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विषय
8

 
संस्कृतियों का टकराव

इस अध्याय में पंद्रहवीं से सत्रहवीं शताब्दियों के दौरान यूरोपवासियों और उत्तरी तथा दक्षिणी अमरीका के मूल निवासियों के बीच हुए संघर्ष के कुछ पहलुओं पर विचार किया जाएगा। इस अवधि में यूरोपवासियों ने एेसे देशों के व्यापारिक भागों की खोज के लिए अज्ञात महासागरों में साहसपूर्ण अभियान किये जहाँ से वे चाँदी और मसाले प्राप्त कर सकते थे। इस काम को सर्वप्रथम स्पेन और पुर्तगाल के निवासियोेें ने शुरू किया। उन्होंने पोप से उन प्रदेशों पर शासन करने का अनन्य अधिकार प्राप्त कर लिया जिन्हें वे भविष्य में खोजेंगे। स्पेन के शासकों के तत्त्वावधान में इटली निवासी क्रिस्टोफर कोलंबस 1492 में पूर्व की ओर यात्रा करते-करते, जिन प्रदेशों में पहुँचा उन्हें उसने ‘इंडीज’ (भारत और भारत के पूर्व में स्थित देश, जिनके बारे में उसने मार्को पोलो (Marco Polo) के यात्रा-वृत्तांतों में पढ़ रखा था) समझा।

बाद में हुई खोजों से पता चला कि ‘नयी दुनिया’ के ‘इंडियन’ वास्तव में भारतीय नहीं बल्कि अलग संस्कृतियों के लोग थे और वे जहाँ रहते थे वह एशिया का हिस्सा नहीं था। उस समय उत्तरी व दक्षिणी अमरीका में दो तरह की संस्कृतियों के लोग रहते थे–एक ओर कैरीबियन क्षेत्र तथा ब्राज़ील में छोटी निर्वाह अर्थव्यवस्थाएँ (subsistence economy) थीं। दूसरी ओर विकसित खेती और खनन पर आधारित शक्तिशाली राजतांत्रिक व्यवस्थाएँ थीं। मैक्सिको और मध्य अमरीका के एज़टेक और माया समुदाय और पेरू के इंका समुदाय के समान यहाँ भव्य वास्तुकला थी।

दक्षिण अमरीका की खोज और बाद में बाहरी लोगों का वहाँ बस जाना वहाँ के मूल निवासियों और उनकी संस्कृतियों के लिए विनाशकारी साबित हुआ। इसी से दास-व्यापार की शुरुआत हो गई जिसके अंतर्गत यूरोपवासी अफ़्रीका से गुलाम पकड़कर या खरीदकर उत्तरी तथा दक्षिणी अमरीका की खानों तथा बागानों में काम करने के लिए बेचने लगे।

अमरीका के लोगों पर यूरोपवासियों की विजय का एक दुष्परिणाम यह हुआ कि अमरीकी लोगों की पांडुलिपियों और स्मारकों को निर्ममतापूर्वक नष्ट कर दिया गया। इसके बाद उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दौर में जाकर ही मानवविज्ञानियों द्वारा इन संस्कृतियों का अध्ययन प्रारंभ किया गया और उसके बाद पुरातत्त्वविदों ने इन सभ्यताओं के भग्नावशेषों को खोज निकाला। सन् 1911 में इंकाई शहर माचू-पिच्चू (Machu Picchu)की फिर से खोज की गई। हाल में, हवाई जहाज़ से लिए गए चित्रों से पता चला है कि वहाँ और भी कई शहर थे जो अब जंगलों से ढके हुए हैं।

हम अमरीका के मूल निवासियों तथा यूरोपवासियों के बीच हुई मुठभेड़ों के बारे में मूलनिवासियों के पक्ष को तो अधिक नहीं जानते पर यूरोपीय पक्ष को विस्तारपूर्वक जानते हैं। जो यूरोपवासी अमरीका की यात्राओं पर गए वे अपने साथ रोजनामचा (log-book) और डायरियाँ रखते थे जिसमें वे अपनी यात्राओं का दैनिक विवरण लिखते थे। हमें सरकारी अधिकारियों, एवं जेसुइट धर्मप्रचारकों के विवरणों से भी इसके बारे में जानकारी मिलती है। लेकिन यूरोपवासियों ने अपनी अमरीका की खोज के बारे में जो कुछ विवरण दिया है और वहाँ के देशों के जो इतिहास लिखे हैं उनमेें यूरोपीय बस्तियों के बारे मेें ही अधिक और स्थानीय लोगों के बारे मंें बहुत कम या न के बराबर ही लिखा गया है।

अनेक जन-समुदाय उत्तरी तथा दक्षिणी अमरीका और निकटवर्ती द्वीपसमूहों में हजारों वर्षों से रहते आए थे और एशिया तथा दक्षिणी सागर के द्वीपों (South Sea Islands) से जाकर लोग वहाँ बसते रहे थे। दक्षिणी अमरीका घने जंगलों और पहाड़ों से ढका हुआ था (आज भी उसके अनेक भाग जंगलों से ढके हैं) और दुनिया की सबसे बड़ी नदी अमेज़न (Amazon) मीलों तक वहाँ के घने जंगली इलाकों से होकर बहती है। मध्य अमरीका में, मैक्सिको मंें समुद्रतट के आसपास के क्षेत्र और मैदानी इलाके घने बसे हुए थे, जबकि अन्यत्र सघन वनों वाले क्षेत्रों में गाँव दूर-दूर स्थित थे।

कैरीबियन द्वीपसमूह और ब्राज़ील के जन-समुदाय

अरावाकी लुकायो (Arawakian Lucayos) समुदाय के लोग कैरीबियन सागर में स्थित छोटे-छोटे सैकड़ों द्वीपसमूहों (जिन्हें आज बहामा (Bahamas) कहा जाता है) और बृहत्तर एेंटिलीज (Greater Antilles) में रहते थे। कैरिब (Caribs) नाम के एक खूंखार कबीले ने उन्हें लघु एेंटिलीज (Lesser Antilles) प्रदेश से खदेड़ दिया था। इनके विपरीत, अरावाक लोग एेसे थे, जो लड़ने की बजाय बातचीत से झगड़ा निपटाना अधिक पसंद करते थे। वे कुशल नौका-निर्माता थे (वे पेड़ के खोखले तनों से अपनी डोंगियाँ बनाते थे) और डोंगियों में बैठकर खुले समुद्र में यात्रा करते थे। वे खेती, शिकार और मछली पकड़कर अपना जीवन-निर्वाह करते थे। खेती में वे मक्का, मीठे आलू और अन्य किस्म के कंद-मूल और कसावा उगाते थे।

जीववादियों का विश्वास है कि आज के वैज्ञानिक जिन वस्तुओं को निर्जीव मानते हैं उनमें भी जीवन या आत्मा हो सकती है।

8.1
मानचित्र 1: मध्य अमरीका और कैरीबियन द्वीपसमूह।
क्रियाकलाप 1

अरावाकों और स्पेनवासियों के अीच पाए जाने वाले अंतरों को स्पष्ट कीजिए। इनमें से कौन से अंतरों को आप सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं और क्यों?

अरावाक संस्कृति के लोगों का मुख्य सांस्कृतिक मूल्याधार यह था कि वे सब एक साथ मिलकर खाद्य उत्पादन करें और समुदाय के प्रत्येक सदस्य को भोजन प्राप्त हो। वे अपने वंश के बुजुर्गों के अधीन संगठित रहते थे। उनमें बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। वे जीववादी (Animists) थे। अन्य अनेक समाजों की तरह अरावाक समाज में भी शमन लोग (Shamans) कष्ट निवारकों और इहलोक तथा परलोक के बीच मध्यस्थों के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे।

अरावाक लोग सोने के गहने पहनते थे पर यूरोपवासियों की तरह सोने को उतना महत्त्व नहीं देते थे। उन्हें अगर कोई यूरोपवासी सोने के बदले काँच के मनके दे देता था तो वे खुश होते थे क्योंकि उन्हें काँच का मनका ज़्यादा सुंदर दिखाई देता था। उनमें बुनाई की कला बहुत विकसित थी–हैमक (Hammock) यानी झूले का इस्तेमाल उनकी एक विशेषता थी जिसे यूरोपीय लोगों ने बहुत पसंद किया।

अरावाकों का व्यवहार बहुत उदारतापूर्ण होता था और वे सोने की तलाश में स्पेनी लोगों का साथ देने के लिए सदा तैयार रहते थे। लेकिन आगे चलकर जब स्पेन की नीति क्रूरतापूर्ण हो गई तब उन्होंने उसका विरोध किया परन्तु उन्हें उसके विनाशकारी परिणाम भुगतने पड़े। स्पेनी लोगों के संपर्क में आने के बाद कोई पच्चीस साल के भीतर ही अरावाकों और उनकी जीवन शैली का लगभग सत्यानाश ही हो गया।

‘तुपिनांबा’ (Tupinamba) कहे जाने वाले लोग दक्षिणी अमरीका के पूर्वी समुद्र तट पर और ब्राज़ील नामक पेड़ों के जंगलों में बसे हुए गाँवों में रहते थे (ब्राज़ील पेड़ के नाम पर ही इस प्रदेश का नाम ब्राज़ील पड़ा)। वे खेती के लिए घने जंगलों का सफाया नहीं कर सके क्योंकि पेड़ काटने का कुल्हाड़ा बनाने के लिए उनके पास लोहा नहीं था। लेकिन उन्हें बहुतायत से फल, सब्जियाँ और मछलियाँ मिल जाती थीं जिससे उन्हें खेती पर निर्भर नहीं होना पड़ा। जो यूरोपवासी उनसे मिले, वे उनकी खुशहाल आजादी को देखकर उनसे ईर्ष्या करने लगे, क्योंकि वहाँ न कोई राजा था, न सेना और न ही कोई चर्च था जो उनकी ज़िंदगी को नियंत्रित कर सके।


