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एकादश : पाठः


कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम्


यह पाठ महर्षि पतञ्जलि विरचित महाभाष्य से उद्धृत है। इसमें शब्दों के अनुशासन का वर्णन किया गया है। इस पाठ में वर्णन किया गया है कि हमें कैसे शब्दों का उपदेश करना चाहिये। अर्थात् केवल शब्दों का उपदेश करना चाहिये, अथवा अपशब्दों का अथवा दोनों का। इसी का समाधान प्रस्तुत पाठ में पौराणिक आख्यानक के माध्यम से किया गया है।

शब्दानुशासनमिदानीं कर्तव्यम्। किं शब्दोपदेशः कर्तव्यः, आहोस्विदपशब्दोपदेशः, आहोस्विदुभयोपदेश इति?

अन्यतरोपदेशेन कृतं स्यात्। तद्यथा-भक्ष्यनियमेनाभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते। ‘पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः’ इत्युक्ते गम्यत एतत्- अतोऽन्येऽभक्ष्या इति।।

अभक्ष्यप्रतिषेधेन च भक्ष्यनियमः। तद्यथा- ‘अभक्ष्यो ग्रााम्यकुक्कुटः अभक्ष्यो ग्राम्यसूकरः’ इत्युक्ते गम्यत एतत्-आरण्यो भक्ष्य इति।।

एवमिहापि।

गावी
(अपभ्रंश)
गोणी
  (अपभ्रंश)  
गौः
    (शब्दः)    
गोपोतलिका
(अपभ्रंश)
गोता
(अपभ्रंश)

 


यदि तावच्छब्दोपदेशः क्रियते, गौरित्येतस्मिन्नुपदिष्टे गम्यत एतत् गाव्यादयोऽपशब्दा इति।

अथाप्यपशब्दोपदेशः क्रियेत, गाव्यादिषूपदिष्टेषु गम्यत एतत्-गौरित्येष शब्द इति।।

किं पुनरत्र ज्यायः?

लघुत्वाच्छबदोपदेशः। लघीयाञ्छब्दोपदेशः। गरीयानपशब्दोपदेशः। एकैकस्य शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः। तद्यथा-गौरित्यस्य शब्दस्य गावी गोणी गोता गोपोतलिका इत्येवमादयोऽपभ्रंशाः।

इष्टान्वाख्यानं खल्वपि भवति।।

अथैतस्मिन शब्दोपदेशे सति किं शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः कर्तव्यः- गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मण इत्येवमादयः शब्दाः पठितव्या?

नेत्याह। अनभ्युपाय एष शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः।। एवं हि श्रूयते-‘‘बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम’’।। बृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रश्चाध्येता, दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालः, न चान्तं जगाम।

किं पुनरद्यत्वे? यः सर्वथा चिरं जीवति वर्षशतं जीवति।

चतुर्भिश्च प्रकारैर्विद्योपयुक्ता भवति-आगमकालेन, स्वाध्यायकालेन, प्रवचनकालेन, व्यवहारकालेनेति। तत्र चास्यागमकालेनैवायुः पर्युपयुक्तं स्यात्। तस्मादनभ्युपायः शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः।।

कथं तर्हीमे शब्दाः प्रतिपत्तव्याः?

किञि्चत्सामान्यविशेषवल्लक्षणं प्रवर्त्यम्। येनाल्पेन यत्नेन महतो महतः शब्दौघान् प्रतिपद्येरन्।।

किं पुनस्तत्?

उत्सर्गापवादौ। कशि्चदुत्सर्गः कर्तव्यः, कशि्चदपवादः।।

कथञ्जातीयकः पुनरुत्सर्गः कर्तव्यः कथञ्जातीयकोऽपवादः?

सामान्येनोत्सर्गः कर्तव्यः। तद्यथा-‘‘कर्मण्यण्’’।

तस्य विशेषेणापवादः। तद्यथा-‘‘आतोऽनुपसर्गे कः’’


