RuchiraBhag1-001

एकादशः पाठः

नवद्रव्याणि

तर्क शब्द का अर्थ है - प्रमाण ( यथार्थज्ञान का साधन ) । जो प्रमाण के विषय हैं वे तर्क के अन्तर्गत गृहीत हैं । द्रव्यादि सप्त प्रमेय पदार्थ एवं प्रत्यक्षादि चार प्रमाण तर्क के विषय हैं। इनका संक्षेप से लक्षण एवं परीक्षा करना ही इस ग्रन्थ का मुख्य उद्देश्य है। तर्क शास्त्र व्याकरण एवं साहित्य आदि शास्त्रों के लक्षणों का पदकृत्य जानने की जिज्ञासा का उत्पादक होने से छात्रों के लिए उपयोगी है। इसके रचयिता अन्नंभट्ट हैं, इनका समय 17वीं शताब्दी माना जाता है। तर्कशास्त्र की मान्यता के अनुसार- द्रव्यादि सप्त पदार्थों के ज्ञान से लोकसिद्धि होकर निःश्रेयस अर्थात् मोक्ष प्राप्ति होती है। विश्व का समग्र ज्ञान इन सप्त पदार्थों में ही समाहित है।

'तर्कसंग्रह' न्याय एवं वैशेषिक दर्शन के प्रवेश की कुञ्जी है । वैशेषिक दर्शन को भौतिक विज्ञान के प्रति प्राचीन भारतीय योगदान का पोषक ग्रन्थ माना जाता है। छात्र प्राच्य ज्ञान की समृद्ध परम्परा से परिचय एवं उसकी अनुभूति कर सके, यही इस पाठ का उद्देश्य है।

द्रव्य-गुण-कर्म- सामान्य- विशेष - समावायाभावाः सप्त पदार्थाः ।

तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव ।

रूप-रस- गन्ध

- स्पर्श - संख्या - परिमाण - पृथक्त्व - संयोग-विभाग- परत्वापरत्व-गुरुत्व- द्रवत्व- स्नेह - शब्द-बुद्धि-सुख-दुःखेच्छा- द्वेष- प्रयत्न-धर्माऽधर्म - संस्काराश्चतुर्विंशतिर्गुणाः ।

उत्क्षेपणापक्षेपणाकुश्चन - प्रसारण - गमनानि पश्ञ्च कर्माणि ।

परमपरं चेति द्विविधं सामान्यम् ।

नित्यद्रव्यवृत्तयो विशेषास्त्वनन्ता एव ।

समवायस्त्वेक एव ।

अभावश्चतुर्विधः - प्रागभावः प्रध्वंसाभावोऽत्यन्ताभावोऽन्योन्या भावश्चेति ।

द्रव्यलक्षणप्रकरणम्।

तत्र गन्धवती पृथिवी । सा द्विविधा नित्याऽनित्या च । नित्या परमाणुरूपा। अनित्या कार्यरूपा ।

शीतस्पर्शवत्य आपः । ता द्विविधा:- नित्या अनित्याश्च । नित्याः परमाणुरूपाः। अनित्याः कार्यरूपाः ।

पुनस्त्रिविधा :- शरीरेन्द्रियविषयभेदात् ।

उष्णस्पर्शवत्तेजः । तच्च द्विविधं नित्यमनित्यं च ।

नित्यं परमाणुरूपम्। अनित्यं कार्यरूपम् ।

पुनस्त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयभेदात् ।

रूपरहितः स्पर्शवान् वायुः । स द्विविधः - नित्योऽनित्यश्च ।

नित्यः परमाणुरूपः अनित्यः कार्यरूपः

पुनस्त्रिविध:- शरीरेन्द्रियविषयभेदात् ।

शब्दगुणकमाकाशम्। तच्चैकं विभु नित्यं च।

अतीतादिव्यवहारहेतुः कालः । स चैको विभुर्नित्यश्च । 

प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिक् । सा चैका । नित्या विभ्वी च । 