मध्य और दक्षिणी अमरीका की राज्
य-व्यवस्थाएँ

कैरीबियन और ब्राज़ील क्षेत्रों के विपरीत, मध्य अमरीका में कुछ अत्यंत सुगठित राज्य थे। वहाँ मक्के की उपज उनकी आवश्यकता से अधिक होती थी जो एज़टेक, माया और इंका जनसमुदायों की शहरीकृत सभ्यताओं का आधार बनी। इन शहरों की भव्य वास्तुकला के अवशेष आज भी आगंतुकों को मुग्ध कर देते हैं।


एज़टेक जन

बारहवीं शताब्दी में एज़टेक लोग उत्तर से आकर मेक्सिको की मध्यवर्ती घाटी में बस गए थे। (इस घाटी का यह नाम उनके मेक्सिली (mexitli) नामक देवता के नाम पर पड़ा था।) उन्होंने अनेक जनजातियों को परास्त करके अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया और उन पराजित लोगों से नज़राना वसूल करने लगे

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बॉल कोर्ट मारकर पर उत्कीर्ण तिथियाँ, माया संस्कृति, काईपास, छठी शताब्दी।

एज़टेक समाज श्रेणीबद्ध था। अभिजात वर्ग में वे लोग शामिल थे जो उच्च कुलोत्पन्न, पुरोहित थे अथवा जिन्हें बाद में यह प्रतिष्ठा प्रदान कर दी गई थी। पुश्तैनी अभिजातों की संख्या बहुत कम थी और वे सरकार, सेना तथा पौरोहित्य कर्म में ऊँचे पदों पर आसीन थे। अभिजात लोग अपने में से एक सर्वोच्च नेता चुनते थे जो आजीवन शासक बना रहता था। राजा पृथ्वी पर सूर्य देवता का प्रतिनिधि माना जाता था। योद्धा, पुरोहित और अभिजात वर्गों को सबसे अधिक सम्मान दिया जाता था; लेकिन व्यापारियों को भी अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे और उन्हें अक्सर सरकारी राजदूतों और गुप्तचरों के रूप में सेवा करने का मौका दिया जाता था। प्रतिभाशाली शिल्पियों, चिकित्सकों और विशिष्ट अध्यापकों को भी आदर की दृष्टि से देखा जाता था

भूमि उद्धार का अभिप्राय बंजर भूमि को आवासीय या कृषि योग्य भूमि में परिवर्तन से है। कई बार, भूमि उद्धार विभिन्न जलस्रोतों से जमीन लेकर भी किया जाता है।

चूँकि एज़टेक लोगों के पास भूमि की कमी थी इसलिए उन्होंने भूमि उद्धार (reclamation, जल में से जमीन लेकर इस कमी को पूरा करना) किया। सरकंडे की बहुत बड़ी चटाइयाँ बुनकर और उन्हें मिट्टी तथा पत्तों से ढँककर उन्होंने मैक्सिको झील में कृत्रिम टापू बनाये, जिन्हें चिनाम्पा (Chinampas) कहते थे। इन अत्यंत उपजाऊ द्वीपों के बीच नहरें बनाई गईं जिन पर 1325 में एज़टेक राजधानी टेनोक्टिटलान (Tenochtitlan) का निर्माण किया गया, जिसके राजमहल और पिरामिड झील के बीच में खड़े हुए बड़े अद्भुत लगते थे। चूंकि एज़टेक शासक अक्सर युद्ध में लगे रहते थे, इसलिए उनके सर्वाधिक भव्य मंदिर भी युद्ध के देवताओं और सूर्य भगवान को समर्पित थे।

साम्राज्य ग्रामीण आधार पर टिका हुआ था। लोग मक्का, फलियाँ, कुम्हड़ा, कद्दू, कसावा, आलू और अन्य फसलें उगाते थे। भूमि का स्वामित्व किसी व्यक्ति विशेष का न होकर कुल (Clan) के पास होता जो सार्वजनिक निर्माण कार्यो को सामूहिक रूप से पूरा करवाता था। यूरोपीय कृषिदासों जैसे खेतिहर लोग अभिजातों की ज़मीनों से जुड़े रहते थे और फसल में से कुछ हिस्से के बदले, उनके खेत जोतते थे, गरीब लोग कभी-कभी अपने बच्चों को भी गुलामों के रूप में बेच देते थे; लेकिन यह बिक्री आमतौर पर कुछ वर्षों के लिए ही की जाती थी और गुलाम अपनी आजादी फिर से खरीद सकते थे।

एज़टेक लोग इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखते थे कि उनके सभी बच्चे स्कूल अवश्य जाएँ। कुलीन वर्ग के बच्चे कालमेकाक (Calmecac) में भर्ती किए जाते थे जहाँ उन्हें सेना अधिकारी और धार्मिक नेता बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। बाकी सारे बच्चे पड़ोस के तेपोकल्ली स्कूल (Tepochcalli) में पढ़ते थे जहाँ उन्हें इतिहास, पुराण-मिथकों, धर्म और उत्सवी गीतों की शिक्षा दी जाती थी। लड़कों को सैन्य प्रशिक्षण, खेती और व्यापार करना सिखाया जाता था और लड़कियों को घरेलू काम-धंधों में कुशलता प्रदान की जाती थी।

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माया मंदिर, टिकल, ग्वातेमाला, आठवीं शताब्दी।

सोलहवीं शताब्दी के शुरू के सालों में, एज़टेक साम्राज्य में अस्थिरता के लक्षण दिखाई देने लगे। यह स्थिति हाल ही में जीते गए लोगों में उत्पन्न असंतोष के कारण पैदा हुई, जो केंद्रीय नियंत्रण से मुक्त होने के अवसर खोजने लगे।


माया लोग

मेक्सिको की माया संस्कृति ने ग्याहरवीं से चौदहवीं शताब्दियों के दौरान उल्लेखनीय उन्नति की, लेकिन सोलहवीं शताब्दी में माया लोगों के पास राजनीतिक शक्ति एज़टेक लोगों की अपेक्षा कम थी। मक्के की खेती उनकी सभ्यता का मुख्य आधार थी और उनके अनेक धार्मिक क्रियाकलाप एवं उत्सव मक्का बोने, उगाने और काटने से जुड़े होते थे। खेती करने के तरीके उन्नत और कुशलतापूर्ण थे, जिनके कारण खेतोें में बेशुमार पैदावार होती थी। इससे शासक वर्ग, पुरोहितों और प्रधानोें को एक उन्नत संस्कृति का विकास करने में सहायता मिली जिसके अंतर्गत वास्तुकला, खगोल विज्ञान और गणित जैसे विषयों की अभिव्यक्ति हुई। माया लोगों के पास अपनी एक चित्रात्मक लिपि थी। लेकिन इस लिपि को अभी तक पूरी तरह नहीं पढ़ा जा सका है।


पेरू के इंका लोग

दक्षिणी अमरीकी देशज संस्कृतियों में से सबसे बड़ी पेरू में क्वेचुआ (Quechuas) या इंका (Inca) लोगों की संस्कृति थी। बारहवीं शताब्दी में प्रथम इंका शासक मैंको कपाक (Manco Capac) ने कुज़को (Cuzco) में अपनी राजधानी स्थापित की थी। नौवें इंका शासक के काल में राज्य का विस्तार शुरू हुआ और अंततः इंका साम्राज्य इक्वेडोर से चिली तक 3000 मील में फैल गया।

साम्राज्य अत्यंत केंद्रीकृत था। राजा में ही संपूर्ण शक्ति निहित थी और वह ही सत्ता का उच्चतम स्रोत था। नए जीते गए कबीलों और जनजातियों को पूरी तरह अपने भीतर मिला लिया गया। प्रत्येक प्रजाजन को प्रशासन की भाषा क्वेचुआ (Quechua) बोलनी पड़ती थी। प्रत्येक कबीला स्वतंत्र रूप से वरिष्ठों की एक सभा द्वारा शासित होता था, लेकिन पूरा कबीला अपने आप में शासक के प्रति निष्ठावान था। साथ ही साथ स्थानीय शासकों को उनके सैनिक सहयोग के लिए पुरस्कृत किया जाता था। इस प्रकार, एज़टेक साम्राज्य की ही तरह इंका साम्राज्य इंकाइयों के नियंत्रण वाले एक संघ के समान था। आबादी के निश्चित आँकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं लेकिन एेसा लगता है कि 10 लाख से ज़्यादा लोग इस साम्राज्य में थे।

