अध्याय एक


संविधान– 

क्यों और कैसे?

Bharat Ka Sabindhan Chapter-1


परिचय

यह पुस्तक संविधान की कार्यप्रणाली पर लिखी गई है। आगे के अध्यायों में आप संविधान की कार्यप्रणाली के विभिन्न पहलुओं के बारे में पढ़ेंगे। हमारे देश के सरकार की विभिन्न संस्थाओं और उनके आपसी संबंधों के बारे में आप को ज्ञान होगा।

लेकिन इसके पहले कि आप चुनाव, सरकार, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बारे में पढ़ें, यह समझना ज़रूरी है कि सरकार के पूरे ढाँचे और सरकार की संस्थाओं को नियंत्रित करने वाले विभिन्न सिद्धांतों की उत्पत्ति भारत के संविधान से हुई है।

इस अध्याय के अध्ययन से आपको निम्न बातों का ज्ञान होगा :

संविधान किसे कहते हैं;

➤ संविधान समाज को क्या देता है;

संविधान समाज में शक्ति का बँटवारा कैसे करता है; और

➤ भारत का संविधान कैसे बनाया गया।


हमें संविधान की क्या आवश्यकता है?

संविधान क्या है? इसके कार्य क्या हैं? समाज के लिए उसकी क्या भूमिका है? हमारे दैनिक जीवन से संविधान का क्या संबंध है? इन प्रश्नों के उत्तर उतने कठिन नहीं हैं जितना आप सोचते हैं।

sr.munni2flipped.tif

हाँ! यह तो हमारी कालोनी जैसा ही है। क्या आपके गाँव, शहर या कालोनी में भी एेसे ही समूह हैं?

 

संविधान तालमेल बढ़ाता है और भरोसा दिलाता है


कल्पना करें कि आप एक बड़े समूह के सदस्य हैं। यह भी कल्पना करें कि उस समूह की कुछ विशेषताएँ हैं मसलन, उस समूह के सदस्य एक-दूसरे से अनेक तरह से भिन्न हैं। उनकी अलग-अलग धार्मिक निष्ठाएँ हैं; उनमें कुछ हिंदू, कुछ मुसलमान, कुछ ईसाई हैं और कुछ एेसे भी हैं जो किसी धर्म को नहीं मानते। वे और आधारों पर भी भिन्न हैं – वे अलग-अलग व्यवसाय करते हैं, उनकी भिन्न योग्यताएँ हैं, अलग-अलग शौक हैं, और सिनेमा से लेकर किताबों तक उनकी पसंद अलग-अलग है। उनमें कुछ धनी, तो कुछ गरीब हैं। कुछ लोग बूढ़े, तो कुछ जवान हैं। कल्पना करें कि एेसे समूह के सदस्यों में जीवन के विभिन्न पहलुओं को लेकर विवाद है, जैसे-किसी व्यक्ति को कितनी संपत्ति रखने की इज़ाज़त होनी चाहिए? क्या सभी बच्चों को स्कूल भेजना अनिवार्य है या माता-पिता को इसका निर्णय लेने देना चाहिये? इस समूह को अपनी सुरक्षा के लिए कितना खर्च करना चाहिये? या इसकी जगह उसे बहुत सारे पार्क बनवाना चाहिये? क्या इस समूह को अपने ही कुछ सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव करने देना चाहिए? भिन्न-भिन्न लोग इनमें से प्रत्येक प्रश्न का अलग-अलग उत्तर देंगे। लेकिन अपनी भिन्नताओं के बावजूद भी इस समूह को एक साथ रहना है। सदस्य अनेक रूपों में एक-दूसरे पर आश्रित हैं उन्हें एक-दूसरे के सहयोग की ज़रूरत होती है। इस समूह को शांतिपूर्वक एक साथ रहने के लिए क्या चाहिये?

Sr.Unni2.tif

यह समूह तो बहुत कुछ हमारे गाँव के लोगों जैसा है।

लेकिन इस समूह के लोग एक साथ रह सकते हैं यदि वे कुछ बुनियादी नियमों के बारे में सहमत हो जाएँ। इस समूह को एेसे नियम क्यों चाहिये? कल्पना करें कि एेसे बुनियादी नियमों के अभाव में क्या होगा? प्रत्येक सदस्य अपने को असुरक्षित महसूस करेगा क्योंकि उसे यह मालूम नहीं होगा कि समूह के सदस्य एक-दूसरे के साथ कैसा बर्ताव करेंगे और किसका किस चीज़ पर अधिकार है। किसी भी समूह को सार्वजनिक रूप से मान्यता प्राप्त कुछ बुनियादी नियमों की आवश्यकता होती है जिसे समूह के सभी सदस्य जानते हों, ताकि आपस में एक न्यूनतम समन्वय बना रहे। लेकिन ये नियम केवल पता ही नहीं होने चाहिए वरन् उन्हें लागू भी किया जाना चाहिये। यदि नागरिकों को यह विश्वास न हो कि दूसरे नागरिक भी उन नियमों का पालन करेंगे तो उनके पास भी उन नियमों को पालन करने का कोई आधार नहीं होगा। लेकिन जब यह कहा जाता है कि उन नियमों को न्यायालय में लागू किया जाएगा, तो इससे सभी को विश्वास हो जाता है कि और लोग भी इन नियमों का पालन करेंगे, क्योंकि एेसा न करने पर उन्हें दंड दिया जाएगा।

संविधान का पहला काम यह है कि वह बुनियादी नियमों का एक एेसा समूह उपलब्ध कराये जिससे समाज के सदस्यों में एक न्यूनतम समन्वय और विश्वास बना रहे।


खुद करें खुद सीखें

पुस्तक के इस भाग में दिये गये विचार का अपनी कक्षा में प्रयोग करें। पूरी कक्षा वाद-विवाद करके उन निर्णयों पर पहुँचने की कोशिश करे, जो इस सत्र में सभी पर लागू होंगे। ये निर्णय निम्नलिखित के बारे में हो सकते हैंः

➤ कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव कैसे हो?

कक्षा प्रतिनिधि पूरी कक्षा की ओर से कौन-सा निर्णय ले
सकता है?

क्या एेसे भी निर्णय हैं जिन्हें कक्षा प्रतिनिधि पूरी कक्षा से परामर्श किये बिना नहीं ले सकता?

यदि और लोग उससे सहमत हों, तो आप इसमें और बातें (कक्षा के लिए पिकनिक और यात्राओं के लिए पैसे जुटाने की योजना, अपने संसाधनों का साझा प्रयोग आदि) भी जोड़ सकते हैं। इसका ध्यान रहे कि इसमें वे बातें भी हो जिन पर पहले मतभेद रहा हो।

यदि आवश्यकता पड़े तो इन निर्णयों को कैसे बदला जाए?

इन सभी निर्णयों को कागज़ पर लिख लें और उसे नोटिस बोर्ड पर लगायें। इन निर्णयों को लेने में आपको किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? क्या विभिन्न छात्रों में इस पर मतभेद था? उन मतभेदों को आपने कैसे सुलझाया? क्या इस प्रक्रिया से पूरी कक्षा को कुछ लाभ हुआ?


निर्णय-निर्माण शक्ति की विशिष्टताएँ

संविधान कुछ एेसे बुनियादी सिद्धांतों का समूह है जिसके आधार पर राज्य का निर्माण और शासन होता है। लेकिन ये बुनियादी नियम क्या हों? और एेसी कौन-सी बात है जो उन्हें ‘बुनियादी’ बना देती है? पर हाँ ! सबसे पहले आपको यह तय करना पड़ेगा कि जिन नियमों के आधार पर समाज का शासन होता है उन्हें बनायेगा कौन ? आपको ‘क’ नियम बनाने की इच्छा है, लेकिन दूसरे लोग ‘ख’ नियम बनाना चाहते हैं। फिर यह कैसे तय किया जाए कि किसकी इच्छा वाले नियमों से हम पर शासन हो? जिन नियमों के अंतर्गत आप सभी को रखना चाहते हैं वे आपको सर्वश्रेष्ठ लग सकते हैं लेकिन दूसरे लोगों को लगता है कि उनके द्वारा सुझाये गये नियम सर्वश्रेष्ठ हैं। इस विवाद को कैसे सुलझाया जाए? अतः यह निर्णय करने से पहले कि हमारे समूह को किन नियमों से शासित होना है, हमें वास्तव में यह तय करना पड़ेगा कि उन नियमों को बनायेगा कौन?