ब्दार्थाः

इदानीम् - अधुना, अब।

कर्त्तव्यम् - कुर्यात्, करना चाहिए।

शब्दोपदेशः - शब्दकथनम्, शब्द कथन।

अपशब्द - अपकथनम्, अपशब्द कथन।

अन्यतरः - एकतरः, एक

भक्ष्यम् - खादनीयम्, खाने योग्य।

उक्ते - कथिते, कहने पर।

आरण्यः - वन्यः, वन के।

ज्यायः - श्रेष्ठः, श्रेष्ठ

आख्यानम् - कथनम्, कथन।

पठितव्याः - पठेयुः, पढ़ने चाहिए।

प्रतिपत्तौ - ज्ञाने, जानने पर।

अध्येता - श्रोता, सुनने वाला।

उपयुक्ता - उपयोगिनी, उपयोगी।

कृत्स्नम् - सम्पूर्णम्, सारी।

प्रतिपत्तव्याः - ज्ञातव्याः, जानने चाहिए।

औघान् - समूहान्, समूह को।

प्रतिपद्येरन् - जानीयुः, जाना चाहिए।


टिप्पणीः- कर्मण्यण् (पाणिनि सूत्र-  3-2-1) उदाहरण- कुम्भकारः, कुम्भं करोति इति, कुम्भं कृ अण्

                आतोऽनुपसर्गे कः (पाणिनि सूत्र-  3-2-2)। उदाहरण- जलदः, जलं ददाति इति, जलं दा क

उपपद तत्पुरुष समास में धातु से सामान्यतया ‘अण्’ प्रत्यय होता है, किन्तु यदि धातु आकारान्त एवं उपसर्ग रहित है तो उससे ‘क’ प्रत्यय हो जाता है। इस प्रकार पहला सूत्र उत्सर्ग एवं दूसरा अपवाद हैं।


अभ्यास

1. संस्कृतभाषायाम् उत्तरत ।

(क) मनुष्यस्य आयुः कति वर्षाणि मन्यते?

(ख) कस्य नियमेन अभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते?

(ग) गाम्यकुक्कुटः भक्ष्यः अभक्ष्यः वा?

(घ) कः ज्यायः अस्ति?

(ङ) कः गरीयान् अस्ति?

2. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत ।

(क) एकैकस्य शब्दस्य बहवः अपभ्रंशाः सन्ति।

(ख) शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः कर्तव्यः।

(ग) बृहस्पतिः इन्द्राय प्रतिपदशब्दान् उक्तवान्।

(घ) चतुर्भिश्च प्रकारैर्विद्योपयुक्ता भवति।

(ङ) सामान्येन उत्सर्गः कर्तव्यः।

3 विपरीतार्थैः सह मेलनं कुरुत ।

(क) भक्ष्यम् - तदानीम्

(ख) लघीयान् - अनिष्टान्

(ग) एकः - अभक्ष्यम्

(घ) इष्टान् गरीयान्

(ङ) इदानीम् - बहवः

4. अधोलिखितवाक्यानि पठित्वा शुद्धं अशुद्धं वा समक्षं लिखत ।

(क) अन्यतरोपदेशेन कृतं स्यात्। -----------

(ख) इष्टान्वाख्यानं खल्वपि भवति। -----------

(ग) यः सर्वथा चिरं जीवति वर्षशतं न जीवति। -----------

(घ) चतुर्भिश्च प्रकारैर्विद्योपयुक्ता न भवति। -----------

(ङ) आगमकालेनैवायुः कृत्स्नं पर्युपयुक्तं स्यात्। -----------

5. शब्दानाम् अर्थं लिखित्वा वाक्येषु प्रयोगं कुरुत ।

(क) शब्दानुशासनम् - ..............

(ख) भक्ष्यम् - ..............

(ग) इदानीम् - ..............

(घ) चिरम् - ..............

(ङ) प्रवक्ता - ..............

(च) कृत्स्नम् - ..............

6. रिक्तस्थानानि पूरयत ।

प्रतिपदपाठः कर्तव्य:, शब्दोपदेशाः, अपभ्रंशाः, अपशब्दोपदेशाः, अभक्ष्यप्रतिषेधः, शब्दानुशासनम्

(क) इदानीं.......................................कर्त्तव्यम्।

(ख) भक्ष्यनियमेन........................................गम्यते।

(ग) गरीयान्........................................

(घ) एकैकस्य शब्दस्य बहवः........................................भवन्ति।

(ङ) लघुत्वात्........................................

(च) शब्दोपदेशे सति शब्दानां प्रतिपत्तौ........................................

7. उदाहरणानुसारं लिखत ।

यथा कर्त्तव्यः कृ+तव्यत्

(क) भक्ष्यः - ........................................

(ख) उक्तः - ........................................

(ग) कृतम् - ........................................

(घ) उपयुक्ता - ........................................

(ङ) उपदिष्टः - ........................................