ज्ञानाधिकरणमात्मा । स द्विविध:- जीवात्मा परमात्मा चेति । तत्रेश्वरः सर्वज्ञः । परमात्मा एक एव जीवस्तु प्रतिशरीरं भिन्नो विभुर्नित्यश्च।

दुःखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः । तच्च 

प्रत्यात्मनियतत्वादनन्तं परमाणुरूपं नित्यं च ।


शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च

द्रव्यम् - द्रव्यत्वजातिमत्वं गुणवत्त्वं वा द्रव्यसामान्यलक्षणम् - गुण एवं क्रिया का आधार ( द्रव्य ) ।

समवायः - इदमिति यतः स समवायः, जिसके कारण यह इसमें है, ऐसी अनुभूति होती है, वह समवाय है। यह नित्य सम्बन्ध है जो कार्य-कारण, क्रिया- क्रियावान्, गुण-गुणी एवं जाति और व्यक्ति के बीच होता है।

अभावः - निषेधमुख अर्थात् नहीं है ऐसी अनुभूति का विषय 'अभाव' है। यह चार प्रकार का है- प्रागभव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव, अन्योन्याभाव। 

संस्कार: - संस्कारस्त्रिविध:- वेगः, भावना, स्थितिस्थापकश्च। वेग - सभी मूर्त्त द्रव्यों में होता है जैसे पृथ्वी, जल, वायु एवं मन । भावना - यह आत्मा का गुण है, स्मरण एवं प्रत्यभिज्ञा का कारण यही है। स्थितिस्थापकः-पूर्वस्थिति में लौटने का कारण, कारणभूत ।

कर्म - चलनात्मकं कर्म - चलने का स्वभाव कर्म है। कर्म के पांच प्रकार हैं- उत्क्षेपणम् - उर्ध्वदशसंयोग हेतु :- उर्ध्व स्थान संयोग का कारण । अपक्षेपणम्- ओदेशसंयोगहेतुः- निम्नस्थान के संयोग हेतु । आकुञ्चनम् - शरीरस्य सन्निकृष्टसंयोगहेतुः- शरीर के संकोचरूपी संयोग का हेतु । प्रसारणम्- विप्रकृष्ट- संयोगहेतु :- शरीर के विस्ताररूपी संयोग का हेतु ।

गमनम् - उत्क्षेपणादि चार प्रकार के कर्मों के अतिरिक्त समस्त प्रकार की क्रियायें गमन में स्वीकृत हैं। 

प्रागभावः - अनादिसान्तः उत्पत्तेः पूर्व कार्यस्य - जिस अभाव का आदि नहीं हो परन्तु अन्त हो अर्थात् कार्य की उत्पत्ति से पूर्व की अवस्था ।

प्रध्वंसाभावः - सादिरनन्तः उत्पत्त्यनन्तरं कार्यस्य- जिस भाव का आदि हो अन्त न हो अर्थात् कार्य के प्रध्वंस की परवर्ती अवस्था ।

अत्यन्ताभावः - त्रैकालिक संसर्गाभाव:- सर्वथा अभाव ।

अन्योन्याभावः -  तादात्म्यसम्बन्धाभावः- एक का दूसरे में अभाव यथा - घटः पटो न पटः घटो न। 

विभुः / विभु/विभ्वी - पुं./नपुं. / स्त्री. सर्वव्यापक ।

दिक् - प्राच्यादिव्यवहारहेतुः- पूर्वपश्चिम आदि दिशा ।

अधिकरणम् - आधार ।

प्रत्यात्मम् - आत्मनि आत्मनि इति - हर आत्मा में।


अभ्यासः

1. एकपदेन उत्तरं लिखत ।

(क) पदार्थाः कति भवन्ति ?

(ख) पृथिव्याः कति भेदा: उक्ता: ?

(ग) तेजः कीदृशं कथ्यते ?