संविधान ही इस प्रश्न का भी उत्तर देता है। वह समाज में शक्ति के मूल वितरण को स्पष्ट करता है। संविधान यह तय करता है कि कानून कौन बनायेगा? ‘कानून कौन बनायेगा’ - इस प्रश्न का उत्तर, सैद्धांतिक रूप में, कई प्रकार से दिया जा सकता है। राजतंत्र में कानून का निर्माण राजा करता है जबकि कुछ संविधान, जैसे पुराने सोवियत संघ के संविधान में निर्णय करने का अधिकार केवल एक पार्टी को दिया गया था। लेकिन लोकतांत्रिक संविधानों में निर्णय मोटे तौर पर जनता लेती है। लेकिन यह विषय इतना सरल नहीं है। यदि यह मान भी लिया जाए कि जनता निर्णय लेती है, तब भी यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि जनता निर्णय कैसे लेती है? क्या कोई कानून बनाने के लिए सभी लोगों को सहमत होना चाहिये? प्राचीन यूनान की पद्धति के अनुसार, क्या प्रत्येक मुद्दे पर सभी लोगों को वोट देना चाहिये? या लोगों को अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के द्वारा अपनी राय को व्यक्त करना चाहिये? लेकिन लोगों को अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से काम करना हो, तो फिर उन प्रतिनिधियों का चयन कैसे हो? और कुल कितने प्रतिनिधि हाें?

उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान में यह स्पष्ट किया गया है कि अधिकतर कानून संसद बनायेगी, और इस संसद का गठन भी एक विशेष प्रकार से किया जाएगा। किसी समाज में कानून कैसे हैं - इसे देखने के पहले उन कानूनों को बनाने का अधिकार रखने वालाें को पहचानना होगा। यदि संसद को कानून बनाने का अधिकार है, तो पहले उसे यह अधिकार देने वाला कोई कानून होना चाहिये। यह काम संविधान करता है। संविधान वह सत्ता है जो, सर्वप्रथम, सरकार बनाती है।

संविधान का दूसरा काम यह स्पष्ट करना है कि समाज में निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी। संविधान यह भी तय करता है कि सरकार कैसे निर्मित होगी।

 

सरकार की शक्तियों पर सीमाएँ

मान लीजिये कि आपने यह तय कर लिया कि निर्णय कौन करेगा। किंतु, जब उस सत्ता ने कानून बनाए तब आपको लगा कि वे कानून पूर्णतः अनुचित हैं। उदाहरण के लिए उसने आपको अपने धर्म का पालन करने से रोक दिया या उसने यह निर्णय लिया कि किसी खास किस्म के रंग वाले वस्त्र नहीं पहने जा सकते या आप कुछ विशेष गीत गाने को स्वतंत्र नहीं हैं या किसी विशेष समूह (धर्म, जाति) के लोगों को सदैव दूसरों की सेवा करनी पड़ेगी और उन्हें किसी प्रकार की संपत्ति रखने का अधिकार भी नहीं होगा या सरकार किसी को भी मनमाने तरीके से गिरफ़्तार कर सकती है या किसी एक खास रंग वाले लोगों को ही कुएँ से पानी भरने की इज़ाज़त दी जाएगी। स्वाभाविक है कि आपको यह कानून अनुचित और अन्यायपूर्ण लगेंगे। यद्यपि ये सभी कानून उस सरकार द्वारा बनाये गये जो एक विशेष प्रक्रिया का पालन करके बनी थी, लेकिन सरकार द्वारा एेसे कानूनों को बनाने के पीछे ज़रूर कोई अन्यायपूर्ण बात रही होगी।


कार्टून बूझें

European%20constitution-H.tif

यूरोपीय संघ के देशों ने एक यूरोपीय संविधान बनाने की कोशिश की। उनकी कोशिश असफल हो गई। कार्टूनिस्ट ने संविधान निर्माण के उनके प्रयास को मार-पीट और झगड़े से भरी कोशिश के रूप में देखा। क्या संविधान निर्माण की प्रक्रिया हमेशा एेसी ही होती है?


अतः संविधान का तीसरा काम यह है कि वह सरकार द्वारा अपने नागरिकों पर लागू किये जाने वाले कानूनों पर कुछ सीमाएँ लगाए। ये सीमाएँ इस रूप में मौलिक होती हैं कि सरकार कभी उसका उल्लंघन नहीं कर सकती।

Sr.Unni4.tif

ओह ! तो इसका मतलब यह कि पहले आप एक राक्षस बनाये और फिर खुद को उससे बचाने की चिंता करें। मैं तो यही कहूँगा कि फिर इस राक्षस जैसी सरकार को बनाया ही क्यों जाए?


संविधान सरकार की शक्तियों को कई तरह से सीमित करता है। सरकार की शक्तियों को सीमित करने का सबसे सरल तरीका यह है कि नागरिकों के रूप में हमारे मौलिक अधिकारों को स्पष्ट कर दिया जाए और कोई भी सरकार कभी भी उनका उल्लंघन न कर सके। इन अधिकारों का वास्तविक स्वरूप और व्याख्याएँ भिन्न-भिन्न संविधानों में बदलती रहती हैं। लेकिन अधिकतर संविधानों में कुछ विशेष मौलिक अधिकार सदैव पाये जाते हैं। नागरिकों को मनमाने ढंग से बिना किसी कारण के गिरफ्तार करने के विरुद्ध सुरक्षा प्राप्त हेै। यह सरकार की शक्तियों के ऊपर एक मूलभूत सीमा है। नागरिकों को सामान्यतः कुछ मौलिक स्वतंत्रताओं का अधिकार है जैसे भाषण की स्वतंत्रता, अंतरात्मा की आवाज पर काम करने की स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता आदि। व्यवहार में, इन अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल में सीमित किया जा सकता है और संविधान उन परिस्थितियाें का उल्लेख भी करता है जिनमें इन अधिकारों को वापिस लिया जा सकता है।


 

समाज की आकांक्षाएँ और लक्ष्य

अधिकतर पुराने संविधानों द्वारा केवल निर्णय लेने की शक्ति का वितरण और सरकार की शक्ति पर प्रतिबंध लगाने का काम किया जाता था। लेकिन बीसवीं शताब्दी के अनेक संविधान - जिनमें भारतीय संविधान एक अत्यंत सुंदर उदाहरण है, एक एेसा सक्षम ढाँचा भी प्रदान करता है जिससे सरकार कुछ सकारात्मक कार्य कर सके और समाज की आकांक्षाओं और उसके लक्ष्य को अभिव्यक्ति दे सके। भारतीय संविधान ने इस संबंध में कुछ नये प्रयोग किये। जिन समाजों में नाना प्रकार की असमानताओं की गहरी खाइयाँ हों, वहाँ केवल सरकार की शक्तियों पर प्रतिबंध लगाना ही पर्याप्त नहीं, वरन् वहाँ सरकार को समर्थ और शक्तिशाली भी बनाना पड़ेगा जिससे वह असमानता और गरीबी के विभिन्न रूपों से निपट सकें।



कार्टून बूझें

संविधान निर्माताओं को लोगों के अलग-अलग आकांक्षाओं से जूझना पड़ा। यहाँ पर नेहरू को अनेक भावी कल्पनाओं और विचारधाराओं में संतुलन करते दिखाया गया है। क्या आप पहचान सकते हैं कि ये विभिन्न समूह क्या चाहते हैं? आपको क्या लगता है? संतुलन करने का अंतिम परिणाम क्या हुआ?



