले मार्ग में नौसंचालन भी होता है। इस नदी की अपवाह द्रोणी का 53 प्रतिशत भाग मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में और 47 प्रतिशत भाग ओडिशा राज्य में विस्तृत है।

गोदावरी सबसे बड़ा प्रायद्वीपीय नदी तंत्र है। इसे दक्षिण गंगा के नाम से जाना जाता है। यह महाराष्ट्र में नासिक जिले से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में जल विसर्जित करती है। इसकी सहायक नदियाँ महाराष्ट्र मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और आंध्र प्रदेश राज्यों से गुजरती हैं। यह 1,465 किलोमीटर लंबी नदी है, जिसका जलग्रहण क्षेत्र 3.13 लाख वर्ग किलोमीटर है। इसके जलग्रहण क्षेत्र का 49 प्रतिशत भाग महाराष्ट्र में, 20 प्रतिशत भाग मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में और शेष भाग आंध्रप्रदेश में पड़ता है। इसकी मुख्य सहायक नदियों में पेनगंगा, इंद्रावती, प्राणहिता और मंजरा हैं। पोलावरम् के दक्षिण, में जहाँ इसके मार्ग के निचले भागों में भारी बाढ़ें आती हैं, गोदावरी एक सुदृश्य प्रपात की रचना करती है। इसके डेल्टाई भाग में ही नौसंचालन संभव है। राजामुंद्री के बाद यह नदी कई धाराओं में विभक्त होकर एक बृहत डेल्टा का निर्माण करती है।

कृष्णा पूर्व दिशा में बहने वाली दूसरी बड़ी प्रायद्वीपीय नदी है, जो सह्याद्रि में महाबलेश्वर के निकट निकलती है। इसकी कुल लंबाई 1,401 किलोमीटर है। कोयना, तुंगभद्रा और भीमा इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। इस नदी के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 27 प्रतिशत भाग महाराष्ट्र में, 44 प्रतिशत भाग कर्नाटक में और 29 प्रतिशत भाग आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पड़ता है।

कावेरी नदी कर्नाटक के कोगाडु जिले में बह्मगिरी पहाड़ियों (1,341 मीटर) से निकलती है। इसकी लंबाई 800 किलोमीटर है और यह 81,155 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपवाहित करती है। प्रायद्वीप की अन्य नदियों की अपेक्षा कम उतार-चढ़ाव के साथ यह नदी लगभग सारा साल बहती है, क्योंकि इसके ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में दक्षिण-पश्चिम मानसून (गर्मी) से और निम्न क्षेत्रों में उत्तर-पूर्वी मानसून (सर्दी) से वर्षा होती है। इस नदी की द्रोणी का 3 प्रतिशत भाग केरल में, 41 प्रतिशत भाग कर्नाटक में और 56 प्रतिशत भाग तमिलनाडु में पड़ता है। इसकी महत्त्वपूर्ण सहायक नदियाँ काबीनी, भवानी और अमरावती हैं।

नर्मदा नदी अमरकंटक पठार के पश्चिमी पार्श्व से लगभग 1,057 मीटर की ऊँचाई से निकलती है। दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में विंध्याचल श्रेणियों के मध्य यह भ्रंश घाटी से बहती हुई संगमरमर की चट्टानों में खूबसूरत महाखड्ड और जबलपुर के निकट धुआँधार जल प्रपात बनाती है। लगभग 1,312 किलोमीटर दूरी तक बहने के बाद यह भड़ौच के दक्षिण में अरब सागर में मिलती है और 27 किलोमीटर लंबा ज्वारनदमुख बनाती है। सरदार सरोवर परियोजना इसी नदी पर बनाई गई है।

नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए प्रारंभ की गई योजना "नमामि देवि नर्मदे - एक यात्रा" के विषय में जानकारी एकत्रित करें और आपस में चर्चा करें।

तापी पश्चिम दिशा में बहने वाली एक अन्य महत्त्वपूर्ण नदी है। यह मध्य प्रदेश में बेतूल जिले में मुलताई से निकलती है। यह 724 किलोमीटर लंबी नदी है और लगभग 65,145 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपवाहित करती है। इसके अपवाह क्षेत्र का 79 प्रतिशत भाग महाराष्ट्र में, 15 प्रतिशत भाग मध्य प्रदेश में और शेष 6 प्रतिशत भाग गुजरात में पड़ता है।