8.2
मानचित्र 2ः दक्षिणी अमरीका।

एज़टेक लोगों की तरह इंका भी उच्चकोटि के भवन निर्माता थे। उन्होंने पहाड़ों के बीच इक्वेडोर से चिली तक अनेक सड़कें बनाई थीं। उनके किले शिलापट्टियों को इतनी बारीकी से तराश कर बनाए जाते थे कि उन्हें जोड़ने के लिए गारे जैसी सामग्री की जरूरत नहीं होती थी। वे निकटवर्ती इलाकों में टूटकर गिरी हुई चट्टानों से पत्थरों को तराशने और ले जाने के लिए श्रम-प्रधान प्रौद्योगिकी का उपयोग करते थे जिसमें अपेक्षाकृत अधिक संख्या में मज़दूरों की ज़रूरत पड़ती थी। राज मिस्त्री खंडों को सुंदर रूप देने के लिए शल्क पद्धति (फ्लेकिंग) का प्रयोग करते थे जो प्रभावकारी होने के साथ-साथ सरल होती थी। कई शिलाखंड वजन में 100 मेट्रिक टन से भी अधिक भारी होते थे, लेकिन उनके पास इतने बड़े शिलाखंडों को ढोने के लिए पहियेदार गाड़ियाँ नहीं थीं। यह सब काम मज़दूरों को जुटाकर बड़ी सावधानी से करवाया जाता था।

इंका सभ्यता का आधार कृषि था। उनके यहाँ जमीन खेती के लिए बहुत उपजाऊ नहीं थी इसलिए उन्होंने पहाड़ी इलाकों में सीढ़ीदार खेत बनाए और जल-निकासी तथा सिंचाई की प्रणालियाँ विकसित कीं। हाल ही में यह बताया गया है कि पंद्रहवीं शताब्दी में एंडियाई अधित्यकाओं (ऊँची भूमियों) में खेती आज की तुलना में काफी अधिक परिमाण मेें की जाती थी। इंका लोग मक्का और आलू उगाते थे और भोजन तथा श्रम के लिए लामा पालते थे।

आज भी अनेक सैलानी इंका लोगों के कला-कौशल के नमूनों को देखकर दंग रह जाते हैं। हालाँकि चिली के कवि नेरुदा (Neruda) जैसे भी कुछ लोग हैं, जिन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला है कि एेसे विपरीत वातावरण में खेती, शिल्प, स्थापत्य आदि के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए हज़ारों लोगों को कितने कठोर परिश्रम के लिए बाध्य किया गया होगा।
"एे खेत जोतने वालो, बुनकरो, ऊँचे खतरनाक मचान पर चढ़कर चिनाई करने वाले राजगीरो, एेंडीज़ के मेहनतकश पनहारो, अपनी कुचली हुई उंगलियों वाले जौहरियो, अपने लगाए पौधों की खुशहाली के लिए चिंतातुर किसानो, मिट्टी में बरबाद हुए कुम्हारो-
ज़रा ज़मीन की गहराइयों से झाँककर मेरी ओर तो देखो;अपने पुराने दुःख-दर्दों को मिट्टी में दफनाकर ज़िंदगी का नया प्याला भर लाओ;
तुमने इन खेतों, खलिहानों, खदानों में जो खून बहाया है जरा उसका नमूना तो मुझे दिखलाओ;
जरा बताओ कि : यहाँ मुझ पर चाबुक की मार पड़ी थी क्योंकि मेरा तराशा गया एक हीरा जरा धुँधला रह गया था। अथवा यह धरती अपने अनाज या पत्थर का हिस्सा समय पर नहीं दे सकी थी।"

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पर्वत के शिखर पर बसा माचू-पिच्चू नगरः इस पर स्पेनियों का निगाह नहीं पड़ी जिसके कारण यह नष्ट नहीं हो पाया।

 – पाबलो नेरुड़ा (1904-1973) हाइट्स अॉफ माचू-पिच्चू, 1943 की पंक्तियों का स्वतंत्र अनुवाद।

उनकी बुनाई और मिट्टी के बर्तन बनाने की कला उच्च कोटि की थी। उन्होंने लेखन की किसी प्रणाली का विकास नहीं किया। किंतु उनके पास हिसाब लगाने की एक प्रणाली अवश्य थी– यह थी क्विपु (Quipu), यानी डोरियों पर गाँठें लगाकर गणितीय इकाइयों का हिसाब रखना। कुछ विद्वानों का विचार है कि इंका लोग इन धागों में एक किस्म का संकेत (code) बुनते थे।

इंका सम्राज्य का ढाँचा पिरामिडनुमा था जिसका मतलब यह था कि जब एक बार इंका प्रधान पकड़ लिया जाता तो उसके शासन की सारी शृंखला तुरंत टूट जाती थी और उस समय भी एेसा ही हुआ जब स्पेनी सैनिकों ने उनके देश पर आक्रमण करने का निश्चय किया।

एज़टेक तथा इंका संस्कृतियों में कुछ समानताएँ थीं, और वे यूरोपीय संस्कृति से बहुत भिन्न थीं। समाज श्रेणीबद्ध था, लेकिन वहाँ यूरोप की तरह कुछ लोगों के हाथों में संसाधनों का निजी स्वामित्व नहीं था। पुरोहितों और शमनों को समाज में ऊँचा स्थान प्राप्त था। यद्यपि भव्य मंदिर बनाए जाते थे, जिनमें परंपरागत रूप से सोने का प्रयोग किया जाता था, लेकिन सोने या चाँदी को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था। तत्कालीन यूरोपीय समाज की स्थिति इस मामले में बिलकुल विपरीत थी।

क्रियाकलाप 2

दक्षिणी अमरीका के प्राकृतिक मानचित्र का अवलोकन करें। आपके अनुसार किस हद तक भूगोल ने इंका साम्राज्य के विकास को प्रभावित किया?


यूरोपवासियों
की खोज यात्राएँ

दक्षिणी अमरीकी और कैरीबियन लोगों को यूरोपवासियों के अस्तित्व का पता तभी चला जब यूरोपवासी अटलांटिक सागर को जहाजों द्वारा पार करके वहाँ पहुँचे। सन् 1380 में कुतबनुमा यानी दिशासूचक यंत्र का आविष्कार हो चुका था जिससे यात्रियों को खुले समुद्र में दिशाओं की सही जानकारी लेने में सहायता मिल सकती थी, लेकिन उसका इस्तेमाल 15वीं शताब्दी में ही जाकर हो पाया, जब लोगों ने अनजान मुल्कों की ओर दुस्साहसिक समुद्री यात्राएँ कीं। इस समय तक, समुद्री यात्रा पर जाने वाले यूरोेपीय जहाज़ों में भी काफी सुधार हो चुका था। बहुत बड़े जहाज़ों का निर्माण होने लगा था, जो विशाल मात्रा में माल की ढुलाई करते थे, साथ ही, आत्मरक्षा के अस्त्र-शस्त्रों से भी लैस होते थे, ताकि शत्रुओं के आक्रमण का मुकाबला किया जा सके। पूरी पंद्रहवीं सदी के दौरान यात्रा-वृत्तांतों और सृष्टि-वर्णन तथा भूगोल की पुस्तकों के प्रसार ने लोगों में व्यापक रुचि उत्पन्न की।

सृष्टिशास्त्र (Cosmography) विश्व का मानचित्र तैयार करने का विज्ञान था। इसमें स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का वर्णन किया जाता था लेकिन इसे भूगोल और खगोल से अलग शास्त्र माना जाता था।

1477 में टॉलेमी की ज्योग्राफी नाम की पुस्तक (जो 1300 वर्ष पहले लिखी गई थी) मुद्रित हुई (विषय 7 देखिए) और इसीलिए लोगों द्वारा व्यापक रूप से पढ़ी गई। मिस्रवासी टॉलेमी ने विभिन्न क्षेत्रों की स्थिति को अक्षांश और देशांतर रेखाओं के रूप में व्यवस्थित किया था। इन विवरणों को पढ़ने से यूरोपवासियों को दुनिया के बारे में कुछ जानकारी मिली जिसे उन्होंने तीन महाद्वीपों यानी यूरोप, एशिया और अफ़्रीका में बँटा हुआ समझा। टॉलेमी ने बताया था कि दुनिया गोल (Spherical) है, लेकिन उसने महासागरों की चौड़ाई को काफ़ी कम आँका था। यूरोपवासियों को इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि अटलांटिक के दूसरी ओर भूमि पर पहुँचने के लिए उन्हें कितनी दूरी तय करनी होगी। चूँकि वे यह सोचते थे कि यह दूरी बहुत कम होगी इसलिए उनमें से कई बिना सोचे-समझे समुद्रों में उतरने के लिए सदा उतारू रहते थे।

पंद्रहवीं शताब्दी में आईबेरियाई प्रायद्वीप (Iberian Peninsula), यानी स्पेन और पुर्तगाल के लोग इन खोज यात्राओं में सबसे आगे रहे। पहले इतिहासकार इन समुद्री यात्राओं को ‘खोज-यात्रा’ कहा करते थे परंतु, बाद में उन्होंने एेसा कहना छोड़ दिया। बाद के इतिहासकारों ने यह कहा कि अनजान इलाकों की ओर ‘पुरानी दुनिया’ (old world) के लोगों की ये पहली समुद्री यात्राएँ नहीं थीं। पहले भी अरब, चीनी और भारतीय यात्री और प्रशांत द्वीपसमूहों के (पोलिनेशियन तथा मइक्रोनेशियन) नाविक अपने समुद्री जलयानों में बैठकर बड़े-बड़े महासागरों के आरपार जा चुके थे। नार्वे के जलदस्यु (Vikings) ग्यारहवीं शताब्दी में उत्तरी अमरीका पहुँच चुके थे।

स्पेन और पुर्तगाल के शासक ही विशेष रूप से इस समुद्री खोज के लिए धन देने को इतने लालायित क्यों थे? उनके सिर पर सोने तथा धनदौलत के भंडारों और यश एवं सम्मान प्राप्ति की धुन क्यों सवार हुई? दरअसल वे आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक तीन प्रकार के मिले-जुले कारणों से इस कार्य के लिए प्रेरित हुए।