उदाहरण के लिए भारत की आकांक्षा है कि हम एक एेसा समाज बनाएँ जिसमें जातिगत भेदभाव न हों। यदि यह हमारे समाज की आकांक्षा है, तो हमें अपनी सरकार को इतना समर्थ और शक्तिशाली बनाना पड़ेगा कि वह इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा सके। दक्षिण अफ्रीका नस्लीय भेदभाव के पुराने इतिहास का उदाहरण है। उसके नये संविधान ने सरकार को इस योग्य बनाया है कि वह नस्लीय भेदभाव को मिटा सके। वास्तव में एक संविधान अपने समाज की आकांक्षाओं का पिटारा है। उदाहरण के लिए भारत में संविधान निर्माताओं की इच्छा थी कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को बुनियादी भौतिक ज़रूरतें और शिक्षा सहित वह सब कुछ मिलना चाहिये जिसके आधार पर वह गरिमा और सामाजिक आत्मसम्मान से भरा हुआ जीवन जी सके। भारतीय संविधान सरकार को वह सामर्थ्य प्रदान करता है जिससे वह कुछ सकारात्मक लोक-कल्याणकारी कदम उठा सके और जिन्हें कानून की मदद से लागू भी किया जा सके। जैसे-जैसे हम भारतीय संविधान को पढ़ते हैं, हमें पता चलता है कि एेसी सामर्थ्य प्रदान करने वाले प्रावधानों को हमारे संविधान की प्रस्तावना का समर्थन प्राप्त है और वे संविधान के मौलिक अधिकारों वाले भाग में पाये जाते हैं।

संविधान का चौथा काम यह है कि वह सरकार को एेसी क्षमता प्रदान करे जिससे वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए उचित परिस्थितियों का निर्माण कर सके।


sr.munni1.tif
 

राज्य के नीति-निर्देशक तत्व भी सरकार से लोगों की कुछ आकांक्षाएँ पूरी करने की अपेक्षा करते हैं। संविधान में अच्छी बातेंलिखने में क्या जाता है? लेकिन एेसी ऊँची 

आकांक्षाओं और लक्ष्यों को लिखने का मतलब क्या है यदि वे लोगों के ीवन कोबदल  सकें?


संविधान के समर्थ बनाने वाले प्रावधान

 संविधान सरकार की शक्तियों को नियंत्रित करने वाले नियमों और कानूनों का ही नाम नहीं है। वह सरकार को एेसी शक्तियाँ भी देता है जिससे वह समाज की सामूहिक भलाई के लिये काम कर सके।

➤ दक्षिण अफ्रीका का संविधान सरकार को अनेक उत्तरदायित्त्व सौंपता है। वह सरकार को पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने और अन्यायपूर्ण भेदभाव से व्यक्तियों और समूहों को बचाने का प्रयास करने के लिये कदम उठाने का अधिकार देता है और यह प्रावधान भी करता है कि सरकार धीरे-धीरे सभी के लिये पर्याप्त आवास और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराये।

➤ इंडोनेशिया में सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था बनाए और उसका संचालन करे। इंडोनेशिया का संविधान यह भी सुनिश्चित करता है कि सरकार गरीब और अनाथ बच्चों की देखभाल करेगी।


राष्ट्र की बुनियादी पहचान

आखिरी और शायद सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि संविधान किसी समाज की बुनियादी पहचान होता है।

इसका अर्थ यह है कि संविधान के माध्यम से ही किसी समाज की एक सामूहिक इकाई के रूप में पहचान होती है। इस सामूहिक पहचान को बनाने के लिए हमें इस संबंध में कुछ बुनियादी नियमों पर सहमत होना पड़ता है कि हम पर शासन कैसे होगा और शासितों में कौन-कौन से लोग होंगे। संविधान बनने के पहले हमारी अन्य अनेक प्रकार की पहचान या अस्मिताएँ होती हैं। लेकिन कुछ बुनियादी नियमों और सिद्धांतों पर सहमत होकर हम अपनी मूलभूत राजनीतिक पहचान बनाते हैं। दूसरा, संवैधानिक नियम हमें एक एेसा विशाल ढाँचा प्रदान करते हैं जिसके अंतर्गत हम अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं, लक्ष्य और स्वतंत्रताओं का प्रयोग करते हैं। संविधान आधिकारिक बंधन लगा कर यह तय कर देता है कि कोई क्या कर सकता है और क्या नहीं। अतः संविधान हमें एक नैतिक पहचान भी देता है। तीसरा, और अंतिम, अब शायद यह संभव हो सका है कि अनेक बुनियादी राजनीतिक और नैतिक नियम विश्व के सभी प्रकार के संविधानों में स्वीकार किये गये हैं।

अगर हम दुनिया भर के संविधानों को देखें तो हमें सरकारों के अलग-अलग स्वरूप और विविध प्रकार की प्रक्रियाएँ दिखाई देेंगी। लेकिन उनमें काफी कुछ साझा भी है। अधिकतर संविधान कुछ मूलभूत अधिकारों की रक्षा करते हैं और एेसी सरकारें संभव बनाते हैं जो किसी न किसी रूप में लोकतांत्रिक होती हैं। लेकिन राष्ट्रीय पहचान की अवधारणा अलग-अलग संविधानों में अलग-अलग ढंग की होती है। ज़्यादातर राष्ट्र विभिन्न जटिल एेतिहासिक परंपराओं के सम्मिलन से बनते हैं। वे उस राष्ट्र में रहने वाले विभिन्न समूहों को कई तरीकों से आपस में मिला लेते हैं, जैसे जर्मनी का निर्माण ‘जर्मन नस्ल’ के आधार पर हुआ। संविधान ने इस पहचान को अभिव्यक्ति दी। दूसरी ओर भारतीय संविधान जातीयता या नस्ल को नागरिकता के आधार के रूप में मान्यता नहीं देता। विभिन्न राष्ट्रों में देश की केंद्रीय सरकार और विभिन्न क्षेत्रों के बीच के संबंधों को लेकर भिन्न-भिन्न अवधारणाएँ होती हैं। यह संबंध उस देश की राष्ट्रीय पहचान बनाता है।

कार्टून बूझें


Screenshot-2018-6-14 Ch 1 ver 2 pmd - chapter 1 pdf

इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता खत्म होने पर एक नए संविधान की रचना करने में देश के विभिन्न जातीय समूहों में काफीसंघर्ष दिखाई दिया। इन भिन्न-भिन्न लोगों की क्या माँगे हैं? इसमें दिखाये गये संघर्ष की यूरोपीय संघ और भारत केसंबंध में पिछले कार्टून में दिखाये संघर्ष से तुलना करें।

 

संविधान की सत्ता

हमने संविधान द्वारा किये जाने वाले कुछ कार्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की है। 


कहाँ पहुँचे? क्या समझे?

नीचे भारतीय और अन्य संविधानों के कुछ प्रावधान दिये गये हैं। बताएँ कि इनमें प्रत्येक प्रावधान का क्या कार्य है।

Screenshot-2018-6-14 Ch 1 ver 2 pmd - chapter 1 pdf(1)

इन कार्यों से स्पष्ट होता है कि क्यों अधिकतर समाजों में एक संविधान होता है। लेकिन संविधान के बारे में हम तीन और प्रश्न कर सकते हैं ः

(क) संविधान क्या है?

(ख) संविधान कितना प्रभावी है?

(ग) क्या संविधान न्यायपूर्ण है?