अरावली के पश्चिम में लूनी राजस्थान का सबसे बड़ा नदी-तंत्र है। यह पुष्कर के समीप दो धाराओं (सरस्वती और सागरमती) के रूप में उत्पन्न होती है, जो गोबिंदगढ़ के निकट आपस में मिल जाती हैं। यहाँ से यह नदी अरावली पहाड़ियों से निकलती है और लूनी कहलाती है। तलवाड़ा तक यह पश्चिम दिशा में बहती है और तत्पश्चात् दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती हुई कच्छ के रन में जा मिलती है। यह संपूर्ण नदी-तंत्र अल्पकालिक है।

पश्चिम की ओर बहने वाली छोटी नदियाँ

अरब सागर की ओर बहने वाली नदियों का जलमार्ग छोटा है। इनका मार्ग छोटा क्यों है? गुजरात की छोटी नदियों को ढूँढ़ें। शेतरूनीजी एक एेसी ही नदी है, जो अमरावली जिले में डलकाहवा से निकलती है। भद्रा नदी राजकोट जिले के अनियाली गाँव के निकट से निकलती है। ढाढर नदी पंचमहल जिले के घंटार गाँव से निकलती है। साबरमती और माही गुजरात की दो प्रसिद्ध नदियाँ हैं।

इन नदियों के संगम-स्थल ढूँढ़िए। महाराष्ट्र के पश्चिम की ओर बहने वाली कुछ नदियों का भी पता लगाएँ

नासिक जिले में त्रिंबक पहाड़ियों में 670 मीटर की ऊँचाई पर वैतरणा नदी निकलती है। कालिंदी नदी बेलगाँव जिले से निकलकर करवा\ड़ की खाड़ी में गिरती है। बेद्ति नदी हुबली (धारवाड़) से निकलती है और 161 किलोमीटर लंबा मार्ग तय करती है। शरावती पश्चिम की ओर बहने वाली कर्नाटक की एक अन्य महत्त्वपूर्ण नदी है। शरावती कर्नाटक के शिमोगा जिले से निकलती है और इसका जलग्रहण क्षेत्र 2,209 वर्ग किलोमीटर है।

उस नदी का नाम ज्ञात करें जिस पर गरसोप्पा (जोग) प्रपात है।

गोवा में दो महत्त्वपूर्ण नदियाँ हैं, जिनका यहाँ उल्लेख किया जा सकता है। एक का नाम मांडवी है और दूसरी जुआरी है। आप इन्हें मानचित्र पर रेखांकित कर सकते हैं। केरल की तट रेखा छोटी है। केरल की सब से बड़ी नदी भरतपूझा अन्नामलाई पहाड़ियों से निकलती है। इसे पाेंनानी के नाम से भी जाना जाता है। यह लगभग 5,397 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अपवाहित करती है। इसके जलग्रहण क्षेत्र की तुलना कर्नाटक की शरावती नदी के जलग्रहण क्षेत्र से कीजिए।

पेरियार केरल की दूसरी सबसे बड़ी नदी है। इसका जलग्रहण क्षेत्र लगभग 5,243 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। आप देख सकते हैं कि यास्थापूझा और पेरियार नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में बहुत कम अंतर है।

केरल की अन्य उल्लेखनीय नदी पांबा है, जो उत्तरी केरल में 177 किलोमीटर लंबा मार्ग तय करती हुई वेंबानाद झील में जा गिरती है।

केरल की अन्य उल्लेखनीय नदी पांबा है, जो उत्तरी केरल में 177 किलोमीटर लंबा मार्ग तय करती हुई वेंबानाद झील में जा गिरती है।

अध्यापक महोदय पश्चिम की ओर बहने वाली छोटी नदियों के तुलनात्मक महत्त्व की 
व्याख्या कर सकते हैं
नदी

 जलग्रहण क्षेत्र वर्ग कि.मी.