(घ) अतीतादिव्यवहारहेतुः कः ?

(ङ) आत्मा कतिविध: ?

2. पूर्णवाक्येन उत्तरत ।

(क) कस्मात् ग्रन्थात् सङ्गृहीतः एषः पाठः ? 

(ख) कानि पञ्चकर्माणि पाठे वर्णितानि ?

(ग) मनः कस्य साधनम् ?

(घ) वायोः कतिभेदा: ?

(ङ) अतीतादिव्यवहारहेतुः कालः, स च कीदृश: ?

3. मञ्जूषातः पदान्यादाय रिक्तस्थानानि पूरयत ।

त्रिविधम् गन्धवती, प्रसारण, परमाणुरूपः, अनन्तम्

(क) आपः शरीरेन्द्रियविषयभेदात्" .................भवति ।

(ख) वायोः द्वौ भेदौ नित्यः.................अनित्यः कार्यरूपश्च ।

(ग) पृथिवी ".................'सा नित्याऽनित्या, परमाणुरूपा कार्यरूपा च ।

(घ) उत्क्षेपणाऽपक्षेपणाऽऽकुञ्चन"................."गमनानि पञ्चकर्माणि भवन्ति ।

(ङ) मनः प्रत्यात्मनियतत्वात्".................परमाणुरूपं नित्यं च ।

4. यथोचितं योजयत ।

(क) शीतस्पर्शवत्यः - सर्वज्ञः

(ख) चतुर्विधः - रूपरहितः

(ग) ईश्वर : - अभावः

(घ) वायुः - आकाशम्

ङ) शब्दगुणकम् - आपः

5. सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धेः नाम लिखत ।

(क) चैक: ..................+ .................. .......

(ख) प्रत्यात्मम्  ..................+ .................. .......

(ग) तच्च  .................. +.................. .......

(घ) अभावश्च  .................. +.................. .......

(ङ) पृथिव्यप्तेजः  .................. +.................. .......

6. प्रदत्तपदान्यधिकृत्य वाक्यानि रचयत ।

अनित्यम्, चतुर्विंशतिः, नवैव, समवायः, रूपरहितः। 

7. पाठात् विपरीतार्थकपदानि चित्वा लिखत ।

(क) उत्क्षेपणम्

(ख) सामान्यम् 

(ग) अनित्या

(घ) पृथिवी

(ङ) अनन्तम्

8. अ. अधोलिखितपदानां मूलशब्द, विभक्तिं वचनं, लिङ्ग च लिखत |

(क) द्रव्याणि

(ख) मनांसि

(ग) विभ्वी

(घ) गुणाः

(ङ) लक्षणानि

आ. समस्तपदानां विग्रहं कृत्वा लिखत ।

(क) सप्तपदार्थाः

(ख) अनन्ताः

(ग) शरीरेन्द्रियविषयभेदात्

(घ) व्यवहारहेतुः

(ङ) रूपरहितः

9. कानि पञ्चकर्माणि? सोदाहरणं स्पष्टयत ।


 योग्यताविस्तारः

( क ) तर्कसङ्ग्रहस्य रचयिता अन्नम्भट्टः । अस्य रचना बालकानां कृते तर्कशास्त्रस्य ज्ञानार्थं कृता ।

“बालानां सुखबोधाय क्रियते तर्कसङ्ग्रहः '

बालकानां कृते एषः ग्रन्थः अतीव उपयोगी अस्ति । अस्मिन् ग्रन्थे महर्षिगौतमप्रणीतन्यायदर्शनस्य एवं कणादप्रणीतवैशेषिकदर्शनस्य सिद्धान्तानां वर्णनम् अस्ति ।

काणादन्यायमतयोर्बालव्युत्पत्तिसिद्धये । 

अन्नम्भट्टेन विदुषा रचितस्तर्कसंग्रहः ॥

महर्षिणा गौतमेन षोडशपदार्थानां चर्चा कृता कणादेन च सप्तपदार्थानां चर्चा कृता। तर्कसंग्रहेऽपि सप्तपदार्थानां वर्णनं अन्नम्भटेन कृतम्।