अधिकतर देशों में ‘संविधान’ एक लिखित दस्तावेज़ के रूप में होता है जिसमें राज्य के बारे में कई प्रावधान होते हैं। यह प्रावधान बताते हैं कि राज्य का गठन कैसे होगा और वह किन सिद्धांतों का पालन करेगा। जब हम किसी देश के संविधान की बात करते हैं तो सामान्य रूप से हम उसी दस्तावेज़ का ज़िक्र कर रहे होते हैं। लेकिन कुछ देशों जैसे इंग्लैंड के पास एेसा कोई दस्तावेज़ नहीं है जिसे संविधान कहा जा सके बल्कि उनके पास दस्तावेज़ाें और निर्णयों की एक लंबी शृंखला है जिसे सामूहिक रूप से संविधान कहा जाता है। अतः हम कह सकते हैं कि  संविधान वह दस्तावेज़ या दस्तावेज़ों का पुँज है जो उन कार्यों को करने का प्रयास करता है जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है।

लेकिन विश्व में अनेक संविधान केवल कागज़ पर ही होते हैं। वे केवल थोथे शब्द होते हैं और कुछ नहीं। महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कोई संविधान कितना प्रभावी है? उसे कौन-सी बात प्रभावी बनाती है? कौन-सी बात यह सुनिश्चित करती है कि लोगों के जीवन पर वास्तव में उसका प्रभाव पड़ा है? संविधान का प्रभावी होना अनेक कारणों पर निर्भर है।

संविधान को प्रचलन में लाने का तरीका

इसका मतलब है कि कोई संविधान कैसे अस्तित्व में आया। किसने संविधान बनाया और उनके पास इसे बनाने की कितनी शक्ति थी? अनेक देशों में संविधान इसीलिए निष्प्रभावी होते हैं क्योंकि वे सैनिक शासकों या एेसे अलोकप्रिय नेताओं के द्वारा बनाये जाते हैं जिनके पास लोगों को अपने साथ लेकर चलने की क्षमता नहीं होती। विश्व के सर्वाधिक सफल संविधान भारत, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका के हैं। ये एेसे संविधानों के उदाहरण हैं जिन्हें एक सफल राष्ट्रीय आंदोलन के बाद बनाया गया। यद्यपि भारतीय संविधान को औपचारिक रूप से एक संविधान सभा ने दिसंबर 1946 और नवंबर 1949 के मध्य बनाया पर एेसा करने में उसने राष्ट्रीय आंदोलन के लंबे इतिहास से काफी प्रेरणा ली। राष्ट्रीय आंदोलन में समाज के सभी वर्गों को एक साथ लेकर चलने की विलक्षण क्षमता थी। संविधान को भारी वैधता मिली क्योंकि उसे एेसे लोगों ने बनाया जिनमें समाज का अटूट विश्वास था और जिनके पास समाज के विभिन्न वर्गों से सीधा संवाद करने और उनका सम्मान प्राप्त करने की क्षमता थी। संविधान निर्माता लोगों को यह समझाने में सफल रहे कि संविधान उनकी व्यक्तिगत शक्तियों को बढ़ाने का कोई साधन नहीं है। यही कारण है कि संविधान को भारी वैधता मिली। संविधान का अंतिम प्रारूप उस समय की व्यापक राष्ट्रीय आम सहमति को व्यक्त करता है।

कुछ देशों ने अपने संविधान पर पूर्ण जनमत संग्रह कराया जिसमें सभी लोग अपनाये जा रहे संविधान के पक्ष या विपक्ष में राय देते हैं। भारतीय संविधान पर एेसा कोई जनमत संग्रह नहीं हुआ। लेकिन इसे लोगों की ओर से प्रबल शक्ति प्राप्त थी क्योंकि यह बहुत ही लोकप्रिय नेताओं की सहमति और समर्थन पर आधारित था और लोगों ने उसके प्रावधानों पर अमल करके उसे अपना लिया। अतः संविधान बनाने वालों का प्रभाव भी एक हद तक संविधान की सफलता की संभावना सुनिश्चित करता है।

Sr.Unni1.tif

लोगों को जब यह पता चलता है कि उनका संविधान न्यायपूर्ण नहीं है तो वे क्या करते हैं? एेसे लोगों का क्या होता है

 जिनकासंविधान केवल कागज़ पर ही होता है?


नेपाल के संविधान निर्माण का विवाद

संविधान बनाना कोई आसान और सुगम काम नहीं है। नेपाल संविधान बनाने की एक जटिल प्रक्रिया का उदाहरण है। 1948 के बाद से नेपाल में पाँच संविधान बनाये जा चुके हैं : 1948, 1951, 1959, 1962 और 1990 में। लेकिन ये सभी संविधान नेपाल-नरेश द्वारा ‘प्रदान’ किए गए। 1990 में संविधान द्वारा बहु-दलीय लोकतंत्र की शुरुआत की गई पर अनेक क्षेत्रों में नरेश के पास अंतिम शक्तियाँ बनी रहीं। पिछले वर्षों में नेपाल में सरकार और राजनीति की पुनर्संरचना के लिए सशस्त्र राजनीतिक आंदोलन चल रहा था। उसमें प्रमुख मुद्दा यही था कि संविधान में राजा की भूमिका क्या होनी चाहिए। नेपाल के कुछ समूह राजतंत्र नामक संस्था को ही खत्म करने और गणतांत्रिक सरकार की स्थापना के पक्ष में थे। कुछ लोगों का मानना था कि राजा की सीमित भूमिका के साथ संवैधानिक राजतंत्र का बना रहना उपयोगी रहेगा। स्वयं राजा भी शक्तियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। राजा ने अक्तूबर 2002 में समस्त शक्तियों को अपने हाथ में ले लिया।

बहुत सारे राजनीतिक दल और संगठन एक नई संविधान सभा के गठन की मांग कर रहे थे। 
नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) जनता द्वारा चुनी गई संविधान सभा के संघर्ष में सबसे आगे थी। अंततः जन प्रदर्शन के दबाव के सामने झुकते हुए राजा को एक एेसी सरकार बनवानी पड़ी जो आंदोलनकारी दलों को स्वीकार्य थी। इस सरकार ने राजा की लगभग सभी शक्तियाँ छीन लीं। 2008 में नेपाल ने राजतंत्र को खत्म किया और लोकतांत्रिक गणराज्य बन गया। अंततः नेपाल ने 2015 मेें नये संविधान को अपनाया।



संविधान के मौलिक प्रावधान

एक सफल संविधान की यह विशेषता है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के प्रावधानों का आदर करने का कोई कारण अवश्य देता है। उदाहरण के लिए जिस संविधान में बहुसंख्यकों को समाज के अल्पसंख्यक समूहों का उत्पीड़न करने की अनुमति दी गई हो, वहाँ अल्पसंख्यकों के पास कोई कारण नहीं होगा कि वे संविधान के प्रावधानों का आदर करें। कोई संविधान अन्य लोगों की तुलना में कुछ लोगों को ज़्यादा सुविधाएँ देता है या सुनियोजित ढंग से समाज के छोटे-छोटे समूहों की शक्ति को और मज़बूत करता है तो उसे जनता की निष्ठा मिलनी बंद हो जाएगी। यदि कोई समूह यह महसूस करे कि उसकी ‘पहचान’ को दबाया जा रहा है तो उसके पास संविधान को मानने का कोई कारण नहीं होगा। कोई भी संविधान खुद से न्याय के आदर्श स्वरूप की स्थापना नहीं करता लेकिन उसे लोगों को विश्वास दिलाना पड़ता है कि वह बुनियादी न्याय को प्राप्त करने के लिए ढाँचा उपलब्ध कराता है।

लोगों को जब यह पता चलता है कि उनका संविधान न्यायपूर्ण नहीं है तो वे क्या करते हैं? ऐसे लोगों का क्या होता है जिनका संविधन वेफवल कागश पर ही होता है?

आप इस विचार को प्रयोग में लाएँ। स्वयं अपने से यह प्रश्न पूछिये : समाज के कुछ बुनियादी नियमों में एेसी कौन-सी चीज़ें होनी चाहिए जिनसे सभी लोगों को उन्हें मानने का एक कारण मिल सके?