साबरमती
माही
ढाढ
कालिंदी
शरावती 
भरतपूझा 
पेरियार

21,674
34,842
2,770
5,179
2,029
5,397
5,243

पूर्व की ओर बहने वाली छोटी नदियाँ

प्रायद्वीप में बहुत बड़ी संख्या में नदियाँ अपनी सहायक नदियों के साथ पूर्व की ओर प्रवाहित होती हैं। क्या इनमें से कुछ के नाम आप बता सकते हैं? कुुछ छोटी नदियाँ बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। छोटी होने के बावजूद इन नदियों का अपना महत्त्व है। स्वर्णरेखा, वैतरणी, ब्रह्मणी, वामसाधारा, पेंनर, पालार और वैगाई महत्त्वपूर्ण नदियाँ हैं। एटलस में इन नदियों को ढूँढ़ें।

अध्यापक महोदय पूर्व की  बहने वाली इन छोटी 
नदियों के तुलनात्मक महत्त्व की व्याख्या कर सकते हैं
नदी

 जलग्रहण क्षेत्र वर्ग कि.मी.

स्वर्ण रेखा 
वैतरणी
ब्रह्मणी
पेंनर
पालार

19,926
12,789
39,033
55,213
17,870

नदी बहाव प्रवृत्ति

क्या आप जानते हैं कि नदी में बहने वाले जल की मात्रा सारा साल एक समान नहीं रहती? इसमें ऋतुओं के अनुसार बदलाव आता रहता है। किस ऋतु में, आप गंगा व कावेरी नदियों में सर्वाधिक प्रवाह की अपेक्षा कर सकते हैं? एक नदी के चैनल में वर्षपर्यंत जल प्रवाह के प्रारूप को नदी बहाव प्रवृत्ति (River regime) कहा जाता है। उत्तर भारत की हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बारहमासी हैं, क्योंकि ये अपना जल बर्फ पिघलने तथा वर्षा होने से प्राप्त करती हैं। दक्षिण भारत की नदियाँ हिमनदों से नहीं निकलती जिससे इनकी बहाव प्रवृत्ति में उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है। इनका बहाव मानसून ऋतु में काफी ज्यादा बढ़ जाता है। इस प्रकार दक्षिण भारत की नदियों के बहाव की प्रवृत्ति वर्षा द्वारा नियंत्रित होती है, जो प्रायद्वीपीय पठार के एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न होती है।

जल विसर्जन (Discharge) नदी में समयानुसार जल प्रवाह के आयतन का माप है। इसे क्यूसेक्स (क्यूबिक फुट प्रति सैकेंड) या क्यूमैक्स (क्यूबिक मीटर प्रति सैकेंड) में मापा जाता है।

गंगा नदी में न्यूनतम जल प्रवाह जनवरी से जून की अवधि के दौरान होता है। अधिकतम प्रवाह अगस्त या सितंबर में प्राप्त होता है। सितंबर के बाद प्रवाह में लगातार कमी होती चली जाती है। इस प्रकार इस नदी की वर्षा ऋतु में जल प्रवाह की प्रवृत्ति मानसूनी होती है।

गंगा द्रोणी के पूर्वी व पश्चिमी भागों की जल बहाव प्रवृत्ति में चौंकाने वाले अंतर नज़र आते हैं। बर्फ पिघलने के कारण गंगा नदी का प्रवाह मानसून आने से पहले भी काफी बड़ा होता है। फरक्का में गंगा नदी का औसत
अधिकतम जल प्रवाह लगभग 55,000 क्यूसेक्स है, जबकि न्यूनतम औसत केवल 1,300 क्यूसेक्स है। जल-प्रवाह में इतने अधिक अंतर के लिए कौन-से कारक उत्तरदायी हैं?

प्रायद्वीप की दो नदियों की प्रवाह प्रवृत्ति हिमालय के नदियों की तुलना में रोचक अंतर प्रस्तुत करती हैं। नर्मदा नदी में जल विसर्जन का स्तर जनवरी से जुलाई माह तक बहुत कम रहता है, लेकिन अगस्त में इस नदी का जल-प्रवाह अधिकतम हो जाता है, तो यह अचानक उ\फ़ान पर आ जाती हैै। अक्तूबर महीने में बहाव की गिरावट उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितना अगस्त में उ\फ़ान। गरूड़ेश्वर में दर्ज इस नदी के बहाव के आँकड़े बताते हैं कि इसका अधिकतम बहाव 2,300 क्यूसेक्स तथा न्यूनतम बहाव 15 क्यूसेक्स है। गोदावरी में न्यूनतम प्रवाह मई में और अधिकतम जुलाई-अगस्त में होता है। अगस्त माह के पश्चात् इनके प्रवाह में भारी कमी आती है, लेकिन फिर भी अक्तूबर और नवंबर में प्रवाह का आयतन जनवरी से मई तक किसी भी माह की तुलना में अधिक रहता है। पोलावरम् में गोदावरी नदी का औसत अधिकतम विसर्जन 3,200 क्यूसेक्स और न्यूनतम औसत केवल 50 क्यूसेक्स होता है। ये आँकड़े नदी की प्रवाह प्रवृत्ति की जानकारी देते हैं।