(ख) महर्षिणा गौतमेन वर्णिताः षोडशपदार्था:-

1. प्रमाणम् 2. प्रमेयम् 3. संशय: 4. प्रयोजनम् 5. दृष्टान्तः 6.सिद्धान्तः 7. अवयव : 8. तर्क : 9. निर्णय: 10. वाद :11. जल्प: 12. वितण्डा 13. हेत्वाभासः 14. छल: 15. जाति: 16. निग्रहस्थानम्

(ग) अन्नम्भट्टानुसारेण सप्तपदार्था:-

1. द्रव्यम् 2. गुण: 3. कर्म 4. सामान्यम् 5. विशेष : 6. समवायः 7. अभावः

महर्षिणा गौतमेन वर्णितषोडशपदार्थानाम् अन्तर्भावः अन्नम्भट्टस्य सप्तपदार्थेषु एव भवति ।

सर्वेषां पदार्थानां सम्बन्ध : विज्ञानेन सह अपि अस्ति । विज्ञाने पदार्थ : (matter) इति नाम्ना वर्णितः । यथा-

Matter is any substance that has mass and takes up space by having volume. This includes atoms anything made up of these.


परिशिष्ट - 1


छन्द

छन्द

पद्य लिखते समय वर्णों की एक निश्चित व्यवस्था रखनी पड़ती है। यह व्यवस्था छन्द या वृत्त कहलाती है।

वृत्त के भेद

प्रायः प्रत्येक पद्य के चार भाग होते हैं, जो पाद या चरण कहलाते हैं। जिस वृत्त के चारों चरणों में बराबर वर्ण हों, वे समवृत्त कहलाते हैं। जिसके प्रथम और तृतीय तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण वर्णों की दृष्टि से समान हों, वे अर्धसमवृत्त हैं। जिसके चारों चरणों में वर्णों की संख्या समान न हो, वे विषमवृत्त कहे जाते हैं।

गुरु लघु व्यवस्था

छन्द की व्यवस्था वर्णों पर आधारित रहती है, मुख्यतः स्वर वर्ण पर। ये वर्ण छन्द की दृष्टि से दो प्रकार के होते हैं - लघु और गुरु | सामान्यतः ह्रस्व स्वर लघु होता है और दीर्घ स्वर गुरु | किन्तु कुछ परिस्थितियों में ह्रस्व स्वर लघु न होकर गुरु माना जाता है। छन्द में गुरु-लघु व्यवस्था का नियम इस प्रकार है- अनुस्वारयुक्त, दीर्घ, विसर्गयुक्त, संयुक्तवर्ण के पूर्व का वर्ण गुरु होता है। शेष सभी वर्ण लघु होते हैं। छन्द के किसी पाद का अंतिम वर्ण लघु होने पर भी आवश्यकतानुसार गुरु मान लिया जाता है।

सानुस्वारश्च दीर्घश्च विसर्गी च गुरुर्भवेत् । 

वर्णः संयोगपूर्वश्च तथा पादान्तगोऽपि च ॥

गुरु एवं लघु के लिए अधोलिखित चिह्न प्रयुक्त होते हैं-

गुरु  - 

लघु - ।

यति व्यवस्था

छन्द में जिस-जिस स्थान पर किञ्चिद् विराम होता है, उसको 'यति' कहते हैं । विच्छेद, विराम, विरति आदि इसके नामान्तर हैं।