14वीं शताब्दी के मध्य से 15वीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप की अर्थव्यवस्था गिरावट के दौर से गुज़र रही थी (विषय 6 देखिए)। प्लेग और युद्धों ने यूरोप के अनेक भागाें में आबादी को उजाड़ दिया, व्यापार में मंदी आती गई और वहाँ सोने तथा चाँदी की कमी आ गई, जो कि उन दिनों यूरोप में सिक्के बनाने के काम आती थी। यह स्थिति इससे पहले (11वीं से मध्य 14वीं शताब्दी तक) की उस स्थिति से बिलकुल विपरीत थी जब बढ़ते हुए व्यापार ने इटली के नगर-राज्यों को समृद्ध बना दिया था और उसके चलते पूँजी-संचय भी हुआ था। लेकिन 14वीं शताब्दी के बाद के दशकों में लंबी दूरी के व्यापार में गिरावट आ गई, और 1453 में तुर्कों द्वारा कुंस्तुनतुनिया (Constantinople) की विजय के बाद तो वह और भी मुश्किल हो गया। इटलीवासियों ने किसी तरह तुर्कों के साथ व्यवसाय करने का इंतजाम तो कर लिया पर उन्हें व्यापार पर अधिक कर देना पड़ता था।

बाहरी दुनिया के लोगों को ईसाई बनाने की संभावना ने भी यूरोप के धर्मपरायण ईसाइयों को इन साहसिक कार्याें की ओर उन्मुख किया।

यह तो सभी जानते हैं कि तुर्कों के विरुद्ध क्रूसेड (Crusades) (विषय 4 देखिए) यों तो धर्मयुद्ध के रूप में ही प्रारंभ हुए थे पर इन्होंने एशिया के साथ यूरोप के व्यापार में वृद्धि की और एशिया के उत्पादों, विशेष रूप से मसालों के प्रति भी यूरोपवासियाें की रुचि बढ़ाई। यूरोपवासियों को एेसा लगा कि यदि व्यापार के साथ-साथ राजनीतिक नियंत्रण भी स्थापित हो पाए और यूरोपीय देश अधिक गर्म जलवायु वाले स्थानों पर उपनिवेश स्थापित कर पाएँ, तो उन्हें अधिक लाभ होगा।

जब यूरोपवासी सोने और मसालों की खोज में नए-नए प्रदेशों में जाने की बात सोचने लगे तो उन्हें पश्चिमी अफ़्रीका का ध्यान आया जहाँ उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से अब तक किसी तरह का व्यापार नहीं किया था। एक छोटा-सा देश पुर्तगाल, जो 1139 में स्पेन से अलग होकर स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित हो चुका था और मछुवाही तथा नौकायन के क्षेत्र में उसने विशेष कुशलता प्राप्त कर ली थी, ने इस दिशा में पहल की। पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी जो नाविक (Navigator) के नाम से मशहूर था, ने पश्चिमी अफ़्रीका की तटीय यात्रा आयोजित की और 1415 में सिउटा (Ceuta) पर आक्रमण कर दिया। उसके बाद कई अभियान आयोजित किए गए और अफ़्रीका के बोजाडोर अंतरीप में पुर्तगालियों ने अपना व्यापार केंद्र स्थापित कर लिया। अफ़्रीकियों को पकड़-पकड़ कर गुलाम बनाया जाने लगा और स्वर्णधूलि को साफ करके सोना तैयार किया जाने लगा।

स्पेन में, आर्थिक कारणों ने लोगों को महासागरी शूरवीर (Knights of the ocean) बनने के लिए प्रोत्साहित किया। धर्मयुद्धों की याद और रीकांक्विस्टा (Reconquista) की सफलता ने निजी महत्त्वाकांक्षाओं को उत्तेजित कर दिया और उन इकरारनामों की शुरुआत की जिन्हें कैपिटुलैसियोन (Capitulaciones) कहा जाता था। इन इकरारनामों के तहत स्पेन का शासक नए जीते हुए इलाकों पर अपनी प्रभुसत्ता जमा लेता था और उन्हें जीतने वाले अभियानों के नेताओं को पुरस्कार के रूप में पदवियाँ और जीते गए देशों पर शासनाधिकार देता था।

रीकांक्विस्टा (पुनर्विजय) ईसाई राजाओं द्वारा आइबेरियन प्रायद्वीप पर प्राप्त की गई सैनिक विजय थी जिसके द्वारा इन राजाओं ने 1492 में इस प्रायद्वीप को अरबों के कब्ज़े से छुड़ा लिया था।


अटलांटिक पारगमन

क्रिस्टोफर कोलंबस (1451-1506) एक स्वयं-शिक्षित व्यक्ति था, लेकिन उसमें साहसिक कार्य करने और नाम कमाने की उत्कट इच्छा थी। भविष्यवाणियों में विश्वास करते हुए वह यह मानता था कि उसके भाग्य में पश्चिम की ओर से यात्रा करते हुए पूर्व (the Indies) की ओर जाने का रास्ता खोजना लिखा है। वह कार्डिनल पिएर डिएेली (Cardinal Pierre d’ Ailly) द्वारा 1410 में लिखी गई (खगोलशास्त्र और भूगोल की) पुस्तक इमगो मुंडी (Imago Mundi) से बहुत प्रेरित हुआ। उसने इस संबंध में पुर्तगाल के राजा के समक्ष अपनी योजनाएँ प्रस्तुत कीं, लेकिन वे मंजूर नहीं हुईं। पर सौभाग्य से स्पेन के प्राधिकारियों ने उसकी एक साधारण-सी योजना स्वीकार कर ली और वह उसे पूरा करने के लिए 3 अगस्त 1492 को पालोस के पत्तन से अपने अभियान पर जहाज़ द्वारा रवाना हो गया।

स्पेनिश भाषा में ‘नाओ’ शब्द का अर्थ है भारी जहाज़। यह शब्द अरबी से स्पेनिश भाषा में आया है। इससे यह तथ्य स्पष्ट होता है कि 1492 तक इस क्षेत्र पर अरबों का शासन था।

लेकिन कोलंबस और उसके साथी अनुमान से अधिक लंबी चलने वाली अटलांटिक यात्रा के लिए तैयार नहीं थे। उनका बेड़ा छोटा-सा था जिसमें सांता मारिया नाम की एक छोटी नाओ (Nao) और दो कैरेवल (Caravel, छोटे हलके जहाज) ‘पिंटा’ और ‘नीना’ थे। सांता मारिया की कमान स्वयं कोलंबस के हाथाें में थी। उसमें 40 कुशल नाविक थे। यात्रा पर जाते समय अनुकूल व्यापारिक हवाओं के सहारे उनका बेड़ा आगे बढ़ता जा रहा था, लेकिन रास्ता लंबा था। 33 दिनों तक बेड़ा तैरता हुआ आगे से आगे बढ़ता गया मगर तट के दर्शन नहीं हुए, ऊपर आकाश था तो नीचे समुद्र। अब तो उसके नाविक बेचैन हो उठे और उनमें से कुछ तुरंत वापस चलने की माँग करने लगे।

आखिर 12 अक्टूबर 1492 को उन्हें ज़मीन दिखाई दी, जिसे कोलंबस ने भारत समझा लेकिन वह स्थान बहामा द्वीपसमूह का गुआनाहानि (Guanahani) द्वीप था। (यह कहा जाता है कि इस द्वीपसमूह को ‘बहामा’ नाम कोलंबस द्वारा इसलिए दिया गया था क्योंकि वह चारों ओर से छिछले समुद्र, जिसे स्पेनिश में बाजा मार, Baja mar, कहते हैं, से घिरा हुआ था।) गुआनाहानि में इस बेड़े के नाविकों का अरावाक लोगोें ने स्वागत किया। अरावाक लोग शांतिप्रिय थे, उन्होंने दोस्ती का हाथ बढ़ाया और अपना खाने-पीने का सामान नाविकों के साथ मिल-बाँटकर खाया; वस्तुतः कोलंबस उनकी इस उदारता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने इस बारे में अपने रोजनामचे में लिखा, ‘‘वे इतने ज्यादा उदार और सरल स्वभाव के लोग हैं कि अपना सब कुछ देने को तैयार हैं, वे कभी इनकार नहीं करते; बल्कि वे सदा बाँटने को तत्पर रहते हैं और इतना अधिक प्यार जताते हैैं कि मानो उनका प्यार भरा कलेजा ही बाहर निकल आएगा।’’

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अमरीकी मूलनिवासियों के साथ यूरोपीय लोगों की मुलाकात-यूरोप की काष्ठ ब्लॅाक वाली एक छपाई, सोलहवीं सदी।

कोलंबस ने गुआनाहानि में स्पेन का झंडा गाड़ दिया (उसने इस द्वीप का नया नाम सैन सैल्वाडोर, San Salvador रखा)। वहाँ उसने एक सार्वजनिक उपासना कराई और स्थानीय लोगों से बिना पूछे ही अपने-आपको वाइसराय घोषित कर दिया। उसने बड़े द्वीपसमूह क्यूबानास्कैन (Cubanascan, क्यूबा, जिसे उसने जापान समझा था) और किस्केया (Kiskeya, नया नाम हिस्पानिओला, Hispaniola, जो आज दो देशों - हाइती और डोमिनिकन रिपब्लिक- में बँटा हुआ है) तक आगे बढ़ने के लिए इन स्थानीय लोगों का सहयोग प्राप्त किया। यद्यपि सोना तत्काल उपलब्ध नहीं था लेकिन खोजकर्ताओं ने सुन रखा था कि सोना हिस्पानिओला में, भीतरी क्षेत्र की पहाड़ी जलधाराओं में मिल सकता है।