नदी जल उपयोग की सीमा

भारत की नदियाँ प्रतिवर्ष जल की विशाल मात्रा का वहन करती हैं, लेकिन समय व स्थान की दृष्टि से इसका वितरण समान नहीं है। बारहमासी नदियाँ वर्ष भर जल का वहन करती हैं, परंतु अनित्यवाही नदियों में शुष्क ऋतु में बहुत कम जल होता है। वर्षा ऋतु में, अधिकांश जल बाढ़ में व्यर्थ हो जाता है और समुद्र में बह जाता है। इसी प्रकार, जब देश के एक भाग में बाढ़ होती है तो दूसरा सूखाग्रस्त होता है। एेसा क्यों होता है? क्या यह जल उपलब्धता की समस्या है या इसके प्रबंधन की? क्या आप देश में एक साथ आने वाली बाढ़ और सूखे की समस्या को कम करने के उपाय सुझा सकते हैं? (इस पुस्तक में अध्याय 7 देखें)।


तालिका 3.1 : हिमालयी व प्रायद्वीपीय नदियों की तुलना

क्र. सं. पक्ष हिमालयी नदी प्रायद्वीपीय नदी
1.

उद्गम स्थल
 हिम नदियों से ढके हिमालय पर्वत
प्रायद्वीपीय पठार व मध्य उच्चभूमि
2. प्रवाह प्रवृत्ति बारहमासी: हिमनद व वर्षा से जल प्राप्ति
मौसमी; मानसून वर्षा पर निर्भर
3. अप्रवाह के प्रकार पूर्ववर्ती व अनुवर्ती; मैदानी भाग में वृक्षाकार प्रारूप

अध्यारोपित, पुनर्युवनित नदियाँ, अरीय व आयताकार प्रारूप बनाती हुई

4. नदी की प्रकृति लंबा मार्ग, उबड़-खाबड़ पर्वतों से गुजरती नदियाँ, अभिशीर्ष अपरदन व नदी  अपहरण, मैदानों में जल मार्ग बदलनातथा विसर्प बनाना सुसमायोजित घाटियों के साथ छोटे, निश्चित मार्ग
5. जलग्रहण क्षेत्र बहुत बड़ी द्रोणी अपेक्षाकृत छोटी द्रोणी
6.
नदी की आयु
युवा, क्रियाशील व घाटियों को गहरा करना

प्रवणित परिच्छेदिका वाली प्रौढ़ नदियाँ, जो अपने आधार तल जा पहुँची हैं।

क्या एक द्रोणी की जल-आधिक्य को जल की कमी वाली द्रोणियों में स्थानांतरित करके इस समस्या को समाप्त अथवा कम किया जा सकता है? क्या हमारे देश में नदियों की द्रोणियों को जोड़ने संबंधी कोई योजना बनाई गई है?

क्या आपने समाचार-पत्रों में नदियों को आपस में जोड़ने के बारे में पढ़ा है? क्या आप समझते हैं कि मात्र नहर बनाकर गंगा नदी का पानी प्रायद्वीपीय नदियों में स्थानांतरित किया जा सकता है? मुख्य समस्या क्या है? इसी पुस्तक के दूसरे अध्याय को देखें और धरातल के ऊबड़-खाबड़ होने से उत्पन्न कठिनाइयों को जानें। मैदानी क्षेत्रों से पठारी क्षेत्र में जल कैसे उठाया जा सकता है? क्या उत्तर भारत की नदियों में पर्याप्त जलाधिक्य है, जिसे स्थायी तौर पर स्थानांतरित किया जा सकता है? इस पूरे मुद्दे पर वाद-विवाद का आयोजन करें व एक लेख तैयार करें। नदी जल उपयोग से संबंधित निम्नलिखित समस्याओं को आप किस प्रकार क्रम देते हैं?