8. सन्धिविच्छेदं कुरुत ।

(क) शब्दोपदेशः  - .............. ..............

(ख) अन्येऽभक्ष्याः - .............. + ..............

(ग) गाव्यादिषूपदिष्टेषु - .............. + ..............

(घ) गौरिति - .............. + ..............

(ङ) लघुत्वाच्छब्दोपदेशः - .............. + ..............

(च) इष्टान्वाख्यानम् -  .............. + ..............

(छ) पुनरत्र - .............. + ..............

(ज) अथैतस्मिन् - .............. + ..............

(झ) इत्येवम् - .............. + ..............

(ञ) प्रतिपदोक्तानाम् - .............. + ..............


योग्यताविस्तारः


अथ ब्दानुशासनम् व्याकरणमहाभाष्य का प्रथम सूत्र है। ब्दानुशासन अष्टाध्यायी की संज्ञा है और इसी को भाष्यकार पतञ्जलि ने ‘शब्दानुशासनं नाम शास्त्रम्’ से स्पष्ट की है। इसमें सर्वलोकप्रसिद्ध साधु शब्दों का अनुशासन है।

लौकिकव्यवहार में पद नियत नहीं होते परन्तु वेदवाक्यों में नियत होते हैं, वह बदले नहीं जा सकते। अतः लौकिक शब्दों को एक-एक करके स्वतन्त्र रूप में पढ़ दिया है, पर वैदिक शब्दों को मन्त्रस्थ-क्रम-विशिष्ट ही पढ़ा जाता है।

पाणिनीय व्याकरण को ‘त्रिमुनि व्याकरण’ नाम से भी जाना जाता है। पाणिनि व्याकरण की परम्परा में पाणिनि, कात्यायन व पतञ्जलि के क्रमशः अष्टाध्यायी, वार्तिक एवं महाभाष्य प्रमुख एवं प्रामाणिक ग्रन्थ हैं। महर्षि पतञ्जलि का समय ई.पू. प्रथम शताब्दी माना जाता है।


परिशिष्ट -1

छन्द


छन्द

पद्य लिखते समय वर्णों की एक निश्चित व्यवस्था रखनी पड़ती है। यह व्यवस्था छन्द या वृत्त कहलाती है।

वृत्त के भेद

प्रायः प्रत्येक पद्य के चार भाग होते हैं, जो पाद या चरण कहलाते हैं। जिस वृत्त के चारों चरणों में बराबर वर्ण हों, वे समवृत्त कहलाते हैं। जिसके प्रथम और तृतीय तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण वर्णों की दृष्टि से समान हों, वे अर्धसमवृत्त हैं। जिसके चारों चरणों में वर्णों की संख्या समान न हो, वे विषमवृत्त कहे जाते हैं।

गुरु लघु व्यवस्था

छन्द की व्यवस्था वर्णों पर आधारित रहती है, मुख्यतः स्वर वर्ण पर। ये वर्ण छन्द की दृष्टि से दो प्रकार के होते हैं- लघु और गुरु। सामान्यतः ह्हस्व स्वर लघु होता है और दीर्घ स्वर गुरु। किन्तु कुछ परिस्थितियों में ह्हस्व स्वर लघु न होकर गुरु माना जाता है। छन्द में गुरु-लघु व्यवस्था का नियम इस प्रकार है- अनुस्वारयुक्त, विसर्गयुक्त, संयुक्तवर्ण के पूर्व का वर्ण गुरु होता है। शेष सभी वर्ण लघु होते हैं। छन्द के किसी पाद का अंतिम वर्ण लघु होने पर भी आवश्यकतानुसार गुरु मान लिया जाता है।

सानुस्वारश्च दीर्घश्च विसर्गी च गुरुर्भवेत्।

वर्णः संयोगपूर्वश्च तथा पादान्तगोपि च।।

गुरु एवं लघु के लिए अधोलिखित चिह्न प्रयुक्त होते हैं-

गुरु - 

लघु - 

यति व्यवस्था

छन्द में जिस-जिस स्थान पर किञ्चिद् विराम होता है, उसको ‘यति’ कहते हैं। विच्छेद, विराम, विरति आदि इसके नामान्तर हैं।