वाइसराय (Viceroy) का अर्थ है राजा के स्थान पर यानी उसका स्थापनापन्न या प्रतिनिधि (इस संदर्भ में राजा का मतलब है, स्पेन का राजा)।

लेकिन कोलंबस और उसके साथी इस संबंध में आगे कुछ और करते उससे पहले ही उनका यह अभियान दुर्घटनाओं में फँस गया और खूंख़ार ‘कैरिब’ (Carib) कबीलों की प्रचंडता का भी उन्हें सामना करना पड़ा। नाविक जल्दी से जल्दी घर लौटने के लिए अधीर हो गए। वापसी यात्रा अधिक कठिन साबित हुई क्योंकि जहाज़ों को दीमक लग गई थी और नाविकों को थकान व घर की याद सताने लगी थी। इस संपूर्ण यात्रा में कुल 32 सप्ताह लगे। आगे चलकर एेसी तीन यात्राएँ और आयोजित की गईं, जिनके दौरान कोलंबस ने बहामा और बृहत्तर एेंटिलीज द्वीपों (Greatar Antilles) ,दक्षिणी अमरीका की मुख्य भूमि और उसके तटवर्ती इलाकों में अपना खोज कार्य पूरा किया। परवर्ती यात्राओं से यह पता चला कि इन स्पेनी नाविकों ने ‘इंडीज’ (Indies) नहीं बल्कि एक नया महाद्वीप ही खोज निकाला था।

8.3

कोलंबस की विशेष उपलब्धि यह रही कि उसने अनंत समुद्र की सीमाएँ खोज निकालीं और यह करके दिखा दिया कि यदि पाँच सप्ताहों तक व्यापारिक हवाओं के साथ-साथ यात्रा की जाए तो पृथ्वी के गोले के दूसरी ओर पहुँचा जा सकता है। अक्सर जगहों को उन्हें खोजने वालों के अनुसार नाम दिया जाता है, इसलिए यह एक अजीब बात है कि कोलंबस की स्मृति में समस्त अमरीका महाद्वीप को नहीं बल्कि संयुक्त राज्य अमरीका के एक छोटे से जिले में और दक्षिणी अमरीका के पश्मिोत्तर भाग में स्थित एक देश (कोलंबिया) का नामकरण किया गया है जबकि वह उन दोनों इलाकों में से किसी एक में भी नहीं गया था। उसके द्वारा खोजे गए दो महाद्वीपों उत्तरी और दक्षिणी अमरीका का नामकरण फ्लोरेन्स के एक भूगोलवेत्ता ‘अमेरिगो वेस्पुस्सी’’ (Amerigo Vespucci) के नाम पर किया गया, जिसने उनके विस्तार का अनुभव किया और उन्हें ‘नयी दुनिया’ (New world) के नाम से संबोधित किया। उनके लिए ‘अमरीका’ (America) नाम का प्रयोग सर्वप्रथम एक जर्मन प्रकाशक द्वारा 1507 में किया गया।

क्रियाकलाप 3
आपके विचार से एेसे कौन से कारण थे जिनसे प्रेरित होकर यूरोप के भिन्न-भिन्न देशों के लोगों ने खोज यात्राओं पर जाने का ज़ोखिम उठाया।


अमरीका में स्पेन
के साम्राज्य की स्थापना

स्पेनी साम्राज्य का विस्तार बारूद और घोड़ों के इस्तेमाल पर आधारित सैन्य-शक्ति की बदौलत हुआ। स्थानीय लोगों को या तो नज़राना देना पड़ता था या फिर सोने व चाँदी की खानों में काम करना पड़ता था। विशेष बात यह थी कि वहाँ प्रारंभ में ‘खोज’ के बाद छोटी बस्ती बसानी पड़ती थी जिसमें रहने वाले स्पेनी लोग स्थानीय मजदूरों पर निगरानी रखते थे। स्थानीय प्रधानों को नए-नए प्रदेश और संभव हो तो, सोने के नए-नए स्रोत खोजने के लिए भर्ती किया जाता था। सोने के लालच से गंभीर हिंसक घटनाएँ भड़कीं, जिनका स्थानीय लोगों ने प्रतिरोध किया। स्पेनी विजेताओं के कठोर आलोचक कैथलिक भिक्षु (friar) बार्टोलोम डि लास कैसास (Bartolome de las Casas) ने कहा है कि स्पेनी उपनिवेशक अक्सर अपनी तलवारों की धार अरावाकों के नंगे बदन पर आज़माते थे।

जब सैनिक दमन और बेगार का तांडव हो रहा था तभी महामारी की विनाश लीला ने नया मोर्चा खोल दिया। पुरानी दुनिया की बीमारियों विशेषतः चेचक ने अरावाक लोगों पर कहर ढाह दिया, क्योंकि उनमें प्रतिरोध-क्षमता नहीं थी। स्थानीय लोग ये मानते थे कि इन बीमारियों का कारण स्पेनियों द्वारा चलाई जाने वाली ‘अदृश्य’ गोलियाँ थीं। अरावाकों और उनकी जीवन शैली का लोप निहायत खामोशी से स्पेनियों के साथ हुए उस दुःखांत मुकाबले की याद दिलाता है।

कोलंबस के अभियानों के बाद स्पेनवासियों द्वारा मध्यवर्ती और दक्षिणी अमरीका में खोज बराबर चलती रही और उसमें सफलता मिलती गई। आधी सदी के भीतर ही स्पेनवासियों ने लगभग 40 डिग्री उत्तरी से 40 डिग्री दक्षिणी अक्षांश तक के समस्त क्षेत्र को खोज-खोज कर बिना किसी चुनौती के उस पर अपना आसानी से अधिकार जमा लिया।

उपर्युक्त घटनाओं से पहले, स्पेनवासियों ने इस क्षेत्र के दो बड़े साम्राज्यों को जीतकर अपने कब्ज़े में कर लिया था। यह काम मुख्यतः दो व्यक्तियों हरमन कोर्टेस (Herman Cortes
1488–1547) और फ्रांसिस्को पिज़ारो (Francisco Pizarro 1478–1541) का था। उनके अभियानों के द्वारा किया गया खर्चा स्पेन के जमींदारों, नगरपरिषदों के अधिकारियों और अभिजातों ने उठाया था। इन अभियानों में शामिल होनेवालों ने जीत के बाद हासिल होनेवाले अपेक्षित हिस्से के बदले में अपने अस्त्र-शस्त्र भी मुहैया कराए।


कोर्टेस और एज़टेक लोग


कोर्टेस और उसके सैनिकों ने (जिन्हें कोंक्विस्टोडोर, Conquistadores, कहा जाता था) मैक्सिको को रौंदते हुए उसे चुटकियों में जीत लिया। 1519 में, कोर्टेस क्यूबा से मैक्सिको आया था जहाँ उसने टॉटानैक (Totonacs) समुदाय से दोस्ती कर ली। टॉटानैक लोग एज़टेक शासन से अलग होना चाहते थे। एज़टेक शासक मोंटेज़ुमा ने कोर्टेस से मिलने के लिए अपना एक अधिकारी भेजा। वह स्पेनवासियों की आक्रमण-क्षमता, उनके बारूद और घोड़ों के प्रयोग को देखकर घबरा गया। स्वयं मोंटेज़ुमा को भी यह पक्का विश्वास हो गया कि कोर्टेस सचमुच किसी निर्वासित देवता का अवतार है जो अपना बदला लेने के लिए फिर से प्रकट हुआ है।

बर्नाड डियाज़ ने लिखा, ‘‘और जब हमने इन सभी शहरों और गाँवों को जल में बना हुआ और अन्य कस्बों को सूखी जमीन पर बसा हुआ देखा और यह भी देखा कि मेक्सिको नगर तक जाने के लिए जल में सीधा और समतल रास्ता बनाया गया है तो हम दंग रह गए। ये बड़े नगर और भवन जो पानी में खड़े हुए थे, सभी पत्थर के बने हुए थे और एेसा लगता था कि मानो हम ‘अमाडिस’ (Amadis) की कहानी का कोई अद्भुत दृश्य देख रहे हैं। सचमुच, हमारे कुछ सैनिक तो यह पूछ ही बैठे कि कहीं हम कोई सपना तो नहीं देख रहे हैं।’’


डोना मैरीना

बर्नार्ड डियाज़ डेल कैस्टिलो (Bernard Diaz del Castillo, 1495-1584) ने अपने ट्रू हिस्ट्री अॉफ़ मैक्सिकों में लिखा है कि टैबैस्को (Tabasco) के लोगों ने कोर्टेस को डोना मैरीना नाम की एक सहायिका दी थी। वह तीन भाषाओं में प्रवीण थी और उसने कोर्टेस के लिए दुभाषिये के रूप में बहुत निर्णायक भूमिका अदा की। "यह हमारी जीतों की ज़ोरदार शुरुआत थी और डोना मैरीना की सहायता के बिना हम न्यू स्पेन और मैक्सिको की भाषा नहीं समझ सकते थे।"

डियाज सोचता था कि वह एक राजकुमारी थी लेकिन मैक्सिकन लोग उसे ‘मालिंच’, यानी विश्वासघातिनी कहते थे। मालिंचिस्टा (Malinchista) का अर्थ है वह व्यक्ति जो दूसरों की भाषा और कपड़े की हू-ब-हू नकल करता है।