यतिर्जिह्वेष्टविश्रामस्थानं कविभिरुच्यते ।

सा विच्छेदविरामाद्यैः पदैर्वाच्या निजेच्छया ॥

गण व्यवस्था

आदिमध्यावसानेषु भजसा यान्ति गौरवम् । 

यरता लाघवं यान्ति मनौ तु गुरुलाघवम् ॥

तीन वर्णों का एक गण माना जाता है । गुरु लघु के क्रम से गण आठ प्रकार के होते हैं।

भगण - ऽ।।

जगण - ।ऽ।

सगण - ।।ऽ

यगण - ।ऽऽ

रगण - ऽ।ऽ

तगण - ऽऽ।

मगण - ऽऽऽ

नगण- ॥।


क. वैदिक छन्द

वैदिक मन्त्रों में गेयता का समावेश करने के लिए जिन छन्दों का प्रयोग हुआ है उनमें गायत्री, अनुष्टुप् तथा त्रिष्टुप् प्रमुख हैं।

गायत्री लक्षण : जिस छन्द के तीन चरण हों, प्रत्येक चरण में आठ वर्ण हों वह गायत्री छन्द होता है। इसका पाँचवाँ वर्ण लघु तथा छठा वर्ण गुरु होता है। उदाहरण-

पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती ।

यज्ञं वष्टु धिया वसुः ॥ ( यजुर्वेद : - 40/ 1 )

अनुष्टुप् लक्षण : अनुष्टुप् छन्द में चार चरण होते हैं, प्रत्येक चरण में आठ वर्ण होते हैं।

सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । 

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ॥

त्रिष्टुप् लक्षण : जिस छन्द के चार चरण हों और प्रत्येक चरण में ग्यारह अक्षर हों वह त्रिष्टुप् छन्द होता है। उदाहारण-

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्

 समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि || (ऋग्वेद : 10/192/3)


ख. लौकिक छन्द

प्रस्तुत पुस्तक के पाठों में अनेक लौकिक छन्दों को भी संकलित किया गया है। अत: संकलित श्लोंकों के छन्दों के लक्षण तथा उदाहरण प्रस्तुत हैं-

1.अनुष्टुप् लक्षण-आठ वर्णों वाला समवृत्त

अनुष्टुप् छन्द के सभी चारों चरणों का पाँचवाँ वर्ण लघु, छठा वर्ण गुरु तथा प्रथम एवं तृतीय चरण का सातवाँ वर्ण गुरु और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण का सातवाँ वर्ण लघु होता है। इसे श्लोकछन्द भी कहते हैं। उदाहरण-

पतितैः पतमानैश्च पादपस्थैश्च मारुतः ।

कुसुमैः पश्य सौमित्रे! क्रीडन्निव समन्ततः ॥ (रामायणम्)

इन्द्रवज्रा लक्षण- (ग्यारह वर्णों वाला समवृत्त )

जिस छन्द के प्रत्येक पाद में दो तगण, एक जगण और दो गुरु वर्ण क्रम से हों वह इन्द्रवज्रा छन्द होता है।

स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ।

उदाहरण-

हंसो यथा राजतपञ्जरस्थः सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः ।

वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थश्चन्द्रोऽपि बभ्राज तथाम्बरस्थः ॥ (रामायणम्)

3. उपेन्द्रवज्रा लक्षण - ( ग्यारह वर्णों का समवृत्त )

जिस छन्द के प्रत्येक पाद में क्रमश: एक जगण, एक तगण, एक जगण और दो गुरु वर्ण हों वह उपेन्द्रवज्रा छन्द होता है।

उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ । उदाहरण-

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । 

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देव देव ।

4. उपजाति लक्षण- ( ग्यारह वर्णों वाला समवृत्त )

जिस छन्द में इन्द्रवज्रा तथा उपेन्द्रवज्रा के चरणों का मिश्रण होता है वह उपजाति छन्द होता है।

अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजौ पादौ यदीयावुपजातयस्ताः ।

इत्थं किलान्यास्वपि मिश्रितासु वदन्ति जातिष्विदमेव नाम ॥

इस छन्द का प्रथम तथा तृतीय चरण उपेन्द्रवज्रा छन्दानुसार तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण इन्द्रवज्रानुसार हैं। अत: इसे उपजाति छन्द कहा जा सकता है।