कोई संविधान अपने सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और समानता की जितनी अधिक सुरक्षा करता है उसकी सफलता की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। मोटे तौर पर कहें, तो क्या भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को एक ना एक एेसा कारण देता है जिससे वह उसकी सामान्य रूपरेखा का समर्थन कर सके? इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप इस प्रश्न का ‘हाँ’ में उत्तर देने की स्थिति में होने चाहिए।


संस्थाओं की संतुलित रूपरेखा

संविधान को जनता नहीं प्राय: एक छोटा समूह ही नष्ट कर देता है क्योंकि वह अपनी शक्तियाँ बढ़ाना चाहता है। ढंग से बनाये संविधान में शक्तियों को इस प्रकार बाँट दिया जाता है जिससे कोई एक समूह संविधान को नष्ट न कर सके। संविधान की रूपरेखा बनाने की एक कारगर विधि यह सुनिश्चित करना है कि किसी एक संस्था का सारी शक्तियों पर एकाधिकार न हो। एेसा करने के लिए शक्तियों को कई संस्थाओं में बाँट दिया जाता है। उदाहरण के लिए भारतीय संविधान शक्ति को एक समान धरातल पर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं और स्वतंत्र संवैधानिक निकाय जैसे निर्वाचन आयोग आदि में बाँट देता है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि यदि कोई एक संस्था संविधान को नष्ट करना चाहे तो अन्य दूसरी संस्थाएँ उसके अतिक्रमण को नियंत्रित कर लेंगी। अवरोध और संतुलन के कुशल प्रयोग ने भारतीय संविधान की सफलता सुनिश्चित की है।

संस्थाओं की रूपरेखा बनाने में इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि उसमें बाध्यकारी मूल्य, नियम और प्रक्रियाओं के साथ अपनी कार्यप्रणाली में लचीलापन का संतुलन होना चाहिए जिससे वह बदलती आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुकूल अपने को ढाल सके। ज़्यादा कठोर संविधान परिवर्तन के दबाव में नष्ट हो जाते हैं और दूसरी ओर, यदि संविधान अत्यधिक लचीला है तो वह समाज को सुरक्षा और पहचान न दे सकेगा। सफल संविधान प्रमुख मूल्यों की रक्षा करने और नई परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने में एक संतुलन रखते हैं। आप भारतीय संविधान निर्माताओं की समझदारी को नवें अध्याय (संविधान ः एक जीवंत दस्तावेज़) में महसूस करेंगे जिसमें भारतीय संविधान को एक जीवंत दस्तावेज़ की संज्ञा दी गई है। अपने प्रावधानों में परिवर्तन की संभावना और एक हद तक ठोस रूप में संतुलन बैठा कर संविधान सुनिश्चित करता है कि वह दीर्घायु होगा और जनता का आदर प्राप्त करेगा। इस व्यवस्था से यह भी सुनिश्चित हो जाता है कि कोई भी वर्ग या समूह अपने बल-बूते संविधान को नष्ट नहीं कर सकेगा।

Screenshot-2018-6-14 Ch 1 ver 2 pmd - chapter 1 pdf(2)

कार्टून बनाने वाले ने नये इराकी संविधान को ‘ताश के पत्तों का महल’ क्यों कहा? क्या यह वर्णन भारतीय संविधान पर लागू होगा?


अतः यह पता लगाने के लिए कि क्या किसी संविधान की सत्ता मान्य है, आप अपने से तीन प्रश्न पूछ सकते हैंः


क्या जिन लोगों ने संविधान बनाया वे विश्वसनीय थे? इस प्रश्न का उत्तर इसी अध्याय में आगे मिलेगा।

दूसरा क्या संविधान ने सुनिश्चित किया था कि सूझबूझ के साथ शक्ति को इस प्रकार संगठित किया जाए कि किसी एक समूह के लिए संविधान नष्ट करना
आसान न हो। और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि क्या संविधान सबको कुछ एेसा कारण देता है कि वे संविधान का पालन करें? इस पुस्तक के
अधिकतर हिस्से में इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है।

क्या संविधान लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का पिटारा है? संविधान द्वारा लोगों की निष्ठा प्राप्तकरने की योग्यता काफी कुछ इस बात पर भी निर्भर करती है कि संविधान न्यायपूर्ण है या नहीं। भारतीय  संविधान में न्याय के बुनियादी सिद्धांत क्या हैं? इस पुस्तक का अंतिम अध्याय इस प्रश्न का उत्तर देगा।

 

भारतीय संविधान कैसे बना ?

आइये देखें कि भारतीय संविधान कैसे बना। औपचारिक रूप से एक संविधान सभा ने संविधान को बनाया जिसे अविभाजित भारत में निर्वाचित किया गया था। इसकी पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई और फिर 14 अगस्त, 1947 को विभाजित भारत के संविधान सभा के रूप में इसकी पुनः बैठक हुई। संविधान सभा के सदस्य 1935 में स्थापित प्रांतीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से चुने गए। संविधान सभा की रचना लगभग उसी योजना के अनुसार हुई जिसे ब्रिटिश मंत्रिमंडल की एक समिति - ‘कैबिनेट मिशन’ ने प्रस्तावित किया था। इस योजना के अनुसार –

प्रत्येक प्रांत, देशी रियासत या रियासतों के समूह को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें दी गईं। मोटे तौर पर दस लाख की जनसंख्या पर एक सीट का अनुपात रखा गया। परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार के प्रत्यक्ष शासन वाले प्रांतों को 292 सदस्य चुनने थे तथा देशी रियासतों को न्यूनतम 93 सीटें आवंटित की गईं।

प्रत्येक प्रांत की सीटों को तीन प्रमुख समुदायों - मुसलमान, सिख और सामान्य में उनकी जनसंख्या के अनुपात में बाँट दिया गया।

प्रांतीय विधान सभाओं में प्रत्येक समुदाय के सदस्यों ने अपने प्रतिनिधियों को चुना और इसके लिए उन्होंने समानुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमण मत पद्धति का प्रयोग किया।

देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के चुनाव का तरीका उनके परामर्श से तय किया गया।

अध्याय के पिछले भाग में उन तीनों कारकों पर प्रकाश डाला गया जो संविधान को प्रभावी और सम्मान के योग्य बनाते हैं। भारतीय संविधान इस परीक्षा में किस हद तक कामयाब होता है?

अधिक जानकारी के लिए, देखें

http://164.100.47.194/loksabha/constituent/facts.html


अपने राजनीतिक लोकतंत्र को हमें सामाजिक लोकतंत्र का रूप भी देना चाहिए। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहींरह सकता है, जब तक कि उसका आधार सामाजिक लोकतंत्र न हो। सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है? इसका अर्थजीवन के उस मार्ग से है, जो स्वतंत्रता, समता और बंधुता को जीवन के सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करता है। स्वतंत्रता, समता और बंधुता के सिद्धांतों को इन तीनों के एक संयुक्त रूप से पृथक-पृथक रूपों में नहीं समझना चाहिए। ये तीनों मिलकर एक एेसा संयुक्त रूप बनाते हैं कि इनमें से एक को दूसरे से अलग करना लोकतंत्र के मूल प्रयोजन को ही विफल कर देना है। स्वतंत्रता को समता से अलग नहीं किया जा सकता है, समता को स्वतंत्रता से अलग नहीं किया जा सकता है। और न ही स्वतंत्रता और समता को बंधुता से अलग किया जा सकता है। समताविहीन स्वतंत्रता कुछ व्यक्तियों की अनेक व्यक्तियों पर प्रभुता को जन्म देगी। स्वतंत्रताविहीन समता व्यक्तिगत पहल को नष्ट कर देगी। बंधुता के बिना स्वतंत्रता और समता अपना स्वाभाविक मार्ग ग्रहण नहीं कर सकते।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर

संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड XI, पृष्ठ 979, 25 नवंबर 1949


क्या आपकी कक्षा में स्वतंत्रता, समता और बंधुता के सिद्धांतों को व्यवहार में लाया जाता है? इनको एक साथ कैसे व्यवहार में ला सकते हैं? अपने साथियों के साथ चर्चा कीजिए।

संविधान सभा का स्वरूप

3 जून 1947 की योजना के अनुसार विभाजन के बाद वे सभी प्रतिनिधि संविधान सभा के सदस्य नहीं रहे जो पाकिस्तान के क्षेत्रों से चुनकर आये थे। संविधान सभा के वास्तविक सदस्यों की संख्या घट कर 299 रह गई। इनमें से 26 नवंबर, 1949 को कुल 284 सदस्य उपस्थित थे। इन्होंने ही अंतिम रूप से पारित संविधान पर अपने हस्ताक्षर किये।

इस प्रकार इस उपमहाद्वीप में विभाजन से उपजी विभीषिका और हिंसा के बीच संविधान निर्माण का काम हुआ। लेकिन संविधान निर्माताओं के धैर्य की प्रशंसा करनी पड़ेगी कि उन्होंने न केवल अत्यधिक दबाव में एक संविधान बनाया बल्कि विभाजन के कारण हुई अकल्पनीय हिंसा से सही सबक भी लिया। भारत के संविधान ने नागरिकता की एक नई अवधारणा प्रस्तुत की। इसके अंतर्गत अल्पसंख्यक न केवल सुरक्षित होंगे बल्कि धार्मिक पहचान का नागरिक अधिकारों पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।


लेकिन संविधान सभा के गठन का यह विवरण केवल सतही तौर पर ही हमें बताता है कि संविधान वास्तव में बना कैसे। यद्यपि हमारी संविधान सभा के सदस्य सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं चुने गये थे पर उसे ज़्यादा से ज़्यादा प्रतिनिधिपरक बनाने का गंभीर प्रयास किया गया। सभी धर्मों के सदस्यों को ऊपर बतायी गयी विधि से प्रतिनिधित्त्व दिया गया। इसके अतिरिक्त संविधान सभा में अनुसूचित जातियों के अट्ठाईस सदस्य थे। जहाँ तक राजनीतिक दलों का सवाल है विभाजन के बाद संविधान सभा में काँग्रेस का वर्चस्व था और उसे 82 प्रतिशत सीटें प्राप्त थीं। लेकिन काँग्रेस स्वयं विविधताओं से भरी हुई एक एेसी पार्टी थी जिसमें लगभग सभी विचारधाराओं की नुमाइंदगी थी।



sr.munni6.tif

यदि भारत की संविधान सभा देश के सभी लोगों के द्वारा निर्वाचित होती तो क्या होता? क्या वह उस संविधान सभा से भिन्न होती जो बनाई गई ?

संविधान सभा के कामकाज की शैली

संविधान सभा की सत्ता केवल इस बात पर ही नहीं टिकी थी कि वह मोटे तौर पर (हालांकि पूर्ण रूप से नहीं) सबका प्रतिनिधित्व कर रही थी। संविधान बनाने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया और सदस्यों के विचार-विमर्श की जड़ में छुपे मूल्यों में ही संविधान सभा की लोकप्रिय सत्ता का आधार था। जहाँ प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली किसी सभा के लिए वांछनीय है कि उसमें समाज के विभिन्न वर्ग सहभागी हों वहीं यह भी महत्त्वपूर्ण है कि वे केवल अपनी पहचान या समुदाय का ही प्रतिनिधित्व न करें। संविधान सभा के सदस्यों ने पूरे देश के हित को ध्यान में रखकर विचार-विमर्श किया। सदस्यों में प्रायः मतभेद हो जाते थे लेकिन सदस्यों द्वारा अपने हितों को आधार बना कर शायद ही कोई मतभेद हुआ हो।

ये मतभेद वास्तव में वैध सैद्धांतिक आधार पर थे। हालाँकि संविधान सभा में अनेक मतभेद थे : भारत में शासन प्रणाली केंद्रीकृत होनी चाहिए या विकेंद्रीकृत? राज्यों के बीच कैसे संबंध होने चाहिए? न्यायपालिका की क्या शक्तियाँ होनी चाहिए? क्या संविधान को संपत्ति के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए? लगभग उन सभी विषयों पर गहराई से चर्चा हुई जो आधुनिक राज्य की बुनियाद हैं। संविधान का केवल एक ही प्रावधान एेसा है जो लगभग बिना किसी वाद-विवाद के पास हो गया। यह प्रावधान सार्वभौमिक मताधिकार का था जिसका अर्थ है कि धर्म, जाति, शिक्षा, लिंग और आय के आधार पर भेदभाव के बिना सभी नागरिकों को एक निश्चित आयु प्राप्त करने पर वोट देने का अधिकार होगा। सदस्यों ने इस पर वाद-विवाद आवश्यक नहीं माना कि किसे वोट देने का अधिकार होना चाहिए, लेकिन इसके अतिरिक्त प्रत्येक विषय पर गंभीर विचार-विमर्श और वाद-विवाद हुए।

इस सभा की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा का इससे बढ़िया व्यावहारिक रूप कुछ और नहीं हो सकता था।

संविधान सभा को असली ताकत इस बात से मिल रही थी कि वह सार्वजनिक हित का काम कर रही है। इसके सदस्यों ने चर्चा और तर्कपूर्ण बहसों पर काफी जोर दिया। उन्होंने सिर्फ अपने हितों की बात नहीं की बल्कि अपनी सोच और फ़ैसले के पक्ष में अन्य सदस्यों को सैद्धांतिक कारण दिए। अपनी सोच के पक्ष में दूसरों से तर्कपूर्ण संवाद स्वार्थ या संकीर्णता से ऊपर उठा देता है। संविधान सभा में हुई चर्चा कई मोटे-मोटे खंडों में प्रकाशित हुई है और हर अनुच्छेद को लेकर जैसी विस्तृत और बारीकी से बातचीत हुई है वह सार्वजनिक विवेक की भावना को सबसे प्रामाणिक ढंग से सामने लाती है। ये बहसें भी फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांति की तरह संविधान निर्माण के इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण और यादगार अध्यायों में से हैं।

 

कार्यविधि

संविधान सभा की सामान्य कार्यविधि में भी सार्वजनिक विवेक का महत्त्व स्पष्ट दिखाई देता था। विभिन्न मुद्दों के लिए संविधान सभा की आठ मुख्य कमेटियाँ थीं। आम तौर पर जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल या बी.आर. अंबेडकर इन कमेटियों की अध्यक्षता करते थे। ये एेसे लोग थे जिनके विचार हर बात पर एक-दूसरे के समान नहीं थे। अंबेडकर तो कांग्रेस और गांधी के कड़े आलोचक थे और उन पर अनुसूचित जातियों के उत्थान के लिए पर्याप्त काम न करने का आरोप लगाते थे। पटेल और नेहरू बहुत-से मुद्दों पर एक-दूसरे से असहमत थे। फिर भी सबने एक साथ मिलकर काम किया। प्रत्येक कमेटी ने आम तौर पर संविधान के कुछ-कुछ प्रावधानों का प्रारूप तैयार किया जिन पर बाद में पूरी संविधान सभा में चर्चा की गई। आम तौर पर यह प्रयास किया गया कि फ़ैसले आम राय से हों और कोई भी प्रावधान किसी खास हित समूह के पक्ष में न हो। कई प्रावधानों पर निर्णय मत विभाजन करके भी लिए गए। एेसे अवसरों पर भी हर सरोकार का ध्यान रखा गया और हर तर्क और शंका का समाधान बहुत ही सावधानी से किया गया। लिखित रूप में उनका जवाब दिया गया। दो वर्ष और ग्यारह महीने की अवधि में संविधान सभा की बैठकें 166 दिनों तक चलीं। इसके सत्र अखबारों और आम लोगों के लिए खुले हुए थे।



संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रारूप समिति के सभापति डॉ. बी.आर. अंबेडकर एक दूसरे का अभिवादन करते हुए

...जैसा मैंने महसूस किया, शायद ही किसी ने किया हो कि प्रारूप समिति के सदस्यों विशेषकर इसके सभापति 
डॉ. अंबेडकर ने अस्वस्थ होने के बावजूद कितने उत्साह और लगन के साथ कार्य किया। डॉ. अंबेडकर को प्रारूप समिति में शामिल करने और इसके सभापति बनाने के निर्णय से बेहतर और कोई निर्णय नहीं हो सकता था। उन्होंने न केवल अपने चयन को न्यायोचित सिद्ध किया बल्कि उन्होंने जो कार्य किया उसे भी गरिमा प्रदान की। इस संबंध में समिति के अन्य सदस्यों में परस्पर भेद करना पक्षपातपूर्ण होगा। मैं जानता हूँ कि उन सभी ने उतने ही उत्साह और लगन के साथ कार्य किया, जितना कि उसके सभापति ने। वे सभी देश की कृतज्ञता के पात्र हैं।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद

संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड XI, पृष्ठ 994, 26 नवंबर 1949


 

राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत

लेकिन कोई भी संविधान केवल अपनी संविधान सभा के बूते नहीं बनता। भारत की संविधान सभा इतनी विविधतापूर्ण थी कि वह सामान्य ढंग से काम ही नहीं कर सकती थी यदि उसके पीछे उन सिद्धांतों पर आम सहमति न होती जिन्हें संविधान में रखा जाना था। इन सिद्धांतों पर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सहमति बनी। एक तरह से संविधान सभा केवल उन सिद्धांतों को मूर्त रूप और आकार दे रही थी जो उसने राष्ट्रीय आंदोलन से विरासत में प्राप्त किए थे। संविधान लागू होने के कई दशक पूर्व से ही राष्ट्रीय आंदोलन में उन प्रश्नों पर चर्चा हुई थी जो संविधान बनाने के लिए प्रासंगिक थे, जैसे - भारत में सरकार का स्वरूप और संरचना कैसी होनी चाहिए, हमें किन मूल्यों का समर्थन करना चाहिए, किन असमानताओं को दूर किया जाना चाहिए आदि? उन बहसों से प्राप्त निष्कर्षों को ही संविधान में अंतिम रूप प्रदान किया गया।

राष्ट्रीय आंदोलन से जिन सिद्धांतों को संविधान सभा में लाया गया उसका सर्वोत्तम सारांश हमें नेहरू द्वारा 1946 में प्रस्तुत ‘उद्देश्य-प्रस्ताव’ में मिलता है। इस प्रस्ताव में संविधान सभा के उद्देश्यों को परिभाषित किया गया था। इस प्रस्ताव में संविधान की सभी आकांक्षाओं और मूल्यों को समाहित किया गया था। पिछले भाग में जिसे संविधान के मौलिक प्रावधान कहा गया था वह वास्तव में उद्देश्य-प्रस्ताव में समाहित मूल्यों से प्रेरित और उनका सारांश है। इसी प्रस्ताव के आधार पर हमारे संविधान में समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, संप्रभुता और एक सर्वजनीन पहचान जैसी बुनियादी प्रतिबद्धताओं को संस्थागत स्वरूप दिया गया। अतः हमारा संविधान केवल नियमों और प्रक्रियाओं की भूलभुलैया नहीं है, बल्कि यह एक एेसी सरकार बनाने की नैतिक प्रतिबद्धता है जो राष्ट्रीय आंदोलन में लोगों को दिये गये आश्वासनों को पूरा करेगी।

 

संस्थागत व्यवस्थाएँ

संविधान को प्रभावी बनाने का तीसरा कारक यह है कि सरकार की सभी संस्थाओं को संतुलित ढंग से व्यवस्थित किया जाए। मूल सिद्धांत यह रखा गया कि सरकार लोकतांत्रिक रहे और जन-कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हो। संविधान सभा ने शासन के विभिन्न अंगों – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – के बीच समुचित संतुलन स्थापित करने के लिए बहुत विचार-मंथन किया। संविधान सभा ने संसदीय शासन व्यवस्था और संघात्मक व्यवस्था को स्वीकार किया जो एक ओर विधायिका और कार्यपालिका के बीच तथा दूसरी ओर केंद्रीय सरकार और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण करती है।


sr.munni5.tif


यदि हमें 1937 में स्वतंत्रता मिल जाती तो क्या होता? हमें 1957 तक इंतज़ार करना पड़ता तो क्या होता? क्या तब बनाया गया संविधान हमारे वर्तमान संविधान से भिन्न होता?


उद्देश्य-प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु


भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य है;

भारत ब्रिटेन के अधिकार में आने वाले भारतीय क्षेत्रों, देशी रियासतों और देशी रियासतों के बाहर के एेसे क्षेत्र जो हमारे संघ का अंग बनना चाहते हैं, का एक संघ होगा।

संघ की इकाइयाँ स्वायत्त होंगी और उन सभी शक्तियों का प्रयोग और कार्यों का संपादन करेंगी जो संघीय सरकार को नहीं दी गईं।

संप्रभु और स्वतंत्र भारत तथा इसके संविधान की समस्त शक्तियों और सत्ता का स्रोत जनता है।

भारत के सभी लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; कानून के समक्ष समानता; प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा कानून और सार्वजनिक नैतिकता की सीमाओं में रहते हुए भाषण, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संगठन और कार्य करने की मौलिक स्वतंत्रता की गारंटी और सुरक्षा दी जायेगी।

अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्र, दलित व अन्य पिछड़े वर्गों को समुचित सुरक्षा दी जायेगी।

गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता तथा थल, जल और आकाश में इसके संप्रभु अधिकारों की रक्षा सभ्य राष्ट्रों के कानून और न्याय के अनुसार की जायेगी।

विश्वशांति और मानव कल्याण के विकास के लिए देश स्वेच्छापूर्वक और पूर्ण योगदान करेगा।


शासकीय संस्थाओं की सर्वाधिक संतुलित व्यवस्था स्थापित करने में हमारे संविधान निर्माताओं ने दूसरे देशों के प्रयोगों और अनुभवों से कुछ सीखने में कोई संकोच नहीं किया। इसी प्रकार हमारे संविधान निर्माताओं ने अन्य संवैधानिक परंपराओं से कुछ ग्रहण करने से भी कोई परहेज नहीं किया। यह उनके व्यापक ज्ञान का प्रमाण है कि उन्होंने किसी भी एेसे बौद्धिक तर्क या एेतिहासिक उदाहरण की अनदेखी नहीं की जो उनके कार्य को संपन्न करने के लिए ज़रूरी था। अतः उन्होंने विभिन्न देशों से अनेक प्रावधानों को भी लिया।

लेकिन उन विचारों को लेना कोई नकलची मानसिकता का परिणाम नहीं था बल्कि बात इससे बिलकुल अलग थी। संविधान के प्रत्येक  प्रावधान को इस आधार पर उचित सिद्ध करना था कि वह भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप है। यह भारत का सौभाग्य ही था कि हमारी संविधान सभा ने संकुचित दृष्टिकोण छोड़कर संपूर्ण विश्व से सर्वोत्तम चीज़ों को ग्रहण किया और उन्हें अपना बना लिया।

Sr.Unni5.tif

क्या यह संविधान उधार का था? हम एेसा संविधान क्यों नहीं बना सके जिसमें कहीं  से कुछ भी उधार न लिया गया हो?