स्पेनी सैनिकों ने ट्लैक्सकलानों (Tlaxcalans) पर हमला बोल दिया। ट्लैक्सकलान खूंखार लड़ाकू थे जिन्होंने ज़बर्दस्त प्रतिरोध करने के बाद अंततः समर्पण कर दिया। स्पेनी सैनिकों ने क्रूरतापूर्वक उन सबका सफ़ाया कर दिया। फिर वे टेनोक्टिटलैन (Tenochtitlan) की ओर बढ़े जहाँ वे 8 नवंबर 1519 को पहुँच गए।

स्पेनी आक्रमणकारी टेनोक्टिटलैन के दृश्य को देखकर हक्के-बक्के रह गए। यह मैड्रिड से पाँच गुना बड़ा था और इसकी आबादी स्पेन के सबसे बड़े शहर सेविली (Seville) से दो गुनी (यानी 100,000) थी।


ऊपरः टेनोंक्टिटलान का एक यूरोपीय रेखांकन, सोलहवीं सदी।

नीचेः टेनोक्टिटलैन के केंद्र में मंदिरों तक ले जाने वाला भव्य सीढ़ी मार्ग, जो अब मेक्सिको शहर का एक खंडहर है।

8.4

मोंटेज़ुमा ने कोर्टेस का हार्दिक स्वागत किया। एज़टेक लोग बड़़े सम्मान के साथ स्पेनियों को शहर के बीचोंबीच ले गए, जहाँ मोंटेज़ुमा ने उन पर उपहारों की वर्षा कर दी। लेकिन टेलैक्सकलान के हत्याकांड के बारे में जानकारी होने के कारण उसके अपने लोगों के मन में आशंका थी। एज़टेकाें के एक वृत्तांत में स्थिति का वर्णन कुछ इस प्रकार है–‘‘एेसा लग रहा था मानो टेनाेंक्टिटलान ने किसी दानव को शरण दे दी है। टेनोंक्टिटलान के निवासियों को एेसा महसूस हुआ कि सभी ने भांग खा ली है... वे सब पगला-से गए हैं। हर आदमी भयभीत होकर काँप रहा था, मानो सारी दुनिया की आँते ही बाहर निकाली जा रही हों...लोग भयाक्रांत नींद में सो गए।’’

एज़टेक लोगों की चिंता भी निर्मूल नहीं थी। कोर्टेस ने बिना कोई कारण बताए सम्राट को नज़रबंद कर लिया और फिर उसके नाम पर शासन चलाने का प्रयास करने लगा। स्पेन के प्रति सम्राट मोंटेजुमा के समर्पण को औपचारिक बनाने के प्रयत्न में, कोर्टेस ने एज़टेक मंदिरों में ईसाई प्रतिमाएँ स्थापित करवाईं। मोंटेजुमा ने एक समझौता प्रस्तावित किया और मंदिर में एज़टेक और ईसाई दोनों प्रकार की प्रतिमाएँ रखवा दीं।

इसी समय कोर्टेस को अपने सहायक एेल्वारैडो (Alvarado) को सब कुछ सौंपकर जल्दी से क्यूबा लौटना पड़ा। स्पेनी शासन के अत्याचारों से और सोने के लिए उनकी निरन्तर माँगों के दबाव के कारण, आम जनता ने विद्रोह कर दिया। एेल्वारैडो ने हुइजिलपोक्टली (Huizilpochtli) के वसंतोत्सव में कत्लेआम का हुक्म दे दिया। जब 25 जून 1520 को कोर्टेस वापस लौटा तो उसे घोर संकट का सामना करना पड़ा। पुल तोड़ दिए गए थे। जलमार्ग काट दिए गए थे, और सड़कें बंद कर दी गई थीं। स्पेनियों को भोजन और पेयजल की घोर कमी का सामना करना पड़ा। कोर्टेस को मजबूर होकर वापस लौटना पड़ा।

इसी समय, रहस्यमय परिस्थितियों में मोंटेजुमा की मृत्यु हो गई। एज़टेकों की स्पेनियों के साथ लड़ाई जारी रही और उसके परिणामस्वरूप लगभग 600 अत्याचारी विजेता और उतने ही ट्लैक्सकलान के लोग मारे गए। हत्याकांड की इस भयंकर रात को आँसूभरी रात (Night of Tears) के नाम से जाना जाता है। कोर्टेस को नवनिर्वाचित राजा क्वेटेमोक (Cuatemoc) के विरुद्ध अपनी रणनीति की योजना बनाने के लिए वापस ट्लैक्सकलान में शरण लेनी पड़ी। उस समय एज़टेक लोग यूरोपीय लोगों के साथ आई चेचक के प्रकोप से मर रहे थे। कोर्टेस केवल 180 सैनिकों और 30 घोड़ों के साथ टेनोंक्टिटलान में घुस आया और एज़टेक भी अपनी आखिरी मुठभेड़ के लिए तैयार थे। अपशकुनों ने एज़टेकों को बता दिया कि उनका अंत दूर नहीं है। इसे वास्तविकता समझकर, सम्राट ने अपना जीवन त्याग देना ही ठीक समझा।

मेक्सिको पर विजय प्राप्त करने में दो वर्ष का समय लग गया। कोर्टेस मेक्सिको में ‘न्यू स्पेन’ का कैप्टेन-जनरल बन गया और उसे चार्ल्स पंचम द्वारा सम्मानों से विभूषित कर दिया गया। मेक्सिको से, स्पेनियों ने अपना नियंत्रण ग्वातेमाला (Guatemala ), निकारगुआ (Nicaragua) और होंडुरास (Honduras) पर भी स्थापित कर लिया।


पिज़ारो और इंका लोग

कोर्टेस के विपरीत, पिज़ारो (Pizarro) गरीब और अनपढ़ था। वह सेना में भर्ती होकर 1502 में कैरीबियन द्वीपसमूह में आया था। उसने कहानियों में इंका राज्य के बारे में यह सुन रखा था कि वह चाँदी और सोने का देश (EI-dor-ado) है। उसने प्रशांत से वहाँ पहुँचने के लिए कई प्रयत्न किए। एक बार जब वह अपनी यात्रा से घर (स्पेन) लौटा तो वह स्पेन के राजा से मिलने में सफल हो गया। इस मुलाकात के दौरान उसने राजा को इंका के कारीगरों द्वारा बनाए गए सोने के सुंदर-सुंदर मर्तबान दिखाए। राजा के मन में लोभ जाग उठा और उसने पिज़ारो को यह वचन दे दिया कि अगर वह इंका प्रदेश को जीत लेगा तो उसे वहाँ का राज्यपाल (गवर्नर) बना दिया जाएगा। पिज़ारों ने कोर्टेस का तरीका अपनाने की योजना बनाई। लेकिन वह यह देख कर क्षुब्ध हुआ कि इंका साम्राज्य की स्थिति वहाँ से भिन्न थी।

1532 में वहाँ अताहुआल्पा (Atahualpa) ने एक गृहयुद्ध के बाद इंका साम्राज्य की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी। तभी वहाँ के परिदृश्य में पिज़ारों ने प्रवेश किया। उसने जाल बिछाकर राजा को बंदी बना लिया। राजा ने अपने आप को मुक्त कराने के लिए एक कमरा-भर सोना फिरौती में देने का प्रस्ताव किया–आज तक के इतिहास में इतनी बड़ी फिरौती किसी को नहीं मिली थी। लेकिन पिज़ारो ने अपना वचन नहीं निभाया। उसने राजा का वध करवा दिया। और उसके सैनिकों ने जी भरकर लूटमार मचाई। लूटपाट के बाद इंका राज्य क्षेत्र पर कब्जा कर लिया गया। विजेताओं की क्रूरता के कारण 1534 में विद्रोह भड़क उठा जो दो साल तक चलता रहा, जिसके दौरान हज़ारों की संख्या मेें लोग युद्ध और महामारियों के कारण मौत के मुँह में चले गए।

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एक औरत की छोटी सी प्रतिमा, पेरू। यह एक मकबरे में मिली जिस पर स्पेनियों की निगाह नहीं गई थी और इसीलिए यह लघु प्रतिमा गलाए जाने से बच गई।

अगले पाँच वर्षों में स्पेनियों ने पोटोसी (Potosi, ऊपरी पेरू, आज का बोलीविया) की खानों में चाँदी के विशाल भंडारों का पता लगा लिया और उन खानों में काम करने के लिए उन्होंने इंका लोगों को गुलाम बना लिया।


कैब्राल और ब्राज़ील

ब्राज़ील पर पुर्तगालियों का कब्ज़ा तो इत्तफाक से ही हुआ। सन् 1500 में पुर्तगाल निवासी पेड्रो अल्वारिस कैब्राल (Pedro Alvares Cabral) जहाज़ों का एक शानदार जुलूस लेकर भारत के लिए रवाना हुआ। तूफानी समुद्रों से बचने के लिए उसने पश्चिमी अफ़्रीका का एक बड़ा चक्कर लगाया और यह देखा कि वह उस प्रदेश के समुद्रतट पर पहुँच गया है जिसे वर्तमान में ब्राज़ील कहा जाता है। दक्षिणी अमरीका का यह पूर्वी भाग उस क्षेत्र में आता था जिसे पोप ने पुर्तगाल को सौंप रखा था, इसलिए वे अविवादित रूप से इसे अपना इलाका मानते थे।