उदाहरण-

अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा, (इन्द्रवज्रा )

हिमालयो नाम नगाधिराजः । ( उपेन्द्रवज्रा )

पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य,

स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः ॥ (कुमारसम्भवम्)

5. मालिनी लक्षण - ( पन्द्रह वर्णों वाला समवृत्त )

जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः दो नगण, एक मगण तथा दो यगण हों वह मालिनी छन्द होता है। इसके प्रत्येक चरण में आठवें तथा तदनन्तर सातवें अर्थात् चरण के अन्तिम वर्ण पन्द्रहवें वर्ण के बाद यति (विराम) होती है । ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकेः ।

उदाहरण-

मम हि पितृभिरस्य प्रस्तुतो ज्ञातिभेद- 

स्तदिह मयि तु दोषो वक्तृभिः पातनीयः । 

अथ च मम स पुत्रः पाण्डवानां तु पश्चात्

सति च कुलविरोधे नापराध्यन्ति बालाः ॥ (पञ्चरात्रम्)


परिशिष्ट - 2


अलङ्कार


लोक में जिस प्रकार आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाने में सहायक होते हैं उसी प्रकार काव्य में उपमादि अलंकार उसकी चारुता की अभिवृद्धि करते हैं। वस्तुतः काव्य के शोभादायक तत्व को ही अलंकार कहते हैं।

शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशयिनः ।

रसादीनुपकुर्वन्तोऽलङ्कारास्तेऽङ्गदादिवत्॥

शब्द तथा अर्थ को काव्य का शरीर कहा गया है। अतः काव्य - शरीर का अलंकरण भी शब्द तथा अर्थ दोनों रूपों में होता है । जो अलंकार शब्दों के द्वारा काव्य में चारुता की अभिवृद्धि करते हैं वे शब्दालंकार कहे जाते हैं जैसे अनुप्रास, यमक आदि । जो अलंकार अर्थ के द्वारा काव्य की चारुता की अभिवृद्धि करते हैं वे अर्थालंकार कहे जाते हैं, जैसे उपमा, रूपक आदि। इन दोनों प्रकार के अलंकारों का प्रस्तुत संकलन के पाठों में प्रयोग हुआ है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-

अनुप्रासः

वर्णसाम्यमनुप्रासः । (काव्यप्रकाशः)

समान वर्णों की आवृत्ति को अनुप्रास अलंकार कहा जाता है।

उदाहरण

वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति । 

नद्यो घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविहीनाः शिखिनः प्लवंगाः ॥ (रामायणम्)

इस श्लोक में आए हुए वहन्ति, वर्षन्ति, नदन्ति, भान्ति, ध्यायन्ति, नृत्यन्ति तथा समाश्वसन्ति इन शब्दों में अनेक वर्णों की समान आवृत्ति है जो श्लोक की चारुता की अभिवृद्धि में सहायक है। अतः यहाँ पर अनुप्रास अलंकार है ।

यमकः

सत्यर्थे पृथगर्थायाः स्वरव्यञ्जनसंहतेः । 

क्रमेण तेनैवावृत्तिर्यमकं विनिगद्यते ॥ (साहित्यदर्पणम्)

जब वर्ण समूह की उसी क्रम से पुनरावृत्ति की जाए किंतु आवृत्त वर्ण समुदाय या तो भिन्नार्थक हो या अंशत: अथवा पूर्णत: निरर्थक हो तो यमक अलंकार कहलाता है। उदाहरण-

प्रकृत्या हिमकोशाढ्यो दूरसूर्यश्च साम्प्रतम् । 

यथार्थनामा सुव्यक्तं हिमवान् हिमवान् गिरिः ॥

इस श्लोक में हिमवान् शब्द की आवृत्ति हुई है और दोनों पद भिन्नार्थक हैं। अतः यहाँ पर प्रयुक्त अंलकार यमक है जो श्लोक के सौंदर्य की अभिवृद्धि में सहायक है।