15%20Ch%202.tif

संविधान सभा में चर्चा की अध्यक्षता करते हुए डॉ. बी.आर. अंबेडकर



हम पूछना चाहेंगे कि विश्व-इतिहास के इस पड़ाव पर बनाये गये संविधान में क्या कुछ नया भी हो सकता है।...आज इस समय बनाये संविधान में यदि कुछ नया हो सकता है तो वह यह कि उसमें केवल कुछ एेसे परिवर्तन किये जाएँ जो कमियों को दूर करें और उसे देश की आवश्यकताओं के अनुरूप बना सकें।

-डॉ. बी. आर. अंबेडकर

संविधान सभा वाद-विवाद, खंड VII, पृष्ठ 37
4 नवंबर 1948

विभिन्न देशों के संविधानों से लिए गए प्रावधान

Screenshot-2018-6-14 Ch 1 ver 2 pmd - chapter 1 pdf(3)

 

निष्कर्ष

यह संविधान निर्माताओं की बुद्धिमत्ता और दूरदृष्टि का प्रमाण है कि वे देश को एक एेसा संविधान दे सके जिसमें जनता द्वारा मान्य आधारभूत मूल्यों और सर्वोच्च आकांक्षाओं को स्थान दिया गया था। यही वह कारण है जिसकी वजह से इतनी जटिलता से बनाया संविधान न केवल अस्तित्व में है, बल्कि एक जीवंत सच्चाई भी है जबकि दुनिया के अन्य अनेक संविधान कागज़ी पोथों में ही दब कर रह गए।

भारत का संविधान एक विलक्षण दस्तावेज़ है जो अन्य अनेक देशों, खासतौर से दक्षिण अफ्रीका के लिए एक प्रतिमान हो गया। तीन वर्ष तक संविधान बनाने की प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह रहा कि एक एेसा संतुलित संविधान बनाया जाए जिसमें संविधान द्वारा निर्मित संस्थाएँ अस्त-व्यस्त या कामचलाऊ व्यवस्थाएँ मात्र न हों बल्कि लोगों की आकांक्षाओं को एक लंबे समय तक संजोये रख सकें। आप पुस्तक के शेष भाग में इन व्यवस्थाओं के बारे में पढ़ेंगे।


प्रश्नावली

1. इनमें कौन-सा संविधान का कार्य नहीं है?

(क) यह नागरिकों के अधिकार की गारंटी देता है।

(ख) यह शासन की विभिन्न शाखाओं की शक्तियों के अलग-अलग क्षेत्र का रेखांकन करता है।

(ग) यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता में अच्छे लोग आयें।

(घ) यह कुछ साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करता है।

 

2. निम्नलिखित में कौन-सा कथन इस बात की एक बेहतर दलील है कि संविधान की प्रमाणिकता संसद से ज़्यादा है?

(क) संसद के अस्तित्व में आने से कहीं पहले संविधान बनाया जा चुका था।

(ख) संविधान के निर्माता संसद के सदस्यों से कहीं ज्यादा बड़े नेता थे।

(ग) संविधान ही यह बताता है कि संसद कैसे बनायी जाय और इसे कौन-कौन-सी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।

(घ) संसद, संविधान का संशोधन नहीं कर सकती।

3. बतायें कि संविधान के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या गलत?

(क) सरकार के गठन और उसकी शक्तियों के बारे में संविधान एक लिखित दस्तावेज़ है।

(ख) संविधान सिर्फ लोकतांत्रिक देशों में होता है और उसकी ज़रूरत एेसे ही देशों में होती है।

(ग) संविधान एक कानूनी दस्तावेज़ है और आदर्शों तथा मूल्यों से इसका कोई सरोकार नहीं।

(घ) संविधान एक नागरिक को नई पहचान देता है।

 

4. बतायें कि भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में निम्नलिखित अनुमान सही हैं या नहीं? अपने उत्तर का कारण बतायें।

(क) संविधान-सभा में भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई। इसका निर्वाचन सभी नागरिकों द्वारा नहीं हुआ था।

(ख) संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फ़ैसला नहीं लिया गया क्योंकि उस समय नेताओं के बीच संविधान की बुनियादी रूपरेखा के बारे में आम सहमति थी।

(ग) संविधान में कोई मौलिकता नहीं है क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा दूसरे देशों से लिया गया है।

 

5. भारतीय संविधान के बारे में निम्नलिखित प्रत्येक निष्कर्ष की पुष्टि में दो उदाहरण दें।

(क) संविधान का निर्माण विश्वसनीय नेताओं द्वारा हुआ। उनके लिए जनता के मन में आदर था।

(ख) संविधान ने शक्तियों का बँटवारा इस तरह किया कि इसमें उलट-फेर मुश्किल है।

(ग) संविधान जनता की आशा और आकांक्षाओं का केंद्र है।

 

6. किसी देश के लिए संविधान में शक्तियों और जिम्मेदारियों का साफ-साफ निर्धारण क्यों ज़रूरी है? इस तरह का निर्धारण न हो, तो क्या होगा?

 

7. शासकों की सीमा का निर्धारण करना संविधान के लिए क्यों ज़रूरी है? क्या कोई एेसा भी संविधान हो सकता है जो नागरिकों को कोई अधिकार न दे।

8. जब जापान का संविधान बना तब दूसरे विश्वयुद्ध में पराजित होने के बाद जापान अमेरिकी सेना के कब्जे में था। जापान के संविधान में एेसा कोई प्रावधान होना असंभव था, जो अमेरिकी सेना को पसंद न हो। क्या आपको लगता है कि संविधान को इस तरह बनाने में कोई कठिनाई है? भारत में संविधान बनाने का अनुभव किस तरह इससे अलग है?

राज्य सभा टीवी शृंखला ‘संविधान : भारतीय संविधान के निर्माण की कहानी’ तथा ‘गांधी’, ‘सरदार’ और ‘डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर’ जैसी फ़िल्मेें देखें एवं चर्चा करें। जिस संदर्भ में संविधान बनाया गया, उसको समझने में ये दृश्य-श्रव्य सामग्रियाँ मदद करेंगी।
ये हमारे राष्ट्रीय नेताओं के जीवन और समय को जानने में भी आपकी मदद करेंगी।


9. रजत ने अपने शिक्षक से पूछा – ‘संविधान एक पचास साल पुराना दस्तावेज़ है और इस कारण पुराना पड़ चुका है। किसी ने इसको लागू करते समय मुझसे राय नहीं माँगी। यह इतनी कठिन भाषा में लिखा हुआ है कि मैं इसे समझ नहीं सकता। आप मुझे बतायें कि मैं इस दस्तावेज़ की बातों का पालन क्यों करूँ?’ अगर आप शिक्षक होते तो रजत को क्या उत्तर देते?

 

10. संविधान के क्रिया-कलाप से जुड़े अनुभवों को लेकर एक चर्चा में तीन वक्ताओं ने तीन अलग-अलग पक्ष लिए –

(क) हरबंस – भारतीय संविधान एक लोकतांत्रिक ढाँचा प्रदान करने में सफल रहा है।

(ख) नेहा – संविधान में स्वतंत्रता, समता और भाईचारा सुनिश्चित करने का विधिवत् वादा है। चूँकि एेसा नहीं हुआ इसलिए संविधान असफल है।

(ग) नाजिमा – संविधान असफल नहीं हुआ, हमने उसे असफल बनाया।

क्या आप इनमें से किसी पक्ष से सहमत हैं, यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो आप अपना पक्ष बतायें।

राज्य सभा टीवी शृंखला ‘संविधान : भारतीय संविधान के निर्माण की कहानी’ तथा ‘गांधी’, ‘सरदार’ और ‘डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर’ जैसी \फ़िल्मेें देखें एवं चर्चा करें। जिस संदर्भ में संविधान बनाया गया, उसको समझने में ये दृश्य-श्रव्य सामग्रियाँ मदद करेगी। 
ये हमारे राष्ट्रीय नेताओं के
 जीवन और समय को जानने मे भी आपकी मदद करेंगी।