पुर्तगालवासी ब्राज़ील की बजाय पश्चिमी भारत के साथ अपना व्यापार बढ़ाने के लिए अधिक उत्सुक थे क्योंकि ब्राज़ील में सोना मिलने की कोई संभावना नहीं थी। लेकिन वहाँ एक प्राकृतिक संसाधन था, जिसका उन्होंने भरपूर लाभ उठाया और यह संपदा थी ‘टिंबर’ यानी इमारती लकड़ी। ब्राज़ीलवुड वृक्ष, जिसके नाम पर यूरोपवासियों ने इस प्रदेश का नामकरण किया, से एक सुंदर लाल रंजक (Dye) मिलता था। ब्राज़ील के मूल निवासी लोहे के चाकू-छुरियों और आरियों के बदले में, जिन्हें वे अद्भुत वस्तु मानते थे, इन पेड़ाें को काटने और इनके लट्ठे बनाकर जहाज़ों तक ले जाने के लिए तुरंत तैयार हो गए। (एक हँसिए, चाकू या कंघे के बदले वे ढेरों मुर्ग़ियाँ, बंदर, तोते, शहद मोम, सूती धागा, और अन्यान्य चीज़ें, जो भी इन गरीब लोगों के पास थी, देने को तैयार रहते थे)

‘‘तुम फ्रांसीसी और पुर्तगाली लोग इस लकड़ी की तलाश मेें इतनी दूरी से यहाँ क्यों आते हो? क्या तुम्हारे देश में लकड़ी नहीं है?’’ एक मूलनिवासी ने फ्रांसीसी पादरी से पूछा। चर्चा के अंत में उसने कहा, "मुझे लगता है तुम बिलकुल बावले हो। तुम लंबा समुद्र पार करते हो, घोर परेशानियाँ झेलते हो और इतना कठिन परिश्रम करते हो, किसलिए? अपने बच्चों के लिए धन इकट्ठा करने के लिए ही न! क्या जिस भूमि ने तुम्हें पाला-पोसा और बड़ा किया है वह तुम्हारे बच्चों का पेट भरने के लिए पर्याप्त नहीं है? हमारे भी माता, पिता और बच्चे हैं, जिन्हें हम बहुत प्यार करते हैं। लेकिन हमें यह पक्का विश्वास है कि जिस भूमि ने हमें पालपोसकर बड़ा किया है, वह उनका भी भरण-पोषण कर देगी। इसलिए हम लोग आगे की चिंता किए बिना आराम से जिंदगी जीते हैं।"


क्रियाकलाप 4

दक्षिणी अमरीका के मूल निवासियों पर यूरोपीय लोगों के संपर्क से क्या प्रभाव पड़ा? विश्लेषण कीजिए। यूरोप से आकर दक्षिणी अमरीका में बसे लोगों और जेसुइट पादरियों के प्रति स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया का वर्णन कीजिए।

इमारती लकड़ी के इस व्यापार की वजह से पुर्तगाली और फ्रांसीसी व्यापारियों के बीच भयंकर लड़ाइयाँ हुईं। इनमें अंततः पुर्तगालियों की जीत हुई क्योंकि वे स्वयं तटीय क्षेत्र में बसना और उपनिवेश बसाना चाहते थे। 1534 में पुर्तगाल के राजा ने ब्राज़ील के तट को 14 आनुवंशिक कप्तानियों (Captaincies) में बाँट दिया। उनके मालिकाना हक उन पुुर्तगालियों को सौंप दिए जो वहाँ स्थायी रूप से रहना चाहते थे, और उन्हें स्थानीय लोगों को गुलाम बनाने का अधिकार भी दे दिया। बहुत से पुर्तगाली बाशिंदे भूतपूर्व सैनिक थे जिन्होंने भारत के गोवा क्षेत्र में लड़ाइयाँ लड़ी थीं और स्थानीय लोगों के प्रति उनका व्यवहार अत्यंत क्रूर था।

1540 के दशक मेें पुर्तगालियों ने बड़े-बड़े बागानों मेें गन्ना उगाना और चीनी बनाने के लिए मिलें चलाना शुरू कर दिया । यह चीनी यूरोप के बाज़ारों में बेची जाती थी। बहुत ही गर्म और नम जलवायु में चीनी की मिलों में काम करने के लिए वे स्थानीय लोगों पर निर्भर थे। जब उन लोगों ने इस थकाने वाले नीरस काम को करने से इनकार कर दिया तो मिल मालिकों ने उनका अपहरण करवाकर उन्हें गुलाम बनाना शुरू कर दिया।

तब स्थानीय लोग इन गुलाम बनाने वाले मिल मालिकों से बचने के लिए गाँव छोड़कर जंगलों की ओर भागने लगे। और ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, तटीय क्षेत्र में मुश्किल से कोई इक्का-दुक्का ही स्थानीय लोगों का गाँव बचा, लेकिन उनके बदले यूरोपीय लोगों के सुनियोजित कस्बे बस गए। मिल मालिकों को गुलाम लाने के लिए मजबूर होकर एक दूसरे स्रोत यानी पश्चिमी अफ़्रीका की ओर मुड़ना पड़ा। लेकिन स्पेनी उपनिवेशों में स्थिति इससे बिलकुल विपरीत थी। वहाँ एज़टेक और इंका साम्राज्यों के अधिकांश लोगों से खदानों और खेतों में काम कराया जाता था, इसलिए स्पेनी बाशिंदों को ‘औपचारिक’ रूप से उन्हें गुलाम बनाने अथवा कहीं और से गुलाम लाने की जरूरत नहीं पड़ी।

1549 में पुर्तगाली राजा के अधीन एक औपचारिक सरकार स्थापित की गई और बहिया (Bahia) / सैल्वाडोर (Salvador) को उसकी राजधानी बनाया गया। इस समय तक जेसुइट पादरियों ने बाहर ब्राज़ील जाना शुरू कर दिया था। यूरोपीय बाशिंदे इन जेसुइट पादरियों को पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वे मूलनिवासियों के साथ दया का बर्ताव करने की सलाह देते थे और निडरतापूर्वक जंगलों में जाकर उनके गाँवों में रहते हुए यह सिखाते थे कि ईसाई धर्म एक आनंददायक धर्म है और उसका आनंद लेना चाहिए। और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि ये धर्मप्रचारक दासप्रथा की कड़े शब्दों में आलोचना करते थे।

‘‘घर या परिवार पर इससे बड़ा अभिशाप कोई नहीं है कि उसका भरण-पोषण दूसरों के खून-पसीने की कमाई  से हो!’’

‘‘जो भी आदमी दूसरों की स्वतंत्रता छीनता है और उस स्वतंत्रता को वापस लौटाने की क्षमता रखते हुए भी नहीं लौटाता, वह अवश्य ही महापाप का भागी होता है!"

– ये विचार हैं ब्राज़ील में 1640 के दशक में रहने वाले जेसुइट पादरी एंटोनियो वीइरा (Antonio Vieira) के।



विजय, उपनिवेश और दास
व्यापार

जो अभियान पहले अनिश्चित परिणाम वाली समुद्री यात्राओं के रूप में शुरू हुए थे, आगे चलकर उनका यूरोप, उत्तरी तथा दक्षिणी अमरीका और अफ़्रीका पर स्थायी प्रभाव पड़ा।

पंद्रहवीं शताब्दी में शुरू की गई यूरोपीय समुद्री परियोजनाओं ने एक महासागर से दूसरे महासागर तक के ‘अटूट समुद्री मार्ग’ खोल दिए। इससे पहले तक, इनमें से अधिकांश मार्ग यूरोप के लोगों के लिए अज्ञात थे और कुछ मार्गों को तो कोई भी नहीं जानता था। तब तक कोई भी जहाज़ कैरीबियन या अमरीका महाद्वीपों के जलक्षेत्रों में नहीं घुसा था। दक्षिणी अटलांटिक तो पूरी तरह अछूता था, किसी भी जहाज़ ने, उसके पार जाना तो दूर, उसके पानी में भी प्रवेश नहीं किया था। और न ही कोई जहाज़ दक्षिणी अटलांटिक से प्रशांत महासागर या हिंद महासागर तक पहुँचा था। 15वीं शताब्दी के अंतिम और 16वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में ये सभी साहसिक कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किए गए।

प्रारंभिक समुद्री यात्रियों के अलावा, अन्य यूरोपवासियों के लिए भी अमरीका की ‘खोज’ के दीर्घकालीन परिणाम निकले। सोने-चाँदी की बाढ़ ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और औद्योगीकरण का और अधिक विस्तार किया। 1560 से 1600 तक सैकड़ों जहाज़ हर वर्ष दक्षिणी अमरीका की खानों से चाँदी स्पेन को लाते रहे। लेकिन मजेदार बात यह हुई कि इसका लाभ स्पेन और पुर्तगाल को उतना नहीं मिला। उन्होंने अपने भारी-भरकम मुनाफ़ों को आगे व्यापार या अपने व्यापारी जहाज़ों के बेड़े का विस्तार करने मेें नहीं लगाया। उनकी बजाय, अटलांटिक महासागर के किनारे-किनारे स्थित एेसे अनेक देश थे, विशेष रूप से इंग्लैंड, फ्रांस, बेल्जियम और हॉलैंड, जिन्होंने इन ‘खोजों’ का लाभ उठाया। उनके सौदागरों ने बड़ी-बड़ी संयुक्त-पूंजी कंपनियाँ बनाई और अपने बड़े-बड़े व्यापारिक अभियान चलाए, उपनिवेश स्थापित किए और यूरोपवासियों को नयी दुनिया में पैदा होने वाली नयी-नयी चीज़ों; जैसे- तंबाकू, आलू, गन्ने की चीनी, ककाओ और रबड़ आदि से परिचित कराया।