यतिर्जिह्नेष्टविश्रामस्थानं कविभिरुच्यते।

सा विच्छेदविरामाद्यैः पदैर्वाच्या निजेच्छया।।

गण व्यवस्था

आदिमध्यावसानेषु भजसा यान्ति गौरवम्।

यरता लाघवं यान्ति मनौ तु गुरुलाघवम्।।

तीन वर्णों का एक गण माना जाता है। गुरु-लघु के क्रम से गण आठ प्रकार के होते हैं।

भगण - ऽ।। जगण - ।ऽ।

सगण - ।।ऽ  यगण - ।

रगण - ऽ।ऽ  तगण - ऽ

मगण - ऽ  नगण - ।।।

क. वैदिक छन्द

वैदिक मन्त्रों में गेयता का समावेश करने के लिए जिन छन्दों का प्रयोग हुआ है उनमें गायत्री, अनुष्टुप् तथा त्रिष्टुप् प्रमुख हैं।

गायत्री: जिस छन्द के तीन चरण हों, प्रत्येक चरण में आठ वर्ण हों वह गायत्री छन्द होता है। इसका पाँचवाँ वर्ण लघु तथा छठा वर्ण गुरु होता है। उदाहरण-

पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती।

यज्ञं वष्टु धिया वसु।।

(यजुर्वेदः -40/1)

अनुष्टुप्: अनुष्टुप् छन्द में चार चरण होते हैं, प्रत्येक चरण में आठ वर्ण होते हैं।

सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।

देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ।।

त्रिष्टुप्: जिस छन्द के चार चरण हों और प्रत्येक चरण में ग्यारह अक्षर हों वह त्रिष्टुप् छन्द होता है। उदाहारण-

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्

समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।।

(ऋग्वेदः 10/192/3)

ख. लौकिक छन्द

प्रस्तुत पुस्तक के पाठों में अनेक लौकिक छन्दों को भी संकलित किया गया है। अतः सकंलित श्लोकों के छन्दों के लक्षण तथा उदाहरण आगे प्रस्तुत हैं-

1. अनुष्टुप् - आठ वर्णों वाला समवृत्त

अनुष्टुप् छन्द के सभी चारों चरणों का पाँचवाँ वर्ण लघु, छठा वर्ण गुरु तथा प्रथम एवं तृतीय चरण का सातवाँ वर्ण गुरु और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण का सातवाँ वर्ण लघु होता है। इसे श्लोकछन्द भी कहते हैं। उदाहरण-

पतितैः पतमानैश्च, पादपस्थैश्च मारुतः।

कुसुमैः पश्य सौमित्रे! क्रीडन्निव समन्ततः।।

(रामायणम्)

2. इन्द्रवज्रा - (ग्यारह वर्णों वाला समवृत्त)

जिस छन्द के प्रत्येक पाद में दो तगण, एक जगण और दो गुरु वर्ण क्रम से हों वह इन्द्रवज्रा छन्द होता है।

स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः।

उदाहरण-

हंसो यथा राजतपञ्जरस्थः, सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः।

वीरो यथा गर्वितकुञ्जरस्थश्चन्द्रोऽपि बभ्राज तथाम्बरस्थः।।

(रामायणम्)

3. उपेन्द्रवज्रा - (ग्यारह वर्णों का समवृत्त)

जिस छन्द के प्रत्येक पाद में क्रमशः एक जगण, एक तगण, एक जगण और दो गुरु वर्ण हों वह उपेन्द्रवज्रा छन्द होता है।

उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ। उदाहरण-

त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देव-देव।

4. उपजाति - (ग्यारह वर्णों वाला समवृत्त)

जिस छन्द में इन्द्रवज्रा तथा उपेन्द्रवज्रा के चरणों का मिश्रण होता है, वह उपजाति छन्द होता है।

अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजौ पादौ यदीयावुपजातयस्ताः।

इत्थं किलान्यास्वपि मिश्रितासु वदन्ति जातिष्विदमेव नाम ।।

इस छन्द का प्रथम तथा तृतीय चरण उपेन्द्रवज्रा छन्दानुसार तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण इन्द्रवज्रानुसार हैं। अतः इसे उपजाति छन्द कहा जा सकता है।

उदाहरण-

अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा,      (इन्द्रवज्रा)

हिमालयो नाम नगाधिराजः। (उपेन्द्रवज्रा)

पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य,                              

स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।।     (कुमारसम्भवम्)

5. मालिनी - (पन्द्रह वर्णों वाला समवृत्त)

जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः दो नगण, एक मगण तथा दो यगण हों, वह मालिनी छन्द होता है। इसके प्रत्येक चरण में आठवें तथा तदनन्तर सातवें अर्थात् चरण के अन्तिम वर्ण पन्द्रहवें वर्ण के बाद यति (विराम) होती है। ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।