उपमा

साधर्म्यमुपमा भेदे । ( काव्यप्रकाश:, 10, 87)

दो वस्तुओं में, भेद रहने पर भी, जब उनकी समानता प्रतिपादित की जाती है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है। उदाहरण-

रविसंक्रान्तसौभाग्यस्तुषारारुणमण्डलः ।

निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते ॥ ( रामायणम्)

यहाँ पर सूर्य के प्रकाश से मलिन चन्द्रमा की उपमा निःश्वासों से मलिन आदर्श (दर्पण) से दी गई है। यह उपमा श्लोक के अर्थ की चारुता की वृद्धि में सहायक है।

उपमा में चार तत्त्व होते हैं-

1. उपमेय - जिसकी समानता बताई जाए

2. उपमान - जिससे समानता बताई जाए

3. साधारण धर्म - उक्त दोनों में समान गुण

4. वाचक शब्द - समानता प्रकट करने वाले शब्द - इव यथा आदि ।

रूपकम्

तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः । ( काव्यप्रकाशः, 10,93)

अतिशय सादृश्य के कारण जहाँ उपमेय को उपमान का रूप दे दिया जाये अथवा उपमेय पर उपमान का आरोप कर दिया जाये वहाँ रूपक अलंकार होता है। उदाहरण-

अनलंकृतशरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति मम हृदयम् ।

सौवर्णशकटिका पाठ के इस वाक्य में प्रयुक्त चन्द्रमुख शब्द में रूपक अलंकार है। यहाँ पर मुख पर चन्द्रमा का आरोप होने से रूपक अलंकार है ।

उत्प्रेक्षा

" भवेत् सम्भावनोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य परात्मना ॥ (साहित्यदर्पणम्)

पर (उपमान) के द्वारा प्रकृत (उपमेय) की सम्भावना ( उत्कट सन्देह) को उत्प्रेक्षा अलंकार कहते हैं।

उदाहरण-

पतितैः पतमानैश्च पादपस्थैश्च मारुतः ।

कुसुमैः पश्य सौमित्रे! क्रीडन्निव समन्ततः ॥ (रामायणम्) 

यहां पर वायु के द्वारा पुष्पों के साथ की जाने वाली क्रीडा की सम्भावना में उत्प्रेक्षा अलंकार है ।

अर्थान्तरन्यासः

भवेदर्थान्तरन्यासोऽनुषक्तार्थान्तराभिधा । ( चन्द्रालोक:, 5.66)

मुख्य अर्थ का समर्थन करने वाले अर्थान्तर (दूसरे वाक्यार्थ ) का प्रतिपादन (न्यास) अर्थान्तरन्यास कहलाता है। उदाहरण-

यः स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रमः । 

श्वा यदि क्रियते राजा तत्किं नाश्नात्युपानहम्॥

यहाँ पर पूर्वार्द्ध के वाक्यार्थ का समर्थन उत्तरार्द्ध के वाक्यार्थ द्वारा किया गया है। अतः यहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार है।

अतिशयोक्तिः

सिद्धत्वेऽध्यवसायस्यातिशयोक्तिर्निगद्यते । ( साहित्यदर्पणम्, 10.46)

अध्यवसाय के सिद्ध उपमेय के लिए केवल उपमान का ही कथन होने पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। अध्यवसाय का तात्पर्य है- उपमेय के निगरण के साथ उपमान से अभेद का आरोप अर्थात् उपमेय तथा उपमान में अभेद की स्थापना ।

उदाहरण-

यूथेऽपयाते हस्तिग्रहणोद्यतेन केन कलभो गृहीतः ।

यहाँ पर अर्जुन को हस्ती तथा अभिमन्यु को कलभ (हाथी का बच्चा) के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार उपमेय अर्जुन व अभिमन्यु का निगरण कर उन्हें उपमान हस्ती तथा कलभ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है ।


परिशिष्ट- 3


अनुशंसित ग्रन्थ


क्र.सं.