इसके अलावा यूरोप अमरीका से आने वाली नयी फसलों, विशेष रूप से आलू और लाल मिर्च से परिचित हो गया। फिर ये फसल यूरोपवासियों द्वारा आगे भारत जैसे अन्य देशों में ले जाई गई।

उत्तरी तथा दक्षिणी अमरीका के मूल निवासियों के लिए, इन अभियानों के अनेक तात्कालिक परिणाम हुए; जैसे मार काट के कारण मूल निवासियों की जनसंख्या कम हो गई; उनकी जीवन-शैली का विनाश हो गया और उन्हें गुलाम बनाकर खानों, बागानों और कारखानों में उनसे काम लिया जाने लगा।


उत्पादन की पूँजीवादी प्रणाली वह होती है जिसमें उत्पादन तथा वितरण के साधनों का स्वामित्व व्यक्तियों अथवा निगमों के पास होता है और जहाँ प्रतिस्पर्धी खुले बाजार में भाग लेते हैं।

8.5

दक्षिणी अमरीका के एक ठेठ स्पेनी नगर क्षेत्र का रेखांकन।

अनुमानित आंकड़ों से पता चलता है कि विजय-पूर्व मेक्सिको की जनसंख्या 3 करोड़ से 3.75 करोड़ तक रही होगी। एंडियन (Andean) क्षेत्र की भी यही स्थिति थी। जबकि मध्य-अमरीका में यह 1 करोड़ से 1.3 करोड़ के बीच थी। यूरोपीय लोगों के आने से पहले यहाँ के स्थानीय लोगों की जनसंख्या 7 करोड़ थी। और फिर डेढ़ सौ साल बाद उनकी आबादी घटकर केवल 35 लाख रह गई। इस जनहानि के लिए लड़ाइयाँ और बीमारियाँ प्रमुख रूप से जिम्मेदार थीं।

अमरीका में दो बड़ी सभ्यताओं-एज़टेक और इंका के अचानक नष्ट हो जाने से यह बात उजागर होती है कि आपस में लड़ने वाली ये दो संस्कृतियाँ एक-दूसरे से बहुत भिन्न थीं। एज़टेक और इंका दोनों ही साम्राज्यों के मामले में युद्धकला के स्वरूप ने स्थानीय लोगों को मनोवैज्ञानिक और भौतिक रूप से भयभीत करने में अपनी निर्णायक भूमिका अदा की। इस संघर्ष से नैतिक मूल्यों के बुनियादी अंतर का भी पता चलता है। ‘स्थानीय’ लोगों के लिए सोने के प्रति स्पेनियों की लोलुपता को समझ पाना असंभव था।

1550 के दशक में खानों का काम चालू हो जाने के बाद, संन्यासी डोमिनिगो डि सैंटो टॉमस (Dominigo de Santo Tomas) ने इंडीज़ की परिषद में कहा था कि पोटोसी (Potosi) नरक का मुख है जो हर साल हज़ारों की संख्या में इंडियन लोगों को निगल जाता है और वहाँ के लालची और बेरहम खान मालिक उनके साथ लावारिस जानवरों जैसा बर्ताव करते हैं।

इन मुठभेड़ों की बर्बरता का एक स्पष्ट प्रमाण यही है कि हारे हुए लोगों को गुलाम बना लिया जाता था। वैसे गुलाम बनाना कोई नयी बात नहीं थी– परंतु दक्षिणी अमरीका का अनुभव इस दृष्टि से नया था कि इसके साथ-साथ वहाँ उत्पादन की पूँजीवादी प्रणाली का प्रादुर्भाव हो गया। काम की परिस्थितियाँ भयावह थीं लेकिन स्पेनी मालिकों का मानना था कि उनके आर्थिक लाभ के लिए इस प्रकार का शोषण अत्यंत आवश्यक है।

1601 में, स्पेन के फिलिप द्वितीय ने सार्वजनिक रूप से बेगार की प्रथा पर रोक लगा दी, लेकिन उसने एक गुप्त आदेश के द्वारा इसे चालू रखने की व्यवस्था भी कर दी। किंतु 1609 में एक कानून बनाया गया जिसके अंतर्गत ईसाई और ग़ैर-ईसाई, सभी प्रकार के स्थानीय लोगों को पूरी स्वतंत्रता दे दी गई। इससे उपनिवेशी यानी यूरोप से आकर यहाँ बसे लोग नाराज़ हो गए और दो साल के भीतर ही उन्होंने राजा को यह कानून हटाने और गुलाम बनाने की प्रथा को चालू रखने के लिए मजबूर कर दिया।

अब नयी-नयी आर्थिक गतिविधियाँ जोरों से शुरू हो गईं। जंगलों का सफाया करके प्राप्त की गई भूमि पर पशुपालन किया जाने लगा। 1700 में सोने की खोज के बाद खानों का काम जोरों से चल पड़ा और इन सभी कामों के लिए सस्ते श्रम की माँग बनी रही। यह स्पष्ट था कि स्थानीय लोग गुलाम बनने का विरोध करेंगे। अब यही विकल्प बचा था कि गुलाम अफ़्रीका से मँगवाए जाएँ। 1550 के दशक से 1880 के दशक तक (जब ब्राज़ील में दास प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया था) ब्राज़ील में 36 लाख से भी अधिक अफ़्रीकी गुलामों का आयात किया गया। किंतु यह अमरीकी महाद्वीपों में आयातित अफ़्रीकी गुलामों की संख्या का तक़रीबन आधा था। 1750 में, कुछ लोग एेसे भी थे जिनके पास हज़ार-हज़ार गुलाम होते थे।

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मानचित्र 3 : अप्ऱηीका के नक्शे पर वे जगहें जहाँ से दास पकड़कर ले जाए गए

दास प्रथा के उन्मूलन के बारे में 1780 के दशक में किए गए प्रारंभिक वाद-विवाद में कुछ लोगों ने यह भी दलील दी थी कि यूरोपवासियों के अफ़्रीका में आने से पहले भी वहाँ दास प्रथा मौजूद थी। यहाँ तक कि पंद्रहवीं शताब्दी में अफ़्रीका में स्थापित किए जाने वाले राज्यों में भी अधिकांश मजदूर-वर्ग गुलामों से ही बना था। उन्होंने यह भी बताया था कि यूरोपीय व्यापारियों को जवान स्त्री-पुरुषों को गुलाम बनाने में अफ़्रीकी लोगों से भी मदद मिलती थी। ये व्यापारी बदले में उन अफ़्रीकावासियों को दक्षिणी अमरीका से आयात की गई फसलें (मक्का, कसावा, कुमाला आदि जो इनका प्रमुख खाद्य था) देते थे। 1789 की अपनी आत्मकथा में ओलाउदाह एक्वियानो (Olaudah Equiano) नाम के एक मुक्त किए गए गुलाम ने इन दलीलों का उत्तर देते हुए लिखा है कि अफ़्रीका में गुलामों के साथ परिवार के सदस्यों जैसा बर्ताव किया जाता था। एरिक विलियम्स पहला आधुनिक इतिहासकार था जिसने 1940 के दशक में अपनी पुस्तक कैपिटलिज़्म एंड स्लेवरी (Capitalism and Slavery) में अफ़्रीकी गुलामों द्वारा सही गई तकलीफों का फिर से जायज़ा लेने की पहल की थी

उपसंहार

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षो में, दक्षिणी अमरीका के उपनिवेशों में आकर बसे यूरोपीय लोगों ने स्पेन और पुर्तगाल के शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया; वे स्वतंत्र देश बन गए, ठीक वैसे ही जैसे कि 1776 में तेरह उत्तरी अमरीकी उपनिवेशों ने ब्रिटेन के विरुद्ध विद्रोह करके संयुक्त राज्य अमरीका का निर्माण कर लिया था।

दक्षिणी अमरीका को आज ‘लैटिन अमरीका’’ भी कहा जाता है, क्योंकि स्पेनी और पुर्तगाली दोनों भाषाएँ लैटिन भाषा परिवार की ही हैं। वहाँ के निवासी अधिकतर देशज यूरोपीय (जिन्हें ‘क्रिओल’ Creole, कहा जाता था), यूरोपीय और अफ़्रीकी मूल के हैं। उनमें से अधिकांश लोग कैथलिक धर्मावलंबी हैं। उनकी संस्कृति में यूरोपीय परंपराओं के साथ मिली हुई देशी परंपराओं के तत्त्व विद्यमान हैं।

अभ्यास

संक्षेप में उत्तर दीजिए

1. एज़टेक और मेसोपोटामियाई लोगों की सभ्यता की तुलना कीजिए।

2. एेसे कौन-से कारण थे जिनसे 15वीं शताब्दी में यूरोपीय नौचालन को सहायता मिली?

3. किन कारणों से स्पेन और पुर्तगाल ने पंद्रहवीं शताब्दी में सबसे पहले अटलांटिक महासागर के पार जाने का साहस किया?

4. कौन सी नयी खाद्य वस्तुएँ दक्षिणी अमरीका से बाकी दुनिया में भेजी जाती थीं? 

संक्षेप में निबंध लिखिए

5. गुलाम के रूप में पकड़कर ब्राज़ील ले जाए गए सत्रहवर्षीय अफ़्रीकी लड़के की यात्रा का वर्णन करें।

6. दक्षिणी अमरीका की खोज ने यूरोपीय उपनिवेशवाद के विकास को कैसे जन्म दिया?