उदाहरण-

मम हि पितृभिरस्य प्रस्तुतो ज्ञातिभेद-

स्तदिह मयि तु दोषो त्तृकभिः वत्तफ़ृभिः पातनीयः।

अथ च मम स पुत्रः पाण्डवानां तु पश्चात्

सति च कुलविरोधे नापराधयन्ति बालाः।। (पञ्चरात्रम्)

6. वंशस्य - (बारह वर्णों वाला समवृत्त)

जिस छन्द के प्रत्येक पाद में क्रमशः जगण, तगण, जगण, रगण हों वह वंशस्थ छन्द कहलाता है।

जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमै-

र्नवाम्बुभिर्दूर विलम्बिनो घनाः।

अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः

स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्।।

7. शार्दूलविक्रीडित (उन्नीस अक्षरों वाला समवृत्त)

जिस छन्द के प्रत्येक पाद में क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण दो तगण एवं एक गुरु वर्ण हो वह शार्दूलविक्रीडित छन्द कहलाता है। इसमें बारहवें अक्षर के बाद पहली यति और उन्नीसवें अक्षर के बाद दूसरी यति होती है। (सूर्याश्वैर्यदि मासजौसततगाः शार्दूलविक्रीडितम्।)

उदाहरण -

वत्सायाश्च रघूद्वहस्य च शिशावस्मिन्नभिव्यज्यते,

संवृत्तिः प्रतिबिम्बतेव निखिला सैवाकृति सा द्युतिः।

सा वाणी विनयः स एव सहजः पुण्यानुभावोप्यसौ,

हा! हा! देवि किमुत्यथैर्मम मनः पारिप्लवं धावति।।

उत्तररामचरितम्

8. वसन्ततिलका (चौदह अक्षरों वाला समवृत्त)

जिसके प्रत्येक चरण में क्रमशः तगण, भगण, जगण, जगण एवं दो गुरु वर्ण हों, वह छन्द वसन्ततिलका कहलाता है। उक्ता वसन्ततिलका तभजाजगौगः

उदाहरण-

पापान्निवारयति योजयते हिताय

गुह्यं निगूहति गुणान्प्रकटीकरोति।

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले

सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः।।

नीतिशतकम् 73

9. शिखरिणी- (सत्रह अक्षरों वाला समवृत्त)

जिसके प्रत्येक चरण में क्रमशः यगण, मगण, नगण, सगण, भगण तथा एक लघु और एक गुरु वर्ण हों, वह शिखरिणी छन्द कहलाता है। छठे और सत्रहवें वर्ण के पश्चात् इसमें यति होती है। रसैर्रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी।

उदाहरण-

मह्मिनामेतस्मिन् विनयशिशिरो मौग्ध्यमसृणो

विदग्धैर्निग्राह्यो न पुनरविदग्धैरतिशयः।

मनो मे संमोहस्थिरमपि हरत्येष बलवान्

अयोधातुं यद्वत्परिलघुरयस्कान्तशकलः।।

उत्तररामचरितम्

10. मन्दाक्रान्ता (सत्रह अक्षरों वाला समवृत्त)

मगण, भगण, नगण, दो तगणों और दो गुरुओं से मन्दाक्रान्ता छन्द होता है। इसमें चौथे अक्षर के पश्चात् पहली यति, छठे अक्षर के पश्चात दूसरी यति तथा आठवें अक्षर के बाद तीसरी यति होती है।

मन्दाक्रान्ताम्बुधि रसनगैर्मोभनौतौग युग्मम्।

उदाहरण-

पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजस्त्रम्

दीर्घग्रीवः स भवति, खुरास्तस्य चत्वार एव।

शष्पाण्यति प्रकिरति शकृत् पिण्डकानाम्रमात्रान्

किं व्याख्यानैर्व्रजति स पुनर्दूरमेह्येहि यामः।।

उत्तररामचरितम्


परिशिष्ट -2

अलङ्कार


लोक में जिस प्रकार आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाने में सहायक होते हैं, उसी प्रकार काव्य में उपमादि अलंकार उसकी चारुता की अभिवृद्धि करते हैं। वस्तुतः काव्य के शोभाधायक तत्व को ही अलंकार कहते हैं।

शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्माः शोभातिशायिनः।

रसादीनुपकुर्वन्तोऽलङ्कारास्तेऽङ्गदादिवत्।।

शब्द तथा अर्थ को काव्य का शरीर कहा गया है। अतः काव्य-शरीर का अलंकरण भी शब्द तथा अर्थ दोनों रूपों में होता है। जो अलंकार शब्दों के द्वारा काव्य में चारुता की अभिवृद्धि करते हैं वे शब्दालंकार कहे जाते हैं, जैसे अनुप्रास, यमक आदि। जो अलंकार अर्थ के द्वारा काव्य की चारुता की अभिवृद्धि करते हैं वे अर्थालंकार कहे जाते हैं, जैसे उपमा, रूपक आदि। इन दोनों प्रकार के अलंकारों का प्रस्तुत संकलन के पाठों में प्रयोग हुआ है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-

अनुप्रासः

वर्णसाम्यमनुप्रासः।  (काव्यप्रकाशः)

समान वर्णों की आवृत्ति को अनुप्रास अलंकार कहा जाता है।

उदाहरण -

वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति।

नद्यो घना मत्तगजा वनान्ताः प्रियाविहीनाः शिखिनः प्लवङ्गाः।।

(रामायणम्)

इस श्लोक में आए हुए वहन्ति, वर्षन्ति, नदन्ति, भान्ति, ध्यायन्ति, नृत्यन्ति तथा समाश्वसन्ति इन शब्दों में अनेक वर्णों की समान आवृत्ति है, जो श्लोक की चारुता की अभिवृद्धि में सहायक है। अतः यहाँ पर अनुप्रास अलंकार है।

यमकम्

सत्यर्थे पृथगर्थायाः स्वरव्यञ्जनसंहतेः।

क्रमेण तेनैवावृत्तिर्यमकं विनिगद्यते।। 

(साहित्यदर्पणम्)

जब वर्ण समूह की उसी क्रम से पुनरावृत्ति की जाए, कितु आवृत्त वर्ण समुदाय या तो भिन्नार्थक हो या अंशतः अथवा पूर्णतः निरर्थक हो तो यमक अलंकार कहलाता है। उदाहरण-

अस्ति यद्यपि सर्वत्र नीरं नीरजराजितम्।

रमते न मरालस्य मानसं मानसं विना।।

इस श्लोक में मानसम् शब्द की आवृत्ति हुई है और दोनों पद भिन्नार्थक हैं। अतः यहाँ पर प्रयुक्त अंलकार यमक है जो श्लोक के सौंदर्य की अभिवृद्धि में सहायक है।

उपमा

साधर्म्यमुपमा भेदे।

(काव्यप्रकाशः, 10, 87)

दो वस्तुओं में, भेद रहने पर भी, जब उनका (समानता) प्रतिपादित किया जाता है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है। उदाहण-

रविसङ्क्रान्तसौभाग्यस्तुषारारुणमण्डलः।

निःश्वासान्ध इवादर्शश्चन्द्रमा न प्रकाशते।। 

(रामायणम्)

यहाँ पर सूर्य के प्रकाश से मलिन चन्द्रमा की उपमा निः श्वासों से मलिन आदर्श (दर्पण) से दी गई है। यह उपमा श्लोक के अर्थ की चारुता की वृद्धि में सहायक है।

उपमा में चार तत्त्व होते हैं

1. उपमेय - जिसकी समानता बताई जाए

2. उपमान - जिससे समानता बताई जाए

3. साधारण धर्म - उक्त दोनों में समान गुण

4. वाचक शब्द - समानता प्रकट करने वाले शब्द- इव यथा आदि।

रूपकम्

तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः। 

(काव्यप्रकाशः, 10,93)

अतिशय सादृश्य के कारण जहाँ उपमेय को उपमान का रूप दे दिया जाये अथवा उपमेय पर उपमान का आरोप कर दिया जाये, वहाँ रूपक अलंकार होता है। उदाहरण-

अनलङ्कृतशरीरोपि चन्द्रमुख आनन्दयति मम हृदयम्।

सौवर्णशकटिका पाठ के इस वाक्य में प्रयुक्त चन्द्रमुख शब्द में रूपक अलंकार है। यहाँ पर मुख पर चन्द्रमा का आरोप होने से रूपक अलंकार है।

उत्प्रेक्षा

‘‘भवेत् सम्भावनोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य परात्मना।।

(साहित्यदर्पणम्)

पर (उपमान) के द्वारा प्रकृत (उपमेय) की सम्भावना (उत्कट सन्देह) को उत्प्रेक्षा अलंकार कहते हैं।