ग्रन्थनाम

 लेखक

 संपादक/प्रकाशक

1.

ऋग्वेदः    


    संप्र. एन. एस. सोनटक्के, वैदिक संशोधन मण्डल, पूना - 2, 1946

2.

यजुर्वेदः 

 उव्वटमहीधरभाष्य 

 चौखम्बा प्रकाशन, वाराणसी, 1912

3.

अथर्ववेदः

 

  सातवलेकर, पारडी, 1957

4.

रामायणम्   

 वाल्मीकि      

  चौखम्बा प्रकाशन, वाराणसी, 1977

5.

महाभारतम् 

  व्यास         

 भण्डारकर प्राच्यविद्यासंशोधन संस्थानम् पुण्यपत्तनम् (पूना) 1975

6.

जातकमाला

  आर्यशूर          

   सूर्यनारायण चौधरी, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, 1971

7..

मृच्छकटिकम्

 शूद्रक

निर्णयसागर प्रेस, मुम्बई

8.

मृच्छकटिक  

 शूद्रक

 मोहन राकेश (हिंदी अनुवादक) राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1962

9.

 चरकसंहिता    

 चरक

  चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी, 1984

10.

 भवानी भारती

 अरविन्द

 अरविन्दाश्रम, पाण्डिचेरी

11.

पुरुषपरीक्षा  

 विद्यापति

 खेमराज श्रीकृष्णदास, मुम्बई

12.

सत्यशोधनम् 

 पं. होसकेरे  नागप्पशास्त्री

 गाँधी स्मारक निधि,नयी दिल्ली( भारतीय विद्या भवन,मुम्बई, 1965 )

13.

रूपरुद्रीयम् 

प्रो. राजेन्द्र मिश्र

 वैजयन्त प्रकाशन, इलाहाबाद

14.

तदेव गगनं सैवधरा

 प्रो. श्रीनिवास रथ

 राष्ट्रिय संस्कृत संस्थानम्, नयी दिल्ली

15.

गीताञ्जलिः (संस्कृतानुवाद)

 

को. ल. व्यासराय शास्त्री

16.

 संस्कृत ड्रामा इन इट्स ओरिजनएण्ड थ्योरी डेवेलपमेंट

 ए.बी. कीथ

 ऑक्सफोर्ड प्रेस, लदन, 1924

17.

संस्कृत नाटक

 ए.बी. कीथ

उदय भानु सिंह (हिंदी अनुवाद), मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली,

18.

संस्कृत साहित्य का इतिहास

 बलदेव उपाध्याय

 शारदा मन्दिर, वाराणसी, 1973

19.

वैदिक साहित्य और संस्कृति

 बलदेव उपाध्याय

 शारदा मन्दिर, वाराणसी, 1973

20.

 हिस्ट्री ऑफ़ क्लासिक्ल संस्कृत लिटरेचर

 एम. कृष्णामचार्य

 मोती लाल बनारसीदास, दिल्ली 

21.

ए हिस्ट्री ऑफ़  संस्कृत लिटरेचर

 ए. ए. मैकडोनेल

 मोती लाल बनारसीदास, दिल्ली 1962

22.

संस्कृत साहित्य का इतिहास

  वाचस्पति गैरोला

 चौखम्बा विद्याभवन,वाराणसी, 1978

23.

संस्कृत साहित्यका अभिनव इतिहास

 राधावल्लभ त्रिपाठी

 विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी, 2001


24.

 संस्कृत और राष्ट्र की एकता

 

राधावल्लभ त्रिपाठी, अक्षयवट प्रकाशन बलरामपुर हाऊस इलाहाबाद, 1991

25.

संस्कृत रवीन्द्रम्

 

वी. राघवन्, साहित्य अकादमी. रवीन्द्रभवन, नयी दिल्ली, 1966