(i) पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध न होना;

(ii) नदी जल प्रदूषण;

(iii) नदी जल में गाद;

(iv) ऋतुवन जल का असमान प्रवाह;

(v) राज्यों के बीच नदी जल-विवाद;

(vi) मध्य धारा की ओर बस्तियों के विस्तार के कारण नदी वाहिकाओं का सिकुड़ना।

नदियाँ प्रदूषित क्यों हैं? क्या आपने शहरों के गंदे पानी को नदियों में गिरते देखा है? औद्योगिक कूड़ा-करकट कहाँ डाला जाता है? बहुत से श्मशान घाट नदी किनारे हैं और कई बार मृत शरीरों को नदियों में डाल दिया जाता है। कुछ त्योहारों पर फूलों और मूर्तियों को नदियों में डुबो दिया जाता है। बड़े पैमाने पर स्नान व कपड़े धोना भी नदी जल को प्रदूषित करता है। नदियों को प्रदूषण मुक्त कैसे किया जा सकता है? क्या आपने गंगा एक्शन प्लान और दिल्ली में यमुना सफाई अभियान के विषय में पढ़ा है? नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने हेतु योजनाओं पर सामग्री एकत्र करें व इस सामग्री को एक लेख के रूप में व्यवस्थित करें।

अध्यापक निम्नलिखित उदाहरणों की व्याख्या कर सकते हैं :

पेरियार दिक्परिवर्तन (Diversion) योजना;

इंदिरा गाँधी नहर परियोजना;

कुर्नूल-कुडप्पा नहर;

व्यास-सतलुज लिंक नहर;

गंगा-कावेरी लिंक नहर।


अभ्यास

1. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए :

(i) निम्नलिखित में से कौन-सी नदी ‘बंगाल का शोक’ के नाम से जानी जाती थी?

(क) गंडक            (ख) कोसी

(ग) सोन              (घ) दामोदर

(ii) निम्नलिखित में से किस नदी की द्रोणी भारत में सबसे बड़ी है?

(क) सिंधु            (ख) बह्मपुत्र

(ग) गंगा              (घ) कृष्णा

(iii) निम्नलिखित में से कौन-सी नदी पंचनद में शामिल नहीं है?

(क) रावी          (ख) सिंधु

(ग) चेनाब         (घ) झेलम

(iv) निम्नलिखित में से कौन-सी नदी भ्रंश घाटी में बहती है?

(क) सोन          (ख) यमुना

(ग) नर्मदा         (घ) लूनी

(v) निम्नलिखित में से कौन-सा अलकनंदा व भागीरथी का संगम स्थल है?

(क) विष्णु प्रयाग        (ख) रूद्र प्रयाग

(ग) कर्ण प्रयाग          (घ) देव प्रयाग

2. निम्न में अंतर स्पष्ट करें :

(i) नदी द्रोणी और जल-संभर;

(ii) वृक्षाकार और जालीनुमा अपवाह प्रारूप;

(iii) अपकेंद्रीय और अभिकेंद्रीय अपवाह प्रारूप;

(iv) डेल्टा और ज्वारनदमुख।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दें।

(i) भारत में नदियों को आपस में जोड़ने के सामाजिक-आर्थिक लाभ क्या हैं?

(ii) प्रायद्वीपीय नदी के तीन लक्षण लिखें।

4. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 125 शब्दों से अधिक में न दें।

(i) उत्तर भारतीय नदियों की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ क्या हैं? ये प्रायद्वीपीय नदियों से किस प्रकार भिन्न हैं?

(ii) मान लीजिए आप हिमालय के गिरिपद के साथ-साथ हरिद्वार से सिलीगुड़ी तक यात्रा कर रहे हैं। इस मार्ग में आने वाली मुख्य नदियों के नाम बताएँ। इनमें से किसी एक नदी की विशेषताओं का भी वर्णन करें।

परियोजना/क्रियाकलाप

परिशिष्ट-III का अध्ययन करें और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दें।

(i) देश में किस नदी के जलग्रहण क्षेत्र का अनुपात सबसे ज़्यादा है?

(ii) दियों के मार्गों की लंबाई को प्रदर्शित करने के लिए ग्राफ़ पेपर पर एक तुलनात्मक दंड आरेख बनाएँ।