उदाहरण-

पतितैः पतमानैश्च पादपस्थैश्च मारुतः।

कुसुमैः पश्य सौमित्रे! क्रीडन्निव समन्ततः।। 

(रामायणम्)

यहाँ पर वायु के द्वारा पुष्पों के साथ की जाने वाली क्रीडा की सम्भावना में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

अर्थान्तरन्यासः

भवेदर्थान्तरन्यासोनुषक्तार्थान्तराभिधा।

(चन्द्रालोकः, 5.66)

मुख्य अर्थ का समर्थन करने वाले अर्थान्तर (दूसरे वाक्यार्थ) का प्रतिपादन (न्यास) अर्थान्तरन्यास कहलाता है। उदाहरण-

यः स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रमः।

श्वा यदि क्रियते राजा तत्किं नाश्नात्युपानहम्।।

यहाँ पर पूर्वार्द्ध के वाक्यार्थ का समर्थन उत्तरार्द्ध के वाक्यार्थ द्वारा किया गया है। अतः यहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार है।

अतिशयोक्तिः

सिद्धत्वेध्यवसायस्यातिशयोक्तिर्निगद्यते।

(साहित्यदर्पणम्, 10.46)

अध्यवसाय के सिद्ध उपमेय के लिए केवल उपमान का ही कथन होने पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। अध्यवसाय का तात्पर्य है- उपमेय के निगरण के साथ उपमान से अभेद का आरोप अर्थात् उपमेय तथा उपमान में अभेद की स्थापना ।

उदाहरण-

यूथेपयाते हस्तिग्रहणोद्यतेन केन कलभो गृहीतः।

यहाँ पर अर्जुन को हस्ती तथा अभिमन्यु को कलभ (हाथी का बच्चा) के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार उपमेय अर्जुन व अभिमन्यु का निगरण कर उन्हें उपमान हस्ती तथा कलभ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अतः यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है।

श्लेषः

श्लिष्टैः पदैरनेकार्थाभिधाने श्लेष इष्यते।

(साहित्यदर्पणम्) पद या पद समुदाय द्वारा अनेक अर्थों का कथन श्लेष अलङ्कार कहलाता है।

उच्छलद् भूरि कीलालः शुशुभे वाहिनीपतिः।

यहाँ पर ‘कीलाल’ तथा ‘वाहिनीपति’ शब्दों में अनेक अर्थ होने के कारण श्लेष अलङ्कार है। (कीलाल = रुधिर/जल, वाहिनीपति = सेनापति/समुद्र)।

व्याजस्तुतिः

व्याजस्तुतिर्मुखे निन्दा स्तुतिर्वा रूढिरन्यथा।

(काव्यपकाश) प्रारम्भ में निन्दा अथवा स्तुति प्रतीत हो, परन्तु वास्तव में वह उसके विपरीत हो अर्थात् दीखने वाली निन्दा का स्तुति में अथवा स्तुति का निन्दा में पर्यवसान होने पर व्याजस्तुति अलंङ्कार होता है।

उदाहरण-

हित्वा त्वामुपरोधवन्ध्यमनसां मध्ये न मौलिः परो,

लज्जावर्जनमन्तरेण न रमामन्यत्र सन्दृश्यते।

यस्त्यागं तनुतेतरां मुखशतैरेत्याश्रितायाः श्रियः

प्राप्य त्यागकृतावमाननमपि त्वय्येव यस्याः स्थितिः।।

अर्थात् हे राजन्! मुझे तो यही स्पष्ट लग रहा है कि आपको छोड़कर न तो आश्रितों के अनुरोध से रिक्तहृदय आश्रयदाताओं का कोई दूसरा शिरोमणि है और न लक्ष्मी को छोड़कर कहीं अन्यत्र (स्त्रीजाति में) कोई निर्लज्जता दिखाई देती है, क्योंकि आप तो ऐसे ठहरे कि नानाविध उपायों से स्वाश्रिता लक्ष्मी के अनवरत परित्याग (दान) से अपमानित होकर भी लक्ष्मी सदा आपके साथ ही रहना चाहती हैं।

यहाँ राजा की आपाततः निन्दा उसके महादान या लक्ष्मी समृद्धि की स्तुति (प्रशंसा) में परिणत हो रही है। 

अतः व्याजस्तुति अलंकार है।

अन्योक्तिः

असमानविशेषणमपि यत्र समानेतिवृत्तमुपमेयम्।

उक्तेन गम्यते परमुपमानेनेति साऽन्योक्तिः।।

(काव्यालङ्कारः)

जहाँ कथित उपमान के द्वारा ऐसे उपमेय की प्रतीति हो जो (उपमान के) विशेषणों के असमान होता हुआ भी समान इतिवृत्त वाला हो, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण-

तावत् कोकिल विरसान् यापय दिवसान् वनान्तरे निवसन्।

यावन्मिलदलिमालः कोपि रसालः समुल्लसति।।

(रसगङ्गाधरः)

हे कोयल! वन में रहते हुए अपने बुरे समय को तब तक किसी प्रकार बिता लो जब तक कि कोई बौर (मंजरी) से लदा हुआ भौरों से युक्त आम का पेड़ तुम्हें नहीं मिल जाए। 

यहाँ कोयल उपमान है और कोई सज्जन उपमेय है। यद्यपि कोयल और सज्जन के विशेषण एकसमान नहीं हैं तथापि इनका इतिवृत्त एक समान है। अतः यहाँ पर अन्योक्ति अलंकार है।





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परिशिष्ट -3

अनुशंसित ग्रन्थ


क्र.सं. ग्रन्थनाम लेखक सम्पादक/प्रकाशक
1. ईशावास्योपनिषद् वेदव्यास गीताप्रेस, गोरखपुर
2. रघुवंशमहाकाव्यम् कालिदास चौखंबा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी
3. उत्तररामचरितम् भवभूति चौखंबा प्रकाशन, वाराणसी
4. श्रीमद्भगवद्गीता वेदव्यास गीताप्रेस, गोरखपुर
5. कादम्बरी  बाणभट्ट चौखंबा प्रकाशन, वाराणसी
6. सिंहासनद्वात्रिंशिका
7. शिवराजविजयः  अम्बिकादत्तव्यासः साहित्य भंडार, मेरठ
8. संस्कृतचन्द्रिकापत्रिका अप्पाशस्त्रिराशि वडेकरः
9. प्रबन्धमञ्जरी
हृषीकेशभट्टाचार्यः
10. प्रबन्धपारिजातम् भट्टमथुरानाथ शास्त्री
11. द संस्कृत ड्रामा इन इट्स ऑरिजन डवलपमेंट थ्योरी एंड प्रेक्टिस (1920) आर्थर बेरीडेल
कीथ प्रोफ़ेसर
आक्सफोर्ड प्रैस लंदन 22
12. संस्कृत नाटक ए. बी. कीथ उदयभानु सिह (हिंदी अनुवाद) मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली
13. संस्कृत साहित्य का इतिहास बलदेव उपाध्याय शारदा मन्दिर, वाराणसी, 1973
14. वैदिक साहित्य और संस्कृति बलदेव उपाध्याय शारदा मन्दिर, वाराणसी, 1973
15. हिस्ट्री ऑफ़ क्लासिकल संस्कृत लेटरेचर एम. कृष्णम्आचार्य मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली
16. संस्कृत साहित्य का इतिहास वाचस्पति गैरोला चौखंबा विधाभवन, वाराणसी, 1978
17. संस्कृत साहित्य का अभिनव इतिहास राधावल्लभ त्रिपाठी विश्वविद्यालय प्रकाशन चौक, वाराणसी द्वि सं., 2007
18. छन्दोमञ्जरी गंगादास डॉ ब्रह्मानन्द त्रिपाठी, चौखंबा सुरभारती प्रकाशन वाराणसी, 1903
19. व्याकरण-सौरभम् रा.शै.अनु.अ.प्र.प. द्वारा प्रकाशित
20. संस्कृत साहित्य परिचय रा.शै.अनु.अ.प्र.प. द्वारा प्रकाशित
21. चन्द्रालोक जयदेव सं. तथा अनु. सुबोधचन्द्र पन्त, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, 1925
22. वृत्तरत्नाकरः  भट्टकेदार सं. आर्येन्दु शर्मा, संस्कृत अकादमी, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद
23. समुद्रसङ्गमः दाराशिकोह हिंदी अनु. बाबू लाल शुक्ल शास्त्री भारतीय विद्या प्रकाशन, दिल्ली, 1995 वही- हिंदी अनु. जगन्नाथ पाठक राका प्रकाशन, इलाहाबाद, 2005
24. कथासरित् (पत्रिका) (द्वितीयाङ्कः)
सम्पादकः डॉ. नारायणदाश कटकम्, ओडिशा


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